हरकारा डीप डाइव के इस लाइव इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी और उनके साथी राजेश चतुर्वेदी ने पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के राजनीतिक सफर और उनके उदय के व्यापक असर पर विस्तार से चर्चा की.
बातचीत की शुरुआत इस बात से हुई कि शुभेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री बनना केवल एक चुनावी परिणाम नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति में एक बड़े संरचनात्मक बदलाव का संकेत है. इसे ऐसे नेता के रूप में देखा गया जिनका राजनीतिक सफर बेहद जटिल रहा है. कांग्रेस से शुरू होकर तृणमूल कांग्रेस तक और फिर भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख चेहरे के रूप में उभरना.
चर्चा में यह भी कहा गया कि उनका राजनीतिक करियर केवल सत्ता की राजनीति नहीं बल्कि विवादों, दल-बदल, प्रशासनिक अनुभव और तीखी राजनीतिक भाषा का मिश्रण रहा है. ट्रांसपोर्ट और सिंचाई जैसे अहम विभागों में मंत्री रहते हुए उनका प्रशासनिक अनुभव भी उनके राजनीतिक प्रोफाइल का हिस्सा बताया गया.
राजेश चतुर्वेदी ने विश्लेषण में यह सवाल उठाया कि भाजपा द्वारा ऐसे नेताओं को आगे लाना क्या एक नई राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है, जहां पहले के विरोधी चेहरे ही बाद में सत्ता के केंद्र बन जाते हैं. उन्होंने इसे “वाशिंग मशीन राजनीति” के रूप में भी संदर्भित किया, जिसमें पुराने आरोप और राजनीतिक छवि सत्ता में आने के बाद बदल जाती है.
बातचीत का एक बड़ा हिस्सा 2014 के नारदा स्टिंग और उसके बाद की राजनीतिक घटनाओं पर केंद्रित रहा, जहां भ्रष्टाचार के आरोप, जांच एजेंसियों की भूमिका और चुनावी राजनीति के बीच संबंधों को विस्तार से समझाया गया.
इसके साथ ही यह भी चर्चा हुई कि शुभेंदु अधिकारी के हालिया राजनीतिक बयानों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, हिंदू-मुस्लिम वोटिंग नैरेटिव और राजनीतिक टकराव की भाषा कैसे लगातार दिखाई देती है.
विश्लेषण में यह संकेत भी दिया गया कि बंगाल अब केवल एक राज्य की राजनीति नहीं रह गया है, बल्कि एक “टेम्पलेट” बनता जा रहा है, जिसे आने वाले समय में अन्य बड़े राज्यों, खासकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में दोहराया जा सकता है.
चर्चा के अंत में यह बड़ा सवाल सामने रखा गया कि क्या यह नया राजनीतिक मॉडल भारतीय लोकतंत्र को स्थिरता देगा या फिर ध्रुवीकरण और तनाव को और गहरा करेगा, और इसका असर 2029 के लोकसभा चुनावों की दिशा पर कितना पड़ेगा.
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