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क्या गरीबी का संबंध जाति से है? तेलंगाना सर्वे ने दिया जवाब! सुमित झा #harkara

‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.

हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में हमने पत्रकार सुमित झा से गहन बातचीत की, जिन्होंने तेलंगाना के जातिगत सर्वे से उजागर हुई असमानताओं पर साउथ फर्स्ट में विस्तृत लेखों की श्रृंखला लिखी है. तेलंगाना का 2024 का जाति सर्वे, एक ऐसा सर्वे जो सिर्फ आंकड़े नहीं देता, बल्कि समाज की छुपी परतों को उधेड़ कर सामने रखता है. बातचीत में यह समझने की कोशिश की गई कि क्या सच में हम जाति से आगे बढ़ चुके हैं, या जाति आज भी हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी को चुपचाप नियंत्रित कर रही है.

सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय आर्थिक, शैक्षिक और स्वास्थ्य के स्तर पर अब भी पीछे हैं. इलाज के लिए क़र्ज़ लेना, असंगठित काम में फंसा रहना, और बुनियादी सुविधाओं की कमी, ये सब सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि जीवन की कठोर सच्चाइयां हैं. वहीं दूसरी तरफ, सरकारी योजनाओं का बड़ा हिस्सा उन वर्गों तक पहुंच रहा है जो पहले से ही अपेक्षाकृत मज़बूत हैं.

इस चर्चा में यह भी सामने आया कि ज़मीन, शिक्षा, माइग्रेशन और यहां तक कि बाल विवाह जैसे मुद्दों में भी जाति का असर साफ दिखाई देता है. शहरों की चमक के पीछे छुपी असमानता, और विदेश जाने के अवसरों में भी दिखती सामाजिक दूरी, ये सब इस सर्वे के ज़रिये उजागर हुआ.
देखें यह पूरा एपिसोड और अपने हम ख़्याल दोस्तों से ज़रूर साँझा करें.

पाठकों से अपील :

आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.

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