हरकारा डीप डाइव के इस लाइव इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी और वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया सार्वजनिक आह्वानों, आर्थिक संकट, खाड़ी युद्ध, कोविड मॉडल, चुनावी राजनीति और भारतीय लोकतंत्र की दिशा पर गहराई से चर्चा की. बातचीत की शुरुआत प्रधानमंत्री द्वारा नागरिकों से “सोना कम खरीदने”, “वर्क फ्रॉम होम करने”, “पेट्रोल-डीजल की खपत घटाने” और “खर्च कम करने” की अपील से होती है. इसके तुरंत बाद प्रधानमंत्री की भव्य यात्राओं, बड़े काफिलों और सार्वजनिक आयोजनों का जिक्र करते हुए इस विरोधाभास पर सवाल उठाया गया कि जनता के लिए सादगी और त्याग की अपील करने वाली सत्ता खुद उसी जीवनशैली का पालन करती दिखाई नहीं देती.
श्रवण गर्ग ने इस पूरे परिदृश्य को “कोविड मॉडल” का पुनरावर्तन बताया. उनका कहना था कि सरकार को कोविड काल के दौरान नागरिक नियंत्रण, भय, अनुशासन और केंद्रीकृत सत्ता संचालन का एक “टेम्पलेट” मिल गया था, जिसे अब नए आर्थिक और वैश्विक संकटों के बीच फिर से लागू करने की कोशिश दिखाई दे रही है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री लगातार “क्या मत करो” बता रहे हैं, लेकिन “क्या करना चाहिए” इसका कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं दे रहे.
बातचीत में भारत की गिरती आर्थिक स्थिति, शेयर बाजार में गिरावट, रुपये की कमजोरी, विदेशी निवेशकों द्वारा पूंजी निकासी, विदेशी मुद्रा भंडार में कमी और डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरती कीमत को सरकार की आर्थिक नीतियों से जोड़कर देखा गया. यह सवाल उठाया गया कि जब वैश्विक स्तर पर तेल सस्ता था तब उसका लाभ आम जनता तक क्यों नहीं पहुंचाया गया, जबकि संकट बढ़ते ही महंगाई और बोझ सीधे नागरिकों पर डाला जा रहा है.
इंटरव्यू में यह भी कहा गया कि सरकार एक तरफ विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की बात करती है, जबकि दूसरी तरफ विदेशी निवेश और बड़े कॉरपोरेट हितों के लिए दरवाजे लगातार खोले जा रहे हैं। चीन, रक्षा, बीमा और रिटेल सेक्टर में निवेश नीतियों का उल्लेख करते हुए इसे दोहरे मानदंड की राजनीति बताया गया.
चर्चा का बड़ा हिस्सा कोविड काल की यादों और उसके राजनीतिक इस्तेमाल पर केंद्रित रहा. लॉकडाउन, मजदूर संकट, ऑक्सीजन की कमी, वैक्सीन अव्यवस्था और मौतों के वास्तविक आंकड़ों को लेकर सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए गए. श्रवण गर्ग ने कहा कि कोविड के दौरान नागरिक अधिकारों को सीमित करने और भय के वातावरण का जो अनुभव सत्ता को मिला, वही मॉडल अब नए संकटों के संदर्भ में दोहराया जा सकता है.
इसके साथ ही खाड़ी क्षेत्र में जारी तनाव, इजराइल-ईरान संघर्ष और उसके भारत पर संभावित असर पर भी चर्चा हुई। बातचीत में आरोप लगाया गया कि सरकार ने समय रहते कोई तैयारी नहीं की और चुनाव खत्म होने तक संकट को सार्वजनिक रूप से स्वीकारने से बचती रही. तेल, गैस, उर्वरक और आयात आधारित अर्थव्यवस्था पर इसके असर को लेकर गहरी चिंता जताई गई.
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