30/04/2026: रुपये की बुरी गत | बंगाल चुनाव होते ही जमानत | ईडी पर सवाल | बीजेपी दफ़्तर से एग्जिट पोल | मोदी के डर पर श्रवण गर्ग | प्रेस फ्रीडम में पाकिस्तान आगे | पेसा 'हथियार' | नए हमले की तैयारी
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
बंगाल चुनाव: एक्ज़िट पोल के बाद बीजेपी का जश्न, टीएमसी की चौकसी, और 27 लाख मतदाताओं का अधर में भविष्य
ईडी ने कोई आपत्ति नहीं की, दिल्ली की अदालत ने आई-पैक निदेशक विनेश चंदेल को जमानत दी
‘लोकतंत्र का मजाक’: आई-पैक संस्थापक को जमानत के बाद एजेंसियों की भूमिका पर सवाल
ममता का दावा: ‘तृणमूल 226 से ज्यादा सीटें जीतेगी’, एग्जिट पोल भाजपा ऑफिस से भेजे गए
“लग रहा है कि घर में बेघर हो गए हम”: वोटर लिस्ट से नाम कटने का दर्द
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 95.34 के सर्वकालिक निचले स्तर पर
विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026: भारत छह स्थान फिसला, पाकिस्तान पांच पायदान ऊपर
विश्लेषण: बंगाल चुनाव में केंद्रीय बलों पर आरोप और बढ़ता राजनीतिक तनाव
श्रवण गर्ग: क्या मोदी के डर से मुक्त होने का यही सबसे अच्छा अवसर है?
असम सीएम की पत्नी पर टिप्पणी मामला: पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड 92% मतदान, लेकिन वजह बनी घटती मतदाता संख्या
छत्तीसगढ़ में पेसा कानून का दुरुपयोग: आदिवासियों के नाम पर ईसाइयों पर दबाव
ट्रम्प को ईरान पर सैन्य विकल्पों की ब्रीफिंग, नई योजना तैयार
ईरान युद्ध में अमेरिका के अरबों डॉलर के सैन्य उपकरण तबाह
ट्रम्प का दांव: क्या नाकाबंदी ईरान को झुका पाएगी?
ईरान युद्ध से ब्रिक्स में दरार, भारत की कूटनीतिक परीक्षा
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 95.34 के सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंचा
पश्चिम एशिया संकट के बीच घरेलू इक्विटी में बिकवाली और वैश्विक कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के चलते, रुपया गुरुवार (30 अप्रैल 2026) को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.34 के अपने सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंच गया. इसके बाद मिड-सेशन सौदों में यह 95.25 पर कारोबार कर रहा था.
इस बीच, कच्चे तेल की उच्च कीमतों के कारण पैदा हुए मजबूत मुद्रास्फीति दबाव को देखते हुए, अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया और उन्हें यथावत रखा.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में, रुपया डॉलर के मुकाबले 95.01 पर खुला और फिर 46 पैसे टूटकर 95.34 के रिकॉर्ड इंट्राडे निचले स्तर पर पहुंच गया. दोपहर के सत्र में, घरेलू मुद्रा 37 पैसे की गिरावट के साथ 95.25 पर कारोबार कर रही थी.
इससे पहले बुधवार को, रुपया 20 पैसे कमजोर होकर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 94.88 के सर्वकालिक निचले स्तर पर बंद हुआ था. फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स एलएलपी के ट्रेजरी हेड और कार्यकारी निदेशक अनिल कुमार भंसाली ने कहा, “रुपये पर मुख्य प्रभाव कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का पड़ा है, जो 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं. इनके और ऊपर जाने की संभावना है, क्योंकि अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी जारी रखी है, जबकि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य से किसी भी जहाज या टैंकर को गुजरने नहीं दे रहा है.”
इस बीच, डॉलर इंडेक्स, जो छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले ग्रीनबैक (अमेरिकी डॉलर) की मजबूती को मापता है, 0.03 प्रतिशत की मामूली गिरावट के साथ 98.79 पर कारोबार कर रहा था.
वैश्विक तेल बेंचमार्क, ब्रेंट क्रूड, वायदा कारोबार में 3.46 प्रतिशत की बढ़त के साथ 122.11 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था.
घरेलू शेयर बाजार की बात करें तो, दोपहर के कारोबार में सेंसेक्स 687.75 अंक गिरकर 76,808.61 अंक पर आ गया, जबकि निफ्टी 228.60 अंक टूटकर 23,949.05 पर आ गया. एक्सचेंज के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने बुधवार को 2,468.42 करोड़ रुपये मूल्य के शेयर बेचे. भंसाली ने आगे कहा, “विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) भारतीय इक्विटी और ऋण (जहां यील्ड बुधवार को 7 प्रतिशत तक पहुंच गई) की बिक्री जारी रखे हुए हैं और वे लगातार डॉलर के खरीदार बने हुए हैं.”
ईडी ने कोई आपत्ति नहीं की, दिल्ली की अदालत ने आई-पैक निदेशक विनेश चंदेल को जमानत दी
‘द हिंदू ब्यूरो’ के मुताबिक, दिल्ली की एक अदालत ने गुरुवार (30 अप्रैल, 2026) को राजनीतिक परामर्शदाता संस्था ‘इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी’ (आई-पैक) के निदेशक विनेश चंदेल को नियमित जमानत दे दी. यह फैसला तब आया जब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने उनकी जमानत याचिका का विरोध नहीं किया.
चंदेल को केंद्रीय एजेंसी ने 13 अप्रैल को गिरफ्तार किया था, जो पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों से कुछ दिन पहले की बात है. राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म आई-पैक के निदेशक और सह-संस्थापक चंदेल, चुनावी राज्य में एक कथित कोयला घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोपी हैं. उन्हें यह जमानत बंगाल में 29 अप्रैल को विधानसभा चुनाव का मतदान संपन्न होने के एक दिन बाद मिली है.
पटियाला हाउस कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमित बंसल ने चंदेल द्वारा दायर जमानत याचिका को स्वीकार कर लिया. अदालत ने दर्ज किया कि आवेदक के वकील ने पीएमएलए की धारा 45 का हवाला दिया और प्रस्तुत किया कि वर्तमान मामले में विशेष लोक अभियोजक को जमानत का विरोध करने का अवसर दिया गया था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, इसलिए इस मामले में ‘दोहरी शर्तें’ लागू नहीं होंगी.
ईडी ने आरोप लगाया है कि चंदेल हवाला सहित अनौपचारिक माध्यमों से धन स्थानांतरित करने और औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से बाहर लेनदेन करने में शामिल थे.
एजेंसी ने आगे दावा किया कि जाँच के दौरान दिए गए बयान एकत्र किए गए साक्ष्यों के साथ मेल नहीं खाते थे, और विभिन्न संस्थाओं के साथ किए गए कई वित्तीय लेनदेन का कोई स्पष्ट वैध उद्देश्य प्रतीत नहीं होता था.
‘लोकतंत्र का मजाक’: क्या बंगाल चुनाव के लिए गिरफ्तार किया था? जमानत के बाद ईडी पर सवाल
इस बीच आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि विनेश चंदेल को यह जमानत इसलिए संभव हो सकी, क्योंकि ईडी ने याचिका का विरोध नहीं किया.
‘टीएनआईई ऑनलाइन’ के अनुसार, ‘आप’ नेता ने चुनाव के दौरान केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए इसे “लोकतंत्र का मजाक” करार दिया. उन्होंने अपनी पोस्ट में कहा: “क्या आपने कभी एजेंसियों द्वारा लोकतंत्र का इससे ज़बरदस्त मज़ाक देखा है? आप सभी ने देखा कि चुनाव आयोग ने क्या किया. आप सभी ने देखा कि ईडी ने क्या किया. आप सभी ने देखा कि कैसे केंद्र सरकार ने केंद्रीय सुरक्षा बलों को मैदान में झोंक दिया. मैं भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस के समर्थकों से पूछना चाहता हूँ, ‘क्या आप इसी तरह चुनाव जीतेंगे?”
उन्होंने दावा किया कि आई-पैक, जो पश्चिम बंगाल चुनाव के लिए ममता बनर्जी की अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के साथ काम कर रही थी, को मतदान से कुछ दिन पहले कार्रवाई का सामना करना पड़ा. उनके अनुसार, आई-पैक के कार्यालयों पर छापे मारे गए, इसके संस्थापक-निदेशक चंदेल को गिरफ्तार किया गया और कई कर्मचारियों को पूछताछ के लिए बुलाया गया.
भारद्वाज ने आरोप लगाया कि इस कार्रवाई ने आई-पैक संगठन पर दबाव बनाया, जिससे उनके चुनाव संबंधी काम प्रभावित हुए और कई कर्मचारियों को छुट्टी पर भेज दिया गया. उन्होंने कहा कि चुनाव के ठीक बाद मिली जमानत ईडी की कार्रवाईयों की टाइमिंग पर सवाल खड़े करती है.
ममता का दावा, ‘तृणमूल 226 से ज्यादा सीटें जीतेगी’, टीवी चैनलों को एग्जिट पोल दोपहर 1.08 बजे भाजपा ऑफिस से भेजे गए थे
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गुरुवार को आरोप लगाया कि एग्जिट पोल के अनुमान टीएमसी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिराने के लिए “भाजपा के निर्देश” पर प्रसारित किए जा रहे हैं. उन्होंने दावा किया कि उनकी पार्टी विधानसभा की 294 सीटों में से 226 से अधिक सीटें जीतेगी.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, 4 मई को होने वाली मतगणना से पहले ‘एक्स’ पर पोस्ट किए गए एक वीडियो संदेश में, बनर्जी ने दावा किया कि टेलीविजन चैनल उन चुनावी अनुमानों को चला रहे हैं जो “भाजपा कार्यालय से प्रसारित” किए गए थे.
उन्होंने आरोप लगाया, “टेलीविजन पर जो दिखाया जा रहा है, उसे दोपहर 1:08 बजे भाजपा कार्यालय से भेजा गया था. इसका प्रसारण सुनिश्चित करने के लिए पैसे दिए गए थे. मेरे पास इसकी विशिष्ट जानकारी है.”
अपनी पार्टी की संभावनाओं पर भरोसा जताते हुए बनर्जी ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) 294 सदस्यीय विधानसभा में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा आसानी से पार कर लेगी. उन्होंने कहा, “हम 2026 में 226 सीटों का आंकड़ा पार करेंगे. हम 230 के भी पार जा सकते हैं. मुझे जनता द्वारा दिए गए भारी जनादेश पर पूरा भरोसा है.”
टीएमसी प्रमुख ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर भी निशाना साधा और आरोप लगाया कि “अमित शाह के सीधे निर्देश पर, केंद्रीय बल पूरी मतदान प्रक्रिया में पश्चिम बंगाल में भाजपा के एजेंट के रूप में काम कर रहे थे.”
निर्वाचन आयोग ने बुधवार को बताया कि 2026 के विधानसभा चुनावों में राज्य में स्वतंत्रता के बाद से अब तक का सबसे अधिक मतदान दर्ज किया गया है, जहाँ दो चरणों में कुल 92.47 प्रतिशत मतदान हुआ. आयोग ने कहा कि बुधवार को दूसरे और अंतिम चरण के मतदान में शाम 7:45 बजे तक 91.66 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया, जबकि पहले चरण में 93.19 प्रतिशत मतदान हुआ था.
जानें फलोदी सट्टा बाजार का अनुमान
‘द टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के अनुसार, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में रिकॉर्ड मतदान के बाद, फलोदी सट्टा बाजार ने दूसरे चरण के बाद अपने अनुमानों को संशोधित किया है. प्रथम चरण के बाद फलोदी सट्टा बाजार ने टीएमसी को 158-161 सीटें और भाजपा को 127-130 सीटें मिलने का अनुमान जताया था. लेकिन, दूसरे चरण के बाद संशोधित अनुमान के अनुसार, भाजपा 294 सदस्यीय विधानसभा में 148 के बहुमत के आंकड़े को पार करते हुए 150-152 सीटें हासिल कर सकती है, जबकि टीएमसी को 137-140 सीटें मिलने का अनुमान है.
बंगाल चुनाव: एक्ज़िट पोल के बाद बीजेपी का जश्न, टीएमसी की चौकसी, और 27 लाख मतदाताओं का अधर में भविष्य
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की वोटिंग खत्म होते ही राज्य की सियासत तीन धाराओं में बंट गई है. एक तरफ बीजेपी जश्न की तैयारी में है, दूसरी तरफ टीएमसी स्ट्रॉन्गरूम की निगरानी में जुटी है, और तीसरी तरफ करीब 27 लाख ऐसे मतदाता हैं जिनके नाम वोटर लिस्ट से काटे गए — और जिनका भविष्य अब भी कानूनी अंधेरे में है.
बीजेपी दफ्तर में मिठाइयां, टीएमसी की बैठकें गुप्त ठिकानों पर
साल्ट लेक स्थित बीजेपी के राज्य मुख्यालय में माहौल साफ तौर पर उत्साहजनक था. कार्यकर्ता फूलों के गुलदस्ते और मिठाइयों के डिब्बे लेकर पहुंच रहे थे. पार्टी नेताओं ने 23 अप्रैल को हुए पहले चरण में 92 प्रतिशत से ज़्यादा मतदान को अपने पक्ष में जनादेश का संकेत बताया. एक बीजेपी पदाधिकारी ने कहा, “कार्यकर्ताओं का उत्साह जनता के जनादेश को दर्शाता है.”
पार्टी के राज्य अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने दिनभर मुख्यालय में रहकर उम्मीदवारों से फोन पर बात की. उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “हम पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने पर केंद्रित हैं. जश्न उसके बाद होगा.” उन्होंने यह भी कहा कि यह मान लेना गलत होगा कि सारे अल्पसंख्यक वोट एक ही पार्टी को जाते हैं — “हम भी अंकगणित समझते हैं.”
पर्दे के पीछे पटाखे और रंगीन गुलाल जमा किए जा रहे हैं. एक पार्टी सूत्र ने बताया, “जैसे ही रुझान साफ होंगे, पूरा इलाका जश्न में डूब जाएगा. लेकिन नतीजों से पहले कोई उत्सव नहीं.” श्यामनगर से आए प्रदीप्तो घोष ने कहा, “गिनती के दिन नेता व्यस्त रहेंगे, इसलिए हम पहले ही बधाई देने आ गए.”
दफ्तर के बाहर चाय बेचने वाले बिस्वजीत दास ने बताया कि पिछले तीन महीनों में उनकी रोज़ाना की कमाई तिगुनी हो गई. पूर्व सीपीआई(एम) समर्थक और अब बीजेपी के साथ खड़े दास बोले, “मेरा मानना है कि वे सरकार बनाएंगे.”
इसके उलट, टीएमसी के अधिकांश दफ्तर या तो बंद रहे या शाम को थोड़ी देर के लिए खुले. भवानीपुर के एक वरिष्ठ टीएमसी नेता ने बताया, “हम अज्ञात ठिकानों से रणनीति बना रहे हैं. केंद्रीय बलों की कथित धमकियों के बाद पार्टी कार्यालयों से काम करना जोखिम भरा है.”
ममता: ‘स्ट्रॉन्गरूम की रात-दिन रखवाली करो’
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो संदेश में कार्यकर्ताओं से सीधी अपील की. उन्होंने कहा, “मैं सभी कार्यकर्ताओं और उम्मीदवारों से स्ट्रॉन्गरूम और मतगणना केंद्रों की रखवाली करने को कहूंगी. अगर मैं जाग सकती हूं, तो आप भी जाग सकते हैं. रात भर सतर्क रहें और जनादेश की सुरक्षा सुनिश्चित करें.”
ममता ने एक्ज़िट पोल को “राजनीतिक रूप से प्रेरित” बताकर खारिज किया. उनके अनुसार, मीडिया के एक वर्ग को बीजेपी ने पैसे देकर ऐसे आंकड़े दिखवाए ताकि पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटे और शेयर बाज़ार में संभावित गिरावट को रोका जा सके. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान केंद्रीय बल “अमित शाह के सीधे निर्देश पर बीजेपी के एजेंट की तरह काम कर रहे थे.”
उन्होंने दावा किया कि टीएमसी 294 में से 226 से ज़्यादा सीटें जीतेगी. उन्होंने कहा, “एक्ज़िट पोल का इस्तेमाल हमारे कार्यकर्ताओं को हतोत्साहित करने के लिए किया जा रहा है. अगर असली नतीजे आए तो सबको हैरानी होगी.”
टीएमसी नेता कुणाल घोष और शशि पांजा ने नेताजी इंडोर स्टेडियम — जो एक मतगणना केंद्र है — के बाहर धरना दिया. उनका आरोप था कि सभी दलों के प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति में ईवीएम तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है. घोष और पांजा ने कहा, “यह पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाता है.”
पार्टी कार्यकर्ता प्रणब दास ने कहा, “हम दीदी की बात पर भरोसा करते हैं. खासकर महिला मतदाताओं ने पिछले 15 सालों में टीएमसी की योजनाओं का लाभ उठाया है. हमें नतीजों पर भरोसा है लेकिन हम सतर्क हैं.”
एग्जिट पोल में बड़ा फर्क; किसी ने बीजेपी को बहुमत दिया, किसी ने टीएमसी को
बुधवार को आए अधिकांश एक्ज़िट पोल ने बंगाल में कड़े मुकाबले का अनुमान लगाया, जिसमें बीजेपी को बढ़त मिलती दिखी. मैट्रिज़ ने बीजेपी को 146 से 161 सीटें और टीएमसी को 125 से 140 सीटें दीं. पोल डायरी ने बीजेपी को 142 से 171 और टीएमसी को 95 से 110 सीटें दीं. पी-मार्क के मुताबिक बीजेपी को 150 से 175 और टीएमसी को 118 से 138 सीटें मिल सकती हैं. चाणक्य स्ट्रैटेजीज़ ने बीजेपी को 150 से 160 और टीएमसी को 130 से 140 सीटें दीं.
सबसे आशावादी अनुमान प्रजा पोल का था जिसने बीजेपी को 178 से 208 और टीएमसी को महज़ 85 से 110 सीटें दीं. एकमात्र पीपुल्स पल्स ने टीएमसी को बहुमत देते हुए 177 से 187 सीटें और बीजेपी को 95 से 110 सीटें आंकीं.
कुल मिलाकर, बीजेपी के अनुमान 95 से 208 सीटों के बीच फैले हैं — यह भारी अंतर दर्शाता है कि एक्ज़िट पोल कितने अनिश्चित हैं. विश्लेषकों ने चेताया कि चुनाव आयोग की विवादास्पद स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (एसआईआर) प्रक्रिया, जिससे करीब 91 लाख वोटर लिस्ट से हटाए गए, ने इन अनुमानों को और जटिल बना दिया है.
27 लाख को लेकर ट्रिब्यूनल की प्रक्रिया अब भी धुंधली
इस पूरे चुनावी नाटक के बीच सबसे चिंताजनक स्थिति उन करीब 27.10 लाख मतदाताओं की है जिनके नाम वोटर लिस्ट से काटे गए. द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, अब तक महज 1,607 मतदाताओं को वापस सूची में जोड़ा गया है और 15 अपीलें खारिज की गई हैं.
अपील के लिए चुनाव आयोग का पोर्टल ईसीआईनेट किसी भी दस्तावेज़ को अपलोड करने की सुविधा नहीं देता. पोर्टल पर केवल 1,000 अक्षरों में “अपील के तथ्य” और 500 अक्षरों में “मांगी गई राहत” भरने की जगह है. यह तब और बड़ी समस्या बन जाती है जब नाम हटाने का आधार चुनाव आयोग के एल्गोरिद्म द्वारा 2002 की वोटर लिस्ट से नाम का “मेल न खाना” था — जिसे ठीक करने के लिए नए दस्तावेज़ज़रूरी हैं.
5 अप्रैल को पूर्व कलकत्ता हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस टी.एस. शिवज्ञानम की अध्यक्षता वाले ट्रिब्यूनल ने कांग्रेस उम्मीदवार मोताब शेख की अपील स्वीकार की — लेकिन तब जब सुप्रीम कोर्ट ने दखल देकर उनकी तत्काल सुनवाई का आदेश दिया. ट्रिब्यूनल ने पाया कि शेख के पास आधार, ड्राइविंग लाइसेंस और वोटर आईडी — सभी में सही नाम था, और उन्होंने 2002 में ही एफिडेविट से नाम सुधरवा लिया था. ट्रिब्यूनल ने नोट किया, “ये दस्तावेज़ अधिनिर्णय प्रक्रिया के दौरान ध्यान में नहीं लिए गए.”
एक अन्य मतदाता नियाज़ अहमद को गिनती से एक दिन पहले सूची में वापस जोड़ा गया — लेकिन वह भी हाई कोर्ट के दखल के बाद. उनके वकील तारिक कासिमुद्दीन ने बताया कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद पांच परिजनों के नाम पूरक सूची में जोड़े गए. अहमद ने बताया कि जनवरी में हुई सुनवाई में उन्होंने पासपोर्ट, आधार, पैन और वोटर आईडी सब लाए थे, लेकिन बीएलओ ने कह दिया कि “केवल एक दस्तावेज़ पर्याप्त है.”
1 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने 19 ट्रिब्यूनलों को “पूरे रिकॉर्ड की दोबारा जांच” का आदेश दिया और कहा कि “ट्रिब्यूनल नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के तहत अपनी प्रक्रिया खुद तय करने के लिए स्वतंत्र हैं.” एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) 19 पूर्व न्यायाधीशों के बीच परिचालित की गई — पर सार्वजनिक नहीं की गई.
पश्चिम बंगाल कांग्रेस कमेटी के पदाधिकारी शेख अनवर अली ने कलकत्ता हाई कोर्ट में एसओपी सार्वजनिक करने की याचिका दायर की, जिसे 22 अप्रैल को खारिज कर दिया गया और सुप्रीम कोर्ट जाने को कहा गया. वकील झुमा सेन ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “कोई नहीं जानता कि ट्रिब्यूनल कैसे काम कर रहे हैं क्योंकि कोई पारदर्शिता नहीं है. अपीलकर्ता कोई दस्तावेज़ अपलोड नहीं कर सकते. यह प्रक्रिया हमें अतिरिक्त दस्तावेज़ देने से हतोत्साहित करती है.”
चुनाव आयोग ने 13 दस्तावेज़ों की सूची बनाई थी जो एसआईआर के दौरान मान्य थे — जिनमें आधार, राशन कार्ड, पैन कार्ड और स्वयं आयोग का ईपीआईसी (वोटर आईडी) शामिल नहीं थे. सुप्रीम कोर्ट ने बाद में माध्यमिक परीक्षा का एडमिट कार्ड और पास सर्टिफिकेट भी मान्य किया. बिहार के एसआईआर विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने आधार को पहचान प्रमाण के रूप में स्वीकार करने का आदेश दिया था — हालांकि नागरिकता या निवास के प्रमाण के रूप में नहीं.
द इंडियन एक्सप्रेस ने चुनाव आयोग और कलकत्ता हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार-जनरल को एसओपी और नए दस्तावेज़ों की स्वीकृति के बारे में ईमेल भेजे — जिनका कोई जवाब नहीं मिला.
“लग रहा है कि घर में बेघर हो गए हम”: मतदान के लिए व्हीलचेयर तैयार रखी थी, लेकिन सूची से नाम ही हटा दिया
मोहम्मद रौनक परवेज़ ने मतदान के दिन के लिए एक व्हीलचेयर तैयार रखी थी. उनके तीन बेटों में से एक, सॉफ्टवेयर इंजीनियर मोहम्मद फहाद ने इसे तीन महीने पहले इसलिए खरीदा था, ताकि उनके बिस्तर पर पड़े पिता मतदान केंद्र तक पहुँच सकें. बुधवार की सुबह उस व्हीलचेयर की ज़रूरत नहीं पड़ी. मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान 56 वर्षीय दुकानदार का नाम हटा दिया गया था. उनके तीनों बेटों के नाम भी हटा दिए गए थे.
उत्तर 24 परगना के कमरहटी स्थित दासुबाबू बागान में अपने घर के भीतर, परिवार अपने दुख को संभालने की कोशिश कर रहा था, जबकि पड़ोसी वोट डालने के लिए बाहर निकल रहे थे.
परवेज़ ने आँखों में आँसू भरकर कहा, “लग रहा है कि घर में बेघर हो गए हम. मतदान का दिन एक उत्सव होता है—लोकतंत्र का उत्सव. हम एक परिवार के रूप में इसमें भाग लेते थे. इस बार हम सिर्फ गवाह हैं. और कुछ नहीं कर सकते हम. यह दर्द देता है.”
किंशुक बसु के अनुसार, कुछ महीने पहले, स्ट्रोक के कारण परवेज़ बिस्तर पर आ गए थे. तब से, वह फिर से चलने-फिरने की उम्मीद में फिजियोथेरेपी और दवाएं ले रहे हैं. कमरहटी के पुराने निवासी के रूप में, उन्होंने यह सुनिश्चित करने के लिए कड़ी मेहनत की कि उनके बेटों को अच्छी शिक्षा मिले और वे उसी समावेशी समाज के हिस्से के रूप में बड़े हों जिसमें उनका परिवार विश्वास करता था.
उनकी मेहनत रंग भी लाई. सबसे बड़ा बेटा सॉफ्टवेयर इंजीनियर है. दूसरा, मोहम्मद फैजान रौनक, आलिया विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस में बी.टेक कर रहा है. सबसे छोटा बेटा श्यामबाज़ार के महाराजा श्रीश चंद्र कॉलेज में स्नातक का छात्र है.
जहाँ परवेज़ का नाम हटा दिया गया, वहीं उनके दो भाइयों के नाम संशोधित सूची में मौजूद थे. फैजान ने कहा, “तकनीकी खराबी के कारण अंततः मेरे पिता का नाम शामिल नहीं हो सका. परिणामस्वरूप, हमारे नाम भी हटा दिए गए.”
लकड़ी की एक छोटी खाट के इर्द-गिर्द इकट्ठा हुए भाइयों ने अपनी हताशा व्यक्त करते हुए अपने पिता को सहारा देकर बिठाया. फैजान ने कहा, “कोई स्पष्टता नहीं है. हम यहाँ पैदा हुए, इस शहर के संस्थानों में पढ़े, और यह विश्वास करते हुए बड़े हुए कि हमारे दस्तावेज़—पासपोर्ट और अन्य—हमारी पहचान स्थापित करते हैं. हमें अब भी नहीं पता कि हम वोट देने के योग्य क्यों नहीं थे. इन सवालों का जवाब कोई नहीं देता.”
ग्राहम रोड के पास संकरी गलियों में बनी छोटी इमारतों का समूह ‘दासुबाबू बागान’, कोलकाता से लगभग 13 किमी उत्तर में सागर दत्ता अस्पताल के पास स्थित है. बुधवार को बाहर जनजीवन सामान्य था. पुरुषों के समूह चर्चा में बैठे थे कि दूसरे चरण का मतदान कैसा रहा, जबकि अन्य बाज़ारों की ओर जा रहे थे. केंद्रीय बलों की वैन इलाके में घूम रही थी और पुलिस मतदान केंद्रों के पास पहरा दे रही थी.
फहाद ने कहा, “अगर हमें अपना पक्ष ठीक से रखने का समय मिलता, तो नाम नहीं कटते. सब कुछ बहुत जल्दबाज़ी में लगा. हमें समय दीजिए, हम समझा सकते हैं कि हम इस निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता क्यों हैं. लेकिन सुन कौन रहा है?”
कमरहटी, जो कभी बंद कारखानों और संघर्षरत मध्यम वर्ग वाला वामपंथ का गढ़ था, वहां 2011 में पहली बार राजनीतिक बदलाव देखा गया था जब तृणमूल के मदन मित्रा ने 24,000 से अधिक मतों के अंतर से जीत हासिल की थी. वह 2016 में हार गए और 2021 में फिर से सीट जीत ली.
लेकिन बुधवार को कई मोहल्लों में ध्यान इस बात पर नहीं था कि कौन जीतेगा, बल्कि इस पर था कि कौन वोट दे पाएगा. मद्रास लेन, मुस्लिम लेन, धोबिया बागान और अनवर बागान जैसे इलाकों में कई परिवारों को इसी तरह की हताशा का सामना करना पड़ा, क्योंकि उनके नाम मतदाता सूची से काट दिए गए थे.
सबसे छोटे बेटे फरहान ने कहा, “मेरे दोस्त, जिनके साथ मैं अलग-अलग पारा (मोहल्लों) में बड़ा हुआ, उनके नाम सूची में नहीं हैं. वे सभी कोलकाता में पैदा हुए थे, लेकिन मतदाता के रूप में अर्हता प्राप्त करने के लिए उनके लिए इतना काफी नहीं था.”
पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड 92% मतदान, लेकिन वजह बनी घटती मतदाता संख्या
पश्चिम बंगाल में हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में करीब 92% मतदान दर्ज किया गया, जो राज्य के चुनावी इतिहास में अब तक का सबसे अधिक है. यह आंकड़ा चुनाव आयोग द्वारा जारी अस्थायी आंकड़ों पर आधारित है. हालांकि, द हिन्दू की रिपोर्ट के अनुसार यह रिकॉर्ड मतदान दर वास्तव में वोटिंग में बड़ी बढ़ोतरी के कारण नहीं, बल्कि मतदाताओं की कुल संख्या घटने की वजह से सामने आई है.
दरअसल, चुनाव से पहले हुए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के कारण मतदाता सूची में बड़ी कटौती हुई. इस प्रक्रिया में राज्य के कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 11% घटकर 7.66 करोड़ से 6.26 करोड़ रह गई. यह प्रक्रिया काफी विवादित रही है. इसी तरह 2021 के विधानसभा चुनाव में जहां 7.34 करोड़ मतदाता थे, वहीं हालिया चुनाव में यह संख्या घटकर 6.82 करोड़ रह गई, यानी करीब 7% की कमी आई है.
हालांकि मतदाताओं की संख्या कम हुई, लेकिन वोट डालने वालों की संख्या में केवल 3.6% की ही बढ़ोतरी हुई, जो पिछले दस विधानसभा चुनावों में सबसे कम वृद्धि मानी जा रही है. इससे यह संकेत मिलता है कि कई ऐसे लोग, जो वोट डाल सकते थे, एसआईआर के दौरान सूची से हटाए जाने के कारण मतदान नहीं कर पाए.
अगर 2001 से अब तक के आंकड़ों को देखें, तो पिछली बार एसआईआर 2001 के बाद हुआ था, जिसके चलते 2006 के चुनाव में मतदाताओं की संख्या 1% कम हो गई थी, लेकिन उस समय वोट डालने वालों की संख्या में 7.7% की बढ़ोतरी देखी गई थी.
क्षेत्रवार विश्लेषण में पाया गया कि राज्य की 294 में से 242 विधानसभा सीटों पर वोट डालने वालों की संख्या 2021 के मुकाबले बढ़ी, जबकि 52 सीटों पर इसमें गिरावट आई. जिन क्षेत्रों में बढ़ोतरी हुई, वे मुख्य रूप से उत्तर और दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में केंद्रित थे. चांचल, डोमकल और सितालकुची जैसे क्षेत्रों में लगभग 29,000 तक अधिक लोगों ने मतदान किया.
वहीं दूसरी ओर, दक्षिणी डेल्टा और कुछ उत्तरी क्षेत्रों में गिरावट देखी गई है. समसेरगंज, मेटियाब्रुज और हावड़ा उत्तर जैसी सीटों पर क्रमशः करीब 33,500, 24,000 और 19,000 कम लोगों ने वोट डाला, जो 2021 की तुलना में कमी दर्शाता है.
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि जिन सीटों पर एसआई आर के दौरान सबसे ज़्यादा मतदाता हटाए गए, वहीं मतदान प्रतिशत में सबसे ज़्यादा बढ़ोतरी दर्ज हुई है. उदाहरण के लिए, चौरंगी और जोरासांको सीटों पर लगभग 40% मतदाता सूची से हटाए गए थे, लेकिन वहां मतदान प्रतिशत करीब 86% रहा, जो 2021 के मुकाबले कम से कम 33 प्रतिशत अधिक है. इसी तरह समसेरगंज, हावड़ा उत्तर और कोलकाता पोर्ट जैसे क्षेत्रों में भी 30% से अधिक मतदाता हटाए गए और वहां भी इसी तरह का ट्रेंड देखा गया.
इसके उलट, जहां मतदाता सूची में कम कटौती हुई, जैसे कटुलपुर, भगवानपुर और साबंग, वहां मतदान प्रतिशत 90% से अधिक रहा, लेकिन इसमें 2021 के मुकाबले केवल 5 प्रतिशत अंक से भी कम की बढ़ोतरी हुई. इसका मतलब है कि इन क्षेत्रों में पहले से ही अधिक संख्या में लोग मतदान करते रहे हैं.
क्षेत्रीय स्तर पर देखा जाए तो दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र, जिसमें 294 में से 117 सीटें आती हैं, वहां लगभग सभी सीटों पर वोट डालने वालों की संख्या बढ़ी है. इसके बाद उत्तरी क्षेत्र रहा, जहां 54 में से 48 सीटों पर बढ़ोतरी देखी गई है. वहीं ग्रेटर कोलकाता क्षेत्र, जो शहरी इलाकों से बना है, वहां कई सीटों पर वोट डालने वालों की कुल संख्या में कमी दर्ज की गई.
श्रवण गर्ग | मोदी के डर से मुक्त होने का क्या यही सबसे अच्छा अवसर नहीं है ?
हमने इस बात पर शायद ही कभी गौर किया हो कि आपसी बातचीत या ‘गोदी चैनलों’की बहसों को देखने-सुनने के दौरान हम दिन के कितने घंटे सिर्फ़ एक ही व्यक्ति यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर पिछले कितने सालों से खर्च कर रहे हैं ! हमें यह भी याद करके देखना चाहिए कि ऐसा हमने पिछली बार किस प्रधानमंत्री के लिए किया होगा कि साल भर तक सिर्फ़ उसके ही बारे में सोचते और उससे डरते रहे हों ! ऐसा तो सिर्फ़ अधिनायकवादी व्यवस्थाओं में ही होता है.
प्रधानमंत्री के इर्द-गिर्द एक ऐसा तंत्र विकसित हो गया है जिसने देश की एक बड़ी आबादी को सिर्फ़ मोदी की दैनंदिन की गतिविधियों और उनके व्यक्तित्व के दबदबे के साथ चौबीसों घंटों के लिए एंगेज कर रखा है. प्रधानमंत्री की उपस्थिति हवा-पानी की तरह ही नागरिकों की ज़रूरतों में शामिल कर दी गई है। पार्टी और तंत्र से परे प्रधानमंत्री की छवि एक ‘कल्ट’ के रूप में स्थापित कर दी गई है.
कुछ ऐसा कर दिया गया है कि नागरिकों को कुछ और सोचने का मौका नहीं दिया जा रहा है. बेरोज़गारी और महंगाई तो बहुत दूर की बात है. जो लोग सार्वजनिक तौर पर दावे करते हैं कि वे प्रधानमंत्री को बहुत चाहते हैं हक़ीक़त में मोदी की छवि का उपयोग स्वयं के डरने में भी कर रहे हैं और दूसरों को डराने में भी ! चूँकि मोदीजी का ख़ुफ़िया तंत्र बहुत सशक्त है हो सकता है प्रधानमंत्री को भी अपनी इस खूबी की जानकारी हो.
कुछ साल पहले एक खबर प्रकाशित हुई थी कि एक मुस्लिम किरायेदार ने अपने मुस्लिम मकान मालिक के ख़िलाफ़ अधिकारियों से यह शिकायत की कि उसे मकान ख़ाली करने की धमकी इसलिए दी जा रही है कि उसने प्रधानमंत्री की तस्वीर अपने घर में लगा रखी है। जाँच के बाद पाया गया कि एक ही अल्पसंख्यक समुदाय के दोनों लोगों के बीच विवाद किराए के लेन-देन का था. किरायेदार को उम्मीद रही होगी कि मोदी की तस्वीर उसके लिए सुरक्षा कवच का काम कर सकती है. किरायेदार अगर बहुसंख्यक समुदाय का होता तो स्थिति जाँच पूरी होने के पहले ही कोई अलग रूप ले सकती थी.
एक यूट्यूब चैनल में बहस के दौरान जब एक पैनलिस्ट ने पहली बार कहा कि भाजपा देश पर पचास साल तक राज करने वाली है तो उसके कहे को ‘पंद्रह लाख हरेक के खाते में जमा हो जाएँगे‘ जैसा ही कोई जुमला मानकर ख़ारिज कर दिया गया. पैनलिस्ट ने जब अपने दावे को ज़ोर देकर संशोधन के साथ पेश किया कि मोदी ही अगले पचास सालों तक राज करने वाले हैं तो उसकी बात पर नए सिरे से सोचना पड़ा. उन्होंने अपने दावे के समर्थन में कुछ तर्क भी पेश किए. उनके दावे का खंडन प्रधानमंत्री की उम्र के बारे में जानकारी होते हुए भी नहीं किया जा सकता था.
‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की पूर्व संध्या पर 8 अगस्त 1942 के दिन बम्बई में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में गांधी जी ने जब घोषणा की होगी कि वे पूर्ण जीवन जीना चाहते हैं और उनके अनुसार पूर्ण जीवन का अर्थ एक सौ पच्चीस वर्ष होता है तो कई लोग आश्चर्यचकित रह गए होंगे. गांधी ने आगे यह भी जोड़ा कि तब तक सिर्फ़ भारत ही नहीं बल्कि सारी दुनिया भी आज़ाद हो जाएगी. (गांधी जी की उम्र उस समय 73 वर्ष थी). गांधी जी दृढ़ इच्छा-शक्ति के व्यक्ति थे अतः उन्हें अपने आप पर पूरा विश्वास रहा होगा कि वे सवा सौ वर्ष तक जीवित भी रह सकते हैं और देश के लिए काम भी कर सकते हैं. उन्होंने डेढ़ सौ वर्ष जीवित रहने जैसी असम्भव-सी बात नहीं कही.
(पूरे देश ने टीवी चैनलों के पर्दों पर देखा था कि किस तरह से 126 वर्ष के स्वामी शिवानंद नंगे पैर चलते हुए पद्मश्री अलंकरण प्राप्त करने राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में पहुँचे थे और बिना किसी सहारे के उन्होंने प्रधानमंत्री के समक्ष झुककर प्रणाम किया था.)
चीन और रूस के राष्ट्रपतियों ने अपने देशवासियों को बता रखा है कि वे और कितने सालों तक अपने पदों पर बने रहकर उनकी ‘सेवा’ करने वाले हैं. राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी संविधान में संशोधन के ज़रिए राष्ट्रपतियों के दो बार से अधिक पद पर बने रहने की समय-सीमा को ख़त्म कर दिया गया है. यानी 2003 से राष्ट्रपति जिनपिंग अब जब तक चाहेंगे सत्ता में बने रह सकेंगे. उन्होंने अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों को सत्ता की होड़ से बाहर कर दिया है.
अपने लिए बनाए गए क़ानून के अनुसार,रूसी राष्ट्रपति पुतिन भी अब 2036 तक सत्ता में रह सकेंगे. वे तब 83 वर्ष के हो जाएँगे. पुतिन 1999 से सत्ता में हैं. 1999 से 2008 तक वे देश के प्रधानमंत्री थे. बाद में राष्ट्रपति बन गए. चीन और रूस दोनों में आने वाले कई वर्षों तक इस बात की कोई चर्चा नहीं होने वाली है कि जिनपिंग के बाद कौन ? या ‘हू आफ़्टर पुतिन ?’ नेहरू के जमाने से भारत की राजनीति में चर्चा होती रही है कि ‘हू आफ़्टर नेहरू ? इंदिरा ? या वाजपेयी ? वाजपेयी जी के मामले में तो मानकर चला जाता था कि आडवाणी ही उनके उत्तराधिकारी होंगे. हमारे यहाँ भी रूस जैसी व्यवस्था क़ायम होने का भय व्यक्त किया जा रहा है. कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे ने इशारों में इस भय को व्यक्त भी किया था.
प्रधानमंत्री ने जनता और भाजपा दोनों को इतने ज़बरदस्त तरीक़े से 24 घंटे एंगेज कर रखा है कि ‘हू आफ़्टर मोदी ?’ का विचार भी कोई अपने मन में नहीं ला सकता. मोदी ने अपनी ओर से भी ‘मन की बात’ कभी ज़ाहिर भी नहीं की कि वे कब तक पद पर बने रहना चाहते हैं. उनकी नज़र में निश्चित ही ऐसे कई बड़े काम अभी बाक़ी हैं जिन्हें उनके ही द्वारा पूरा किया जाना है.
वर्तमान जिम्मेदारियों के साथ मोदी ने अपने आपको इतना एकाकार कर लिया है कि इस उम्र में भी वे ज़बरदस्त तरीक़े से काम करते हुए नज़र आते हैं. कहा जाता है कि उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी जब सुबह उठकर आँखें ही मल रहे होते हैं, मोदी कैबिनेट की मीटिंग बुला लेते हैं. प्रधानमंत्री की असीमित ऊर्जा में यह भी शामिल है कि वे प्रशंसकों के साथ-साथ विरोधियों को भी पूरे समय एंगेज किए रहते हैं. कहा जाता है कि प्रधानमंत्री के रूप में मोदी उस क्षण से कमजोर होने लगेंगे जिस क्षण से विपक्षी उनके बारे में सोचना बंद कर देंगे.
मोदी की दिनचर्या को लेकर एक पुरानी जानकारी के अनुसार वे सिर्फ़ साढ़े तीन घंटे की ही नींद लेते हैं. मोदी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि ‘उनके डॉक्टर मित्र उन्हें लगातार सलाह देते रहते हैं कि कम से कम पाँच घंटे की नींद लेनी चाहिए पर मैं सिर्फ़ साढ़े तीन घंटे ही सो पाता हूँ.’ मोदी का यह इंटरव्यू 2011 का है जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे, प्रधानमंत्री नहीं बने थे. उनकी नींद को लेकर महाराष्ट्र भाजपा के बड़े नेता ने कहा था कि :’पीएम सिर्फ़ दो घंटे सोते हैं और बाईस घंटे काम करते हैं. वे प्रयोग कर रहे हैं कि सोने की ज़रूरत ही नहीं पड़े. वे हरेक मिनट देश के लिए काम करते हैं.’ अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा देर रात तक काम करते थे पर पाँच घंटे की नींद लेते थे.
सार यह है कि विपक्षी इंडिया गठबंधन सहित वे तमाम दल जो मोदी को सत्ता से हटाना चाहते हैं उन्हें अपनी नींद के घंटे कम करना पड़ेंगे. अपनी बात हमने एक पैनलिस्ट के इस दावे से प्रारम्भ की थी कि मोदी और पचास साल हुकूमत में रहने वाले हैं. 126 साल तक सक्रिय रहने का फ़ार्मूला स्वामी शिवानंद से प्राप्त किया जा सकता है. विपक्षी दल और मोदी-विरोधी आरोप लगा जा सकते हैं कि उन्हें डराया जा रहा है ! तय भी विपक्षी दलों और देश की जनता को ही करना है कि वह इस तरह से डर कर कब तक रहना चाहती है ? क्या डर से मुक्त होने का यही सबसे अच्छा अवसर नहीं है ?
वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और टिप्पणीकार श्रवण गर्ग का मूल लेख उनके ब्लॉग पर पढ़ा जा सकता है.
विश्लेषण
अरुण श्रीवास्तव | बंगाल के चुनावी रण में केंद्रीय बलों की ज्यादती के आरोप और राजनीतिक तनाव
बंगाल के लिए आने वाले दिन कठिन दिखाई दे रहे हैं. चुनावी लड़ाई जो ममता बनर्जी ने अमित शाह के केंद्रीय बलों (जिन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अनुरोध पर तैनात किया गया था) के खिलाफ लड़ी है, वह एक बड़ी अग्निपरीक्षा की शुरुआत है. बलों की तैनाती के स्वरूप से यह स्पष्ट हो गया कि ममता और उनकी पार्टी टीएमसी का मुकाबला केवल भाजपा से नहीं था; बल्कि यह ममता और अमित शाह की उस सेना के बीच सीधा टकराव था जिसे ‘हिंदूकृत बल’ के रूप में वर्णित किया गया है.
यद्यपि, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की तरह कलकत्ता के संपन्न और कुलीन मतदाताओं ने शांति बनाए रखने और पिछली हिंसा को रोकने के लिए केंद्रीय बलों का आभार व्यक्त किया, लेकिन वास्तविकता में इन बलों ने पूरे बंगाल में आतंक का माहौल पैदा कर दिया. पुराने जानकारों का कहना है कि अतीत में राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच झड़पें, बमबाजी और मौतें तो हुई थीं, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि केंद्रीय बलों ने महिलाओं और बच्चों को उनके घरों तक खदेड़कर पीटा हो.
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पसंदीदा पुलिस अधिकारी और एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अजय पाल शर्मा को 24 परगना में पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया था. कथित तौर पर उन्होंने इलाके में घूम-घूमकर टीएमसी समर्थकों को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी और एक टीएमसी उम्मीदवार को सीमा में रहने की चेतावनी दी. एक अन्य घटना में, 29 अप्रैल की रात करीब 12:45 बजे केंद्रीय बलों के कर्मी कलकत्ता के मेयर और वरिष्ठ मंत्री फिरहाद हकीम के आवास पर पहुंचे और उन्हें धमकी दी कि यदि उनके कार्यकर्ताओं ने भाजपा उम्मीदवार के लिए समस्या पैदा की तो परिणाम बुरा होगा. एक टीएमसी पार्षद को भी आधी रात को जगाकर धमकाया गया.
खबरों के मुताबिक, केंद्रीय बल लोगों को पीट रहे थे और महिलाओं व बच्चों तक को नहीं छोड़ रहे थे. ममता बनर्जी ने कहा कि लाठीचार्ज की कई घटनाएं हुईं और अदालत के आदेशों का उल्लंघन करते हुए तृणमूल कांग्रेस के कई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया. उन्होंने आरोप लगाया कि बूथों पर प्रभावी रूप से केंद्रीय बलों ने “कब्जा” कर लिया था और सवाल उठाया कि क्या ऐसा करना उनकी ड्यूटी है.
भवानीपुर में मतदान केंद्रों के बाहर हुई लाठीचार्ज की घटनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि अत्याचार पिछली रात से ही शुरू हो गए थे और कई लोगों को हिरासत में लिया गया, जिसे उन्होंने अदालत की अवमानना बताया. उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने लोकतंत्र का ऐसा स्वरूप पहले कभी नहीं देखा. उन्होंने जोर देकर कहा कि तृणमूल की जीत होगी और मतदान केंद्रों पर राज्य पुलिस की अनुपस्थिति की ओर ध्यान दिलाया.
कथित अत्याचारों की तीव्रता के कारण कुछ लोग केंद्रीय बलों को ‘अमित शाह की कसाई सेना’ कह रहे हैं. ऑनलाइन प्रसारित वीडियो में हिंसा की घटनाएं दिखाई दे रही हैं. एक वीडियो में भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी कालीघाट मंदिर के पास पुलिस अधिकारियों को निर्देश देते दिख रहे हैं. एक अन्य वीडियो में, दक्षिण 24 परगना के सतगाछिया में बूथ संख्या 116 के पास लाठीचार्ज के दौरान एक मासूम बच्चा कथित तौर पर चोट लगने के बाद रोता हुआ दिख रहा है. ऐसी ही घटनाएं पूर्व वर्धमान के औसग्राम में भी दर्ज की गईं.
गोबरडांगा विधानसभा क्षेत्र के एक बूथ पर दो बुजुर्ग मतदाताओं, देशेर अली मंडल और गणेश मजुमदार को कथित तौर पर घर जाकर लुंगी की जगह पैंट पहनकर आने को कहा गया, उसके बाद ही उन्हें वोट डालने की अनुमति दी गई.
कृष्णनगर की सांसद महुआ मोइत्रा ने घायल बच्चे का वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करते हुए हिंसा की निंदा की. राज्यसभा में उपनेता सागरिका घोष ने भी इन कार्रवाइयों की आलोचना करते हुए पुलिस पर्यवेक्षकों की जवाबदेही तय करने की मांग की और इस हिंसा को अस्वीकार्य बताया.
बाद में, उत्तर 24 परगना के गायघाटा में एक बूथ के पास पार्किंग विवाद को लेकर भारतीय सेना के एक जवान और उनकी पत्नी के साथ बीएसएफ कर्मियों द्वारा कथित तौर पर मारपीट की गई. अधिकारी को पुलिस स्टेशन और फिर इलाज के लिए ठाकुरनगर अस्पताल ले जाया गया. टीएमसी ने केंद्रीय बलों पर मतदान के दौरान आतंक का ‘सीतलकुची मॉडल’ अपनाने का आरोप लगाया.
‘सीतलकुची मॉडल’ का संदर्भ 2021 की उस घटना से है जिसमें कूचबिहार में सीआईएसएफ की फायरिंग में चार लोगों की मौत हो गई थी. टीएमसी नेताओं का दावा है कि मौजूदा चुनाव में भी वैसे ही तरीके अपनाए जा रहे हैं.
ममता बनर्जी ने यह भी आरोप लगाया कि केंद्रीय बल अदालती आदेशों की अनदेखी कर रहे हैं और बाहर से आए कर्मी मनमाने ढंग से काम कर रहे हैं. उन्होंने उन पर एक पार्षद के घर सहित अन्य घरों में तोड़फोड़ करने और टीएमसी कार्यकर्ताओं एवं एजेंटों को निशाना बनाने का आरोप लगाया.
दिल्ली स्थित कुछ टीवी चैनलों के इन दावों ने कि भाजपा ने बढ़त बनाई है, पर्यवेक्षकों को आश्चर्यचकित नहीं किया, क्योंकि मतदाता डराने-धमकाने के आरोप लग रहे थे. हालांकि, दूसरे चरण में करीब 92.3 प्रतिशत का उच्च मतदान प्रतिशत इन दावों को चुनौती देता है. इसके विपरीत, कलकत्ता स्थित कई चैनल सुझाव दे रहे हैं कि ममता बनर्जी पूर्ण बहुमत की ओर बढ़ रही हैं.
विशेषज्ञ और बुद्धिजीवी अमित शाह के इस दावे को लेकर चिंतित हैं कि भाजपा 200 से अधिक सीटें जीतेगी. कुछ को डर है कि मतगणना प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की जा सकती है और उनका मानना है कि राष्ट्रीय मीडिया के माध्यम से भाजपा की जीत का माहौल तैयार किया जा रहा है. शाह लगातार आत्मविश्वास जता रहे हैं और अवैध अप्रवासन, सीमा सुरक्षा तथा भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर जोर दे रहे हैं.
कुछ अधिकारी चुनाव बाद के घटनाक्रमों को लेकर आशंकित हैं. शाह का यह बयान कि चुनाव के बाद 60 दिनों तक केंद्रीय बल बंगाल में रहेंगे, संभावित अशांति को दबाने की चिंताओं को जन्म दे रहा है. हालांकि चुनाव के दौरान केंद्रीय बल चुनाव आयोग के अधीन होते हैं, लेकिन बाद में नियंत्रण केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास वापस चला जाता है.
संविधान के तहत, ‘पुलिस’ और ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ राज्य के विषय हैं, और केंद्रीय बलों का काम राज्य सत्ता की सहायता करना है, उसे प्रतिस्थापित करना नहीं. आलोचकों का तर्क है कि लंबे समय तक तैनाती संघीय सिद्धांतों और राज्य की स्वायत्तता को कमजोर कर सकती है.
यह चिंता भी जताई जा रही है कि यदि भाजपा की हार होती है, तो चुनाव के बाद ममता बनर्जी के जनाधार को कमजोर करने के लिए केंद्रीय बलों का उपयोग किया जा सकता है. शाह ने अपना अभियान तेज कर दिया है, ममता के 15 साल के शासन को निशाना बनाया है और भ्रष्टाचार तथा ‘भाइपो टैक्स’ (भतीजा टैक्स) के खिलाफ कार्रवाई का वादा किया है.
वरिष्ठ पत्रकार अरुण श्रीवास्तव का यह लेख अंग्रेजी से हिंदी में रूपांतरित है.
विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026: भारत छह स्थान फिसला, पाकिस्तान पांच पायदान ऊपर चढ़ा
भारतीय समयानुसार गुरुवार तड़के ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (आरएसएफ) द्वारा प्रकाशित विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026 में भारत 180 देशों में से 157वें स्थान पर खिसक गया है. पिछले साल वैश्विक मीडिया स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 151वें स्थान पर था. भारत का परमाणु-संपन्न पड़ोसी देश पाकिस्तान 153वें स्थान पर है, जो पिछले साल के 158वें स्थान से बेहतर हुआ है.
‘द टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के मुताबिक, नॉर्वे लगातार 10वें वर्ष पत्रकारों के लिए सर्वश्रेष्ठ देश के रूप में शीर्ष पर बना हुआ है, जबकि इरिट्रिया लगातार तीसरे वर्ष अंतिम स्थान पर है.
आरएसएफ ने कहा कि उसने यह सूची ऐसे समय में जारी की है जब “प्रेस पर राजनीतिक दबाव तेज हो रहा है, अधिनायकवादी प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं और मीडिया बाजार काफी कमजोर हो गया है.”
संस्था ने आगे कहा, “इस वर्ष के सूचकांक का विश्लेषण दुनिया के कई हिस्सों में पत्रकारिता की स्थितियों में चिंताजनक गिरावट को उजागर करता है. हालांकि कुछ छिटपुट सुधार भी हुए हैं, लेकिन 180 में से 100 देशों और क्षेत्रों के प्रेस स्वतंत्रता स्कोर में गिरावट देखी गई है.”
आरएसएफ ने कहा कि भारत में, “स्वतंत्र मीडिया का न्यायिक उत्पीड़न तेज हो रहा है, जिसका मुख्य कारण आपराधिक कानूनों—जिनमें मानहानि और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून शामिल हैं—का बढ़ता उपयोग है, जो सीधे तौर पर पत्रकारों को निशाना बना रहे हैं.”
पाकिस्तान में प्रेस “एक तनावपूर्ण राजनीतिक माहौल के बीच प्रतिबंधों की निरंतर लहरों का सामना कर रही है, जिसमें अधिकारी पत्रकारिता सामग्री के प्रसार को नियंत्रित करने और कुछ मामलों में दबाने की कोशिश करते हैं,” RSF ने कहा।
अमेरिका को 64वें स्थान पर रखा गया है, जो पिछले साल के 57वें स्थान से नीचे है. इस पर आरएसएफ का कहना है: “...पत्रकार जो पहले से ही आर्थिक चुनौतियों और जनता के भरोसे के संकट से जूझ रहे थे, वे अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा राज्य संस्थानों के व्यवस्थित उपयोग का भी सामना कर रहे हैं. इसमें एनपीआर और पीबीएस जैसे सार्वजनिक प्रसारकों के फंड में कटौती, मीडिया स्वामित्व में राजनीतिक हस्तक्षेप, और नापसंद किए जाने वाले पत्रकारों एवं मीडिया संस्थानों के खिलाफ राजनीति से प्रेरित जाँच शामिल हैं.”
आरएसएफ के अनुसार, ट्रंप की सत्ता में वापसी के बाद से, “विरोध प्रदर्शनों के दौरान पत्रकारों को भी निशाना बनाया गया है, जो उस व्यापक गिरावट को दर्शाता है जो आधुनिक अमेरिकी इतिहास में प्रेस स्वतंत्रता के सबसे गंभीर संकटों में से एक है.”
विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक के इतिहास में पहली बार, आरएसएफ ने कहा, “दुनिया के आधे से अधिक देश अब प्रेस स्वतंत्रता के लिए ‘कठिन’ या ‘अत्यंत गंभीर’ श्रेणियों में आते हैं. 25 वर्षों में, सूचकांक में शामिल सभी 180 देशों और क्षेत्रों का औसत स्कोर कभी इतना कम नहीं रहा है.”
संस्था ने आगे जोड़ा: “2001 के बाद से, तेजी से प्रतिबंधात्मक कानूनी शस्त्रागार के विस्तार—विशेष रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों से जुड़े कानूनों—ने लोकतांत्रिक देशों में भी सूचना के अधिकार को लगातार कमजोर किया है. सूचकांक के कानूनी संकेतक में पिछले एक साल में सबसे अधिक गिरावट आई है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि दुनिया भर में पत्रकारिता का अपराधीकरण बढ़ता जा रहा है.”
असम सीएम की पत्नी पर टिप्पणी मामला: पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की उस याचिका पर अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है, जिसमें उन्होंने असम पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर के संबंध में अग्रिम जमानत की मांग की है. यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा द्वारा दर्ज कराई गई एक शिकायत से जुड़ा है.
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल चांदुरकर की पीठ ने पवन खेड़ा की उस याचिका पर सुनवाई की, जो गुवाहाटी उच्च न्यायालय द्वारा उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद दायर की गई थी.
पवन खेड़ा की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि यह मामला पूरी तरह से राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित है. सिंघवी ने असम के मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए सार्वजनिक बयानों का हवाला देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री ने खेड़ा को असम की जेल में जीवन बिताने की धमकी दी है. सिंघवी ने तर्क दिया कि मुख्य मामला मानहानि और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने का है, जिसके लिए हिरासत में पूछताछ की कोई आवश्यकता नहीं है. जब खेड़ा जांच में सहयोग करने और देश न छोड़ने का आश्वासन दे रहे हैं, तो उन्हें अपमानित करने के लिए गिरफ्तार करना क्यों जरूरी है?
राज्य की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अग्रिम जमानत का कड़ा विरोध किया. उन्होंने पीठ को बताया कि यह केवल मानहानि का मामला नहीं है, बल्कि दस्तावेजों की जालसाजी का गंभीर मामला है. खेड़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो पासपोर्ट की तस्वीरें दिखाई थीं, वे जांच में फर्जी पाई गई हैं. पुलिस को यह पता लगाना है कि ये फर्जी दस्तावेज किसने बनाए. क्या इसमें कोई विदेशी ताकतों का हाथ है जो भारतीय चुनावों में हस्तक्षेप करना चाहते हैं? दस्तावेजों का स्रोत क्या है और इनके पीछे का वास्तविक इरादा क्या था?
छत्तीसगढ़ में पेसा कानून का ग़लत इस्तेमाल: आदिवासियों को सशक्त करने वाला कानून बना ईसाइयों के ख़िलाफ़ हथियार
छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में आदिवासियों के अधिकारों के लिए बनाया गया कानून पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम,1996 (पेसा) अब ईसाई समुदाय को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है. यह बात स्क्रॉल की एक रिपोर्ट में सामने आई है.
रिपोर्ट के अनुसार, इस कानून का इस्तेमाल कई गांवों में ईसाई समुदाय को निशाना बनाने और उनके सामाजिक बहिष्कार के लिए किया जा रहा है, जबकि इसके मूल उद्देश्य, ज़मीन और संसाधनों पर आदिवासियों के अधिकार, अक्सर नज़रअंदाज़ किए जा रहे हैं.
बस्तर के कांकेर जिले के डोमपदर गांव के सरपंच देवलाल वट्टी का मामला इस बढ़ते तनाव को दिखाता है. वट्टी ने एक बार अपने व्हाट्सऐप स्टेटस पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए धर्म की स्वतंत्रता की बात लिखी थी. इसके कुछ ही समय बाद उन्हें गांव की बैठक में बुलाकर सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के लिए मजबूर किया गया. वट्टी, जो खुद आदिवासी पारंपरिक धर्म कोया पुनेम के अनुयायी हैं, का कहना है कि बस्तर में कई धर्म आए हैं और सभी ने स्थानीय संस्कृति को प्रभावित किया है, लेकिन निशाना केवल ईसाइयों को बनाया जा रहा है.
बस्तर क्षेत्र लंबे समय से आदिवासी समुदायों का पारंपरिक इलाका रहा है, जहां वे अपने स्थानीय धर्मों का पालन करते रहे हैं. हालांकि समय के साथ यहां हिंदू और ईसाई धर्म का प्रभाव भी बढ़ा है. 1952 में संघ परिवार ने जशपुर में वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना की थी, जबकि 1990 के दशक में भाजपा नेता दिलीप सिंह जूदेव ने “घर वापसी” अभियान शुरू किया. पिछले कुछ वर्षों में बस्तर में भी ऐसे कार्यक्रम बढ़े हैं और इसके साथ ही ईसाई समुदाय के ख़िलाफ़ तनाव और घटनाएं भी बढ़ी हैं.
2025 में कांकेर जिले के कई गांवों में ऐसे बोर्ड लगाए गए, जिनमें ईसाई पादरियों और बाहरी ईसाइयों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई है. इन बोर्डों में पेसा कानून की धारा 4(d) का हवाला दिया गया, जो ग्राम सभा को अपनी संस्कृति और परंपराओं की रक्षा का अधिकार देती है. स्थानीय प्रशासन ने भी इन कदमों को आदिवासी संस्कृति बचाने के प्रयास के रूप में सही ठहराया है.
इन प्रतिबंधों को अदालत में चुनौती दी गई, जहां याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यह संविधान के तहत मिले धर्म और आवागमन के अधिकारों का उल्लंघन है. हालांकि छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इन बोर्डों को असंवैधानिक मानने से इनकार कर दिया और कहा कि ये आदिवासी हितों की रक्षा के लिए लगाए गए हैं. बाद में फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इन याचिकाओं को खारिज कर दिया और शिकायतों को ग्राम सभा और स्थानीय प्रशासन के स्तर पर उठाने की बात कही.
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कई जगहों पर ईसाई बने आदिवासियों को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है. उन्हें गांवों से निकालना, दुकानों से सामान न देना, सरकारी योजनाओं से वंचित करना, खेती करने से रोकना और यहां तक कि मृतकों को गांव में दफनाने से रोकने जैसी घटनाएं सामने आई हैं. कुछ ग्राम सभाओं ने ऐसे प्रस्ताव भी पारित किए हैं जिनमें ईसाइयों को किसी भी तरह की मदद न देने की बात कही गई है.
इसका असर लोगों की ज़मीन और आजीविका पर भी पड़ा है. कुछ मामलों में ईसाई बने लोगों की ज़मीन पर उनका अधिकार खत्म करने की कोशिश की गई. उदाहरण के तौर पर, एक व्यक्ति को गांव से निकाल दिया गया और उसकी ज़मीन ग्राम सभा के क़ब्ज़े में ले ली गई. अब वह दिहाड़ी मज़दूरी कर रहा है और बेघर हो चुका है.
गांवों में इस मुद्दे को लेकर गहरे मतभेद भी हैं. कुछ ग्रामीणों का मानना है कि धर्म परिवर्तन के बाद लोग पारंपरिक देवी-देवताओं और त्योहारों से दूरी बना लेते हैं, जिससे सामाजिक एकता प्रभावित होती है. वहीं ईसाई समुदाय का कहना है कि उन्हें ही समाज से अलग किया जा रहा है और उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है.
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कई परिवारों को अपना गांव छोड़कर शहरों के बाहरी इलाकों में अस्थायी झोपड़ियों में रहना पड़ रहा है. कुछ महिलाओं ने बताया कि उन्हें मारपीट कर घरों से बाहर निकाला गया. एक मामले में तो ग्राम सभा ने लोगों को चेतावनी दी कि अगर वे ईसाई परिवारों से बात करेंगे तो उन्हें जुर्माना देना होगा.
दिसंबर 2025 में एक गंभीर घटना में, एक व्यक्ति को अपने ही पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने से रोक दिया गया क्योंकि वह ईसाई बन चुका था. बाद में उसके घर और एक चर्च को जला दिया गया। इस घटना के बाद उसका परिवार लापता बताया गया.
कार्यकर्ताओं का कहना है कि पेसा कानून का इस्तेमाल चुनिंदा तरीके से किया जा रहा है. जब खनन, जंगल कटाई या भूमि अधिग्रहण जैसे मामलों में ग्राम सभा की सहमति ज़रूरी होती है, तब इस कानून की अनदेखी की जाती है. लेकिन धर्म परिवर्तन के मामलों में इसे सख्ती से लागू किया जा रहा है.
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि आदिवासी समुदाय अपनी अलग धार्मिक पहचान की मांग कर रहे हैं, जैसे कोया पुनेम, सरना और डोनी पोलो. हालांकि कुछ राजनीतिक नेताओं का मानना है कि आदिवासी हिंदू धर्म का ही हिस्सा हैं.
गांवों में इस विषय को लेकर भ्रम भी देखा गया. कुछ लोग आदिवासी धर्म और हिंदू धर्म को एक मानते हैं, जबकि कुछ अपनी अलग पहचान पर जोर देते हैं.
ट्रम्प को ईरान पर सैन्य विकल्पों की ब्रीफिंग आज, हमले की नई योजना तैयार
एक्सिओस में बराक रविद की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को गुरुवार को सेंटकॉम कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर ईरान पर संभावित सैन्य कार्रवाई की नई योजनाओं से अवगत कराएंगे. यह जानकारी एक्सिओस को दो सूत्रों ने दी है. ज्वाइंट चीफ्स चेयरमैन जनरल डैन कैन भी इस ब्रीफिंग में शामिल होंगे.
सेंटकॉम ने ईरान पर “संक्षिप्त और शक्तिशाली” हमलों की एक योजना तैयार की है, जिसमें संभवतः बुनियादी ढाँचे को निशाना बनाया जाएगा. उद्देश्य यह है कि इससे वार्ता का गतिरोध टूटे और ईरान परमाणु मुद्दे पर अधिक लचीलापन दिखाए. इसके अलावा एक अन्य योजना में होर्मुज जलडमरूमध्य के एक हिस्से पर नियंत्रण करके व्यावसायिक जहाजरानी फिर से शुरू करने का प्रस्ताव है, जिसमें ज़मीनी सेना की तैनाती भी शामिल हो सकती है. ईरान के अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम भंडार को सुरक्षित करने के लिए स्पेशल फोर्सेज़ ऑपरेशन का विकल्प भी चर्चा में है.
ट्रम्प ने बुधवार को एक्सिओस को बताया कि उन्हें ईरान पर नौसैनिक नाकाबंदी “बमबारी से कुछ अधिक प्रभावी” लगती है. दो सूत्रों के अनुसार, ट्रम्प फिलहाल नाकाबंदी को अपने दबाव का प्रमुख हथियार मानते हैं, लेकिन यदि ईरान नहीं झुका तो वे सैन्य कार्रवाई पर विचार करेंगे. उल्लेखनीय है कि कूपर ने 26 फरवरी को भी ट्रम्प को ऐसी ही एक ब्रीफिंग दी थी — उसके दो दिन बाद अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया था. एक सूत्र के अनुसार, उसी ब्रीफिंग ने ट्रम्प के युद्ध के निर्णय में योगदान दिया था.
ईरान युद्ध में अमेरिका के अरबों डॉलर के सैन्य उपकरण तबाह
अल जज़ीरा में आलिया चुगताई की रिपोर्ट है कि अमेरिका ने ईरान के साथ चल रहे युद्ध में 2.3 से 2.8 अरब डॉलर के हवाई उपकरण गँवा दिए हैं. यह आँकड़ा वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ (सीएसआईएस) ने जारी किया है. किसी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय शोध संस्था द्वारा यह पहला विस्तृत आकलन है, और अल जज़ीरा ने इसे सबसे पहले रिपोर्ट किया.
सीएसआईएस के वरिष्ठ सलाहकार और अमेरिकी मरीन कॉर्प्स के सेवानिवृत्त कर्नल मार्क कैन्सियन ने यह गणना की है. उनके अनुसार यह अनुमान केवल हवाई उपकरणों का है— अमेरिकी ठिकानों पर हुए नुकसान और नौसैनिक संपत्ति इसमें शामिल नहीं है. ठिकानों के नुकसान का आकलन इसलिए कठिन है, क्योंकि अमेरिकी सरकार के अनुरोध पर प्लानेट लैब्स ने 28 फरवरी से सार्वजनिक सैटेलाइट तस्वीरें अवरुद्ध कर दी हैं, हालाँकि ईरानी सैटेलाइट इमेजरी उपलब्ध है.
प्रमुख नुकसानों में से एक तो ‘फ्रेंडली फायर’ का मामला था, जिसमें मार्च की शुरुआत में कुवैत में तीन F-15 जेट गिरे. इसके अलावा, 1 मार्च को थाड मिसाइल रक्षा रडार नष्ट हुआ, जिसकी कीमत 48.5 करोड़ से 97 करोड़ डॉलर के बीच थी. और 27 मार्च को सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयरबेस पर हमले में 70 करोड़ डॉलर का E-3 AWACS/E-7 रडार डिटेक्शन विमान तबाह हो गया — यह हमला तब हुआ जब रक्षा मंत्री पीट हेग्सेथ ने टेलीविज़न पर ईरानी सेना को “पूरी तरह निष्क्रिय” बताने का दावा किया था.
दोहा इंस्टीट्यूट के सुरक्षा अध्ययन के प्रोफेसर उमर अशूर ने बताया कि ट्रम्प प्रशासन राजनीतिक कारणों से पूरी पारदर्शिता नहीं दिखा सकता. उन्होंने कहा, “इस मोड़ पर ट्रम्प प्रशासन उपकरण और कर्मियों को खोते नहीं दिखना चाहेगा.” उन्होंने वियतनाम और अफगानिस्तान का उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका ने ऐतिहासिक रूप से परिचालन जीत हासिल की है लेकिन रणनीतिक हार झेली है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरानी नौसेना पूरी तरह नष्ट नहीं हुई है — “आप पारंपरिक नौसेना के बिना भी समुद्र में लड़ सकते हैं.”
कैन्सियन के अनुसार होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला न रख पाना अमेरिकी नौसेना के लिए एक अपमानजनक स्मरण है. उन्होंने कहा, “हम 45 वर्षों से इस बारे में सोच रहे हैं.” उनका मानना है कि ईरान द्वारा खाड़ी देशों पर हमला एक रणनीतिक भूल थी — इसने अरब देशों को अमेरिका से दूर करने के बजाय और करीब कर दिया.
ट्रम्प का दाँव: नाकाबंदी इतिहास को पलट सकती है और ईरान को झुका सकती है?
सीएनएन में स्टीफन कोलिन्सन का विश्लेषण है कि ईरान पर अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी एक सरल रणनीति पर आधारित है — ईरान के तेल निर्यात और आयात को गला घोंट दो, जिससे सामाजिक पतन हो और परमाणु कार्यक्रम को हमेशा के लिए त्यागने पर मजबूर हो जाए. ट्रम्प ने बुधवार को कहा, “नाकाबंदी शानदार है. उनकी अर्थव्यवस्था बर्बाद हो रही है. यह एक मृत अर्थव्यवस्था है.” ट्रम्प ने सहायकों को संकेत दिया है कि नाकाबंदी लंबे समय तक चल सकती है.
ईरान की अर्थव्यवस्था वाकई संकट में है. वॉल स्ट्रीट जर्नल ने बताया कि युद्ध की वजह से दस लाख लोग बेरोज़गार हुए हैं, खाद्य कीमतें आसमान छू रही हैं और इंटरनेट बंद होने से ऑनलाइन अर्थव्यवस्था ठप है. लाल माँस जैसी बुनियादी चीज़ें अफोर्डेबल नहीं रहीं. ईरान के तेल मंत्री ने जनता से ऊर्जा खपत घटाने की अपील की है और सरकारी दफ्तरों को दोपहर 1 बजे के बाद 70% बिजली कटौती के निर्देश दिए गए हैं. अमेरिकी खुफिया जानकारी के हवाले से सीएनएन ने बताया कि ईरानी अर्थव्यवस्था केवल कुछ हफ्तों, बल्कि कुछ दिनों तक ही टिक सकती है.
मिडल ईस्ट इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ फेलो एलेक्स वटंका ने कहा कि नाकाबंदी इतनी आर्थिक पीड़ा पैदा कर सकती है जो अनियंत्रित राजनीतिक विरोध में बदल जाए. लेकिन उन्होंने एक अहम चेतावनी दी — “इसमें महीने लग सकते हैं.” उन्होंने कहा, “यह ऐसी स्थिति है जो ईरान ने ईरान-इराक युद्ध में भी कभी नहीं झेली.”
लेकिन रणनीति की विफलता का खतरा भी है. इस्लामी गणराज्य दशकों से पश्चिमी प्रतिबंधों में जी रहा है. 1980 के दशक में इराक के साथ आठ साल के युद्ध में अनुमानित 10 लाख लोग मारे गए. जब भी विरोध प्रदर्शन बढ़ा, शासन ने दमन से उसे कुचल दिया. क्विंसी इंस्टीट्यूट के ट्रिटा पार्सी ने कहा, “हर बार अमेरिका यह सोचता है कि दबाव का एक चाँदी का बुलेट मिल गया, जो ईरान को झुका देगा — और हर बार वह निराश होता है.”
ट्रम्प की अपनी राजनीतिक मुश्किलें भी हैं. उनकी अनुमोदन रेटिंग ऐतिहासिक निचले स्तर पर है. नवंबर में मध्यावधि चुनाव हैं, और रिपब्लिकन हाउस खोने से डरे हुए हैं. होर्मुज बंद रहने से अमेरिका में पेट्रोल 4 डॉलर प्रति गैलन से ऊपर है और महंगाई बढ़ रही है. अगर ईरान झुक जाता है, तो ट्रम्प इतिहास के एक बेकार चक्र को तोड़ने वाले नेता बनेंगे. अगर नहीं, तो एक बार फिर यह साबित होगा कि इस्लामी गणराज्य की असीम सहनशक्ति अमेरिकी ताकत को भी बेअसर कर सकती है.
ईरान युद्ध ने भारत के ब्रिक्स नेतृत्व को कड़ी परीक्षा में डाला, ‘राजनीतिक प्रासंगिकता’ पर सवाल
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट कहती है कि ईरान युद्ध पर एक स्वर में बोल पाने में ब्रिक्स की विफलता ने भारत के अध्यक्षता काल को एक कठिन परीक्षा में डाल दिया है. पिछले सप्ताह नई दिल्ली में मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका मुद्दों पर ब्रिक्स अधिकारियों की बैठक हुई, लेकिन सदस्य देश युद्ध पर कोई साझा रुख नहीं अपना सके. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने बताया कि 24 अप्रैल को हुई बैठक में “पश्चिम एशिया” संघर्ष पर मतभेदों के कारण सहमति नहीं बन सकी.
समस्या की जड़ यह है कि ब्रिक्स के दो सदस्य — ईरान और संयुक्त अरब अमीरात — इस युद्ध में परस्पर विरोधी पक्षों पर हैं. 28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल द्वारा तेहरान पर हमले के बाद से यह संघर्ष छिड़ा है. भारत ने अध्यक्ष के रूप में एक कम ज़ोरदार दस्तावेज़ जारी किया जिसमें सदस्यों ने मध्य पूर्व में “गहरी चिंता” व्यक्त की — लेकिन कोई साझा रुख नहीं अपनाया.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ टास्मानिया के एशिया इंस्टीट्यूट के निदेशक जेम्स चिन ने कहा कि सहमति न बन पाना ब्रिक्स से ज़्यादा भारत के लिए नुकसानदेह है. उन्होंने कहा, “भारत को किसी तरह का बयान जारी करना चाहिए था.” तुलनात्मक रूप से, 2025 में ब्राज़ील की अध्यक्षता में ब्रिक्स ने न केवल संयुक्त बयान जारी किया था, बल्कि एक अलग बयान में ईरान पर हमलों की निंदा भी की थी.
भारत की मुश्किल यह है कि एक तरफ ईरान से उसके पुराने निवेश और परियोजनाओं के संबंध हैं, दूसरी तरफ यूएई के साथ हाल ही में रणनीतिक साझेदारी का एमओयू हुआ है. और इज़राइल से बढ़ते संबंध तथा अमेरिका को नाराज़ न करने की चाहत भी भारत को किसी स्पष्ट रुख से रोक रही है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ बर्मिंघम के राजनीति विज्ञान शोधकर्ता उमर करीम ने कहा कि इससे यह सवाल उठता है कि बड़ी शक्तियाँ जैसे भारत क्या वास्तव में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता का प्रयोग कर सकती हैं — “चाहे अपनी व्यक्तिगत क्षमता में हो, या ब्रिक्स जैसे मंचों के ज़रिए.”
जेएनयू के प्रोफेसर राजन कुमार ने इसे ब्रिक्स के लिए “बहुत खराब” बताया. उन्होंने कहा, “जब उसके एक सदस्य (ईरान) पर अमेरिका और इज़राइल हमला कर रहे हों और ब्रिक्स संयुक्त बयान न दे सके, तो यह दिखाता है कि आंतरिक मतभेद हल नहीं हुए हैं.” उनके अनुसार ब्रिक्स — जिसमें भारत, चीन और रूस जैसे प्रभावशाली देश हैं — ही एकमात्र संगठन था जो युद्ध में मध्यस्थता की ताकत रख सकता था, लेकिन वह इस अवसर से चूक गया.
भारत अगले महीने ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक की मेज़बानी करेगा, जिसके बाद साल के अंत में वार्षिक शिखर सम्मेलन होगा.
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