हरकारा डीप डाइव के इस लाइव इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ लोकतंत्र, चुनावी वैधता और विपक्ष की रणनीति पर चर्चा हुई. बातचीत की शुरुआत पराकला प्रभाकर के उस सवाल से हुई कि अगर विपक्ष चुनावी प्रक्रिया को “लूटा हुआ” मानता है, तो फिर उसी प्रक्रिया में लगातार हिस्सा क्यों लेता है.
श्रवण गर्ग ने कहा कि मुद्दा केवल बंगाल का नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे का संकट है. उन्होंने बिहार, हरियाणा और कर्नाटक जैसे राज्यों का जिक्र करते हुए दावा किया कि चुनावी प्रक्रिया, संवैधानिक संस्थाओं और न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.
चर्चा का बड़ा हिस्सा इस बहस पर केंद्रित रहा कि विपक्ष चुनावों का बहिष्कार करे या संघर्ष जारी रखे. पराकला प्रभाकर के विचारों का हवाला देते हुए कहा गया कि चुनाव में भागीदारी व्यवस्था को वैधता देती है, लेकिन श्रवण गर्ग ने तर्क दिया कि मैदान छोड़ना सत्ता पक्ष को “वॉकओवर” देने जैसा होगा. उनके मुताबिक, जनता अपने नेताओं को लड़ते हुए देखना चाहती है.
बातचीत में ममता बनर्जी के इस्तीफे, विपक्ष की कमजोर रणनीति और इंडिया ब्लॉक की अंदरूनी खींचतान पर भी चर्चा हुई. श्रवण गर्ग ने हंगरी का उदाहरण देते हुए कहा कि लंबे समय तक मजबूत दिखने वाली व्यवस्थाओं को भी लगातार राजनीतिक संघर्ष के जरिए चुनौती दी जा सकती है.
अंत में चर्चा इस निष्कर्ष पर पहुंची कि लोकतंत्र का संकट सिर्फ चुनावों का नहीं, बल्कि संस्थाओं, राजनीतिक नैरेटिव और जनता की भागीदारी तीनों का संयुक्त संकट बन चुका है.
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