24/04/2026: ईरान-पाकिस्तान कूटनीति | होर्मुज़ संकट और वैश्विक सप्लाई शॉक | चुनावी राज्यों में ईडी सक्रिय | आप से भाजपा के राघव | सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नोटिस | ट्रंप के पोस्ट पर भारत का ऐतराज
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अरागची का पाकिस्तान दौरा, फिर बातचीत के आसार
पेंटागन की सख्ती: नाकेबंदी और बारूदी सुरंगों का साया
विपक्ष शासित राज्यों में चुनाव से पहले ईडी की छापेमारी में आई तेजी
पुराने मामलों में नई छापेमारी: पश्चिम बंगाल में ईडी की कार्रवाई पर फिर उठे सवाल
आप में फूट: राघव चड्ढा ने बगावत की, 6 सांसदों के साथ भाजपा में शामिल, मित्तल को 10 दिन पहले ईडी ने घेरा था
सुप्रीम कोर्ट का उन लोगों की याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार, जिनके नाम बंगाल ‘एसआईआर’ के बाद हटाए
विपक्ष ने मोदी के टीवी भाषण का दिया हवाला, सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए नया नोटिस सौंपा
भाजपा की योजनाओं पर हिटलर की छाप: बेबी ने ‘एसआईआर’ को हिंदुत्व की बड़ी योजना का हिस्सा बताया
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई पर बनी डॉक्यू-सीरीज पर लगाई रोक
इज़राइल–ग़ज़ा संघर्ष: इतिहास, नैतिकता और भारत की भूमिका
बंगाल में एक चरण बाकी, मगर मोदी को दिख रही ‘परिवर्तन की लहर’
पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड मतदान: 92% वोटिंग के पीछे क्या है असली कहानी?
एनसीएल के खदान विस्तार में शहरी-ग्रामीण इलाक़े प्रभावित, कम मुआवज़े पर लोगों की ज़मीन ली जा रही
ट्रंप द्वारा भारत को ‘नरक’ बताने वाली टिप्पणी साझा करने पर भारत का कड़ा ऐतराज: विपक्ष ने भी साधा निशाना
ईरानी दूतावासों ने ट्रंप को किया ट्रोल: “कभी इंडिया आकर देखो”
मणिपुर के उख्रुल में ताजा कुकी-नागा हिंसा में तीन की मौत; जवाबी झड़पों में कई घायल
केंद्र सरकार बंगाल के चुनाव में व्यस्त है और उधर मणिपुर में हिंसा जारी है. राज्य के उख्रुल जिले में जारी कुकी-नागा हिंसा के बीच शुक्रवार को तीन लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए. मृतकों में से दो कुकी समुदाय के थे, जबकि तीसरा व्यक्ति तांगखुल नागा समुदाय से था.
प्रशांत मजूमदार की रिपोर्ट है कि ‘कुकी ऑर्गनाइजेशन फॉर ह्यूमन राइट्स ट्रस्ट’ ने मुल्लाम और शोंगफाल कुकी गांवों पर सुबह-सवेरे हुए हमले की कड़ी निंदा की. संगठन का आरोप है कि यह हमला हथियारबंद तांगखुल नागा पुरुषों द्वारा तब किया गया जब “निहत्थे नागरिक अपने घरों में सो रहे थे”. संगठन ने बताया कि हमले में दो कुकी ग्राम स्वयंसेवक मारे गए, महिलाओं और बच्चों सहित कई अन्य घायल हुए और दो घरों को आग के हवाले कर दिया गया.
संगठन ने एक बयान में कहा, “ग्रामीणों ने आत्मरक्षा के अपने कानूनी अधिकार का प्रयोग करते हुए लाइसेंस प्राप्त शिकार बंदूकों के साथ बहादुरी से हमले का जवाब दिया और इस प्रक्रिया में एक सशस्त्र हमलावर को ढेर कर दिया.”
दूसरी ओर, ‘नागा विलेज गार्ड (सेंट्रल कमांड)’ ने उन आरोपों को खारिज कर दिया कि तांगखुल नागा स्वयंसेवकों ने मुल्लाम गांव पर हमला किया था. उन्होंने कहा कि उनके कर्मी सिनाकीथेई गांव पर बार-बार होने वाले हमलों और ‘सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन’ समझौते के तहत आने वाले कुकी सशस्त्र कैडरों की आवाजाही की सूचना के बाद गश्त पर थे.
बयान में आगे कहा गया कि गश्त के दौरान ‘सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन’ के तहत आने वाले कुकी सशस्त्र कैडरों ने गोलीबारी की, जिसमें 29 वर्षीय नागा ग्राम स्वयंसेवक की मौत हो गई और चार अन्य घायल हो गए, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई हुई. ‘तांगखुल नागा लोंग’ की कार्यसमिति ने कहा कि सिराखोंग और सिनाकीथेई के बीच गश्त कर रहे नागा विलेज गार्ड्स पर कुकी विद्रोहियों ने घात लगाकर हमला किया था.
पिछले कुछ समय में उख्रुल जिले के कुछ हिस्सों में दोनों समुदायों के सशस्त्र पुरुषों के बीच झड़पों का सिलसिला जारी है, जिसमें कई लोगों की जान गई है और घरों को जलाया गया है.
मणिपुर के मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह ने हाल ही में तनाव कम करने और कुकी व तांगखुल नागा समुदायों के बीच विश्वास बहाली के प्रयास में जिले के कई गांवों का दौरा किया था. हालांकि, इन प्रयासों के बावजूद हिंसा जारी है.
उधर, गुवाहटी उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी. यह याचिका असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां शर्मा द्वारा दर्ज कराई गई एक प्राथमिकी के संबंध में थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उनके पास एक से अधिक पासपोर्ट हैं.
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से खेड़ा की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि यह मामला “राजनीतिक प्रतिशोध” से प्रेरित है, विशेष रूप से चुनावों के समय. उन्होंने कहा कि खेड़ा के देश छोड़कर भागने का कोई खतरा नहीं है और तर्क दिया कि उन्हें हिरासत में लेकर पूछताछ करने की कोई आवश्यकता नहीं है.
याचिका का विरोध करते हुए, असम के महाधिवक्ता देवजीत लोन सैकिया ने दलील दी कि यह मामला केवल मानहानि तक सीमित नहीं है. इसमें दस्तावेजों और टाइटल डीड (मालिकाना हक के दस्तावेज) के कथित फर्जीवाड़े से संबंधित धोखाधड़ी और जालसाजी जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं.
विपक्ष शासित राज्यों में चुनाव से पहले ईडी की छापेमारी में आई तेजी
पुराने मामलों में नई छापेमारी: पश्चिम बंगाल में ईडी की कार्रवाई पर फिर उठे सवाल
“द इंडियन एक्सप्रेस” में दीप्तिमान तिवारी की रिपोर्ट के अनुसार, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने विशेष रूप से उन चुनावी राज्यों में तलाशी, गिरफ्तारी और समन की कार्रवाई तेज कर दी है जहाँ विपक्षी दलों की सरकारें हैं. इसके कारण विपक्ष ने केंद्र पर विधानसभा चुनावों से पहले चुनिंदा तरीके से निशाना बनाने का आरोप लगाया है.
दूसरी ओर, केंद्रीय जांच एजेंसी ईडी का पक्ष है कि उसकी कार्रवाई सबूतों पर आधारित है और इसका उद्देश्य वित्तीय अपराधों पर लगाम लगाना है. हालांकि, ‘एक्सप्रेस’ द्वारा किए गए फोन कॉल, टेक्स्ट मैसेज और ईमेल के सवालों पर एजेंसी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली.
‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि राज्य विधानसभा चुनावों से ठीक पहले, पिछले दो महीनों में ईडी ने कई मामलों में तलाशी, गिरफ्तारी, संपत्ति कुर्क करने और पूछताछ से संबंधित लगभग 20 ऑपरेशन चलाए हैं.
28 मार्च से 19 अप्रैल के बीच मात्र 23 दिनों की अवधि में, एजेंसी ने छह शहरों में फैले 50 से अधिक परिसरों में आठ तलाशी अभियान चलाए, नौ लोगों को पूछताछ के लिए समन भेजा और पश्चिम बंगाल में दर्ज ईडी मामलों के संबंध में चार व्यक्तियों को गिरफ्तार किया.
इनमें से कई मामलों में, ईडी ने अपने हस्तक्षेप को राज्य में “स्वतंत्र, निष्पक्ष और भयमुक्त चुनाव सुनिश्चित करने” की दिशा में एक कदम बताया है—इस शब्दावली की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने तीखी आलोचना की है.
चुनावी राज्य पश्चिम बंगाल में ईडी की कार्रवाई में आई-पैक के निदेशक प्रतीक जैन के आवास पर तलाशी और उसके बाद एक अन्य निदेशक विनेश चंदेल की गिरफ्तारी शामिल है. आई-पैक एक राजनीतिक सलाहकार फर्म है, जिसके सबसे बड़े क्लाइंट्स में बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस शामिल है. इसके अलावा, ईडी ने प्राथमिक शिक्षक भर्ती घोटाले में टीएमसी नेता और मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा से जुड़ी 3.65 करोड़ रुपये की संपत्ति भी कुर्क की. 11 अप्रैल को, ईडी ने लंबे समय से चल रहे शिक्षक भर्ती घोटाले के सिलसिले में पूर्व मंत्री पार्थ चटर्जी से जुड़े परिसरों पर नए सिरे से छापेमारी की.
एजेंसी ने अभिनेत्री और पूर्व सांसद नुसरत जहां, मंत्री सुजीत बोस और रथिन घोष सहित कई टीएमसी नेताओं को समन भी जारी किया और टीएमसी के दिग्गज नेता व रासबिहारी निर्वाचन क्षेत्र के उम्मीदवार देबाशीष कुमार से दो बार पूछताछ की.
ईडी के मामलों में सजा का अनुपात सिर्फ 0.65%, सत्ताधारी दल के साथ जुड़ते ही जांच रुक जाती है
पवन कोराड़ा के अनुसार, चुनाव से पहले केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई का यह पैटर्न अन्य विपक्षी शासित राज्यों में भी फैला हुआ है.
पंजाब में, जहाँ अगले साल चुनाव होने हैं, प्रवर्तन निदेशालय ने 15 अप्रैल को आम आदमी पार्टी के सांसद अशोक कुमार मित्तल से जुड़े 10 से अधिक स्थानों पर छापेमारी की. यह कार्रवाई ठीक उसी समय हुई जब उन्हें उच्च सदन में पार्टी का उप-नेता नियुक्त किया गया था. दो दिन बाद, आप मंत्री संजीव अरोड़ा से जुड़े परिसरों की तलाशी ‘फेमा’ के तहत कथित फंड राउंड-ट्रिपिंग जांच में ली गई. यह दिल्ली में वरिष्ठ आप नेताओं—अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और संजय सिंह—की चुनाव पूर्व गिरफ्तारी के बाद की कड़ियाँ हैं.
केरल में, जनवरी 2026 में सबरीमाला से जुड़े सोने के गबन के मामले में 21 स्थानों पर तलाशी ली गई. ईडी करुवन्नूर सहकारी बैंक घोटाले की भी जांच कर रही है, जिसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के कई नेताओं के शामिल होने का आरोप है. 2025 में, एजेंसी ने ट्वेंटी20 नामक राजनीतिक संगठन को नोटिस भेजे थे, जो अब भाजपा के साथ गठबंधन में है; इस समूह ने इनकार किया है कि उनका यह कदम ईडी मामले से संबंधित था.
तमिलनाडु में, टीएएसएमएसी (तमिलनाडु राज्य विपणन निगम लिमिटेड) लेनदेन से जुड़ी कथित अनियमितताओं की ईडी जांच राजनीतिक बहस का केंद्र बनी हुई है. विपक्ष ने इसे 1,000 करोड़ रुपये का राजनीति से प्रेरित घोटाला बताया है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने मई 2025 में इस जांच पर रोक लगा दी थी.
सांख्यिकीय वास्तविकताएं और पीएमएलए
विपक्षी सदस्य अपने दावों को पुख्ता करने के लिए केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाइयों के सांख्यिकीय संकेंद्रण की ओर इशारा करते हैं. 2014 और 2022 के बीच ईडी द्वारा जांचे गए 121 प्रमुख राजनेताओं पर आधारित एक रिपोर्ट से पता चला कि उनमें से 115 विपक्ष से थे. 2014 के बाद राजनेताओं के खिलाफ दर्ज ईडी मामलों की संख्या में चार गुना वृद्धि हुई है. इन कार्रवाइयों पर नज़र रखने वाले शोधकर्ताओं का कहना है कि विपक्षी हस्तियों के खिलाफ जांच अक्सर तब धीमी पड़ जाती है या रुक जाती है जब वे सत्ताधारी दल के साथ जुड़ जाते हैं.
केंद्र सरकार अक्सर 94.82% की सजा दर का हवाला देकर ईडी के ऑपरेशनों का बचाव करती है. हालांकि, फरवरी 2026 में वित्त मंत्रालय द्वारा संसद में दिए गए जवाब इस गणना के आधार को स्पष्ट करते हैं. 2005 में पीएमएलए की शुरुआत के बाद से कुल 8,391 प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ईसीआईआर) दर्ज की गई हैं. 94.82% का आंकड़ा केवल उन 58 मामलों पर आधारित है जिनका निर्णय योग्यता के आधार पर हुआ, जिनमें से 55 में सजा हुई. यदि कुल दर्ज ईसीआईआर की संख्या के आधार पर गणना की जाए, तो सजा पाने वाले मामलों का अनुपात मात्र 0.65% है.
आंकड़े आगे बताते हैं कि पीएमएलए के 67% से अधिक मामलों में ट्रायल (मुकदमा) शुरू ही नहीं हुआ है. कानूनी विशेषज्ञ इस लंबी जेल अवधि के लिए पीएमएलए की धारा 45 को जिम्मेदार मानते हैं. यह कानून जमानत के लिए ‘दोहरी शर्तें’ लगाता है, जिसके तहत न्यायाधीश को यह संतुष्ट होना पड़ता है कि आरोपी प्रथम दृष्टया दोषी नहीं है और जमानत पर रहने के दौरान उसके अपराध करने की संभावना नहीं है. चूंकि जमानत के स्तर पर सबूत का बोझ आरोपी पर होता है, इसलिए विपक्षी नेताओं और रणनीतिकारों को बिना मुकदमे के अनिश्चित काल तक हिरासत में रखा जा सकता है.
ईडी ने खुलासा किया कि वर्तमान में हिरासत में लिए गए 74% आरोपी 2023 और 2024 में गिरफ्तार किए गए थे, जो आम चुनावों से ठीक पहले का समय है. इसके अलावा, सभी ‘प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट’ (जो ईडी की चार्जशीट के बराबर है) में से 55% से अधिक 2022 के बाद दायर की गईं, जो महत्वपूर्ण चुनावी चरणों से पहले एजेंसी की सक्रियता के बढ़ते संकेंद्रण को रेखांकित करती हैं.
आप में फूट: राघव चड्ढा ने बगावत की, 6 सांसदों के साथ भाजपा में शामिल, मित्तल को 10 दिन पहले ईडी ने घेरा था
आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा, अशोक मित्तल और संदीप पाठक के साथ भाजपा में शामिल हो गए हैं. अपने सहयोगियों संदीप पाठक और अशोक मित्तल के साथ एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए चड्ढा ने कहा, “हमने यह निर्णय लिया है कि राज्यसभा में ‘आप’ से संबंधित दो-तिहाई सदस्य होने के नाते, हम भारत के संविधान के प्रावधानों का उपयोग करते हुए भाजपा में अपना विलय करते हैं.”
चड्ढा ने आगे कहा, “हमारे अलावा, इसमें हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, विक्रम साहनी और स्वाति मालीवाल भी शामिल हैं.”
‘एक्सप्रेस वेब डेस्क’ के अनुसार, यह घटनाक्रम काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह ऐसे समय में आया है जब ‘आप’ पंजाब में चुनावों की तैयारी कर रही है, जहाँ वह सत्ता में है. यदि चड्ढा का अपने साथ कई नेताओं के भाजपा में शामिल होने का दावा सच है, तो बागी नेता दलबदल विरोधी कानून के दायरे से भी बाहर रहेंगे.
राघव चड्ढा और पार्टी के अन्य छह राज्यसभा सदस्यों की इस बगावत पर आप नेता अरविंद केजरीवाल ने ‘एक्स’ पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा, “भाजपा ने एक बार फिर पंजाबियों को झटका दिया है.” यहां यह उल्लेखनीय है कि लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के चांसलर और राज्यसभा सांसद अशोक मित्तल ने 10 दिन पहले ही प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की छापेमारी का सामना किया था. ईडी के छापे के पहले आम आदमी पार्टी ने मित्तल को राघव चड्ढा की जगह उच्च सदन में पार्टी का उप-नेता नियुक्त किया था. ‘आप’ के भीतर उनके बढ़ते कद और पार्टी छोड़ने के समय को देखते हुए, उनके इस अचानक हृदय परिवर्तन ने पंजाब और उससे बाहर राजनीतिक हलचल पैदा कर दी है. साल 2022 से पहली बार सांसद बने मित्तल ने पारिवारिक मिठाई व्यवसाय से ऊपर उठकर एक बड़े निजी विश्वविद्यालय की स्थापना की है.
‘इन तर्कों को ट्रिब्यूनल के समक्ष रखें’: सुप्रीम कोर्ट का उन लोगों की याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार, जिनके नाम बंगाल ‘एसआईआर’ के बाद हटाए
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पश्चिम बंगाल के कई व्यक्तियों द्वारा दायर उन याचिकाओं पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिनमें मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) के बाद उनके नाम हटाए जाने को चुनौती दी गई थी. इन याचिकाकर्ताओं में चुनाव ड्यूटी पर तैनात 65 लोग भी शामिल हैं. अदालत ने उन्हें संबंधित अपीलीय ट्रिब्यूनल के समक्ष राहत पाने का निर्देश दिया.
‘पीटीआई और टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची व न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने दो अलग-अलग याचिकाओं में पेश हुए वकीलों से कहा, “आपको ये तर्क (अपीलीय) ट्रिब्यूनल के सामने रखने होंगे.”
याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि प्रभावित लोगों में से 65 वर्तमान में राज्य में चुनाव ड्यूटी पर हैं. वकील ने तर्क दिया:
“चुनाव ड्यूटी के लिए जारी आदेश में उनके एपिक (मतदाता पहचान पत्र) नंबर का उल्लेख था, जिसे बाद में हटा दिया गया. अब, चुनाव ड्यूटी पर तैनात ये लोग मतदान नहीं कर सकते. यह स्पष्ट रूप से मनमाना कदम है.”
उन्होंने आगे कहा कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान उनके नाम हटाना “अवैध” था क्योंकि इसके लिए कोई ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी नहीं किया गया था. वकील ने पीठ को सूचित किया कि याचिकाकर्ता पहले ही अपीलीय ट्रिब्यूनल में अपील दायर कर चुके हैं.
इस पर पीठ ने कहा, “अपीलीय ट्रिब्यूनल द्वारा उचित आदेश पारित किए जाएंगे.” कानूनी समाचार वेबसाइटों की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति बागची ने मौखिक रूप से टिप्पणी की: “इस चुनाव में शायद वे वोट न दे पाएं, लेकिन मतदाता सूची में बने रहने का जो अधिक मूल्यवान अधिकार है, उसे सुरक्षित रखा जाना चाहिए.”
रिपोर्ट्स के मुताबिक, लगभग 34 लाख अपीलों में से अब तक अपीलीय ट्रिब्यूनल द्वारा केवल 139 का निपटारा किया गया है. शीर्ष अदालत 71 और 6 व्यक्तियों द्वारा अलग-अलग दायर की गई दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी. इन याचिकाओं में चुनाव आयोग को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि जिन याचिकाकर्ताओं की अपीलें लंबित हैं, उन्हें पश्चिम बंगाल के मौजूदा चुनावों में मतदान करने की अनुमति दी जाए.
बंगाल में पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल को हुआ था, जबकि दूसरे और अंतिम चरण का मतदान 29 अप्रैल को होना तय है. परिणाम 4 मई को घोषित किए जाएंगे.
इससे पहले, बंगाल एसआईआर मामले की सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को उन मतदाताओं के लिए एक पूरक संशोधित मतदाता सूची जारी करने का निर्देश दिया था, जिनकी नाम हटाए जाने के खिलाफ की गई अपीलों को अपीलीय ट्रिब्यूनल ने स्वीकार कर लिया था.
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि केवल अपील लंबित होने के आधार पर बाहर किए गए व्यक्तियों को वोट देने का अधिकार नहीं मिलेगा. अपने 13 अप्रैल के आदेश में शीर्ष अदालत ने कहा था: “इसलिए, हम संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हैं और चुनाव आयोग को निर्देश देते हैं कि जहाँ भी अपीलीय ट्रिब्यूनल 21 अप्रैल, 2026 या 27 अप्रैल, 2026 (जैसा भी मामला हो) तक अपीलों पर निर्णय लेने में सक्षम हैं, वहां ऐसे अपीलीय आदेशों को पूरक संशोधित मतदाता सूची जारी करके लागू किया जाएगा और मतदान के अधिकार के संबंध में सभी आवश्यक परिणाम प्रभावी होंगे.” “हालांकि, यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि अपीलीय ट्रिब्यूनल के समक्ष बाहर किए गए व्यक्तियों द्वारा दी गई अपीलों के केवल लंबित रहने से वे अपने मताधिकार का प्रयोग करने के हकदार नहीं हो जाएंगे.”
कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने या बाहर किए जाने के खिलाफ अपीलों की सुनवाई के लिए उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों की अध्यक्षता में 19 ट्रिब्यूनल का गठन किया है.
विपक्ष ने मोदी के टीवी भाषण का दिया हवाला, सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए नया नोटिस सौंपा
‘द टेलीग्राफ’ ब्यूरो के अनुसार राज्यसभा के लगभग 73 विपक्षी सांसदों ने शुक्रवार को मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए एक नया प्रस्ताव पेश किया. उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन को सौंपे गए पत्र में कहा गया, “यह नया नोटिस एक विशिष्ट और हाल ही में उत्पन्न हुए आधार पर आधारित है.” पत्र में आगे कहा गया:
“यह नोटिस 15 मार्च, 2026 को या उसके बाद ज्ञानेश कुमार द्वारा किए गए कार्यों और चूकों तक सीमित है, जिनमें से प्रत्येक स्वतंत्र रूप से और सामूहिक रूप से, अत्यंत गंभीर चरित्र के ‘सिद्ध दुर्व्यवहार’ का गठन करते हैं.”
विपक्षी सांसदों ने तीन सदस्यीय जांच समिति की मांग की है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा न्यायाधीश, किसी भी उच्च न्यायालय के एक मौजूदा मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायालयों के सदस्य शामिल हों, जो अपनी रिपोर्ट राज्यसभा सभापति को सौंपें.पत्र में मांग की गई है कि जब तक समिति अपनी रिपोर्ट नहीं सौंप देती, तब तक ज्ञानेश कुमार को चुनाव से जुड़ी सभी जिम्मेदारियों से खुद को अलग कर लेना चाहिए.
इससे पहले 12 मार्च को, राज्यसभा के 63 विपक्षी सांसदों ने कुमार को हटाने का प्रस्ताव पेश किया था और लोकसभा में भी इसी तरह का प्रस्ताव लाया गया था. हालांकि, 6 अप्रैल को राज्यसभा सभापति राधाकृष्णन और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने साक्ष्यों की कमी के आधार पर इन नोटिसों को खारिज कर दिया था.
नए प्रस्ताव के मुख्य आधार
ताजा प्रस्ताव में राज्यसभा सांसदों ने कुमार पर “आदर्श आचार संहिता के प्रवर्तन में निरंतर पक्षपातपूर्ण असमानता” का आरोप लगाया है. सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 29 मिनट के उस भाषण का हवाला दिया, जिसका प्रसारण 18 अप्रैल को सरकारी दूरदर्शन, संसद टीवी और ऑल इंडिया रेडियो पर लाइव किया गया था.
सांसदों का आरोप है कि यह भाषण—जो मोदी सरकार द्वारा ‘परिसीमन’ के लिए संविधान संशोधन लाने के प्रयास के निचले सदन में विफल होने के एक दिन बाद दिया गया था—पूरी तरह से उसी भाषण के समान था जो मोदी ने उसी दिन तमिलनाडु के कोयंबटूर में एक चुनावी अभियान के दौरान दिया था.
पत्र में रेखांकित किया गया: “प्रधानमंत्री ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके), अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी—जो उस समय भाजपा के साथ सीधे चुनावी मुकाबले में थे—का नाम लिया और उनकी निंदा की। उन्होंने उन पर संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 के संबंध में ‘भ्रूणहत्या’ करने और देश के संविधान के विरुद्ध ‘अपराधी’ होने का आरोप लगाया, और स्पष्ट रूप से तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और केरल के मतदाताओं से उनके खिलाफ कार्रवाई करने का आग्रह किया.”
पत्र में कहा गया कि जिन चार राज्यों का उल्लेख किया गया, उनमें से केरल में मतदान तब तक पूरा हो चुका था, जबकि तमिलनाडु और बंगाल में भाषण के समय मतदान शुरू होना बाकी था.
पत्र के अनुसार, विपक्षी राज्यसभा सांसदों—राजद के मनोज कुमार झा, भाकपा के पी. संदोष कुमार और माकपा के एम.ए. बेबी—ने 19 अप्रैल को मुख्य चुनाव आयुक्त के पास शिकायत दर्ज कराई थी और उसके एक दिन बाद 700 नागरिकों ने प्रधानमंत्री की टिप्पणियों का विरोध करते हुए एक ज्ञापन सौंपा था.
सांसदों ने आगे कहा, “इस नोटिस की तारीख तक, ज्ञानेश कुमार ने उक्त शिकायतों पर न तो कोई कारण बताओ नोटिस जारी किया है, न ही कोई एडवाइजरी और न ही कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी है.” उन्होंने यह भी जोड़ा कि प्रतिक्रिया का यह अभाव पिछले चुनावों के दौरान केंद्रीय चुनाव पैनल द्वारा अपनाए गए रुख के बिल्कुल विपरीत है.
पत्र में कहा गया: “इस निष्क्रियता के विपरीत, ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले आयोग ने विपक्षी नेताओं (कांग्रेस सहित) के खिलाफ भाजपा द्वारा दर्ज की गई इसी तरह की शिकायतों पर कार्रवाई में अत्यधिक तत्परता दिखाई है. प्रवर्तन में पक्षपात का यह पैटर्न उसी आचरण का विस्तार है, जो पिछले अविश्वास प्रस्ताव का विषय था.”
विपक्ष ने कई उदाहरणों का हवाला दिया है, जैसे केरल में आयोग द्वारा जारी एक नोटिस पर भाजपा की मुहर, चुनाव आयोग द्वारा अपने ‘एक्स’ (ट्विटर) हैंडल पर बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल को शांतिपूर्ण और हिंसा मुक्त चुनाव संपन्न कराने के लिए दिया गया कड़ा संदेश, और मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) के बाद बंगाल में मतदाताओं को बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित किया जाना.
एसआईआर के कारण बंगाल के मतदाताओं की संख्या में 91 लाख की कमी आई है; इनमें से लगभग 34 लाख लोगों ने चुनाव आयोग की कार्रवाई के खिलाफ अपील की है और वे अपने मतदान के अधिकार को बहाल करने के लिए अपीलीय ट्रिब्यूनल की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं.
बंगाल में एक चरण बाकी, मगर मोदी को दिख रही ‘परिवर्तन की लहर’
अभी प्रथम चरण में 152 सीटों के लिए ही मतदान हुआ है और दूसरे दौर के लिए 142 सीटों के लिए 29 अप्रैल को मतदान होना शेष है, मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को दावा किया कि पश्चिम बंगाल में “परिवर्तन की लहर” मतदान के पहले चरण में ही स्पष्ट हो गई है. उन्होंने जोर देकर कहा कि “भाजपा के पक्ष में” दिखे समर्थन ने विधानसभा चुनावों में उसकी जीत का शंखनाद कर दिया है.
‘पीटीआई’ के अनुसार, उत्तर 24 परगना के दमदम लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत पानीहाटी में एक रैली को संबोधित करते हुए, मोदी ने आरोप लगाया कि सत्ताधारी टीएमसी ने “तानाशाही” के जरिए बंगाल में “लोकतंत्र के मंदिर को कुचला” है, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि राज्य की जनता ने अपने जनादेश के माध्यम से इसका “पुनर्निर्माण” शुरू कर दिया है.
पहले चरण में गुरुवार को 3.60 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 92 प्रतिशत ने मतदान किया. प्रधानमंत्री ने कहा, “बंगाल में अब, दूसरे चरण में आपको इस मंदिर पर विजय का ध्वज फहराना है.” उन्होंने दावा किया कि पहले चरण के मतदान के बाद टीएमसी “पूरी तरह से बौखला गई” है और आरोप लगाया कि सत्ताधारी दल ने रात भर अपने “गुंडों” को इकट्ठा किया. प्रधानमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि 4 मई को चुनाव परिणामों के बाद, “टीएमसी के गुंडों” के पास छिपने के लिए कोई जगह नहीं होगी.
पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड मतदान: 92% वोटिंग के पीछे क्या है असली कहानी?
टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश के लाइव शो में पत्रकार राजेश चतुर्वेदी से पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड तोड़ मतदान पर बातचीत की गई. पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के पहले चरण में करीब 91.7% से 92.6% तक मतदान दर्ज किया गया है, जो पिछले चुनाव (2021) के लगभग 82% मतदान से काफी ज्यादा है. इस बढ़ोतरी को लेकर चर्चा तेज है, लेकिन इसके पीछे कई अहम कारण भी सामने आ रहे हैं. चर्चा में यह बात सामने आई कि मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं. केवल पहले चरण की 152 सीटों पर ही करीब 50 से 52 लाख नाम हटाए गए, जबकि पूरे राज्य में यह संख्या लगभग 11-12% मतदाताओं तक पहुंचती है. ऐसे में कुल मतदाताओं की संख्या कम होने से मतदान प्रतिशत अपने आप बढ़ा हुआ दिखाई देता है.
इसके अलावा, एसआईआर प्रक्रिया के चलते लाखों लोग अपने नाम कटने के डर से वोट डालने के लिए ज़्यादा संख्या में निकले. कई मामलों में लोग इस चिंता में भी वोट देने पहुंचे कि अगर वे मतदान नहीं कर पाए तो उनके अन्य अधिकारों, जैसे नागरिकता या पहचान पर भी सवाल उठ सकते हैं. इस बीच, सुप्रीम कोर्ट में लाखों अपील लंबित हैं. करीब 34-35 लाख मामलों पर अभी फैसला नहीं हुआ है, जबकि अब तक सिर्फ 139 मामलों का ही निपटारा हुआ है. कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को ट्रिब्यूनल जाने को कहा है, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि चुनाव खत्म होने के बाद इन अपीलों का क्या मतलब रह जाएगा.
राजनीतिक स्तर पर भी माहौल गरम है. एक तरफ प्रधानमंत्री ने इसे “बदलाव की लहर” बताया है, वहीं विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है और केंद्र सरकार का प्रभाव साफ दिख रहा है. दूसरी ओर, यह भी कहा जा रहा है कि इतनी बड़ी वोटिंग को सिर्फ “बेहतर व्यवस्था” का नतीजा मानना सही नहीं होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में पहले भी हर चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़ता रहा है, इसलिए इसे केवल इस बार की व्यवस्था से जोड़ना गलत निष्कर्ष हो सकता है. अब सभी की नजर दूसरे चरण की 142 सीटों और 4 मई को आने वाले नतीजों पर टिकी है, जो यह तय करेंगे कि यह चुनाव किस दिशा में जाएगा.
भाजपा की योजनाओं पर हिटलर की छाप: बेबी ने ‘एसआईआर’ को हिंदुत्व की बड़ी योजना का हिस्सा बताया
माकपा (सीपीएम) पोलित ब्यूरो सदस्य एम.ए. बेबी का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जिस तरह से नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी), जनगणना मूल्यांकन प्रक्रिया, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और परिसीमन का उपयोग एक “फासीवादी, बहुसंख्यकवादी हिंदू राष्ट्र” स्थापित करने के लिए कर रहे हैं, उसमें एडोल्फ हिटलर के शासनकाल की छाप दिखाई देती है.
‘द टेलीग्राफ’ में जॉयजित घोष के मुताबिक, कोलकाता में बोलते हुए बेबी ने कहा: “यह हमें जर्मनी की याद दिलाता है. सितंबर 1935 में, ‘नूर्नबर्ग कानून’ लागू किए गए थे. उनका उद्देश्य क्या था? ‘आर्य शुद्धता’ की रक्षा के नाम पर दूसरों को, विशेषकर यहूदियों को गैर-नागरिक घोषित कर दिया गया था. और हम सभी जानते हैं कि उसके बाद क्या हुआ. 1933 में हिटलर सत्ता में आया और 1935 में नूर्नबर्ग कानून लागू हुए. नरेंद्र मोदी और अमित शाह जो कर रहे हैं, वह हिटलर के जर्मनी का एक ‘कॉपीबुक प्रोजेक्ट’ (हूबहू नकल) है.”
सीपीएम नेता ने कहा कि बंगाल में कराए जा रहे चुनाव स्वतंत्र भारत के इतिहास में अभूतपूर्व हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) हिंदुत्व की एक बड़ी योजना का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य एक विशेष समुदाय के लोगों को लक्षित करना और उन्हें मताधिकार से वंचित करना है.
बेबी ने आगे कहा: “दूर-दराज के इलाकों से गरीब लोग आकर कतारों में खड़े हो रहे हैं, क्योंकि वे अपने मतदान के अधिकार को महत्व देते हैं. भारत में मतदाताओं के अधिकारों और नागरिकsता के संबंध में नरेंद्र मोदी एंड कंपनी जो कर रही है, उसे सीएए, एनआरसी, जनगणना प्रक्रिया और एसआईआर के संदर्भ में देखे जाने की जरूरत है—जो कि मतदाता सूची से ‘विशेष गहन निष्कासन’ के अलावा और कुछ नहीं है... यानी अमित शाह के शब्दों में कहें तो—क्रोनोलॉजी समझिए.”
माकपा मोदी सरकार के उन प्रयासों की आलोचना कर रही है, जिसके तहत परिसीमन के जरिए लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने और इसे महिला आरक्षण विधेयक से जोड़ने की कोशिश की गई थी. पार्टी इसे भारत को हिंदू राष्ट्र में बदलने के आरएसएस प्रोजेक्ट के रूप में देख रही है.
एम.ए. बेबी ने कहा: “परिसीमन के माध्यम से वे ‘जेरीमेंडरिंग’ (चुनावी क्षेत्र में हेरफेर) करना चाहते हैं. केंद्र की सत्ताधारी पार्टी पहले ही जम्मू-कश्मीर और असम में आंशिक रूप से इसका अभ्यास कर चुकी है. अब वे इसे पूरे देश के लिए करना चाहते हैं... जिससे वे भारी बहुमत का उपयोग अपनी इच्छानुसार हिंदू राष्ट्र स्थापित करने के लिए कर सकें. लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने के पीछे यही योजना थी.”
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर मोदी की “कुटिल योजना” का हिस्सा होने का आरोप लगाते हुए बेबी ने कहा कि एक संवैधानिक प्रमुख के रूप में कार्य करने के बजाय, “रेफरी ही एक टीम में शामिल हो गया है.”
उन्होंने आगे कहा: ज्ञानेश कुमार अब केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के समर्थन में अपने कार्यालय का उपयोग कर रहे हैं. पश्चिम बंगाल में यह स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है. यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर आश्चर्य व्यक्त किया है कि कैसे, अन्य राज्यों के विपरीत, यहाँ लोगों की एक विशेष श्रेणी को ‘संदेह’ के घेरे में रखा गया है.”
“लाखों मतदाताओं को अधर में लटकाए रखने के लिए कई तरह के ‘तार्किक स्पष्टीकरण’ दिए गए हैं... पश्चिम बंगाल में यह एक असाधारण, परेशान करने वाली और डराने वाली स्थिति है, जो किसी अन्य राज्य में नहीं है.” इसके साथ ही, उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर भी हमला बोला. उन्होंने आरोप लगाया कि ममता बनर्जी मंदिरों के निर्माण के लिए सरकारी धन खर्च करके आरएसएस के एजेंडे को ही आगे बढ़ा रही हैं.
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई पर बनी डॉक्यू-सीरीज पर लगाई रोक
भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एक बड़ा निर्णय लेते हुए ओटीटी प्लेटफॉर्म ज़ी 5 को गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई पर आधारित डॉक्यू-सीरीज ‘लॉरेंस ऑफ पंजाब’ की रिलीज रोकने का निर्देश दिया है. यह फैसला सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लिया गया है.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ज़ी 5 द्वारा निर्मित यह डॉक्यू-सीरीज 27 अप्रैल को रिलीज होने वाली थी. निर्माताओं के अनुसार, इस शो का उद्देश्य छात्र राजनीति, संगीत, विचारधारा और मीडिया के प्रभाव के जरिए एक अपराधी के बनने की प्रक्रिया का अध्ययन करना था. इसे बिश्नोई के जीवन पर एक ‘केस स्टडी’ के रूप में पेश किया जा रहा था. हालांकि, इसकी घोषणा के बाद से ही विवाद शुरू हो गया था.
शुक्रवार को दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति पुरुशेंद्र कुमार कौरव की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान ज़ी 5 के वकील ने जानकारी दी कि, मंत्रालय ने दोपहर 12 बजे एक एडवाइजरी जारी कर उन्हें इस सीरीज के प्रसारण के साथ आगे न बढ़ने की बात कही है. इसके बाद अदालत ने मामले की सुनवाई सोमवार तक के लिए टाल दी है.
इस सीरीज पर रोक लगाने की मांग सबसे पहले पंजाब पुलिस ने उठाई थी. पंजाब पुलिस के साइबर क्राइम डिवीजन ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के संयुक्त सचिव को पत्र लिखकर इस शो को प्रतिबंधित करने का आग्रह किया था. पंजाब पुलिस ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को आगाह किया कि इस सीरीज का प्रसारण राज्य की कानून-व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन सकता है.
कोर्ट की कार्यवाही के दौरान सरकारी वकील मनिन्दरजीत सिंह बेदी ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया. उन्होंने कहा कि सरकार अब तक लॉरेंस के अपराधों का गुणगान करने वाले 2600 से ज्यादा इंटरनेट लिंक्स ब्लॉक कर चुकी है.
लॉरेंस बिश्नोई वर्तमान में गुजरात की एक जेल में बंद है. वह हत्या, जबरन वसूली और डकैती जैसे दर्जनों आपराधिक मामलों का सामना कर रहा है. उसका नाम सबसे ज्यादा तब उछला जब उसने 2018 में अभिनेता सलमान खान को जान से मारने की धमकी दी. उसके करीबी सहयोगी संपत नेहरा को बेंगलुरु से गिरफ्तार किया गया, जिसने खुलासा किया कि लॉरेंस ने उसे काले हिरण शिकार मामले का बदला लेने के लिए सलमान खान की हत्या का काम सौंपा था. आगे चलकर प्रसिद्ध पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला की हत्या में उसका नाम मुख्य आरोपी के रूप में सामने आया. बिश्नोई गिरोह का प्रभाव न केवल पंजाब, बल्कि हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली तक फैला हुआ है.
यह मामला एक बार फिर ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर ‘सेंसरशिप’ और ‘कंटेंट’ को लेकर बहस छेड़ता है. जहां निर्माता इसे “संस्कृति और व्यवस्था के लेंस से एक अपराधी की यात्रा बता रहे हैं, वहीं सरकार और पुलिस इसे समाज के लिए हानिकारक मान रही है. कानून विशेषज्ञों का मानना है कि जब बात ‘लोक व्यवस्था’ की आती है, तो सरकार को हस्तक्षेप करने का अधिकार होता है.
फिलहाल के लिए ‘लॉरेंस ऑफ पंजाब’ की रिलीज अधर में लटक गई है. सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट में होने वाली सुनवाई यह तय करेगी कि क्या ज़ी 5 सरकार के इस निर्देश को चुनौती देगा या इसे स्थायी रूप से ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा.
ईरान में जंग
अरागची का पाकिस्तान दौरा, फिर बातचीत के आसार
अल जज़ीरा के संवाददाता आबिद हुसैन की रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची शुक्रवार रात एक प्रतिनिधिमंडल के साथ इस्लामाबाद पहुंच रहे हैं. हालांकि ईरान की समाचार एजेंसी ‘इर्ना’ इसे केवल द्विपक्षीय परामर्श बता रही है, लेकिन कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह अमेरिका के साथ सीधी बातचीत फिर से शुरू करने की एक गंभीर पहल है. पाकिस्तान इस समय वॉशिंगटन और तेहरान के बीच एक मुख्य मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है. उधर अमेरिका की तरफ से डोनल्ड ट्रंप के दोस्त स्टीव विटकॉफ और दामाद जारेड कुशनर के इस्लामाबाद जाने की खबर है.
लेकिन इस्लामाबाद के आम नागरिकों के लिए यह कूटनीति किसी सजा से कम नहीं है. सुरक्षा कारणों से राजधानी के ‘रेड ज़ोन’ को सील कर दिया गया है. माहीन सलीम फारूकी, जो दो बच्चों की मां और कंसल्टेंट हैं, बताती हैं कि उनकी पूरी दिनचर्या ध्वस्त हो गई है—स्कूल ऑनलाइन हो गए हैं और सड़कें बंद हैं. शहर के निवासी इस कूटनीतिक गतिरोध के जल्द खत्म होने का इंतजार कर रहे हैं.
पेंटागन की सख्ती: नाकेबंदी और बारूदी सुरंगों का साया
द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा है कि ईरान की नौसैनिक नाकेबंदी “जब तक जरूरी होगा” तब तक जारी रहेगी. ट्रम्प प्रशासन का मुख्य उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार से दूर रखना और उसे बातचीत की मेज़ पर लाना है. हेगसेथ के अनुसार, 13 अप्रैल से अब तक अमेरिकी नौसेना ने 34 जहाजों को वापस भेजा है.
होर्मुज़ जलडमरूमध्य, जो दुनिया के तेल और गैस व्यापार की लाइफलाइन है, इस समय ईरान द्वारा बिछाई गई बारूदी सुरंगों के कारण बेहद खतरनाक हो गया है. अमेरिकी सेना और खुफिया एजेंसियां इस बात पर बंटी हुई हैं कि वहां कितनी सुरंगें हैं, लेकिन इस गतिरोध ने शिपिंग को पूरी तरह बाधित कर दिया है.
एशिया का ‘सप्लाई शॉक’ और अमेरिका की चिंता
सीएनएन के लिए डेविड गोल्डमैन की विश्लेषण रिपोर्ट एक डरावनी तस्वीर पेश करती है. एशिया के कई हिस्सों में अब गैस स्टेशनों पर ईंधन की राशनिंग हो रही है और अस्पतालों में जीवन रक्षक दवाओं की कमी होने लगी है. चूंकि अमेरिका अपनी जरूरत का लगभग आधा सामान एशिया से मंगवाता है, इसलिए वहां की फैक्ट्रियों में उत्पादन रुकने का सीधा असर अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ेगा.
विशेषज्ञों के अनुसार, केवल कच्चा तेल ही नहीं, बल्कि पॉलीथीन और एल्युमीनियम जैसी बुनियादी चीजों की कमी भी दुनिया को डराने लगी है. मध्य पूर्व दुनिया का 25% पॉलीप्रोपाइलीन (प्लास्टिक का आधार) सप्लाई करता है. केपीएमजी की ऊर्जा प्रमुख एंजी गिल्डिया का कहना है कि यह संकट महामारी के दौर की याद दिला सकता है. अगर होर्मुज़ का रास्ता जल्द नहीं खुला, तो तीन से चार महीनों के भीतर ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में भारी गिरावट देखी जा सकती है.
फिलहाल दुनिया की नजरें पाकिस्तान में होने वाली संभावित बातचीत पर टिकी हैं. अगर कूटनीति विफल रहती है, तो ‘सप्लाई शॉक’ की यह लहर न केवल ईंधन की कीमतें बढ़ाएगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर गरीबी और खाद्य असुरक्षा का एक नया दौर शुरू कर सकती है.
ट्रंप द्वारा भारत को ‘नरक’ बताने वाली टिप्पणी साझा करने पर भारत का कड़ा ऐतराज: विपक्ष ने भी साधा निशाना
भारत सरकार ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अपने ‘ट्रुथ सोशल’ अकाउंट पर साझा की गई उन टिप्पणियों की तीखी आलोचना की है, जिनमें भारत को ‘नरक’ (हेल होल) और भारतीय पेशेवरों को ‘लैपटॉप वाले गैंगस्टर’ कहा गया है. ट्रंप ने रूढ़िवादी पॉडकास्टर माइकल सैवेज के एक इंटरव्यू का चार पन्नों का ट्रांसक्रिप्ट साझा किया था, जिसमें सैवेज ने अमेरिका में ‘बर्थराइट सिटीजनशिप’ (जन्म के आधार पर नागरिकता) का विरोध करते हुए कहा कि चीन, भारत या दुनिया के किसी भी “नरक” से लोग यहाँ आते हैं, बच्चा पैदा कर तुरंत नागरिकता पाते हैं और फिर अपने पूरे परिवार को भी यहाँ ले आते हैं. सैवेज ने बिना किसी सबूत के यह दावा भी किया कि कैलिफोर्निया में गोरे लोगों को हाई-टेक नौकरियाँ नहीं मिल रही हैं क्योंकि पूरा तंत्र भारतीयों और चीनियों द्वारा चलाया जा रहा है. ट्रंप द्वारा बिना किसी स्पष्टीकरण के इस पोस्ट को साझा करने से दुनिया भर में हड़कंप मच गया है.
भारत के विदेश मंत्रालय ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए इन टिप्पणियों को “तथ्यहीन, अनुचित और बेहद खराब स्तर का” बताया है. मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि ये टिप्पणियाँ भारत और अमेरिका के बीच आपसी सम्मान और साझा हितों पर आधारित मज़बूत रिश्तों की हकीकत को नहीं दर्शातीं. विवाद बढ़ते देख नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास ने बचाव में एक बयान जारी किया, जिसमें ट्रंप के पुराने बयानों का हवाला देते हुए कहा गया कि राष्ट्रपति भारत को एक महान देश मानते हैं और प्रधानमंत्री मोदी उनके अच्छे मित्र हैं.
विपक्षी दल कांग्रेस ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी पर सवाल उठाए हैं. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर लिखा कि “मोदी जी के प्रिय मित्र ‘नमस्ते ट्रंप’ ने भारत को गाली देने वाला नोट साझा किया है और मोदी जी इस पर पूरी तरह चुप हैं.” पार्टी ने मांग की है कि प्रधानमंत्री को अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने यह मामला उठाना चाहिए. वहीं, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा और आप नेता मनीष सिसोदिया ने भी ट्रंप की बयानबाज़ी की निंदा की है. दिलचस्प बात यह रही कि भारत में ईरान के वाणिज्य दूतावासों ने भी ट्रंप को ट्रोल किया. मुंबई स्थित ईरानी दूतावास ने भारत की खूबसूरती का वीडियो साझा करते हुए लिखा, “कभी इंडिया आकर देखो, फिर बोलना”.
यह विवाद ऐसे समय में आया है जब भारत-अमेरिका संबंधों में कुछ तनाव दिख रहा है. ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में रूसी तेल खरीदने को लेकर भारत पर शुल्क बढ़ाए थे, जिसे बाद में व्यापार समझौते के तहत कम कर दिया गया. इसके अलावा, ट्रंप द्वारा एच-1बी (H-1B) वीज़ा नियमों को कड़ा करने और अवैध प्रवासियों पर कार्रवाई के चलते भारतीय पेशेवरों के बीच पहले से ही असुरक्षा का माहौल है. अमेरिका में रहने वाले हिंदू संगठनों (HAF) और अमी बेरा जैसे भारतीय-अमेरिकी सांसदों ने भी ट्रंप के इस कृत्य को नस्लभेदी बताते हुए इसकी आलोचना की है.
ईरानी दूतावासों ने ट्रंप को किया ट्रोल: “कभी इंडिया आकर देखो”
अमेरिका द्वारा भारत को “नरक” कहे जाने वाली पोस्ट साझा करने के बाद, भारत में स्थित ईरान के दूतावासों ने एक अनोखे कूटनीतिक अंदाज़ में ट्रंप की खिंचाई की है. मुंबई में ईरान के महावाणिज्य दूतावास ने महाराष्ट्र के आधुनिक स्काईलाइन और प्राकृतिक नज़ारों का एक वीडियो साझा करते हुए ट्रंप को “कल्चरल डिटॉक्स” (सांस्कृतिक सफाई) की सलाह दी. उन्होंने लिखा कि ट्रंप को अपनी “बेतुकी बकवास” कम करनी चाहिए और भारत आकर यहाँ की हकीकत देखनी चाहिए. वहीं, हैदराबाद स्थित ईरानी दूतावास ने ट्वीट किया कि “भारत और चीन सभ्यताओं के पालने हैं, असली नरक वह जगह है जहाँ युद्ध अपराधी राष्ट्रपति रहते हैं.” यह कूटनीतिक तंज ऐसे समय में आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच भी तनाव चरम पर है.
इज़राइल– ग़ज़ा संघर्ष: इतिहास, नैतिकता और भारत की भूमिका
इज़राइल–फिलिस्तीन संघर्ष पर हो रही ताज़ा घटनाओं ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान इस जटिल और लंबे इतिहास मुद्दे की ओर खींचा है. हरकारा डीप डाइव में निधीश त्यागी और अपूर्वानंद की बातचीत इसी संदर्भ को गहराई से समझने की कोशिश करती है. हालिया घटना जैसे ग़ज़ा में बड़े पैमाने पर नागरिकों की मौत, इज़राइल पर युद्ध अपराध और नरसंहार के आरोप, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदलती राय, खासकर अमेरिका में जहां अब एक बड़ा वर्ग इज़राइल की नीतियों का विरोध कर रहा है. इन घटनाओं के बीच यह सवाल भी उठता है कि क्या भारत, इज़राइल के साथ अपने संबंधों के कारण, इस पूरे परिदृश्य में एक पक्ष बनता जा रहा है.
बातचीत में एक महत्वपूर्ण संदर्भ उस किताब ,इज़राइल: व्हाट वेंट रॉंग, का है जिसे एक पूर्व इज़राइली सैनिक ओमर बार्टोव ने लिखा है. यह लेखक पहले ज़ायनिज़्म का समर्थक था और इज़राइल के अस्तित्व को एक स्वाभाविक तथ्य मानता था. लेकिन समय के साथ, जब उसने इज़राइली सेना द्वारा फिलिस्तीनियों के साथ किए जा रहे व्यवहार को करीब से देखा, तो उसका नज़रिया बदला. उसने इस व्यवहार की तुलना नाज़ी जर्मनी द्वारा यहूदियों के साथ किए गए अत्याचारों से की, जिसे लेकर उसे तीखी प्रतिक्रिया भी मिली. लेखक का तर्क है कि होलोकॉस्ट के दर्द को एक नैतिक औचित्य की तरह इस्तेमाल कर इज़राइल अपने हर कदम को सही ठहराने की कोशिश करता है, जबकि ऐसा करना इतिहास और नैतिकता दोनों के साथ अन्याय है.
इस चर्चा में 1948 के “नकबा” को भी विस्तार से समझाया गया है, जब बड़ी संख्या में फिलिस्तीनियों को उनकी ज़मीन से बेदखल कर दिया गया और वे शरणार्थी बनकर ग़ज़ा जैसे इलाकों में बसने को मजबूर हुए. यह भी बताया गया कि आज की इज़राइली पीढ़ियों को इस इतिहास की पूरी जानकारी नहीं है, जिससे एक तरह का नैतिक द्वंद्व बना रहता है. ज़ायनिज़्म की विचारधारा, जो एक ओर समानता और सामूहिक जीवन की बात करती है, वहीं दूसरी ओर दूसरे की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने के विरोधाभास से जूझती है. ग़ज़ा में हालिया हमलों में हजारों लोगों की मौत, जिनमें बड़ी संख्या में बच्चे शामिल हैं, इस संकट को और गंभीर बना देती है। इज़राइल इन हमलों को 7 अक्टूबर के हमले का जवाब बताता है, जबकि आलोचक इसे कहीं बड़ा युद्ध अपराध मानते हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस संघर्ष को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में इस मुद्दे को ले जाया गया है और यह कहा गया है कि नरसंहार को रोकना पूरी दुनिया की जिम्मेदारी है. इसके बावजूद पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका, पर यह आरोप है कि उन्होंने इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए. इसी संदर्भ में भारत की भूमिका भी चर्चा में आती है. भारत, जो पहले फिलिस्तीन के समर्थन में खड़ा रहा है, अब इज़राइल के साथ अपने बढ़ते रिश्तों, खासकर रक्षा और तकनीकी सहयोग के कारण आलोचना का सामना कर रहा है. यह भी कहा गया कि इस संबंध के पीछे एक वैचारिक समानता है, जिसमें राष्ट्र की पहचान को एक धर्म विशेष से जोड़कर देखा जाता है.
चर्चा का एक अहम पहलू यह भी है कि इन नीतियों और विचारों का समाज पर क्या असर पड़ता है. इज़राइल के संदर्भ में यह कहा गया कि वहां एक ऐसा समाज बनता जा रहा है जहां हिंसा सामान्य हो गई है और लोगों में एक स्थायी असुरक्षा और आक्रामकता बनी रहती है. इसी तरह भारत में भी कुछ नीतियों और घटनाओं जैसे बुलडोज़र कार्रवाई, निगरानी तकनीकों का इस्तेमाल और नागरिक अधिकारों पर सवाल को इस “इज़राइलीकरण” के रूप में देखा जा रहा है. सोशल मीडिया पर फैलती नफरत और हिंसा की भाषा इस चिंता को और बढ़ाती है.
एनसीएल के खदान विस्तार में शहरी-ग्रामीण इलाक़े प्रभावित, कम मुआवज़े पर लोगों की ज़मीन ली जा रही
आर्टिकल 14 की रिपोर्ट के मुताबिक़ मध्य प्रदेश के सिंगरौली शहर में बड़ी संख्या में लोगों को अपने घर छोड़ने पड़ रहे हैं. शहर का लगभग एक चौथाई हिस्सा कोयला खदान बढ़ाने के लिए खाली कराया जा रहा है. यह खदान नॉर्थेर्न कोलफ़ील्ड्स (एनसीएल) चलाती है, जो कोल इंडिया लिमिटेड की कंपनी है. यह विस्तार जयंती और दुधिचुआ ओपनकास्ट खदानों के लिए किया जा रहा है, जबकि जयंती खदान 2034 तक खत्म होने वाली है, यानी आठ साल से भी कम समय में. इसके बावजूद, हज़ारों लोगों को हटाया जा रहा है. वार्ड 3 से 10 तक के लगभग 50,000 निवासी और 22,000 से अधिक घरों व व्यावसायिक ढांचों को हटाने की योजना है.
मेधौली गांव, जो सिंगरौली नगर निगम के वार्ड 10 में आता है, इस विस्थापन के केंद्र में आता है. यहां के निवासी राजेंद्र प्रसाद बासोर को 2021 में NCL से एक दस्तावेज़ मिला, जिसमें उनके मुआवज़े को 20% घटा दिया गया. 2017 में उन्हें 0.05 एकड़ जमीन के लिए लगभग 8 लाख रुपये मिलने की उम्मीद थी, लेकिन नई गणना के बाद यह राशि घटकर 6,00,847 रुपये कर दी गई है. एनसीएल ने 2020 में किए गए पुनः सर्वे को इसका कारण बताया है. बासोर और अन्य ग्रामीणों का कहना है कि 2011 में सर्वे और 2017 में सत्यापन के बाद अब उसी को गलत बताकर मुआवज़ा कम करना अनुचित है. कई ज़मीन मालिकों को भी इसी तरह के दस्तावेज़ मिला है कि 2017 में घोषित अधिक मुआवज़े को 2020 के बाद 20% घटा दिया गया है.
ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया 2010 में कोयला धारक क्षेत्र (अर्जन और विकास) अधिनियम, 1957 के तहत शुरू हुई थी, जिसमें मुआवज़ा सरकारी गाइडलाइन दरों पर तय होता है और ज़मीन मालिकों की सहमति ज़रूरी नहीं होती. बाद में 2013 में भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन अधिनियम 2013 (एलएआरआर) लागू हुआ, जिसमें बाज़ार दर के क़रीब ग्रामीण में चार गुना, शहरी में दो गुना मुआवज़ा देने का प्रावधान है. 2017 में कानून मंत्रालय ने आदेश दिया कि जहां मुआवज़ा तय नहीं हुआ है, वहां 2013 का अधिनियम लागू होगा. इसी कारण 2017 में मुआवज़ा बढ़ा और कुछ मामलों में 17% तक अधिक भुगतान तय हुआ. लेकिन 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ की सरकार ने ज़मीन की गाइडलाइन दरों को 20% घटा दिया, जिससे 2019-20 में सिंगरौली के लगभग सभी वार्डों में ज़मीन की कीमतें 19-20% कम हो गईं. एनसीएल ने इसी का फायदा उठाते हुए 2020 में नया सर्वे कराया और मुआवज़ा घटा दिया है.
कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि पहले से घोषित मुआवज़ा बाद में कम किया जाए, लेकिन एनसीएल ने बदली हुई गाइडलाइन दरों के आधार पर यह कदम उठाया है. विशेषज्ञ वासुधा छोटराय का कहना है कि कंपनियां खर्च कम करना चाहती हैं, जबकि लोगों का हित अधिक मुआवजे में है, और दोनों के बीच बराबरी नहीं होती.
यह मामला इसलिए भी अलग है क्योंकि आमतौर पर खनन के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में ज़मीन ली जाती है, लेकिन यहां शहरी इलाका प्रभावित हो रहा है., शहरी क्षेत्रों में खनन के लिए ज़मीन अधिग्रहण के मामले बहुत कम देखे गए हैं. सिंगरौली, जो पहले बांध और खदानों से विस्थापित लोगों का पुनर्वास केंद्र था, अब खुद विस्थापन झेल रहा है. यहां की नगर निगम मध्य प्रदेश में इंदौर के बाद दूसरी सबसे अमीर है, लेकिन मेधौली जैसे अनुसूचित जाति बहुल गांव विकास से वंचित रहे हैं और खदान के बिल्कुल किनारे बसे हैं, जहां सुरक्षा नियम भी लागू नहीं किए गए.
ऊर्जा ज़रूरतों के कारण भारत अभी भी कोयले पर निर्भर है, और एनसीएल का कहना है कि अगर खदान का विस्तार नहीं किया गया तो एनटीपीसी का पावर प्लांट बंद हो सकता है. हालांकि, विशेषज्ञ सुगंधा श्रीवास्तव के अनुसार यह विस्तार आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों दृष्टि से उचित नहीं है. एनसीएल की 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार कंपनी का मुनाफा घट रहा है, फिर भी वह इस परियोजना को आगे बढ़ा रही है.
स्थानीय लोगों ने शिकायतें दर्ज कराई हैं, लेकिन अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई. NCL की 2023-24 की रिपोर्ट में भी कैग ने मुआवज़े में गड़बड़ियों की ओर इशारा किया है. सिंगरौली निवासी संघ के नेता राजेश सिंह ने कहा कि यह पहली बार है जब कोल इंडिया के इतिहास में शहरी घरों और दुकानों को इस तरह हटाया जा रहा है. उन्होंने यह भी मांग की कि किरायेदारों को भी मुआवज़े में शामिल किया जाए.
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