29/04/2026: एनएचआरसी पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी | दाभोलकर केस में जमानत | ग्रेट निकोबार पर राहुल | ‘मेड’ संकट | एग्जिट पोल का सच | हार्ट फेलियर का आर्थिक बोझ | जाति-गरीबी का सच
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आज की सुर्खियां
‘एनएचआरसी’ मुसलमानों पर हो रहे हमलों की अनदेखी कर रहा है और उन मामलों में दखल दे रहा है जो उससे संबंधित नहीं हैं: इलाहाबाद हाई कोर्ट
दाभोलकर हत्याकांड: बॉम्बे हाईकोर्ट ने हत्या के दोषी शरद कलस्कर को दी जमानत, रोक लगाने की याचिका खारिज
अडानी की खातिर लाखों पेड़ काट दिए जाएंगे, ग्रेट निकोबार परियोजना विकास की भाषा में लिपटा विनाश: राहुल गांधी
‘मेड इन India’ संकट: बंगाल चुनाव में ‘एसआईआर’ ने महानगरों में बढ़ाई घरेलू सहायकों की किल्लत
एग्जिट पोल 2026: तमिलनाडु में डीएमके, बंगाल और असम में भाजपा आगे; केरल में यूडीएफ दे सकता है एलडीएफ को मात
भारत में हर 8 मिनट में एक परिवार हार्ट फेलियर के इलाज के लिए बेच रहा है अपनी संपत्ति
हरकारा डीप डाइव | क्या गरीबी का संबंध जाति से है? तेलंगाना सर्वे ने दिया जवाब!
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कार्ति चिदंबरम के मामले की सुनवाई से खुद को किया अलग, शराब कंपनी से कथित रिश्वत का आरोप
‘एनएचआरसी’ मुसलमानों पर हो रहे हमलों की अनदेखी कर रहा है और उन मामलों में दखल दे रहा है जो उससे संबंधित नहीं हैं: इलाहाबाद हाई कोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश ने तीखी टिप्पणी करते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) पर आरोप लगाया कि वह मुसलमानों के खिलाफ हिंसा के गंभीर मामलों की अनदेखी कर रहा है, जबकि उन मामलों में लगा हुआ है “जो प्रथम दृष्टया उसके कार्यक्षेत्र से संबंधित नहीं हैं.”
अदालत ‘टीचर्स एसोसिएशन मदारिस अरबिया’ द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी. इस याचिका में फरवरी 2025 के एनएचआरसी के उस निर्देश को चुनौती दी गई थी, जिसमें उत्तर प्रदेश के 558 सहायता प्राप्त मदरसों के खिलाफ आरोपों की जांच आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) से कराने को कहा गया था. आयोग के समक्ष की गई शिकायत में सरकारी अनुदान के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के माध्यम से अयोग्य शिक्षकों की नियुक्ति सहित वित्तीय अनियमितताओं का आरोप लगाया गया था.
इशिता मिश्रा की रिपोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि एनएचआरसी के पास एक वर्ष की अवधि के बाद कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच शुरू करने का अधिकार नहीं है. हाईकोर्ट ने इससे पहले सितंबर 2025 में आयोग के आदेश पर रोक लगा दी थी.
अधिकार क्षेत्र पर सवाल
न्यायमूर्ति विवेक सरन के साथ खंडपीठ का हिस्सा रहे न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने आयोग के आदेश पर “आश्चर्य” व्यक्त किया और मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत इसके अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाए.
अदालत ने रेखांकित किया कि वित्तीय अनियमितताओं के मामलों को आमतौर पर मानवाधिकार निकाय के बजाय हाई कोर्ट के समक्ष लाया जाना चाहिए.
अदालत ने कहा, “यह आश्चर्यजनक है कि देश के मानवाधिकार आयोग उन मामलों में शामिल होने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें अन्यथा आवश्यकता पड़ने पर उचित आदेश के लिए जनहित याचिका के माध्यम से अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट के समक्ष उठाया जाना चाहिए था.”
‘विजिलेंटे’ (स्वघोषित रक्षक) हिंसा की अनदेखी
न्यायमूर्ति श्रीधरन ने कहा, “मुस्लिम समुदाय के सदस्यों पर होने वाले हमलों और कुछ मामलों में उनकी मॉब लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या), जहाँ दोषियों के खिलाफ मामले दर्ज नहीं किए जाते या ठीक से जांच नहीं की जाती, उन घटनाओं का स्वतः संज्ञान लेने के बजाय मानवाधिकार आयोग उन मामलों में हाथ डालता दिख रहा है जो प्रथम दृष्टया उससे संबंधित नहीं हैं.”
उन्होंने आगे कहा, “इस अदालत को ऐसी किसी स्थिति की जानकारी नहीं है जहाँ एनएचआरसी ने स्वतः संज्ञान लिया हो जब ‘विजिलेंटे’ (कानून हाथ में लेने वाले तत्व) कानून अपने हाथ में लेते हैं और इस देश के आम नागरिकों को परेशान करते हैं, या अलग-अलग समुदायों के व्यक्तियों के बीच संबंधों की प्रकृति के आधार पर लोगों को प्रताड़ित करते हैं, या जहाँ किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति के साथ सार्वजनिक स्थान पर कॉफी पीना भी डर का काम बन गया है.”
न्यायाधीश ने यह भी नोट किया कि अदालत के सामने ऐसा कोई उदाहरण नहीं रखा गया जिससे पता चले कि एनएचआरसी ने ‘विजिलेंटे’ हिंसा, अंतरधार्मिक जोड़ों के उत्पीड़न, या नागरिकों की बुनियादी स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाले हमलों के मामलों में स्वतः संज्ञान लिया हो. उन्होंने कहा, “लेकिन इसके बजाय उसके पास उन मामलों पर विचार करने का समय है जो हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आते हैं.”
हालांकि, न्यायमूर्ति सरन इन टिप्पणियों से असहमत दिखे और उन्होंने प्रक्रियात्मक चिंताओं पर जोर दिया. उन्होंने रेखांकित किया कि सुनवाई के दौरान एनएचआरसी का कोई प्रतिनिधि मौजूद नहीं था और याचिकाकर्ता ने स्थगन की मांग की थी. उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में, संबंधित सभी पक्षों को सुने बिना प्रतिकूल टिप्पणी करने से बचना उचित होता.
खंडपीठ ने एनएचआरसी को नोटिस जारी किया है और उसके आदेश पर अंतरिम रोक बढ़ा दी है. इस मामले की अगली सुनवाई अन्य संबंधित याचिकाओं के साथ 11 मई को होनी तय है.
दाभोलकर हत्याकांड: बॉम्बे हाईकोर्ट ने हत्या के दोषी शरद कलस्कर को दी जमानत, रोक लगाने की याचिका खारिज
बॉम्बे हाई कोर्ट ने बुधवार को तर्कवादी नरेंद्र दाभोलकर की 2013 में हुई हत्या के मामले में दोषी शरद कलस्कर को जमानत दे दी.
न्यायमूर्ति अजय गडकरी और न्यायमूर्ति रंजीतसिंह भोंसले की पीठ ने 50,000 रुपये के मुचलके पर याचिका स्वीकार कर ली और इस आदेश पर रोक लगाने के अभियोजन पक्ष के अनुरोध को खारिज कर दिया.
‘पीटीआई और टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के अनुसार कलस्कर ने वकील के माध्यम से अपनी दोषसिद्धि को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी और अपील पर सुनवाई लंबित रहने तक जमानत मांगी थी. दाभोलकर मामले में जमानत मिलने के बाद, वह औपचारिकताएं पूरी करने के बाद जेल से बाहर आ सकेगा.
महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक नरेंद्र दाभोलकर की 20 अगस्त 2013 को पुणे में सुबह की सैर के दौरान मोटरसाइकिल सवार दो हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी. इस मामले की जांच पहले स्थानीय पुलिस ने की थी और बाद में उनकी बेटी मुक्ता दाभोलकर की याचिका पर 2014 में इसे केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया गया था.
याद रहे कि 10 मई, 2024 को एक सत्र न्यायालय ने कलस्कर और सचिन अंदुरे को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. उन्हें गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और शस्त्र अधिनियम के आरोपों से बरी कर दिया गया था. अदालत ने सबूतों के अभाव में वीरेंद्र सिंह तावड़े, संजीव पुनालेकर और विक्रम भावे को बरी कर दिया था. मुक्ता दाभोलकर ने आरोपियों को बरी किए जाने और यूएपीए की धाराओं को हटाए जाने को हाई कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें कहा गया है कि यह हत्या दक्षिणपंथी चरमपंथियों की एक बड़ी साजिश का हिस्सा थी.
कलस्कर, गोविंद पानसरे की हत्या के मामले में भी आरोपी है और पिछले साल अक्टूबर में उस मामले में उसे जमानत मिल गई थी. दाभोलकर की हत्या के बाद इसी तरह के अन्य हमले हुए थे: 2015 में गोविंद पानसरे, अगस्त 2015 में धारवाड़ में कन्नड़ विद्वान एम.एम. कलबुर्गी और सितंबर 2017 में बेंगलुरु में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या कर दी गई थी.
‘हम बनाम वे’ की मानसिकता से पैदा होती है हेट स्पीच; कानूनों का खराब प्रवर्तन ‘हेट क्राइम्स’ की वजह: सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (29 अप्रैल, 2026) को कहा कि नफरत भरे भाषण (हेट स्पीच) और अफवाह फैलाना “हम बनाम वे” की मानसिकता से उपजा है और यह एक विविध समाज में भाईचारे की भावना को दूषित करने का काम करता है. हालांकि, अदालत ने नफरत भरे भाषणों और अपराधों के खिलाफ विशिष्ट कानून बनाने का निर्देश देने से इनकार कर दिया, इसके बजाय इस अपराध को कवर करने वाले मौजूदा कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने का आव्हान किया.
कृष्णदास राजगोपाल की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने 125 पन्नों के फैसले में टिप्पणी की, “नफरत भरा भाषण, अपने मूल में, अंतर की उस धारणा से पैदा होता है जो बहिष्कार को जन्म देती है, जहाँ ‘दूसरे’ को विदेशी, निम्न या समान सम्मान के अयोग्य माना जाता है.” न्यायमूर्ति नाथ ने आगाह किया कि जब तक “हम” और “वे” का यह द्वंद्व बना रहेगा, तब तक भाईचारे का वादा अधूरा रहेगा और सच्ची संवैधानिक आत्मीयता मायावी साबित होगी.
शीर्ष अदालत ने कहा, “नफरत भरा भाषण केवल स्वीकार्य विमर्श से विचलन नहीं है; यह मौलिक रूप से भाईचारे के संवैधानिक मूल्य के विपरीत है और हमारे गणतंत्र के नैतिक ताने-बाने पर प्रहार करता है. यह भारत के गहरे सभ्यतागत लोकाचार के भी प्रतिकूल है... इस लोकाचार का दार्शनिक आधार ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के प्राचीन सूत्र में अभिव्यक्ति पाता है, जिसका विचार है कि पूरी दुनिया एक परिवार है.”
अदालत ने नफरत भरे भाषण के अभिशाप से निपटने के लिए किसी भी विशिष्ट कानून को लाने का विचार केंद्र सरकार और विधायी अधिकारियों पर छोड़ दिया.
न्यायमूर्ति नाथ ने कहा, “हालांकि हम मांगी गई प्रकृति के निर्देश जारी करने से इनकार करते हैं, लेकिन हम यह गौर करना उचित समझते हैं कि ‘नफरत भरे भाषण’ और ‘अफवाह फैलाने’ से जुड़े मुद्दे सीधे तौर पर भाईचारे, गरिमा और संवैधानिक व्यवस्था के संरक्षण से जुड़े हैं.”
अदालत कानून नहीं बना सकती
फैसले में कहा गया कि अदालत विशेष विधायी कार्यक्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकती और न ही नफरत भरे भाषण के खिलाफ कानून बना सकती है. न्यायमूर्ति नाथ ने तर्क दिया, “न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिका मुख्य रूप से कानून की व्याख्या और उसे लागू करने की है, न कि कानून बनाने की... अदालतों द्वारा विस्तृत वैधानिक योजनाएं निर्धारित करने या कानून के समान प्रावधान तैयार करने का कोई भी प्रयास ‘न्यायिक कानून-निर्माण’ कहलाएगा और यह विधायिका को सौंपे गए कार्यों में अनुचित हस्तक्षेप होगा.”
बेहतर प्रवर्तन ही समाधान
अदालत ने कहा कि नफरत भरे अपराधों (हेट क्राइम्स) के कारण खून-खराबा जारी रहने की वजह मौजूदा कानूनों का खराब प्रवर्तन (लागू करना) है, न कि इस मुद्दे से निपटने या दोषियों को दंडित करने के लिए कानूनों की कमी.
अदालत ने कहा, “यह तर्क नहीं दिया जा सकता कि कानून मौन है या सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने या अंतर-समूह शत्रुता को बढ़ावा देने वाले आचरण से उत्पन्न शिकायतों के समाधान में अपर्याप्त है. कमी कानून की अनुपस्थिति में नहीं, बल्कि विशिष्ट मामलों में इसके प्रयोग और प्रवर्तन में है. इस अदालत का कार्य नए अपराध बनाना या समानांतर नियामक व्यवस्थाएं बनाना नहीं है, बल्कि कानून के तहत पहले से परिकल्पित उपायों का निष्ठापूर्वक कार्यान्वयन सुनिश्चित करना है. “
अदालत ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के उन प्रावधानों की ओर इशारा किया जो पहले से ही नफरत भरे अपराधों को कवर करते हैं, जैसे: धारा 196: शत्रुता को बढ़ावा देना, धारा 197(1): राष्ट्रीय अखंडता के प्रतिकूल कार्य, धारा 299: धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना, धारा 302: धार्मिक भावनाओं को आहत करना, धारा 356: शत्रुता या शरारत को बढ़ावा देना.
अदालत ने यह भी नोट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 173(4) शिकायतकर्ता को यह अनुमति देती है कि यदि स्थानीय पुलिस स्टेशन संज्ञेय अपराध दर्ज करने से इनकार करता है, तो वह लिखित जानकारी डाक के माध्यम से पुलिस अधीक्षक को भेज सकता है.
‘पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं’
न्यायमूर्ति नाथ ने कहा कि मूल दंडात्मक कानून (बीएनएस) और प्रक्रियात्मक कानून (बीएनएसएस) दोनों की वैधानिक संरचना इस तरह से बनाई गई है कि क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट की निगरानी में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जा सके. अदालत ने कहा कि यह कानून प्रवर्तन अधिकारियों (पुलिस) पर निर्भर है कि वे मौजूदा कानूनों का निष्ठापूर्वक और निष्पक्ष कार्यान्वयन सुनिश्चित करें.
अदालत ने आगे कहा कि नफरत भरे भाषण की शिकायत पर संज्ञान लेने के लिए मजिस्ट्रेट को पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है. अदालत ने अपने पिछले फैसलों, विशेष रूप से 2018 के तहसीन पूनावाला मामले को दोहराते हुए कहा कि नफरत भरे भाषण की शिकायत मिलने पर पुलिस अधिकारियों को तुरंत प्राथमिकी दर्ज करनी चाहिए.
यह फैसला पत्रकार कुर्बान अली द्वारा दायर याचिका सहित कई याचिकाओं पर आया, जिसमें नफरत भरे भाषण और अपराधों के लिए अलग कानून बनाने की मांग की गई थी. याचिकाओं में इस बात पर भी जोर दिया गया था कि सुप्रीम कोर्ट के बार-बार के फैसलों के बावजूद समाज में नफरत भरे भाषणों की मौजूदगी बेरोकटोक बनी हुई है.
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कार्ति चिदंबरम के मामले की सुनवाई से खुद को किया अलग, शराब कंपनी से कथित रिश्वत का आरोप
‘द वायर’ की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने मंगलवार (28 अप्रैल 2026) को कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम की उस याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया, जिसमें उन्होंने सीबीआई द्वारा दर्ज कथित भ्रष्टाचार मामले को रद्द करने की मांग की थी.
यह मामला कथित ‘डियाजियो स्कॉटलैंड रिश्वत प्रकरण’ से जुड़ा है. सीबीआई का आरोप है कि वर्ष 2005 में, जब पी. चिदंबरम केंद्रीय वित्त मंत्री थे, तब कार्ति चिदंबरम ने शराब कंपनी डियाजियो स्कॉटलैंड को उसकी व्हिस्की की ड्यूटी-फ्री बिक्री पर लगे प्रतिबंध से राहत दिलाने में भूमिका निभाई थी.
कार्ति चिदंबरम ने अपनी याचिका में इस एफआईआर को ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ बताया और इसे रद्द करने की मांग की. हालांकि, सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि यह मामला अब जुलाई में किसी दूसरी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाएगा.
उन्होंने यह भी कहा कि इसी एफआईआर से जुड़ा एडवांटेज स्ट्रैटेजिक कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड का मामला भी किसी अन्य पीठ द्वारा सुना जाएगा.
कार्ति चिदंबरम पर भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी (आपराधिक साजिश) और 420 (धोखाधड़ी) के साथ-साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज है.
यह पहली बार नहीं है जब न्यायमूर्ति शर्मा ने कार्ति चिदंबरम के मामले की सुनवाई से खुद को अलग किया है. इससे पहले जनवरी 2026 में भी उन्होंने कथित ‘चीनी वीजा घोटाला’ मामले में ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली उनकी याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था.
गौरतलब है कि यह फैसला ऐसे समय आया है जब पिछले सप्ताह ही न्यायमूर्ति शर्मा ने अरविंद केजरीवाल और अन्य नेताओं की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें दिल्ली आबकारी नीति मामले की सुनवाई से उन्हें अलग करने की मांग की गई थी.
आम आदमी पार्टी के नेताओं ने उन पर वैचारिक पक्षपात और हितों के टकराव का आरोप लगाया था. हालांकि, न्यायमूर्ति शर्मा ने इन आरोपों को खारिज कर दिया था. सीबीआई ने भी अदालत में यह कहते हुए पक्षपात के आरोपों का विरोध किया था कि न्यायमूर्ति शर्मा ने सह-आरोपी अरुण रामचंद्रन पिल्लई को तीन अलग-अलग मौकों पर अंतरिम जमानत दी थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उनके फैसले केवल न्यायिक आधार पर होते हैं.
अडानी की खातिर लाखों पेड़ काट दिए जाएंगे, ग्रेट निकोबार परियोजना विकास की भाषा में लिपटा विनाश: राहुल गांधी
‘पीटीआई’ के अनुसार, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने बुधवार (29 अप्रैल, 2026) को आरोप लगाया कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के कैंपबेल बे में स्थित ग्रेट निकोबार परियोजना “देश की प्राकृतिक और जनजातीय विरासत के खिलाफ सबसे बड़े घोटालों और गंभीर अपराधों में से एक है.”
यह कहते हुए कि एक उद्योगपति अडानी के लिए 160 वर्ग किलोमीटर के वर्षावनों में लाखों पेड़ों को काट दिया जाएगा, लोकसभा में विपक्ष के नेता ने इसे “विकास की भाषा में लिपटा विनाश” बताया और कहा कि वे इस मुद्दे को संसद में उठाएंगे.
एक सोशल मीडिया पोस्ट में गांधी ने कहा, “मैंने आज पूरे ग्रेट निकोबार की यात्रा की. ये मेरे जीवन में देखे गए अब तक के सबसे असाधारण जंगल हैं. ऐसी यादों से भी पुराने पेड़ और जंगल जिन्हें पनपने में कई पीढ़ियां लगीं. इस द्वीप के लोग भी उतने ही सुंदर हैं—आदिवासी समुदाय और बसने वाले दोनों—लेकिन उनसे वह छीना जा रहा है जो कानूनन उनका है.”
उन्होंने आगे कहा, “सरकार यहाँ जो कर रही है उसे ‘परियोजना’ कहती है. मैंने जो देखा है वह कोई परियोजना नहीं है. यह कुल्हाड़ी के लिए चिन्हित किए गए लाखों पेड़ हैं. यह मरने के लिए अभिशप्त 160 वर्ग किलोमीटर का वर्षावन है. ये वे समुदाय हैं जिन्हें उनके घर छीनते समय नजरअंदाज कर दिया गया है. यह विकास नहीं है. यह विकास की भाषा में लिपटा विनाश है.”
सोशल मीडिया पर एक वीडियो संदेश में गांधी ने कहा, “इस द्वीप पर रहने वाला हर एक व्यक्ति इस परियोजना के खिलाफ है, लेकिन उनसे इस बारे में पूछा तक नहीं गया है. उन्हें नहीं पता कि उनकी जमीन के बदले उन्हें क्या मुआवजा मिलने वाला है.”
‘मेड इन इंडिया’ संकट: बंगाल चुनाव में ‘एसआईआर’ ने महानगरों में बढ़ाई घरेलू सहायकों की किल्लत
पश्चिम बंगाल में आज मंगलवार (29 अप्रैल 2026) को दूसरे चरण की 142 विधानसभा सीटों के लिए वोट डाले गए. इसके पहले 23 अप्रैल को पहले दौर में 152 सीटों के लिए मतदान हुआ था. लेकिन, इस बार राज्य के चुनाव के दौरान एक सवाल पैदा हुआ कि क्या यह हाल के समय में शहरी भारतीय घरों पर आया सबसे बड़ा संकट है? या यह केवल उन परेशान घर-मालिकों को ऐसा महसूस हो रहा है, जिन्हें अब समझ आ रहा है कि वे सहायकों की उस विशाल फौज पर कितने निर्भर हैं जो उनके घरों और शहरों की रफ्तार बनाए रखते हैं, और जो अचानक गायब हो गए हैं?
‘द टेलीग्राफ’ में परन बालकृष्णन की रिपोर्ट के अनुसार, जैसे-जैसे पश्चिम बंगाल चुनाव एक भीषण और हाई-प्रोफाइल मुकाबले में तब्दील हुए—जहाँ भाजपा, टीएमसी को सत्ता से बेदखल करने की कोशिश में है—इन “लापता सहायिकाओं” का असर राज्य की सीमाओं से कहीं दूर तक महसूस किया जा रहा है. मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई से लेकर हैदराबाद, गुरुग्राम, नोएडा और लुटियंस दिल्ली तक, इसका प्रभाव तत्काल और व्यक्तिगत रहा है.
“मुझे खाना बनाने से नफरत नहीं है, नफरत तो बर्तन धोने से है,” गुरुग्राम की एक महिला ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, जिनकी मेड (सहायिका) छुट्टी पर गई है. दूसरी महिला ने जवाब दिया, “मैं भी उसी नाव में सवार हूँ.”
अगर यह कोई किताब होती, तो इसका शीर्षक होता: ‘कहाँ चले गए सारे रसोइये और सहायक?’ और इसके उप-शीर्षक में सफाईकर्मी, ड्राइवर, रेस्तरां के वेटर और कई अन्य लोग शामिल होते.
इसका जवाब ज़ाहिर तौर पर यही है कि वे वोट डालने अपने घर गए हैं. लेकिन इस पलायन के पैमाने और इसकी अवधि ने नियोक्ताओं (मालिकों) को हैरान कर दिया है.
“पूरा नोएडा खाली घोंसले जैसा महसूस होने लगा”
नोएडा की संचार विशेषज्ञ अंजलि प्रसाद शर्मा कहती हैं: “ऐसा लगता है जैसे भारी संख्या में लोग चुनावों के लिए निकल गए हैं और वे लंबी अवधि के लिए गए हैं. इस वजह से नोएडा अब एक ‘एम्प्टी-नेस्टर’ (जहाँ बच्चे घर छोड़कर चले गए हों) स्पेस जैसा महसूस होने लगा है.”
पश्चिम बंगाल के प्रवासी श्रमिकों की इस अचानक अनुपस्थिति को सोशल मीडिया पर चटकारे लेकर परोसा जा रहा है. मीम्स की भरमार है; पूर्व चुनाव आयुक्त डॉ. एस.वाई. कुरैशी द्वारा साझा की गई एक पोस्ट में मज़ाक किया गया: “गुरुग्राम पश्चिम बंगाल में शांतिपूर्ण चुनाव की कामना करता है. हमें अपनी मेड्स सुरक्षित और जल्द वापस चाहिए.”
लेकिन यह हास्य कई लोगों को रास नहीं आया, खासकर इसलिए क्योंकि यह उजागर करता है कि देश के कई हिस्सों में पश्चिम बंगाल को किस नज़रिए से देखा जाता है. वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी कहते हैं, “एक राज्य जिसने कभी भारत की बौद्धिकता, उद्योग और नैतिक कल्पना को आकार दिया था, उसे अब आर्थिक गिरावट के ऐसे दौर में धकेल दिया गया है जहाँ अस्तित्व के लिए पलायन करना सामान्य माना जाता है.”
सोशल मीडिया पर एक अन्य उपयोगकर्ता ने लिखा: “एक समय था जब पश्चिम बंगाल अपनी बौद्धिक हस्तियों और व्यावसायिक घरानों के लिए जाना जाता था. आज इसका एकमात्र निर्यात ‘मेड्स’ हैं.” एक अन्य ने घोषणा की: “ममता बनर्जी ने बंगाल को भारत की ‘मेड्स कैपिटल’ बना दिया है. “
पहचान और अस्तित्व की लड़ाई
लेकिन भारत के समृद्ध वर्गों के बीच बंगाल की छवि को लेकर चल रही यह बहस निम्न-आय वाले बंगालियों के लिए बेमानी है. उनके लिए कहीं अधिक एक तात्कालिक चिंता है “मतदाता सूची में अपना नाम सुनिश्चित करना.” इसी चिंता ने उन्हें घर लौटने पर मजबूर कर दिया.
वर्तमान ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) अभियान ने कई लोगों के लिए घर लौटकर वोटर लिस्ट में अपना नाम चेक करना अनिवार्य बना दिया. जो लोग सक्षम हैं, उन्होंने अपनी हवाई टिकटें तक बुक कर लीं. कई लोगों को डर है कि उनके नाम हटा दिए गए होंगे, इसलिए उन्हें व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपना नाम सूची में बनाए रखना पड़ा है.
टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी ने कहा, “उचित दस्तावेज़ होने के बावजूद मतदाताओं को गलत तरीके से लिस्ट से हटाया गया है.” विपक्ष ने आरोप लगाया है कि बड़ी संख्या में नाम काटे गए हैं, जिसे चुनाव अधिकारियों और भाजपा ने खारिज कर दिया है.
नियोक्ता अंजलि शर्मा बताती हैं कि उनकी मेड कोई जोखिम नहीं लेना चाहती थी और 12 तारीख को ही निकल गई. वह उम्मीद कर रही हैं कि महीने के अंत तक वापस आ जाएगी. बेंगलुरु में अखिला श्रीनिवासन एक बड़ा घर संभालती हैं और परेशान हैं क्योंकि उनकी मेड और ड्राइवर बिना यह बताए बंगाल चले गए कि वे कब लौटेंगे. नोएडा के गेझा और भंगेल जैसे मोहल्ले, जहाँ बंगाली श्रमिक रहते हैं, वहाँ की सड़कें अब पहले जैसी गुलज़ार नहीं हैं.
इसमें कोई शक नहीं कि राजनीतिक दल भी कम आय वाले मतदाताओं की लंबी यात्रा को संभव बनाने के लिए धन खर्च कर रहे हैं. तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा पर ट्रेनों में भरकर मतदाताओं को वापस लाने का आरोप लगाया है, जबकि भाजपा ने टीएमसी पर भी यही आरोप लगाए हैं. बहरहाल, भारत के शहरी मध्यम वर्ग के लिए यह सब कुछ हफ्तों की असुविधा हो सकती है, लेकिन बंगाल के कई लोगों के लिए यह अपनी पहचान बचाए रखने की जद्दोजहद है.
एग्जिट पोल 2026: तमिलनाडु में डीएमके, बंगाल और असम में भाजपा आगे; केरल में यूडीएफ दे सकता है एलडीएफ को मात
बुधवार (29 अप्रैल, 2026) को आए कई एग्जिट पोल्स (मतदान-पश्चात सर्वेक्षणों) में असम में भाजपा की भारी जीत और पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ टीएमसी पर भाजपा की स्पष्ट बढ़त का अनुमान लगाया गया है. वहीं, तमिलनाडु में द्रमुक (डीएमके) सरकार की वापसी और केरल में 10 साल बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ की सत्ता में वापसी की संभावना जताई गई है.
‘द हिंदू’ ब्यूरो के अनुसार, सर्वेक्षणकर्ताओं ने पुडुचेरी में भी एआईएनआरसी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार की वापसी का पूर्वानुमान लगाया है. सभी पांच विधानसभाओं - पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, केरल और असम के लिए वोटों की गिनती 4 मई को की जाएगी.
इस बीच छिटपुट हिंसा की घटनाओं के बीच, दूसरे चरण के मतदान में शाम 7 बजे तक 3.21 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 91.41% ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया.
एग्ज़िट पोल का रिकॉर्ड कमज़ोर रहा है बंगाल में
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण का मतदान बुधवार 29 अप्रैल 2026 को समाप्त होते ही सभी की निगाहें एग्ज़िट पोल पर टिक गई हैं. केरल और असम में 9 अप्रैल को तथा तमिलनाडु में 23 अप्रैल को मतदान पूरा हो चुका है, और चारों राज्यों के नतीजे 4 मई को आने हैं. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक इस पृष्ठभूमि में 2021 के एग्ज़िट पोल का लेखा-जोखा यह बताता है कि सर्वेक्षणकर्ता किन राज्यों में सही साबित हुए और कहाँ बुरी तरह चूके.
पश्चिम बंगाल: सबसे बड़ी चूक
2021 में पश्चिम बंगाल के नतीजों ने लगभग हर एग्ज़िट पोल को ग़लत साबित कर दिया. तृणमूल कांग्रेस ने 294 सदस्यीय विधानसभा में 215 सीटें जीतीं और उसके तत्कालीन सहयोगी गोरखा जनमुक्ति मोर्चा को 1 सीट मिली. भाजपा 77 पर सिमट गई जबकि कांग्रेस की सहयोगी इंडियन सेक्युलर फ्रंट को 1 सीट मिली. बहुमत का आँकड़ा 148 था. इसके बावजूद औसतन एग्ज़िट पोल ने तृणमूल कांग्रेस को 61 सीटें कम और भाजपा को 49 सीटें अधिक आँका. आज तक-ऐक्सिस माई इंडिया ने तो भाजपा को संकीर्ण बहुमत दे दिया था. सबसे क़रीब रहा टुडेज़ चाणक्य जिसने तृणमूल कांग्रेस को 169 से 191 और भाजपा को 97 से 119 सीटें दी थीं. सबसे दूर रहा जन की बात, जिसने तृणमूल कांग्रेस को महज़ 104 से 121 और भाजपा को 162 से 185 सीटें दीं, यानी भाजपा को बहुमत से भी आगे.
तमिलनाडु: थोड़ी चूक, दिशा सही
तमिलनाडु में 234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 118 सीटें चाहिए थीं. डीएमके और उसके सहयोगियों ने 159 सीटें जीतीं जबकि एआईएडीएमके गठबंधन 75 पर रुका. हर एग्ज़िट पोल ने सही भाँपा कि डीएमके स्पष्ट बहुमत पाएगी, लेकिन उसकी सीटें औसतन 7 अधिक आँकी गईं और एआईएडीएमके की 12 कम. टीवी9-पोलस्ट्रैट, शाइनिंग इंडिया न्यूज़ और पैट्रियॉटिक वोटर सबसे सटीक रहे जिन्होंने क्रमश: 143-153, 147-177 और 153 सीटों का अनुमान लगाया. आज तक-ऐक्सिस माई इंडिया ने डीएमके को 175 से 195 सीटें देकर सबसे अधिक अनुमान लगाया.
केरल: जीत का अनुमान सही, अंतर का नहीं
केरल में 140 सदस्यीय विधानसभा के लिए बहुमत का आँकड़ा 70 था. एलडीएफ ने 99 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी की, जबकि यूडीएफ 41 पर सिमट गई. एग्ज़िट पोल ने एलडीएफ की जीत का अनुमान सही लगाया लेकिन यूडीएफ को वास्तविकता से कहीं अधिक मज़बूत आँका. औसतन एलडीएफ को 17 सीटें कम और यूडीएफ को 15 सीटें अधिक दी गईं. न्यूज़24-टुडेज़ चाणक्य सबसे सटीक रहा जिसने एलडीएफ को 93-111 और यूडीएफ को 26-44 सीटें दीं. इंडिया न्यूज़ आईटीवी-जन की बात, मनोरमा न्यूज़-वीएमआर और टीवी9 भारतवर्ष-पोलस्ट्रैट ने तो त्रिशंकु विधानसभा या बेहद संकीर्ण बहुमत का अनुमान लगाया था.
असम: चारों राज्यों में सबसे सटीक
असम में एग्ज़िट पोल सबसे सटीक रहे. 126 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 64 सीटें चाहिए थीं. भाजपा और उसके सहयोगियों ने 75 सीटें जीतीं, कांग्रेस गठबंधन को 50 और एक निर्दलीय को 1 सीट मिली. टीवी9 भारतवर्ष-पोलस्ट्रैट और इंडिया अहेड-पी मार्क ने त्रिशंकु विधानसभा की भविष्यवाणी की थी, लेकिन बाक़ी सभी ने भाजपा को स्पष्ट बहुमत दिया. इंडिया न्यूज़-जन की बात और न्यूज़24-टुडेज़ चाणक्य सबसे क़रीब रहे, जिन्होंने भाजपा को 70-81 और 70 सीटें, तथा कांग्रेस को 45-55 और 56 सीटें दीं. औसतन भाजपा को 4 सीटें कम और कांग्रेस को 4 सीटें अधिक आँका गया.
ममता बनर्जी और मुस्लिमों को निशाना बनाने वाले आपत्तिजनक मीम पर 1800 से अधिक नागरिकों ने जताई कड़ी आपत्ति
द वायर की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, शिक्षाविदों, कलाकारों, कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और आम नागरिकों सहित 1815 लोगों ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने वाले एक मीम की कड़ी निंदा की है. इस मीम को भदोही, उत्तर प्रदेश के एक व्यक्ति ने शेयर किया था, जो ख़ुद को “दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी” बताता है. 27 अप्रैल 2026 को सोशल मीडिया पर वायरल हुए इस मीम को बेहद हिंसक, महिला-विरोधी और कट्टर मुस्लिम-विरोधी बताया गया है. इसमें एक मुस्लिम को ममता बनर्जी के खुले पैरों के बीच से गुज़रते हुए दिखाया गया है और इसका शीर्षक “दिस इज़ मोम्ता कल्चर” (This is Momta Culture) रखा गया है.
हस्ताक्षरकर्ताओं ने इस मीम को घृणित और घटिया बताते हुए लोगों से बलात्कार और महिलाओं के प्रति नफ़रत की संस्कृति के ख़िलाफ़ खड़े होने की अपील की है. द वायर पर अपर्णा भट्टाचार्य ने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि महिलाओं का सार्वजनिक अपमान भारतीय राजनीति की एक ऐसी त्रासदी है जिस पर सभी राजनीतिक दल मौन सहमति जताते हैं. उन्होंने लिखा कि जो नेता महिलाओं के अधिकारों की बात करते हैं, वे भी चुनावी गणित के लिए ऐसे घटिया स्त्री-द्वेष को बर्दाश्त करते हैं और बीजेपी के हमले भी इसी पैटर्न का पालन कर रहे हैं.
बयान में कहा गया है कि केंद्र में सत्तारूढ़ दल द्वारा जिस तरह से महिला-द्वेष को बढ़ावा दिया गया है, उसी का नतीजा है कि आज कोई भी अपने दिमाग़ की नफ़रत को इस तरह खुलेआम ज़ाहिर कर सकता है. नागरिकों ने बिलक़ीस बानो के बलात्कारियों की रिहाई, हाथरस, उन्नाव और कठुआ बलात्कार कांड, और अंकिता भंडारी की हत्या का ज़िक्र करते हुए कहा कि इन सभी मामलों में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सहित सत्ताधारी दल के शीर्ष नेताओं ने पूरी तरह से चुप्पी साधे रखी. नागरिकों ने न्यायपालिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं से अपील की है कि वे सार्वजनिक जीवन में शुचिता के न्यूनतम मानकों को सुनिश्चित करने के लिए अपनी ज़िम्मेदारी निभाएं और इस तरह खुलेआम नफ़रत फैलाने वालों पर कार्रवाई करें.
योगेंद्र यादव: पश्चिम बंगाल चुनाव में अल्पसंख्यकों को बाहर करने की साज़िश
इंडियन एक्सप्रेस के ओपिनियन कॉलम में स्वराज इंडिया के सदस्य और भारत जोड़ो अभियान के राष्ट्रीय संयोजक योगेंद्र यादव लिखते हैं कि पिछले 10 महीनों में पश्चिम बंगाल में ‘स्पेशल इम्पेडिमेंट रिमूवल’ (एसआईआर) के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाना एक सामान्य बात बन गई है. बंगाल का यह मामला मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने का एक असाधारण उदाहरण है.
यादव के अनुसार, यह पूरी क़वायद बीजेपी द्वारा डिज़ाइन की गई, चुनाव आयोग द्वारा लागू की गई और सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रमाणित की गई थी. इसका मक़सद बंगाल फ़तह करने की बीजेपी की कोशिशों में आ रही जनसांख्यिकीय बाधाओं को दूर करना था.
अक्टूबर 2025 में एसआईआर से पहले बंगाल की मतदाता सूची में 7.66 करोड़ नाम थे, जो कि राज्य की वयस्क आबादी (7.67 करोड़) के लगभग बराबर था. जून-अगस्त 2025 में सिर्फ़ 3.5 लाख नए नाम जोड़े गए और 41% आवेदन ख़ारिज कर दिए गए, जो कि सरकारी मिलीभगत की अफ़वाहों को भी ख़ारिज करता है. ड्राफ़्ट सूची में 58 लाख नाम (7.7%) हटा दिए गए, जो राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे अन्य राज्यों के आंकड़े के क़रीब ही था. लेकिन इसके बाद चुनाव आयोग ने असाधारण क़दम उठाए. बंगाल में 30 रोल ऑब्ज़र्वर, स्पेशल रोल ऑब्ज़र्वर और उनके नीचे 8,000 माइक्रो ऑब्ज़र्वर नियुक्त किए गए, जबकि यूपी में सिर्फ़ चार ऐसे ऑब्ज़र्वर थे. जब इससे मनचाहे नतीजे नहीं मिले, तो चुनाव आयोग ने 2002 के डेटा से “तार्किक विसंगतियों” को हथियार बनाया.
यादव बताते हैं कि चुनाव आयोग ने एक विवाद गढ़ा और सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. कोर्ट ने 35 दिनों के भीतर 60 लाख विवादित मामलों को निपटाने के लिए एक विशेष तंत्र बनाया, जिसकी प्रक्रिया बिल्कुल भी पारदर्शी नहीं थी. कुछ सौ जजों ने आनन-फ़ानन में फ़ैसले किए और नतीजा यह हुआ कि 27 लाख और नाम काट दिए गए.
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि हटाए गए इन लोगों ने सभी प्रक्रियाएं पूरी की थीं और उनके पास पैन कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट और आधार जैसे वैध दस्तावेज़ थे. यादव का दावा है कि हटाए गए लोगों में से लगभग दो-तिहाई अल्पसंख्यक समुदाय से हैं.
सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाए गए अपीलीय ट्रिब्यूनल भी वक़्त पर काम नहीं कर पाए हैं. सबर (SABAR) इंस्टीट्यूट के विश्लेषण के अनुसार, अब तक “अधिनिर्णय” के लगभग 89 प्रतिशत फ़ैसलों को ट्रिब्यूनल ने पलट दिया है. यादव ने इसे “एक त्रासदी में कॉमेडी का तड़का” और एक मुकम्मल प्रहसन क़रार दिया है.
ट्रंप ने ईरान का प्रस्ताव ठुकराया, कहा- परमाणु समझौता होने तक जारी रहेगी नौसैनिक नाकेबंदी
अमेरिकी न्यूज़ वेबसाइट एक्सियोस के रिपोर्टर बराक राविड की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के उस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया है जिसमें पहले होर्मुज़ जलडमरूमध्य को खोलने और नाकेबंदी हटाने, और फिर परमाणु वार्ता को बाद के चरण तक टालने की बात कही गई थी. ट्रंप ने एक्सियोस को बताया कि जब तक ईरानी शासन अमेरिका की चिंताओं को दूर करने वाले परमाणु समझौते पर सहमत नहीं हो जाता, तब तक वह ईरान पर नौसैनिक नाकेबंदी जारी रखेंगे.
रिपोर्ट के मुताबिक़, यूएस सेंट्रल कमांड ने बातचीत के इस गतिरोध को तोड़ने के लिए ईरान के बुनियादी ढांचों को निशाना बनाते हुए “छोटी और ताक़तवर” एयर स्ट्राइक की योजना तैयार की है. इसके बाद अमेरिका ईरान पर बातचीत की मेज़ पर लौटने और लचीलापन दिखाने का दबाव बनाएगा. हालांकि, ट्रंप ने सैन्य हमले के बजाय नाकेबंदी को ज़्यादा असरदार माना है. उन्होंने बुधवार को एक्सियोस से एक फ़ोन इंटरव्यू में कहा कि “नाकेबंदी बमबारी से कुछ ज़्यादा प्रभावी है. उनका दम घुट रहा है और उनके लिए हालात और ख़राब होने वाले हैं. वे परमाणु हथियार हासिल नहीं कर सकते.”
ट्रंप ने यह भी दावा किया कि नाकेबंदी के कारण ईरान अपना तेल निर्यात नहीं कर पा रहा है और उसके तेल भंडार व पाइपलाइन “फटने की कगार पर हैं”. उन्होंने एआई द्वारा बनाई गई अपनी एक तस्वीर भी शेयर की है, जिसमें वह बंदूक पकड़े हुए हैं और इसका कैप्शन है- “नो मोर मिस्टर नाइस गाय”. दूसरी तरफ़, अंग्रेज़ी भाषा के ईरानी सरकारी मीडिया ‘प्रेस टीवी’ के हवाले से एक वरिष्ठ ईरानी सुरक्षा सूत्र ने बुधवार को चेतावनी दी है कि अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी का जल्द ही “व्यावहारिक और अभूतपूर्व कार्रवाई” के साथ जवाब दिया जाएगा. ईरान का कहना है कि उनकी सेना ने अब तक कूटनीति को मौक़ा देने के लिए संयम बरता है, लेकिन उनके धैर्य की भी एक सीमा है और अगर नाकेबंदी जारी रही तो कड़ा जवाब देना ज़रूरी हो जाएगा.
भारत में हर 8 मिनट में एक परिवार हार्ट फेलियर के इलाज के लिए बेच रहा है अपनी संपत्ति
भारत के किसी कोने में इस वक्त कोई परिवार अपने जीवन का सबसे मुश्किल फैसला ले रहा होगा. शायद वह पुश्तैनी जमीन बेचने की तैयारी कर रहे होंगे, या शायद वह सोना जो बेटी की शादी के लिए बरसों से सहेज कर रखा था. इसका कारण कोई व्यापारिक घाटा नहीं, बल्कि घर के किसी सदस्य का इलाज है. ‘साउथ फर्स्ट’ में सुमित झा की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर 8 मिनट में एक परिवार को हार्ट फेलियर के इलाज का खर्च उठाने के लिए अपनी संपत्ति बेचनी पड़ती है.
यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि मार्च 2026 में ‘ग्लोबल हार्ट’ में प्रकाशित एक विस्तृत अध्ययन की हकीकत है. श्री चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन ने देश के 21 अस्पतालों के 1,859 मरीजों के आर्थिक हालातों का जायजा लिया.
वह बिल, जिसे चुकाना नामुमकिन है
हार्ट फेलियर कोई ऐसी बीमारी नहीं है जो एक ऑपरेशन के बाद खत्म हो जाए. यह एक लंबी और खर्चीली प्रक्रिया है. जिसमें जीवनभर दवाएं, बार-बार इकोकार्डियोग्राम, ब्लड टेस्ट और बार-बार अस्पताल में भर्ती होना शामिल होता है.
सुमित झा अपनी रिपोर्ट में बताते हैं कि भारत में एक हार्ट फेलियर मरीज का औसत वार्षिक खर्च ₹1,06,566 है. इसके विपरीत, बीमारी के बाद इन मरीजों की औसत व्यक्तिगत वार्षिक आय केवल ₹94,392 रह जाती है. यानी इलाज का बिल मरीज की कुल कमाई से भी ज्यादा है. अध्ययन के अनुसार, कुल स्वास्थ्य खर्च का 92.6% हिस्सा आउट-ऑफ-पॉकेट होता है, यानी वह पैसा जो मरीज को सीधे अपनी जेब से देना पड़ता है.
संपत्ति और सपनों की नीलामी
जब बचत खत्म हो जाती है, तो परिवार ‘डिस्ट्रेस फाइनेंसिंग’ (संकटकालीन वित्त पोषण) का सहारा लेते हैं. अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि 67.7% लोग अपनी पूरी जमा-पूंजी इलाज में लगा देते हैं और 54.4% मामलों में परिवार के सभी सदस्य मिलकर पैसा जुटाने का काम करते हैं. जबकि 3.8% मरीजों को अपना घर, जमीन या मवेशी बेचने पड़ते हैं.
यदि हम भारत में हर साल होने वाले 1.8 मिलियन हार्ट फेलियर दाखिलों पर इस 3.8% के आंकड़े को लागू करें, तो साल भर में 68,400 परिवार अपनी संपत्ति बेचते हैं. गणित आसान है: हर दिन 187 परिवार, और हर 8 मिनट में एक परिवार अपनी संपत्ति बेचते हैं.
आय का स्थायी नुकसान
हार्ट फेलियर सिर्फ बैंक बैलेंस पर हमला नहीं करता, बल्कि भविष्य की कमाई के रास्ते भी बंद कर देता है. रिपोर्ट बताती है कि डायग्नोसिस से पहले मरीजों की औसत मासिक आय ₹12,595 थी, जो बीमारी के बाद घटकर ₹7,866 रह गई. यह आय में लगभग 37% की गिरावट है.
इसका कारण यह है कि मरीज या तो काम करने के लायक नहीं रहता, या घर के किसी अन्य सदस्य को उसकी देखभाल के लिए अपनी नौकरी छोड़नी पड़ती है. यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसमें स्वास्थ्य की हानि, आय की हानि और बढ़ता कर्ज एक साथ मिलकर परिवार को गरीबी की रेखा के नीचे धकेल देते हैं.
बीमा का अधूरा कवच
भारत सरकार ने ‘आयुष्मान भारत’ जैसी योजनाओं के जरिए स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान करने की कोशिश की है, लेकिन हार्ट फेलियर जैसे दीर्घकालिक रोगों के मामले में ये नाकाफी साबित हो रही हैं. मौजूदा अधिकांश बीमा योजनाएं केवल अस्पताल में भर्ती होने के खर्च को कवर करती हैं. लेकिन हार्ट फेलियर में असली खर्च अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद शुरू होता है, जैसे महंगी दवाएं और नियमित जांच, जो कवर नहीं होतीं.”
अध्ययन में पाया गया कि बीमा होने के बावजूद 30.8% मरीजों को ‘विनाशकारी स्वास्थ्य खर्च’ का सामना करना पड़ा. बिना बीमा वाले मरीजों के लिए यह आंकड़ा 40.3% था.
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और बदतर
इस संकट का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि यह ग्रामीण भारत और गरीब तबके को सबसे ज्यादा चोट पहुँचाता है. ग्रामीण क्षेत्रों में 45.6% मरीजों को विनाशकारी खर्च झेलना पड़ा. दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले मरीजों को इलाज के लिए लंबा सफर तय करना पड़ता है, उनकी बचत कम होती है और निजी अस्पतालों के बिल शहरों जैसे ही भारी होते हैं.
इसके अलावा, भारत में हार्ट फेलियर के मरीजों की औसत आयु 55.9 वर्ष है, जो पश्चिमी देशों की तुलना में 10-15 साल कम है. यह वह उम्र है जब इंसान अपने परिवार का मुख्य स्तंभ होता है. जब इस उम्र में कोई बीमार पड़ता है, तो बच्चों की शिक्षा और शादियां रुक जाती हैं और आर्थिक कमज़ोरी पूरी एक पीढ़ी को प्रभावित करता है.
भारत को अपनी स्वास्थ्य नीतियों में बदलाव की जरूरत है. केवल अस्पताल में भर्ती होने का खर्च उठाना काफी नहीं है. बीमा योजनाओं में ओपीडी परामर्श और दवाओं के खर्च को शामिल करना अनिवार्य होना चाहिए. हार्ट फेलियर की जीवन रक्षक दवाओं को ‘आवश्यक दवा सूची’ में शामिल कर उनकी कीमत कम की जानी चाहिए. तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे राज्यों के उदाहरण बताते हैं कि निजी अस्पतालों में खर्च बहुत अधिक है. सरकारी अस्पतालों की सुविधाओं को इस स्तर तक बढ़ाना होगा कि आम आदमी को ₹95,000 के निजी बिल से न जूझना पड़े.
हरकारा डीप डाइव | पत्रकार सुमित झा
क्या गरीबी का संबंध जाति से है? तेलंगाना सर्वे ने दिया जवाब!
2026 में जाति और गरीबी भले ही अलग-अलग कहानियां लगें, चाहे आरक्षण पर बहस हो या बराबरी के दावे, लेकिन तेलंगाना का ताज़ा जाति सर्वे एक अलग ही सच्चाई सामने रखता है. यह बताता है कि जाति और गरीबी का रिश्ता आज भी क़दम से क़दम मिलाकर चलता है, और उनका यह संगम कहीं दूर जाकर भी एक-दूसरे से अलग नहीं होता. इसी मुद्दे पर हरकारा डीप डाइव में पत्रकार सुमित झा से विस्तृत बातचीत हुई, जहां उन्होंने अपने रिपोर्टिंग अनुभव और सर्वे के निष्कर्षों के आधार पर कई अहम बातें रखीं.
बातचीत की शुरुआत में सुमित झा ने उस आम धारणा को चुनौती दी जिसमें कहा जाता है कि अगर समाज से जाति खत्म करनी है तो जाति जनगणना की जरूरत नहीं है. उन्होंने कहा कि यह सर्वे इस सोच को खारिज करता है, क्योंकि आंकड़े साफ दिखाते हैं कि जाति आज भी हर जगह मौजूद है, चाहे गांव में पानी पीने की व्यवस्था हो या शहर में रहने की स्थिति. उनके मुताबिक, तेलंगाना का 2024 का सर्वे स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े डोर-टू-डोर सर्वे में से एक है, जिसमें करीब 3.5 करोड़ लोगों और 242 जातियों को शामिल किया गया. जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी की अध्यक्षता में बने विशेषज्ञ समूह ने 42 मानकों पर पिछड़ेपन को मापा और पाया कि अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय सामान्य वर्ग की तुलना में तीन गुना अधिक पिछड़े हैं.
सुमित झा ने बातचीत में खास तौर पर स्वास्थ्य और क़र्ज़ के मुद्दे को रेखांकित किया. उन्होंने बताया कि सर्वे में सामने आया है कि अनुसूचित जाति के परिवार सामान्य वर्ग की तुलना में लगभग चार गुना ज़्यादा मेडिकल लोन लेते हैं. इसका कारण यह है कि इन समुदायों के लोग अधिकतर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जहां नौकरी की सुरक्षा या स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाएं नहीं होतीं. बीमारी की स्थिति में इन्हें पहले झोला-छाप डॉक्टरों के पास जाना पड़ता है, और जब हालत बिगड़ती है तो महंगे निजी अस्पतालों में क़र्ज़ लेकर इलाज कराना पड़ता है. यह क़र्ज़ भी अक्सर बैंक से नहीं बल्कि निजी मनीलेंडर्स से लिया जाता है, जिसे चुकाने के लिए कई बार मज़दूरी तक करनी पड़ती है.
बातचीत में उन्होंने यह भी बताया कि सरकारी योजनाओं का लाभ समान रूप से नहीं बंट रहा है. ज़मीन या संपत्ति आधारित योजनाओं का फायदा उन वर्गों को ज़्यादा मिल रहा है जिनके पास पहले से संसाधन हैं. उदाहरण के तौर पर, रायतू बंधु जैसी योजनाओं का पैसा बड़े ज़मीन मालिकों तक ज़्यादा पहुंचता है, जबकि सूखी ज़मीन वाले या छोटे किसान इससे वंचित रह जाते हैं. उन्होंने ज़मीन के असमान वितरण पर भी प्रकाश डाला, रेड्डी समुदाय, जिसकी आबादी कम है, उसके पास उपजाऊ ज़मीन का बड़ा हिस्सा है, जबकि आदिवासी समुदाय के पास ज़मीन होने के बावजूद वह खेती के लायक नहीं है.
शिक्षा और रोज़गार के संदर्भ में सुमित झा ने कहा कि अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चे अक्सर 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं, जिससे उनके लिए बेहतर नौकरियों के अवसर कम हो जाते हैं. इसके उलट, जो वर्ग बेहतर शिक्षा प्राप्त करता है, वह आईटी या संगठित क्षेत्र में जाकर स्वास्थ्य बीमा और स्थिर आय जैसी सुविधाएं हासिल कर लेता है. उन्होंने इसे एक “चक्र” बताया जिसमें एक वर्ग लगातार आगे बढ़ता जाता है और दूसरा पीछे छूटता जाता है.
बातचीत के दौरान माइग्रेशन के पैटर्न पर भी चर्चा हुई. सुमित झा ने बताया कि अपर कास्ट और अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति वाले वर्ग अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में पढ़ाई और आईटी नौकरियों के लिए जाते हैं, जबकि एससी/एसटी और कमज़ोर वर्गों के लोग खाड़ी देशों में मज़दूरी के लिए जाते हैं. इसी तरह मुस्लिम समुदाय के संदर्भ में उन्होंने कहा कि उनकी बड़ी आबादी शहरों में रहती है, लेकिन वहां भी वे अक्सर किराए के घरों में और सीमित संसाधनों के साथ जीवन बिताते हैं.
एक दिलचस्प और चौंकाने वाला तथ्य उन्होंने बाल विवाह को लेकर साझा किया. आम धारणा के विपरीत, सर्वे में पाया गया कि बाल विवाह के मामले ऊंची जातियों में अधिक हैं, जहां लगभग 22.5% मामलों में 18 साल से पहले विवाह हो जाता है. यह दिखाता है कि सामाजिक समस्याएं केवल गरीब या पिछड़े वर्गों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अलग-अलग रूपों में हर स्तर पर मौजूद हैं.
सुमित झा ने कहा कि सरकारी दावों और ज़मीनी सच्चाई में अंतर है. जहां सरकार 100% नल जल की बात करती है, वहीं सर्वे में पाया गया कि कई इलाकों में अब भी बड़ी संख्या में घरों तक पानी और शौचालय जैसी सुविधाएं नहीं पहुंची हैं, खासकर आदिवासी समुदायों तक.
अंत में उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि केवल जाति सर्वे कर लेना पर्याप्त नहीं है. जब तक उस डेटा को समझकर नीतियों में नहीं बदला जाएगा, तब तक वास्तविक बदलाव संभव नहीं है. सरकार को टारगेटेड पॉलिसी बनानी होगी, जो खासतौर पर उन समुदायों तक पहुंचे जो सबसे ज़्यादा वंचित है.
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.





