24/02/2026: मोदी पर एप्सटीन की छाया | पीएम केयर पर सवाल | गुजरात मॉडल पर आकार पटेल | हिंदू राष्ट्र पर अपूर्वानंद | यूक्रेन पर रूसी हमले के 4 साल | महाराष्ट्र की लापता महिलाएं | जहाज के चोक्ड टायलेट्स
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
राहुल का मोदी पर हमला जारी, एप्सटीन फाइल्स, अडानी का डर, इसलिए ट्रंप के दबाव में ट्रेड डील
एपस्टीन फाइल्स का भूचाल: ‘प्रिंस’ से लेकर राजदूतों तक, गिरफ्तारियों और इस्तीफों की झड़ी
इज़राइली विपक्ष की मांग: मोदी के संसद संबोधन में सुप्रीम कोर्ट को बुलाएं, वरना होगा बहिष्कार
पीएम मोदी के इज़राइल दौरे पर ‘भू-राजनीतिक’ तूफ़ान का साया
निधीश त्यागी : क्या बीबी, मोदी के इकलौते और आखिरी दोस्त हैं?
कश्मीर, जासूसी, तोड़फोड़: कैसे मोदी का भारत ‘इज़राइल मॉडल’ को अपनाता गया
युद्ध की आग में रूस ने अपनी अर्थव्यवस्था झोंकी, भविष्य पर लगा प्रश्नचिन्ह
रूसी सैनिकों की रूह कंपा देने वाली गवाही: ‘मीट स्टॉर्म’ और अपने ही साथियों का कत्ल
ईरान पर जंग छेड़ने से पहले ही जवाब देने लगा अमेरिका का जंगी जहाज और थके हुए नौसैनिक
क्रिकेट का ‘किंग कॉन्ग’: भारत की दादागिरी से विश्व क्रिकेट में अलगाव का खतरा
2025 में महाराष्ट्र में 48,000 से अधिक महिलाएं लापता हुईं, मुंबई में लड़कियों के गुम होने के मामले 10 गुना बढ़े
लखनऊ विवि: नमाज़ अदा करने पर छात्रों को 50 हजार का बांड और दो जमानतदार लाने का निर्देश
आकार पटेल : इंसानियत के मलबे पर खड़ी गुजरात मॉडल की राष्ट्रीय इमारत
मुस्लिम पहचान पर घर से इनकार, संवैधानिक मूल्यों से दूरी दिखाता है: जस्टिस उज्जल भुइयां
अपूर्वानंद : हिंदू राष्ट्र के भ्रम, अंतरविरोध और दुहरे मापदंड
पीएम केयर्स फंड पर पारदर्शिता और जवाबदेही पर अंजली भारद्वाज के सवाल
राहुल का मोदी पर हमला जारी, एप्सटीन फाइल्स, अडानी का डर, इसलिए ट्रंप के दबाव में ट्रेड डील
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी ने एप्सटीन फाइल्स के कारण और उद्योगपति अडानी को बचाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में भारत-अमेरिका व्यापार समझौता किया.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मंगलवार को भोपाल में आयोजित ‘किसान महाचौपाल’ रैली को संबोधित करते हुए इस अंतरिम व्यापार समझौते की तुलना भारतीय किसानों के दिलों में धँसते हुए तीर से की. यह हमारे किसानों के हितों के खिलाफ है.
लोकसभा में विपक्ष के नेता ने कहा, “अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय के व्यापार समझौते पर फैसले के बाद मैं प्रधानमंत्री मोदी को चुनौती देता हूँ कि वह इसे रद्द करें... खासकर तब जब अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वैश्विक टैरिफ को खारिज कर दिया है. लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाएंगे.”
‘एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस’ के अनुसार, राहुल गांधी ने भोपाल में कांग्रेस की पहली राष्ट्रव्यापी किसान महाचौपाल रैली को संबोधित करते हुए कहा: “अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसले के बाद कई देश अमेरिका के साथ अपने समझौते पर पुनर्विचार या उन्हें रद्द कर रहे हैं. लेकिन मोदी जी चुप हैं. मुझे पता है कि वे रद्द नहीं करेंगे. भाजपा कार्यकर्ताओं, मैं आपको बता रहा हूँ, वे ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि वे राष्ट्रपति ट्रंप और अमेरिका के भारी दबाव में हैं. एप्सटीन फाइल्स और अडानी पर आपराधिक मामले का डर उनके सिर पर मंडरा रहा है.”
उन्होंने आगे कहा: “मैं लिखकर दे सकता हूँ कि अगर वे दबाव में नहीं होते तो यह समझौता कभी नहीं करते. उन्होंने भारत को बेच दिया है, किसानों, वस्त्र और परिधान क्षेत्रों के हितों को गिरवी रख दिया है और भारत का पूरा डेटा अमेरिका को सौंप दिया है, सिर्फ अपनी छवि और राजनीतिक भविष्य बचाने के लिए. लेकिन मैं आपको बता दूँ, वे बच नहीं पाएंगे. कोई ताक़त उन्हें नहीं बचा सकती.”
राहुल गांधी ने कहा: “मैं आपको बताता हूँ, यह समझौता राष्ट्रपति ट्रंप की इच्छा के अनुसार दो कारणों से जल्दबाज़ी में किया गया. पहला, एप्सटीन फाइल्स का डर और दूसरा, अडानी (भारतीय उद्योगपति गौतम अडानी) के खिलाफ अमेरिका में आपराधिक मामला. उन्होंने आगे आरोप लगाया: “प्रधानमंत्री मोदी ने हमारा देश अमेरिका को बेच दिया है. यह केवल मैं नहीं कह रहा हूँ, बल्कि हर आरएसएस-भाजपा कार्यकर्ता के दिल में यही बात है. वे सब जानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी को अमेरिका ने दो तरीकों से जकड़ रखा है– अप्रकाशित एप्सटीन फाइल्स का डर और अडानी के खिलाफ आपराधिक मामला, जिसका असली निशाना मोदी ही हैं. भारत-अमेरिका व्यापार समझौता हर भारतीय किसान के दिल में धँसा हुआ तीर है. 21वीं सदी में जिसके पास सबसे अधिक डेटा होगा, वही वैश्विक स्तर पर ताक़तवर होगा. सबसे बड़ी आबादी वाला भारत दुनिया में सबसे अधिक डेटा रखता है, उसके बाद चीन है. अमेरिका अच्छी तरह जानता था कि चीन का सामना करने के लिए भारतीय डेटा उसके लिए बेहद अहम है. यह अनुचित व्यापार समझौते के ज़रिए अमेरिका को सौंप दिया जाएगा.”
विपक्ष के नेता ने प्रधानमंत्री मोदी से पूछा कि भारत ने इस व्यापार समझौते से वास्तव में क्या हासिल किया है. उन्होंने कहा: “मैं आपको बताता हूँ, भारत को कुछ भी नहीं मिला. उल्टा, असली लाभ तो बांग्लादेश को होगा, क्योंकि अमेरिका ने चीन से आने वाले कुछ वस्त्र और परिधान उत्पादों पर शून्य पारस्परिक टैरिफ तय किया है.”
राहुल गांधी ने कहा कि संसद में गतिरोध के दौरान पीएम मोदी “लोकसभा से भाग खड़े हुए” और उन्होंने सीधे तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को फोन किया. राहुल ने कहा, “सच्चाई यह है कि प्रधानमंत्री संसद में खड़े नहीं हो सके. उन्होंने कैबिनेट से कोई सलाह नहीं ली. आप शिवराज सिंह चौहान जी, राजनाथ सिंह जी या नितिन गडकरी जी से पूछ लीजिए... कैबिनेट को अंधेरे में रखा गया. प्रधानमंत्री ने सीधे फोन पर कहा, ‘मैं डील करने के लिए तैयार हूं’.” राहुल गांधी ने इस समझौते को किसानों की पीठ में छुरा घोंपने जैसा बताया. उन्होंने आरोप लगाया, “मोदी जी ने भारत के किसानों को बेच दिया. गारमेंट इंडस्ट्री को बेच दिया और हमारा सारा डेटा अमेरिका को सौंप दिया.”
एपस्टीन फाइल्स का जिक्र करते हुए राहुल ने सनसनीखेज दावा किया. उन्होंने कहा, “अमेरिका में लाखों एपस्टीन फाइलें बंद पड़ी हैं... ईमेल, मैसेज, वीडियो, सब कुछ. ब्लैकमेल करने के लिए इनका चयनात्मक इस्तेमाल किया जा रहा है.” उन्होंने आगे कहा, “अनिल अंबानी मेरे दोस्त नहीं हैं. नरेंद्र मोदी जी, आप देश को बताइए कि अनिल अंबानी से आपका क्या रिश्ता है? अनिल अंबानी का नाम एपस्टीन फाइल में है. हरदीप सिंह पुरी का नाम एपस्टीन फाइल में है. और भी कई नाम हैं जो अभी छिपे हुए हैं. यही पहली वजह है कि मोदी जी दबाव में हैं.”
राहुल ने दूसरा कारण बताते हुए कहा कि अमेरिका में गौतम अडानी के खिलाफ चल रहा आपराधिक मामला एक गंभीर खतरा है. “अडानी जी अमेरिका नहीं जा सकते... उन्हें डर है कि अगर वे भारत से बाहर गए तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा. लेकिन उस केस का असली निशाना अडानी नहीं, बल्कि वह तीर नरेंद्र मोदी जी की तरफ चलाया जा रहा है.”
किसान महाचौपाल को संबोधित करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यवहार – विशेषकर अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय के टैरिफ पर फैसले की अवहेलना – की तुलना दिल्ली के अठारहवें सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक से की और प्रधानमंत्री मोदी की तुलना जर्मन चांसलर एडॉल्फ हिटलर से की.
खड़गे ने कहा: “दोनों के बीच हुआ यह समझौता हमारे किसानों और उद्योग को बर्बाद कर देगा. पिछले 8-10 वर्षों से प्रधानमंत्री मोदी कहते रहे हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप उनके करीबी मित्र हैं और अक्सर खुद को सच्चा देशभक्त बताते रहे हैं. अगर वे सच में देशभक्त होते, तो राष्ट्रपति ट्रंप के साथ इस अनुचित समझौते के ज़रिए भारत के हितों को नहीं बेचते. अपने 60 साल के राजनीतिक करियर में मैंने इतना कायर प्रधानमंत्री कभी नहीं देखा.”
एपस्टीन फाइल्स का भूचाल: ‘प्रिंस’ से लेकर राजदूतों तक, गिरफ्तारियों और इस्तीफों की झड़ी
अमेरिका के न्याय विभाग द्वारा कुख्यात यौन अपराधी जेफरी एपस्टीन से जुड़े लाखों दस्तावेज़ और ईमेल सार्वजनिक किए जाने के बाद वैश्विक अभिजात वर्ग में हड़कंप मच गया है. अल जजीरा की रिपोर्टर आलिया चुगताई के अनुसार, इस खुलासे के बाद दुनिया भर के कई रसूखदार लोगों को गिरफ्तार किया गया है या उन्हें अपने पदों से इस्तीफा देना पड़ा है. सोमवार को ब्रिटेन के वरिष्ठ राजनेता और पूर्व मंत्री पीटर मैंडेलसन को गिरफ्तार कर लिया गया. उन पर आरोप है कि उन्होंने व्यापार प्रतिनिधि रहते हुए एपस्टीन के साथ गोपनीय सरकारी जानकारी साझा की थी. मैंडेलसन को वर्तमान ब्रिटिश पीएम कीर स्टारमर ने 2025 में अमेरिका में राजदूत नियुक्त किया था, लेकिन एपस्टीन के साथ उनके गहरे संबंधों के खुलासे के बाद उन्हें बर्खास्त कर दिया गया है. 2008 के एक ईमेल में मैंडेलसन ने एपस्टीन को सजा मिलने पर दुख जताते हुए लिखा था, “मैं तुम्हारे लिए बहुत दुखी हूं... यह ब्रिटेन में कभी नहीं हो सकता था.”
यह कार्रवाई ब्रिटेन के शाही परिवार के सदस्य एंड्रयू माउंटबेटन-विंडसर (पूर्व प्रिंस एंड्रयू) की गिरफ्तारी के ठीक बाद हुई है. किंग चार्ल्स के भाई एंड्रयू को 19 फरवरी, 2026 को ‘सार्वजनिक कार्यालय में कदाचार’ के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और बाद में जमानत मिली. फाइलों से पता चलता है कि उन्होंने भी संवेदनशील दस्तावेज लीक किए थे. शाही परिवार ने उनसे पहले ही सभी सैन्य और शाही उपाधियां छीन ली हैं.
स्कैंडल की आंच नॉर्वे तक भी पहुंची है. नॉर्वे की क्राउन प्रिंसेस मेटे-मारिट को एपस्टीन के साथ अपनी लंबी दोस्ती के लिए सार्वजनिक माफी मांगनी पड़ी है. ईमेल दिखाते हैं कि वे एपस्टीन के पाम बीच स्थित घर में रुकी थीं. वहीं, नॉर्वे के पूर्व प्रधानमंत्री थोरबजोर्न जागलैंड के घर पर भ्रष्टाचार की जांच के तहत छापेमारी की गई है. उन पर आरोप है कि एपस्टीन ने उनकी यात्राओं का खर्च उठाया था और पुतिन के साथ बैठक कराने की कोशिश की थी. नॉर्वे की वरिष्ठ राजनयिक मोना जूल ने जॉर्डन और इराक के राजदूत पद से इस्तीफा दे दिया है, जबकि उनके पति टेर्जे रोड-लार्सन पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं.
व्यापार जगत के दिग्गजों पर भी गाज गिरी है. डीपी वर्ल्ड के पूर्व चेयरमैन और सीईओ सुल्तान अहमद बिन सुलेयम ने तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे दिया है. 2013 के एक लीक ईमेल में सुलेयम ने एपस्टीन को “सबसे भरोसेमंद दोस्त” बताया और लिखा, “मैं अपनी यॉट पर एक फ्रेश 100% फीमेल रशियन का सैंपल ले रहा हूं.” इसके अलावा, हयात होटल्स के थॉमस प्रित्जकर और गोल्डमैन सैक्स की पूर्व लीगल चीफ कैथी रुमलर ने भी एपस्टीन के साथ संबंधों के चलते अपने पद छोड़ दिए हैं.
मोदी का इजराइल दौरा
इज़राइली विपक्ष की मांग: मोदी के संसद संबोधन में सुप्रीम कोर्ट को बुलाएं, वरना होगा बहिष्कार
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इज़राइल दौरे और संसद (क्नेसेट) में उनके संबोधन से ठीक पहले वहां एक बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है. रॉयटर्स और द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, इज़राइल के विपक्ष ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को चेतावनी दी है कि यदि प्रोटोकॉल का पालन करते हुए सुप्रीम कोर्ट के अध्यक्ष यित्जाक अमित को आमंत्रित नहीं किया गया, तो विपक्ष मोदी के भाषण का बहिष्कार करेगा.
विपक्ष के नेता यायर लैपिड ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर नेतन्याहू से अपील की है. उन्होंने लिखा, “एक महान मित्र और सहयोगी की यात्रा के दौरान दुनिया को हमें एकजुट देखना चाहिए. (स्पीकर) अमीर ओहाना को फोन करें और उन्हें सुप्रीम कोर्ट के अध्यक्ष को आमंत्रित करने का निर्देश दें.” दरअसल, क्नेसेट के स्पीकर अमीर ओहाना ने स्पष्ट कर दिया है कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के अध्यक्ष को आमंत्रित नहीं किया है, जो इज़राइल में चल रहे न्यायपालिका और सरकार के बीच के भीषण टकराव का हिस्सा है. लैपिड ने चेतावनी दी कि नेतन्याहू की सरकार को इस घरेलू राजनीतिक झगड़े को मोदी की यात्रा के बीच में नहीं लाना चाहिए, क्योंकि इससे “इज़राइल के सबसे महत्वपूर्ण गठबंधनों में से एक को नुकसान पहुंचेगा.” सोमवार को स्पीकर ओहाना ने कहा था कि विपक्ष के बहिष्कार की स्थिति में वे खाली सीटों को पूर्व सांसदों से भर देंगे, जिससे स्थिति और तनावपूर्ण हो गई है. यह विवाद ऐसे समय में हो रहा है जब मोदी 25 फरवरी से अपनी दो दिवसीय यात्रा शुरू करने वाले हैं.
पीएम मोदी के इज़राइल दौरे पर ‘भू-राजनीतिक’ तूफ़ान का साया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 25 फरवरी, 2026 को इज़राइल के दो दिवसीय दौरे पर जा रहे हैं, लेकिन यह यात्रा अभूतपूर्व भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच हो रही है. हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, पीएम मोदी और इज़राइली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू के बीच रक्षा, एआई और आईमेक प्रोजेक्ट पर अहम चर्चा होनी है. नेतन्याहू इस दौरान “हेक्सागोनल एलायंस” की घोषणा करने की योजना बना रहे हैं, जिसमें भारत, ग्रीस, साइप्रस और कुछ अरब देश शामिल होंगे. इसका मकसद “कट्टरपंथी सुन्नी और शिया धुरी” का मुकाबला करना है.
विश्लेषकों का मानना है कि इस “गठबंधन” में भारत का शामिल होना ईरान, तुर्किये और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ उसके रिश्तों को जटिल बना सकता है. यह स्थिति तब और नाजुक हो जाती है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान पर हमले की धमकी दी है. भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री को संसद में आश्वासन देना पड़ा कि युद्ध की स्थिति में पीएम की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी, लेकिन कूटनीतिक ‘क्रॉस-फायर’ से बचना मुश्किल होगा.
यह दौरा गाजा युद्ध के बाद हो रहा है, जिसमें 70,000 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं. वेस्ट बैंक पर इज़राइल के बढ़ते नियंत्रण को लेकर भारत की चुप्पी और संयुक्त राष्ट्र में देरी से प्रतिक्रिया देने पर भी सवाल उठ रहे हैं. इसके अलावा, अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा जेफरी एपस्टीन की फाइलों में 2017 के मोदी दौरे को लेकर किए गए दावों ने माहौल को और गरम कर दिया है, हालांकि भारतीय विदेश मंत्रालय ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है. मोदी के इस दौरे पर सिर्फ द्विपक्षीय समझौतों पर ही नहीं, बल्कि उनके द्वारा दिए जाने वाले संकेतों पर भी पूरी दुनिया की नजर होगी.
इसी सिलसिलेे में हरकारा की पेशकश सुनिये निधीश त्यागी के साथ मोदी और नेतन्याहू की दोस्ती के बारे में.
कश्मीर, जासूसी, तोड़फोड़: कैसे मोदी का भारत ‘इज़राइल मॉडल’ को अपनाता गया
‘अलजज़ीरा’ में यशराज शर्मा की रिपोर्ट है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने खुले तौर पर इज़राइल को अपनाया है, और नई दिल्ली केवल हथियार ही नहीं बल्कि उससे कहीं अधिक चीज़ें आयात करती हुई प्रतीत होती है. भारत और इज़राइल के बीच संबंध हाल के वर्षों में केवल व्यापार और रक्षा तक सीमित नहीं रहे, बल्कि शासन और सुरक्षा नीतियों में भी समानताएँ दिखाई देती हैं. रिपोर्ट में बताया गया है कि मोदी सरकार ने इज़राइल से कई नीतिगत और सुरक्षा उपाय अपनाए हैं, जिनका असर कश्मीर और भारत के मुसलमानों पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है.
शर्मा की रिपोर्ट के अनुसार, भारत-इज़राइल द्विपक्षीय संबंधों के केंद्र में उनके रक्षा संबंध और एक-दूसरे से मिलती-जुलती सुरक्षा नीति है. भारत इज़राइली हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार है और अरबों डॉलर की खरीद करता है.
भारत ने ग़ाज़ा पर चल रहे इज़राइल के नरसंहारक युद्ध के दौरान भी उसे हथियार उपलब्ध कराए हैं. इज़राइल ने भारतीय सैनिकों के लिए अपनी सेना के साथ संयुक्त प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए हैं और साथ ही यूएवी, वायु रक्षा प्रणाली, उन्नत रडार और निगरानी तकनीक सहित कई इज़राइली प्रणालियाँ प्रदान की हैं.
लेकिन सुरक्षा-केंद्रित भारतीय राज्य के समर्थकों के बीच, इज़राइल का आकर्षण केवल उन्नत हथियारों की आपूर्ति से कहीं अधिक रहा है. 22 अप्रैल 2025 को भारतीय प्रशासित कश्मीर के पर्यटक नगर पहलगाम में बंदूकधारियों ने 26 नागरिकों की हत्या कर दी. इसके बाद भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में कई स्थानों पर बमबारी की और इस्लामाबाद पर पर्यटकों पर हमले के पीछे होने का आरोप लगाया. पाकिस्तान ने किसी भी भूमिका से इनकार किया और जवाबी कार्रवाई में मिसाइलें और ड्रोन दागे. परमाणु हथियारों से लैस दोनों पड़ोसी देशों के बीच चार दिन तक तीव्र हवाई युद्ध चला.
उस अवधि में, कई भारतीय टीवी समाचार चैनलों पर बहस और कार्यक्रमों में कश्मीर हमले के बाद इज़राइल का बार-बार उल्लेख हुआ. एंकर अर्नब गोस्वामी ने कहा, “22 अप्रैल भारत के लिए वही है जो 7 अक्टूबर इज़राइलियों के लिए था.” (संदर्भ 2023 में हमास द्वारा दक्षिणी इज़राइल पर हमले का था). कार्यक्रम के एक अतिथि ने कहा, “हम मांग करते हैं कि पाकिस्तान को ग़ाज़ा बना दिया जाए.”
भारतीय प्रशासित कश्मीर में तैनात रहे एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने एक हिंदी अख़बार से कहा, “हमें इज़राइल की तरह जवाब देना चाहिए.”
भारत को इज़राइल से मिलने वाले सबसे विवादास्पद सुरक्षा निर्यातों में से एक है उन्नत स्पाइवेयर पेगासस, जिसे इज़राइली सॉफ़्टवेयर कंपनी एनएसओ ग्रुप ने बनाया है. ‘द वायर’ के सह-संस्थापक सिद्धार्थ वरदराजन उन पत्रकारों में शामिल थे, जिन्हें इस स्पाइवेयर ने निशाना बनाया था. बताया जाता है कि इज़राइली कंपनी ने इसे मोदी सरकार को एक गुप्त रक्षा समझौते के तहत बेचा था.
वरदराजन ने ‘अल जज़ीरा’ को बताया, “इज़राइली स्पाइवेयर एक आईफोन को व्यक्तिगत जासूसी उपकरण में बदल देता है.” उन्होंने अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा कि यह गुप्त रूप से वीडियो और तस्वीरें रिकॉर्ड कर सकता है और उन्हें प्रसारित कर सकता है. भारत और इज़राइल की नीतियों में समान पैटर्न का उल्लेख करते हुए वरदराजन ने कहा, “यह बहुत अफ़सोस की बात है कि जिन तरीकों का इस्तेमाल इज़राइली लोग कब्ज़े वाले लोगों के खिलाफ करते हैं, वही मोदी सरकार अपने ही नागरिकों के खिलाफ कर रही है.”
भारत और इज़राइल के बीच हाल के वर्षों में संबंध गहराते गए हैं. विश्लेषकों का कहना है कि इन रिश्तों की नींव साझा वैचारिक दृष्टि और सुरक्षा नीतियों पर टिकी है. 2019 में न्यूयॉर्क में भारत के तत्कालीन महावाणिज्य दूत संदीप चक्रवर्ती ने कश्मीर में “इज़राइली मॉडल” अपनाने की बात कही थी. उन्होंने इज़राइल की बस्तियों का हवाला देते हुए कश्मीरी हिंदुओं के पुनर्वास का समर्थन किया. विश्लेषकों का कहना है कि मोदी सरकार ने इज़राइल से कई नीतिगत तत्व अपनाए हैं.
भारत में “बुलडोज़र न्याय” नीति को इज़राइल से प्रेरित बताया जाता है. भाजपा शासित राज्यों में मुसलमानों के घर, दुकानें और मस्जिदें बिना कानूनी नोटिस गिराई गईं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को समर्थक “बुलडोज़र बाबा” कहते हैं. इज़राइल ने भी फ़िलिस्तीनी घरों को ध्वस्त कर अवैध बस्तियाँ बसाई हैं.
भारत में मुसलमानों को सामाजिक बहिष्कार, किराए पर घर न मिलने और स्कूलों में उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है. सर्वोच्च न्यायालय ने नवंबर 2024 में आदेश दिया कि बिना कानूनी प्रक्रिया के कोई संपत्ति नहीं गिराई जा सकती, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कार्रवाई जारी रही.
विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा की हिंदुत्व विचारधारा और इज़राइल का यहूदी राष्ट्रवाद एक-दूसरे से मेल खाते हैं. दोनों ही मुसलमानों को जनसांख्यिकीय और सुरक्षा खतरे के रूप में देखते हैं. आज़ाद ईसा और सुमंत्रा बोस जैसे विशेषज्ञों ने कहा कि मोदी सरकार ने इज़राइल को एक मॉडल के रूप में अपनाया है.
कश्मीर को अगस्त 2019 में अर्ध-स्वायत्त दर्जा से वंचित कर दिया गया. राजनीतिक संवाद बंद कर दिया गया और सैन्यीकरण बढ़ा. यह स्थिति इज़राइल के वेस्ट बैंक में अपनाए गए तरीकों से मिलती-जुलती बताई जाती है. चौकियों, छापों और संचार बंदी के ज़रिए नियंत्रण कायम रखा गया.
यूक्रेन पर रूसी हमले के 4 साल
युद्ध की आग में रूस ने अपनी अर्थव्यवस्था झोंकी, भविष्य पर लगा प्रश्नचिन्ह
यूक्रेन युद्ध के चार साल बीत जाने के बाद, राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने रूस की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से ‘युद्ध अर्थव्यवस्था’ में बदल दिया है, लेकिन इसकी कीमत देश के भविष्य को चुकानी पड़ रही है. द न्यूयॉर्क टाइम्स के पॉल सोन की रिपोर्ट के अनुसार, रूस के संघीय बजट का लगभग 40% हिस्सा अब सेना और सुरक्षा पर खर्च हो रहा है. शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे जैसे विकास कार्य लगभग ठप पड़े हैं.
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि युद्ध में अब तक 1.2 मिलियन (12 लाख) रूसी सैनिक मारे गए या घायल हुए हैं. इससे देश में भीषण जनसांख्यिकीय संकट पैदा हो गया है—युवा कार्यबल की कमी हो गई है और जनसंख्या तेजी से घट रही है. रूस का ‘नेशनल वेल्थ फंड’, जो तेल और गैस की कमाई से बुरे वक्त के लिए बनाया गया था, उसका लिक्विड रिज़र्व युद्ध से पहले के 113 अरब डॉलर से घटकर मात्र 55 अरब डॉलर रह गया है.
विशेषज्ञों का कहना है कि पुतिन के पास रूस के लिए कोई दीर्घकालिक आर्थिक विजन नहीं है, वे सिर्फ़ अतीत के गौरव को हासिल करने के लिए वर्तमान संसाधनों को जला रहे हैं. रूस अब तकनीक और बाज़ार के लिए चीन पर पूरी तरह निर्भर हो चुका है. देश के भीतर भी असंतोष बढ़ रहा है. एक ताज़ा सर्वे के अनुसार, 18-29 वर्ष के 59% रूसी युवा अब चाहते हैं कि पुतिन अपने घोषित लक्ष्यों को हासिल किए बिना ही युद्ध समाप्त कर दें. प्रतिबंधों से बचने के लिए रूस ने कई ‘जुगाड़’ किए हैं, लेकिन इससे कोई नया विकास नहीं हो रहा है, बस पुरानी व्यवस्था को किसी तरह चलाया जा रहा है.
रूसी सैनिकों की रूह कंपा देने वाली गवाही: ‘मीट स्टॉर्म’ और अपने ही साथियों का कत्ल
बीबीसी की एक विशेष डॉक्युमेंट्री ‘The Zero Line’ में चार रूसी सैनिकों ने यूक्रेन युद्ध के मोर्चे पर चल रही अमानवीयता का ऐसा सच उजागर किया है जो रोंगटे खड़े कर देने वाला है. बीबीसी के लिए बेन स्टील की रिपोर्ट के मुताबिक, इन सैनिकों ने बताया कि रूसी सेना में अनुशासन पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है और कमांडर अपने ही सैनिकों को आदेश न मानने पर गोली मार रहे हैं—जिसे वहां “ज़ीरोइंग” कहा जाता है.
एक पूर्व सैनिक, इल्या, जिसका काम मृतकों की पहचान करना था, ने बताया कि उसने अपने कमांडर को चार साथियों को बेहद करीब से गोली मारते देखा. उनका कसूर सिर्फ इतना था कि वे फ्रंट लाइन से भागने की कोशिश कर रहे थे. इल्या ने बताया, “मैंने उनमें से एक को चिल्लाते हुए सुना ‘मत मारो, मैं कुछ भी करूंगा’, लेकिन कमांडर ने फिर भी उन्हें ‘ज़ीरो’ कर दिया.” इल्या ने यह भी बताया कि जब उसने एक हमले में जाने से मना किया, तो उसे पेड़ से बांध दिया गया, डंडों से पीटा गया और उस पर पेशाब किया गया. अपमान और डर के कारण उसने आत्महत्या की भी कोशिश की.
एक अन्य सैनिक, दीमा, ने अपने कमांडर अलेक्सी क्सेनोफोंटोव को “कसाई” करार दिया. क्सेनोफोंटोव को 2024 में रूस के सर्वोच्च सम्मान ‘हीरो ऑफ रशिया’ से नवाजा गया था, लेकिन दीमा का दावा है कि उसने अपने हाथों से चार सैनिकों को गोली मारी. दीमा ने बताया कि उसने एक गड्ढे में 20 रूसी सैनिकों के शव देखे, जिन्हें उनके ही साथियों ने मारा था और उनके बैंक कार्ड चुरा लिए थे ताकि उनकी तनख्वाह का गबन किया जा सके. दीमा ने कहा, “यह कोई फिल्म नहीं है, यह असली है. बस क्लिक, क्लैक, और बैंग... काम तमाम.”
सैनिकों ने रूसी सेना की “मीट स्टॉर्म” रणनीति का भी खुलासा किया. इसमें सैनिकों की लहरों को बार-बार यूक्रेन की ओर भेजा जाता है, यह जानते हुए भी कि वे मारे जाएंगे. मकसद सिर्फ इतना होता है कि यूक्रेनी सेना का गोला-बारूद खत्म हो जाए ताकि अगली लहर आगे बढ़ सके. दीमा ने कहा, “पहले तीन भेजते हैं, फिर दस, फिर पचास... जब तक कि रास्ता न बन जाए. भले ही तीन दिन में पूरी रेजीमेंट खत्म हो जाए.”
ईरान पर जंग छेड़ने से पहले ही जवाब देने लगा अमेरिका का जंगी जहाज और थके हुए नौसैनिक
मध्य पूर्व में ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच, अमेरिकी विमानवाहक पोत ‘यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड’ की तैनाती को राष्ट्रपति ट्रम्प के आदेश पर दूसरी बार बढ़ा दिया गया है. द वॉल स्ट्रीट जर्नल की लारा सेलिगमैन की रिपोर्ट के अनुसार, 8 महीने से लगातार समुद्र में तैनात इस विशाल युद्धपोत के नाविकों और उनके परिवारों का सब्र अब जवाब दे रहा है. जहाज पर जीवन बेहद कठिन हो गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, जहाज का सीवेज सिस्टम अक्सर खराब रहता है, जिससे टॉयलेट काम नहीं करते. एक नाविक के पिता ने बताया कि उनका बेटा टॉयलेट की समस्याओं से जूझ रहा है. इसके अलावा, सुरक्षा कारणों से जहाज अक्सर “घोस्ट मोड” में रहता है, जिससे नाविक हफ्तों तक अपने परिवारों से संपर्क नहीं कर पाते. एक नाविक अपने परदादा के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सका, तो एक महिला नाविक अपनी छोटी बेटी को बड़ा होते नहीं देख पा रही है. कमांडर ने स्वीकार किया है कि इस विस्तार की खबर “चुभने वाली” थी, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि वे जल्द घर लौटेंगे. कई नाविकों ने नेवी छोड़ने का मन बना लिया है क्योंकि वे अनिश्चितता और थकान से टूट चुके हैं. तैनाती के बार-बार बढ़ने से न केवल क्रू के मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है, बल्कि जहाज के रखरखाव और उपकरणों पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है.
क्रिकेट का ‘किंग कॉन्ग’: भारत की दादागिरी से विश्व क्रिकेट में अलगाव का खतरा
टेलीग्राफ में मुकुल केसवन अपने विचारोत्तेजक लेख में तर्क देते हैं कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) अब वैश्विक क्रिकेट में एक “धौंस जमाने वाले” की तरह व्यवहार कर रहा है, जो लंबे समय में भारत की सॉफ्ट पावर के लिए नुकसानदेह होगा. केशवन लिखते हैं कि आईपीएल की अकूत दौलत ने भारत को क्रिकेट का अघोषित शासक बना दिया है, लेकिन भारत इस ताकत का इस्तेमाल कूटनीतिक जिम्मेदारी के बजाय जबरदस्ती के लिए कर रहा है.
लेखक ने कोलकाता नाइट राइडर्स (केकेआर) द्वारा बांग्लादेशी खिलाड़ी मुस्तफिजुर रहमान को नीलामी में खरीदने के बाद अचानक टीम से बाहर करने के उदाहरण का हवाला दिया. आरोप है कि ऐसा बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों के बाद बने राजनीतिक दबाव और आगामी पश्चिम बंगाल चुनावों में भाजपा के फायदे के लिए किया गया. केशवन चेतावनी देते हैं कि पाकिस्तान और अब बांग्लादेश के खिलाड़ियों के साथ ऐसा व्यवहार कर भारत अपने पड़ोसियों को दुश्मन बना रहा है. बीबीसी की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा कि इंग्लैंड की ‘द हंड्रेड’ लीग में भी भारतीय मालिक पाकिस्तानी खिलाड़ियों से दूरी बना रहे हैं, जो एक खतरनाक मिसाल है. केशवन निष्कर्ष निकालते हैं, “दादागिरी करने वाले के पास कोई रणनीतिक समझ नहीं होती. कोई भी संप्रभु राष्ट्र लंबे समय तक इस अपमान को बर्दाश्त नहीं करेगा और भारत अंततः अलग-थलग पड़ सकता है.”
2025 में महाराष्ट्र में 48,000 से अधिक महिलाएं लापता हुईं, मुंबई में लड़कियों के गुम होने के मामले 10 गुना बढ़े
मंगलवार को महाराष्ट्र सरकार ने राज्य विधानसभा को सूचित किया कि वर्ष 2025 में राज्य से 48,278 महिलाओं के गुम होने की रिपोर्ट दर्ज हुई, जिनमें से 36,581 का पता लगाया जा चुका है, जबकि 11,697 अब भी लापता हैं. उसी वर्ष 12,113 नाबालिग लड़कियों के गुम होने की रिपोर्ट दर्ज हुई, जिनमें से अब तक 10,295 का पता लगाया जा चुका है.
सोनू श्रीवास्तव की रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई में 2025 में 1,723 लड़कियों के गुम होने के मामले दर्ज हुए, जो 2024 की तुलना में लगभग दस गुना अधिक हैं. महाराष्ट्र में 15–18 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों के गुम होने के 2024–25 के आँकड़ों की तुलनात्मक समीक्षा से पता चला कि कुल मामलों में वृद्धि हुई है, विशेषकर मुंबई और नवी मुंबई जैसे शहरी केंद्रों में लड़कियों के बीच.
भाजपा विधायक अतुल भातखलकर और संजय उपाध्याय तथा शिवसेना के विधायक मंगेश कुदालकर सहित अन्य सदस्यों ने 2024 और 2025 के बीच महाराष्ट्र में कुल 37,695 लड़कियों और महिलाओं के गुम होने की रिपोर्ट पर विवरण माँगा, जिनमें 4,096 नाबालिग लड़कियाँ और 33,599 वयस्क महिलाएँ शामिल थीं.
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा: “महाराष्ट्र में 2024 के दौरान कुल 45,662 महिलाओं के गुम होने की रिपोर्ट दर्ज हुई, जिनमें से 30,877 का पता लगाया गया. उसी वर्ष 11,316 नाबालिग लड़कियाँ गुम हुईं, जिनमें से 8,475 का पता लगाया गया. 2025 में 48,278 महिलाओं के गुम होने की रिपोर्ट दर्ज हुई, जिनमें से 36,581 का पता लगाया गया. इसके अलावा, 2025 में 12,113 नाबालिग लड़कियाँ गुम हुईं, जिनमें से 10,295 का पता लगाया गया.”
केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ को मंज़ूरी
मंगलवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने केरल सरकार के उस प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी, जिसमें राज्य का नाम बदलकर “केरलम” करने की बात कही गई थी. यह कदम अप्रैल–मई में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले उठाया गया है.
‘टीएनआईई’ के मुताबिक, केरल विधानसभा ने जून 2024 में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें राज्य का नाम “केरल” से बदलकर “केरलम” करने की मांग की गई थी. गौरतलब है कि केरल विधानसभा ने दूसरी बार यह प्रस्ताव पारित किया था, क्योंकि गृह मंत्रालय ने पहले प्रस्ताव में तकनीकी बदलाव सुझाए थे.
मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव में कहा गया था कि राज्य को मलयालम में “केरलम” कहा जाता है और मलयालम भाषी समुदायों के लिए एकीकृत केरल राज्य बनाने की मांग राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के समय से ही प्रबल रही है. लेकिन संविधान की पहली अनुसूची में राज्य का नाम “केरल” लिखा गया है.
लखनऊ विवि: नमाज़ अदा करने पर छात्रों को 50 हजार का बांड और दो जमानतदार लाने का निर्देश
लखनऊ विश्वविद्यालय के 13 छात्रों को लाल बारादरी में नमाज़ अदा करने पर नोटिस जारी किए गए हैं. हसनगंज थाने की रिपोर्ट के आधार पर प्रशासन ने कहा कि इस घटना से परिसर में तनाव पैदा हुआ और भविष्य में शांति भंग होने की आशंका बनी हुई है. कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने छात्रों को ₹50,000 का व्यक्तिगत बांड और पचास-पचास हजार रुपये के दो ज़मानतदार जमा करने का निर्देश दिया है, ताकि एक वर्ष तक शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखी जा सके.
यह मामला उस समय सामने आया जब विश्वविद्यालय प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से लाल बारादरी की घेराबंदी कर दी. इसके बाद रविवार को छात्रों ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया.
छात्र संगठनों का आरोप है कि इस कदम से मुस्लिम छात्रों की धार्मिक पहुँच बाधित हुई है, जबकि प्रशासन ने इन आरोपों को खारिज किया है. विरोध प्रदर्शन ज़ुहर की नमाज़ के बाद शुरू हुआ और इसमें एनएसयूआई तथा समाजवादी छात्र सभा के सदस्य शामिल हुए.
छात्र नेताओं ने मांग की है कि प्रशासन लाल बारादरी को फिर से खोले, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) से संरचना की जाँच कराए और रिपोर्ट सार्वजनिक करे.
गज़ाला अहमद की रिपोर्ट के अनुसार, ऑनलाइन प्रसारित हो रहे एक वीडियो में छात्रों को नमाज़ अदा करते हुए और अन्य हिंदू छात्रों को उनकी चारों ओर मानव श्रृंखला बनाते हुए दिखाया गया. अहमद रज़ा ने इस कार्य को सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश बताया और कहा कि छात्रों ने इमारत के बाहर रोज़ा भी खोला.
हालाँकि विश्वविद्यालय प्रशासन ने धार्मिक प्रतिबंधों के आरोपों को खारिज कर दिया. विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर डॉ. राकेश द्विवेदी ने मक़तूब को बताया कि यह संरचना वर्षों से जर्जर हालत में है और घेराबंदी केवल असुरक्षित इमारत में प्रवेश रोकने के लिए की गई है. छात्रों ने यह भी दावा किया कि यह कदम उस समय उठाया गया जब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने परिसर का दौरा किया था, जिसकी वजह से पहले ही छात्र विरोध प्रदर्शन कर चुके थे.
विश्लेषण
आकार पटेल : इंसानियत के मलबे पर खड़ी गुजरात मॉडल की राष्ट्रीय इमारत
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अब लगभग 30 सालों से लगातार गुजरात में शासन कर रही है. कहने को तो गुजरात एक दो-पार्टी वाला राज्य है, लेकिन बाबरी मस्जिद गिराए जाने से पहले से लेकर अब तक कांग्रेस ने वहां न तो कोई विधानसभा और न ही लोकसभा चुनाव जीता है. इस दौरान भाजपा को शासन और कानून का ढांचा विकसित करने की पूरी छूट और आज़ादी मिली है. लगभग 20 साल पहले, 2002 के नरसंहार के बाद, ‘गुजरात मॉडल’ शब्द चलन में आया. हम देखेंगे कि यह मॉडल क्या है और यह ‘नए भारत’ के बारे में क्या खुलासा कर सकता है.
गुजरात मॉडल का पहला तत्व मुसलमानों का राजनीतिक बहिष्कार है. गुजरात में दशकों से कोई मुस्लिम भाजपा विधायक या मंत्री नहीं रहा है और पार्टी उन्हें चुनाव लड़ने के लिए टिकट भी नहीं देती. सिर्फ बहिष्कार के लिए पूर्ण बहिष्कार. इसे नए भारत में भी दोहराया गया है, जहां पिछली तीन लोकसभाओं में भाजपा ने दो बहुमत और एक बड़ी जीत हासिल की है, लेकिन बिना किसी मुस्लिम के. आज भाजपा के पास लगभग 90 राज्यसभा सांसद हैं लेकिन उनमें कोई मुस्लिम नहीं है.
दूसरा तत्व अल्पसंख्यक उत्पीड़न के लिए बनाए गए कानूनों के माध्यम से है. गैर-कानूनी पशु हत्या देखने में एक आर्थिक अपराध है (संविधान का अनुच्छेद 48 पशुपालन और नस्लों को सुधारने के बारे में है). लेकिन किसी भी ‘व्हाइट कॉलर क्राइम’ (वित्तीय अपराध) में उम्रकैद की सजा नहीं होती, जैसा कि गुजरात के गायों पर बने कानूनों में होती है. बैंकों और निवेशकों को हजारों करोड़ का चूना लगाने पर उम्रकैद नहीं मिलती. इसका कारण यह है कि पशु हत्या को एक धार्मिक मामला बना दिया गया है और इसे पूरे देश में दोहराया गया है. बीफ़ रखने को अपराध मानने वाले कानून 2015 से आने शुरू हुए (पहले दो भाजपा राज्यों, महाराष्ट्र और हरियाणा में) और लिंचिंग शुरू हो गईं. अब यह घटना राष्ट्रीय हो गई है. राजस्थान की कैबिनेट ने कहा है कि वह गुजरात के उस कानून की नकल करेगी जो मुसलमानों को जबरदस्ती और कानूनी तौर पर ‘घेटो’ (अलग-थलग बस्तियों) में रखता है और उन्हें इन बस्तियों के बाहर संपत्ति किराए पर लेने या खरीदने से रोकता है.
हिंदुओं और मुसलमानों के बीच शादी को अपराध घोषित करने वाले कानून 2018 में उत्तराखंड से शुरू होकर बनने लगे और आज सात राज्यों में हैं. नागरिकता और बड़े पैमाने पर मताधिकार छीनने की नीतियां आज लागू हैं और पूरे भारत में फैलाई जा रही हैं. यह तीसरे तत्व से जुड़ता है जो है राज्य तंत्र का उपयोग करके लक्षित उत्पीड़न. ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने इस हफ्ते रिपोर्ट दी कि उत्तर प्रदेश के संभल में, जो सरकारी तंत्र कभी निष्पक्ष होकर काम करता था, आज उसका दुरुपयोग एक बहुसंख्यकवादी राज्य द्वारा किया जा रहा है. असल में यह अब नियम बन गया है. 2017 के आस-पास, भाजपा की राज्य सरकारों ने कानून का उल्लंघन करते हुए, ज्यादातर मुसलमानों के घरों और कारोबारों को गिराने के लिए बुलडोजर का इस्तेमाल शुरू कर दिया. दो रिपोर्ट्स, एक मेरे संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया द्वारा और दूसरी सिटिज़न्स एंड लॉयर्स इनिशिएटिव द्वारा, ने उस तरीके को रिकॉर्ड किया है जिसमें सरकारों ने अराजकता को बढ़ावा दिया और फिर बुलडोजर लेकर आ गईं.
न्याय प्रणाली ने ज्यादातर इससे मुंह मोड़ लिया है और राज्य के उन अंगों की मिलीभगत है जो व्यक्तियों के खिलाफ ज़्यादती और हिंसा को रोक सकते थे.
चौथा तत्व वह तरीका है जिससे भारत और उसके समुदायों के बारे में नैरेटिव (कथा/धारणा) बनाया जा रहा है. भाषा जानबूझकर चुनी गई है और इसका मकसद विभाजन पैदा करना है. यह ऐसा करने में सफल रहा है. एक तरीका जिससे हम यह बता सकते हैं, वह यह है कि जो कभी असामान्य और कभी-कभार होने वाली घटना थी, वह आज आम हो गई है. सिर्फ इसलिए व्यक्तियों के खिलाफ हिंसा कि वे किस धर्म में पैदा हुए, अब सामान्य है. राज्य, न्यायपालिका और मीडिया की तरफ से कार्यवाही की पूरी कमी ने इसे ऐसा बना दिया है. इसे ठीक करना आसान नहीं होगा और यह तभी हो सकता है जब इस पर न केवल रोक लगे बल्कि दिशा बदली जाए, जिसे होता हुआ देखना मुश्किल है.
गुजरात मॉडल का पांचवां तत्व मानव विकास पर कम प्राथमिकता है. गुजरात मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) में नीचे आता है, जो तीन तत्वों से बना है: आमदनी, स्वास्थ्य और शिक्षा. यह गुजरात मॉडल के बौद्धिक विरोध का आधार है और कई लोगों द्वारा ‘केरल मॉडल’ पर ज़ोर दिया जाता है जो व्यक्तियों के विकास पर केंद्रित था.
पूंजी और उसके हितों को लोगों के हितों से ऊपर पवित्र मानना, हमारा छठा तत्व, गुजरात मॉडल के अनकहे लेकिन समझे और स्वीकारे गए पहलुओं में से एक है. इसे ‘सरकार का काम व्यापार करना नहीं है’ जैसे जुमलों के ज़रिए बताया जाता है.
जबकि अन्य पांच तत्वों को समाज में स्वीकार्यता मिल गई है, यह छठा वाला थोड़ा समस्यात्मक है. यही वजह है कि प्रधानमंत्री ‘सूट बूट की सरकार’ का मुखिया होने पर चिढ़ गए थे और लगातार और थका देने वाले अंदाज़ में अपनी विनम्रता और अपनी ‘फकीरी’ के बारे में बात करते हैं. मुट्ठी भर कॉर्पोरेट संस्थाओं का विचार, जो ज्यादातर एक विशेष समुदाय के गुजराती व्यापारियों द्वारा चलाई जाती हैं, जो सरकारी संरक्षण से जुड़े ज्यादातर बंदरगाहों, खदानों, हवाई अड्डों, रिफाइनरियों, स्पेक्ट्रम और अन्य चीज़ों के मालिक हैं, उसे भारतीयों को बेचना आसान नहीं है. यह खासकर इसलिए है क्योंकि इसका फायदा भारतीयों को नहीं मिला है जो कमोबेश उसी हालत में हैं जैसे वे 2014 में थे. सरकार द्वारा उत्पन्न किया गया कोई भी डेटा उनकी जीती-जागती हकीकत को नहीं बदल सकता. संभवतः यही वह चीज़ होगी जो समय के साथ मॉडल की संरचनात्मक विफलता का कारण बनेगी.
हालाँकि, अभी के लिए और आने वाले भविष्य के लिए, यह न मानना मुश्किल है कि गुजरात मॉडल जीत गया है और यही वह आधार है जिस पर हमारा ‘नया भारत’ बनाया गया है.
आकार पटेल भारत के एक वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं.
मुस्लिम पहचान पर घर से इनकार, संवैधानिक मूल्यों से दूरी दिखाता है: जस्टिस उज्जल भुइयां
हैदराबाद में हाल ही में आयोजित एक सेमिनार में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा कि भारत में कई सामाजिक हक़ीक़त संविधान के मूल्यों से मेल नहीं खातीं. उन्होंने कहा कि अदालतों का कर्तव्य है कि वे मामलों का फैसला संविधान के आधार पर करें, न कि लोगों की लोकप्रिय राय या बहुमत की सोच के आधार पर.
द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक़ उन्होंने एक उदाहरण देते हुए बताया कि उनकी बेटी की एक दोस्त को दिल्ली में सिर्फ इसलिए किराये पर घर नहीं मिला क्योंकि वह मुस्लिम थी. उन्होंने कहा कि वह लड़की साउथ दिल्ली में एक वर्किंग वुमन हॉस्टल में कमरा लेने गई थी. मकान मालकिन ने पहले उसका नाम पूछा, फिर उपनाम पूछा. जब उपनाम से उसकी मुस्लिम पहचान सामने आई, तो मकान मालकिन ने साफ कह दिया कि कमरा उपलब्ध नहीं है और वह कहीं और तलाश करे.जस्टिस भुइयां ने कहा कि संविधान ने समानता और अधिकारों का एक ऊंचा मानक तय किया है, लेकिन समाज में लोग अक्सर इन मूल्यों का पालन नहीं करते.
उन्होंने ओडिशा का एक और उदाहरण दिया, जहां कुछ माता-पिता ने इस बात का विरोध किया कि उनके बच्चों के लिए मिड-डे मील एक दलित महिला द्वारा बनाया जा रहा है. सरकार ने स्कूलों में बच्चों को भोजन देने के लिए आंगनवाड़ी से जुड़ी महिलाओं को नियुक्त किया था, लेकिन कुछ अभिभावकों ने कहा कि उनके बच्चे दलित महिला के हाथ का बना खाना नहीं खाएंगे.
जस्टिस भुइयां ने कहा कि ये सिर्फ दो उदाहरण हैं, जो दिखाते हैं कि समाज में अब भी गहरी सामाजिक और धार्मिक विभाजन मौजूद हैं, और आज़ादी के 75 साल बाद भी हम संवैधानिक नैतिकता से काफी दूर हैं.
उन्होंने यह भी कहा कि अदालतों ने कई मामलों में साफ किया है कि संवैधानिक नैतिकता, जन-नैतिकता या बहुमत की सोच से ऊपर होती है. उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के नाज़ फाउंडेशन केस और सुप्रीम कोर्ट के नवतेज सिंह जौहर फैसले का उदाहरण दिया, जिसमें अदालत ने कहा था कि अदालत का काम संविधान के अनुसार फैसला करना है, न कि समाज की लोकप्रिय राय के अनुसार.
तेजस की थमी उड़ान और वायुसेना की चुप्पी: क्या छिपा है इस तकनीकी रहस्य के पीछे?
भारतीय वायुसेना के स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस एमके-1 से जुड़ी एक गंभीर घटना के दो सप्ताह से अधिक समय बाद भी वायुसेना ने सार्वजनिक रूप से पूरी जानकारी नहीं दी है. हालांकि, वायुसेना ने चुपचाप अपने पूरे तेजस बेड़े को आसमान में उड़ान भरने से रोक दिया है और तकनीकी जांच शुरू कर दी है, जिसे इस घटना की गंभीरता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है. यह विस्तृत रिपोर्ट द वायर में प्रकाशित हुई है.
भारतीय वायुसेना के पास इस समय दो स्क्वाड्रन में लगभग 32 Tejas विमान शामिल हैं, जिनमें दो-सीटर ट्रेनर भी हैं. इन सभी विमानों को जांच के लिए उड़ान से रोक दिया गया है. यह घटना कथित तौर पर उत्तर-पश्चिम भारत के एक महत्वपूर्ण फ्रंटलाइन एयरबेस पर हुई थी. आधिकारिक जानकारी की कमी से रक्षा विशेषज्ञों और रणनीतिक हलकों में चिंता बढ़ गई है.
यह घटना 7 फरवरी को हुई थी, लेकिन इसकी जानकारी सार्वजनिक रूप से तुरंत नहीं दी गई. बाद में मीडिया रिपोर्टों से पता चला कि तेजस विमानों को उड़ान से हटा दिया गया है. अगर मीडिया में यह खबर नहीं आती, तो यह मामला शायद पोशीदा ही रहता. यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि तेजस भारत का प्रमुख स्वदेशी लड़ाकू विमान है और भारत इसे विदेशों को बेचने की कोशिश कर रहा है. ऐसे में पारदर्शिता की कमी संभावित खरीदारों का भरोसा प्रभावित कर सकती है.
पूरे तेजस बेड़े को ग्राउंड करना एक गंभीर कदम है आम तौर पर ऐसा तब किया जाता है जब किसी तकनीकी समस्या के सभी विमानों में होने की आशंका हो, न कि किसी एक छोटे हादसे के कारण. इसके बावजूद वायुसेना ने अब तक यह नहीं बताया है कि समस्या क्या थी, प्रभावित विमान की स्थिति क्या है और यह प्रतिबंध कितने समय तक रहेगा.
इस मामले में पहली आधिकारिक पुष्टि विमान निर्माता कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने की. कंपनी ने 23 फरवरी को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर कहा कि यह कोई “क्रैश” नहीं बल्कि ज़मीन पर हुआ एक “छोटा तकनीकी हादसा” था. कंपनी ने कहा कि मानक प्रक्रिया के तहत विभिन्न सिस्टम की विस्तृत जांच की जा रही है और तेजस का सुरक्षा रिकॉर्ड मज़बूत रहा है. हालांकि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने घटना के कारण या नुकसान के बारे में कोई विस्तार नहीं दिया.
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि “घटना” और “दुर्घटना” जैसे शब्दों का इस्तेमाल सावधानी से किया गया है, जिससे घटना की गंभीरता स्पष्ट नहीं हो रही.
घटना कैसे हुई, इस बारे में अलग-अलग रिपोर्ट हैं. कुछ रिपोर्टों के अनुसार विमान में लैंडिंग के समय ब्रेक खराब हो गए, जबकि अन्य रिपोर्टों में कहा गया कि समस्या टेक-ऑफ के दौरान हुई. पायलट की स्थिति भी स्पष्ट नहीं है. कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि पायलट को हल्की चोट लगी, जबकि अन्य में बताया गया कि उन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ. शुरुआती रिपोर्टों में यह भी कहा गया था कि पायलट ने इजेक्ट किया, जिससे लगा कि विमान हवा में था, लेकिन बाद में संकेत मिले कि घटना जमीन पर हुई थी.
यह भी स्पष्ट नहीं है कि विमान को कितना नुकसान हुआ , क्या उसे मरम्मत करके फिर से उड़ाया जा सकेगा या वह पूरी तरह नष्ट हो गया. सैन्य विमानन में यह अंतर महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इससे लागत, बेड़े की उपलब्धता और विश्वसनीयता प्रभावित होती है.
पूरे तेजस बेड़े को ग्राउंड करने से वायुसेना की क्षमता पर असर पड़ सकता है. भारतीय वायुसेना के पास वर्तमान में लगभग 29 फाइटर स्क्वाड्रन (260-275 विमान) हैं, जबकि स्वीकृत संख्या 42 स्क्वाड्रन (850-880 विमान) है. ऐसे में तेजसका उड़ान से हटना प्रशिक्षण, ऑपरेशनल तैयारी और सैन्य क्षमता पर प्रभाव डाल सकता है.
यह पिछले दो वर्षों में तेजस से जुड़ी तीसरी दुर्घटना है.रक्षा उद्योग के अधिकारियों का कहना है कि विदेशी खरीदार केवल तकनीकी क्षमता ही नहीं देखते, बल्कि दुर्घटनाओं का रिकॉर्ड, रखरखाव, उपलब्धता और पारदर्शिता को भी महत्व देते हैं. लगातार घटनाएं और सीमित जानकारी इसकी विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती हैं.हालांकि तेजस को स्वदेशी विमान कहा जाता है, लेकिन इसमें कई महत्वपूर्ण विदेशी सिस्टम लगे हैं.
हरकारा डीप डाइव: प्रोफेसर अपूर्वानंद
हिंदू राष्ट्र के भ्रम, अंतरविरोध और दुहरे मापदंड
हरकारा डीप डाइव की इस चर्चा में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद के साथ आरएसएस के 100 साल, उसकी विचारधारा और मौजूदा भूमिका पर विस्तार से बात हुई. बातचीत में खास तौर पर सरसंघचालक मोहन भागवत के हालिया बयानों और उनके पीछे की राजनीति और सोच को समझने की कोशिश की गई.
चर्चा में मोहन भागवत के उस बयान का ज़िक्र हुआ जिसमें उन्होंने कहा कि कोई भी हिंदू सरसंघचालक बन सकता है. हालांकि पिछले 100 साल में ऐसा कोई उदाहरण नहीं है. उन्होंने हिंदुओं से तीन बच्चे पैदा करने की बात भी कही. इस पर सवाल उठा कि अगर आरएसएस हर भारतीय को हिंदू मानता है, तो फिर यह अपील सिर्फ हिंदुओं तक ही क्यों सीमित है.
प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा कि आरएसएस की मूल विचारधारा को समझने के लिए सावरकर और गोलवलकर के विचारों को देखना जरूरी है. उनके अनुसार इस विचार में भारत को हिंदुओं की पितृभूमि और पुण्यभूमि माना गया है, जबकि मुसलमानों और ईसाइयों को अलग माना जाता है. इसी सोच के तहत हिंदू जीवन शैली को राष्ट्रीय पहचान के रूप में पेश किया जाता है, जिसमें शाकाहार, राम जैसे प्रतीकों और एक खास सांस्कृतिक ढांचे को महत्व दिया जाता है.
चर्चा में यह भी सवाल उठा कि क्या आरएसएस सच में जवाबदेह है. यह कहा गया कि संगठन हर साल गुरु दक्षिणा के नाम पर करोड़ों रुपये जुटाता है, लेकिन उसके पैसे का पूरा हिसाब सार्वजनिक नहीं होता. विद्या भारती, सेवा भारती और अन्य संस्थाओं के ज़रिये शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में उसका बड़ा नेटवर्क है, जिसे सरकारी योजनाओं से भी लाभ मिलता है.
एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी उठा कि मोहन भागवत और आरएसएस नेतृत्व को किस बात का डर है. चर्चा में कहा गया कि आरएसएस प्रमुख को राज्य की ओर से सुरक्षा और संसाधन दिए जाते हैं, जबकि वह एक गैर-सरकारी संगठन के प्रमुख हैं. यह भी आरोप लगाया गया कि आरएसएस हमेशा खुलकर जिम्मेदारी लेने से बचता रहा है और विवादों के समय खुद को अलग कर लेता है.
शिक्षा संस्थानों पर प्रभाव भी चर्चा का बड़ा विषय रहा. आरोप लगाया गया कि विश्वविद्यालयों में आरएसएस से जुड़े लोगों को बुलाया जा रहा है और पाठ्यक्रम व संस्थानों की दिशा बदलने की कोशिश हो रही है. विज्ञान और शोध के नाम पर गाय, प्राचीन तकनीक और धार्मिक मान्यताओं को बढ़ावा देने के उदाहरण भी दिए गए.
जाति और सामाजिक ढांचे पर भी गंभीर सवाल उठे. चर्चा में कहा गया कि आरएसएस एक ऐसी सोच का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें सामाजिक पदानुक्रम और ब्राह्मणवादी व्यवस्था की झलक दिखाई देती है. साथ ही यह भी कहा गया कि अगर सभी हिंदू बराबर हैं, तो जाति व्यवस्था खत्म करने के लिए ठोस अभियान क्यों नहीं चलाए गए.
हरकारा डीप डाइव
पीएम केयर्स फंड पर पारदर्शिता और जवाबदेही पर अंजली भारद्वाज के सवाल
हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में पीएम केयर्स फंड और लोकतंत्र में नागरिकों के सवाल पूछने के अधिकार पर विस्तृत चर्चा हुई. इस बातचीत में सूचना के अधिकार कार्यकर्ता अंजली भारद्वाज शामिल हुईं, जो सतर्क नागरिक संस्था से जुड़ी हैं और लंबे समय से पारदर्शिता और जवाबदेही के मुद्दों पर काम कर रही हैं. चर्चा का मुख्य सवाल यह था कि जब किसी फंड में जनता, सरकारी संस्थाओं और कंपनियों का पैसा जमा हो रहा है, तो उसकी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही.
अंजली भारद्वाज ने बताया कि पीएम केयर्स फंड को 28 मार्च 2020 को कोविड महामारी के दौरान एक ट्रस्ट के रूप में बनाया गया, ठीक वित्तीय वर्ष समाप्त होने से तीन दिन पहले. उस समय सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को पत्र लिखकर कहा कि यह केंद्र सरकार द्वारा स्थापित फंड है और इसमें सीएसआर का पैसा दिया जा सकता है. इसी कारण वित्तीय वर्ष के अंतिम दिनों में ही सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने अपने सीएसआर के हज़ारों करोड़ रुपये इस फंड में जमा कर दिए. पहले तीन वर्षों में ही लगभग 13,000 करोड़ रुपये जमा हुए. सरकारी कर्मचारियों की सैलरी से कटौती और विदेशी स्रोतों से चंदा लेने की अनुमति भी इसमें शामिल थी.
लेकिन जब नागरिकों और कार्यकर्ताओं ने सूचना का अधिकार कानून के तहत पूछा कि यह पैसा कहां से आया और कहां खर्च हुआ, तो सरकार ने कहा कि पीएम केयर्स एक प्राइवेट ट्रस्ट है और आरटीआई के दायरे में नहीं आता. बातचीत में इस विरोधाभास को खास तौर पर रेखांकित किया गया कि फंड बनाते समय इसे सरकारी बताया गया ताकि पैसा जुटाया जा सके, लेकिन बाद में जवाबदेही से बचने के लिए इसे निजी ट्रस्ट बताया गया.
चर्चा में यह भी सामने आया कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने लोकसभा सचिवालय को निर्देश दिया कि पीएम केयर्स, पीएम राष्ट्रीय राहत कोष और डिफेंस फंड से जुड़े सवाल संसद में स्वीकार न किए जाएं. इसका मतलब यह हुआ कि न केवल आम नागरिक, बल्कि चुने हुए सांसद भी इस फंड के बारे में जानकारी नहीं मांग सकते. इससे यह सवाल उठा कि क्या यह फंड लोकतांत्रिक जवाबदेही और संसदीय निगरानी से बाहर रखा जा रहा है.
अंजली भारद्वाज ने बताया कि फंड की ऑडिट रिपोर्ट भी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है. अनुमान लगाया जा रहा है कि छह वर्षों में इस फंड में लगभग 25,000 करोड़ रुपये तक जमा हो सकते हैं, लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि या विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है.
चर्चा में इलेक्ट्रोरल बॉन्ड्स का उदाहरण देते हुए बताया गया कि जब चंदा गोपनीय रहता है, तो कंपनियों और सत्ता के बीच संभावित लेन-देन और प्रभाव का खतरा बढ़ जाता है. पीएम केयर्स के ट्रस्टी प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री और वित्त मंत्री हैं, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या कंपनियां चंदा देकर भविष्य में सरकारी फैसलों या ठेकों पर प्रभाव डाल सकती हैं. बातचीत में यह भी कहा गया कि कंपनियां आमतौर पर चंदा बिना किसी अपेक्षा के नहीं देतीं, इसलिए पारदर्शिता और निगरानी ज़रूरी है.
अंजली भारद्वाज ने स्पष्ट कहा कि सरकार को पीएम केयर्स फंड को सूचना के अधिकार के दायरे में लाना चाहिए. फंड में कितना पैसा आया, किस स्रोत से आया और कहां खर्च हुआ, इसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए. नियमित ऑडिट रिपोर्ट जारी होनी चाहिए और संसद में भी इस पर सवाल पूछने की अनुमति होनी चाहिए. इससे जनता का भरोसा मज़बूत होगा और किसी भी तरह के संदेह को दूर किया जा सकेगा.
2019 और 2023 में किए गए संशोधनों से सूचना प्राप्त करना कठिन हो गया है. निजी जानकारी के नाम पर कई मामलों में सूचना देने से इनकार किया जा सकता है. साथ ही सूचना आयोग में नियुक्तियों में देरी और खाली पदों के कारण भी जवाबदेही की प्रक्रिया प्रभावित हुई है. अंजली भारद्वाज ने कहा कि लोकतंत्र में सवाल पूछना और जवाब मिलना एक मौलिक अधिकार है, और इसे कमज़ोर करना लोकतांत्रिक ढांचे को कमज़ोर करता है.
एम्स गोरखपुर में नागालैंड की डॉक्टर से छेड़छाड़; मेघालय सीएम बोले शर्मनाक
गोरखपुर एम्स में काम करने वाली नागालैंड की 25 वर्षीय रेज़िडेंट डॉक्टर से छेड़छाड़ और अभद्र टिप्पणी करने के आरोप में दो युवकों को गिरफ्तार किया गया है. पुलिस के घटना रविवार शाम की है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़ डॉक्टर ने शिकायत में बताया कि वह रविवार को एक मॉल में खरीदारी करने गई थीं. वहां से वापस एम्स लौटते समय तीन युवक मोटरसाइकिल पर उनका पीछा करने लगे. पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने रास्ते भर अश्लील टिप्पणियां कीं और गाली-गलौज की. एम्स के गेट नंबर-2 के पास तक वे उनके साथ चलते रहे और कथित तौर पर उन्हें गलत तरीके से छुआ और आपत्तिजनक इशारे किए.जब डॉक्टर ने विरोध किया और शोर मचाया तो आरोपी जान से मारने की धमकी देकर मौके से फरार हो गए.
गोरखपुर के पुलिस अधीक्षक अभिनव त्यागी ने बताया कि इस मामले में तीन लोग शामिल हैं. दो आरोपियों, सूरज गुप्ता (22) और अमृत विश्वकर्मा (21), को गिरफ्तार कर लिया गया है और उन्हें अदालत में पेश किया जाएगा. तीसरे आरोपी की तलाश में छापेमारी जारी है.
इस घटना पर मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड के संगमा ने’ पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उत्तर-पूर्व की महिलाओं के साथ नस्लीय भेदभाव और यौन उत्पीड़न को सिर्फ सुर्खियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उन्होंने कहा कि नागालैंड की डॉक्टर के साथ हुआ व्यवहार शर्मनाक है और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए.
लुटियंस आउट, ‘भारत माता’ इन: राष्ट्रपति भवन में प्रतिमा बदलाव पर सियासी रार
राष्ट्रपति भवन ने औपनिवेशिक इतिहास के एक और अध्याय को बंद करते हुए नई दिल्ली के ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस की प्रतिमा हटा दी है. उनकी जगह भारत के अंतिम गवर्नर-जनरल और स्वतंत्रता सेनानी चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (राजाजी) की प्रतिमा स्थापित की गई है. टेलीग्राफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा ने इसे “गुलामी की मानसिकता” से मुक्ति और ‘स्वदेशी’ सम्मान की दिशा में एक बड़ा कदम बताया है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि यह भारत की संस्कृति और विरासत को सम्मानित करने की पहल है. हालांकि, विपक्ष ने इस कदम को लेकर सरकार को घेरा है. शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने तंज कसते हुए पूछा, “अगर सरकार को ‘गुलामी’ से इतनी नफरत है, तो वह डोनाल्ड ट्रम्प की ‘गुलामी’ क्यों कर रही है? क्या राफेल फ्रांस से नहीं खरीदा गया?” पीडीपी नेता इल्तिजा मुफ्ती ने कहा कि आप मूर्तियों को हटाकर इतिहास नहीं मिटा सकते, क्योंकि दिल्ली की अधिकांश वास्तुकला ब्रिटिश या मुगल है. वहीं, लुटियंस के परपोते मैट रिडले ने भी प्रतिमा हटाए जाने पर दुख व्यक्त किया है. यह कदम 2022 में राजपथ का नाम बदलकर ‘कर्तव्य पथ’ करने की कड़ी का ही हिस्सा माना जा रहा है.
अपील :
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