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इज़राइल–गाज़ा संघर्ष: इतिहास, नैतिकता और भारत की भूमिका | अपूर्वानंद #harkara

‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.

हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में प्रोफेसर अपूर्वानंद से इज़राइल, गाज़ा, फिलिस्तीन और भारत की भूमिका पर गहरी बातचीत हुई. हाल के घटनाक्रमों में इज़राइल पर लगे युद्ध अपराधों के आरोप, गाज़ा में बड़े पैमाने पर नागरिक हताहत, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदलता जनमत, इन सबके बीच यह चर्चा सिर्फ खबरों से आगे जाकर इतिहास, विचारधारा और नैतिकता के सवाल उठाती है.

बातचीत में 1948 के नकबा, ज़ायनिज़्म की वैचारिक जड़ों, होलोकॉस्ट के नैरेटिव के इस्तेमाल, और फिलिस्तीनियों के विस्थापन की वास्तविकता को समझने की कोशिश की गई है. साथ ही, यह भी देखा गया कि कैसे एक पूर्व इजराइली सैनिक की किताब इजराइल के “मोरल क्राइसिस” को उजागर करती है, जहां एक राष्ट्र अपने ही तर्कों के बोझ तले बदलता जा रहा है.

चर्चा का एक अहम हिस्सा भारत से जुड़ा है जहां पारंपरिक रूप से फिलिस्तीन के समर्थन से आगे बढ़कर अब इजराइल के साथ बढ़ती नज़दीकियों, वैचारिक समानताओं और नीतिगत प्रभावों पर सवाल उठते हैं. क्या भारत भी उसी रास्ते पर है जहां सुरक्षा के नाम पर नागरिक स्वतंत्रताएं और न्याय की प्रक्रिया कमज़ोर होती जा रही है? क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहां घृणा और हिंसा सामान्य बनती जा रही है?

यह बातचीत सिर्फ अंतरराष्ट्रीय राजनीति नहीं, बल्कि हमारे समाज, हमारी सोच और हमारे लोकतंत्र के भविष्य को समझने की कोशिश है.

पाठकों से अपील :

आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.

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