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परिसीमन का प्रश्न: उत्तर-दक्षिण असंतुलन और कंपनसेशन पॉलिटिक्स | डॉ. रथिन रॉय #harkara

‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.

हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में अर्थशास्त्री रथिन रॉय से ख़ास बातचीत हुई. इस चर्चा का केंद्र है भारत का एक बेहद संवेदनशील और जटिल मुद्दा: परिसीम, उत्तर बनाम दक्षिण का संतुलन, और बदलती राजनीति का चरित्र. बातचीत की शुरुआत इस सवाल से होती है कि आखिर भारत में “वन पर्सन, वन वोट” का सिद्धांत व्यवहार में क्यों लागू नहीं है. 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों का जो फिक्सेशन हुआ, उसने आज एक ऐसी स्थिति बना दी है जहां जनसंख्या और प्रतिनिधित्व के बीच असंतुलन स्पष्ट दिखता है.

बातचीत आगे बढ़ती है तो राजनीति के बदलते स्वरूप पर तीखी टिप्पणी सामने आती है. डॉ. रॉय इसे “कंपनसेशन पॉलिटिक्स ” कहते हैं, जहां सरकारें विकास के कठिन रास्ते पर चलने के बजाय मुफ्त योजनाओं, नकद हस्तांतरण और लाभार्थी राजनीति के जरिए वोट हासिल करने की कोशिश करती हैं. उनका तर्क है कि असली विकास वह है जिसमें लोगों को रोजगार, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसर मिलें न कि केवल असफलताओं की भरपाई के रूप में सहायता.

जाति, धर्म और पहचान की राजनीति के बीच विकास का एजेंडा पीछे छूटता जा रहा है। खासकर एक युवा देश होने के बावजूद, निर्णय लेने की शक्ति बुजुर्ग नेतृत्व के हाथों में केंद्रित है, जिससे नई सोच और ऊर्जा का सही उपयोग नहीं हो पा रहा. अगर आप भी भारत की राजनीती की इन बारीकियों को समझना चाहते हैं तो यह वीडियो आपके लिए है.

हरकारा लगातार यह कोशिशर कर रहा है कि हिंदी में सोचने, पढ़ने और समझने वाले दर्शकों के लिए ऐसे ही गहन और सारगर्भित विषयों पर डीप डाइव बातचीत लेकर आए जो आपको भारत की केवल राजनीतिक परिस्थिति से ही अवगत न कराए, बल्कि एक जागरूक नागरिक के रूप में आपकी समझ, भूमिका और दृष्टिकोण को भी सँवारे.

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डॉ. रथिन रॉय का यह आर्टिकल ज़रूर पढ़ें:
https://economictimes.indiatimes.com/opinion/et-commentary/the-delimitation-debate-reflects-our-inability-to-eschew-the-politics-of-handouts-caste-and-ethnicity/articleshow/130375799.cms?from=mdr

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