27/04/2026: बंगाल में प्लासी का युद्ध | दीदी के भाई को चिंता | झींगा वायरस | राघव चड्ढा के 20 लाख घटे | मुस्लिमों का पूर्ण बहिष्कार | पूरा समाज चड्ढा | तरबूज से मौतें | मोदी के भारत का गैंगस्टर आइकन
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
डीपडाइव विद श्रवण गर्ग: ममता की हार का मतलब देश के लिए क्या होगा?
तृणमूल के गढ़ भवानीपुर में ममता की जीत ‘निश्चित नहीं’, कहना ममता के भाई का
राघव चड्ढा ने इंस्टाग्राम पर 20 लाख फॉलोअर्स खोए; सात ‘आप’ बागी सदस्यों के विलय को सभापति की मंजूरी
बंगाल: मछली और झींगा भी मुद्दा; डेल्टा क्षेत्र के बड़े दांव वाले चुनाव में जीविका और वफादारी का असर
आकार पटेल | भाजपा मुस्लिमों का पूर्ण बहिष्कार चाहती है
लॉरेंस बिश्नोई: अपराध, शक्ति और ‘कर्म’ की नई राजनीतिक कथा
अजीत साही | मर्ज़ लाइलाज है, पूरा भारतीय समाज राघव चड्ढा है
राघव चड्ढा और बड़ी समस्या: नेता-केंद्रित दलों की संरचनात्मक कमजोरी
बिरयानी के बाद तरबूज खाया और फिर 4 मौतें: मुंबई में एक त्रासदी जो 12 घंटों के भीतर घटित हुई
ओडिशा में खनन विरोध पर सख्ती: दलित-आदिवासी प्रदर्शनकारियों को ज़मानत के बदले पुलिस थाने साफ करने की शर्त
| डीपडाइव विद श्रवण गर्ग
ममता की हार का मतलब देश के लिए क्या होगा?
पश्चिम बंगाल का 2026 का विधानसभा चुनाव अब सिर्फ एक राज्य की सत्ता का संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे देश की राजनीति और लोकतंत्र की दिशा तय करने वाला एक निर्णायक ‘कुरुक्षेत्र’ बन चुका है. ‘हरकारा डीप डाइव’ पर ऑडियो पॉडकास्ट में में, वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने इस चुनाव के उन अनछुए पहलुओं पर रोशनी डाली, जो इसे आज़ाद भारत के सबसे जटिल और अभूतपूर्व चुनावों में से एक बनाते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग इस चुनाव की तुलना ‘प्लासी के युद्ध’ से करते हैं. उनका मानना है कि बंगाल में जिस तरह से ‘मीर जाफरों’ और ‘जगत सेठों’ की तलाश की गई है, वह अभूतपूर्व है. ममता बनर्जी के खिलाफ इस बार भयंकर सत्ता विरोधी लहर है. 2021 के मुकाबले इस बार भाजपा ने हिंदू वोटों की नाराज़गी को और गहरा किया है, वहीं 30% वाले मुस्लिम वोट बैंक में भी दरार डालने की कोशिश की है.
क्या राहुल गांधी ममता को हराना चाहते हैं? इस चुनाव का सबसे दिलचस्प पहलू कांग्रेस और विशेषकर राहुल गांधी की भूमिका है. हुगली के श्रीरामपुर जैसी रैलियों में राहुल गांधी ने ममता और मोदी को एक ही सिक्के के दो पहलू बताकर सीधा प्रहार किया है.
लेकिन क्या राहुल सच में ममता को हराना चाहते हैं?
श्रवण गर्ग का विश्लेषण इससे अलग है. उनका मानना है कि राहुल गांधी बंगाल में एक ‘सेफ्टी वाल्व’ की तरह काम कर रहे हैं. कांग्रेस की रणनीतिक कोशिश यह है कि ममता से नाराज़ हिंदू या हुमायूं कबीर जैसे नेताओं से असंतुष्ट मुस्लिम वोटर, भाजपा के खेमे में या ‘नोटा’ में जाने के बजाय कांग्रेस को वोट दे. इसका मुख्य उद्देश्य भाजपा को सीधे ध्रुवीकरण के फायदे से रोकना है. यही कारण है कि तृणमूल कांग्रेस भी राहुल गांधी के तीखे हमलों पर कोई आक्रामक प्रतिक्रिया नहीं दे रही है.
संस्थागत प्रहार: जब चुनाव आयोग और एजेंसियां बनीं प्रतिद्वंद्वी चर्चा में इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई कि यह चुनाव ‘ममता बनाम भाजपा’ के बजाय ‘ममता बनाम व्यवस्था’ बन गया है. चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के तहत बंगाल में करीब 90 लाख से ज्यादा लोगों के नाम वोटर लिस्ट से काट दिए गए हैं, जिनमें बड़ी संख्या टीएमसी समर्थकों की मानी जा रही है. ईडी और सीबीआई जैसी एजेंसियों का लगातार दबाव और भवानीपुर जैसी जगहों पर वोटरों के नाम कटना यह दर्शाता है कि सत्ताधारी पार्टी को घेरने के लिए हर संभव ‘अनुचित’ कदम उठाए जा रहे हैं.
महिलाएं बनाम ‘वॉशिंग मशीन’ बंगाल की यह लड़ाई जेंडर के मोर्चे पर भी लड़ी जा रही है. एक तरफ ममता बनर्जी के नेतृत्व में महुआ मोइत्रा और सायोनी घोष जैसी जुझारू महिलाएं मोर्चे पर डटी हैं, तो दूसरी तरफ भाजपा के पास कोई बड़ा स्थानीय महिला चेहरा नहीं है. भाजपा का नेतृत्व मुख्य रूप से उन नेताओं के हाथ में है जो टीएमसी से निकलकर ‘वॉशिंग मशीन’ के जरिए भाजपा में आए हैं, जैसे सुवेंदु अधिकारी.
2029 की नींव और विपक्ष का भविष्य यह चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए ‘करो या मरो’ का सवाल है. 2024 के लोकसभा चुनाव में बंगाल में 12 सीटों पर सिमटने के बाद, भाजपा 2029 की राह आसान करने के लिए बंगाल फतह करना चाहती है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बन रहे दबावों और घरेलू राजनीति में विपक्ष को कमज़ोर करने के लिए बंगाल जीतना मोदी सरकार के लिए ऑक्सीजन जैसा है.
इस विशेष चर्चा का लब्बोलुआब यह है कि यदि ममता यह चक्रव्यूह भेदकर जीत जाती हैं, तो यह मोदी-शाह के अजेय होने के तिलिस्म को हमेशा के लिए तोड़ देगा. लेकिन अगर तमाम संस्थागत ताकतों के इस्तेमाल से भाजपा जीतती है, तो शायद देश में चुनाव लड़ने और जीतने की परिभाषा ही बदल जाएगी, जो विपक्ष-मुक्त भारत की दिशा में एक बड़ा और खतरनाक कदम हो सकता है.
तृणमूल के गढ़ भवानीपुर में ममता की जीत ‘निश्चित नहीं’, कहना ममता के भाई का
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दूसरे चरण के मतदान से ठीक पहले, राज्य की सबसे हॉट सीट भवानीपुर में सियासी पारा चरम पर है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के छोटे भाई कार्तिक बनर्जी ने इस बार चुनाव में ‘अनिश्चितता’ की बात स्वीकार की है. टेलीग्राफ के लिए अर्नब गांगुली की रिपोर्ट के अनुसार, कालीघाट रोड स्थित अपने कार्यालय में बैठे कार्तिक बनर्जी काफी थके हुए और तनाव में नजर आए. उन्होंने साफ कहा, “स्थिति अनिश्चित है.”
अनोखा पारिवारिक मोर्चा और कड़ी मेहनत
ममता बनर्जी के छह भाइयों में से एक, कार्तिक बनर्जी पिछले पांच महीनों से चुनावी तैयारियों में जुटे हैं. उनकी पत्नी काजरी बनर्जी वार्ड 73 से पार्षद हैं और उन पर मुख्यमंत्री को अपने वार्ड से बड़ी बढ़त दिलाने की भारी जिम्मेदारी है. कार्तिक बताते हैं कि वे पिछले कई महीनों से दिन में मुश्किल से चार घंटे सो पा रहे हैं. उनके कार्यालय में समर्थकों और कार्यकर्ताओं का तांता लगा रहता है. कार्तिक का कहना है कि वे कार्यकर्ताओं के साथ चौबीसों घंटे खड़े रहते हैं, क्योंकि अगर वे साथ नहीं रहेंगे, तो कार्यकर्ता उन पर भरोसा क्यों करेंगे. कार्तिक बनर्जी ने चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस को रैलियों और सभाओं के लिए पुलिस अनुमति मिलने में दिक्कत हो रही है, जबकि भाजपा को आसानी से अनुमति मिल रही है. उन्होंने कहा, “मैंने 1980 के बाद से चुनाव प्रक्रिया में ऐसी ज्यादती कभी नहीं देखी. हमारे हाथ काट दिए गए हैं (थुंतो जगन्नाथ कोरे रखेछे).” उन्होंने विपक्ष के नेता और भाजपा उम्मीदवार सुवेंदु अधिकारी पर निशाना साधते हुए उन्हें ‘बाहरी’ बताया और कहा कि वे भवानीपुर को उतना नहीं जानते जितना बनर्जी परिवार जानता है.
आंकड़ों का गणित और बढ़ती चिंता
भवानीपुर को तृणमूल का गढ़ माना जाता है, लेकिन हालिया आंकड़े पार्टी की चिंता बढ़ा रहे हैं. 2021 में ममता बनर्जी ने भवानीपुर उपचुनाव 58,835 वोटों के भारी अंतर से जीता था. हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव के रुझान कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं. भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले आठ नगर निगम वार्डों में से पांच (63, 70, 71, 72 और 74) में भाजपा को बढ़त मिली थी. टीएमसी की कुल बढ़त घटकर मात्र 8,297 रह गई थी. कार्तिक का मानना है कि लोकसभा चुनाव में हिंदी भाषी मतदाता ‘राम’ (भाजपा) की ओर झुक जाते हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव में वे ममता बनर्जी के साथ रहेंगे. उन्होंने अपनी चुनावी रणनीति के तहत हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी भाषी कार्यकर्ताओं और बंगाली बहुल इलाकों में बंगाली महिला कार्यकर्ताओं को तैनात किया है.
दूसरी ओर, भाजपा खेमे में जबरदस्त उत्साह है. दक्षिण कोलकाता के एक भाजपा नेता का कहना है कि वे भवानीपुर के उन इलाकों (जैसे शेक्सपियर सरणी और पार्क स्ट्रीट) में मतदान प्रतिशत बढ़ाने पर ध्यान दे रहे हैं, जहां आमतौर पर लोग वोट डालने कम निकलते हैं. भाजपा को उम्मीद है कि यदि इन इलाकों में वोटिंग बढ़ी, तो वे ममता बनर्जी को उनके अपने घर में हराकर बंगाल के चुनावी इतिहास का सबसे बड़ा उलटफेर कर सकते हैं.
ममता बनर्जी के लिए यह लड़ाई प्रतिष्ठा का सवाल है. 2021 में नंदीग्राम में सुवेंदु अधिकारी से हारने के बाद, वे भवानीपुर में किसी भी तरह की चूक बर्दाश्त नहीं कर सकतीं. कार्तिक बनर्जी को उम्मीद है कि भवानीपुर अपनी ‘बेटी’ के प्रति वफादार रहेगा और भाजपा की कोशिशें नाकाम होंगी.
बंगाल: मछली और झींगा भी मुद्दा; डेल्टा क्षेत्र के बड़े दांव वाले चुनाव में जीविका और वफादारी का असर
बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में ‘मछली’ मुख्य केंद्र बिंदु रही है. इसकी शुरुआत तब हुई जब तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा को एक ‘बोहिरागतो’ (बाहरी) शक्ति के रूप में प्रचारित किया जो शाकाहार थोप देगी, और देखते ही देखते यह अभियान उस समय और तेज हो गया जब नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी मछली उत्पादन के आंकड़ों को लेकर आमने-सामने आ गए.
‘द टेलीग्राफ’ में सौर्ज्य भौमिक के अनुसार, देश के शीर्ष मछली उत्पादक राज्य आंध्र प्रदेश और बंगाल से संबंधित भारत सरकार के आंकड़ों पर नजर डालते हैं, तो पता चलता है कि आंध्र प्रदेश का मछली उत्पादन आठ वर्षों (2014-15 से 2022-23) में लगभग 160 प्रतिशत बढ़ा, जो 70 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है. इसके विपरीत, बंगाल की वृद्धि बहुत धीमी रही—लगभग 26.5 प्रतिशत, जो राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे है.
आंध्र प्रदेश की तटरेखा काफी लंबी है. लेकिन यही पैटर्न ‘अंतर्देशीय मत्स्य पालन’ में भी दिखाई देता है, जहाँ आंध्र का उत्पादन तीन गुना हो गया, जबकि बंगाल में उसी अवधि के दौरान (जिसके लिए नवीनतम आंकड़े उपलब्ध हैं) केवल 29 प्रतिशत की मामूली वृद्धि देखी गई. 2022-23 तक, बंगाल का अंतर्देशीय मछली उत्पादन आंध्र प्रदेश के उत्पादन का लगभग 40 प्रतिशत ही रह गया था.
कोलकाता से बसंती हाईवे से कुछ किलोमीटर की दूरी पर बामनपुकुर क्षेत्र में स्थित 350 बीघे की ‘छोटकी भेरी’ है. मीनखान और मालंचा के ये इलाके कोलकाता के लोगों के बीच झींगा उत्पादन के लिए जाने जाते हैं. लेकिन अब इस ‘भेरी’ (मछली पालन का तालाब) में रुई, कतला और मिगेल मछलियां पाली जाती हैं. दोनों इलाके अब एक गंभीर पारिस्थितिक संकट से जूझ रहे हैं. स्थानीय मछुआरे अब झींगे को ‘वायरस’ कहने लगे हैं, क्योंकि उत्पादन शून्य के करीब पहुँच गया है. इसका मुख्य कारण ‘बनतला लेदर कॉम्प्लेक्स’ से निकलने वाला रासायनिक अपशिष्ट है. रसायनों के कारण विद्याधरी नदी का पानी काला और जहरीला हो गया है.
बढ़ते नुकसान और मुनाफे की जल्दबाजी में किसान रसायनों और हार्मोनों का उपयोग कर रहे हैं, जिससे बाजार में “मेडिसिन चिंगरी” (दवाई वाला झींगा) आ गया है. इस प्रदूषण और घटते उत्पादन ने स्थानीय लोगों को तमिलनाडु जैसे राज्यों में पलायन करने पर मजबूर कर दिया है, जिससे गाँव खाली हो रहे हैं.
मीनखां (एससी आरक्षित सीट) में राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं. यहाँ ‘इंडियन सेकुलर फ्रंट’ (आईएसएफ) के प्रतीक मंडल (पूर्व आईएसएल रेफरी) टीएमसी की मौजूदा विधायक उषारानी मंडल को कड़ी टक्कर दे रहे हैं. हालांकि आईएसएफ को अक्सर मुस्लिम पार्टी माना जाता है, लेकिन प्रतीक मंडल की हिन्दू छवि और उनकी बढ़ती लोकप्रियता ने टीएमसी के लिए खतरा पैदा कर दिया है.
इलाके में ऐसी चर्चाएं भी हैं कि उषारानी मंडल के संबंध भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी से हैं, जिससे यह अटकलें तेज हैं कि परिणाम करीबी होने पर वे पाला बदल सकती हैं. वहीं, पड़ोसी क्षेत्र भांगड़ में नौशाद सिद्दीकी की मजबूती आईएसएफ के पक्ष में माहौल बना रही है.
संदेशखाली, जो 2024 में शेख शाहजहां और यौन शोषण के आरोपों के कारण चर्चा में आया था, अब भारी सैन्य नियंत्रण में है. केंद्रीय बलों की मौजूदगी ने स्थानीय व्यापार में तो तेजी लाई है, लेकिन लोगों के मन में तनाव बरकरार है.
भाजपा ने संदेशखाली आंदोलन का चेहरा रहीं रेखा पात्रा को पड़ोसी सीट हिंगलगंज से मैदान में उतारा है. प्रधानमंत्री मोदी इसे महिला सुरक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के रूप में पेश कर रहे हैं.
संदेशखाली के ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी गहरे मतभेद हैं. टीएमसी समर्थक इन आरोपों को राजनीतिक साजिश मानते हैं, जबकि अन्य शाहजहां के आतंक से मुक्ति को राहत के रूप में देखते हैं.
यह दर्शाता है कि बंगाल का डेल्टा क्षेत्र आज पर्यावरणीय विनाश, आर्थिक पलायन और राजनीतिक ध्रुवीकरण के चौराहे पर खड़ा है. मछली उत्पादन में गिरावट और प्रदूषण ने जहाँ लोगों की आजीविका छीनी है, वहीं संदेशखाली जैसी घटनाओं ने सुरक्षा और न्याय के प्रश्न को चुनावी विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है.
राघव चड्ढा ने इंस्टाग्राम पर 20 लाख फॉलोअर्स खोए; सात ‘आप’ बागी सदस्यों के विलय को सभापति की मंजूरी
‘हिंदुस्तान टाइम्स ’ के अनुसार, राज्यसभा सदस्य राघव चड्ढा ने आम आदमी पार्टी (आप) से नाता तोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद इंस्टाग्राम पर अपने लगभग 20 लाख फॉलोअर्स खो दिए हैं. शुक्रवार को जब घोषणा हुई थी, तब चड्ढा के लगभग 14.6 मिलियन (1.46 करोड़) फॉलोअर्स थे, लेकिन रविवार तक यह संख्या घटकर 12.7 मिलियन (1.27 करोड़) रह गई. चड्ढा, जिन्हें कभी अरविंद केजरीवाल का बेहद करीबी (ब्लू-आईड बॉय) माना जाता था, ने अपनी इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर एक रैंडम स्टोरी भी रीपोस्ट की, जिसमें दावा किया गया था कि यदि सामूहिक रूप से गिना जाए, तो ‘आप’ के शीर्ष नेता भी उनके फॉलोअर्स की संख्या की बराबरी नहीं कर सकते.
भले ही राज्यसभा सदस्य राघव चड्ढा ने ‘आप’ के खिलाफ इस बगावत का नेतृत्व किया हो, लेकिन संदीप पाठक के बाहर निकलने ने पंजाब के पार्टी नेताओं को सबसे ज्यादा हैरान कर दिया है. आईआईटी दिल्ली के एसोसिएट प्रोफेसर से राजनेता बने पाठक एक लो-प्रोफाइल रणनीतिकार रहे हैं, जिन्होंने 2022 के विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी के अभियान का खाका तैयार किया था और बूथ स्तर की योजना और प्रबंधन की निगरानी की थी.
मूसेवाला का गाना ‘स्केपगोट’ फिर चर्चा में
पंजाब के ‘आप’ राज्यसभा सदस्यों द्वारा भाजपा के प्रति अपनी निष्ठा बदलने के बाद, दिवंगत पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला का गाना “स्केपगोट” सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा किया जा रहा है. 2022 में रिलीज हुआ यह गाना पंजाब से राज्यसभा के लिए ‘आप’ के नामांकन की आलोचना करता है और राघव चड्ढा और संदीप पाठक जैसे नेताओं को राज्य के लिए “बाहरी” बताते हुए उन पर निशाना साधता है. यह गाना उस समय रिलीज किया गया था जब ‘आप’ ने पंजाब से अपने राज्यसभा उम्मीदवारों की घोषणा की थी. हालिया दलबदल के बाद, लोग गाने के बोल और वर्तमान स्थिति के बीच समानताएं देख रहे हैं, जिससे यह गाना स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया पर फिर से छा गया है.
इधर, सोमवार को राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन द्वारा आम आदमी पार्टी (आप) के सात सदस्यों के भाजपा में आधिकारिक विलय को स्वीकार करने के बाद, संसद के उच्च सदन में भाजपा की स्थिति और मजबूत हो गई है.
‘एजेंसियों’ के मुताबिक, पार्टी के पास अब 113 सदस्य हैं, जो 245 सदस्यीय राज्यसभा में साधारण बहुमत से केवल 10 कम है. उच्च सदन में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए (एनडीए) के पास अब लगभग 140 सीटें हैं. आम आदमी पार्टी के पास अब केवल तीन सदस्य बचे हैं. राघव चड्ढा, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, संदीप पाठक, विक्रमजीत साहनी, स्वाति मालीवाल और राजिंदर गुप्ता वे सात सांसद हैं जिनका भाजपा में विलय हुआ है. सोमवार को राज्यसभा की वेबसाइट पर इन सातों सांसदों के नाम भाजपा सदस्यों की सूची में दिखाई दिए. राज्यसभा में पंजाब का प्रतिनिधित्व करने वाले कुल सात सांसदों में से छह अब भाजपा के साथ हैं और केवल एक ‘आप’ के पास बचा है.
इससे पहले रविवार को आम आदमी पार्टी ने इस विलय को “असंवैधानिक” करार दिया था और कहा था कि उन्होंने राज्यसभा सभापति के समक्ष पाला बदलने वाले इन सात सदस्यों की सदस्यता रद्द करने की याचिका दायर की है. ‘आप’ सांसद संजय सिंह ने कहा था कि उन्होंने इन सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग करते हुए सभापति को याचिका सौंपी है. संजय सिंह ने आज सोमवार को कहा कि आम आदमी पार्टी सभापति के फैसले के खिलाफ अब कोर्ट में जाएगी, क्योंकि संविधान की 10वीं के तहत सातों सांसदों को अयोग्य नहीं ठहराया गया है.
आकार पटेल | भाजपा मुस्लिमों का पूर्ण बहिष्कार चाहती है
इस महीने इस शीर्षक के तहत एक ख़बर आई: ‘भाजपा की बंगाल सूची में किसी भी मुस्लिम नाम को जगह नहीं मिली’. इस ख़बर में आगे पाठकों को आँकड़े दिए गए—यानी, कितने टिकट बाँटे गए वग़ैरह—लेकिन उस शीर्षक के परे, जोड़ने के लिए बहुत कुछ नहीं है. यह हम में से ज़्यादातर लोगों को हैरान नहीं करता है, क्योंकि 2014 से आए आँकड़ों ने हमें सिखा दिया है कि भाजपा क्या चाहती है. पिछली तीन लोक सभाओं में, भारतीय जनता पार्टी ने 282, 303 और 240 सीटें जीती हैं, जिनमें कोई भी मुस्लिम नहीं है. राज्य सभा में इसके 100 से अधिक सांसद हैं जिनमें कोई मुस्लिम प्रतिनिधित्व नहीं है.
लगभग एक दशक पहले, यह ख़बर आई थी कि पूरे भारत में इसके एक हज़ार से अधिक विधायक थे, जिनमें से सिर्फ़ एक मुस्लिम था. केंद्रीय मंत्रिमंडल में कोई भी मुस्लिम मंत्री नहीं है—ऐसा हम 1947 के बाद पहली बार देख रहे हैं. फिर से, यह हमें हैरान नहीं करता है क्योंकि, अगर भाजपा के बारे में किसी एक चीज़ की तारीफ़ की जानी चाहिए, तो वह उसकी ईमानदारी है.
पार्टी, ख़ासकर प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले अपने मौजूदा स्वरूप में, इस तथ्य के बारे में स्पष्ट है कि वह भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक वर्ग का पूर्ण बहिष्कार चाहती है, जिसके ख़िलाफ़ वह ऐतिहासिक नाराज़गी रखती है. हमें इस भावना के गुण-दोषों में जाने की ज़रूरत नहीं है, सिवाय यह स्वीकार करने के कि पार्टी और उसके कई समर्थक ऐसा ही महसूस करते हैं. विचार करने वाला मुद्दा कुछ और है: जब भाजपा—और विशेष रूप से प्रधानमंत्री—इस बहिष्कार को बढ़ावा देने को लेकर इतने स्पष्ट हैं, तो फिर हम ‘सबका साथ, सबका विश्वास’ जैसे नारे और ‘140 करोड़ भारतीयों’ के संदर्भ क्यों सुनते हैं? पार्टी और इसके नेता उतने ही ईमानदार हो सकते हैं और ऐसे नारे गढ़ सकते हैं जो उनके व्यवहार की तरह ही बहिष्कार वाले हों, लेकिन वे ऐसा नहीं करते हैं. क्यों? इसका जवाब देने के दो तरीक़े हैं, और पहला वाला कम पेचीदा है. ये नारे उन लोगों को शांत करने के लिए गढ़े और दोहराए जाते हैं जो ऐसे मुद्दों को लेकर चिंतित रहते हैं. इनके बहुत मायने नहीं हैं क्योंकि बहिष्कार की वास्तविकता व्यवहार में स्पष्ट है. यह जवाब ख़ास तौर पर संतोषजनक नहीं है, क्योंकि यह इस बात को संबोधित नहीं करता कि भाजपा को अपनी कार्यप्रणाली की पारदर्शिता को देखते हुए, आख़िर ऐसा करने की ज़रूरत ही क्यों है. यह इस तथ्य का भी हिसाब नहीं देता है कि, मुसलमानों के बहिष्कार और उत्पीड़न के बारे में पूरी तरह से मुखर और बेझिझक होकर, प्रधानमंत्री ने ऐसे कई लोगों का दिल जीत लिया है जो इस तरह का व्यवहार और इस तरह का समाज चाहते हैं.
पार्टी और प्रधानमंत्री के इस विरोधाभास में मजबूर होने की असली वजह यह है कि पूर्ण बहिष्कार की उनकी इच्छा भारतीय समाज और संस्कृति के अनुकूल नहीं बैठती है. अपने घोषणापत्र में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसे वाक्यांशों का आह्वान कौन करता है? यह विपक्ष या बुद्धिजीवी वर्ग नहीं है— यह भाजपा है. पार्टी अपना संदेश पेश करते समय भारतीय ज्ञान का सहारा लेती है, भले ही वह किसी और चीज़ को बढ़ावा दे रही हो. बेशक, भाजपा के अधिक स्पष्ट एजेंडे के लिए एक समर्थक वर्ग मौजूद है, लेकिन यह उसके कुल मतदाता आधार से छोटा है. यही कारण है कि ‘विकास’ पार्टी के मंच का एक इतना बड़ा हिस्सा है, या कम से कम हुआ करता था. कठोर तत्वों को औपचारिक घोषणाओं में छिपाया जाना चाहिए, ख़ासकर जब व्यापक दुनिया के साथ जुड़ रहे हों. हमारे बेचारे राजनयिकों को इस दुविधा से जूझना पड़ता है कि स्वदेश में बर्बरतापूर्वक काम करें और विदेश में उदार होने का दिखावा करें.
अमेरिका की अपनी एक यात्रा पर, विदेश मंत्री जयशंकर का डोनाल्ड ट्रंप के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, जनरल एच.आर. मैकमास्टर के साथ एक साक्षात्कार हुआ था. जनरल, जो भारत से परिचित हैं और यहाँ का दौरा भी कर चुके हैं, ने पूछा: ‘मैं आपसे यह पूछना चाहता था कि आप अपने देश में हो रहे राजनीतिक घटनाक्रमों को कैसे देखते हैं. आप कोई पक्षपाती व्यक्ति नहीं हैं. आपने कई प्रशासनों में बड़ी विशिष्टता के साथ काम किया है. महामारी के बीच, इनमें से कुछ हिंदुत्ववादी नीतियों को लेकर चिंता है जो भारतीय लोकतंत्र की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति को कमज़ोर कर सकती हैं... क्या भारत के मित्रों का इन हालिया रुझानों में से कुछ को लेकर चिंतित होना सही है?’ जयशंकर ने सीधे तौर पर सवाल का जवाब देने से परहेज़ किया और इसके बजाय राशन वितरण और नक़द हस्तांतरण के बारे में बात की. उन्होंने मैकमास्टर द्वारा उठाई गई हिंदुत्ववादी नीतियों से जुड़ी विशिष्ट चिंताओं का समाधान नहीं किया. ये चिंताएँ क्या हैं? इनमें नागरिकता में धर्म को शामिल करना; मुस्लिम विवाह और तलाक़ के पहलुओं को अपराध की श्रेणी में डालने वाले नए क़ानून; गोमांस रखने को अपराध घोषित करने वाले क़ानून; गुजरात में मुसलमानों को ज़बरदस्ती अलग-थलग बस्तियों में सीमित करना; भारत के केवल एक हिस्से — कश्मीर — में भीड़ पर शॉटगन का इस्तेमाल; और सरकार द्वारा मुसलमानों को खलनायक के रूप में पेश करना शामिल है, जिसमें कोविड फैलाने का आरोप भी शामिल है. ये वे मुद्दे हैं जिन्हें लेकर भारत के मित्र चिंतित थे. जयशंकर ने एक बार भी ‘हिंदुत्व’ शब्द का इस्तेमाल किए बिना और उन क़ानूनों का ज़िक्र किए बिना जवाब दिया, जिनके लिए भारत को अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना करना पड़ा है.
बेशक, उनके द्वारा इस बहस से बचने की वजह यह है कि इसके बचाव में कहने के लिए बहुत कम है. इस आरोप—जिसे आलोचक वैध मानते हैं—कि भारत ऐसी नीतियों के ज़रिए ख़ुद को और अपने लोगों को नुक़सान पहुँचा रहा है, का जवाब देने का एकमात्र तरीक़ा बातों को घुमाना और टालमटोल करना ही था. इससे उन लोगों को कुछ उम्मीद मिलनी चाहिए, भले ही वह महज़ एक किरण ही क्यों न हो, जो हमारे समाज के बारे में चिंता करते हैं—कि यह कहाँ आ गया है और किधर जा रहा है. यदि धर्म के आधार पर बँटवारे को बढ़ावा देने वालों को भी चुनौती दिए जाने पर खुले तौर पर अपने रुख़ का बचाव करना असहज लगता है, तो यह दर्शाता है कि अंततः हम ऐसा नहीं बनना चाहते, और न ही हम वास्तव में ऐसे हैं.
आकार पटेल भारतीय लेखक, स्तंभकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं
अजीत साही | मर्ज़ लाइलाज, पूरा भारतीय समाज राघव चड्ढा है
राघव चड्ढा बीजेपी में शामिल हो गया है. मुझे पंद्रह साल पहले का एक वाकया याद आ रहा है.
2011 में अन्ना हज़ारे ने जंतर मंतर पर अनशन शुरु किया. देश को लगा भ्रष्टाचार अब जल्द ख़त्म हो जाएगा. हज़ारों की भीड़ जमा हो गई. क्रांति को नाम मिला ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’. नामी गिरामी एक्टिविस्ट, वकील, बाबा, पत्रकार, एक्टर, कॉमेडियन, आर्टिस्ट और न जाने कौन कौन उसमें शामिल हो गए. मेरी एक मुंहबोली बहन भी उनमें थीं. मैं ख़ुद तो वहाँ कभी नहीं गया.
उस दौर में अक्सर बहन के घर मुलाक़ात होती थी. एक दिन उन्होंने मुझे कहा, “अन्ना गांधी हैं और अरविंद नेहरू हैं.”
कुछ हफ़्तों बाद आग्रह कर के वो अपनी गाड़ी में मुझे महाराष्ट्र भवन ले गईं. वहाँ एक कमरे में उन्होंने मुझे अन्ना हज़ारे से मिलवाया. उन्होंने अन्ना हज़ारे से मेरे बारे में अच्छी अच्छी बातें कीं. मैं चुप बैठा रहा. फिर अन्ना करवट पलट कर सो गए और हम कमरे से बाहर आ गए.
एक दिन मैंने बहन से धीरे से कहा: “मैं आपको एक सुझाव देना चाहता हूँ. आप इस मूवमेंट में अपनी जगह पुख़्ता कर लें. कल ये एक पार्टी बनेगा. आप सेटिंग करके चांदनी चौक से लोकसभा चुनाव का टिकट लें. आपको मुसलमान और हिंदू दोनों वोट देंगे. बस बीजेपी से समझौता करना होगा वो अपना उम्मीदवार न खड़ा करें.”
बहन को मेरी बात नागवार गुज़री. बोलीं, “मुझे अफ़सोस है कि आप इतने सिनिकल हैं. अन्ना और अरविंद पार्टी बनाने की सोच भी नहीं सकते हैं. हम इंडिया बदलने निकले हैं. आपकी सोच बहुत छोटी है. आप इस माइंडसेट से बाहर निकलिए. ये एक दूसरी आज़ादी है. वी आर मेकिंग हिस्ट्री.”
ये सुनकर मुझे बरबस बचपन और जवानी का ख़याल आ गया.
मैं ग्यारह साल का था जब इमरजेंसी ख़त्म हुई थी. कुछ महीनों पहले ही मेरे पिता का देहांत हुआ था तो हम इलाहाबाद के रानीमंडी में अपने ननिहाल रहने आ गया थे. 1977 में जब इंदिरा गाँधी चुनाव हारीं और जनता पार्टी चुनवा जीती तो पूरे मुहल्ले में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. मैं भी इस ख़ुशी में दीवाना हो गया. ढाई साल बाद 1980 में जनता पार्टी की सरकार गिरी और इंदिरा गाँधी चुनाव जीत गईं. पूरे मुहल्ले में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. मैं भी इस ख़ुशी में शामिल हो गया.
फिर 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या हो गई. दो महीने बाद लोकसभा चुनाव हुआ. इलाहाबाद से अमिताभ बच्चन ने चुनाव लड़ा. मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ता था. सिविल लाइंस जाकर मैंने खादी का नया कुर्ता पैजामा ख़रीदा और अमिताभ बच्चन की कैंपेनिंग में लग गया.
चुनाव से चौबीस घंटे पहले एक जीप में छंटे हुए कांग्रेसी गुंडों के साथ मुझे गांवों की ओर भेज दिया गया. मैंने वहाँ बूथ मैनेजमेंट का पावन अनुभव किया.
आधी रात खेतों के बीच घुप अंधेरे में कच्ची सड़क पर दो जीपें आमने सामने रुकीं. मैं अपनी जीप में बैठा रहा. मेरी जीप के गुंडे और दूसरी जीप के गुंडे जीपों की हेडलाइट में गुटखा खाते बातें करते रहे. फिर दूसरी जीप पर से विपक्षी पार्टी का झंडा उतर गया. आवाज़ लगा कर मुझे कांग्रेस का झंडा लाने को कहा गया. उसे दूसरी जीप पर लगा दिया गया. फिर दोनों जीपें अपने अपने अपने रस्ते निकल लीं.
राजीव गाँधी ने बंपर जीत हासिल की. अमिताभ बच्चन ने भी. तब तक मेरा परिवार ननिहाल छोड़ कर सरकारी अफ़सरों के मुहल्ले में रहने लगा था. इस मुहल्ले में भी ख़ुशी की लहर दौड़ गई. मैं भी इस ख़ुशी में शामिल हो गया.
फिर 1989 आया. अब मैं दिल्ली के ‘इंडियन एक्सप्रेस’ अख़बार में रिपोर्टर की नौकरी कर रहा था. देश जान गया था कि राजीव गाँधी भ्रष्ट है. देश ये भी जान गया था कि वी पी सिंह देवता है. राजीव गाँधी हार गया. वी पी सिंह जीत गया. जिस मुहल्ले में मैं रहता था वहाँ भी ख़ुशी की लहर दौड़ गई.
ख़ैर.
जैसा कि मैंने अपनी मुंहबोली बहन से कहा था, ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ से पार्टी निकली. उस मकाम पर केजरीवाल ने अन्ना हज़ारे को थैंक्यू बोल दिया. मेरी बहन गाँधी को छोड़ कर नेहरू के साथ चली गईं. तमाम और लोगों ने भी यही मुश्किल फ़ैसला लिया.
उस दौर में पार्टी के एक दूसरे भारी नेता थे. मैं उनकी तब भी और आज भी इज़्जत करता हूँ. उन्होने मुझे घर बुलाया. केजरीवाल भी थे. दोनों बोले हम पार्टी शुरू कर रहे हैं और एक खोजी पत्रकारिता की वेबसाइट बना रहे हैं. तुम हमारे साथ आ कर उसे चलाओ. विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़ कर मैंने बताया मैं इस नेक काम के काबिल नहीं हूँ. बाद में नेहरू ने उन दूसरे नेता को भी पार्टी से निकाल दिया.
मेरी बहन ने भी वक़्त आने पर नेहरू को छोड़ दिया. आज वो पार्टीगत राजनीति की माननीय सदस्या हैं. मेरी मनोकामना है कि देर से ही सही, उनको संसद की सदस्यता मिलनी चाहिए. और ऐसा क्यों न हो?
अगर आप सोच रहे हैं कि इस कहानी का कोई क्लाइमेक्स है तो मैं माफ़ी चाहता हूँ, इस कहानी का कोई क्लाइमेक्स नहीं है. भारतीय समाज जिस रुआब से अपनी पीठ थपथपाता है दरअसल वो भीतर से उतना ही खोखला और लचर है. हम उस मरीज़ की तरह हैं जो दुनिया से जानलेवा मर्ज़ छुपा कर सोचता है कि कोई मर्ज़ है ही नहीं.
लेकिन दुनिया जानती है कि मर्ज़ लाइलाज है. पूरा भारतीय समाज राघव चड्ढा है.
वी.वी.पी. शर्मा | राघव चड्ढा और बड़ी समस्या: नेता-केंद्रित दलों की संरचनात्मक कमजोरी
आम आदमी पार्टी से राघव चड्ढा का बाहर निकलना महज एक सामान्य राजनीतिक उथल-पुथल नहीं है; यह उन कई व्यक्तित्व-आधारित पार्टियों की एक साझा संरचनात्मक कमजोरी को उजागर करता है—जो तेजी से, करिश्मा-प्रेरित लामबंदी को टिकाऊ संगठन में बदलने की कठिनाई से जुड़ी है. अरविंद केजरीवाल के इर्द-गिर्द बनी ‘आप’, एक शक्तिशाली भ्रष्टाचार विरोधी विमर्श और कड़ाई से केंद्रीकृत नेतृत्व के दम पर उभरी. यह मॉडल उत्थान के चरण में गति और स्पष्टता तो देता है, लेकिन एक बार जब पार्टी ‘आंदोलन’ से ‘शासन’ में परिवर्तित होती है, तो गहरी संस्थागत व्यवस्थाओं की कमी दिखाई देने लगती है. ऐसे सिस्टम में विशिष्ट नेताओं का बाहर निकलना, गुटीय तनाव और आंतरिक अनिश्चितता कोई विसंगतियां नहीं हैं; वे अनुमानित परिणाम हैं.
वेबर, हंटिंगटन और राजनीतिक स्थिरता की समस्या
मौजूदा गतिशीलता को मैक्स वेबर और सैमुअल पी. हंटिंगटन के संयुक्त दृष्टिकोण से सबसे बेहतर समझा जा सकता है. वेबर का मुख्य विचार यह है कि करिश्माई सत्ता—जो व्यक्तिगत अपील और भावनात्मक वैधता में निहित होती है—राजनीतिक रूप से परिवर्तनकारी तो है, लेकिन स्वाभाविक रूप से अस्थिर होती है. यह अपने आप को स्वतः पुनरुत्पादित नहीं कर सकती; निरंतरता के लिए इसे नियमबद्ध संरचनाओं—नियमों, पदानुक्रमों और प्रक्रियाओं में ढालना आवश्यक है, जो व्यक्तियों से परे टिक सकें. हंटिंगटन इसके पूरक के रूप में तर्क देते हैं कि राजनीतिक स्थिरता संस्थागतकरण पर निर्भर करती है: संगठनों को बढ़ती भागीदारी और महत्वाकांक्षा को संभालने के लिए पर्याप्त तेजी से सुसंगतता, जटिलता, अनुकूलनशीलता और स्वायत्तता विकसित करनी चाहिए. जब लामबंदी संस्थागत क्षमता से आगे निकल जाती है, तो राजनीतिक पतन शुरू हो जाता है. पार्टियां चुनाव जीत सकती हैं, फिर भी संरचनात्मक रूप से नाजुक बनी रहती हैं.
पहला चरण: करिश्माई आंदोलन
अधिकांश राजनीतिक दल करिश्माई आंदोलनों के रूप में शुरू होते हैं जहाँ नेता और संगठन वस्तुतः एक-दूसरे से अभिन्न होते हैं. अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली शुरुआती ‘आप’ इसका उदाहरण है, जैसा कि तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के माध्यम से के. चंद्रशेखर राव के नेतृत्व वाली तेलंगाना लामबंदी थी. एन. टी. रामा राव के नेतृत्व में तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) का उदय भी इसी तरह के पथ पर चला, जो करिश्मे और प्रतीकात्मक अपील से प्रेरित था. ऐसे आंदोलन तेजी से और नाटकीय सफलता हासिल कर सकते हैं, लेकिन वे संरचनात्मक रूप से नाजुक बने रहते हैं क्योंकि सांगठनिक गहराई कम होती है और उत्तराधिकार तंत्र का अभाव होता है.
दूसरा चरण: गहरे संगठन के बिना चुनावी गठबंधन
कुछ पार्टियां शुद्ध करिश्मे से आगे बढ़कर स्थिर चुनावी आधार बनाती हैं, जो अक्सर जाति या क्षेत्रीय पहचान पर आधारित होते हैं, फिर भी मजबूत संस्थागत ढांचे विकसित करने में विफल रहती हैं. मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी और लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनता दल इस मॉडल को दर्शाते हैं. उनके सामाजिक गठबंधन लचीलापन प्रदान करते हैं, लेकिन सत्ता नेतृत्वकारी परिवारों के भीतर केंद्रित रहती है, जिससे उत्तराधिकार स्वाभाविक रूप से विवादित हो जाता है. नीतीश कुमार के तहत जनता दल (यूनाइटेड) और नवीन पटनायक के तहत बीजू जनता दल भी इसी तरह के पैटर्न दिखाते हैं: चुनावी स्थिरता और शासन की विश्वसनीयता व्यक्तिगत नेतृत्व पर गहरी निर्भरता के साथ सह-अस्तित्व में रहती है.
तीसरा चरण: हाइब्रिड पार्टियां और आंशिक संस्थागतकरण की सीमाएं
एक अधिक उन्नत चरण तब उभरता है जब पार्टियां कैडर, सांगठनिक नेटवर्क और शासन का अनुभव विकसित कर लेती हैं, फिर भी असुरक्षित रहती हैं, क्योंकि उत्तराधिकार संस्थागत नहीं होता. बाल ठाकरे के तहत शिवसेना ने एक उच्च अनुशासित कैडर आधार बनाया, विशेष रूप से मुंबई में, और महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रभाव डाला. फिर भी सत्ता गहराई से व्यक्तिगत बनी रही. बाल ठाकरे के बाद, नेतृत्व उद्धव ठाकरे के पास गया, लेकिन वैधता पर प्रतिस्पर्धी दावों के कारण विभाजन हुआ, जो यह दर्शाता है कि मजबूत कैडर संरचना भी कमजोर संस्थागत उत्तराधिकार की भरपाई नहीं कर सकती.
शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) एक अन्य ‘हाइब्रिड’ रूप को दर्शाती है, जो विशिष्ट सौदेबाजी की शक्ति और गठबंधन के लचीलेपन को मजबूत नेतृत्व केंद्रीयता के साथ जोड़ती है. हालांकि, बार-बार होने वाले गुटीय तनाव और पारिवारिक समीकरण इस मॉडल की सीमाओं को प्रकट करते हैं. देवेगौड़ा परिवार के नेतृत्व में जनता दल (सेक्युलर) विस्तार के बिना निरंतरता का प्रतिनिधित्व करता है—गहरे संस्थागतकरण के बिना सांगठनिक अस्तित्व.
एआईएडीएमके: करिश्मा, केंद्रीकरण और उत्तराधिकार की विफलता
अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) का पथ सबसे स्पष्ट उदाहरणों में से एक है कि कैसे करिश्मा दशकों तक एक पार्टी को बनाए रख सकता है, लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता हासिल करने में विफल रहता है. एम. जी. रामचंद्रन द्वारा स्थापित, पार्टी ने फिल्मी लोकप्रियता और कल्याणकारी छवि में निहित असाधारण व्यक्तिगत अपील का लाभ उठाया. यह निरंतर चुनावी सफलता और सांगठनिक उपस्थिति में तब्दील हुआ.
एमजीआर की मृत्यु के बाद, जे. जयललिता ने सत्ता का पुनर्निर्माण और केंद्रीकरण किया, और एक नए व्यक्तित्व-संचालित मॉडल के माध्यम से पार्टी को स्थिर किया. करिश्मे को पूरी तरह से व्यक्तिगत रहित संस्थागत नियमों में बदलने के बजाय, पार्टी ने एक नए नेता में सत्ता को फिर से स्थापित किया. इसने अल्पकालिक निरंतरता तो सुनिश्चित की लेकिन केंद्रीकृत नेतृत्व पर दीर्घकालिक निर्भरता को गहरा कर दिया. जयललिता के निधन के बाद, संस्थागत उत्तराधिकार तंत्र की अनुपस्थिति के कारण गुटीय संघर्ष और सांगठनिक तनाव पैदा हुआ. एआईएडीएमके प्रदर्शित करती है कि यदि सत्ता व्यक्तिगत बनी रहती है, तो केवल चुनावी सफलता और कैडर की ताकत स्थिरता की गारंटी नहीं दे सकती.
तेलंगाना मामला: सफलता के बाद तनाव
तेलंगाना राष्ट्र समिति (बाद में भारत राष्ट्र समिति) का विकास एक अलग लेकिन संबंधित चुनौती को उजागर करता है: अपने संस्थापक उद्देश्य को प्राप्त करने के बाद पार्टी को बनाए रखना. के. चंद्रशेखर राव के नेतृत्व में, पार्टी ने तेलंगाना राज्य के दर्जे के लिए एक सफल आंदोलन का नेतृत्व किया और शुरुआती चुनावों में दबदबा बनाया. हालाँकि, एक बार मुख्य लक्ष्य प्राप्त हो जाने के बाद, एकीकृत वैचारिक शक्ति कमजोर हो गई. परिवार-केंद्रित नेतृत्व पर बढ़ती निर्भरता और व्यापक संस्थागतकरण के अभाव ने आंतरिक कमजोरियों को उजागर कर दिया. यह ‘आंदोलन के बाद की थकान’ का मामला है, जहाँ लामबंदी में सफल होने वाला करिश्मा पूरी तरह से टिकाऊ संगठन में तब्दील नहीं हो पाता है.
पूर्णतः संस्थागत पार्टियां
सीढ़ी के शीर्ष पर वे पार्टियां हैं जिन्होंने करिश्मे को संस्थागत ताकत में सफलतापूर्वक परिवर्तित कर दिया है. भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ अपने एकीकरण के माध्यम से इसका उदाहरण पेश करती है, जो वैचारिक निरंतरता और कैडर की निरंतर आपूर्ति प्रदान करता है. नेतृत्व परिवर्तन सांगठनिक अस्तित्व के लिए खतरा नहीं बनते क्योंकि सत्ता संरचना में निहित है.
द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) एक अन्य टिकाऊ मॉडल का प्रतिनिधित्व करती है. एम. करुणानिधि से लेकर एम. के. स्टालिन तक, पार्टी ने नेतृत्व को एक व्यापक वैचारिक और सांगठनिक ढांचे के भीतर स्थापित करके निरंतरता बनाए रखी है, जिससे व्यक्तियों से परे स्थिरता सुनिश्चित हुई है.
संगठन के बिना नेतृत्व: चंद्रशेखर का उदाहरण
प्रधानमंत्री के रूप में चंद्रशेखर का संक्षिप्त कार्यकाल सांगठनिक गहराई के बिना नेतृत्व के चरम मामले को दर्शाता है. उनकी सरकार एक मजबूत पार्टी ढांचे के बजाय नाजुक संसदीय गठजोड़ पर निर्भर थी और दबाव में जल्दी ही गिर गई. यह हंटिंगटन के मूल विचार को पुष्ट करता है: विशिष्ट समन्वय संस्थागत ताकत का विकल्प नहीं हो सकता.
‘आप’ और विशिष्ट वर्ग के निकास का तर्क
इस ढांचे के भीतर, ‘आप’ आंदोलन और संस्थान के बीच एक संक्रमणकालीन स्थिति में है. इसने चुनावी विस्तार तो किया है, लेकिन अभी तक सत्ता या आंतरिक उन्नति के रास्तों को पूरी तरह से संस्थागत नहीं किया है. ऐसी प्रणालियों में, राजनीतिक करियर अनुमानित सांगठनिक नियमों के बजाय नेतृत्व के साथ निकटता पर बहुत अधिक निर्भर करते हैं. यह महत्वाकांक्षी नेताओं के लिए अधिक स्थिर अवसर आने पर बाहर निकलने के प्रोत्साहन पैदा करता है. इसलिए, राघव चड्ढा का जाना किसी अलग विकल्प के बजाय संरचनात्मक परिस्थितियों को दर्शाता है.
निष्कर्ष: भारतीय राजनीति का वास्तविक विभाजन
इन सभी मामलों में, एक सुसंगत पैटर्न उभरता है. वेबर बताते हैं कि क्यों करिश्माई नेतृत्व तेजी से राजनीतिक उत्थान तो कराता है लेकिन अस्थिर उत्तराधिकार पैदा करता है. हंटिंगटन बताते हैं कि क्यों जो पार्टियां विस्तार के साथ-साथ संस्थागत क्षमता बनाने में विफल रहती हैं, वे विखंडन, विशिष्ट नेताओं के पलायन या सफलता के बाद पतन का अनुभव करती हैं. डीएमके और बीजेपी से लेकर एसपी, आरजेडी, जडी (एस), एनसीपी, शिवसेना, एआईएडीएमके, बीआरएस और आप तक, निर्णायक परिवर्तनशील केवल चुनावी ताकत या सामाजिक आधार नहीं है. यह इस बात पर निर्भर है कि क्या करिश्मा, जाति लामबंदी या आंदोलन की ऊर्जा को सत्ता और उत्तराधिकार के स्थिर नियमों वाले संस्थागत संगठन में सफलतापूर्वक बदला गया है या नहीं. जहाँ यह परिवर्तन सफल होता है, वहां पार्टियां टिकी रहती हैं. जहाँ ऐसा नहीं होता, वहां अस्थिरता केवल समय की बात है.
(लेखक वी.वी.पी शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार हैं)
तरबूज खाने से हुईं 4 मौतें? मुंबई में एक त्रासदी जो 12 घंटों के भीतर घटित हुई
दक्षिण मुंबई में अपने घर पर एक पारिवारिक मिलन समारोह में भोजन के बाद एक दंपति और उनकी दो नाबालिग बेटियों की मौत हो गई, पुलिस ने सोमवार को यह जानकारी दी. परिवार ने रात के खाने के बाद तरबूज का सेवन किया था, और उनकी मौत का कारण ‘फूड पॉइजनिंग’ (खाद्य विषाक्तता) होने का संदेह है.
मृतकों में अब्दुल्ला (40), उनकी पत्नी नसरीन (35), और बेटियाँ ज़ैनब (13) और आयशा (16) शामिल हैं. समाचार एजेंसी ‘पीटीआई’ के अनुसार, उल्टी और चक्कर आने की शिकायत के बाद दंपति और उनके बच्चों को पहले एक निजी अस्पताल ले जाया गया था.
हालाँकि, उनकी स्थिति और बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें जेजे अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया, जहाँ रविवार को उन्होंने दम तोड़ दिया. रविवार रात करीब 10.30 बजे अब्दुल्ला की मौत सबसे अंत में हुई.
क्या तरबूज घातक साबित हुआ?
एक अधिकारी के अनुसार, अब्दुल्ला और नसरीन ने 25 अप्रैल (शनिवार) को अपने जेजे मार्ग स्थित आवास पर एक छोटा सा मिलन समारोह आयोजित किया था. परिवार और पाँच अन्य मेहमानों ने रात के खाने में मुख्य भोजन के रूप में ‘चिकन पुलाव’ खाया था.
पीटीआई ने अधिकारी के हवाले से बताया कि मेहमानों के जाने के बाद, चारों ने तरबूज खाया और उसके तुरंत बाद उन्हें उल्टी और चक्कर आने लगे. अधिकारी ने आगे कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला तरबूज से हुई फूड पॉइजनिंग का लगता है, क्योंकि जिन लोगों ने केवल ‘पुलाव’ खाया था, उन्हें स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्या नहीं हुई.
मृतकों का पोस्टमार्टम कर लिया गया है, लेकिन मौत के सटीक कारण की पुष्टि के लिए हिस्टोपैथोलॉजी रिपोर्ट का इंतजार है. अधिकारी ने बताया कि दुर्घटनावश मृत्यु का मामला दर्ज कर लिया गया है और घटना की आगे की जाँच जारी है.
शुरुआत में परिवार की जाँच करने वाले डॉ. ज़ियाद कुरैशी ने ‘एनडीटीवी’ को बताया कि चारों लोग बहुत खराब स्थिति में थे और काफी थके हुए लग रहे थे. उन्होंने कहा, “उन्हें गंभीर उल्टी और दस्त की शिकायत थी. जब मैं उन्हें अस्पताल ले गया, तो उन्होंने मुझे बताया कि उन्होंने तरबूज खाया था.”
इस बीच, आधे खाए हुए तरबूज के टुकड़े को प्रयोगशाला परीक्षण के लिए भेज दिया गया है. पुलिस उपायुक्त प्रवीण मुंडे ने एनडीटीवी को बताया, “जाँच के लिए पोस्टमार्टम के दौरान शरीर से नमूने एकत्र किए गए हैं.”
विशेषज्ञों का क्या कहना है?
विशेषज्ञों के अनुसार, दुर्लभ मामलों में तरबूज फूड पॉइजनिंग का कारण बन सकता है और स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएं पैदा कर सकता है. एनडीटीवी ने एक सलाहकार पोषण विशेषज्ञ के हवाले से बताया कि फल में पानी और प्राकृतिक शर्करा की मात्रा अधिक होने के कारण ऐसा वातावरण बन जाता है जहाँ संदूषण होने पर बैक्टीरिया तेजी से बढ़ सकते हैं. इसके अलावा, ऐसी खबरें भी आती रही हैं कि फल की मिठास बढ़ाने या उसे बेहतर दिखाने के लिए उसमें ग्लूकोज या चीनी के पानी के इंजेक्शन दिए जाते हैं.
ओडिशा में खनन विरोध पर सख्ती: दलित-आदिवासी प्रदर्शनकारियों को ज़मानत के बदले पुलिस थाने साफ करने की शर्त
निकिता जैन की रिपोर्ट के मुताबिक़ ओडिशा के रायगढ़ा जिले के तिजिमाली इलाक़े में खनन के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन पर 2023 से लगातार सख़्ती बढ़ती जा रही है. दलित और आदिवासी गांव वाले वेदांता लिमिटेड की बॉक्साइट खनन परियोजना का विरोध कर रहे हैं, जिसके लिए कंपनी को 2023 में खनन का ठेका दिया गया था. इस परियोजना के तहत क़रीब 1,560.40 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन होना है, जिसमें लगभग 46.37% ज़मीन जंगल की है. इससे दो गांव मालिपदार (रायगढ़ा) और तिजिमाली (कालाहांडी), पूरी तरह हट जाएंगे और 140 से ज़्यादा परिवार प्रभावित होंगे, जो खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं. गांव वालों का कहना है कि अभी तक मुआवज़े पर कोई साफ बात नहीं हुई है और कई लोग ऐसे हैं जो दूसरों की ज़मीन पर काम करते हैं, इसलिए उन्हें मुआवज़ा भी नहीं मिलेगा.
इस विरोध के दौरान 2023 से अब तक कम से कम 40 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है. अगस्त 2023 में ही 24 लोगों को पकड़ा गया था, जब उन्होंने पुलिस और कंपनी के अधिकारियों को इलाके में घुसने से रोका था. सितंबर 2024 में एक बड़े विरोध के बाद पुलिस ने 58 नामज़द और करीब 140 अज्ञात लोगों पर केस दर्ज किया, जिनमें दंगा, सरकारी काम में बाधा और हत्या की कोशिश जैसी गंभीर धाराएं शामिल थीं. जनवरी 2025 में कुमेश्वर नायक नाम के 26 वर्षीय दलित युवक को भी गिरफ्तार किया गया है. वह कांतामाल गांव का रहने वाला है और एक छोटी किराना दुकान चलाता है.
कुमेश्वर नायक को 28 मई 2025 को ओडिशा हाईकोर्ट से ज़मानत मिली, लेकिन इसके साथ एक विवादित शर्त भी रखी गई कि उन्हें हर दिन सुबह 6 बजे से 9 बजे तक काशीपुर पुलिस स्टेशन की सफाई करनी होगी. उन्हें करीब दो महीने तक झाड़ू, फिनाइल और सफाई के सामान से पुलिस स्टेशन साफ करना पड़ा. कुमेश्वर ने बताया कि जेल से निकलने के बाद यह उनके लिए राहत का समय होना चाहिए था, लेकिन यह शर्त उन्हें अपमानित करने के लिए लगाई गई थी. उन्होंने कहा कि पुलिस के कुछ लोग भी इस शर्त से असहज थे और शुरू में उन्हें सिर्फ साइन करके जाने को कहते थे, लेकिन बाद में जब 45 साल के दलित किसान और कार्यकर्ता हिरामल नायक को भी इसी शर्त पर रिहा किया गया था.
आर्टिकल 14 को ऐसे कुल 8 ज़मानत आदेश मिले हैं, जो मई 2025 से जनवरी 2026 के बीच दिए गए थे. इनमें से 7 रायगढ़ा जिला अदालत के दो जजों, अल्पना स्वैन (एडीजे) और नर्मदा कर (जेएमएफसी) ने दिए थे, जबकि एक आदेश ओडिशा हाईकोर्ट के जज एस.के. पाणिग्रही ने दिया था. इन 8 लोगों में 6 दलित और 2 आदिवासी हैं. इनमें से कम से कम 5 मामलों में यह शर्त लागू भी की गई है. 18 फरवरी 2026 को तीन और लोगों, नारिंग देई माझी, रामाकांत नायक और सुंदर सिंह माझी को एक साल से ज़्यादा जेल में रहने के बाद ज़मानत मिली, लेकिन उन्हें भी दो महीने तक हर सुबह पुलिस स्टेशन साफ करने की शर्त दी गई, इन्हें 25 किलोमीटर दूर से रोज आना पड़ता है.
सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों का कहना है कि ये ज़मानत की शर्तें जातिगत भेदभाव को दिखाती हैं और दलित-आदिवासी समुदाय को अपमानित करने वाली हैं. उनका कहना है कि यह काम ऐतिहासिक रूप से इन्हीं समुदायों से जबरन कराया जाता रहा है. “द लीफलेट” की सितंबर 2025 की रिपोर्ट में भी कहा गया कि इस तरह की शर्तें अदालत की सीमा से बाहर हैं, क्योंकि ज़मानत का मकसद सिर्फ यह सुनिश्चित करना होता है कि आरोपी कोर्ट में पेश हो, न कि उसे सज़ा देना. जबकि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में कुछ मामलों में सामुदायिक सेवा की सज़ा का प्रावधान है, लेकिन कुमेश्वर नायक पर जो धाराएं लगी थीं, जैसे हत्या की कोशिश और दंगा, उनमें ऐसी शर्त लागू नहीं होती हैं.
इस पूरे आंदोलन में “मां माटी माली सुरक्षा मंच” नाम का संगठन सक्रिय है, जिसमें दलित और आदिवासी लोग शामिल हैं. उनका कहना है कि ग्राम सभा की सहमति के बिना खनन किया जा रहा है, जबकि फॉरेस्ट राइट्स एक्ट और पेसा अधिनियम 1996 के तहत यह ज़रूरी है. ग्रामीणों का आरोप है कि फ़र्ज़ी सहमति पत्र बनाए गए, जिनमें नाबालिगों, मृत लोगों और बाहर रहने वालों के नाम शामिल थे. इन आरोपों के कारण लोगों का गुस्सा बढ़ा और बड़े स्तर पर विरोध शुरू हुआ. इस विरोध को दबाने के लिए लगातार कार्रवाई हो रही है. वकील मंगल मूर्ति बेउरिया का कहना है कि पुलिस आदिवासियों के पारंपरिक हथियारों, जैसे कुल्हाड़ी और धनुष को बहाना बनाकर उन पर हमला करने का आरोप लगा देती है. कई लोगों को बार-बार अलग-अलग मामलों में गिरफ्तार किया गया है. कुछ परिवारों के 5-6 सदस्यों तक पर केस दर्ज हैं. गांवों में डर का माहौल है और लोग बाहर जाने से भी डर रहे हैं.
महिलाओं ने भी इस आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई है. जब पुरुषों को गिरफ्तार किया गया, तब महिलाओं ने गांव संभाला और पुलिस आने पर लोगों को चेतावनी दी. लेकिन उन्हें भी धमकियों का सामना करना पड़ा. कुछ महिलाओं ने आरोप लगाया कि कंपनी से जुड़े लोगों ने उन्हें रेप की धमकी दी, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की. इस बीच, जुलाई 2025 में 86 वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर इन जमानत शर्तों को हटाने की मांग की, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.
किसका पलड़ा भारी है दो माह से जारी जंग के बाद…
अमेरिका और इज़रायल के हमलों को दो महीने बीत चुके हैं, लेकिन ईरान के ख़िलाफ़ छिड़ी यह जंग एक महँगे गतिरोध में तब्दील हो गई है. पाकिस्तान की मध्यस्थता से नाज़ुक युद्धविराम तो लागू हुआ, मगर होर्मुज़ जलडमरूमध्य अब भी बंद है, सीधी वार्ता ध्वस्त हो चुकी है, और दोनों पक्षों में झुकने के कोई संकेत नहीं हैं.
पिछले सप्ताहांत वाशिंगटन के दूतों ने इस्लामाबाद में आगामी वार्ता के लिए अपना नियोजित दौरा रद्द कर दिया, क्योंकि तेहरान ने साफ़ कह दिया कि जब तक अमेरिकी नौसेना ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी नहीं हटाती, वह किसी भी बातचीत में शामिल नहीं होगा. ड्रॉप साइट न्यूज़ को एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने बताया, “हम अपने ही डिज़ाइन के साथ आगे बढ़ रहे हैं. जब तक अमेरिका समुद्री नाकेबंदी नहीं हटाता, बातचीत का कोई मतलब नहीं.”
दोनों पक्षों को अपनी जीत का यक़ीन
बीजिंग में 26 अप्रैल को चाइना एंड ग्लोबलाइज़ेशन फ़ोरम में बोलते हुए निंगशिया विश्वविद्यालय के उपकुलपति और मध्यपूर्व विशेषज्ञ नियू शिनचुन ने कहा, “अमेरिका और ईरान, दोनों को लगता है कि पलड़ा उनकी तरफ़ भारी है.” उनके अनुसार अमेरिका सैन्य रूप से श्रेष्ठ है, लेकिन उसने अपने दो प्रमुख लक्ष्य — ईरान की परमाणु क्षमता और सैन्य शक्ति को नष्ट करना — हासिल नहीं किए हैं. दूसरी तरफ़ ईरान भारी नुकसान उठाने के बाद भी टिका हुआ है. “शासन बचा रहा, सेना बची रही, इसलिए ईरान मानता है कि समय उसके पक्ष में है,” नियू ने कहा.
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के मुताबिक शंघाई स्थित सैन्य विश्लेषक नी लेशियोंग ने दोनों पक्षों की संरचनागत कमज़ोरियों की ओर ध्यान दिलाया. उनके अनुसार अमेरिका की कमज़ोरी यह है कि वह ईरान में सत्ता परिवर्तन के लिए अपने सभी संसाधन झोंकने से हिचकिचाता है — वह क्षेत्रीय दलदल में नहीं फँसना चाहता. “वाशिंगटन वेनेजुएला-शैली का हल चाहता है — तख्तापलट किए बिना दबाव और नियंत्रण. ईरान के कट्टरपंथियों ने अपनी प्रतिरोध-नीति इसी अमेरिकी हिचकिचाहट का फ़ायदा उठाकर बनाई है,” नी ने कहा. इसके अलावा अमेरिका के गोला-बारूद भंडार घट रहे हैं, और बढ़ती ईंधन क़ीमतों के कारण साल के अंत में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले यह संघर्ष घरेलू स्तर पर तेज़ी से अलोकप्रिय हो रहा है. नी की राय है कि अगर अमेरिका दबाव बनाए रखे, तो ईरान अंततः “महत्वपूर्ण रियायतें” देगा, भले ही वह “हारे हुए पक्ष की भूमिका में विजेता बनने का नाटक” करता रहे. होर्मुज़ की नाकेबंदी को नी ने ईरान की “ग़लती” बताया — “इसने अमेरिका के हाथ में पत्ते दे दिए.”
ईरान के तीन ‘एम’: हथियार, बाज़ार और मध्यावधि चुनाव
तेहरान विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफ़ेसर और प्रतिष्ठित ईरानी विश्लेषक हसन अहमदियन ने ड्रॉप साइट न्यूज़ को बताया कि ईरान के पास तीन ‘म’ हैं — मुनिशन्स यानी हथियार, मार्केट्स यानी बाज़ार, और मिडटर्म्स यानी मध्यावधि चुनाव. “ये तीनों चीज़ें ईरान की स्थिति को मज़बूत करती हैं और अमेरिकी स्थिति को कमज़ोर करती हैं. अमेरिका चाहता है कि वह कह सके — हमने ईरान को निचोड़ा और यह हासिल किया. मेरी समझ में ईरान यही नहीं होने देना चाहता.”
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची इस समय रणनीतिक दौरे पर हैं — पाकिस्तान, ओमान और रूस. ड्रॉप साइट न्यूज़ के अनुसार यह दौरा दो परिदृश्यों की तैयारी के लिए है: कूटनीति की वापसी या युद्ध का नया दौर. अरागची ने अमेरिका को वार्ता के ठप होने का ज़िम्मेदार ठहराते हुए कहा, “अमेरिकियों के रवैये ने पिछले दौर की वार्ता को, उसमें हुई प्रगति के बावजूद, लक्ष्य तक नहीं पहुँचने दिया.”
अहमदियन ने बताया कि ईरान ने युद्ध समाप्त करने की एक बहु-चरणीय रूपरेखा तैयार की है: पहले पूरे क्षेत्र में — ख़ासकर लेबनान में — वास्तविक युद्धविराम, फिर होर्मुज़ में समझौता, और उसके बाद परमाणु कार्यक्रम तथा दीर्घकालिक अनाक्रामकता समझौते पर व्यापक बातचीत.
ट्रम्प का उलझा कथा-भाष्य
ट्रम्प ने बार-बार दावा किया है कि ईरान झुक रहा है, लेकिन ड्रॉप साइट न्यूज़ के वरिष्ठ ईरानी सूत्र ने इसे ख़ारिज किया. पाकिस्तान में हुई वार्ता को लेकर खूब अटकलें लगाई गईं — ट्रम्प ने कहा कि उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस इस्लामाबाद जा रहे हैं, फिर कहा कि स्टीव विटकॉफ़ और जेरेड कुशनर जाएँगे. लेकिन ईरान ने किसी भी बैठक से इनकार किया. ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माईल बाग़ाई ने कहा, “ईरान और अमेरिका के बीच कोई बैठक होने वाली नहीं है.” जब अरागची पाकिस्तान से ओमान चले गए, तो ट्रम्प ने पलटी मारते हुए कहा कि उन्होंने ख़ुद वार्ता रद्द की. “बहुत यात्रा में समय बर्बाद, बहुत काम!” ट्रम्प ने ट्रूथ सोशल पर लिखा. “उनके पास कोई पत्ता नहीं है, सारे पत्ते हमारे पास हैं!”
अहमदियन के अनुसार वास्तव में अव्यवस्था अमेरिकी शिविर में है, जैसा कि ट्रम्प की बदलती बातों, अधूरी धमकियों और इस्लामाबाद भेजे जाने वाले अधिकारियों को लेकर हुई उठापटक से ज़ाहिर होता है. ईरान विटकॉफ़ और कुशनर को “इज़रायल के प्रतिनिधि” मानता है, न कि अमेरिकी हितों के. “यह जैसे फुटबॉल मैच में रग्बी के नियम लेकर आ जाना है,” वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने कहा.
रूस, चीन और परमाणु यूरेनियम का सवाल
27 अप्रैल को सेंट पीटर्सबर्ग में बोरिस येल्तसिन प्रेसिडेंशियल लाइब्रेरी में व्लादिमीर पुतिन से मिलने पर रूसी राष्ट्रपति ने ईरानी लड़ाई की “वीरता” की तारीफ़ की और कहा, “रूस ईरान के साथ अपने रणनीतिक संबंध जारी रखेगा.” 2015 के परमाणु समझौते में रूस की अहम भूमिका थी; तब ईरान ने अपने 98 प्रतिशत समृद्ध यूरेनियम का भंडार — लगभग 11,000 किलोग्राम — मास्को को भेजा था. अब ईरान के पास अनुमानतः 450 किलोग्राम अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम है. ट्रम्प ने हाल ही में झूठा दावा किया कि ईरान ने अमेरिकी सैनिकों को यूरेनियम की हिफ़ाज़त के लिए ईरान में भेजने पर सहमति दी है. ईरान ने यूरेनियम को देश से बाहर भेजने से इनकार कर दिया है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय निगरानी में उसे तनु करने पर सहमति ज़ताई है. अहमदियन ने कहा कि रूस और चीन वे देश हैं जिन पर ईरान किसी भी समझौते में गारंटर के रूप में भरोसा कर सकता है.
थिंगहुआ विश्वविद्यालय की अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा शोधकर्ता जोडी वेन का मानना है कि फ़िलहाल “कार्ड ईरान के हाथ में हैं” — होर्मुज़ से सटा होने के कारण तेहरान कम लागत पर अधिक प्रभाव डाल सकता है. लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि यह स्थिति “विस्फोटक बनी हुई है” और जोखिम तेल क़ीमतों से लेकर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला तक फैल रहा है. उन्होंने 1973 के वॉर पॉवर्स रेज़ोल्यूशन का भी ज़िक्र किया: 1 मई के बाद ट्रम्प प्रशासन को सैन्य अभियानों के लिए कांग्रेस की मंज़ूरी लेनी होगी.
नियू शिनचुन आने वाले हफ़्तों में “आंशिक, सीमित समझौते” को लेकर आशावादी हैं — होर्मुज़ को 10 साल तक खुला रखने और 2015 जैसे परमाणु समझौते की संभावना देखते हैं. उनके अनुसार अमेरिका संभवतः “ईरान में लड़कर जल्दी निकल जाएगा” और बाद का काम इज़रायल तथा खाड़ी देशों पर छोड़ देगा.
ट्रंप के इतने करीब कैसे पहुँचा बंदूकधारी?
व्हाइट हाउस करेस्पॉन्डेंट्स डिनर में गोलीबारी: संदिग्ध अधिकारियों को निशाना बना रहा था
वाशिंगटन के हिल्टन होटल में शनिवार रात व्हाइट हाउस करेस्पॉन्डेंट्स डिनर के दौरान हुई गोलीबारी ने अमेरिकी राजनीतिक और मीडिया जगत को हिला दिया. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस और अन्य अधिकारियों को तुरंत वहाँ से निकाल लिया गया. कोई भी मेहमान हताहत नहीं हुआ, लेकिन एक सीक्रेट सर्विस एजेंट को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा — हालाँकि उनकी बुलेटप्रूफ़ जैकेट ने उनकी जान बचाई और वे अगली सुबह अस्पताल से छुट्टी पा गए.
पोलिटिको की रिपोर्ट के अनुसार, कार्यवाहक अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लांश ने रविवार को सीबीएस, एबीसी और एनबीसी को दिए साक्षात्कारों में बताया कि संदिग्ध की प्रारंभिक जाँच के आधार पर क़ानून प्रवर्तन एजेंसियों का मानना है कि वह प्रशासनिक अधिकारियों को — “संभवतः राष्ट्रपति समेत” — निशाना बनाने की फ़िराक़ में था. संदिग्ध फ़िलहाल जाँचकर्ताओं के साथ सहयोग नहीं कर रहा.
संदिग्ध की पहचान और हथियार
कई समाचार संस्थाओं ने संदिग्ध की पहचान 31 वर्षीय कैलिफ़ोर्निया निवासी कोल टॉमस एलन के रूप में की है. ब्लांश के अनुसार एलन ट्रेन से कैलिफ़ोर्निया से शिकागो और फिर वाशिंगटन पहुँचा, और शुक्रवार को वाशिंगटन हिल्टन में चेक इन किया — वही होटल जहाँ 1981 में रोनाल्ड रीगन पर हमला हुआ था. वाशिंगटन पुलिस के अंतरिम प्रमुख जेफ़री कैरल ने बताया कि संदिग्ध के पास “एक शॉटगन, एक हैंडगन और कई चाकू” थे. उसने सुरक्षा चौकी पर धावा बोला था.
एलन ने गोलीबारी से कुछ मिनट पहले अपने परिवार को एक मैनिफ़ेस्टो भेजा, जिसकी सूचना उसके भाई ने कनेक्टिकट के न्यू लंदन की स्थानीय पुलिस को दी. मैनिफ़ेस्टो में उसने प्रशासनिक अधिकारियों को निशाना बनाने की बात लिखी थी. उसकी बहन — जिससे सीक्रेट सर्विस और मॉन्टगोमरी काउंटी पुलिस ने रॉकविल, मेरीलैंड स्थित उसके घर पर मुलाक़ात की — ने पुष्टि की कि उसके भाई ने तीन हथियार ख़रीदे थे और उसमें “कट्टरपंथी बयान देने की आदत” थी.
ट्रम्प ने फ़ॉक्स न्यूज़ को दिए साक्षात्कार में कहा कि संदिग्ध “बहुत परेशान इंसान” है जो मैनिफ़ेस्टो के अनुसार “ईसाइयों से नफ़रत करता है.” उन्होंने यह भी कहा कि संदिग्ध “दरवाज़ों तक भी नहीं पहुँच पाया.” डीसी के संघीय अटॉर्नी जीनाइन पिरो ने बताया कि एलन पर संघीय अधिकारी पर ख़तरनाक हथियार से हमला करने और हिंसक अपराध के दौरान आग्नेयास्त्र का इस्तेमाल करने के आरोप लगाए जाएँगे. ब्लांश ने कहा कि “इससे कहीं अधिक संघीय आरोप” भी संभव हैं.
ब्लांश ने एफ़बीआई, सीक्रेट सर्विस और स्थानीय एजेंसियों की त्वरित कार्रवाई को “बड़ी सफलता” बताया, लेकिन यह भी माना कि जाँच जारी है कि संदिग्ध होटल में हथियार कैसे ले जा सका. हाउस ओवरसाइट एंड गवर्नमेंट रिफ़ॉर्म कमेटी ने सीक्रेट सर्विस से ब्रीफ़िंग माँगी है. ब्रिटेन के बकिंघम पैलेस ने कहा कि किंग चार्ल्स तृतीय की इस सप्ताह अमेरिका यात्रा पर इस घटना का क्या असर पड़ेगा, इस पर अमेरिकी अधिकारियों के साथ चर्चाएँ जारी हैं. कांग्रेस में मंगलवार को उनके भाषण की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चर्चाएँ तेज़ हो गई हैं.
ट्रम्प का व्हाइट हाउस बॉलरूम प्रोजेक्ट
ट्रम्प ने रविवार को सोशल मीडिया पर लिखा कि यह गोलीबारी उनके नए व्हाइट हाउस बॉलरूम में “कभी नहीं होती.” वे उस बॉलरूम का निर्माण करवा रहे हैं जहाँ ध्वस्त ईस्ट विंग हुआ करता था. इस 40 करोड़ डॉलर के प्रोजेक्ट को नेशनल ट्रस्ट फ़ॉर हिस्टोरिक प्रिज़र्वेशन ने कांग्रेस की मंज़ूरी न मिलने पर अदालत में चुनौती दी है. असिस्टेंट अटॉर्नी जनरल ब्रेट शुमेट ने गोलीबारी के बाद नेशनल ट्रस्ट को मुक़दमा वापस लेने का अनुरोध करते हुए कड़े शब्दों में पत्र लिखा और सोमवार सुबह 9 बजे तक मुक़दमा न हटाने पर ख़ुद उसे ख़ारिज करवाने की चेतावनी दी.
सीएनएन के ‘स्टेट ऑफ़ द यूनियन’ कार्यक्रम में मनोरंजनकर्ता ओज़ पर्लमैन ने बताया कि वे उस वक़्त मंच पर ट्रम्प, प्रथम महिला मेलानिया ट्रम्प और प्रेस सचिव कैरोलाइन लेविट के सामने प्रस्तुति दे रहे थे. जब सुरक्षाकर्मी मंच पर दौड़े तो उन्हें लगा कोई बम फटने वाला है. उन्होंने कहा, “कमरे में ऐसी हलचल में आप सोचते हैं — क्या यह कोई मेडिकल इमरजेंसी है? मुझे पक्का नहीं था कि वह गोली की आवाज़ थी.” उन्होंने बताया कि बाद में उन्होंने वेंस को पर्दे के पीछे देखा जो “बहुत शांत” और “आश्वस्त करने वाले” लग रहे थे.
मीडिया से ट्रंप का 24 घंटे सीज़ फायर और फिर हमले जारी
एक्सियोस के ज़ाकरी बासू की रिपोर्ट के अनुसार, शनिवार की गोलीबारी के बाद ट्रम्प ने शुरुआत में वह भूमिका निभाई जो एक राजनेता से अपेक्षित होती है. व्हाइट हाउस ब्रीफ़िंग रूम में पत्रकारों के साथ बातचीत में उन्होंने “अपार प्यार और एकजुटता” की सराहना की. उन्होंने सीबीएस के ‘60 मिनट्स’ कार्यक्रम में एंकर नोरा ओ’डॉनेल को बताया: “मैं घबराया नहीं था. मैं ज़िंदगी समझता हूँ. हम पागल दुनिया में जी रहे हैं.” साथ ही उन्होंने जोड़ा: “पिछले 20, 40, 100, 200, 500 साल से राजनीतिक हिंसा रही है — और मुझे नहीं लगता यह पहले से ज़्यादा है.”
लेकिन जब ओ’डॉनेल ने पूछा कि क्या यह घटना मीडिया के साथ उनके रिश्ते को बदलेगी — तो ट्रम्प ने पत्रकारों और डेमोक्रेट्स को “एक ही” बताते हुए हमला बोल दिया. जब ओ’डॉनेल ने संदिग्ध के मैनिफ़ेस्टो का एक अंश — जिसमें ट्रम्प पर गंभीर आरोप लगाए गए थे — पढ़ा, तो ट्रम्प भड़क गए. “आप किसी बीमार इंसान की बकवास पढ़ रही हैं? आपको शर्म आनी चाहिए. आप ‘60 मिनट्स’ के लिए कलंक हैं,” उन्होंने कहा. उन्होंने दावा किया कि डेमोक्रेट्स की “घृणा भरी भाषा” देश के लिए ज़्यादा ख़तरनाक है — और जेफ़री एपस्टीन के मामले में भी डेमोक्रेट्स को ज़िम्मेदार ठहराया. ट्रम्प ने वॉल स्ट्रीट जर्नल पर 1,000 करोड़ डॉलर का मुक़दमा उसकी एक रिपोर्ट को लेकर किया है जिसमें कथित रूप से एपस्टीन के साथ उनके संबंधों का उल्लेख था.
ग़ौरतलब है कि ट्रम्प इस डिनर में मीडिया पर हमला करने की पूरी तैयारी के साथ आए थे. “मैं सच में बहुत कड़ी बातें कहने वाला था,” उन्होंने कहा. ट्रम्प ने पहले कहा था कि कार्यक्रम जारी रहेगा, फिर क़ानून प्रवर्तन की सलाह पर उसे रद्द किया और 30 दिनों में दोबारा आयोजन का वादा किया.
ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल में मीडिया के ख़िलाफ़ कई मोर्चे खोल रखे हैं — ‘60 मिनट्स’ के मालिक पैरामाउंट समेत कई बड़े मीडिया संस्थानों पर अरबों डॉलर के मुक़दमे, एपी को ओवल ऑफ़िस से बाहर, और व्हाइट हाउस करेस्पॉन्डेंट्स एसोसिएशन से प्रेस पूल चुनने का सदियों पुराना अधिकार छीनना. ‘60 मिनट्स’ इंटरव्यू समाप्त होते-होते “24 घंटे की शांति” का जवाब मिल गया था.
“लॉरेंस ही कर्म है”: मोदी के भारत का गैंगस्टर जो आइकन बन गया
लॉरेंस बिश्नोई पिछले एक दशक से अधिक समय से उच्च सुरक्षा हिरासत में है. इस दौरान उसका नाम भारत में और कनाडा तक कई हाई-प्रोफ़ाइल हत्याओं से जुड़ा रहा है. उसकी ताक़त, जो अब तक कमज़ोर नहीं हुई दिखती, उसे क्या समझाती है? लॉरेंस की ज़िंदगी पर ‘द गार्डियन’ में प्रकाशित अपनी एक विस्तृत रिपोर्ट में अतुल देव ने कहा है कि बिश्नोई आज के उस भारत का प्रतीक बन गया है जहाँ कानून के बजाय ताकत की पूजा हो रही है. वह खुद को ‘मुख्यधारा’ से बाहर रहकर खुश बताता है, और उसके समर्थक उसे एक ऐसे योद्धा के रूप में देखते हैं, जो वह सब हासिल कर रहा है जो वे केवल सपनों में देख सकते हैं. बिश्नोई केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक बदलती हुई सामाजिक मानसिकता का परिणाम है. पेश है अतुल देव की लंबी रिपोर्ट का सारांश:
देव इस कहानी को बिश्नोई के पैतृक गाँव दुतारांवाली पहुँचकर शुरू करते हैं. बिश्नोई का परिवार गाँव के सबसे धनी परिवारों में से एक है, लेकिन वे मीडिया से पूरी तरह दूरी बनाकर रखते हैं. अतुल के साथ मौजूद ‘हैप्पी बिश्नोई’ का डर उस प्रभाव को दर्शाता है जो लॉरेंस ने अपने क्षेत्र में पैदा किया है. हैप्पी का सीसीटीवी कैमरों से बचना और ‘लॉरेंस के इलाके’ से जल्द से जल्द बाहर निकलने की जल्दबाजी यह बताती है कि जेल में होने के बावजूद लॉरेंस का खौफ जमीन पर बरकरार है.
वह लॉरेंस के उदय को भारत की वर्तमान स्थितियों से जोड़कर देखते हैं. मणिपुर में सांप्रदायिक हिंसा, कश्मीर के हालात, और उत्तर भारत में गौरक्षकों द्वारा की जाने वाली लिंचिंग जैसी घटनाओं का जिक्र करते हुए अतुल की यह रिपोर्ट एक ऐसे भारत की तस्वीर खींचती है, जहाँ ‘कानून का शासन’ कमजोर पड़ता दिख रहा है. इस माहौल में बिश्नोई जैसे अपराधी उन युवाओं के लिए ‘आदर्श’ बन गए हैं जो बेरोजगारी और हताशा से जूझ रहे हैं. उनके लिए कानून का पालन करना ‘हारने वालों’ का काम है, और बिश्नोई की शून्यवादी विचारधारा—”जो मिले उसे झपट लो”—उन्हें आकर्षित करती है.
लॉरेंस बिश्नोई को मुख्यधारा के मीडिया और उसके समर्थकों द्वारा एक ‘हिन्दू डॉन’ के रूप में पेश किया गया है. उसके शाकाहारी होने, ब्रह्मचर्य का पालन करने और शरीर पर धार्मिक टैटू होने को उसकी ‘हिन्दू साख’ के रूप में विज्ञापित किया जाता है.
सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने आरोप लगाया कि बिश्नोई गिरोह भारत सरकार के इशारे पर कनाडाई धरती पर सिख अलगाववादियों (जैसे हरदीप सिंह निज्जर) को निशाना बना रहा है. हालांकि भारत ने इन आरोपों को खारिज किया है, लेकिन यह रिपोर्ट संकेत देती है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बिश्नोई का नाम अब केवल एक स्थानीय अपराधी नहीं, बल्कि एक ‘रणनीतिक मोहरे’ के रूप में लिया जाने लगा है.
लॉरेंस का नाम एक ब्रिटिश अधिकारी के नाम पर रखा गया था, जो उसके परिवार की ऊंची आकांक्षाओं को दर्शाता है. संपन्न परिवार से आने के कारण उसे बचपन से ही विशेष उपचार मिला. चंडीगढ़ के पंजाब विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई के दौरान उसकी मुलाकात विक्की मिड्दुखेड़ा से हुई, जिसने उसे छात्र राजनीति के रास्ते अपराध की दुनिया में धकेला. चंडीगढ़ जैसे आधुनिक शहर में अपनी पहचान बनाने की छटपटाहट ने उसे हिंसा के रास्ते पर डाल दिया. 2014 से वह जेल में है, लेकिन वहीं से अपना साम्राज्य चला रहा है.
बिश्नोई समुदाय के लिए वन्यजीव और पर्यावरण पवित्र हैं. 1998 के काले हिरण शिकार मामले में सलमान खान के शामिल होने को लॉरेंस ने अपने पूरे समुदाय का अपमान माना. उसने कसम खाई है कि जब तक सलमान खान बिश्नोई मंदिर में जाकर माफी नहीं मांगते, वह उनका पीछा नहीं छोड़ेगा. बाबा सिद्दीकी की हत्या और सलमान के घर के बाहर गोलीबारी इसी प्रतिशोध की कड़ी के रूप में देखी जाती है. लॉरेंस के लिए यह केवल अपराध नहीं, बल्कि एक ‘सांस्कृतिक बदला’ है.
अतुल जब बिश्नोई के समर्थकों और वकीलों से मिलते हैं, तो एक अलग ही पक्ष सामने आता है. कुछ लोग उसे अपराधी नहीं बल्कि ‘कर्म’ का अवतार मानते हैं—एक ऐसा व्यक्ति जो उन लोगों को सजा दे रहा है जो उनके अनुसार गद्दार या भ्रष्ट हैं.
दूसरी ओर, जयपुर के युवाओं के साथ लेखक की बातचीत यह उजागर करती है कि बिश्नोई की लोकप्रियता का असली कारण ‘ताक़त की भूख’ है. चमकते हुए मॉल और लग्जरी कारों के बीच रहने वाले लेकिन उन्हें हासिल न कर पाने वाले बेरोजगार युवाओं के लिए लॉरेंस एक ऐसा व्यक्ति है जिसने व्यवस्था को चुनौती दी है. वे उसकी हिंसा में अपनी हताशा का समाधान देखते हैं.
अतुल के अनुसार, “किसी भी प्रमाणित जानकारी के अभाव में, बिश्नोई उन कहानियों और मिथकों में सबसे अधिक जीवंत है जो उसके चारों ओर बुने गए हैं. जब मैं दिल्ली के एक आलीशान इलाके में उसके वकील से मिलने गया, तो मैंने देखा कि अदालतों की छुट्टी के बाद वकील दफ्तर के बाहर बैठे चाय पी रहे थे. जब मैंने उन्हें बताया कि मैं लॉरेंस बिश्नोई पर एक कहानी लिख रहा हूँ, तो वे मुस्कुराए. उनमें से सबसे अच्छे कपड़े पहने एक वकील ने कहा, “आपको उसके बारे में यह लिखना चाहिए: उसने कुछ भी गलत नहीं किया है. जिन लोगों को मारने का उस पर आरोप है, वे किसी न किसी तरह इसी के लायक थे.” उसने विस्तार से बताया: “मूसेवाला, एक जाना-माना गैंगस्टर जिसे सिर्फ औरतें और तेज कारें पसंद थीं; बाबा सिद्दीकी, एक भ्रष्ट राजनेता; सलमान खान, उनके बारे में जितना कम कहा जाए उतना अच्छा; और खालिस्तानी (जो पंजाब से अलग सिख राज्य की मांग कर रहे हैं), जो गद्दार हैं.” उसने मेरी ओर घूरते हुए कहा: “समझे? लॉरेंस कोई गैंगस्टर नहीं है. लॉरेंस ‘कर्म’ है.” उसने बिश्नोई को हिंदू नैतिकता के एक ऐसे दैवीय दूत के रूप में पेश किया जो यह सुनिश्चित करता है कि हर किसी को उसके किए का फल मिले.
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.










