23/04/2026: बंगाल बोल रहा है | एसआईआर से लाखों मतदाता गायब | चुनाव आयोग पर सवाल | परिसीमन से उत्तर-दक्षिण | ईरान-होर्मुज़ टकराव, तेल संकट | चीन की तेल चाल | गरीबी-जाति सर्वे
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
एक अलग आवाज़: बंगाल बोल रहा है, भारत को सुनना चाहिए
‘तृणमूल के गुंडों’ पर सीआरपीएफ की कार्रवाई? बांग्लादेश का पुराना वीडियो गलत दावे के साथ वायरल
बंगाल: मतदान से पहले ही ‘एसआईआर’ ने बदल दिए चुनावी समीकरण, भाजपा को वोटिंग से पहले ही मिला लाभ
बंगाल चुनाव: भाजपा ने राहुल गांधी के वीडियो क्लिप का इस्तेमाल कर उन्हें धन्यवाद दिया!
‘लाखों मतदाताओं का छूटना हमारे लोकतंत्र पर कलंक है’: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत
परिसीमन की राजनीति:उत्तर-दक्षिण असंतुलन और कंपनसेशन पॉलिटिक्स
होर्मुज़ में बारूदी सुरंगें बिछाने वालों को देखते ही गोली मारने का ट्रम्प का आदेश.
युद्ध आज ख़त्म हो तो भी 3 करोड़ से ज़्यादा लोग ग़रीबी के गर्त में जाएंगे.
ईरान युद्ध से पहले ही चीन ने कर लिया था कच्चे तेल का भारी भंडारण.
मध्यस्थता की क़वायद और तेज़ होती नाकेबंदी: अमेरिका ने एशियाई जलक्षेत्र में रोके चार ईरानी तेल टैंकर.
ऑनलाइन गेमिंग पर सरकार का ‘कंट्रोल मोड’: नए नियम लागू, पैसे वाले गेम्स पर सख्ती
क्या गरीबी सच में ‘जातिहीन’ है? तेलंगाना सर्वे ने ‘समान हालात’ की सदियों पुरानी दलील तोड़ी
सुप्रीम कोर्ट ने आज गुरुवार (23 अप्रैल 2026) को सबरीमाला मंदिर मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि वह सभी प्रतिष्ठित लेखकों और विचारकों के विचारों का सम्मान करता है, लेकिन वह ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ से प्राप्त जानकारी को स्वीकार नहीं कर सकता.” कोर्ट ने व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी” से जानकारी साझा करने को लेकर आगाह किया. यह टिप्पणी तब आई जब वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित एक लेख से राजनेता शशि थरूर के शब्दों को उद्धृत किया. जब कौल ने तर्क दिया कि विनम्रता के साथ कहीं से भी ज्ञान लेने में कोई बुराई नहीं है, तो न्यायमूर्ति नागरत्ना ने सावधानी बरतने की इस सलाह के साथ जवाब दिया. कौल ने आगे कहा, “यदि ज्ञान और बुद्धिमत्ता किसी भी स्रोत, किसी भी देश, किसी भी विश्वविद्यालय से आती है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए.” इसके बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि अदालत सभी प्रतिष्ठित व्यक्तियों का सम्मान करती है, लेकिन व्यक्तिगत विचार व्यक्तिगत ही होते हैं. उधर, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए प्रथम चरण की 152 सीटों के लिए आज 92.14% मतदान हुआ, जो एक रिकॉर्ड है. वहीं दक्षिण के राज्य तमिलनाडु में भी आज वोट डाले गए और 84.98% मतदान दर्ज किया गया, जो 1952 के बाद से सर्वाधिक है. बंगाल में मतदान के दौरान छिटपुट हिंसा हुई, जहाँ राजनीतिक दलों ने एक-दूसरे पर बूथ कैप्चरिंग और मतदाताओं को डराने का आरोप लगाया. कुछ वीडियो भी वायरल हुए. इसके विपरीत, तमिलनाडु में मतदान अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा, हालांकि कुछ जिलों में देरी और परिवहन संबंधी समस्याओं की खबरें आईं. इस बीच पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने गुरुवार को कहा कि उन्हें अपने अप्रकाशित संस्मरण ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ को लिखने में बहुत आनंद आया. इस पुस्तक ने फरवरी की शुरुआत में एक राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया था और संसद की कार्यवाही में बाधा डाली थी. उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार “आज नहीं तो कल” इस पुस्तक को प्रकाशन के लिए मंजूरी दे देगी.
एक अलग आवाज़: बंगाल बोल रहा है, भारत को सुनना चाहिए
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में क्या दांव पर लगा है, इसे समझने के लिए एक उपयोगी वैचारिक प्रयोग किया जा सकता है. एक ऐसे राज्य की कल्पना कीजिए जो लगभग दो शताब्दियों से भारतीय आधुनिकता की प्रमुख प्रयोगशालाओं में से एक रहा है: वह स्थान जो ‘बंगाल पुनर्जागरण’ का केंद्र रहा, राजा राममोहन राय के सुधारवाद का, टैगोर के विश्वव्यापी बहुलवाद का, सुभाष चंद्र बोस के प्रखर उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष का और वामपंथी मोर्चे के तीन दशक लंबे चुनावी मार्क्सवाद के प्रयोग का साक्षी रहा. अब कल्पना कीजिए कि उस प्रयोगशाला की व्यवस्थित रूप से घेराबंदी की जा रही है. यह चुनाव यह सवाल खड़ा करता है कि क्या नागरिकों के नेतृत्व वाली राजनीति की एक विशिष्ट और तर्कपूर्ण परंपरा, संस्थागत शक्ति के उस सबसे केंद्रीकृत जमावड़े के सामने जीवित रह सकती है, जैसा भारत ने आपातकाल के बाद से नहीं देखा है.
‘द टेलीग्राफ’ में मनोज झा ने अंग्रेजी में लिखा है कि, 2026 की शुरुआत तक, भारतीय जनता पार्टी सीधे तौर पर 15 भारतीय राज्यों में शासन कर रही है, जबकि उसका राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) 28 में से 19 राज्यों की सरकारों को नियंत्रित करता है और लोकसभा की 293 सीटों पर काबिज है, जो सदन का 54% है. स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में कांग्रेस के प्रभुत्व के बाद से किसी भी राजनीतिक दल ने भारत के संघीय परिदृश्य के इतने बड़े हिस्से पर एक साथ नियंत्रण नहीं किया है. अपने मूल में, बंगाल इस बात की परीक्षा ले रहा है कि क्या एक मजबूत क्षेत्रीय दल के नेतृत्व वाला गर्वित प्रगतिशील राज्य भाजपा के निरंतर विस्तार का सामना कर सकता है, और क्या भारत के संघीय लोकतंत्र में अब भी कोई सार्थक बहुलता बची है.
मैंने अन्यत्र जिसे ‘तथ्यों की परिणति का न्यायशास्त्र’ कहा है—अर्थात संवैधानिक संस्थाओं का उपयोग कानून की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि राजनीतिक परिणाम गढ़ने और फिर उन परिणामों को जमीनी हकीकत के रूप में पेश करने के लिए करना—उसे बंगाल के खिलाफ विशेष तीव्रता के साथ तैनात किया गया है. भारत निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूचियों का ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) अत्यंत विवादास्पद हो गया है, जिसमें बड़े पैमाने पर जांच और नाम हटाए जाने की खबरें हैं. प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) सक्रिय रहे हैं. भाजपा ने भ्रष्टाचार के मामलों को शासन की व्यवस्थागत विफलता के प्रमाण के रूप में पेश किया है; वहीं तृणमूल कांग्रेस ने राजनीतिक रूप से निशाना बनाने का आरोप लगाकर इसका मुकाबला किया है, जिससे जांच की कार्रवाई ही एक राजनीतिक मुद्दा बन गई है. पश्चिम बंगाल में, टीएमसी खुद को भाजपा के विस्तार का विरोध करने वाले अंतिम प्रमुख पूर्वी गढ़ के रूप में पेश करती है, और यह चुनावी रूप से पहले भी प्रभावी साबित हुआ है. यह लचीलापन इस तथ्य से उपजा है कि राजनीतिक चेतना, जब एक बार सामाजिक जीवन के कण-कण में बस जाती है, तो उसे संस्थागत हेरफेर के माध्यम से दरकिनार करना कठिन होता है.
2021 के अभियान के दौरान लगभग हर राजनीतिक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को बार-बार अब कुख्यात हो चुके जुमले “दीदी, ओ दीदी” से संबोधित किया था. इस फब्ती को उस राज्य की महिलाओं ने पसंद नहीं किया जहाँ सामाजिक समानता और आत्मसम्मान की परंपराएँ गहरी हैं. बंगाल ने मतपेटी के माध्यम से इसका जवाब दिया, क्योंकि वह कटाक्ष एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति से टकराया था जो ‘तर्क’ को जीवन जीने के तरीके के रूप में महत्व देती है. जैसा कि अमर्त्य सेन, राजा राममोहन राय का हवाला देते हुए याद करते हैं—बंगाली कल्पना में मृत्यु का वास्तविक भय ‘वापस तर्क न कर पाने’ की अक्षमता में निहित है. प्रतिक्रिया देने की गरिमा से वंचित किया जाना, एक तरह से, मौन रहकर अस्तित्वहीन हो जाने के समान है.
एक ऐसा समाज जिसने ऐतिहासिक रूप से तर्कसंगत असहमति को अपने बौद्धिक और राजनीतिक जीवन के केंद्र में रखा है, वह तिरस्कार या उपहास का सहजता से उत्तर नहीं देता. यह असुविधा केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत भी थी. महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा की इस बार रणनीति बदली हुई प्रतीत होती है, और वह मुख्यमंत्री पर सीधे व्यक्तिगत हमलों से काफी हद तक बच रही है.
बंगाल क्यों अलग है, इसे समझने के लिए हमें अमर्त्य सेन के प्रसिद्ध विचार ‘द आर्ग्युमेंटेटिव इंडियन’ (तर्कशील भारतीय) से शुरुआत करनी होगी. यह विचार भारतीय बौद्धिक जीवन के दो सहस्राब्दियों के इतिहास से निकला है, जो कहता है कि सार्वजनिक तर्क और लोकतांत्रिक असहमति कोई पश्चिमी आयात नहीं, बल्कि हमारी अपनी मानसिक आदतें हैं. सेन का तर्क है कि यह परंपरा भारत के लोकतंत्र की सफलता, धर्मनिरपेक्ष राजनीति की रक्षा, वर्ग, जाति, लिंग और समुदाय से जुड़ी असमानताओं के उन्मूलन और उपमहाद्वीपीय शांति की खोज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. बंगाल इस परंपरा की सबसे निरंतर संस्थागत अभिव्यक्ति रहा है. इसने हमें ‘अड्डा’ दिया—अनौपचारिक लेकिन राजनीतिक रूप से चार्ज की गई बातचीत का वह जमावड़ा, जो किसी भी समाचार पत्र या संसद की तरह ही सार्वजनिक क्षेत्र का एक स्वरूप है. बंगाली जीवन के हर क्षेत्र—साहित्य, सिनेमा, वाणिज्य और घरेलू दायरे—में राजनीति का समावेश एक सभ्यतागत उपलब्धि है.
बंगाल में गहन वैचारिक राजनीति की एक लंबी परंपरा रही है, जो वामपंथी मोर्चे के 34 साल के शासन से वर्तमान टीएमसी के प्रभुत्व तक पहुँची है. राजनीतिक ध्रुवीकरण यहाँ स्थायी सामाजिक कलह पैदा करने में शायद ही कभी सफल रहा है, क्योंकि बंगाल में ध्रुवीकरण को पारंपरिक रूप से विचारों के आदान-प्रदान के रूप में अपनाया गया है. यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में बंगाल को भारत का “सबसे ध्रुवीकृत राज्य” बताया जाना भी इस इतिहास को गलत तरीके से पढ़ना है. किसी बहस या तर्क को ‘बीमारी’ की तरह देखना दरअसल एक जीवित लोकतंत्र को ‘विकार’ समझने की भूल करना है जिसे प्रबंधन की आवश्यकता हो.
उदारवादी टीकाकार—संपादकीय लेखकों और अर्थशास्त्रियों का वह समूह जो वितरणात्मक न्याय के ऊपर बाजार की दक्षता का जश्न मनाता है—लंबे समय से बंगाल की राजनीति से असहज रहा है, और यह असुविधा काफी कुछ सिखाती है. जब यह समूह बंगाल के बारे में शिकायत करता है, तो उसका वास्तविक अर्थ यह होता है कि यह राज्य उस तरह के निर्बाध पूंजी संचय के लिए अनुकूल नहीं रहा है जिसे राष्ट्रीय कल्पना में ‘विकास’ माना जाता है. यहाँ श्रमिक आंदोलन ऐतिहासिक रूप से मजबूत रहा है. बेदखली के लिए जमीन आसानी से उपलब्ध नहीं रही है. ‘अड्डा’ ने एक ऐसी नागरिकता तैयार की है जो विकास के उस मॉडल के बीच अंतर जानती है जो भूमि और श्रम को सस्ते में प्राप्त किए जाने वाले इनपुट के रूप में देखता है, और उस मॉडल के बीच जो इस बात पर जोर देता है कि जो जमीन के मालिक हैं और जो श्रम की आपूर्ति करते हैं, लेनदेन की शर्तों पर उनका प्राथमिक अधिकार है.
ये टीकाकार जिसे न कहना चुनते हैं, वह यह है कि बंगाल ने उत्तर-औपनिवेशिक भारत के कुछ सबसे महत्वपूर्ण भूमि सुधार किए. वे इस तथ्य पर गंभीरता से विचार नहीं करते कि कन्याश्री, स्वास्थ्य साथी और लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाएं विकास की एक ऐसी पुनर्व्याख्या हैं, जिसमें परिवार के आधार पर खड़ी महिला नीति की प्राथमिक इकाई है, न कि वैल्यू चेन के शीर्ष पर बैठा उद्योगपति. बंगाल में महिला साक्षरता, शिशु मृत्यु दर और जीवन प्रत्याशा में हुए सुधारों ने उन ऊंचाइयों को छुआ है जहाँ कई उच्च-विकास दर वाले राज्य नहीं पहुँच सके. तथ्य यह है कि भाजपा जैसी बाजार विचारधारा पर आधारित दक्षिणपंथी पार्टी को भी, चाहे वह चुनावी रणनीति के तहत ही क्यों न हो, इसी व्याकरण को अपनाना पड़ा है, जो हमें बताता है कि बंगाल ने वह बहस जीत ली है जिसे ये टीकाकार चाहते थे कि वह हार जाए.
देश और दुनिया में बिखरा हुआ ‘प्रवासी’ बंगाली अक्सर पुरानी यादों और अलगाव के बीच झूलता रहता है. लेकिन यह अलगाव अब एक ऐसी विलासिता है जिसे यह समय बर्दाश्त नहीं कर सकता. बंगाल में अभी इस बात पर संघर्ष हो रहा है कि क्या भारत का संघीय लोकतंत्र वास्तविक बहुलवाद को बनाए रख सकता है, या यह एक प्रबंधित एकरूपता में बदल जाएगा जहाँ हर सार्वजनिक क्षेत्र को एक ही रंग में रंगा जाएगा. बंगाली प्रवासियों को इसका साक्षी बनना चाहिए. इसका दस्तावेजीकरण करें. अपने स्वयं के ‘अड्डों’ में इस पर बहस करें, चाहे वे आभासी ही क्यों न हों. तर्क करने की यह परंपरा कोई अवशेष नहीं है जिसे सहेज कर रखा जाए; यह एक जीवित अभ्यास है जिसे निरंतर करना होगा, अन्यथा यह समाप्त हो जाएगी. जैसा कि 2004 के चुनावों से ठीक पहले एक बंगाली ग्रामीण ने अमर्त्य सेन से कहा था: “हमें चुप कराना बहुत कठिन नहीं है, लेकिन ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि हम बोल नहीं सकते.”
बंगाल बोल रहा है. गणतंत्र को सुनना चाहिए.
(लेखक मनोज कुमार झा राज्यसभा सांसद, राष्ट्रीय जनता दल हैं)
शमशेरगंज एक सैंपल: मतदान से पहले ही ‘एसआईआर’ ने बदला चुनावी समीकरण, भाजपा को वोटिंग से पूर्व लाभ
पश्चिम बंगाल का शमशेरगंज निर्वाचन क्षेत्र, जो पिछले वर्ष सांप्रदायिक हिंसा के कारण सुर्खियों में था, आज एक अभूतपूर्व लोकतांत्रिक विवाद के केंद्र में है. इस विवाद का कारण कोई हिंसा नहीं, बल्कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत मतदाता सूची से 91,712 मतदाताओं के नाम हटाया जाना है. यह संख्या निर्वाचन क्षेत्र के कुल मतदाताओं का लगभग 36.27% है, जो पूरे पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक है.
अपर्णा भट्टाचार्य की रिपोर्ट के अनुसार, सामान्यतः मतदाता सूची से नाम ‘एएसडीडी’ (अनुपस्थित, स्थानांतरित, विस्थापित या मृत) श्रेणी के तहत हटाए जाते हैं. शमशेरगंज में इस प्रक्रिया से केवल 16,836 नाम हटाए गए. विलोपन का सबसे बड़ा कारण ‘विचाराधीन’ (अंडर एडजुडिकेशन) प्रक्रिया रही. इस प्रक्रिया के तहत 1,08,400 मतदाताओं को चिन्हित किया गया, जिनमें से लगभग 68.98% (74,775 लोग) के नाम अंततः काट दिए गए.
हैरानी की बात यह है कि जब 22 अप्रैल को अपीलीय न्यायाधिकरण की पूरक सूची आई, तो 247 मतदान केंद्रों में से केवल एक व्यक्ति (तृणमूल नेता इंजमुल इस्लाम) का नाम बहाल हुआ. यह दर्शाता है कि सुधार की संस्थागत गुंजाइश लगभग समाप्त कर दी गई थी.
शमशेरगंज एक अत्यधिक मुस्लिम बहुल क्षेत्र है. यहाँ के 247 बूथों में से 207 बूथों में मुस्लिम आबादी 50% से अधिक है. आंकड़ों का विश्लेषण करने पर एक गहरा पक्षपात दिखाई देता है:
मुस्लिम बहुल बूथ: जिन बूथों में 50% से अधिक मुस्लिम आबादी है, वहाँ प्रति बूथ औसतन 467 मतदाताओं को ‘विचाराधीन’ श्रेणी में डाला गया.
अन्य बूथ: जहाँ मुस्लिम आबादी 50% से कम है, वहाँ यह औसत केवल 65 मतदाता प्रति बूथ था.
इसका परिणाम यह हुआ कि मुस्लिम बहुल बूथों में मतदाता आधार में 39% की भारी कटौती हुई, जबकि अन्य बूथों में यह गिरावट मात्र 10% रही. यह सांख्यिकीय अंतर प्रशासनिक त्रुटि से कहीं अधिक एक व्यवस्थित प्रयास की ओर संकेत करता है.
विलोपन के इस पैटर्न का सीधा संबंध राजनीतिक दलों के प्रदर्शन से जुड़ा है. डेटा विश्लेषण से पता चलता है कि:
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी): जिन बूथों पर टीएमसी का प्रदर्शन मजबूत रहा है, वहाँ नाम हटाए जाने की दर सबसे अधिक रही. अनुमान है कि 2021 के आंकड़ों के अनुसार टीएमसी ने लगभग 46,040 संभावित मतदाता खो दिए हैं.
कांग्रेस: कांग्रेस को भी भारी नुकसान हुआ है क्योंकि उसका मुख्य आधार भी इसी अल्पसंख्यक समुदाय में है. उसे लगभग 32,235 मतदाताओं का घाटा होने का अनुमान है.
भाजपा: भाजपा के मजबूत गढ़ों को इस सामूहिक ‘विचाराधीन’ प्रक्रिया से काफी हद तक बख्श दिया गया. भाजपा को केवल 4,882 मतदाताओं का नुकसान होने का अनुमान है.
इस प्रकार, भाजपा को नए वोट हासिल किए बिना ही आनुपातिक लाभ मिल गया है, क्योंकि उसके प्रतिद्वंद्वियों का वोट बैंक बड़े पैमाने पर साफ कर दिया गया है.
शमशेरगंज की सामाजिक स्थिति इस मुद्दे को और अधिक गंभीर बनाती है. यह क्षेत्र बीड़ी मजदूरों, अनौपचारिक श्रमिकों और नदी कटाव से प्रभावित विस्थापितों का है. यहाँ के लोगों के पास अक्सर पक्के दस्तावेजों का अभाव होता है और पते बदलते रहते हैं. ऐसी अस्थिर स्थिति में ‘दस्तावेजी प्रमाण’ की मांग करना गरीब और हाशिए के मतदाताओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर करने का एक औजार बन गया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, शमशेरगंज में आज 23 अप्रैल को हुआ मतदान केवल एक चुनावी औपचारिकता प्रतीत हो रहा है. प्रशासन का “नियमों के पालन” का तर्क उस समय खोखला नजर आता है जब एक-तिहाई मतदाता, जो मुख्य रूप से एक ही समुदाय और राजनीतिक विचारधारा से जुड़े हैं, मतदान से पहले ही बाहर कर दिए जाते हैं. असली सवाल यह नहीं है कि कौन जीतेगा, बल्कि यह है कि क्या यह चुनाव वास्तव में ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ कहा जा सकता है, जब मैदान को पहले ही एकतरफा रूप से बदल दिया गया हो. यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र की चुनावी शुचिता पर एक गहरा प्रश्नचिन्ह लगाती है.
बंगाल चुनाव: भाजपा ने राहुल गांधी के वीडियो क्लिप का इस्तेमाल कर उन्हें धन्यवाद दिया!
भाजपा की पश्चिम बंगाल ईकाई ने गुरुवार को सोशल मीडिया पर राहुल गांधी का एक 13 सेकंड का वीडियो क्लिप साझा किया, जिसमें वे बंगाल के मतदाताओं को संदेश दे रहे हैं. भाजपा ने इस क्लिप को साझा करते हुए उनका आभार व्यक्त किया.
‘द टेलीग्राफ’ ब्यूरो के अनुसार, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी क्लिप में यह कहते सुनाई दे रहे हैं: “अगर ममता जी ने एक साफ-सुथरी सरकार चलाई होती, अगर उन्होंने राज्य का इस हद तक ध्रुवीकरण नहीं किया होता, तो भाजपा के लिए रास्ता साफ नहीं होता.”
भाजपा के आधिकारिक हैंडल ने लिखा, “राहुल गांधी टीएमसी के बारे में सच्चाई के बम फोड़ते रहते हैं. राहुल जी, एक बार फिर धन्यवाद.” यह क्लिप राहुल गांधी द्वारा गुरुवार को बंगाल में पहले चरण के मतदान की पूर्व संध्या पर साझा किए गए एक लंबे संदेश का हिस्सा थी.
राहुल गांधी का पूरा वीडियो लगभग 1 मिनट 47 सेकंड लंबा है, जिसमें उन्होंने भाजपा द्वारा देश और बंगाल के लिए पैदा किए गए “खतरे” पर बात की थी. जाहिर है, भाजपा ने उस हिस्से का इस्तेमाल नहीं किया, जिसमें राहुल ने उसे कटघरे में खड़ा किया है. राहुल ने कहा: “इस देश में लड़ाई भाजपा और कांग्रेस की विचारधाराओं के बीच है. भाजपा चुनाव चुराती है. हरियाणा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में उन्होंने चुनाव चुराए. विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) भी चुनाव चुराने का एक जरिया है.” उन्होंने बंगाल के मतदाताओं को आगाह किया कि भाजपा बंगाल की बहुसंस्कृतिवाद और उदार बंगाली सोच का सम्मान नहीं करती है. भाजपा बंगाल की संस्कृति, इतिहास और भाषा के खिलाफ है. वे ‘एक राष्ट्र, एक धर्म, एक भाषा’ की बात करते हैं. हमारे देश में कई भाषाएं, अलग-अलग तरह के लोग, विभिन्न धर्म और विचार की धाराएं हैं. संविधान कहता है कि ‘इंडिया जो कि भारत है, राज्यों का एक संघ है’. हम संविधान की रक्षा करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि भाजपा संविधान को खत्म करने की कोशिश कर रही है.”
‘लाखों मतदाताओं का छूटना हमारे लोकतंत्र पर कलंक है’: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत ने चुनाव आयोग (ईसीआई) की कार्यप्रणाली, मतदाता सूचियों में गड़बड़ी और चुनावी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं. ‘द वायर’ के एमके वेणु को दिए इंटरव्यू में रावत ने कहा कि जिस बड़े पैमाने पर लाखों पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से गायब पाए जा रहे हैं, वह “हमारे लोकतंत्र पर एक बड़ा कलंक” है. उन्होंने जोर देकर कहा कि चुनाव आयोग की यह प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वह सुनिश्चित करे कि हर पात्र नागरिक का नाम सूची में हो और वह वोट दे सके. यदि लाखों लोग मतदान के अधिकार से वंचित रह जाते हैं, तो यह चुनाव की शुचिता पर सवाल खड़ा करता है.
उन्होंने सुझाव दिया कि चुनाव आयोग को टी.एन. शेषन के उदाहरण का अनुसरण करना चाहिए था और विपक्षी नेताओं को भी दूरदर्शन पर उतना ही समय देना चाहिए था जितना 18 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया गया. उन्होंने इस बात को भी दोहराया कि चुनाव आयोग के लिए आधिकारिक तौर पर किसी एक अकेली पार्टी को ‘क्या करें और क्या न करें’ (डूज़ एण्ड डॉन्ट्स) जारी करना स्पष्ट रूप से अवैध है – यदि ऐसा किया जाता है, तो यह चुनाव लड़ रहे सभी दलों के लिए होना चाहिए. उनके अनुसार, एक “लेवल प्लेइंग फील्ड” (समान अवसर) सुनिश्चित करना आयोग का संवैधानिक कर्तव्य है.
रावत ने इस बात की कड़ी आलोचना की कि चुनाव आयोग ने केवल एक विशेष दल (विपक्ष) को आधिकारिक तौर पर निर्देश जारी किए. उन्होंने इसे “स्पष्ट रूप से अवैध” बताया. उनका तर्क था कि यदि चुनाव आयोग कोई निर्देश या आचार संहिता से जुड़ी चेतावनी जारी करता है, तो वह चुनाव लड़ रहे सभी दलों के लिए समान रूप से होनी चाहिए, न कि किसी एक को निशाना बनाकर.
इंटरव्यू के दौरान उन्होंने हालिया ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) की प्रक्रिया पर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि पहले की प्रक्रियाएं सरल थीं, लेकिन ऐन चुनाव के पहले अब मतदाताओं पर खुद को साबित करने का बोझ डाल दिया गया है, जो कि गलत है. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को 100 करोड़ मतदाताओं की नागरिकता की जांच करने का कोई जनादेश नहीं है; यह उसका अधिकार क्षेत्र नहीं है.
उन्होंने इस बात पर दुख जताया कि वर्तमान में चुनाव आयोग की छवि एक निष्पक्ष संस्था के रूप में धूमिल हो रही है. उन्होंने कहा कि जब आयोग सत्ता पक्ष के उल्लंघन पर आंखें मूंद लेता है और केवल विपक्ष पर सख्त होता है, तो जनता का भरोसा डगमगाने लगता है.
ओम प्रकाश रावत का मानना है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए चुनाव आयोग का निडर और निष्पक्ष होना अनिवार्य है. उन्होंने अंत में चेतावनी दी कि यदि चुनाव आयोग ने अपनी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं किया और मतदाताओं के विश्वास को बहाल नहीं किया, तो भविष्य के चुनावों की विश्वसनीयता खतरे में पड़ सकती है.
परिसीमन की राजनीति: उत्तर-दक्षिण असंतुलन और ‘मुआवज़े की सियासत’
‘हरकारा’ डीप डाइव के इस एपिसोड में अर्थशास्त्री रथिन रॉय से परिसीमन, उत्तर बनाम दक्षिण का संतुलन, और बदलती राजनीति पर गहन चर्चा की. बातचीत की शुरुआत इस सवाल से होती है कि आखिर भारत में “वन पर्सन, वन वोट” का सिद्धांत व्यवहार में क्यों लागू नहीं है. 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों का जो फिक्सेशन हुआ, उसने आज एक ऐसी स्थिति बना दी है जहां जनसंख्या और प्रतिनिधित्व के बीच असंतुलन स्पष्ट दिखता है.
डॉ. रॉय विस्तार से समझाते हैं कि अगर आज के जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर सीटों का पुनर्विभाजन किया जाए, तो उत्तर और पूर्वी भारत को भारी राजनीतिक बढ़त मिल सकती है. वहीं दक्षिण और पश्चिम भारत, जो आर्थिक रूप से ज़्यादा मज़बूत हैं और देश की आधुनिक अर्थव्यवस्था (आईटी, मैन्युफैक्चरिंग, सर्विसेज) का बड़ा हिस्सा संभालते हैं, उन्हें यह डर है कि उनकी निर्णय लेने की शक्ति कम हो जाएगी. इस पूरे विवाद में दिलचस्प बात यह है कि दोनों पक्ष अपने-अपने दृष्टिकोण से सही हैं यानी यह एक टकराव नहीं, बल्कि संतुलन का सवाल है.
राजनीति के बदलते स्वरूप पर तीखी टिप्पणी सामने आती है. डॉ. रॉय ने “कंपनसेशन पॉलिटिक्स” का ज़िक्र किया, जहां सरकारें विकास के कठिन रास्ते पर चलने के बजाय मुफ्त योजनाओं, नकद हस्तांतरण और लाभार्थी राजनीति के ज़रिये वोट हासिल करने की कोशिश करती हैं. उनका तर्क है कि असली विकास वह है जिसमें लोगों को रोज़गार, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसर मिलें, न कि केवल असफलताओं की भरपाई के रूप में सहायता.
उत्तर और दक्षिण के बीच आर्थिक असमानता पर भी गहराई से चर्चा की. जहां दक्षिण भारत में निवेश, उद्योग और आधुनिक अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ है, वहीं उत्तर भारत के कई हिस्सों में औद्योगिकीकरण की गति धीमी रही है. इसके साथ ही एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है, सामाजिक एकीकरण की कमी. माइग्रेशन के बावजूद “रोटी-बेटी” का संबंध नहीं बन पा रहा, जिससे एक वास्तविक राष्ट्रीय एकता का निर्माण अधूरा रह जाता है.
डॉ. रॉय यह भी बताते हैं कि भारत तेज़ी से “मिडिल इनकम ट्रैप” की ओर बढ़ रहा है, एक ऐसी स्थिति जहां आय तो बढ़ती है, लेकिन स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन गुणवत्ता में सुधार नहीं हो पाता. वे उदाहरण देते हैं कि कैसे समृद्धि का लाभ समान रूप से वितरित नहीं हो रहा, और बड़ी आबादी अब भी बुनियादी ज़रूरतों के लिए संघर्ष कर रही है.
भारत की राजनीति का “भविष्य” की बजाय “अतीत” में उलझ जाना, एक अहम वजह है. जाति, धर्म और पहचान की राजनीति के बीच विकास का एजेंडा पीछे छूटता जा रहा है. खासकर एक युवा देश होने के बावजूद, निर्णय लेने की शक्ति बुजुर्ग नेतृत्व के हाथों में केंद्रित है, जिससे नई सोच और ऊर्जा का सही उपयोग नहीं हो पा रहा.
‘तृणमूल के गुंडों’ पर सीआरपीएफ की कार्रवाई? बांग्लादेश का पुराना वीडियो गलत दावे के साथ वायरल
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से जोड़कर सोशल मीडिया में एक वीडियो शेयर किया जा रहा है. इसमें मोटरसाइकिल पर सवार दो व्यक्ति नीचे उतरकर एक दरवाज़े पर कुल्हाड़ी से हमला करते नज़र आ रहे हैं. थोड़ी ही देर बाद सुरक्षाकर्मी द्वारा इन्हें हिरासत में ले लिया जाता है. यूज़र्स इस वीडियो को शेयर करते हुए दावा कर रहे है कि टीएमसी (तृणमूल कांग्रेस) के दो गुंडे बाइक पर सवार होकर मतदाताओं को डराने आए थे, जिन्हें चुनाव के दौरान तैनात केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने रोक दिया और तुरंत गिरफ़्तार कर लिया.
‘ऑल्ट न्यूज़’ में पवन कुमार के अनुसार, भाजपा और नरेंद्र मोदी समर्थक राइट विंग एक्स-यूज़र अरुण यादव कोसली ने वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “टीएमसी के गुंडे धमकाने आए थे, पर भूल गये बंगाल में अब सीआरपीएफ तैनात हैं, कर दिया इलाज.” बता दें कि ऑल्ट न्यूज़ द्वारा पहले भी अरुण यादव कोसली को कई मौकों पर ग़लत और सांप्रदायिक नफ़रती जानकारी फैलाते पाया गया है.
ऑल्ट न्यूज़ ने वायरल वीडियो का फैक्ट-चेक कर पाया कि वीडियो क्रॉप्ड है जिसके ऊपर किनारे में मिरर व्यू के रूप में ‘ƎꟼƎᗡИI’ लिखा है और सफेद और लाल रंग के एक लोगो जैसा बना हुआ है. जिसे सीधा करने पर ‘INDEPE‘ लिखा हुआ पता चलता है.
वायरल वीडियो के की-फ्रेम्स को रिवर्स इमेज सर्च किया, तो बांग्लादेशी मीडिया संस्था ‘Independent Television‘ के यूट्यूब चैनल पर 3 मिनट लंबा वीडियो 17 अगस्त 2024 को अपलोडेड मिला. इसका लोगो ‘INDEPENDENT’ वायरल वीडियो में दिख रहे लोगो से मेल खा रहा है. इस वीडियो के साथ दी गई जानकारी के मुताबिक, “बांग्लादेश के फरीदपुर के एक दुकान में तोड़फोड़ करते बदमाशों को सेना ने पकड़ा.”
जांच के दौरान बांग्लादेशी मीडिया आउटलेट ‘Dhaka Post‘ की 17 अगस्त 2024 को प्रकाशित एक रिपोर्ट मिली. इसमें वीडियो दिखाते हुए बताया गया कि 14 अगस्त 2024 को फरीदपुर के बोआलमारी में दो गुटों के बीच हुई झड़प के बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) कार्यकर्ताओं ने एक पार्टी की दुकानों में तोड़फोड़ की. बाद में सेना ने दो लोगों को हिरासत में लिया है. घटना का वीडियो 17 अगस्त को सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. आगे रिपोर्ट में बताया गया गिरफ्तार किए गए लोगों में मोहम्मद तुतुल हुसैन और दुखु मियां को अदालत के माध्यम से जेल भेज दिया गया.
यानी, असल में वायरल वीडियो अगस्त 2024 में बांग्लादेश के फरीदपुर इलाके में हुई एक घटना का है, जहां दो गुटों की झड़प के बाद दुकान में तोड़फोड़ की गई. सेना ने दो लोगों को हिरासत में ले लिया था. इस दो साल पुराने वीडियो को यूज़र्स शेयर करते हुए हालिया पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान का बताकर झूठा दावा कर रहे हैं. ये वीडियो मतदाताओं को धमकाने आए ‘टीएमसी गुंडों’ का नहीं है.
ईरान में जंग
होर्मुज़ में बारूदी सुरंगें बिछाने वालों को देखते ही गोली मारने का ट्रम्प का आदेश
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गुरुवार को अमेरिकी नौसेना को सख़्त आदेश दिया है कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य में बारूदी सुरंगें बिछाने वाली किसी भी नाव को देखते ही गोली मार दी जाए. यह निर्देश ऐसे समय में आया है जब पेंटागन ने घोषणा की है कि अमेरिकी बलों ने ईरान से तेल ले जा रहे एक और प्रतिबंधित टैंकर को अपने कब्ज़े में ले लिया है. एक दिन पहले ही, ईरानी बलों ने इस जलडमरूमध्य के पास दो मालवाहक जहाज़ों को ज़ब्त करने का दावा किया था, जो तेल और गैस की सप्लाई के लिए एक बेहद अहम मार्ग है. ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि इसमें कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए. उन्होंने यह भी बताया कि अमेरिकी माइंसवीपर्स अभी जलडमरूमध्य को साफ़ कर रहे हैं. हालांकि, अभी तक इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है कि क्या वाक़ई ईरानी नावें वहां सुरंगें बिछा रही हैं.
बुधवार को व्हाइट हाउस ने कहा था कि राष्ट्रपति, ईरान द्वारा जहाज़ों को ज़ब्त करने की घटना को इस हफ़्ते बढ़ाए गए अमेरिका-ईरान संघर्ष विराम का उल्लंघन नहीं मानते हैं, लेकिन ट्रम्प की ताज़ा पोस्ट काफ़ी आक्रामक है. इस तनाव ने ऊर्जा बाज़ारों में फिर से डर पैदा कर दिया है, जिससे गुरुवार को तेल की क़ीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गईं. अमेरिका और इज़राइल द्वारा फ़रवरी के अंत में ईरान पर युद्ध शुरू करने और ईरान द्वारा इस जलमार्ग को ब्लॉक करने के बाद से ऊर्जा की क़ीमतें तेज़ी से बढ़ी हैं. इसके जवाब में अमेरिका ने नौसैनिक नाकेबंदी कर दी है. पेंटागन ने बताया कि अमेरिकी बलों ने हिंद महासागर में एम/टी मैजेस्टिक एक्स नामक एक ईरानी तेल टैंकर को रोका है, और इससे पहले एम/टी टिफ़नी को भी नेवी सील्स ने अपने कब्ज़े में लिया था. अन्य घटनाक्रमों में, वाशिंगटन में इज़राइल और लेबनान के बीच राजदूत स्तर की दूसरे दौर की वार्ता गुरुवार को होनी है, जबकि इज़राइल और ईरान समर्थित हिज़्बुल्लाह के बीच 10 दिन का संघर्ष विराम रविवार को ख़त्म हो रहा है. ग्रीस के विदेश मंत्री ने बताया कि ईरान द्वारा ज़ब्त किया गया एक टैंकर एपामिनोंडास अब बिना किसी ईरानी नागरिक के खड़ा है, हालांकि उसकी लोकेशन नहीं बताई गई. वहीं, लंदन में होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए 30 से अधिक देशों के सैन्य योजनाकारों के साथ एक शिखर सम्मेलन फिर से शुरू हुआ. इस बीच, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने तीन मध्य पूर्वी देशों के साथ हुए सुरक्षा समझौतों का ब्यौरा सार्वजनिक किया है, जो ईरानी ड्रोन और मिसाइलों के ख़िलाफ़ अपनी रक्षा मज़बूत कर रहे हैं.
अल जज़ीरा की पत्रकार एलिज़ाबेथ मेलिमोपोलोस की रिपोर्ट के अनुसार, शांति वार्ता रुकने के लिए वरिष्ठ ईरानी अधिकारियों ने वाशिंगटन को ज़िम्मेदार ठहराया है. ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने कहा कि तेहरान बातचीत और समझौता चाहता है, लेकिन अमेरिका द्वारा वादों का उल्लंघन, नाकेबंदी और धमकियां इसमें बाधा बन रही हैं. दूसरी ओर, व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के लिए शांति प्रस्ताव पेश करने की कोई समय सीमा तय नहीं की है. ईरान की संसद के स्पीकर ने कहा है कि जब तक अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी जारी रहेगी, तब तक होर्मुज़ जलडमरूमध्य को नहीं खोला जाएगा, जिसे उन्होंने सीज़फ़ायर का खुला उल्लंघन बताया है. इस बीच, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने इस जलमार्ग से गुज़रने के प्रतिबंधों का उल्लंघन करने पर दो विदेशी जहाज़ों पर कब्ज़ा करने और एक अन्य पर गोलीबारी करने की बात स्वीकार की है. ईरान के शीर्ष वार्ताकार के अनुसार, तेहरान को जलडमरूमध्य से गुज़रने वाले जहाज़ों पर लगाए गए टोल से पहली आमदनी भी प्राप्त हो गई है.
अमेरिका के भीतर भी भारी राजनीतिक और सैन्य उथल-पुथल
पेंटागन के प्रमुख पीट हेगसेथ ने नौसेना सचिव जॉन फ़ेलन को बर्ख़ास्त कर दिया है. ट्रम्प प्रशासन के तहत यह 34वें वरिष्ठ अधिकारी की छंटनी है और अब 25 वर्षीय नौसेना युद्ध वयोवृद्ध हंग काओ को कार्यवाहक प्रमुख बनाया गया है. वहीं, अमेरिकी सीनेट ने 55-46 के वोट से ईरान पर युद्ध छेड़ने के ट्रम्प के अधिकारों को सीमित करने वाले प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया है, जिसे डेमोक्रेट सीनेटर टैमी बाल्डविन ने पेश किया था. अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने कम से कम 10,000 सैनिकों, 17 युद्धपोतों और 100 से अधिक विमानों के साथ बड़े पैमाने पर नाकेबंदी करते हुए 31 जहाज़ों को वापस भेज दिया है. वाशिंगटन से अल जज़ीरा के एलन फ़िशर की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रम्प का मानना है कि यह नाकेबंदी ईरान पर भारी आर्थिक दबाव बनाकर उसे वार्ता की मेज़ पर लौटने को मजबूर कर देगी. ट्रम्प ने यह कहकर अपनी हताशा भी ज़ाहिर की है कि ईरान को ख़ुद नहीं पता कि उसका नेता कौन है. इज़राइल-लेबनान के मोर्चे पर, पूर्व अमेरिकी ब्रिगेडियर जनरल मार्क किमिट ने अल जज़ीरा को बताया कि वाशिंगटन में हो रही वार्ता में हिज़्बुल्लाह की अनुपस्थिति एक बड़ी खामी है. इज़राइल के विदेश मंत्री गिदोन सार ने भी लेबनान के बजाय हिज़्बुल्लाह को शांति में मुख्य बाधा बताया है. इस बीच, सीज़फ़ायर के बावजूद लेबनान और ग़ज़ा में हिंसा जारी है. टायर से अल जज़ीरा की हेइडी पेट की रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिणी लेबनान के अल-तैरी में इज़राइली हवाई हमलों में कम से कम पांच लोग मारे गए हैं, जिनमें अल अख़बार की संवाददाता अमल ख़लील शामिल हैं, जबकि स्वतंत्र पत्रकार ज़ैनब फ़राज़ घायल हो गई हैं. बताया जा रहा है कि शरण लेने के दौरान पत्रकारों का पीछा किया गया और बचाव के लिए आई रेड क्रॉस की एम्बुलेंस पर भी स्टन ग्रेनेड और गोलीबारी से हमला हुआ. ग़ज़ा की नागरिक सुरक्षा एजेंसी के मुताबिक, उत्तरी ग़ज़ा के बीट लाहिया में अल-क़सम मस्जिद के पास इज़राइली हमले में तीन बच्चों सहित पांच फ़िलिस्तीनी नागरिक मारे गए हैं.
युद्ध आज ख़त्म हो तो भी 3 करोड़ से ज़्यादा लोग ग़रीबी के गर्त में जाएंगे
सीएनएन और रॉयटर्स के हवाले से आई ख़बर के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र ने एक गंभीर चेतावनी दी है कि अगर ईरान युद्ध कल ख़त्म भी हो जाए, तो भी दुनिया भर में 3 करोड़ से अधिक लोग फिर से ग़रीबी की मार झेलने को मजबूर हो जाएंगे. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के प्रमुख अलेक्जेंडर डी क्रू ने रॉयटर्स के साथ बातचीत में बताया कि दुनियाभर में 0.5 से 0.8 प्रतिशत जीडीपी का नुक़सान हो रहा है. बेल्जियम के पूर्व प्रधानमंत्री रहे डी क्रू ने कहा कि कमज़ोर देशों के लिए इसका सीधा अर्थ है 3.2 करोड़ लोगों का वापस ग़रीबी में धकेला जाना. उन्होंने बताया कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र को हर साल 100 अरब डॉलर की रेमिटेंस मिलती थी, जो सीधे परिवारों तक जाती थी, लेकिन मौजूदा हालात में यह रक़म लगभग ग़ायब हो चुकी है. डी क्रू ने इस भयानक स्थिति के पीछे ऊर्जा की क़ीमतों में उछाल और बढ़ती खाद्य असुरक्षा को मुख्य कारण बताया. तेल की आपूर्ति के अलावा, फ़र्टिलाइज़र की एक बहुत बड़ी खेप भी आम तौर पर होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुज़रती है, जिसे ईरान ने पूरी तरह बंद कर रखा है. उन्होंने आगाह किया कि कुछ महीनों में भोजन की कमी अपने चरम पर पहुंच जाएगी. उनका कहना था कि अभी बुआई का मौसम है, और अगर किसानों को उर्वरक नहीं मिला तो सितंबर, अक्टूबर और नवंबर में उत्पादकता बहुत कम हो जाएगी, जिसके चलते आने वाले महीनों में दुनिया भयंकर खाद्य संकट का सामना करेगी.
ईरान युद्ध से पहले ही चीन ने कर लिया था कच्चे तेल का भारी भंडारण
एक्सियोस की पत्रकार एमी हार्डर की एक अहम विश्लेषण रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान युद्ध शुरू होने से पहले ही चीन ने भारी मात्रा में तेल का भंडारण कर लिया था, जो अब एक बड़े रणनीतिक फ़ायदे के रूप में उभर रहा है. यह भंडार पिछले साल तेज़ी से बढ़ा था, और अब जबकि होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद है और दुनिया तेल संकट का सामना कर रही है, चीन सबसे बड़े विजेता के रूप में सामने आया है. एक्सियोस के सह-संस्थापक और सीईओ जिम वांडेहेई ने चीन पर लिखे अपने बिहाइंड द कर्टेन कॉलम में स्पष्ट किया है कि यह युद्ध एक ऐसा स्ट्रेस टेस्ट था जिसके लिए बीजिंग की ऊर्जा रणनीति को पहले से ही डिज़ाइन किया गया था. इसके अलावा, दुनिया भर में सौर, पवन, बैटरी और इलेक्ट्रिक वाहन की सप्लाई चेन के 70 प्रतिशत से अधिक हिस्से पर भी चीन का ही कब्ज़ा है, जिसकी मांग अब तेल-आयात करने वाले देशों द्वारा रिन्यूएबल एनर्जी की तरफ़ मुड़ने के कारण तेज़ी से बढ़ रही है. ऑक्सफ़ोर्ड इंस्टीट्यूट फ़ॉर एनर्जी स्टडीज़ के फ़रवरी के एक पेपर के अनुसार, 2025 में चीन के तेल भंडारण में भारी उछाल के कई कारण थे. इनमें नरम मांग के कारण तेल की कम क़ीमतें, रूस, वेनेज़ुएला और ईरान जैसे प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं पर प्रतिबंधों से जुड़े भू-राजनीतिक जोखिम और कंपनियों को अधिक रिज़र्व रखने का निर्देश देने वाला एक नया घरेलू ऊर्जा क़ानून शामिल हैं. अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के अनुमानों के मुताबिक, चीन ने 2025 में अपने रणनीतिक तेल भंडार में रोज़ाना औसतन 1.1 मिलियन बैरल कच्चा तेल जोड़ा, जो दिसंबर तक क़रीब 1.4 बिलियन बैरल तक पहुंच गया था. फ़रवरी के अंत में संघर्ष शुरू होने से पहले तक चीन लगातार यह भंडार बढ़ा रहा था. दूसरी ओर, अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने 11 मार्च को अब तक की सबसे बड़ी रिलीज़ का समन्वय करते हुए 400 मिलियन बैरल तेल जारी किया था, लेकिन गैर-सदस्य होने के कारण चीन इसका हिस्सा नहीं था. वहीं, 714 मिलियन बैरल की क्षमता वाला अमेरिकी रिज़र्व दिसंबर में लगभग 413 मिलियन बैरल पर था, जो मार्च की रिलीज़ के बाद गिरकर 409 मिलियन पर आ गया है. युद्ध के बीच अमेरिका के लिए इसे दोबारा भरना फ़िलहाल नामुमकिन लग रहा है, जिससे चीन के पिछले साल के क़दम अब बेहद दूरदर्शी साबित हो रहे हैं. लिंक:
मध्यस्थता की क़वायद और तेज़ होती नाकेबंदी: अमेरिका ने एशियाई जलक्षेत्र में रोके चार ईरानी तेल टैंकर
ड्रॉप साइट न्यूज़ के लिए रयान ग्रिम और मुर्तज़ा हुसैन की संयुक्त रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिकी नौसेना ने अपनी व्यापक नाकेबंदी को और सख़्त करते हुए हाल ही में भारत, मलेशिया और श्रीलंका के पास एशियाई जलक्षेत्र में कम से कम चार ईरानी तेल टैंकरों को रोका है. रॉयटर्स के अनुसार, सेंटकॉम ने पुष्टि की है कि डोरेना सुपरटैंकर हिंद महासागर में नौसेना की निगरानी में है. युद्ध विभाग की मैजेस्टिक एक्स को ज़ब्त करने की ख़बर के साथ-साथ शिपिंग सूत्रों ने डीप सी, सेविन और डेरिया को भी रोके जाने की पुष्टि की है. यह सब उसी अभियान का हिस्सा है जिसके तहत 31 अन्य जहाज़ों को पहले ही वापस भेजा जा चुका है. वाशिंगटन पोस्ट की एक ख़बर के मुताबिक, पेंटागन ने एक ख़ुफ़िया ब्रीफ़िंग में सांसदों को बताया है कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य से ईरानी बारूदी सुरंगों को पूरी तरह हटाने में कम से कम छह महीने लग सकते हैं और यह काम युद्ध ख़त्म होने के बाद ही शुरू हो सकेगा. हालांकि, ट्रम्प का दावा है कि उन्होंने माइंसवीपिंग अभियान को तीन गुना तेज़ करने का आदेश दे दिया है. कूटनीतिक मोर्चे पर भी पर्दे के पीछे कई हलचलें हो रही हैं. न्यूयॉर्क पोस्ट को दिए एक साक्षात्कार में राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा है कि शुक्रवार तक अमेरिका-ईरान की दूसरे दौर की वार्ता को लेकर अच्छी ख़बर आ सकती है. पाकिस्तानी सूत्रों ने अख़बार को बताया कि सीज़फ़ायर बना हुआ है और वे 36 से 72 घंटे की कूटनीतिक विंडो पर काम कर रहे हैं.
फ़ाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख फ़ील्ड मार्शल असीम मुनीर वाशिंगटन और तेहरान के बीच मुख्य मध्यस्थ के रूप में उभरे हैं. वह ईरानी नेताओं और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कमांडरों के साथ बैठकें कर रहे हैं और व्हाइट हाउस के भी सीधे संपर्क में हैं. हालांकि, विश्लेषक पाकिस्तान की मध्यस्थता की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं, क्योंकि सऊदी अरब के साथ उसके रक्षा समझौते हैं, ट्रम्प के क़रीबी लोगों के साथ उसके वित्तीय संबंध हैं और वह अमेरिकी नाकेबंदी पर पूरी तरह चुप है. इस बीच, ईरान के राष्ट्रपति पेज़ेशकियन ने फिर से बातचीत का रास्ता खुला रखने की बात कही है, लेकिन उन्होंने अमेरिका पर पाखंडी बयानबाज़ी का आरोप भी लगाया है.
एक अन्य चौंकाने वाले और मानवीय पहलू वाले खुलासे में, ड्रॉप साइट न्यूज़ ने रिपोर्ट किया है कि दक्षिण टेक्सास की आईसीई हिरासत में बंद दो ईरानी महिलाओं हमीदेह सुलेमानी अफ़शार और उनकी बेटी सरीना हुसैनी का ईरान के दिवंगत कमांडर जनरल क़ासिम सुलेमानी से कोई संबंध नहीं है. विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने आनन-फ़ानन में 3 अप्रैल को इन महिलाओं के ग्रीन कार्ड रद्द कर दिए थे. सबसे चिंताजनक बात यह है कि हमीदेह ऑटोइम्यून हेमोलिटिक एनीमिया नाम की गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं और उन्हें हिरासत केंद्र में ब्लड ट्रांसफ़्यूज़न से बार-बार मना किया जा रहा है. लिंक:
ऑनलाइन गेमिंग पर सरकार का ‘कंट्रोल मोड’: नए नियम लागू, पैसे वाले गेम्स पर सख्ती
भारत सरकार ने देश के तेजी से बढ़ते ऑनलाइन गेमिंग बाजार को विनियमित करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है. करोड़ों उपयोगकर्ताओं और बढ़ते वित्तीय लेनदेन को देखते हुए, केंद्र सरकार ने ऑनलाइन गेमिंग का प्रचार और विनियमन नियम, 2026 को अधिसूचित कर दिया है. ये नए नियम आगामी 1 मई से प्रभावी होने जा रहे हैं.
इस नए ढांचे के तहत सबसे बड़ा बदलाव ‘भारतीय ऑनलाइन गेमिंग प्राधिकरण’ का गठन है. इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत काम करने वाला यह नियामक यह तय करेगा कि कौन सा गेम ‘ऑनलाइन मनी गेम’, ‘ऑनलाइन सोशल गेम’ या ‘ई-स्पोर्ट्स’ की श्रेणी में आता है. इस प्राधिकरण की कमान पूरी तरह से सरकार के हाथों में होगी, जिसमें गृह, वित्त और खेल जैसे विभिन्न मंत्रालयों के प्रतिनिधि शामिल होंगे.
सरकार ने स्पष्ट किया है कि सभी गेम्स के लिए अनिवार्य पंजीकरण की आवश्यकता नहीं होगी. यह प्रक्रिया केवल उन्हीं गेम्स के लिए अनिवार्य होगी जिन्हें नियामक विशेष रूप से निर्देशित करेगा या जो ई-स्पोर्ट्स के अंतर्गत आते हैं. सरकार लेनदेन के मूल्य और गेम के पैमाने के आधार पर भी कुछ श्रेणियों को पंजीकरण के लिए अधिसूचित कर सकती है.
इन नियमों की एक खास बात यह है कि अब बैंकों और पेमेंट गेटवे जैसे वित्तीय संस्थानों को भी जवाबदेह बनाया गया है. किसी भी गेमिंग प्लेटफॉर्म को भुगतान की सुविधा देने से पहले इन संस्थानों को उसकी नियामक स्थिति की जांच करनी होगी. यदि ‘ओजीएआई’ किसी मनी गेम के खिलाफ निर्देश जारी करता है, तो बैंकों को तत्काल प्रभाव से उसके लेनदेन रोकने होंगे.
उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा और लत से बचाव के लिए कई तकनीकी प्रावधान किए गए हैं. गेमिंग कंपनियों को अब आयु सत्यापन, समय की पाबंदी, पैरेंटल कंट्रोल और फेयर-प्ले मॉनिटरिंग जैसे फीचर्स अनिवार्य रूप से देने होंगे. इसके अलावा, शिकायतों के निपटारे के लिए दो-स्तरीय व्यवस्था बनाई गई है, जहाँ उपयोगकर्ता अपनी समस्या पहले कंपनी के पास और फिर सरकारी अपीलीय प्राधिकरण के पास ले जा सकेंगे.
डेटा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए नए नियमों में डेटा स्थानीयकरण का प्रावधान भी शामिल है. यानी अब गेमिंग प्लेटफॉर्म्स को भारतीय उपयोगकर्ताओं से संबंधित ट्रैफिक और डेटा को भारत के भीतर ही स्टोर करना होगा.
इन नियमों के जरिए सरकार एक समान राष्ट्रीय ढांचा लागू करना चाहती है, जिससे अलग-अलग राज्यों में मौजूद नियामकीय असमानता खत्म हो सके. अब तक कई राज्य अपने-अपने तरीके से ऑनलाइन गेमिंग को नियंत्रित कर रहे थे, जिससे कंपनियों के लिए काम करना जटिल हो जाता था. नया फ्रेमवर्क इस भ्रम को दूर करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह नीति डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए दोधारी तलवार साबित हो सकती है. एक ओर इससे पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी, वहीं दूसरी ओर स्टार्टअप्स और निवेशकों के लिए अनुपालन लागत बढ़ सकती है. खासकर रियल-मनी गेमिंग से जुड़े प्लेटफॉर्म्स को अपने बिजनेस मॉडल में बदलाव करना पड़ सकता है.
आने वाले समय में ‘ओजीएआई’ द्वारा जारी दिशा-निर्देश इस सेक्टर की दिशा तय करेंगे. फिलहाल इतना तय है कि भारत में ऑनलाइन गेमिंग का दौर जारी रहेगा, लेकिन अब यह पूरी तरह नियमों के दायरे में होगा.यह खबर ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से लिया गया है.
क्या गरीबी सच में ‘जातिहीन’ है? तेलंगाना सर्वे ने ‘समान हालात’ की सदियों पुरानी दलील तोड़ी
सदियों से भारत की नीतिगत बहसों में यह तर्क हमेशा दिया जाता रहा है कि गरीबी का जाती से कोई लेना देना नहीं है, अगर गरीब इंसान, चाहे वह किसी भी जाती का हो, उसकी स्थिति एक जैसी होती है और सिर्फ आर्थिक हालात बेहतर होने से ही असमानता दूर की जासकती है, लेकिन तेलंगाना सरकार के सोशिओ-इकनोमिक,एचुकेशनल, एम्प्लॉयमेंट, पॉलिटिकल एंड कास्ट (एसईईईपीसी) सर्वे 2024 ने लंबे समय से चले आ रहे तर्क को चुनौती दी है.
सुमित झा की साउथ फर्स्ट में चार हिस्सों में प्रकाशित रिपोर्ट से साफ पता चलता है कि तेलंगाना में गरीबी जाति से अलग नहीं है, बल्कि यह सामाजिक पहचान से गहराई से जुड़ी हुई है. भारत में गरीबी, शहर, स्वास्थ और अवसर , यह सब जाति ही तय करती है. इस सर्वे में करीब 3.55 करोड़ लोगों और 242 जातियों को शामिल किया गया है. जस्टिस बी. सुधर्शन रेड्डी के नेतृत्व में स्वतंत्र विशेषज्ञ समूह (आईईडब्ल्यूजी) ने इस रिपोर्ट का विश्लेषण किया, जिसमें केवल आय नहीं बल्कि आवास, शिक्षा, रोजगार, भूमि स्वामित्व, वित्तीय पहुंच और सामाजिक भेदभाव जैसे कई आयामों पर असमानताओं को मापा गया.
समान आय होने के बावजूद अलग-अलग जातियों की स्थिति में बड़ा अंतर बना रहता है. जिन परिवारों की सालाना आय एक लाख रुपये से कम है, उनमे अनुसूचित जाति (एससी) परिवारों का कम्पोज़िट बैकवर्डनेस इंडेक्स स्कोर 49 है, जबकि सामान्य वर्ग के परिवारों का स्कोर 16 है. इसका मतलब यह है कि सामान आर्थिक हालात होने के बावजूद एससी परिवारों को ख़राब घर, अंग्रेजी माध्यम शिक्षा की कमी, क़र्ज़ और सामाजिक पाबंदियों का ज़्यादा सामना करना पड़ता है.
सीबीआई इंडेक्स, 0 से 126 के बीच स्कोर देता है और 42 मानकों पर आधारित है, जैसे शिक्षा, रोज़गार, जीवन स्तर, आय, जायदाद, लिंग, सामाजिक भेदभाव और वित्तीय पहुंच. राज्य का औसत स्कोर 81 है, लेकिन एससी और एसटी समुदायों का पिछड़ापन सामान्य वर्ग से तक़रीबन तीन गुना ज़्यादा है. जबकि ओबीसी 2.7 गुना ज़्यादा पिछड़े हैं. सबसे अधिक पिछड़ा एससी दक्कल और बीसी-ऐ पिचिगुंटला हैं, जबकि सबसे कम पिछड़े समुदायों में ओसी कपु , जैन, राजू और ब्राह्मण शामिल हैं.
आवास और बुनियादी सुविधाओं में भी बड़ा अंतर सामने आया है. जहां शहरी तेलंगाना में 78.4% सामान्य वर्ग पक्के घरों में रहते हैं, वहीं एससी और एसटी समुदायों के लोग झुग्गी झोपड़ियों या कमज़ोर मकानों में ज़्यादा रहते हैं. जहाँ सामान्य वर्ग के 82% घरों में नल का पानी आता है, जानकी एससी परिवारों में सिर्फ 54% घरों में पानी आता है. शिक्षा के क्षेत्र में भी एक बड़ा अंतर देखने को मिलता है, प्राइवेट स्कूल में भी एक तिहाई सीटें सामान्य वर्ग के बच्चों से भरी होती हैं और वहीं एस-सी में यह आंकड़ा 10% से भी कम है. अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ने वाले ज़्यादा तर बच्चे यानी 66.3% सामान्य वर्ग से होते हैं, जबकि एसटी में 36.6% और एससी में 40.7 % है. तेलंगाना में 56%12वीं से आगे नहीं पढ़ पाती और इसका सबसे ज़्यादा असर इन जातिओं से ताल्लुक़ रखने वाले बच्चों पर पड़ता है.
रोजगार, आय और क़र्ज़ के आंकड़े भी असमानता को दिखाते हैं. एससी के 45.7% और एसटी के 40.6% लोग दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं, जबकि सामान्य वर्ग में यह सिर्फ 10.9% है. आय के मामले में भी अंतर है सिर्फ 2.1% एससी -एसटी परिवार सालाना 5 लाख रुपये से ज़्यादा कमाते हैं, जबकि सामान्य वर्ग में यह 13.2% है.क़र्ज़ में भी फ़र्क़ है, सामान्य वर्ग बैंक से कम ब्याज पर लोन लेता है, जबकि एससी-एसटी को साहूकारों पर निर्भर रहना पड़ता है.
सर्वे में माइग्रेशन और सरकारी योजनाओं के लाभ में भी बड़ा अंतर देखने को मिलता है. सामान्य वर्ग के लोग पढ़ाई के लिए अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में जाते हैं, जबकि एससी-एसटी समुदाय मुख्य तौर पर पश्चिम एशिया में मज़दूरी के लिए जाते हैं. वहीं, राज्य की 30% कल्याणकारी योजनाओं का लाभ अपेक्षाकृत कम पिछड़े वर्गों को मिल रहा है. हालांकि आरक्षण से एससी, एसटी और बीसी को सरकारी नौकरियों में कुछ मदद मिली है, लेकिन ग्रुप 1 सेवाओं में उनकी भागीदारी अभी भी कम है.
स्वास्थ्य के क्षेत्र में यह असमानता और अधिक स्पष्ट रूप से सामने आती है. सर्वे के अनुसार,एससी परिवार सामान्य वर्ग के मुकाबले लगभग चार गुना अधिक चिकित्सा खर्च के लिए क़र्ज़ लेने को मजबूर हैं। पूरे राज्य में जहां एससी समुदाय के 10.9% परिवार मेडिकल लोन पर निर्भर हैं, वहीं सामान्य वर्ग में यह आंकड़ा केवल 3% है. शहरी क्षेत्रों में यह अंतर और बढ़ जाता है. चौंकाने वाली बात यह है कि समान आय वाले गरीब वर्ग में भी एससी परिवारों में 12% लोग इलाज के लिए क़र्ज़ लेते हैं, जबकि ओसी में यह केवल 4% है. इसका कारण केवल गरीबी नहीं, बल्कि बचत, पारिवारिक सहयोग और सस्ती वित्तीय सेवाओं तक पहुंच नहीं होना है.
शहरों को लेकर भी एक बड़ा मिथक इस सर्वे ने तोड़ा है. दशकों से यह माना जाता रहा है कि शहर जाति को खत्म कर देते हैं और सभी को समान अवसर देते हैं. लेकिन तेलंगाना के आंकड़े बताते हैं कि शहर जातिगत असमानता को खत्म नहीं करते, बल्कि कई बार उसे और गहरा कर देते हैं.
इसके उलट सामान्य वर्ग हालात शहरों में बेहतर हो जाता है. कई समुदायों के लिए शहर अवसर नहीं, बल्कि असुरक्षा का स्थान बन जाता है, जहां उन्हें अजीब ओ गरीब काम, किराए के छोटे घर और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है. भेदभाव के आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं. जहां ग्रामीण क्षेत्रों में 3.8% लोगों ने धार्मिक स्थलों पर भेदभाव की बात कही, वहीं शहरों में यह आंकड़ा 8.2% तक पहुंच जाता है. हालांकि शहरों में अंतरजातीय विवाह की दर अधिक है, लेकिन 91% से ज़्यादा लोग अब भी अपनी ही जाति में विवाह करते हैं. यानी सामाजिक ढांचा अभी भी बड़े पैमाने पर अपरिवर्तित है.
अगर ज़मीन रखने और उनकी मिलकियत की बात की जाए तो इसमें एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिला है, एसटी समुदायों के पास औसतन अधिक ज़मीन है, लेकिन उनमे से ज़्यादातर ज़मीन या तो बंजर हैं या सिंचाई रहित, जो आमदनी का ज़रिया नहीं बन सकता है.
“नो कास्ट” समूह का निष्कर्ष भी दिलचस्प है. यह समूह, जो खुद को जाति से अलग बताता है, सामाजिक और आर्थिक रूप से उम्मीद के मुताबिक़ बेहतर स्थिति में है. लेकिन इनमें से बड़ी संख्या के पास जाति प्रमाणपत्र भी है और उन्होंने आरक्षण का लाभ भी लिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि जाति से दूरी तभी संभव होती है जब व्यक्ति पहले से सुरक्षित और सशक्त स्थिति में हो. भारत में असमानता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि गहराई से सामाजिक संरचना में निहित है. तेलंगाना का यह सर्वे यह दिखाता है कि जब तक नीतियां जाति आधारित असमानताओं को ध्यान में रखकर नहीं बनाई जाएंगी, तब तक समानता का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल रहेगा.
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