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मोदी सरकार में ‘आर्थिक आपातकाल’ के संकेत? श्रवण गर्ग #harkara

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‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग और वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी ने भारत की मौजूदा आर्थिक स्थिति, विदेशी निवेश में गिरावट, बढ़ती महंगाई, रुपया कमजोर होने और सरकार की आर्थिक नीतियों पर गहन चर्चा की. बातचीत की शुरुआत इस सवाल से हुई कि क्या भारत में बिना औपचारिक घोषणा के एक तरह का “आर्थिक आपातकाल” लागू हो चुका है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद लोगों से ऊर्जा बचाने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने और खर्च कम करने की अपील कर रहे हैं.

श्रवण गर्ग ने कहा कि देश की स्थिति “हड्डियों में बुखार” जैसी हो गई है. उनके अनुसार ऊपर से सब सामान्य दिखाया जा रहा है, लेकिन भीतर आर्थिक संकट गहरा चुका है. उन्होंने कहा कि अब तक देश में “अघोषित राजनीतिक आपातकाल” की बात होती रही, लेकिन अब वित्तीय और आर्थिक आपातकाल के लक्षण भी साफ दिखाई देने लगे हैं. उन्होंने अनुच्छेद 360 का जिक्र करते हुए कहा कि वित्तीय आपातकाल तब माना जाता है जब अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में हो और वित्तीय स्थिरता खतरे में पड़ जाए.

बातचीत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं और उनके बयानों का भी उल्लेख हुआ. श्रवण गर्ग ने कहा कि नीदरलैंड में भारतीय प्रवासियों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने दुनिया को “आपदाओं का दशक” बताया और कहा कि बड़ी आबादी गरीबी के दलदल में फंस सकती है. गर्ग के अनुसार यह बात प्रधानमंत्री को देश के नाम संदेश में भारत की जनता से कहनी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने विदेश में कही. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर दुनिया की बड़ी आबादी गरीबी में फंस रही है, तो भारत जैसे देश में पहले से मुफ्त अनाज पर निर्भर करोड़ों लोगों की स्थिति क्या होगी.

इंटरव्यू में राहुल गांधी के हालिया बयानों पर भी विस्तार से चर्चा हुई. श्रवण गर्ग ने कहा कि राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह को “गद्दार” तक कहा और आरोप लगाया कि उन्होंने भारत की आर्थिक व्यवस्था को बेच दिया है. उनके अनुसार यह भाषा अचानक नहीं आई होगी, बल्कि इसके पीछे गहरे आर्थिक और राजनीतिक संकेत हैं. उन्होंने कहा कि अगर देश की स्थिति सामान्य होती तो विपक्ष का सबसे बड़ा नेता इस तरह की तीखी भाषा इस्तेमाल नहीं करता.

बातचीत में गिरते विदेशी निवेश, बढ़ते आयात और कमजोर होते विदेशी मुद्रा भंडार का भी जिक्र हुआ. श्रवण गर्ग ने दावा किया कि पिछले कुछ महीनों में भारत का फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व तेजी से घटा है और विदेशी कंपनियां भारत में निवेश को लेकर असमंजस में हैं. उन्होंने टेस्ला का उदाहरण देते हुए कहा कि कंपनी ने भारत में कारोबारी माहौल, नीतिगत अनिश्चितता और कमजोर खरीद क्षमता को लेकर चिंता जताई है. उनके अनुसार यह संकेत है कि आने वाले समय में विदेशी निवेश और कम हो सकता है.

श्रवण गर्ग ने यह भी कहा कि भारत में अब लोग बैंकों से नकदी निकालकर घरों में रखने लगे हैं. उनके मुताबिक यह केवल डिजिटल भुगतान पर अविश्वास नहीं, बल्कि असुरक्षा की भावना का संकेत है. उन्होंने नोटबंदी और कोविड का उदाहरण देते हुए कहा कि लोग किसी बड़े आर्थिक झटके की आशंका से नकद जमा कर रहे हैं. पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी को भी उन्होंने “पैनिक सिचुएशन” का हिस्सा बताया.

इंटरव्यू में नीति आयोग की कथित रिपोर्ट का भी उल्लेख हुआ, जिसमें बढ़ती आयात लागत और ऊर्जा संकट के कारण बड़े सरकारी निर्माण प्रोजेक्ट्स को रोकने की चर्चा सामने आई थी. हालांकि सरकार और नीति आयोग ने ऐसी किसी अंतिम रिपोर्ट से इनकार किया है. इसके बावजूद बातचीत में यह सवाल उठाया गया कि क्या सरकार धीरे-धीरे खर्च सीमित करने की दिशा में बढ़ रही है.

बातचीत के अंतिम हिस्से में अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला के लेख का जिक्र हुआ. श्रवण गर्ग ने कहा कि जो लोग लंबे समय तक सरकार की आर्थिक नीतियों के समर्थक रहे, वे भी अब अर्थव्यवस्था को “डिरेल” बता रहे हैं. उनके अनुसार सरकार चुनाव जीतना जानती है, लेकिन अर्थव्यवस्था संभालना नहीं. उन्होंने कहा कि अगर अभी चुनाव हो जाएं तो सरकार शायद फिर जीत जाए, लेकिन “देश हार जाएगा.”

इंटरव्यू का समापन इस टिप्पणी के साथ हुआ कि भारत में आर्थिक संकट अब केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम लोगों के जीवन में महसूस होने लगा है. श्रवण गर्ग ने कहा कि लोगों को डराने के बजाय सचेत करना जरूरी है ताकि वे समझ सकें कि अर्थव्यवस्था किस दिशा में जा रही है और सरकार किन संकेतों के जरिए जनता को अप्रत्यक्ष संदेश दे रही है.

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