25/04/2026: भाजपा की ‘वाशिंग मशीन’ | राम माधव पलटे | लोकतंत्र बनाम तंत्र | ममता चौथी बार | तेलंगाना में कविता की 'टीआरएस' | मताधिकार पर मंडराता खतरा
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आज की सुर्खियां
हरकारा एक्सप्लेनर: द ग्रेट भाजपा वाशिंग मशीन
रूस और ईरान से तेल खरीद पर मेरी टिप्पणी गलत थी: विवाद के बाद राम माधव पलटे
जर्मनी: पनडुब्बी में प्रवेश करते समय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह फिसले, वीडियो हुआ वायरल
कविता ने ‘तेलंगाना राष्ट्र सेना’ लॉन्च की, राज्य के भविष्य को संवारने का लक्ष्य
बंगाल के परिणाम भारतीय चुनावी लोकतंत्र का भविष्य तय करेंगे
यदि चौथी बार जीतती हैं तो 2029 में पीएम पद के लिए मजबूत दावेदार बन जाएंगी ममता बनर्जी
शहरी चुनावी निर्वासन का संकट: मताधिकार पर मंडराता खतरा
पीएम मोदी की झालमुड़ी से लेकर रेस्टोरेंट में प्राइम-टाइम टीवी तक: बंगाल चुनाव के केंद्र में ‘भोजन’ क्यों और कैसे?
हरकारा एक्सप्लेनर
ये दाग अच्छे हैं... भाजपा की ‘द ग्रेट वाशिंग मशीन’...!
भारतीय राजनीति में इन दिनों एक शब्द की चर्चा खूब हो रही है - ‘भाजपा की वाशिंग मशीन’. यह सिर्फ एक तंज़ नहीं, बल्कि विपक्ष का वह राजनीतिक आरोप है जो लगातार सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनता रहा है. आरोप यह है कि जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार, घोटाले, मनी लॉन्ड्रिंग या सत्ता के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप लगते हैं, जिनके दरवाज़े पर ईडी, सीबीआई या आयकर विभाग की दस्तक सुनाई देती है, वे जैसे ही भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लेते हैं या एनडीए के साथ खड़े हो जाते हैं, उनके खिलाफ़ कार्रवाई की रफ्तार अचानक धीमी पड़ जाती है. कई मामलों में जांच ठंडी पड़ जाती है, फाइलें गायब होने लगती हैं, और कई नेता राजनीतिक पुनर्जन्म के साथ नई भूमिका में दिखाई देने लगते हैं.
राघव चड्ढा समेत आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सदस्यों के भाजपा में शामिल होने से यह बहस फिर तेज हो गई है. सवाल वही पुराना है क्या भाजपा सचमुच एक ऐसी ‘वाशिंग मशीन’ बन चुकी है, जहां ‘भ्रष्टाचार के दाग’ धुल जाते हैं? आरोप मिट जाते हैं? ऐसे आरोप, जो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या भाजपा के नेतृत्व द्वारा लगाए गए. चाहे फिर असम के हिमंता बिस्वा सरमा का मामला हो या पश्चिम बंगाल के सुवेन्दु अधिकारी और महाराष्ट्र के दिवंगत एनसीपी नेता अजित पवार; सबके केस में भाजपा नेतृत्व ने हजारों करोड़ के भ्रष्टाचार के आरोप लगाए, लेकिन फिर भाजपा की शरण में आते ही सब “धुल” गए. इस ‘हरकारा एक्सप्लेनर’ में हम उन नेताओं, मामलों और राजनीतिक पैटर्न को समझेंगे, जिनकी वजह से “वाशिंग मशीन” का यह जुमला भारतीय लोकतंत्र की सबसे चर्चित राजनीतिक उपमाओं में बदल गया.
भाजपा और केंद्र सरकार इस आरोप को हमेशा खारिज करती रही है. उनका कहना है कि ईडी, सीबीआई और अन्य जांच एजेंसियां स्वतंत्र रूप से काम करती हैं, कार्रवाई सबूतों के आधार पर होती है और कई मामलों में कमज़ोर साक्ष्यों या न्यायिक प्रक्रिया के कारण जांच की रफ्तार प्रभावित होती है, न कि राजनीतिक हस्तक्षेप से.लेकिन सवाल इसलिए गहरा होता है क्योंकि एक ही पैटर्न बार-बार सामने आता है.
2024 में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक पड़ताल में 2014 के बाद ऐसे 25 बड़े विपक्षी नेताओं की पहचान की गई, जो ईडी या सीबीआई की जांच के दायरे में थे और बाद में भाजपा में शामिल हो गए. इनमें से 23 नेताओं को किसी न किसी रूप में राहत मिली है. वहीं 3 मामलों में केस पूरी तरह बंद हो गए, जबकि 20 मामलों में जांच ठंडी पड़ गई. केवल दो नाम ऐसे रहे, जहां जांच में कोई स्पष्ट नरमी नहीं दिखी ज्योति मिर्धा और वाईएस चौधरी.
इन 25 नेताओं में 10 कांग्रेस से, 4-4 एनसीपी और शिवसेना से, 3 टीएमसी से, 2 टीडीपी से, और 1-1 समाजवादी पार्टी तथा वाईएसआर कांग्रेस से थे. सबसे दिलचस्प तथ्य यह था कि इनमें 12 नेता अकेले महाराष्ट्र से थे, जिनमें से 11 ने 2022 के बाद पाला बदला.
इस पूरे नैरेटिव को समझने के लिए सिर्फ आरोप नहीं, बल्कि घटनाओं की टाइमलाइन देखना ज़रूरी है. कई मामलों में पैटर्न लगभग एक जैसा दिखता है. पहले ईडी/सीबीआई/आईटी की कार्रवाई, फिर राजनीतिक पाला बदलना, और उसके बाद जांच की रफ्तार का धीमा पड़ जाना.
अजित पवार (महाराष्ट्र)
एनसीपी के दिवंगत नेता अजित पवार महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव बैंक से जुड़े कथित धनशोधन और अनियमितताओं के मामले में जांच के घेरे में आए. अगस्त 2019 में बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने अजित पवार, शरद पवार और अन्य नेताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की. इसी प्राथमिकी के आधार पर सितंबर 2019 में प्रवर्तन निदेशालय ने भी जांच शुरू की.
अक्टूबर 2020 में आर्थिक अपराध शाखा ने समापन रिपोर्ट दाखिल कर दी, लेकिन प्रवर्तन निदेशालय ने इसका विरोध किया. अप्रैल 2022 में प्रवर्तन निदेशालय ने आरोपपत्र दाखिल किया, लेकिन उसमें अजित पवार का नाम शामिल नहीं था. जून 2022 में शिवसेना टूटने के बाद एकनाथ शिंदे गुट ने भाजपा के साथ सरकार बनाई. इसके बाद अक्टूबर 2022 में मुंबई की आर्थिक अपराध शाखा ने प्रवर्तन निदेशालय के सबूतों के आधार पर आगे जांच की मांग की.
फिर जुलाई 2023 में अजित पवार खुद एनडीए सरकार में शामिल होकर उपमुख्यमंत्री बने. जनवरी 2024 में आर्थिक अपराध शाखा ने दूसरी समापन रिपोर्ट दाखिल कर दी. बाद में जनवरी 2026 में विमान दुर्घटना में उनका निधन हो गया. फिलहाल इस मामले में कानूनी प्रक्रिया और समापन रिपोर्ट को लेकर बहस जारी है, लेकिन जांच की रफ्तार लंबे समय से लगभग ठहर चुकी दिखती है.
प्रफुल्ल पटेल (महाराष्ट्र)
पूर्व नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल पर एयर इंडिया के 111 विमानों की खरीद, एयर इंडिया-इंडियन एयरलाइंस विलय और विदेशी एयरलाइंस को लाभ पहुंचाने जैसे मामलों में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय की जांच चल रही थी. मई 2017 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने एयर इंडिया-इंडियन एयरलाइंस विलय मामले में प्राथमिकी दर्ज की. मई 2019 में प्रवर्तन निदेशालय ने अपनी आरोपपत्र में प्रफुल्ल पटेल का नाम शामिल किया. जून 2023 में वे भाजपा-समर्थित एनडीए खेमे के साथ आ गए.
इसके बाद मार्च 2024 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए समापन रिपोर्ट दाखिल कर दी. फिलहाल यह समापन रिपोर्ट अदालत में लंबित है. मामला कानूनी रूप से पूरी तरह बंद नहीं हुआ है, लेकिन जांच की दिशा और गति ने “भाजपा की वाशिंग मशीन” वाले आरोप को और मजबूत किया.
प्रताप सरनाईक (महाराष्ट्र)
शिवसेना नेता प्रताप सरनाईक पर उनकी कंपनियों और एक सुरक्षा फर्म के बीच कथित अनियमितताओं को लेकर प्रवर्तन निदेशालय ने कार्रवाई की. नवंबर 2020 में प्रवर्तन निदेशालय ने मुंबई की आर्थिक अपराध शाखा की प्राथमिकी के आधार पर छापेमारी की.
जनवरी 2021 में आर्थिक अपराध शाखा ने समापन रिपोर्ट दाखिल की. जून 2021 में सरनाईक ने तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को पत्र लिखकर भाजपा से समझौते की सलाह दी और कहा कि वे प्रवर्तन निदेशालय की “प्रताड़ना” झेल रहे हैं.
जून 2022 में शिवसेना टूटने पर वे एकनाथ शिंदे गुट के साथ भाजपा-समर्थित एनडीए में चले गए. सितंबर 2022 में अदालत ने समापन रिपोर्ट स्वीकार कर ली, जिससे प्रवर्तन निदेशालय का मामला लगभग निष्प्रभावी हो गया. फिलहाल एक अन्य मामले में जांच जारी है, लेकिन इस केस में कार्रवाई लगभग ठंडी पड़ चुकी है.
हिमंत बिस्वा सरमा (असम)
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा जब कांग्रेस में थे, तब उन पर शारदा चिटफंड घोटाले में संलिप्तता के आरोप लगे थे. वर्ष 2014 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने उनके आवास और कार्यालयों पर छापेमारी की थी. नवंबर 2014 में उनसे पूछताछ भी की गई.
इसके बाद उनका नाम 2015 में उनका नाम लुई बर्जर रिश्वत मामले में भी आया. इस मामले में राज्य पुलिस की जांच पर सवाल उठे थे. हालांकि अगस्त 2015 में ही हिमंत बिस्वा सरमा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो चुके थे. इसके बाद दोनों मामलों में कोई बड़ी प्रगति सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई. इसके बाद मामला खुला तो रहा, लेकिन जांच में कोई बड़ी प्रगति नहीं दिखी. आज वे भाजपा के सबसे शक्तिशाली मुख्यमंत्रियों में गिने जाते हैं.
हसन मुश्रीफ (महाराष्ट्र)
एनसीपी नेता हसन मुश्रीफ पर कोल्हापुर की सर सेनापति संताजी घोरपड़े शुगर फैक्ट्री में कथित धनशोधन और किसानों के पैसे के दुरुपयोग का आरोप लगा.
फरवरी और मार्च 2023 में प्रवर्तन निदेशालय ने लगातार तीन बार उनके ठिकानों पर छापेमारी की. एजेंसी का आरोप था कि हजारों किसानों से पूंजी के नाम पर धन जुटाया गया, लेकिन उन्हें शेयर प्रमाणपत्र नहीं दिए गए और यह पैसा कथित रूप से शेल कंपनियों के जरिए परिवार और करीबी रिश्तेदारों से जुड़ी संस्थाओं तक पहुंचाया गया.
जुलाई 2023 में हसन मुश्रीफ अजित पवार के साथ भाजपा-समर्थित एनडीए में शामिल हो गए. इसके बाद न तो कोई नई छापेमारी हुई और न ही जांच में कोई विशेष तेजी दिखाई दी. मामला तकनीकी रूप से खुला है, लेकिन कार्रवाई की रफ्तार लगभग ठहर चुकी है.
भावना गवली (महाराष्ट्र)
शिवसेना सांसद भावना गवली पर एक ट्रस्ट से करोड़ों रुपये के कथित गबन और धनशोधन का मामला सामने आया. यह मामला यवतमाल-वाशिम क्षेत्र के एक ट्रस्ट से जुड़ी वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित था, जिसमें लगभग 17 करोड़ रुपये तक की गड़बड़ी की बात कही गई.
अगस्त 2021 में प्रवर्तन निदेशालय ने उनके ठिकानों पर छापेमारी की. सितंबर 2021 में उनके करीबी सहयोगी सईद खान को गिरफ्तार किया गया. नवंबर 2021 में प्रवर्तन निदेशालय ने ट्रस्ट और सहयोगी के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया. एजेंसी ने मुंबई में लगभग 3.75 करोड़ रुपये की एक कार्यालय इमारत भी जब्त की, जिसे इस मामले से जुड़ा बताया गया.
जून 2022 में शिवसेना टूटने के बाद भावना गवली एकनाथ शिंदे गुट के साथ भाजपा-समर्थित एनडीए में शामिल हो गईं. इसके बाद इस मामले में कोई पूरक आरोपपत्र दाखिल नहीं हुआ.
सुवेंदु अधिकारी (पश्चिम बंगाल)
पश्चिम बंगाल के नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी नारदा स्टिंग ऑपरेशन मामले के प्रमुख आरोपियों में गिने जाते हैं. इस मामले में कई तृणमूल कांग्रेस नेताओं पर आरोप था कि वे एक कथित फर्जी कंपनी को लाभ पहुंचाने के बदले नकद राशि लेते या उस पर बातचीत करते कैमरे में दिखाई दिए थे.
अप्रैल 2017 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने इस मामले में प्राथमिकी दर्ज की. अप्रैल 2019 में सीबीआई ने लोकसभा स्पीकर से अभियोजन की मंजूरी मांगी, क्योंकि कथित घटना के समय सुवेंदु अधिकारी लोकसभा सांसद थे.
दिसंबर 2020 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया. इसके बाद मामला कानूनी रूप से खुला रहा, लेकिन अभियोजन की मंजूरी अब तक लंबित है. फाइल वर्षों से स्पीकर की मेज पर अटकी हुई है और जांच में कोई निर्णायक प्रगति नहीं दिखी.
अशोक चव्हाण (महाराष्ट्र)
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाले के प्रमुख आरोपियों में रहे हैं. यह मामला मुंबई की आदर्श कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी में फ्लैट आवंटन और निर्माण नियमों में कथित अनियमितताओं से जुड़ा था.
दिसंबर 2011 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने अशोक चव्हाण के खिलाफ मामला दर्ज किया. आरोप था कि मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने अतिरिक्त फ्लोर स्पेस इंडेक्स को मंजूरी दी और बदले में अपने रिश्तेदारों के लिए दो फ्लैट सुनिश्चित किए. जुलाई 2012 में सीबीआई ने आरोपपत्र दाखिल किया. इसके आधार पर प्रवर्तन निदेशालय ने भी धनशोधन की जांच शुरू की और उनसे पूछताछ की. जनवरी 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कार्यवाही पर रोक लगा दी, जिससे मुकदमे की रफ्तार धीमी पड़ गई.
फरवरी 2024 में अशोक चव्हाण कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. इसके बाद उन्हें राज्यसभा भेजा गया. फिलहाल मुकदमे पर रोक जारी है और जांच की दिशा को लेकर राजनीतिक सवाल लगातार उठते रहे हैं.
नवीन जिंदल (हरियाणा)
उद्योगपति और पूर्व कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल का नाम कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में प्रमुख रूप से सामने आया. उन पर आरोप था कि कोयला खदानों के आवंटन में अनियमितताओं के जरिए लाभ प्राप्त किया गया.
जून 2013 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने कोल ब्लॉक आवंटन मामले में उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की. वर्ष 2016 और 2017 में उन्हें दो अलग-अलग मामलों में आरोपपत्र का सामना करना पड़ा. इन मामलों में आरोप था कि गलत जानकारी और प्रभाव का उपयोग कर कोयला ब्लॉकों का लाभ लिया गया.
प्रवर्तन निदेशालय ने भी धनशोधन के आरोपों की जांच शुरू की और आरोपपत्र दाखिल किया. अप्रैल 2022 में प्रवर्तन निदेशालय ने विदेशी मुद्रा उल्लंघन से जुड़े एक नए मामले में जिंदल स्टील एंड पावर तथा नवीन जिंदल के ठिकानों पर छापेमारी की.
मार्च 2024 में नवीन जिंदल कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. इसके बाद वे भाजपा के उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में उतरे. मामले तकनीकी रूप से अब भी खुले हैं, लेकिन गति धीमी है.
बाबा सिद्दीकी (महाराष्ट्र)
मुंबई के वरिष्ठ नेता रहे दिवंगत बाबा सिद्दीकी के खिलाफ स्लम पुनर्विकास परियोजना से जुड़ी कथित अनियमितताओं को लेकर प्रवर्तन निदेशालय की जांच शुरू हुई. आरोप था कि इस परियोजना में वित्तीय गड़बड़ी और नियमों के उल्लंघन के जरिए बड़े पैमाने पर लाभ पहुंचाया गया.
मई 2017 में प्रवर्तन निदेशालय ने बाबा सिद्दीकी से जुड़े परिसरों पर छापेमारी की. वर्ष 2018 में एजेंसी ने इस मामले से जुड़े एक डेवलपर की 450 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति जब्त की. यह मामला मुंबई के एक बड़े स्लम पुनर्विकास प्रोजेक्ट से जुड़ा बताया गया.
फरवरी 2024 में बाबा सिद्दीकी कांग्रेस छोड़कर अजित पवार गुट की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए, जो भाजपा-समर्थित एनडीए का हिस्सा थी. इसके बाद जांच औपचारिक रूप से जारी रही, लेकिन कार्रवाई की गति को लेकर सवाल लगातार उठते रहे.
दिगंबर कामत (गोवा)
गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री दिगंबर कामत का नाम लुई बर्जर जल परियोजना घोटाले और अवैध खनन से जुड़े मामलों में सामने आया. उन पर आरोप था कि जल परियोजना के ठेकों और अन्य प्रशासनिक फैसलों में अनियमितताएं हुईं.
वर्ष 2015 में प्रवर्तन निदेशालय ने लुई बर्जर मामले में उनके घर पर छापेमारी की. बाद में एजेंसी ने उनकी और एनसीपी नेता चर्चिल अलेमाओ से जुड़ी करीब 2 करोड़ रुपये की संपत्तियां भी जब्त कीं. जुलाई 2021 में अदालत ने मामले में आरोप तय किए.
सितंबर 2022 में दिगंबर कामत कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए और अपने साथ कई विधायकों को भी ले गए. इसके बाद मामला कानूनी रूप से जारी रहा, लेकिन राजनीतिक रूप से वे भाजपा के वरिष्ठ विधायक और रणनीतिक चेहरा बन गए.
सी.एम. रमेश (आंध्र प्रदेश)
आंध्र प्रदेश के नेता सी.एम. रमेश का नाम आयकर अनियमितताओं और कथित वित्तीय गड़बड़ियों के मामलों में सामने आया. आरोप था कि उनकी कंपनी से जुड़े परिसरों में लगभग 100 करोड़ रुपये की अनियमितताओं के संकेत मिले.
अक्टूबर 2018 में आयकर विभाग ने उनके ठिकानों पर छापेमारी की. इसके बाद वे उन नेताओं में शामिल थे, जिनके खिलाफ भाजपा सांसद जीवीएल नरसिम्हा राव ने संसद की आचार समिति को शिकायत भेजी थी.
जून 2019 में सी.एम. रमेश तेलुगु देशम पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए. इसके बाद मामले में कोई बड़ी कार्रवाई सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई. आज वे भाजपा के महत्वपूर्ण दक्षिण भारतीय चेहरों में गिने जाते हैं.
गीता कोड़ा (झारखंड)
झारखंड की नेता गीता कोड़ा का नाम सीधे किसी बड़े घोटाले में नहीं, बल्कि उनके पति और पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा से जुड़े मामलों के कारण चर्चा में रहा. मधु कोड़ा पर खनन घोटाला, आय से अधिक संपत्ति और कोल ब्लॉक आवंटन जैसे मामलों में केंद्रीय एजेंसियों की जांच चलती रही.
सितंबर 2012 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने मधु कोड़ा के खिलाफ कोयला ब्लॉक मामले में प्राथमिकी दर्ज की. दिसंबर 2014 में आरोपपत्र दाखिल हुआ. दिसंबर 2017 में उन्हें सजा सुनाई गई, हालांकि जनवरी 2018 में सजा पर रोक मिल गई.
फरवरी 2024 में गीता कोड़ा कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गईं. इसके बाद वे भाजपा की प्रमुख आदिवासी महिला चेहरों में शामिल हो गईं. जांच अभी भी अन्य मामलों में जारी है, लेकिन राजनीतिक रूप से उनका स्थान मजबूत हुआ.
संजय सेठ (उत्तर प्रदेश)
उत्तर प्रदेश के कारोबारी और नेता संजय सेठ लंबे समय तक समाजवादी पार्टी से जुड़े रहे. उन पर आय से अधिक संपत्ति, बिल्डर नेटवर्क और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े आरोप लगते रहे.
जून 2015 में आयकर विभाग ने उनकी कंपनी शालीमार कॉर्प से जुड़े परिसरों पर छापेमारी की. इसके बाद वे जांच एजेंसियों की निगरानी में रहे. समाजवादी पार्टी ने उन्हें पहले राज्यसभा भेजा था और वे पार्टी के प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते थे.
अगस्त 2019 में संजय सेठ भाजपा में शामिल हो गए. इसके बाद जांच की रफ्तार धीमी पड़ती दिखी. फरवरी 2024 में भाजपा ने उन्हें उत्तर प्रदेश से राज्यसभा भेजा और बाद में वे केंद्र सरकार में रक्षा राज्य मंत्री बने. यह मामला भी “वाशिंग मशीन” वाले आरोप के प्रमुख उदाहरणों में गिना जाता है.
छगन भुजबल (महाराष्ट्र)
महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेता छगन भुजबल का नाम सार्वजनिक निर्माण विभाग के ठेकों और महाराष्ट्र सदन निर्माण से जुड़े कथित भ्रष्टाचार मामले में प्रमुख रूप से सामने आया. उन पर आरोप था कि मंत्री रहते हुए ठेकों के आवंटन में अनियमितताएं हुईं और इससे करोड़ों रुपये का आर्थिक लाभ पहुंचाया गया.
वर्ष 2015 में महाराष्ट्र की भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने उनके खिलाफ मामला दर्ज किया. इसी के आधार पर प्रवर्तन निदेशालय ने धनशोधन का मामला शुरू किया. मार्च 2016 में प्रवर्तन निदेशालय ने छगन भुजबल को गिरफ्तार किया और अप्रैल 2016 में आरोपपत्र दाखिल किया.
करीब दो वर्ष जेल में रहने के बाद मई 2018 में उन्हें जमानत मिली. इसके बाद उन्हें विदेश यात्रा की अनुमति भी मिली, जिसका प्रवर्तन निदेशालय ने विरोध किया था. सितंबर 2021 में विशेष अदालत से उन्हें राहत मिली और मामले की गति धीमी पड़ने लगी.
जुलाई 2023 में छगन भुजबल अजित पवार गुट के साथ भाजपा-समर्थित एनडीए में शामिल हो गए. नवंबर 2023 में विशेष अदालत ने खुद टिप्पणी की कि मामला ‘घोंघे की चाल’ से आगे बढ़ रहा है. दिसंबर 2023 में प्रवर्तन निदेशालय ने विदेश यात्रा की अनुमति के खिलाफ अपनी याचिका भी वापस ले ली. आज छगन भुजबल महाराष्ट्र सरकार में मंत्री हैं.
मुकुल रॉय (पश्चिम बंगाल)
पश्चिम बंगाल की राजनीति के बड़े चेहरों में गिने जाने वाले मुकुल रॉय लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस के रणनीतिकार रहे. उनका नाम शारदा चिटफंड घोटाले और नारदा स्टिंग ऑपरेशन जैसे चर्चित मामलों में सामने आया, जहां कई नेताओं पर वित्तीय अनियमितताओं और कथित भ्रष्टाचार के आरोप लगे.
शारदा चिटफंड घोटाले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने कई तृणमूल नेताओं से पूछताछ की और मुकुल रॉय से भी जांच एजेंसियों ने सवाल किए. नारदा स्टिंग मामले में भी उनका नाम राजनीतिक बहस के केंद्र में रहा. इन मामलों ने बंगाल की राजनीति में उनकी स्थिति को लगातार दबाव में रखा.
वर्ष 2017 में मुकुल रॉय ने तृणमूल कांग्रेस छोड़ दी और बाद में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. भाजपा में आने के बाद वे पश्चिम बंगाल में पार्टी के बड़े रणनीतिक चेहरों में शामिल हुए और संगठन विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
इसके बाद जांच के मामलों में कोई विशेष आक्रामकता दिखाई नहीं दी. न तो कार्रवाई की गति पहले जैसी रही और न ही कोई बड़ा कानूनी मोड़ सामने आया.
यामिनी और यशवंत जाधव (महाराष्ट्र)
शिवसेना विधायक यामिनी जाधव और उनके पति यशवंत जाधव कई केंद्रीय एजेंसियों की जांच के दायरे में आए. उन पर विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम के उल्लंघन, संदिग्ध कंपनियों से असुरक्षित ऋण लेने और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे.
फरवरी 2022 में आयकर विभाग ने उनके ठिकानों पर छापेमारी की. मई 2022 में प्रवर्तन निदेशालय ने मामला दर्ज कर यशवंत जाधव को पूछताछ के लिए तलब किया. जांच में परिवार से जुड़ी कई कंपनियों और संपत्तियों की पड़ताल हुई.
जून 2022 में शिवसेना टूटने के बाद यामिनी जाधव एकनाथ शिंदे गुट के साथ भाजपा-समर्थित एनडीए में शामिल हो गईं. इसके बाद मामले में कोई बड़ी प्रगति सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई. जांच औपचारिक रूप से जारी रही, लेकिन कार्रवाई की रफ्तार काफी धीमी पड़ गई.
रणिंदर सिंह (पंजाब)
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के बेटे रणिंदर सिंह पर विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम से जुड़े मामलों में प्रवर्तन निदेशालय की जांच चली. यह मामला आयकर विभाग की जांच के आधार पर आगे बढ़ा था.
वर्ष 2016 से एजेंसियां उनसे पूछताछ कर रही थीं. नवंबर 2020 में प्रवर्तन निदेशालय ने उनसे फिर पूछताछ की. इसी दौरान अमरिंदर सिंह का कांग्रेस से टकराव बढ़ा.
नवंबर 2021 में अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस छोड़ दी और सितंबर 2022 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. इसके बाद रणिंदर सिंह से जुड़े मामले में कोई बड़ी प्रगति सामने नहीं आई. यह मामला भी “राजनीतिक बदलाव और जांच की रफ्तार” वाले पैटर्न में जोड़ा गया.
के. गीता (आंध्र प्रदेश)
आंध्र प्रदेश की नेता के. गीता और उनके पति पर बैंक धोखाधड़ी का गंभीर मामला दर्ज हुआ. केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने आरोप लगाया कि उनकी कंपनी ने पंजाब नेशनल बैंक से लगभग 42 करोड़ रुपये का ऋण गलत जानकारी देकर लिया और बाद में चूक की.
जून 2015 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने आरोपपत्र दाखिल किया. सितंबर 2022 में विशेष अदालत ने दोनों को पांच साल की सजा सुनाई. बाद में तेलंगाना हाईकोर्ट ने सजा पर रोक लगाते हुए जमानत दे दी.
वर्ष 2019 में के. गीता भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गईं. मार्च 2024 में अदालत ने दोषसिद्धि पर भी रोक लगा दी, लेकिन केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने अब तक उस आदेश को चुनौती नहीं दी. इस मामले को भी जांच की धीमी रफ्तार के उदाहरण के रूप में देखा गया.
सोवन चटर्जी (पश्चिम बंगाल)
कोलकाता के पूर्व मेयर सोवन चटर्जी नारदा स्टिंग ऑपरेशन और शारदा चिटफंड मामले में जांच के घेरे में रहे. उन पर कथित रिश्वत और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े आरोप लगे.
अप्रैल 2017 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने प्राथमिकी दर्ज की. अगस्त 2019 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा जॉइन की. कुछ समय तक जांच में कोई विशेष तेजी नहीं दिखी.
लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले जब उन्हें टिकट नहीं मिला, तो उन्होंने भाजपा छोड़ दी. इसके तुरंत बाद मई 2021 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने उन्हें नारदा मामले में गिरफ्तार कर लिया. बाद में उन्हें जमानत मिल गई. उनका मामला इस नैरेटिव का उल्टा उदाहरण माना जाता है.
कृपाशंकर सिंह (महाराष्ट्र)
मुंबई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह पर आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज हुआ. आरोप था कि उन्होंने अपने ज्ञात आय स्रोतों से कहीं अधिक संपत्ति अर्जित की.
वर्ष 2012 में महाराष्ट्र पुलिस ने मामला दर्ज किया, जिसके आधार पर प्रवर्तन निदेशालय ने भी धनशोधन की जांच शुरू की. 2015 में आरोपपत्र दाखिल हुआ, जिसमें लगभग 95 करोड़ रुपये की संपत्ति का उल्लेख था.
फरवरी 2018 में अदालत ने अभियोजन की मंजूरी न होने के कारण उन्हें राहत दे दी. सितंबर 2019 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और जुलाई 2021 में भाजपा में शामिल हो गए. इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय का मामला लगभग निष्प्रभावी हो गया.
तपस रॉय (पश्चिम बंगाल)
पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ नेता तपस रॉय का नाम कोलकाता नगर निकाय भर्ती घोटाले से जुड़े धनशोधन मामले में सामने आया. आरोप था कि नियुक्तियों में अनियमितताओं के जरिए आर्थिक लाभ पहुंचाया गया.
जनवरी 2024 में प्रवर्तन निदेशालय ने उनके घर पर छापेमारी की. यह कार्रवाई राजनीतिक रूप से काफी चर्चित रही. कुछ ही हफ्तों बाद मार्च 2024 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया.
भाजपा ने उन्हें जल्द ही कोलकाता उत्तर से उम्मीदवार बना दिया. जांच तकनीकी रूप से जारी रही, लेकिन राजनीतिक संदेश स्पष्ट माना गया.
अर्चना पाटिल (महाराष्ट्र)
महाराष्ट्र की नेता अर्चना पाटिल का नाम सीधे किसी बड़े घोटाले में नहीं था, लेकिन उनके पति शैलेश पाटिल की कंपनी पर आयकर विभाग की कार्रवाई हुई थी. शैलेश, पूर्व केंद्रीय मंत्री शिवराज पाटिल के बेटे हैं.
अप्रैल 2017 में आयकर विभाग ने कंपनी से जुड़े परिसरों पर छापेमारी की. लंबे समय तक मामला जांच के दायरे में रहा.
फरवरी 2024 में आयकर अपीलीय अधिकरण ने कहा कि छापेमारी में कोई ठोस आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली, इसलिए नए कर दावे उचित नहीं हैं. इसके कुछ ही समय बाद मार्च 2024 में अर्चना पाटिल भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गईं. इसके बाद उन्हें चुनावी राजनीति में नई भूमिका मिली.
ज्योति मिर्धा और सुजाना चौधरी : “वाशिंग मशीन” पूरी तरह काम नहीं आई
भाजपा की “वाशिंग मशीन” वाले नैरेटिव में ज्योति मिर्धा और वाईएस “सुजाना” चौधरी दो ऐसे नाम माने जाते हैं, जहां पार्टी बदलने के बावजूद जांच में स्पष्ट राहत दिखाई नहीं दी.
ज्योति मिर्धा वर्ष 2023 में कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुईं. उनका नाम सीधे किसी मामले में नहीं था, लेकिन इंडियाबुल्स, यस बैंक और शेयर मूल्य कृत्रिम रूप से बढ़ाने जैसे मामलों में उनके रिश्तेदारों, खासकर इंडियाबुल्स प्रमोटर समीर गहलौत, पर प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई जारी रही. मार्च 2020 से लेकर 2024 तक एजेंसी की जांच लगातार चलती रही और फरवरी 2024 में भी छापेमारी हुई.
इसी तरह वाईएस “सुजाना” चौधरी 2019 में तेलुगु देशम पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए. उन पर बेस्ट एंड क्रॉम्पटन इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स लिमिटेड से जुड़े बैंक धोखाधड़ी के मामले में आरोप लगे. जांच एजेंसियों के अनुसार उनकी कंपनी ने बैंकों के समूह से 360 करोड़ रुपये से अधिक का ऋण लेकर कथित रूप से धोखाधड़ी की और चूक की. प्रवर्तन निदेशालय ने 2016 में मामला दर्ज किया, 2018 में छापेमारी की और 2019 में संपत्तियां जब्त कीं. भाजपा में शामिल होने के बाद भी आरोपपत्र कायम रहा और मामला ट्रायल तक पहुंच गया. इसी वजह से इन दोनों नामों को अक्सर उन अपवादों के रूप में गिना जाता है, जहां पार्टी बदलने के बावजूद जांच की धार पूरी तरह कम नहीं हुई.
आख़िर में सवाल सिर्फ भाजपा, ईडी या सीबीआई का नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता का है. अगर जांच एजेंसियों की कार्रवाई राजनीतिक निष्ठा बदलते ही धीमी पड़ती दिखे, तो संदेह स्वाभाविक रूप से गहराता है. और अगर यह सिर्फ संयोग है, तो भी उसका सबसे बड़ा नुकसान संस्थाओं की साख को ही होता है.
‘भाजपा की वाशिंग मशीन’ एक राजनीतिक जुमला भर नहीं रह गया है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में सत्ता, जांच और अवसरवाद के रिश्ते का प्रतीक बन चुका है. विपक्ष इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताता है, जबकि भाजपा इसे अपने खिलाफ गढ़ा गया नैरेटिव कहती है. लेकिन जनता की नज़र में सवाल अब भी वही है क्या कानून सबके लिए बराबर है, या सत्ता बदलते ही न्याय का रंग भी बदल जाता है?
इसी मुद्दे पर ‘टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश’ के लाइव शो में पत्रकार राजेश चतुर्वेदी के साथ वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी ने विस्तार से चर्चा की है.
रूस और ईरान से तेल खरीद पर मेरी टिप्पणी गलत थी: विवाद के बाद राम माधव पलटे
अमेरिका के प्रतिबंधों की धमकी के आगे भारत द्वारा झुकने और रूस व ईरान से तेल खरीद बंद करने तथा अमेरिकी टैरिफ वृद्धि को स्वीकार करने संबंधी अपने बयान के कुछ ही घंटों बाद, भाजपा और आरएसएस के वरिष्ठ नेता राम माधव ने अपना बयान वापस ले लिया. उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणियाँ “तथ्यात्मक रूप से गलत” थीं.
‘द हिंदू’ ब्यूरो के अनुसार, वाशिंगटन में हडसन इंस्टीट्यूट के “न्यू इंडिया कॉन्फ्रेंस” में दिए गए इन बयानों के दौरान भारत और अमेरिका के वक्ताओं के बीच तीखी बहस हुई थी, जिसमें भारत-अमेरिका संबंधों की वर्तमान समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किया गया था. रूस से तेल की खरीद और मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) की वार्ता मुख्य विषय थे. भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत केनेथ जस्टर ने रूस से “बहुत अधिक तेल” खरीदने के लिए भारत की आलोचना की, जबकि भारतीय विपक्षी नेता और शिवसेना (यूबीटी) की पूर्व सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि ऊर्जा खरीदना भारत का “स्वायत्त” निर्णय है और इसे एफटीए वार्ता का हिस्सा नहीं होना चाहिए.
एक अमेरिकी विशेषज्ञ, जिन्होंने कहा था कि भारत और अमेरिका दोनों को विश्वास बहाली और आपसी चिंताओं पर मिलकर काम करने की आवश्यकता है, उन्हें जवाब देते हुए माधव ने पूछा, “हम कहाँ पीछे रहे हैं?” उन्होंने आगे कहा, “हमने (भारत) ईरान से तेल खरीदना बंद करने पर सहमति जताई, हमने भारतीय विपक्ष की भारी आलोचना के बावजूद रूस से तेल खरीदना बंद करने पर सहमति जताई.” उन्होंने यह भी कहा कि नई दिल्ली ने भारतीय वस्तुओं पर अमेरिका के 50% टैरिफ (जिसे बाद में घटाकर 18% कर दिया गया) पर भी धैर्य बनाए रखा, जबकि ये दोनों दरें पिछली दरों से अधिक हैं.
कुछ घंटों बाद सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के माध्यम से माधव ने कहा कि जो उन्होंने कहा था वह गलत था. उन्होंने स्पष्ट किया, “भारत कभी भी रूस से तेल आयात बंद करने पर सहमत नहीं हुआ. साथ ही, उसने 50% टैरिफ लगाए जाने का भी कड़ा विरोध किया था.” उन्होंने आगे जोड़ा कि वह दूसरे पैनलिस्ट की बात का जवाब दे रहे थे, लेकिन उनके द्वारा कही गई बातें तथ्यात्मक रूप से गलत थीं.
जब एक अलग चर्चा में पूछा गया कि भारतीय विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बीच टेलीफोन पर बातचीत के बाद घोषित ‘भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते’ का विरोध क्यों किया था, तो चतुर्वेदी ने कहा कि विपक्ष ने अमेरिकी राष्ट्रपति के इस दावे पर आपत्ति जताई थी कि भारत एफटीए वार्ताओं के हिस्से के रूप में रूसी तेल “छोड़ने” के लिए सहमत हो गया है. इसके अलावा बाजार पहुंच, कृषि और अमेरिका में अनिवार्य निवेश जैसे विवरणों पर भी आपत्तियाँ थीं. उन्होंने कहा, “यह हमारा स्वायत्त निर्णय है और यह कुछ ऐसा है जिसे भारत को अपनी घरेलू ऊर्जा सुरक्षा जरूरतों के संदर्भ में तय करना चाहिए.”
अपने बयानों में जस्टर ने कहा कि अमेरिका ने पिछले साल अगस्त में भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद पर 25% दंड (पेनल्टी) लगाया था. यह कदम ट्रम्प के उस दावे के बाद संबंधों में आए तनाव के बाद उठाया गया था, जिसमें उन्होंने भारत-पाकिस्तान संघर्ष में मध्यस्थता करने की बात कही थी. उन्होंने सुझाव दिया कि भारत को यह “पहचानना चाहिए था कि भारत और पाकिस्तान के बीच संकट को कम करने में अमेरिका की कुछ भूमिका है.”
वर्ष 2017-2021 तक भारत में राजदूत रहे जस्टर ने यह भी कहा कि यूक्रेन में रूस द्वारा युद्ध जारी रखने के मद्देनजर, एक विश्व नेता के रूप में भारत के लिए रूसी तेल का भारी मात्रा में आयात जारी रखना “अच्छा नहीं था”. उन्होंने कहा, “किसी भी स्थिति में राष्ट्रपति ट्रम्प इससे खुश नहीं थे क्योंकि भारत एक बार फिर रूस से बहुत अधिक तेल खरीद रहा था, जो उसके कुल आयात के 1% से बढ़कर 33% तक पहुँच गया था, हालाँकि आर्थिक स्थितियाँ इसे कम करने के लिए बदल रही थीं.”
विदेश मंत्रालय ने अमेरिका में आयोजित इस सम्मेलन के दौरान की गई टिप्पणियों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, जिसमें आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले और भाजपा के विदेश विभाग के प्रभारी विजय चौथाईवाले भी वक्ताओं में शामिल थे.
यद्यपि अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों की धमकी दिए जाने के बाद, भारत ने 2019 में ईरान से अपना तेल आयात घटाकर शून्य कर दिया था और नवंबर 2024 से फरवरी 2025 के बीच रूसी तेल के आयात को आधा कर दिया था, लेकिन विदेश मंत्रालय ने हमेशा यही रुख बनाए रखा है कि भारत की ऊर्जा खरीद “राष्ट्रीय हित” से प्रेरित होती है.
जर्मनी: पनडुब्बी में प्रवेश करते समय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह फिसले, वीडियो हुआ वायरल
जर्मनी की तीन दिवसीय यात्रा पर पहुंचे भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह एक आधिकारिक दौरे के दौरान पनडुब्बी में प्रवेश करते समय फिसल गए. यह क्षण कैमरे में कैद हो गया और सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया. इसके बाद यूज़र्स ने राजनाथ सिंह और भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर तंज़ कसना शुरू कर दिया. जगदीश कौशिक नामक एक यूज़र ने लिखा, “हे भगवान! उस पनडुब्बी में पहले नींबू-मिर्च क्यों नहीं बांधा! जरूर यह नेहरू जी की कारस्तानी है!! अपनी यात्रा के अंतिम दिन, रक्षा मंत्री ने थायसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (टीकेएमएस) शिपयार्ड का दौरा किया, जहाँ उन्होंने टाइप 212 पनडुब्बी का निरीक्षण किया. व्यापक रूप से प्रसारित एक वीडियो में, राजनाथ सिंह को पनडुब्बी में प्रवेश करते समय संघर्ष करते हुए देखा जा सकता है और संकरे रास्ते के कारण वे असहज नजर आए. खबरों के मुताबिक, इस प्रयास के दौरान वे फिसल गए, जिसके बाद चालक दल के सदस्यों ने उन्हें बाहर निकलने में मदद की.
इससे पहले, उन्होंने 21 से 23 अप्रैल तक जर्मनी की तीन दिवसीय आधिकारिक यात्रा की, जिसके दौरान भारत और जर्मनी ने रक्षा औद्योगिक सहयोग और संयुक्त राष्ट्र शांति सेना प्रशिक्षण में सहयोग के समझौतों पर हस्ताक्षर किए.
कविता ने ‘तेलंगाना राष्ट्र सेना’ लॉन्च की, राज्य के भविष्य को संवारने का लक्ष्य
तेलंगाना जागृति के सदस्यों, युवाओं, महिलाओं, एससीसीएल श्रमिकों और तेलंगाना के शहीदों के परिजनों की एक विशाल सभा के उत्साह के बीच, तेलंगाना जागृति की अध्यक्ष कलवकुंतला कविता ने शनिवार (25 अप्रैल, 2026) को अपने नए राजनीतिक दल, तेलंगाना राष्ट्र सेना (टीआरएस) की घोषणा की. पार्टी का शुभारंभ मेडचल-मलकाजगिरी जिले में मुनीराबाद के बाहरी इलाके में स्थित एक कन्वेंशन सेंटर में किया गया.
पी. लक्ष्मा रेड्डी के अनुसार, इस घोषणा के साथ ही सभा में जश्न का माहौल बन गया; कविता द्वारा आत्मविश्वास के साथ पार्टी के नाम का अनावरण करते ही भीड़ तालियों और पटाखों की गूँज के साथ झूम उठी. समर्थकों ने उन्हें “सीएम” (मुख्यमंत्री) और “तेलंगाना टाइगर” बताते हुए नारे लगाए, जिससे आयोजन स्थल का माहौल और भी जोशपूर्ण हो गया. ‘टीआरएस’ नाम के चयन ने मीडिया कर्मियों सहित कई लोगों को चौंका दिया, क्योंकि पहले ऐसे संकेत थे कि पार्टी का नाम ‘तेलंगाना प्रजा जागृति’ रखा जा सकता है. यह नाम उनके पिता और पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव द्वारा स्थापित पूर्ववर्ती ‘तेलंगाना राष्ट्र समिति’ की याद दिलाता है, जिसे सभा ने भारी समर्थन दिया.
सभा को संबोधित करते हुए कविता ने कहा, “आज तेलंगाना में एक ऐतिहासिक दिन है. यह मेरे जीवन का भी एक अविस्मरणीय दिन रहेगा. ईश्वर और समय ने हम सभी को इस ऐतिहासिक क्षण का हिस्सा बनाया है जो तेलंगाना को अपना भविष्य लिखने में मदद करेगा.”
तेलंगाना जागृति के साथ अपने जुड़ाव पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने राज्य की सांस्कृतिक पहचान को बढ़ावा देने में संगठन की भूमिका पर जोर दिया. पार्टी की वैचारिक दिशा को रेखांकित करते हुए कविता ने कहा कि यह संवैधानिक मूल्यों पर आधारित “सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण तेलंगाना” के निर्माण के लिए सामाजिक आंदोलनों को राजनीतिक शक्ति के साथ जोड़ने का प्रयास करेगी. उन्होंने चाकली ऐलम्मा और कोंडा लक्ष्मण बापूजी जैसे नेताओं को अपनी प्रेरणा बताया और कहा कि राज्य के संघर्ष का इतिहास पार्टी का मार्गदर्शन करेगा.
विशेष रूप से, इस लॉन्च कार्यक्रम में बीआरएस या अन्य राजनीतिक दलों के किसी भी वरिष्ठ नेता की अनुपस्थिति चर्चा का विषय रही.
घोषणा के बाद, कार्यकर्ताओं और मेहमानों को पारंपरिक तेलंगाना भोजन परोसा गया, जिसमें 34 व्यंजनों का विस्तृत मेन्यू शामिल था.
बंगाल के परिणाम भारतीय चुनावी लोकतंत्र का भविष्य तय करेंगे
वर्ष 2021 में, स्वीडन स्थित वी-डेम संस्थान ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें पहली बार भारत को एक लोकतंत्र के रूप में नहीं, बल्कि एक “चुनावी तानाशाही” के रूप में वर्णित किया गया था. वी-डेम की परिभाषा के अनुसार, चुनावी तानाशाही एक ऐसा देश, जहाँ बहु-दलीय चुनाव तो होते हैं, लेकिन वे त्रुटिपूर्ण होते हैं. इसके अतिरिक्त, राज्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की स्वतंत्रता पर महत्वपूर्ण प्रतिबंध लगाता है.
विशेष रूप से, वी-डेम का मानना था कि जहाँ चुनावों की निष्पक्षता पर “कड़ा प्रहार” हुआ है, वहीं लोकतंत्र के इन उदारवादी पहलुओं (स्वतंत्रता) में गिरावट ही वह मुख्य कारण है जिसने उनके डेटा सेट में मोदी के भारत को एक चुनावी तानाशाही में बदल दिया है.
‘स्क्रॉल’ में शोएब दानियाल की रिपोर्ट कहती है कि पाँच साल बाद, जब पश्चिम बंगाल राज्य में चुनाव हो रहे हैं, यह स्पष्ट है कि मोदी के भारत ने अब इन दो तत्वों के बीच संतुलन बना लिया है: यानी अब चुनावों के संचालन के स्तर में भी भारी गिरावट आई है.
तर्कहीन विसंगतियाँ
चुनावों से ठीक पहले, भारतीय चुनाव आयोग ने राज्य में एक ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) किया. प्रत्येक मतदाता के अस्तित्व को सत्यापित करने के प्रयास में, यह अभ्यास बेहद व्यापक था और स्वतंत्र भारत में पहले कभी नहीं देखे गए पैमाने पर आयोजित किया गया था.
इसके शुरू होने से पहले ही इस बात पर संदेह जताया गया था कि चुनावों से ठीक पहले इतना व्यापक अभ्यास क्यों किया जा रहा है. यह सब उन आशंकाओं के बीच हुआ कि चुनाव आयोग मोदी सरकार के दबाव में है, विशेषकर एक नए कानून के बाद जिसने केंद्र सरकार को चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का प्रभार दे दिया है.
इन शंकाओं के बावजूद, पश्चिम बंगाल में ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ का पहला चरण काफी मजबूत कार्यप्रणाली का उपयोग करके संचालित किया गया था. चुनाव आयोग ने मतदाताओं का मिलान 2002 की मतदाता सूची से किया, ताकि यह पता लगाया जा सके कि किन लोगों की मृत्यु हो गई है, कौन स्थानांतरित हो गए हैं या किनके पास अन्य राज्यों के वोटर आईडी कार्ड हैं.
एकमात्र समस्या यह थी कि इस वस्तुनिष्ठ कार्यप्रणाली के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में ऐसे लोग बाहर हो गए जो सामान्यतः भारतीय जनता पार्टी को वोट देते थे. 2002 की मतदाता सूची से मिलान की प्रक्रिया का अर्थ था कि कई बांग्लादेशी हिंदू प्रवासियों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासियों को भी बाहर कर दिया गया.
इसके बाद, चुनाव आयोग ने कुछ असाधारण किया. उसने विशेष रूप से पश्चिम बंगाल के लिए एक तथाकथित ‘तार्किक विसंगति परीक्षण’ ईजाद किया – इसका उपयोग पहले अन्य राज्यों में नहीं किया गया था. विडंबना यह थी कि इस परीक्षण में तार्किक जैसा कुछ बहुत कम ही प्रतीत हो रहा था. माता-पिता के नाम में वर्तनी की गलतियाँ, माता-पिता के साथ आयु का अंतर बहुत कम या बहुत अधिक होना, दादा-दादी के साथ आयु का पर्याप्त अंतर न होना या छह से अधिक बच्चे होना—इन सभी को चुनाव आयोग द्वारा तथाकथित ‘तार्किक विसंगतियाँ’ माना गया.
आयोग ने कभी भी इसके पीछे के तर्क की व्याख्या नहीं की कि बच्चों की एक निश्चित संख्या होने या दस्तावेजों में वर्तनी की गलतियों के कारण कोई व्यक्ति वोट देने के लिए अयोग्य कैसे हो जाता है.
चुनाव आयोग के इस नए फिल्टर का परिणाम चौंकाने वाला था: विशेष गहन पुनरीक्षण ने अब लगभग 30 लाख (तीन मिलियन) मतदाताओं को बाहर कर दिया, जिनमें से अधिकांश मुस्लिम थे. अब तक सामने आए सभी साक्ष्य दिखाते हैं कि इन निष्कासनों के पीछे कोई ठोस तर्क नहीं था और वे केवल एक ही मानदंड पर आधारित प्रतीत होते थे: धर्म. एक मामले में, एक न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) ने कांग्रेस उम्मीदवार मोताब शेख के निष्कासन को रद्द कर दिया, और यह टिप्पणी की कि चुनाव आयोग यह बताने में असमर्थ था कि उन्हें पहली बार सूची से हटाया ही क्यों गया था.
चूँकि अनुचित रूप से बाहर किए गए ये लगभग सभी मतदाता मुस्लिम हैं, जो आमतौर पर भाजपा को वोट नहीं देते हैं, इसलिए हिंदुत्ववादी पार्टी पश्चिम बंगाल के चुनावों में चुनाव आयोग द्वारा प्रदान किए गए एक अनुचित लेकिन महत्वपूर्ण लाभ के साथ चुनाव मैदान में उतर रही है.
जैसा कि वी-डेम ने उल्लेख किया था, भारत के लोकतांत्रिक पतन का एक बड़ा हिस्सा इस विचार पर आधारित था कि इसकी उदारवादी संस्थाओं को पंगु बनाया जा रहा है. सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि अदालतें सरकार को जवाबदेह ठहराने में असमर्थ रही हैं. प्रेस में भारी गिरावट आई है. वर्षों से, मुख्यधारा के टीवी समाचार चैनल और यहाँ तक कि समाचार पत्र भी सरकार की प्रशंसा करने और अपनी सारी आलोचना सत्ता से बाहर के विपक्ष के लिए सुरक्षित रखने में लगे हुए हैं.
सच्ची कहानी: चुनाव क्षेत्रों का अनुचित हेरफेर का खतरा वास्तविक है; असम में यह पहले ही हो चुका
‘जेरीमेंडरिंग’ राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को इस तरह से फिर से निर्धारित करने की क्रिया है, जिससे सत्ताधारी दल को अपने प्रतिद्वंद्वियों पर स्पष्ट लाभ मिल सके. यह शब्द, जिसकी उत्पत्ति संयुक्त राज्य अमेरिका में हुई थी, पिछले हफ्ते भारत के मुख्यधारा के राजनीतिक विमर्श में तब आया जब मोदी सरकार ने महिला आरक्षण लागू करने के नाम पर ‘जल्द परिसीमन’ पर जोर देने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया था.
वे विधेयक पराजित हो गए. लेकिन जेरीमेंडरिंग का खतरा वास्तविक है, जैसा कि हम असम के मामले से जानते हैं. राज्य ने 2023 में एक परिसीमन अभ्यास देखा जिसने राजनीतिक सीमाओं को इस तरह बदल दिया कि उसके परिणाम बेहद विचित्र रहे: उदाहरण के तौर पर, एक पंचायत का प्रतिनिधित्व अब दो सांसद और तीन विधायक करते हैं.
इसका व्यापक प्रभाव यह हुआ कि राज्य में मुस्लिम प्रतिनिधित्व घट गया और भारतीय जनता पार्टी ने अपने प्रतिद्वंद्वियों पर स्थायी बढ़त हासिल कर ली.
‘ट्रू स्टोरी’ के इस एपिसोड में, ‘स्क्रॉल’ की कार्यकारी संपादक सुप्रिया शर्मा और रिपोर्टर रोकीबुज़ ज़मान असम के निर्वाचन क्षेत्र के मानचित्रों का सूक्ष्मता से विश्लेषण कर रहे हैं, ताकि यह समझाया जा सके कि क्या बदलाव हुआ और कैसे. रिपोर्ट में इस बात पर चिंता व्यक्त की गई है कि चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं निष्पक्ष रहने के बजाय सरकार के एजेंडे को आगे बढ़ा रही हैं.
यदि चौथी बार जीतती हैं तो 2029 में पीएम पद के लिए मजबूत दावेदार बन जाएंगी ममता बनर्जी
स्तंभकार आसिम अली का ‘द टेलीग्राफ’ में प्रकाशित यह लेख बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य का गहन विश्लेषण करता है. अली का मानना है कि राजनीतिक अभियान मूलतः एक ‘थिएटर’ (रंगमंच) की तरह होते हैं. महीने भर के चुनाव प्रचार में, प्रतिद्वंद्वी दलों के नेता प्रतिनिधित्व के अपने दावों को नाटकीय ढंग से प्रस्तुत करके एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं. हाव-भाव, प्रतीकों और वाकपटुता के माध्यम से, जो कोई भी सामूहिक ‘लोक’ (जनता) की पहचान और हितों को सबसे प्रामाणिक रूप से आत्मसात कर पाता है, आमतौर पर जनादेश उसी को मिलता है. इस कसौटी पर, बंगाल की लड़ाई में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने स्पष्ट रूप से भारतीय जनता पार्टी को पछाड़ दिया है. अंग्रेजी में लिखे इस लेख का हिंदी में सारांश इस प्रकार है:
लेखक के अनुसार, ममता बनर्जी ने बंगाल की सांस्कृतिक पहचान—विशेषकर ‘मछली और चावल’ (माछे भाते बंगाली)—को अपने अभियान का केंद्र बनाया. उन्होंने इसे बंगाली उप-राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया और उत्तर भारत में हिंदुत्ववादी समूहों द्वारा खान-पान पर किए गए हमलों को बंगाली संस्कृति के खिलाफ शत्रुता के रूप में पेश किया.
इसके विपरीत, भाजपा इस मुद्दे पर रक्षात्मक दिखी. अनुराग ठाकुर जैसे भाजपा नेताओं द्वारा कैमरों के सामने मछली खाना एक कृत्रिम प्रयास लगा, जिसने उनकी सांस्कृतिक जड़ों की प्रामाणिकता पर और सवाल खड़े कर दिए. यह एक तरह से “पानी से बाहर निकली मछली” की स्थिति है.
अली का तर्क है कि भाजपा के पास ममता बनर्जी के भ्रष्टाचार और उनके “फ्रेंचाइजी मॉडल” (स्थानीय स्तर पर सत्ता के दलालों का वर्चस्व) को उजागर कर सत्ता विरोधी लहर पैदा करने का मौका था. लेकिन भाजपा ने जनता (लोक) के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, सरकारी मशीनरी और राज्य की शक्ति (तंत्र) के उपयोग को अपनी रणनीति का आधार बनाया. अमित शाह के नेतृत्व में केंद्रीय बलों का अभूतपूर्व उपयोग और जांच एजेंसियों का सहारा लिया गया. लेकिन इस ‘तंत्र’ के प्रहार ने ममता बनर्जी को फिर से एक ‘विद्रोही नेता’ की छवि में लौटने का मौका दिया, जो उनके लिए हमेशा राजनीतिक रूप से फायदेमंद रहा है.
लेख के सबसे गंभीर हिस्सों में से एक ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) का मुद्दा है. लेखक का आरोप है कि चुनाव आयोग के माध्यम से लाखों मतदाताओं के नाम हटाना एक पक्षपातपूर्ण कदम था. आंकड़ों के अनुसार, हटाए गए 27 लाख चुनौतीपूर्ण नामों में से लगभग 65% मुस्लिम थे. लेखक इसकी तुलना अमेरिका के ‘जिम क्रो’ कानूनों से करते हैं, जिसका उद्देश्य एक विशेष समुदाय को मताधिकार से वंचित करना था. अली चेतावनी देते हैं कि भारत एक ऐसे लोकतंत्र की ओर बढ़ रहा है जहाँ केवल बहुसंख्यक समुदाय को पूर्ण राजनीतिक अधिकार प्राप्त होंगे, जबकि अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेल दिया जाएगा.
उनके अनुसार, 2026 तक आते-आते नरेंद्र मोदी की ‘परिवर्तनकारी’ छवि धुंधली पड़ गई है. 12 वर्षों के शासन के बाद, बेरोजगारी और औद्योगिक ठहराव जैसे मुद्दों पर वे जनता को आकर्षित करने में विफल रहे हैं. इसके अलावा, भाजपा ने अपने दो प्रमुख नरेटिव खो दिए हैं:
1. स्वच्छ शासन: दागी विपक्षी नेताओं को पार्टी में शामिल करने (जैसे सुवेंदु अधिकारी) से भाजपा की भ्रष्टाचार विरोधी छवि को गहरा धक्का लगा है.
2. डबल इंजन सरकार: उत्तर भारत के राज्यों की स्थिति को देखते हुए ‘डबल इंजन’ का नारा अब एक मजाक जैसा प्रतीत होता है.
जर्मन इतिहासकार रेनहार्ट कोसेलेक के सिद्धांत का उपयोग करते हुए, वह बताते हैं कि आज का मतदाता भविष्य से बहुत बड़ी उम्मीदें नहीं रख रहा है. नकद हस्तांतरण जैसी कल्याणकारी योजनाओं (रेवड़ी संस्कृति) ने ‘अपेक्षा के क्षितिज’ को छोटा कर दिया है. मतदाता केवल उपलब्ध विकल्पों में से कम बुरे को चुन रहा है.
इस लेख का निष्कर्ष यह है कि टीएमसी की संभावित जीत केवल एक राज्य की जीत नहीं होगी, बल्कि यह भाजपा द्वारा संवैधानिक संस्थानों और मताधिकार पर किए गए हमलों के खिलाफ एक ‘आंशिक उद्धार’ होगा. यदि ममता बनर्जी चौथी बार जीतती हैं, तो वे न केवल मोदी-शाह की जोड़ी को सीधे मुकाबले में हराने वाली एक अपराजेय नेता के रूप में उभरेंगी, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए एक बेहद मजबूत दावेदार भी बन जाएंगी. बंगाल का परिणाम केवल एक चुनावी नतीजा नहीं, बल्कि इस बात का फैसला होगा कि भारतीय लोकतंत्र अपनी उदारवादी और समावेशी प्रकृति को बचा पाता है या नहीं.
शहरी चुनावी निर्वासन का संकट: मताधिकार पर मंडराता खतरा
संविधान निर्माता डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने संविधान प्रस्तुत करते समय एक दूरदर्शी विचार रखा था: “एक व्यक्ति, एक वोट के सिद्धांत को अंततः एक व्यक्ति, एक आर्थिक इकाई की ओर ले जाना चाहिए.” हालांकि, दशकों बाद भी यह सपना अधूरा है. आर्थिक खाई कम होने के बजाय और गहरी हुई है. आज गरीबों, प्रवासियों और अल्पसंख्यकों के बढ़ते हाशिएकरण के बीच ‘वयस्क मताधिकार’ की आधारशिला ही संकट में है.
टिप्पणीकार टिकेंदर सिंह पंवार ने ‘द हिंदू’ में लिखा है कि पिछले कुछ दशकों में शहरी आबादी को व्यवस्थित रूप से मताधिकार से वंचित किया गया है. हालिया ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) इस हाशिएकरण को और पुख्ता करता है. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने स्पष्ट किया था कि “पते का अर्थ कोई आलीशान बंगला नहीं, बल्कि वह स्थान है जहाँ व्यक्ति निवास करता है, चाहे वह पेड़ के नीचे हो या फुटपाथ पर.” दुर्भाग्य से, आज जटिल बहिष्करण प्रक्रियाओं और नौकरशाही बाधाओं के कारण मतदाता सूची से लोगों को बाहर करना आसान बना दिया गया है.
विश्व बैंक के अनुसार, भारत की लगभग 40% शहरी आबादी झुग्गी-झोपड़ियों में रहती है. शहरी भारत में 18 वर्ष से कम आयु की औसत जनसंख्या 28% है. इन आंकड़ों के मिलान से पता चलता है कि पात्र मतदाताओं की एक विशाल संख्या, विशेषकर झुग्गी-निवासियों और अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों को मतदाता सूची से बाहर रखा गया है.
एक अन्य चुनौती चुनावी गोपनीयता का खत्म होना है. वर्तमान ईवीएम प्रणाली में बूथ-वार मतों के खुलासे से छोटे कस्बों में मतदान पैटर्न को आसानी से पहचाना जा सकता है, जो मतदाताओं की सुरक्षा और गोपनीयता के लिए खतरा है.
एसआईआर का सबसे घातक प्रहार शहरी गरीबों पर हुआ है. दलित, अल्पसंख्यक और असंगठित क्षेत्र के श्रमिक इस प्रक्रिया में सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं. यह इन वर्गों पर दोहरा बोझ है: वे न तो नया पंजीकरण करा पा रहे हैं और जो पहले से पंजीकृत थे, उनके नाम बड़े पैमाने पर काटे जा रहे हैं.
कुछ शहरों का उदाहरण लें जहाँ सबसे बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए हैं: बिहार के पटना में मसौदा सूची से 16.5 लाख नाम हटा दिए गए. उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में लगभग 36.67% नाम हटाए गए, लखनऊ में एसआईआर के बाद 30.88% मतदाताओं के नाम हटाए गए. बिहार के पूर्णिया में 2.73 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए, उत्तर प्रदेश के कानपुर में 25.62% नामों को हटाने के लिए चिन्हित किया गया, जिनमें मुख्य रूप से असंगठित क्षेत्र के श्रमिक शामिल थे. कोलकाता के एक विशेष इलाके, गुलशन कॉलोनी में 90% मतदाता गायब पाए गए. मुंबई में, 2025 के एसआईआर के तहत अनुमान है कि 14 लाख नाम हटा दिए गए, और अनौपचारिक आवासों (झुग्गी-बस्तियों) में रहने वाले केवल 50% निवासी ही पंजीकृत थे.
प्रवास शहरीकरण की एक मुख्य विशेषता है, ऐसे में 2002 या 2005 के प्रमाण मांगना प्रवासियों को पंजीकरण से हतोत्साहित करने जैसा है.
कुलमिलाकर, ‘एसआईआर’ केवल एक प्रशासनिक अभ्यास नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक आधार पर प्रहार है. कठोर दस्तावेजों और स्थायी निवास की शर्त के माध्यम से यहाँ मतदाताओं की एक ‘चयनात्मक छनाई’ की जा रही है. इसके तहत उन लोगों को बाहर किया जा रहा है, जो सत्ताधारी व्यवस्था के अनुकूल नहीं हैं या जिन्हें पूंजी निवेश के लिए संभावित खतरे के रूप में देखा जाता है. यह प्रक्रिया भारतीय लोकतंत्र के समावेशी स्वरूप को कमजोर कर रही है.
पीएम मोदी की झालमुड़ी से लेकर रेस्टोरेंट में प्राइम-टाइम टीवी तक: बंगाल चुनाव के केंद्र में ‘भोजन’ क्यों और कैसे?
बैरकपुर से भाजपा उम्मीदवार कौस्तव बागची हाथ में मछली लेकर चुनाव प्रचार करते हुए.
सत्यजीत रे, जिन्होंने ‘अपराजितो’ और ‘जॉय बाबा फेलुनाथ’ जैसी फिल्मों में काशी को बंगालियों के दूसरे घर के रूप में चित्रित किया था, उन्होंने शायद ही कल्पना की होगी कि सालों बाद वाराणसी (पूर्ववर्ती काशी) के सांसद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बंगाल को अपना ‘राजनीतिक दूसरा घर’ बनाने की कोशिश करेंगे. वह भी ‘झालमुड़ी’ के पड़ाव के साथ, जिसने भोजन को इस विधानसभा चुनाव के केंद्र में ला खड़ा किया है.
सौर्ज्य भौमिक लिखते हैं कि बंगाली के दिल का रास्ता उसके पेट से होकर जाता है, और भाजपा लंबे समय से ‘बोहिरागोतो’ (बाहरी) के टैग से लड़ रही है. अल्बर्ट कामू ने अपने उपन्यास ‘द स्ट्रेंजर’ (जिसे ‘द आउटसाइडर’ के नाम से भी जाना जाता है) में भावनात्मक और सांस्कृतिक अलगाव के राजनीतिक जोखिमों को उजागर किया था. बंगाल के चुनावी संदर्भ में, “बाहरी” होना केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि संवेदी और सांस्कृतिक भी है—यानी कोई क्या खाता है, कैसे बोलता है, और वह अपने जुड़ाव को किस तरह प्रदर्शित करता है.
तृणमूल कांग्रेस, जिसका नाम आमतौर पर उच्च साहित्यिक विमर्श से नहीं जुड़ता, उसने 2021 में “बाहरी” (आउटसाइडर) के लेबल को बहुत सफलतापूर्वक चुनावी हथियार बनाया. इसीलिए, इस चुनाव चक्र में मोदी झाड़ग्राम में झालमुड़ी खा रहे हैं; अनुराग ठाकुर मछली खाते दिख रहे हैं; और कौस्तव बागची (बैरकपुर), रुद्रनील घोष (शिबपुर) और शरद्वत मजुमदार (बिधाननगर) जैसे भाजपा उम्मीदवार हाथ में मछली लेकर प्रचार कर रहे हैं.
खाद्य समीक्षक और इतिहासकार पुष्पेश पंत बताते हैं कि मोदी को बिहार में लिट्टी-चोखा खाते या तमिलनाडु में इडली-वडई का सेवन करते नहीं देखा गया. केरल, जो अपने कई लजीज व्यंजनों के लिए जाना जाता है, वहाँ भी मोदी के कुछ खाते हुए दृश्य दिखाई नहीं देते.
सभी राजनीतिक दलों में, चुनाव प्रचार के ब्रेक के दौरान उम्मीदवार क्या खाते हैं, इसका दस्तावेजीकरण करना एक आम विशेषता बन गई है. चाहे टीएमसी हो या भाजपा, बार-बार दिखने वाला भोजन ‘माछेर झोल-भात’ (मछली की करी और चावल) ही है.
व्यावहारिक दृष्टिकोण से भी यह चुनाव तर्कसंगत है. गर्मियों में चुनाव प्रचार के दौरान हल्की मछली करी शरीर को ठंडा रखती है, पेट भरती है और इसे तैयार करना भी आसान है. बंगाल के बाहर से आए मीडियाकर्मियों का हुजूम भी इस ‘भोजन-राजनीति’ के चक्र का हिस्सा है. कहाँ खाना है और क्या खाना है, यह अब उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है जितना कि यह जानना कि कहाँ जाना है और किससे बात करनी है.
एक राष्ट्रीय टेलीविजन चैनल ने दक्षिण कोलकाता के एक प्रमुख भोजनालय से चुनाव शो आयोजित किया, जिसमें चर्चा को ‘लास्ट सपर’ (ईसा मसीह के अंतिम भोज) की झांकी की तरह पेश किया गया. इसमें शामिल एंकर, मालिक, शेफ और पत्रकारों ने बंगाली व्यंजनों का स्वाद लेते हुए राजनीति पर बहस की.
पंत कहते हैं, “अगर मोदी ‘बाहरी’ का टैग हटाना चाहते थे, तो वे मछली खा सकते थे. लेकिन वे शाकाहारी हैं, इसलिए वे मछली नहीं खाएंगे। पर वे किसी झुग्गी-बस्ती में एक ‘निरामिष’ (शाकाहारी) भोजन कर सकते थे, जिसमें छोलार दाल, चोछोड़ी और घंटो होता.”
पंत के अनुसार, मोदी ने जो कुछ भी खाया, वह बहुत नपा-तुला और ‘सेफ’ था. उनका मानना है कि मुद्दा यह नहीं है कि बंगाली ‘भद्रलोक’ (सभ्य) हैं या ‘मस्तान’ (गुंडे), बल्कि बंगालियों की एक विशिष्ट आत्म-पहचान है. बंगाल के खान-पान पर इस्लामी, डच और अंग्रेजी प्रभावों के साथ-साथ ‘घोटी-बांगाल’ (पश्चिम बंगाल बनाम पूर्वी बंगाल के लोग) के विभाजन की छाप है, जो सांस्कृतिक पहचान के कई रास्ते खोलती है.
इस लिहाज से ‘झालमुड़ी’ एक रणनीतिक रूप से तटस्थ विकल्प है. यह सर्वव्यापी है, सस्ता है और निष्पक्ष है. यह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पसंद से भी मेल खाता है, जिन्हें ‘मुड़ी’ (मुरमुरा) पसंद है.
जेएनयू के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सेवानिवृत्त प्रोफेसर पंत तर्क देते हैं, “यदि कोई सांस्कृतिक रूप से बंगाल के साथ जुड़ना चाहता है, तो उसे भाषा को थोड़ा बेहतर बोलना होगा और एक महिला मुख्यमंत्री को ‘ऐ दीदी, ओ दीदी’ कहकर नहीं बुलाना चाहिए.” (क्रमशः अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने ऐसा किया).
इसकी तुलना में, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, जो पूरे भारत में दलितों और आदिवासियों के घरों में भोजन करने के लिए जाने जाते हैं, इस चुनाव में बंगाल में कैमरे के सामने ऐसा कोई भोजन करते नहीं दिखे. विज्ञापन विशेषज्ञ सुमंतो चट्टोपाध्याय कहते हैं कि बंगाल में ‘माछ’ (मछली) घोषणापत्र पर भारी पड़ सकती है क्योंकि भोजन ही पहचान है.
चट्टोपाध्याय के अनुसार, “जब कोई राजनेता झालमुड़ी खाता है, तो वह यह कहने की कोशिश कर रहा होता है कि ‘मैं यहीं का हूँ’. मोदी का झालमुड़ी खाना और अनुराग ठाकुर का मछली खाना ‘बाहरी’ होने के आरोप का दृश्य उत्तर है.” हालांकि, वे यह भी जोड़ते हैं कि जब आपको स्थानीय नाश्ते के साथ खुद को पेश करके यह साबित करना पड़े कि आप ‘यहीं के’ हैं, तो आप लोगों को यह भी याद दिला रहे होते हैं कि आप एक ‘राजनीतिक पर्यटक’ हैं.
यह तनाव नीतिगत अंतर्विरोधों से और जटिल हो जाता है. कुछ भाजपा शासित राज्यों में पोषण संस्थानों की सिफारिशों के बावजूद शाकाहारी या धार्मिक भावनाओं का हवाला देकर स्कूली भोजन से अंडे हटा दिए गए हैं. ऐसे फैसले पार्टी के उन प्रयासों को मुश्किल बनाते हैं जहाँ वे खुद को बंगाल की खाद्य संस्कृति (जहाँ मछली और अंडे मुख्य आहार हैं) से जोड़ना चाहते हैं.
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