31/01/2026: अडानी समन लेने को तैयार | टेक इंडस्ट्री की खुदकुशियां | अहमदाबाद विमान हादसे के छह माह बाद | वांगचुक जेल से अस्पताल | एपस्टीन फाइलें | इजराइल पर बासिम यूसुफ | वंदेमातरम और जनगणमन
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियाँ
अडानी ने मानी बात: अमेरिकी एसईसी से फ्रॉड केस का नोटिस लेने पर सहमति. 90 दिन में देना होगा जवाब.
टेक इंजीनियर की मौत: बेंगलुरु में 24 साल के इंजीनियर की खुदकुशी. 15 घंटे काम और बर्नआउट बना वजह.
एयर इंडिया का दर्द: क्रैश के 6 महीने बाद परिवारों को मिली अपनों की जली हुई निशानियां.
एप्स्टीन का सच: डोनाल्ड ट्रम्प का नाम 30 लाख दस्तावेजों में 1000 बार. रेप के आरोप भी शामिल.
रसोइयों पर केस: छत्तीसगढ़ में 66 रुपये दिहाड़ी बढ़ाने की मांग करने वालों पर दंगा करने का केस.
आईपीएस नियम बदले: आईजी बनने के लिए अब केंद्र में 2 साल की नौकरी ज़रूरी.
एनकाउंटर पर रोक: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी पुलिस को लगाई फटकार. कहा घुटने पर गोली मारना कानूनन गलत.
पाकिस्तान में हिंसा: बलूचिस्तान में बीएलए के हमले. 21 लोगों की मौत. 67 उग्रवादी ढेर.
अमेरिकी एसईसी धोखाधड़ी मामला
ट्रंप का वकील ही अडानी का भी, कानूनी नोटिस प्राप्त करने पर सहमत
अदालत के एक दस्तावेज़ के अनुसार, अरबपति गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी, अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग (एसईसी) से एक दीवानी धोखाधड़ी मुकदमे में कानूनी नोटिस प्राप्त करने पर सहमत हो गए हैं. इस मुकदमे में आरोप लगाया गया है कि उन्होंने रिश्वतखोरी की योजना के बारे में निवेशकों को गुमराह किया. यह समझौता अदालत की मंजूरी के अधीन है.
ब्रुकलिन, न्यूयॉर्क की एक संघीय अदालत में दायर और ‘पीटीआई’ द्वारा देखे गए दस्तावेज़ में, एसईसी और गौतम एवं सागर अडानी के अमेरिका स्थित वकीलों ने कहा कि वकील नियामक के कानूनी कागजात स्वीकार करने के लिए सहमत हो गए हैं, जिससे न्यायाधीश को इस बात पर फैसला सुनाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी कि प्रतिवादियों को नोटिस कैसे दिया जाए.
इस संयुक्त आवेदन को संबंधित न्यायालय की मंजूरी के लिए प्रस्तुत किया गया है. यह अमेरिकी कानूनी कार्यवाही में एक मानक प्रक्रियात्मक कदम है, जो मामलों के व्यवस्थित समाधान की अनुमति देता है. यदि न्यायाधीश सहमत होते हैं, तो यह एसईसी मामले को आगे बढ़ने देगा और अडानी को 90 दिनों के भीतर अपना बचाव पेश करने या मामले को खारिज करने का प्रस्ताव देने का समय देगा. इसके बाद एसईसी अगले 60 दिनों के भीतर अपना विरोध दर्ज कर सकता है और प्रतिवादी उसके 45 दिनों के भीतर जवाब दे सकते हैं.
एसईसी ने नवंबर 2024 में एक मुकदमा दायर कर आरोप लगाया था कि दोनों ने अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड (एजीईएल) के बारे में झूठे और भ्रामक बयान देकर अमेरिकी प्रतिभूति कानूनों का उल्लंघन किया है. इसके अलावा, ब्रुकलिन के संघीय अभियोजकों ने सौर ऊर्जा अनुबंध हासिल करने के लिए भारत में 265 मिलियन डॉलर की रिश्वत योजना चलाने में मदद करने का भी आरोप लगाया है.
अडानी समूह ने अपने या संस्थापक परिवार के खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों को बार-बार नकारा है. दोनों मुकदमे एक साल से अधिक समय से रुके हुए थे, क्योंकि दोनों अडानी भारत में हैं और उन्हें नोटिस नहीं दिया जा सका था. पिछले हफ्ते, एसईसी ने अमेरिकी न्यायाधीश से नोटिस देने के वैकल्पिक तरीकों (जैसे ईमेल) की अनुमति मांगी थी.
एजीईएल ने स्टॉक एक्सचेंज फाइलिंग में कहा कि नोटिस स्वीकार करने की सहमति एक प्रक्रियात्मक कदम है और वे एसईसी की शिकायत को खारिज करने की मांग करेंगे. कंपनी ने स्पष्ट किया कि 30 जनवरी, 2026 को उनके वकीलों ने नोटिस स्वीकार किया है, लेकिन उन्होंने न्यूयॉर्क के पूर्वी जिला (ईडीएनवाई) के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया है और अपने सभी बचावों को सुरक्षित रखा है.
फाइलिंग में आगे कहा गया कि गौतम और सागर अडानी पर अमेरिकी विदेशी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (एफसीपीए) के उल्लंघन का आरोप नहीं लगाया गया है, यानी उन पर रिश्वतखोरी या भ्रष्टाचार के आपराधिक आरोप नहीं हैं. साथ ही, कंपनी इस कार्यवाही में पक्षकार नहीं है.
गौतम अडानी ने अपना पक्ष रखने के लिए वॉल स्ट्रीट के प्रसिद्ध वकील रॉबर्ट गिउफ्रा जूनियर को नियुक्त किया है, जिनके ग्राहकों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी शामिल हैं.
सरकारी अधिकारियों ने बताया कि एजीईएल का व्यावसायिक संचालन सभी क्षेत्रों में सामान्य रूप से जारी है और कंपनी अपने हितधारकों को मूल्य प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है. अडानी समूह ने कहा कि वह सभी न्यायक्षेत्रों में एक कानून का पालन करने वाले संगठन के रूप में काम करता है और उच्च मानकों को बनाए रखता है.
न्यूयॉर्क के पूर्वी जिला न्यायालय में प्रतिवादियों और एसईसी द्वारा दायर एक संयुक्त फाइलिंग में कहा गया कि एसईसी ने 17 फरवरी, 2025 को “भारत के कानून और न्याय मंत्रालय, कानूनी मामलों के विभाग को ‘दीवानी या वाणिज्यिक मामलों में न्यायिक और अतिरिक्त न्यायिक दस्तावेजों के विदेश में तामील पर हेग कन्वेंशन’ के तहत सहायता के लिए एक औपचारिक अनुरोध प्रस्तुत किया था, लेकिन प्रतिवादियों पर अभी तक नोटिस की तामील नहीं हो पाई थी.”
21 जनवरी, 2026 को, एसईसी ने एक प्रस्ताव और प्रस्तावित आदेश दायर किया, जिसमें प्रतिवादियों के अमेरिकी वकील और उनके व्यावसायिक ईमेल के माध्यम से ‘वैकल्पिक तामील’ करने की अनुमति मांगी गई थी. कोर्ट फाइलिंग में कहा गया, “23 जनवरी, 2026 को, प्रतिवादियों के अमेरिकी वकील प्रक्रिया की तामील स्वीकार करने के लिए सहमत हो गए, जिससे अदालत को इस प्रस्ताव पर निर्णय लेने की आवश्यकता समाप्त हो गई.”
टेक कर्मचारियों के सपनों की मौत: एक सुसाइड नोट, 15 घंटे की शिफ्ट और एआई (AI) का खौफ
“इसे एक एक्सीडेंट (दुर्घटना) बताना.” यह वो आखिरी संदेश था जो 24 वर्षीय निखिल सोमवंशी ने पिछले साल मई में अपने रूममेट को भेजा था. इसके कुछ ही देर बाद, भारत की ‘सिलिकॉन वैली’ कहे जाने वाले बेंगलुरु की एक झील के किनारे उसका शव मिला. निखिल, 1 अरब डॉलर के एआई स्टार्टअप ‘ओला कृत्रिम’ (Olai Krutrim) में मशीन-लर्निंग इंजीनियर था. उसकी मौत ने भारत के चमकते टेक उद्योग के पीछे छिपे अंधेरे सच—जानलेवा वर्क प्रेशर और एआई से नौकरी जाने के डर—को उजागर कर दिया है. निखिल महाराष्ट्र के एक छोटे से किसान परिवार से आता था. उसके माता-पिता ने उसकी पढ़ाई के लिए अपनी जमीन बेच दी थी. ‘कृत्रिम’ में नौकरी मिलना उसके गांव के लिए एक उत्सव जैसा था. उसकी सैलरी (3.7 लाख रुपये मासिक अनुमानित) उसके परिवार की खेती की कमाई से 10 गुना ज्यादा थी. लेकिन नौकरी लगते ही उस पर काम का पहाड़ टूट पड़ा. उसके चचेरे भाई सचिन के अनुसार, निखिल दिन में 15 घंटे काम करता था. उसकी कॉल लॉग्स में बॉस और एचआर की अनगिनत मिस्ड कॉल्स मिलीं. वह बेंगलुरु में अकेला पड़ गया था और वापस पुणे जाने की सोच रहा था, लेकिन परिवार को निराश करने के डर से चुप रहा.
उद्योग का संकट: बर्नआउट और आत्महत्याएं
निखिल की कहानी अकेली नहीं है. ‘रेस्ट ऑफ वर्ल्ड’ के विश्लेषण में पाया गया कि 2017 से 2025 के बीच 227 टेक कर्मचारियों ने आत्महत्या की है. एक सर्वे के मुताबिक, 83% भारतीय टेक कर्मचारी ‘बर्नआउट’ (अत्यधिक मानसिक थकान) से जूझ रहे हैं.
जहां एक ओर नारायण मूर्ति और भाविश अग्रवाल (ओला के संस्थापक) जैसे दिग्गज 70 से 90 घंटे के कार्य सप्ताह की वकालत कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कर्मचारी तनाव से टूट रहे हैं. टीसीएस जैसी बड़ी कंपनियों द्वारा एआई पुनर्गठन के नाम पर 20,000 कर्मचारियों की छंटनी और अमेरिका में एच-1बी वीजा नियमों में सख्ती ने भविष्य को अनिश्चित बना दिया है. यूनियन नेताओं का कहना है कि कर्मचारी आवाज उठाने से डरते हैं क्योंकि उन्हें ‘ब्लैकलिस्ट’ होने का डर रहता है. कंपनियां अक्सर आत्महत्या के मामलों को दबाने के लिए परिवारों को बीमा राशि का लालच देती हैं और नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट का हवाला देती हैं. निखिल के मामले में भी कंपनी ने परिवार को 18 लाख रुपये का मुआवजा दिया. उसके पिता छोटू सोमवंशी ने रुंधे गले से कहा, “हमें पता होता तो हम उसे वापस बुला लेते. पैसा ही सब कुछ नहीं है.”
‘मणिपुर बचाओ’ रैली में हजारों की भागीदारी; विस्थापितों के पुनर्वास और क्षेत्रीय अखंडता की मांग
“मणिपुर की अखंडता से कोई समझौता नहीं”, “छद्म युद्ध (प्रॉक्सी वार) बंद करो” और “मणिपुर अमर रहे” जैसे नारे लगाते हुए, शनिवार को इंफाल में हजारों लोगों ने एक विशाल रैली में भाग लिया. यह हाल के वर्षों में राज्य में देखी गई सबसे बड़ी रैलियों में से एक थी.
“द इंडियन एक्सप्रेस” के मुताबिक, कई मैतेई नागरिक निकायों के एक साझा समूह, ‘कोऑर्डिनेटिंग कमेटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी’ (कोकोमी) के नेतृत्व में, ‘मणिपुर कनबा खोंगचट’ या ‘मणिपुर बचाओ रैली’ का आयोजन किया गया. आयोजकों ने कहा कि इसका उद्देश्य यह संदेश देना था कि लोग राज्य को खंडित करने वाली किसी भी नीति के खिलाफ एकजुट हैं, और जातीय संघर्ष के कारण विस्थापित हुए लोगों के पुनर्वास की मांग करना है.
इस रैली में मैतेई मुस्लिम, जनजातीय समूहों के साथ-साथ जैन, पंजाबी, मारवाड़ी और बंगाली सहित विभिन्न समुदायों के लोग शामिल हुए, जिन्होंने टिड्डिम ग्राउंड से थौ ग्राउंड तक लगभग पांच किलोमीटर की दूरी तय की. आंतरिक रूप से विस्थापित लोग भी भारी संख्या में उमड़े, जिनमें से कई राहत शिविरों और प्रभावित इलाकों से यात्रा करके आए थे.
कोकोमी द्वारा कुछ दिन पहले दी गई अपील के कारण राज्य भर में जनजीवन प्रभावित रहा; व्यावसायिक प्रतिष्ठान बंद रहे और स्कूल-कॉलेज भी बंद रखे गए. भारी भीड़ का हवाला देते हुए कोकोमी के संयोजक खुराइजम अथौबा ने कहा कि इस रैली का उद्देश्य केंद्र सरकार को “स्पष्ट संदेश देना” है.
अथौबा ने मीडियाकर्मियों से कहा, “मणिपुर के लोगों ने विस्थापितों के पुनर्वास और संकट के समाधान की तत्काल मांगों के साथ बार-बार भारत सरकार से गुहार लगाई, लेकिन इस स्थिति को केवल एक जातीय संघर्ष के रूप में चित्रित करने के लिए जानबूझकर एक झूठा नैरेटिव (विमर्श) गढ़ा गया, ताकि केंद्र की कोई जिम्मेदारी न रहे.”
एयर इंडिया अहमदाबाद क्रैश: राख में मिली यादें और एक पिता का दर्द
“मैं उन आखिरी चीज़ों को थामे हुए था जिन्हें कमलेश ने छुआ था. मैं इन्हें हमेशा अपने पास रखना चाहता हूँ.” बनासकांठा के थवर गाँव में अपनी चारपाई पर बैठे सावधानभाई चौधरी की आँखों से आँसू थम नहीं रहे हैं. उनके हाथों में कुछ ज़िपलॉक बैग हैं - एक में उनके बेटे कमलेश की जली हुई शादी की एल्बम है, तो दूसरे में नए-नवेले जोड़े की तस्वीर वाला एक कैलेंडर. इन सब चीजों पर आग की लपटों के निशान हैं, ठीक वैसे ही जैसे उनके दिल पर. इंडियन एक्सप्रेस
में ऋतु शर्मा ने इस मामले पर एक लंबा रिपोर्ताज लिखा है.
छह महीने पहले, एयर इंडिया का बोइंग 787 ड्रीमलाइनर अहमदाबाद में उड़ान भरने के कुछ ही मिनटों बाद बीजे मेडिकल कॉलेज मेस की इमारत से टकराकर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. इस हादसे में विमान में सवार 242 में से 241 यात्रियों की मौत हो गई थी. अब, एयरलाइंस मलबे से बरामद 22,000 निजी सामानों में से पहचाने गए 8,000 सामानों को उनके वारिसों को सौंप रही है. बाकी 14,000 ‘अज्ञात’ वस्तुओं की तस्वीरें एक 492 पन्नों के पोर्टल पर अपलोड की गई हैं, जहाँ परिजन अपनों की निशानी तलाश रहे हैं.
त्रासदी और लंदन से आता एक कॉल
सावधानभाई और उनकी पत्नी रत्नीबेन ने 12 जून 2025 को 26 वर्षीय कमलेश और उसकी पत्नी धापुबेन को खुशी-खुशी लंदन के लिए विदा किया था. लेकिन रास्ते में ही उन्हें क्रैश की खबर मिली. कमलेश और धापुबेन की मौत के बाद से सावधानभाई के जीवन में एक नया लेकिन दर्दनाक रूटीन शुरू हो गया है. हर रोज़ दोपहर 3 बजे लंदन से उमर अली का कॉल आता है. उमर, लंदन की उस दुकान में कमलेश के साथ काम करते थे. पहले कॉल छोटे होते थे, क्योंकि उमर को गुजराती नहीं आती थी और सावधानभाई को हिंदी. लेकिन अब वे घंटों बात करते हैं. “मैं कमलेश के माता-पिता को अपना मानता हूँ,” उमर कहते हैं. सावधानभाई ने हाल ही में उमर के लिए वैसे ही गाय का घी भेजा, जैसा वे कमलेश के लिए भेजते थे.
पोर्टल पर बिखरी यादें
एयर इंडिया द्वारा बनाए गए पोर्टल पर हर वस्तु एक कहानी कहती है, एक अधूरी यात्रा की गवाह है. किसी बच्चे का स्वेटर जिस पर पाइन ट्री बने हैं, ‘डैड-टू-बी’ का बैज, राखी के गुच्छे, प्रार्थना की किताबें, और एक घड़ी की चेन. 31 वर्षीय पार्थ पटेल को एयर इंडिया से एक ईमेल मिला जिसमें उनकी माँ के पासपोर्ट और चाचा के बटुए की तस्वीरें थीं. पार्थ ने इस हादसे में अपनी माँ, चाचा और चाची को खो दिया. वे कहते हैं, “पोर्टल के 492 पन्नों को देखना भावनात्मक रूप से निचोड़ देने वाला था.”
कुछ ने यादें लेने से किया इनकार
जहाँ कुछ परिवार यादों को समेटने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो इस दर्द को दोबारा जीने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे. 24 वर्षीय क्रिकेटर डर्थ पटेल के भाई क्रूतिक कहते हैं, “हमने पोर्टल देखा, लेकिन फिर आगे न देखने का फैसला किया. माँ की हालत देखकर हम उन्हें दोबारा उस ट्रॉमा से नहीं गुज़ारना चाहते.” डर्थ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में गोल्ड मेडलिस्ट थे और यूनिवर्सिटी ऑफ हडर्सफ़ील्ड में रिसर्च एसोसिएट के तौर पर ज्वाइन करने वाले थे.
मुआवज़ा और भविष्य की राह
कमलेश की याद में सावधानभाई ने अपने जीवन को वैसे ही जीने का फैसला किया है जैसा उनका बेटा चाहता था. “कमलेश ने दिवाली पर कार लेने का वादा किया था. हमने मुआवजे के पैसों से कार खरीदी,” वे बताते हैं. उन्होंने मुआवजे की राशि का उपयोग उस कर्ज को चुकाने में भी किया जो उन्होंने कमलेश को लंदन भेजने के लिए लिया था. एयर इंडिया के प्रवक्ता ने कहा, “हम समझते हैं कि यह एक भावनात्मक और कठिन समय है. हम पूरी गरिमा और सम्मान के साथ परिवारों को उनकी अमानत सौंपने के लिए प्रतिबद्ध हैं.”
‘वे क्यों नहीं समझ सकते? 66 रुपये बहुत कम हैं’: छत्तीसगढ़ के रसोइयों पर ‘दंगा’ करने का केस दर्ज
प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण (पीएम-पोषण) मध्यान्ह भोजन योजना के तहत काम करने वाले सैकड़ों रसोइयों ने पिछले 34 दिनों से नवा रायपुर के तूता मैदान में विरोध प्रदर्शन किया. उनकी मांग थी कि उनकी दैनिक मजदूरी 66 रुपये से बढ़ाई जाए. गुरुवार रात, जब वे मंत्रालय की ओर मार्च कर रहे थे, पुलिस ने उन्हें रोक दिया और उन पर ‘दंगा’ करने का मामला दर्ज कर दिया.
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक छत्तीसगढ़ स्कूल मध्यान्ह भोजन रसोइया संयुक्त संघ के सचिव मेघराज बघेल ने कहा, “पहले हमने शिक्षा मंत्री से मुलाकात की थी और 440 रुपये प्रति दिन की मांग की थी, लेकिन उन्होंने केवल 500 रुपये प्रति माह बढ़ाने की बात कही, जिसे हमने अस्वीकार कर दिया. फिर हमने कहा कि हमें कम से कम प्रतिदिन 261 रुपये चाहिए जो मनरेगा श्रमिकों को दिया जाता है, लेकिन वह मांग भी ठुकरा दी गई.”
पुलिस ने रसोइयों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 126(2) (गलत तरीके से रोकना) और 191(2) (दंगा) के तहत प्राथमिकी दर्ज की है. अभनपुर पुलिस स्टेशन के एक अधिकारी ने कहा, “हमने उन्हें कई बार सड़क खाली करने के लिए कहा, लेकिन वे नहीं माने.” हालांकि, संघ के अध्यक्ष रामराज कश्यप का कहना है, “हमने किसी सार्वजनिक संपत्ति को हाथ भी नहीं लगाया. यह सच है कि हमने सड़क जाम की थी, लेकिन हमने कोई दंगा नहीं किया.”
बघेल सवाल उठाते हैं, “वे हमारी स्थिति क्यों नहीं समझ सकते? हम चार से पांच घंटे काम करते हैं, और 66 रुपये बहुत कम हैं. वे महंगाई दर के हिसाब से भी भुगतान नहीं कर रहे हैं.”
जेल में तबीयत बिगड़ने पर सोनम वांगचुक को एम्स ले जाया गया
कार्यकर्ता और वैज्ञानिक सोनम वांगचुक को न्यायिक हिरासत में स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद, उच्चतम न्यायालय के निर्देशों पर चिकित्सा परीक्षण के लिए एम्स जोधपुर ले जाया गया.
राजेश असनानी की रिपोर्ट है कि पुलिस शनिवार तड़के (31 जनवरी) करीब 6.30 बजे वांगचुक को जोधपुर सेंट्रल जेल से एम्स के इमरजेंसी वार्ड में लेकर आई. उन्हें लगभग डेढ़ घंटे तक निगरानी में रखा गया और एक गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट (उदर रोग विशेषज्ञ) ने उनकी जाँच की.
एम्स के सूत्रों के अनुसार, वांगचुक पेट से संबंधित बीमारियों से पीड़ित हैं और उन्होंने शरीर के कई हिस्सों में दर्द की शिकायत भी की है. उन्हें एक दिन पहले भी मेडिकल टेस्ट के लिए संस्थान ले जाया गया था. जांच के बाद, उन्हें कड़ी सुरक्षा के बीच वापस जोधपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया.
वांगचुक के स्वास्थ्य पर चिंता उनकी पत्नी द्वारा व्यक्त की गई थी, जिन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल के माध्यम से उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर की थी, जिसमें उनकी स्थिति में लगातार गिरावट का हवाला दिया गया था. गुरुवार (29 जनवरी) को सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ ने जेल प्रशासन को वांगचुक की जाँच किसी सरकारी अस्पताल के विशेषज्ञ डॉक्टर से कराने का निर्देश दिया था.
सिब्बल ने अदालत को बताया कि वांगचुक पेट की समस्याओं से जूझ रहे हैं, जो कथित तौर पर जेल में उपलब्ध कराए गए पीने के पानी की गुणवत्ता के कारण हुई हैं. उन्होंने तर्क दिया कि बार-बार शिकायत के बावजूद उनके इलाज के लिए कोई विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं था. वकील ने यह भी मांग की कि वांगचुक की साप्ताहिक चिकित्सा जाँच की जाए और उनके परिवार द्वारा आपूर्ति किए जाने वाले स्वच्छ पेयजल की अनुमति दी जाए.
उच्चतम न्यायालय ने अधिकारियों को 2 फरवरी तक वांगचुक की मेडिकल रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया है. सुनवाई के दौरान राजस्थान सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने अदालत को सूचित किया कि वांगचुक को नियमित चिकित्सा सुविधा मिल रही है और पिछले चार महीनों में जेल के डॉक्टरों ने 21 बार उनकी जाँच की है.
शिक्षाविद् और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को पिछले साल सितंबर में लद्दाख की संवैधानिक स्थिति को लेकर लेह में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद हिरासत में लिया गया था. वांगचुक तब से हिरासत में हैं और अब एनएसए के तहत जेल में 100 से अधिक दिन बिता चुके हैं.
आईपीएस की कमी का सामना कर रहे केंद्र ने पदोन्नति के लिए केंद्रीय प्रतिनियुक्ति को अनिवार्य किया
केंद्र में भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारियों की भारी कमी का सामना करते हुए, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पदोन्नति के दिशानिर्देशों में संशोधन किया है, ताकि वरिष्ठ पदों पर पैनल में शामिल होने के लिए केंद्रीय प्रतिनियुक्ति को अनिवार्य बनाया जा सके.
मुकेश रंजन की रिपोर्ट के अनुसार, एक आदेश में, गृह मंत्रालय ने नियमों को संशोधित करते हुए कहा है कि आईपीएस अधिकारियों को अब केंद्र में महानिरीक्षक (आईजी) या उसके समकक्ष पद के लिए पात्र होने के लिए पुलिस अधीक्षक (एसपी) और उप महानिरीक्षक (डीआईजी) के पद पर, या उसके समकक्ष स्तर पर, न्यूनतम दो वर्ष की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पूरी करनी होगी.
यह निर्णय गृह मंत्रालय द्वारा राज्य सरकारों को ‘केंद्रीय प्रतिनियुक्ति रिजर्व’ (सीडीआर) के अनुरूप पर्याप्त संख्या में आईपीएस अधिकारियों को नामित करने के लिए बार-बार भेजे गए रिमाइंडर्स के बाद लिया गया है. ये रिमाइंडर्स केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन के स्तर से भी भेजे गए थे, जिनमें केंद्र में विशेष रूप से एसपी और डीआईजी स्तर पर कर्मचारियों की कमी को रेखांकित किया गया था. आदेश के अनुसार, संशोधित दिशानिर्देश 2011 बैच और उसके बाद के आईपीएस अधिकारियों पर लागू होंगे.
गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि युवा आईपीएस अधिकारियों में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के प्रति उदासीनता बढ़ी है. इसका मुख्य कारण जिलों में फील्ड पोस्टिंग का आकर्षण है, जहां वे पुलिस बल का नेतृत्व करते हैं और सीधे कमान संभालते हैं. परिणामस्वरूप, कई अधिकारी अपने करियर के शुरुआती और मध्य चरणों के दौरान अपने संबंधित राज्य कैडर में रहना पसंद करते हैं. हालांकि, रुझानों से पता चलता है कि अधिकारी आईजी या उससे ऊपर के स्तर पर पहुँचने के बाद ही केंद्र में सेवा करने के इच्छुक होते हैं. इसी असंतुलन को देखते हुए सरकार ने पदोन्नति दिशानिर्देशों में बदलाव किया है, ताकि अधिकारियों को करियर के शुरुआती दौर में ही केंद्रीय अनुभव लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके.
हालांकि, एक अन्य अधिकारी ने इस बात पर जोर दिया कि इस कदम का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केंद्र सरकार में वरिष्ठ नेतृत्व पदों के लिए विचार किए जाने से पहले अधिकारियों को केंद्रीय स्तर पर पर्याप्त अनुभव प्राप्त हो.
गृह मंत्रालय ने इस आदेश को एक पत्र के साथ सभी राज्य सरकारों के मुख्य सचिवों को भेज दिया है, जिसमें उन्हें अपने संबंधित कैडर में कार्यरत आईपीएस अधिकारियों को इन संशोधित नियमों के बारे में सूचित करने का निर्देश दिया गया है. इस सूचना की प्रतियां राज्यों के पुलिस महानिदेशकों, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग, गृह मंत्रालय के केंद्र शासित प्रदेश प्रभाग और अन्य संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों को भी भेज दी गई हैं.
साल 2021 में, अखिल भारतीय सेवा अधिकारियों की इसी तरह की कमी के बीच, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने राज्य सरकार की अनिवार्य मंजूरी के बिना आईएएस, आईपीएस और आईएफ़एस अधिकारियों को केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर भेजने का प्रस्ताव दिया था. हालांकि, राज्यों के कड़े विरोध के बाद उस प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था.
मौजूदा नियमों के अनुसार, केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए अधिकारी की सहमति और राज्य सरकार की मंजूरी दोनों आवश्यक हैं. आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले साल दिसंबर तक केंद्र में एसपी स्तर के स्वीकृत 229 पदों में से 104 खाली थे, जबकि डीआईजी स्तर के 256 पदों में से 69 पद नहीं भरे जा सके थे.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एनकाउंटर की बढ़ती घटनाओं पर यूपी पुलिस को लगाई फटकार, आरोपी को दी जमानत
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एक आरोपी को जमानत दे दी और पुलिस को घुटने या उसके नीचे गोली मारने की लगातार घटनाओं पर कड़ी फटकार लगाई.
राजू उर्फ राज कुमार को जमानत देते समय न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने कहा कि अधिकारियों को “अनावश्यक गोलीबारी और शरीर के गैर-महत्वपूर्ण हिस्सों पर चोट पहुंचाकर” किसी अपराधी को सजा देने की अनुमति नहीं दी जा सकती. ‘पीटीआई’ के मुताबिक, अदालत के पहले के निर्देश के बाद, उत्तरप्रदेश के अतिरिक्त गृह सचिव संजय प्रसाद और पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण शुक्रवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उच्च न्यायालय के समक्ष पेश हुए.
उन दोनों (अधिकारियों) ने बताया कि 1 अगस्त 2017 और 11 अक्टूबर 2024 को जारी किए गए परिपत्र, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए उन निर्देशों के अनुपालन में जारी किए गए थे, जो ऐसी पुलिस मुठभेड़ों से संबंधित हैं जिनमें मृत्यु या गंभीर चोटें आती हैं.
हालांकि, अधिकारियों के जवाबों से संतुष्ट न होते हुए, अदालत ने निर्देश दिया कि यदि कोई मुठभेड़ होती है और उसमें आरोपी को गंभीर चोट आती है, तो उसकी जांच सीबी सीआईडी या किसी अन्य पुलिस स्टेशन की पुलिस टीम द्वारा की जानी चाहिए.
अदालत ने यह भी कहा कि एफआईआर में शामिल पुलिस टीम के सदस्यों का नाम लेना आवश्यक नहीं है, बल्कि केवल यह बताना ही पर्याप्त होगा कि वे विशेष कार्य बल (एसटीएफ) से थे या नियमित पुलिस बल से.
अदालत ने कहा कि घायल अपराधी को चिकित्सा सहायता प्रदान की जानी चाहिए और मजिस्ट्रेट या चिकित्सा अधिकारी के समक्ष बयान दर्ज होने के बाद उनकी चोट की जांच की जानी चाहिए.
अदालत ने कहा, “पुलिस मुठभेड़ की घटना की पूरी जांच के बाद, संबंधित सक्षम न्यायालय को एक रिपोर्ट भेजी जानी चाहिए, जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पीयूसीएल मामले में दिए गए फैसले में उल्लिखित प्रक्रिया का पालन करेगा.”
अदालत ने आगे कहा, “पुलिस मुठभेड़ की घटना के तुरंत बाद पुलिस टीम के अधिकारी को आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन या वीरता पुरस्कार नहीं दिया जाना चाहिए. यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ऐसे पुरस्कार तभी दिए जाएं या उनकी सिफारिश की जाए, जब पुलिस प्रमुख द्वारा गठित समिति द्वारा उस व्यक्ति की वीरता बिना किसी संदेह के स्थापित हो जाए.” अदालत ने निर्देश दिया कि यदि घायल के परिवार को पुलिस प्रक्रिया में कोई कमी मिलती है, तो वे सत्र न्यायाधीश से शिकायत कर सकते हैं.
सुनेत्रा पवार महाराष्ट्र की पहली महिला उपमुख्यमंत्री, आबकारी, खेल और अल्पसंख्यक विकास विभाग मिले
एनसीपी के दिवंगत नेता अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार, जिन्होंने शनिवार को महाराष्ट्र की पहली महिला उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, को राज्य आबकारी (एक्साइज), खेल एवं युवा कल्याण और अल्पसंख्यक विकास विभाग आवंटित किए गए हैं. पदभार ग्रहण करने के बाद से यह उनकी पहली बड़ी प्रशासनिक जिम्मेदारी है.
“टीएनआईई” के अनुसार, मंत्रिपरिषद के विस्तार और फेरबदल के कुछ ही घंटों बाद घोषित इस विभाग आवंटन ने पवार को उन विभागों का प्रभारी बनाया है, जिनमें राजस्व की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है.
पवार को कैबिनेट में शामिल किया जाना और इन विभागों का सौंपा जाना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के भीतर पवार परिवार की बढ़ती राजनीतिक भूमिका को रेखांकित करता है. हालांकि, वह दशकों से सार्वजनिक जीवन से जुड़ी रही हैं, लेकिन उन्होंने औपचारिक रूप से चुनावी राजनीति में हाल ही में प्रवेश किया और पिछले साल राज्यसभा के लिए चुनी गईं. उपमुख्यमंत्री के पद पर उनकी पदोन्नति और प्रमुख विभागों का आवंटन, राजनीतिक रूप से संवेदनशील और प्रशासनिक रूप से चुनौतीपूर्ण कार्यों को संभालने की उनकी क्षमता पर पार्टी नेतृत्व के भरोसे का संकेत देता है. ताजा आवंटन के साथ ही नए शामिल किए गए मंत्रियों के बीच विभागों का वितरण पूरा हो गया है और इसे कैबिनेट विस्तार के बाद सरकार के पहले बड़े प्रशासनिक कदम के रूप में देखा जा रहा है.
राज्यपाल की मंजूरी का इंतज़ार कर रहा ‘हेट स्पीच बिल’, हिंदुत्ववादी नेता को नोटिस देने पर पुलिसकर्मी निलंबित
कर्नाटक पुलिस ने ‘कर्नाटक नफ़रती भाषा और नफ़रती अपराध (निवारण और नियंत्रण) विधेयक, 2025’ के तहत एक हिंदुत्ववादी नेता को नोटिस जारी करने के आरोप में एक निरीक्षक (इंस्पेक्टर) को निलंबित कर दिया है, क्योंकि यह कानून अभी तक लागू ही नहीं हुआ है.
यह विधेयक, जिसे दिसंबर 2025 में शीतकालीन सत्र के दौरान राज्य विधायिका द्वारा पारित किया गया था, वर्तमान में राज्यपाल की मंजूरी का इंतजार कर रहा है.
‘मकतूब मीडिया’ के अनुसार, यह मामला तब प्रकाश में आया जब भाजपा विधायक वी. सुनील कुमार ने विधानसभा में इसे उठाते हुए आरोप लगाया कि चिक्कमगलुरु जिले के तारिकेरे क्षेत्र के एक पुलिस निरीक्षक ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम से पहले हिंदू दक्षिणपंथी नेता विकास पुत्तुर को प्रस्तावित कानून के प्रावधानों का हवाला देते हुए नोटिस थमाया. कुमार ने तर्क दिया कि चूंकि विधेयक को राज्यपाल से मंजूरी नहीं मिली है, इसलिए इसे लागू नहीं किया जा सकता.
ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से इस मामले को उठाते हुए, कुमार ने आरोप लगाया कि हिंदुत्व कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है और उन्हें राज्य भर में हिंदू समाजोत्सव और अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेने से रोका जा रहा है. इसके जवाब में, कर्नाटक के गृह मंत्री जी. परमेश्वर ने एक लिखित उत्तर में कहा कि कानून-व्यवस्था की चिंताओं के कारण अलग-अलग जिलों में चार हिंदू दक्षिणपंथी नेताओं पर प्रतिबंध लगाए गए थे.
कांग्रेस के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने ‘कर्नाटक नफ़रती भाषा और नफ़रती अपराध (निवारण और नियंत्रण) विधेयक, 2025’ को नफरत भरी भाषा और सामाजिक वैमनस्य फैलाने वाले अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए पेश किया था. यह अभद्र भाषा को संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में रखता है, जिसमें पहली बार के अपराधियों के लिए एक साल और दोबारा अपराध करने वालों के लिए दो से सात साल तक की सजा का प्रावधान है. भाजपा ने इस विधेयक का विरोध करते हुए तर्क दिया कि इसका दुरुपयोग पुलिस को व्यापक शक्तियां देकर उनके नेताओं को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है. विपक्ष के विरोध के बावजूद विधेयक दोनों सदनों में पारित हो गया था. तब से, कर्नाटक भाजपा ने राज्यपाल को एक प्रतिवेदन सौंपकर इस पर हस्ताक्षर न करने का आग्रह किया है.
दलित मैनेजर के ट्रांसफर के बाद गाय के गोबर से दफ़्तर की सफ़ाई की गयी
तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले से जातिगत भेदभाव की एक बेहद शर्मनाक घटना सामने आई है. मेट्टुपालयम बस डिपो में एक ड्राइवर ने अपने ही ब्रांच मैनेजर के ट्रांसफर के बाद दफ़्तर का फर्श गोबर से साफ करवाया, आरोप है कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि मैनेजर का ताल्लुक़ अनुसूचित जाति (एससी) से था.
यह घटना 23 जनवरी की है. न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, मेट्टुपालयम शाखा के मैनेजर डी. प्रकाशकुमार का ट्रांसफर उक्कडम कर दिया गया था. उनके जाते ही ड्राइवर एस. शशिराज ने सफाईकर्मी से ऑफिस में गोबर लगवाया और आपत्तिजनक टिप्पणी की कि “शाखा से गंदगी साफ हो गई.” यह सब मैनेजर के सामने ही हुआ, जिससे वह मानसिक रूप से बेहद आहत हुए और काम पर लौट नहीं पाए.
मामले के सामने आने के बाद तमिलनाडु राज्य परिवहन निगम ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी ड्राइवर शशिराज को सस्पेंड कर दिया. शशिराज एलपीएफ यूनियन का सचिव भी है. अधिकारियों के अनुसार, उसके ख़िलाफ़ पहले भी शिकायतें थीं कि वह दलित कर्मचारियों को मुश्किल रूट देता था और अपने करीबी लोगों को सुविधाजनक ड्यूटी दिलवाता था. उस पर छुट्टी और पोस्टिंग के बदले पैसे लेने के भी आरोप हैं.
बताया जा रहा है कि मैनेजर प्रकाशकुमार ने शशिराज की मनमानी पर आपत्ति जताई थी और उसे नोटिस भी दिया था. इसी से नाराज़ होकर शशिराज ने दबाव बनवाकर उनका ट्रांसफर करा दिया. हालांकि, शशिराज ने सभी आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि सफाई सामान्य प्रक्रिया थी, इसे जातिगत रंग दिया जा रहा है.
कालाज़ार पर भारत की बड़ी जीत: बीमारी खत्म होने के करीब, डबल्यूएचओ प्रमाणन की ओर देश
भारत में कालाज़ार (काला बुखार) की बीमारी लगभग खत्म होने की कगार पर है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जहां 1992 में इसके 77,000 से ज़्यादा मामले थे, वहीं 2025 में यह संख्या घटकर सिर्फ 429 रह गई है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) के नियम के अनुसार, किसी देश को अगर लगातार तीन साल तक प्रति 10,000 आबादी पर एक से कम मामला रहता है, तो उसे बीमारी उन्मूलन का दर्जा मिल सकता है. भारत इस लक्ष्य के बहुत करीब पहुंच चुका है.
कालाज़ार एक गंभीर बीमारी है जो सैंडफ्लाई के काटने से फैलती है और शरीर के अंदरूनी अंगों को प्रभावित करती है. समय पर इलाज न हो तो यह जानलेवा हो सकती है. भारत में इसके नियंत्रण में बड़ी भूमिका रही है नई दवाओं, बेहतर जांच तकनीकों, और सरकारी निगरानी कार्यक्रमों की. पहले इस्तेमाल होने वाली दवा के असर खत्म होने के बाद मिल्टेफोसिन और बाद में एम्फोटेरिसिन-बी जैसी असरदार दवाएं आईं, जिससे इलाज आसान और सुरक्षित हुआ. इसके अलावा, तेज़ जांच के लिए रैपिड टेस्ट और नई तकनीकें भी मददगार रहीं.
हालांकि चुनौतियां अभी बाकी हैं. बीमारी का एक रूप पीकेडीएल (पोस्ट-कालाज़ार डर्मल लीशमैनियासिस) अब भी संक्रमण फैला सकता है. साथ ही, जलवायु परिवर्तन, पलायन और दवा प्रतिरोध जैसी समस्याएं खतरा बनी हुई हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि सतर्क निगरानी, समय पर इलाज और सरकारी प्रतिबद्धता बनी रही तो भारत जल्द ही कालाज़ार से पूरी तरह मुक्त देश बन सकता है.
24 साल के वकील ने खोली पोल, मध्य प्रदेश पुलिस के ‘फ़र्ज़ी गवाहों’ पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती
इंदौर में 150 से ज्यादा मामलों में दो गवाह को बार बार इस्तेमाल करने का खुलासा हुआ है. इसका पर्दाफ़ाश इंदौर के एक वकील असद अली वारसी ने की है.
‘आर्टिकल 14’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इंदौर के 24 वर्षीय वकील सद अली वारसी की याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश पुलिस की गंभीर अनियमितताओं पर कड़ा रुख अपनाया. वारसी ने आरोप लगाया था कि इंदौर के चंदन नगर थाने में ही दो गवाहों का इस्तेमाल 150 से ज़्यादा मामलों में किया गया. इस पर 13 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने थाने के एसएचओ इंद्रमणि पटेल को हटाने का आदेश दिया.
कोर्ट ने कहा कि “बार-बार एक ही गवाहों का इस्तेमाल जांच की निष्पक्षता को खत्म करता है” और यह कानून के ख़िलाफ़ है. कोर्ट ने एसएचओ को “रोग अफसर” जैसा बताते हुए कहा कि उन्होंने जानबूझकर गलत तरीके अपनाए.यह मामला तब सामने आया जब अनवर हुसैन नामक व्यक्ति ने ज़मानत मांगी और पुलिस ने उस पर आठ केस होने का दावा किया, जबकि बाद में सामने आया कि कई केसों में वह आरोपी ही नहीं था. पुलिस ने गलती को “कंप्यूटर जनरेटेड” बताया, जिसे कोर्ट ने सिरे से ख़ारिज कर दिया.
वकील वारसी ने बताया कि सितंबर 2024 में उनके ख़िलाफ़ भी झूठा केस दर्ज किया गया था, जब उन्होंने रिश्वत देने से इनकार किया। बाद में अदालत ने उनके खिलाफ मामला खारिज कर दिया. इसके बाद उन्होंने जांच शुरू की और पाया कि एक गवाह के नाम पर 200 से ज़्यादा एफआईआर दर्ज हैं. सुप्रीम कोर्ट ने इसे बेहद गंभीर बताते हुए इंदौर पुलिस कमिश्नर तक को जवाबदेह ठहराया.
कोर्ट के आदेश के बाद एसएचओ पटेल को लाइन अटैच कर दिया गया और विभागीय जांच शुरू हुई. इसी दौरान यह भी सामने आया कि बीते दो साल में मध्य प्रदेश पुलिस पर 329 एफआईआर दर्ज हुई हैं. कई मामलों में चार्जशीट दाखिल हुई, कुछ अब भी जांच में हैं.
इसी तरह एक और मामले में 18 साल के छात्र सोहनलाल को झूठे ड्रग केस में फंसाया गया. सीसीटीवी फुटेज से पुलिस का दावा झूठा साबित हुआ और छह पुलिसकर्मी सस्पेंड किए गए. एक अन्य मामले में राजा दुबे को बिना केस दर्ज किए 30 घंटे हिरासत में रखा गया, जिसे हाईकोर्ट ने संविधान के अधिकारों का उल्लंघन बताया.
इन मामलों ने मध्य प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि पुलिस की जवाबदेही तय करने के लिए स्वतंत्र जांच एजेंसी ज़रूरी है, ताकि आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हो सके.
पाकिस्तान: बलूचिस्तान में अलगाववादियों का भीषण हमला, बच्चों समेत 21 की मौत, 67 उग्रवादी ढेर
पाकिस्तान का अशांत बलूचिस्तान प्रांत शनिवार (31 जनवरी 2026) को एक के बाद एक कई हमलों से दहल उठा. अलगाववादियों ने पूरे दक्षिणी पाकिस्तान में पुलिस स्टेशनों, एक हाई-सिक्योरिटी जेल और अर्धसैनिक बलों के मुख्यालयों को निशाना बनाकर सुनियोजित हमले किए. अधिकारियों के मुताबिक, इस हिंसा में 11 आम नागरिक और 10 सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं. वहीं, जवाबी कार्रवाई में सुरक्षा बलों ने 67 उग्रवादियों को मार गिराने का दावा किया है.
प्रतिबंधित अलगाववादी समूह ‘बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी’ (बीएलए) ने इन हमलों की जिम्मेदारी ली है. समूह ने कुछ वीडियो जारी किए हैं जिनमें महिलाएं भी इन हमलों में सक्रिय रूप से भाग लेती दिखाई दे रही हैं, जो इस संघर्ष में एक नए और खतरनाक ट्रेंड का संकेत है. बलूचिस्तान में विद्रोही अक्सर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों को निशाना बनाते हैं, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर एक साथ कई जगहों पर हमला करना दुर्लभ माना जा रहा है. ग्वादर शहर, जो चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) का केंद्र है, वहां भी भारी हिंसा हुई. पुलिस अधिकारी इबाद खान ने बताया कि मारे गए 11 नागरिकों में तीन महिलाएं और तीन बच्चे शामिल थे. ये सभी जातीय रूप से बलूच थे. अधिकारियों का कहना है कि पिछले 48 घंटों में पूरे प्रांत में कुल 108 आतंकवादी मारे जा चुके हैं.
ट्रंप और एपस्टीन फाइलों का सच: 30 लाख दस्तावेजों में रेप के आरोप और एफबीआई के नोट्स का खुलासा
शुक्रवार को अमेरिकी न्याय विभाग ने यौन अपराधी जेफरी एपस्टीन से जुड़े 30 लाख से अधिक दस्तावेज जारी किए. इन दस्तावेजों में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नाम 1,000 से अधिक बार आया है. दस्तावेजों ने न केवल ट्रंप के एपस्टीन के साथ पुराने संबंधों को उजागर किया है, बल्कि एफबीआई के आंतरिक नोट्स और पीड़ितों के बयानों से कई गंभीर आरोप भी सामने आए हैं.
क्या हैं प्रमुख आरोप? (सभी असत्यापित)
13 साल की बच्ची से रेप का आरोप: एफबीआई के दस्तावेजों में एक महिला (जिसे ‘जेन डो’ कहा गया है) का जिक्र है, जिसने पहले मुकदमा दायर कर आरोप लगाया था कि 13 साल की उम्र में ट्रंप ने उसका रेप किया था और एपस्टीन इस बात से नाराज था कि “ट्रंप ने उसकी वर्जिनिटी ले ली.”
मैक्सवेल की भूमिका: एक अन्य नोट के मुताबिक, एपस्टीन की सहयोगी गिलेन मैक्सवेल ने एक पीड़िता को पार्टी में ट्रंप के सामने “पेश” किया था और कहा था, “वह तुम्हें पसंद करते हैं.” हालांकि, उस महिला ने कहा कि ट्रंप के साथ कुछ गलत नहीं हुआ.
फ्लाइट लॉग्स का खंडन: 2020 में अभियोजकों ने सबूत जुटाए थे कि ट्रंप 1990 के दशक में एपस्टीन के प्राइवेट जेट में कई बार उड़े थे. यह ट्रंप के उस दावे को झूठा साबित करता है जिसमें उन्होंने कहा था कि वे “कभी एपस्टीन के प्लेन में नहीं बैठे.”
ट्रंप का विरोध और आधिकारिक बयान
राष्ट्रपति रहते हुए ट्रंप ने इन फाइलों को जारी करने का भारी विरोध किया था, लेकिन अमेरिकी संसद (कांग्रेस) ने कानून पास कर इसे अनिवार्य बना दिया. शुक्रवार को जारी दस्तावेजों पर न्याय विभाग ने कहा कि ट्रंप के खिलाफ लगाए गए आरोप “झूठे और सनसनीखेज” हैं और अगर इनमें सच्चाई होती तो जांच एजेंसियां पहले ही कार्रवाई कर चुकी होतीं. दस्तावेजों में एपस्टीन और उसके सहयोगियों (जैसे स्टीव बैलन और माइकल वोल्फ) के बीच ईमेल भी मिले हैं. 2016 में ट्रंप की जीत के बाद एपस्टीन ने वोल्फ से पूछा था, “ट्रंप अब क्या करेंगे?” वहीं, पूर्व ट्रेजरी सेक्रेटरी लैरी समर्स के साथ बातचीत में जब समर्स ने ट्रंप को “मानसिक रूप से बीमार” कहा, तो एपस्टीन ने जवाब दिया, “वह मेरा दोस्त नहीं है.”
भारत ने पीएम मोदी से जुड़े ‘एपस्टीन फाइल’ के संदर्भ को घटिया विचार बता खारिज किया
भारत ने शनिवार को जेफ्री एपस्टीन से जुड़ी जांच फाइलों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदर्भ को दृढ़ता से खारिज कर दिया. भारत ने इसे “एक सजायाफ्ता अपराधी के घटिया विचार” बताते हुए कहा कि इसे “कड़ी अवमानना” के साथ खारिज कर दिया जाना चाहिए.
‘पीटीआई’ के अनुसार, दोषी करार दिए गए यौन तस्कर से जुड़ी नवीनतम फाइलें हाल ही में अमेरिकी अधिकारियों द्वारा जारी की गई थीं. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक बयान में कहा, “हमने तथाकथित एपस्टीन फाइलों के एक ईमेल संदेश की खबरें देखी हैं, जिसमें प्रधानमंत्री और उनकी इज़राइल यात्रा का संदर्भ है.”
उन्होंने कहा, “जुलाई 2017 में प्रधानमंत्री की आधिकारिक इज़राइल यात्रा के तथ्य के अलावा, ईमेल में किए गए बाकी सभी संकेत एक सजायाफ्ता अपराधी के घटिया विचारों से अधिक कुछ नहीं हैं, जो पूरी तरह से तिरस्कार के साथ खारिज किए जाने के योग्य हैं.”
यह ईमेल उन जांच फाइलों का हिस्सा है, जिन्हें शुक्रवार को अमेरिकी न्याय विभाग ने जारी किया था. विभाग ने अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित एक कानून के अनुरूप 35 लाख पन्ने और 2,000 वीडियो सार्वजनिक किए हैं.
ईरान के बंदर अब्बास में इमारत में विस्फोट, गैस रिसाव को बताया गया कारण
शनिवार (31 जनवरी, 2026) को दक्षिणी ईरानी बंदरगाह शहर बंदर अब्बास में एक इमारत में जोरदार विस्फोट हुआ. स्थानीय दमकल विभाग के प्रमुख के हवाले से अर्ध-सरकारी मेहर समाचार एजेंसी ने बताया कि विस्फोट का कारण गैस रिसाव था. इस घटना में कम से कम एक व्यक्ति की मौत हो गई और 14 अन्य घायल हो गए.
आधिकारिक ‘इरना’ समाचार एजेंसी ने होर्मुजगन प्रांत के संकट प्रबंधन महानिदेशक मेहरदाद हसनजादेह के हवाले से कहा कि विस्फोट के कारणों की जांच की जा रही है. उन्होंने बताया कि घायलों को अस्पताल ले जाया जा रहा है, हालांकि उन्होंने किसी की मौत की पुष्टि नहीं की. सरकारी टीवी पर दिखाए गए दृश्यों में इमारत का अगला हिस्सा पूरी तरह से उड़ा हुआ दिखाई दिया और मलबा चारों ओर बिखरा हुआ था.
यह विस्फोट ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक बयानबाजी के बाद अमेरिका ने क्षेत्र में एक विमान वाहक पोत समूह तैनात किया है, जिससे ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ गया है. हालांकि, शुरुआती रिपोर्ट्स इसे एक दुर्घटना बता रही हैं.
‘वंदे मातरम और जन गण मन भारत के दो अलग-अलग विचार हैं’: टीएम कृष्णा
अपनी नई किताब ‘We, the People of India: Decoding a Nation’s Symbols’ में प्रसिद्ध कर्नाटक शास्त्रीय गायक टीएम कृष्णा ने भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों की व्याख्या की है. उनका कहना है कि राष्ट्रीय प्रतीक किसी देश के संघर्षों और आकांक्षाओं के रूपक होते हैं.
इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित लेख में कृष्णा बताते हैं कि 2016 के आसपास उन्होंने पूरा राष्ट्रगान गाना शुरू किया था, जिससे उन्हें इसके अर्थ को गहराई से समझने की प्रेरणा मिली. “संगीत कई तरह से प्रतीकात्मक होता है. जब आप कोई धुन सुनते हैं, तो वह कुछ ट्रिगर करती है,” वे कहते हैं.
किताब में राष्ट्रगान (जन गण मन) और राष्ट्रीय गीत (वंदे मातरम) पर चर्चा करते हुए कृष्णा कहते हैं कि ये दोनों गीत भारत के दो अलग-अलग विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं. “अगर आप भारत को एक हिंदू-केंद्रित भूमि के रूप में देखते हैं जहाँ दूसरों को समायोजित किया जा सकता है, तो ‘वंदे मातरम’ आपका गीत है. अगर आप मानते हैं कि भारत वह जगह है जहाँ हर कोई अलग भाषा बोलता है, अलग कपड़े पहनता है, अलग देवताओं की पूजा करता है, फिर भी समान रूप से रहता है, तो ‘जन गण मन’ आपका गीत है.”
कृष्णा ने किताब में संविधान की प्रस्तावना को भी शामिल किया है, हालाँकि यह आधिकारिक राष्ट्रीय प्रतीक नहीं है. उनका मानना है कि हमने एक लोगों के रूप में अपने संविधान को विफल कर दिया है. “हमने भारत के लोगों के साथ संविधान की भावना को साझा नहीं किया है... हम एक जाति-आधारित समाज हैं जो सैकड़ों वर्षों से सामंती विचारों को आगे बढ़ा रहे हैं,” वे कहते हैं. गोपालकृष्ण गांधी इस मुद्दे पर उनसे असहमत हैं, लेकिन कृष्णा का तर्क है कि सांस्कृतिक रूप से हमने एक लोकतांत्रिक संस्कृति विकसित नहीं की है.
बासिम युसूफ का अमेरिका, इजरायल पर प्रहार: ‘वे झूठ बोलते हैं, क्योंकि उन्हें इसमें मजा आता है’
मशहूर मिस्री-अमेरिकी कॉमेडियन और व्यंग्यकार बासिम युसूफ ने हाल ही में दक्षिणपंथी अमेरिकी कमेंटेटर कैंडेस ओवेन्स के साथ एक विस्तृत बातचीत में इजरायल-हमास युद्ध, अमेरिकी मीडिया के प्रोपेगेंडा और पश्चिमी देशों की ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के भ्रम पर तीखा हमला बोला है. अपने खास व्यंग्यात्मक अंदाज में बासिम ने कहा कि दुनिया को अब ‘गैसलाइट’ (भ्रमित) किया जा रहा है और इतिहास को बदलने की कोशिश हो रही है.
‘बेन शपिरो तथ्यों से तेज भागते हैं’
बातचीत की शुरुआत में कैंडेस ओवेन्स ने स्वीकार किया कि पियर्स मॉर्गन के शो पर बासिम के वायरल इंटरव्यू ने गाजा के प्रति उनका नजरिया बदल दिया. बासिम ने उस इंटरव्यू में इजरायली और फिलिस्तीनी जानों की कीमत के ‘एक्सचेंज रेट’ का चार्ट दिखाया था. इस पर बासिम ने अमेरिकी कमेंटेटर बेन शपिरो की आलोचना करते हुए कहा, “बेन शपिरो एक बहुत प्रतिभाशाली झूठे हैं. वे इतनी तेजी से बोलते हैं कि सच उनके झूठ की रफ्तार को पकड़ ही नहीं पाता. वे तथ्यों को तोड़ते-मरोड़ते हैं.” बासिम ने उदाहरण देते हुए कहा कि कैसे शपिरो ने यूरोपीय संघ द्वारा दिए गए पानी के पाइपों को हमास द्वारा हथियार बनाने की झूठी कहानी गढ़ने के लिए एक अरबी वीडियो का गलत अनुवाद किया.
‘इजरायल एक नार्सिसिस्टिक साइकोपैथ की तरह है’
बासिम ने इजरायल के रवैये की तुलना एक ‘नार्सिसिस्टिक साइकोपैथ’ (आत्ममुग्ध मनोरोगी) से की. उन्होंने कहा, “इजरायल पहले आपको मारता है, और फिर आपको यह विश्वास दिलाता है कि यह आपकी ही गलती थी. वे खुद को पीड़ित के रूप में पेश करते हैं, जबकि वे उत्पीड़क हैं.” बासिम ने कहा कि इजरायल सिर्फ सच छिपाने के लिए झूठ नहीं बोलता, बल्कि वे “मनोरंजन के लिए झूठ बोलते हैं”, ताकि सामने वाले को थका दिया जाए. उन्होंने यूएसएस लिबर्टी हमले और ऐतिहासिक ‘फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन्स’ (जैसे किंग डेविड होटल बमबारी) का हवाला देते हुए कहा कि एक ऐसे देश पर कैसे भरोसा किया जा सकता है जिसका धोखे का इतना लंबा इतिहास रहा हो.
अमेरिका में आजादी का भ्रम
अमेरिकी लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कटाक्ष करते हुए बासिम ने कहा कि एक आप्रवासी के रूप में उन्हें अब समझ आ रहा है कि ‘साम्राज्य’ का नागरिक होना कैसा लगता है. उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “तीसरी दुनिया के देशों में हम जानते हैं कि हम भ्रष्ट हैं और हम बोल नहीं सकते क्योंकि यह खतरनाक है. अमेरिका में हर कोई जानता है, हर कोई बोल सकता है, लेकिन कुछ बदलता नहीं है. आपको बोलने की आजादी दी गई है ताकि आपको लगे कि आप भागीदारी कर रहे हैं, लेकिन परिणाम शून्य है.”
धर्म और राजनीति का अंतर
बासिम ने यहूदी धर्म और जायनिज़्म के बीच स्पष्ट अंतर करने की वकालत की. उन्होंने कहा कि एक राजनीतिक विचारधारा (जायनिज़्म) ने एक पूरे धर्म को हाईजैक कर लिया है. उन्होंने कहा, “मेरे कई यहूदी दोस्त परेशान हैं कि उनकी पहचान का इस्तेमाल एक ऐसे समूह द्वारा किया जा रहा है जो केवल सत्ता और जमीन का भूखा है.” बासिम ने ईसाई जायनिज़्म पर भी सवाल उठाए, जहां पादरी अपने ही अनुयायियों को बताते हैं कि वे यहूदियों से कम खास हैं और उन्हें इजरायल के लिए सब कुछ न्योछावर कर देना चाहिए.
गाजा और पश्चिमी नैतिकता
गाजा में हो रही मौतों पर बासिम ने कहा कि पश्चिम ने फिलिस्तीनियों को पूरी तरह अमानवीय बना दिया है. उन्होंने कहा, “अगर आप बच्चों की हत्या को सही ठहराते हैं, तो आप अपनी इंसानियत खो चुके हैं.” उन्होंने अमेरिकी नीतियों पर व्यंग्य करते हुए कहा कि उन्हें अब अमेरिका में अच्छा लग रहा है क्योंकि, “यह एक ऐसा देश है जो आधी दुनिया पर हमला कर सकता है और फिर भी बिना किसी परिणाम के ओलंपिक या वर्ल्ड कप होस्ट कर सकता है. यह असली ताकत है.”
अंत में, बासिम ने चेतावनी देते हुए कहा कि जिस तरह की सेंसरशिप और प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल फिलिस्तीन के मुद्दे पर किया जा रहा है, वह धीरे-धीरे अमेरिकी नागरिकों के खिलाफ भी इस्तेमाल होगा. “जब वे नियंत्रण खोने लगेंगे, तो वे और अधिक क्रूर और बेवकूफ बन जाएंगे,” बासिम ने निष्कर्ष निकाला.
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