21/04/2026: इस्लामाबाद आने से ईरान की ना |आक्रामक ट्रंप | 'दीदी ओ दीदी' के बाद बंगाल में अब 'ऐ दीदी' | आरएसएस की बंगाल एंट्री | मोदी भाषण पर 700 नागरिकों की चिट्ठी | सूरत से पलायन | ऊर्जा संकट
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
इस्लामाबाद आने से ईरान की ना, उधर जेडी का आना भी होल्ड पर.. सीज़ फायर की मियाद खत्म
ट्रंप का आक्रामक रुख: “सेना युद्ध के लिए बेकरार है
दुनिया के लिए खतरे की घंटी: इतिहास का सबसे बड़ा ऊर्जा संकट
अमित शाह के ‘ऐ दीदी’ तंज़ में मोदी के 2021 वाले ‘दीदी ओ दीदी’ की एंट्री: पहले चरण के चुनाव प्रचार के अंत में टीएमसी का भाजपा पर हमला
अपूर्वानंद लोकतंत्र की अप्रत्याशित घर वापसी
मोदी के भाषण और आचार संहिता पर विवाद, 700 नागरिकों की चिट्ठी से बढ़ी बहस
“अब नहीं आऊंगा दोस्त…”: सूरत से पलायन की पीड़ा के बीच नोएडा से तमिलनाडु तक मज़दूर असंतोष
अरुण कुमार: ऐन चुनाव के वक़्त बंगाल में आरएसएस का हरकत में आना
बिज़नेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की संचयी निकासी पिछले किसी भी पूरे वर्ष के आंकड़ों को पार कर गई है. इस साल अब तक विदेशी निवेशकों द्वारा की गई कुल शुद्ध बिकवाली लगभग ₹1.68 ट्रिलियन रही है.
पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण, मार्च के महीने में विदेशी निवेशकों का सबसे बड़ा पलायन देखा गया, जिसमें उन्होंने एक ही महीने के भीतर ₹1.1 ट्रिलियन मूल्य के भारतीय शेयर बेचे.
होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने के कारण तेल की कीमतों में हुई वृद्धि ने भारत के राजकोषीय घाटे को बढ़ा दिया है, मुद्रास्फीति (महंगाई) में वृद्धि की है और आर्थिक विकास को प्रभावित किया है, क्योंकि भारत ऊर्जा आयात पर बहुत अधिक निर्भर है.
बिज़नेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया संकट का प्रभाव भारतीय बाजारों पर भी महसूस किया गया है. इस वर्ष अब तक सेंसेक्स में 7.9% और निफ्टी में 6.8% की गिरावट दर्ज की गई है.
इसी तरह, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध कंपनियों का बाजार पूंजीकरण 10.1 ट्रिलियन घटकर 465.7 ट्रिलियन रह गया है.
रुपया भी 2026 में 3.5% कमजोर हुआ है (जिसमें संघर्ष शुरू होने के बाद से आई 2.3% की गिरावट शामिल है) और 93.1 प्रति डॉलर के स्तर पर पहुँच गया है, जिससे विदेशी निवेशकों के रिटर्न में कमी आई है.
इस बीच ‘रॉयटर्स’ की खबर है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से होने वाली पश्चिम एशियाई खेप रुकने के बाद, मार्च में भारत का कच्चे तेल का आयात फरवरी (युद्ध-पूर्व स्तर) की तुलना में 13 प्रतिशत गिर गया. दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक और उपभोक्ता भारत ने मार्च में 4.5 मिलियन बैरल प्रति दिन (बीपीडी) कच्चे तेल का आयात किया. इसमें से आधा आयात रूस से हुआ.
रूस से होने वाला आयात फरवरी की तुलना में मार्च में लगभग दोगुना होकर 2.25 मिलियन बीपीडी हो गया, जबकि पश्चिम एशिया से होने वाली खेप 61 प्रतिशत घटकर 1.18 मिलियन बीपीडी रह गई.
मणिपुर में शांति कायम नहीं हो पा रही है. मंगलवार को भी दो जनजातीय समुदायों के बीच झड़पें हुईं. तनाव तब बढ़ा, जब स्थानीय पुलिस ने ‘यूनाइटेड नागा काउंसिल’ द्वारा लगाए गए सड़क जाम को हटाने की कोशिश की. दोनों पक्षों के बीच पथराव शुरू हो गया. इस हंगामे के दौरान कुछ राउंड गोलियां भी चलाई गईं. हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि यह किसने किया.
पहलगाम के भीषण आतंकी हमले, जिसमें 25 पर्यटकों और एक स्थानीय पोनीवाले (खच्चर चलाने वाले) की जान चली गई थी, के एक साल बाद भी ‘मिनी स्विट्जरलैंड’ के नाम से प्रसिद्ध बैसरन घाटी नागरिकों के लिए बंद है. हालांकि सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं, फिर भी पाबंदी जारी है. फ़ैयाज़ वानी के मुताबिक, बैसरन से लगभग 4 किलोमीटर दूर कनीमर्ग के कच्चे रास्ते पर अर्धसैनिक बल सीआरपीएफ के जवान तैनात हैं और वे किसी भी आगंतुक को इस प्रतिष्ठित पर्यटन स्थल की ओर जाने की अनुमति नहीं दे रहे हैं. आतंकी हमले के बाद कश्मीर के 48 पर्यटन स्थलों को बंद कर दिया गया था. इनमें से अधिकांश स्थलों को फिर से खोल दिया है, लेकिन बैसरन और कुछ अन्य स्थल अब भी बंद हैं.
कांग्रेस ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन नोटिस दिया है. कांग्रेस नेता के.सी. वेणुगोपाल ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर मोदी पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन के दौरान सांसदों पर “आक्षेप लगाने” का आरोप लगाया है. वेणुगोपाल ने कहा, “इस मामले को अत्यंत गंभीरता से लिए जाने की आवश्यकता है, क्योंकि अपने कर्तव्य का पालन करने वाले एक निर्वाचित प्रतिनिधि पर सवाल उठाना न केवल एक व्यक्तिगत हमला है, बल्कि यह संसद के अधिकार और भारत के लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का सीधा अपमान है. क्योंकि विधेयक अनुच्छेद 368 के प्रावधानों के तहत आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में विफल रहा था.
ईरान-अमेरिका युद्ध:
इस्लामाबाद आने से ईरान की ना, उधर जेडी का आना भी होल्ड पर.. सीज़ फायर की मियाद खत्म..
वॉशिंगटन/तेहरान/इस्लामाबाद: अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा तनाव अब एक निर्णायक और खतरनाक मोड़ पर आ गया है. एक्सियोस के रिपोर्टर बराक राविद की विशेष रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस की पाकिस्तान यात्रा, जो दोनों देशों के बीच शांति वार्ता के दूसरे दौर के लिए निर्धारित थी, मंगलवार को ऐन वक्त पर रोक दी गई. वॉशिंगटन में घंटों की देरी और अनिश्चितता का माहौल रहा क्योंकि ईरान का नेतृत्व इस मुद्दे पर पूरी तरह बंटा हुआ है. तेहरान में रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (आईआरजीसी) का दबाव है कि जब तक अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकाबंदी नहीं हटाता, तब तक बातचीत की मेज पर नहीं जाना चाहिए.
ट्रंप का आक्रामक रुख: “सेना युद्ध के लिए बेकरार है”
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शांति वार्ताओं के बीच अपने चिर-परिचित अंदाज में दबाव बनाना शुरू कर दिया है. सीएनबीसी और ब्लूमबर्ग के साथ बातचीत में ट्रंप ने स्पष्ट किया कि 14 दिनों का युद्ध विराम बुधवार शाम को समाप्त हो जाएगा और वे इसे आगे बढ़ाने के मूड में नहीं हैं. ट्रंप ने बेहद सख्त लहजे में कहा, “मेरे पास ज्यादा समय नहीं है. सेना पूरी तरह तैयार है और युद्ध के मैदान में उतरने के लिए बेकरार है. अगर कल तक कोई ठोस डील नहीं होती, तो मैं बमबारी फिर से शुरू करूँगा.” ट्रंप का मानना है कि बमबारी की धमकी देना बातचीत के लिए एक “बेहतर रवैया” है.
सीएनएन की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप की सोशल मीडिया पोस्ट्स ने भी वार्ता को नुकसान पहुँचाया है. ट्रंप ने दावा कर दिया था कि ईरान अपने संवर्धित यूरेनियम को सौंपने और परमाणु कार्यक्रम पर ‘असीमित’ रोक लगाने को तैयार है, जिसे ईरान ने सिरे से खारिज कर दिया. ईरान का मानना है कि ट्रंप सोशल मीडिया के जरिए उन शर्तों को थोप रहे हैं जो अभी तय ही नहीं हुई हैं.
ईरान की जवाबी चेतावनी और मध्यस्थों की भाग-दौड़
ईरान की संसद के अध्यक्ष और मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने साफ कर दिया है कि ईरान “धमकियों के साये में” बातचीत की मेज पर नहीं आएगा. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि युद्ध फिर से भड़कता है, तो ईरान के पास “मैदान में दिखाने के लिए नए पत्ते” मौजूद हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार और सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार लगातार तेहरान के संपर्क में हैं. पाकिस्तान, मिस्र और तुर्की के मध्यस्थों ने पूरा सोमवार ईरान को यह समझाने में बिता दिया कि कूटनीति को एक मौका दिया जाना चाहिए, लेकिन ईरानी प्रतिनिधिमंडल अभी भी अपने सर्वोच्च नेता की हरी झंडी का इंतजार कर रहा है.
दुनिया के लिए खतरे की घंटी: इतिहास का सबसे बड़ा ऊर्जा संकट
इस टकराव का असर केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं है. रॉयटर्स और ड्रॉपसाइट न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के प्रमुख फातिह बिरोल ने इसे “इतिहास का सबसे बड़ा ऊर्जा संकट” करार दिया है. बिरोल का कहना है कि यह संकट 1973 और 1979 के तेल संकटों से कहीं अधिक विनाशकारी है. ईरान पर अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी और हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे दुनिया भर में महंगाई और ईंधन की किल्लत पैदा हो सकती है. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी पहली बार सार्वजनिक रूप से हॉर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने की अपील की है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए इसकी महत्ता को दर्शाता है.
जमीनी हालात: नाकाबंदी, फांसी और हिंसा
युद्ध की भयावहता अन्य मोर्चों पर भी दिख रही है:
नौसैनिक घेराबंदी: लॉयड्स लिस्ट के अनुसार, कम से कम 26 ईरानी जहाजों ने अमेरिकी नाकाबंदी को धता बताते हुए हॉर्मुज से निकलने की कोशिश की है, जबकि अमेरिकी सेंटकॉम ने 27 जहाजों को वापस खदेड़ दिया है.
लेबनान और वेस्ट बैंक: अल जजीरा के अनुसार, इजरायली सेना ने लेबनान में 10-दिवसीय संघर्ष विराम का उल्लंघन करते हुए बमबारी की है, जिसमें कई घर तबाह हो गए. वहीं वेस्ट बैंक में इजरायली सेटलर्स की गोलीबारी में एक बच्चे समेत दो फिलिस्तीनियों की जान चली गई है.
मौजूदा स्थिति बेहद नाजुक है. यदि बुधवार तक वेंस और ईरानी वार्ताकारों के बीच इस्लामाबाद में आमना-सामना नहीं होता, तो ट्रंप की दी हुई समय सीमा समाप्त होते ही मध्य-पूर्व फिर से भीषण लपटों की चपेट में आ सकता है.
मोदी के भाषण और आचार संहिता पर विवाद, 700 नागरिकों की चिट्ठी से बढ़ी बहस
टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश के लाइव शो में वरिष्ठ पत्रकार राजेश चतुर्वेदी के साथ बातचीत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण और चुनाव आचार संहिता को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए. चर्चा में बताया गया कि हाल ही में लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक के फेल होने के अगले दिन प्रधानमंत्री ने दूरदर्शन के मंच से राष्ट्र के नाम संबोधन किया. आरोप है कि इस सरकारी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल चुनावी उद्देश्य से किया गया और संबोधन में कांग्रेस का नाम करीब 58-59 बार लिया गया, जबकि विषय महिलाओं से जुड़ा बताया गया था.
इस मुद्दे पर 700 से अधिक नागरिकों, रिटायर्ड अफसरों और एक्टिविस्टों ने इलेक्शन कमीशन को पत्र लिखकर शिकायत की है. पत्र में कहा गया कि जब कई राज्यों में चुनाव चल रहे हैं, तब सरकारी मंच का इस्तेमाल कर विपक्षी दलों पर हमला करना आचार संहिता का उल्लंघन है. साथ ही यह मांग भी की गई कि विपक्ष को भी ऐसे प्लेटफॉर्म पर समान अवसर दिया जाए और चुनाव तक ऐसे कंटेंट को हटाया जाए.
चर्चा में यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री के भाषणों में पहले भी सांप्रदायिक और विवादित बयान देखने को मिले हैं, जैसे “मंगलसूत्र छीनने”, “घुसपैठियों” और धार्मिक मुद्दों पर बयान. 2024 के चुनावों का हवाला देते हुए बताया गया कि कई मौकों पर विपक्ष पर गंभीर आरोप लगाए गए, लेकिन उनके समर्थन में ठोस तथ्य नहीं दिए गए. ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार, 2024 में 110 से ज्यादा भाषणों में इस्लामोफोबिया से जुड़े संदर्भ सामने आए थे.
कार्यक्रम में चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठे. राजेश चतुर्वेदी ने कहा कि पहले प्रधानमंत्री कार्यालय आचार संहिता को लेकर आयोग से सलाह लेता था, लेकिन हाल के वर्षों में ऐसा नहीं देखा गया. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि आयोग की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं और कई मामलों में कार्रवाई नहीं हुई. साथ ही यह भी कहा गया कि चुनावों के दौरान सरकारी एजेंसियों जैसे आयकर विभाग और ईडी की कार्रवाई भी राजनीतिक माहौल को प्रभावित करती है.
बातचीत के अंत में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनावों का जिक्र करते हुए कहा गया कि अलग-अलग चरणों में चुनाव कराने और भारी सुरक्षा बलों की मौजूदगी ने माहौल को और तनावपूर्ण बना दिया है. चर्चा में यह चिंता जताई गई कि क्या ऐसे हालात में मतदाता बिना डर के स्वतंत्र रूप से वोट दे पाएंगे। कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि यह चुनाव केवल राज्य का नहीं बल्कि पूरे देश की राजनीति पर असर डालने वाला हो सकता है.
अमित शाह के ‘ऐ दीदी’ तंज़ में मोदी के 2021 वाले ‘दीदी ओ दीदी’ की एंट्री; टीएमसी का भाजपा पर हमला
पश्चिम बंगाल में पहले चरण के मतदान के लिए प्रचार खत्म होने के साथ ही, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी पर किए गए एक तंज ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है. अमित शाह ने हिंदी में कहा, “ऐ दीदी, आँख और कान खोल के सुन लो,” और दावा किया कि टीएमसी चुनाव हारने वाली है.
आरिश छाबड़ा के अनुसार, ‘दीदी’ शब्द, जिसका बांग्ला में अर्थ ‘बड़ी बहन’ है और जो ममता बनर्जी के समर्थकों द्वारा उन्हें दिया गया एक प्रिय नाम है, इस बार फिर राज्य चुनावों के केंद्र में है. शाह की इस टिप्पणी ने टीएमसी का ध्यान खींचा, जिसने इसे 2021 के चुनाव अभियान के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “दीदी ओ दीदी” वाले तंज की गूँज के रूप में देखा. टीएमसी ने आरोप लगाया कि यह भाजपा की “महिला-विरोधी” मानसिकता का प्रदर्शन है.
यह विवाद ठीक उसी समय खड़ा हुआ जब मंगलवार शाम को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण (जो 23 अप्रैल को निर्धारित है) का प्रचार समाप्त हुआ. पश्चिम मेदिनीपुर में पहले चरण की अपनी अंतिम सार्वजनिक रैली को संबोधित करते हुए अमित शाह ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर सीधा और तीखा हमला किया. विकास के वादों के बीच शाह ने दावा किया कि टीएमसी का कार्यकाल समाप्त होने वाला है.
शाह ने भीड़ के सामने घोषणा की, “टाटा, बाय-बाय दीदी, आपका समय समाप्त हुआ.” उन्होंने आगे कहा, “आपने (बनर्जी और टीएमसी) बंगाल की जनता को बहुत परेशान किया है. अब आपके जाने का और भाजपा के आने का समय आ गया है.”
| विश्लेषण
अरुण कुमार: ऐन चुनाव के वक़्त बंगाल में आरएसएस का हरकत में आना
एक शासक जो विफलताओं को छिपाने और अपनी सकारात्मक छवि गढ़ने के लिए झूठ का सहारा लेता है, उसे हेरफेर करने वाले, स्व-मुग्ध और जनोत्तेजक नेता के रूप में देखा जाता है, जो अत्यधिक बेईमानी और ईमानदारी की कमी प्रदर्शित करता है. वह अक्सर अपने अनुयायियों को वास्तविकता पर संदेह करने के लिए उकसाता है, और सच्चाई एवं जवाबदेही के ऊपर आत्म-संरक्षण और अपनी छवि को प्राथमिकता देता है. नरेंद्र मोदी तर्कसंगत बहस के बजाय इच्छाओं और पूर्वाग्रहों को अपील करके समर्थन मांगते हैं, जिसमें अक्सर गलत बयानी शामिल होती है.
संसद द्वारा परिसीमन विधेयक से जुड़े महिला आरक्षण के उनके कदम को खारिज किए जाने के ठीक अगले दिन, उनका जनता के बीच जाना और कांग्रेस के खिलाफ़ इशारे करना इस बात को रेखांकित करता है कि उनमें नैतिक सिद्धांतों की भारी कमी है और वे अपनी व्यक्तिगत छवि के प्रति अत्यधिक आसक्त हैं. वे अपनी गलतियों को स्वीकार करने में असमर्थ हैं और विफलताओं के लिए दूसरों को दोष देने के आदी हैं. एक सच्चे शासक को ईमानदार और सच्चा होना चाहिए, और सत्ता बनाए रखने के लिए उसे धोखेबाज़ तरीके नहीं अपनाने चाहिए. मोदी में अपनी विफलताओं को स्वीकार करने की कोई प्रवृत्ति नहीं है और वे बाहरी कारकों को दोष देने पर निर्भर रहते हैं.
ऐसा नेता अपने नेतृत्व वाले लोगों के कल्याण के बजाय अपने स्वयं के ‘ब्रांड’ पर ध्यान केंद्रित करके खराब नेतृत्व का प्रदर्शन करता है. मूल रूप से यही वह कारण है जिसकी वजह से आरएसएस प्रमुख, जिन्होंने मोदी को प्रधानमंत्री बनाया, अब उनके खिलाफ़ हो गए हैं. बंगाल विधानसभा चुनाव भगवा पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) के अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण रहे हैं, फिर भी आरएसएस काफी हद तक चुनाव प्रचार से दूर रहा है. पिछले लगभग तीन वर्षों से, आरएसएस ने उनके काम करने के तरीके का खुलकर विरोध और आलोचना की है.
इसके बावजूद, राजनीतिक परिस्थितियों के कारण, आरएसएस ने हाल ही में विधानसभा चुनावों के प्रति अपना रुख नरम किया है. नरेंद्र मोदी और अमित शाह के साथ सुलह के संकेत के रूप में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने चुनाव के पहले चरण से ठीक तीन दिन पहले ज़मीनी स्तर पर हिंदू एकीकरण के लिए एक महत्वपूर्ण अभियान शुरू किया. गुजरात की यह जोड़ी, जो ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल करने का श्रेय आरएसएस के साथ साझा करने को तैयार नहीं थी, ने शुरू में अकेले आगे बढ़ने का फैसला किया था. एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए, प्रधानमंत्री मोदी ने वोट मांगते हुए ब्लॉक और जिला स्तर की बैठकें कीं. समर्थन जुटाने के लिए भारतीय चुनाव आयोग को एक सहयोगी के रूप में उपयोग करने का उनका प्रयास विफल रहा और इसके बजाय कई हिंदू मतदाता उनसे दूर हो गए.
हाल ही के एक सर्वे से पता चला है कि मोदी और शाह ने भाजपा को मुकाबले से लगभग बाहर कर दिया है, जबकि प्रारंभिक चुनाव प्रचार पर काफी खर्च किया गया था. वरिष्ठ भगवा नेताओं का मानना है कि मोदी का प्रचार उल्टा असर कर रहा है, क्योंकि उनके दावों और बयानबाज़ी ने मतदाताओं को खुद से दूर कर दिया है.
खबरों के मुताबिक, आरएसएस नेतृत्व महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक को संभालने के तरीके को लेकर मोदी और शाह से नाराज़ है. उन्होंने यह उम्मीद नहीं की थी कि एक सावधानीपूर्वक नियोजित रणनीति को इस जोड़ी द्वारा बिगाड़ दिया जाएगा. बंगाल में मोदी द्वारा लगभग पूरे भाजपा नेतृत्व और मंत्री सहयोगियों की तैनाती का उल्टा असर हुआ है, क्योंकि कई बंगाली उनके प्रचार के अंदाज़ को बंगाली संस्कृति और सामाजिक मानदंडों को नज़रअंदाज़ करने वाला मान रहे हैं. परिसीमन विधेयक का उपयोग उस तरह से नहीं किया गया जैसा कि आरएसएस ने मूल रूप से सोचा था.
हालाँकि आरएसएस सीधे तौर पर चुनाव प्रचार में भाग लेने के लिए अनिच्छुक था, लेकिन बंगाल जीतने और भगवा आधार को मज़बूत करने की आवश्यकता ने उसे फिर से विचार करने और महत्वपूर्ण राज्य चुनावों से पहले हिंदुत्व लामबंदी अभियान चलाने के लिए मजबूर किया. आरएसएस नेताओं का मानना है कि उनके प्रयास पार्टी की काफी मदद कर सकते हैं. हिंदू मतदाताओं के झुकाव में 5 प्रतिशत का बदलाव भी भाजपा के लिए चुनावी जीत में बदल सकता है. इस भागीदारी को भाजपा के संगठनात्मक ढांचे को मज़बूत करने और हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने के लिए “शांत, छोटे और समझदार” प्रयास के रूप में देखा जा रहा है.
यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि पार्टी मूल कैडरों और दल-बदलुओं के बीच आंतरिक संघर्ष से जूझ रही है. पुराने सदस्य इस बात से दुखी हैं कि मोदी और शाह ने शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाले दल-बदलुओं को प्रमुखता दी है, जो पूर्व तृणमूल नेता के रूप में एक बड़े वित्तीय घोटाले से जुड़े थे. चुनाव प्रचार में आरएसएस की भागीदारी से मूल कैडरों और नेताओं को प्रेरित करने की उम्मीद है. बंगाल विधानसभा चुनाव को केवल एक क्षेत्रीय प्रतियोगिता के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक परिदृश्य और भाजपा नेतृत्व के भविष्य के प्रभाव को आकार देने वाले फैसले के रूप में देखा जा रहा है. यही कारण है कि आरएसएस हाई-प्रोफाइल रैलियों के बजाय घर-घर संपर्क, मोहल्ला बैठकों और सांस्कृतिक “जागरण” कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित करते हुए व्यापक ज़मीनी संपर्क अभियान चला रहा है.
मोदी की पहले वाली अपील कम होने और उनके प्रभावी ढंग से नेतृत्व न कर पाने के कारण, हिंदू एकीकरण सुनिश्चित करने में संघ की भूमिका अधिक प्रत्यक्ष हो गई है. आरएसएस नेताओं का मानना है कि हिंदुत्व पर नए सिरे से ज़ोर देने से स्थिति को संभालने में मदद मिल सकती है. संगठन ने महिला मतदाताओं तक पहुँचने और परिसीमन एवं आरक्षण के निहितार्थों पर चर्चा करने के लिए अपने महिला कैडरों को तैनात करने की योजना बनाई है. हालाँकि, कांग्रेस के खिलाफ़ सार्वजनिक अभियान चलाकर खुद को महिलाओं के मसीहा के रूप में पेश करने का मोदी का प्रयास आरएसएस की रणनीति के अनुरूप नहीं हो सकता है.
महिला आरक्षण के प्रति आरएसएस का दृष्टिकोण पारंपरिक पुरुष-अनन्य वैचारिक रुख से बदलकर एक अधिक सक्रिय राजनीतिक भागीदारी की ओर विकसित हुआ है, जिसका लक्ष्य भाजपा के लिए एक समर्पित महिला वोट बैंक बनाना है. इसमें ‘राष्ट्र सेविका समिति’ जैसे संगठनों के माध्यम से महिलाओं के लिए एक राष्ट्रवादी पहचान विकसित करना और सकारात्मक कार्रवाई को परिसीमन जैसे व्यापक राजनीतिक लक्ष्यों से जोड़ना शामिल है.
‘नारी शक्ति’ वोट बैंक बनाने के लिए, आरएसएस अपने सहयोगियों और भाजपा महिला कार्यकर्ताओं के माध्यम से महिलाओं को लामबंद कर रहा है, विशेष रूप से सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है. महिला आरक्षण विधेयक (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) का समर्थन करते हुए, यह इसके कार्यान्वयन को 2026 के बाद की परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ता है, जिससे वर्तमान पुरुष नेताओं को हटाए बिना संसदीय सीटों के विस्तार की अनुमति मिलती है.
आरएसएस नेताओं का यह भी मानना है कि मोदी को सक्रिय चुनाव प्रचार से दूर रहना चाहिए था. बंगाल में पार्टी को पहले ही झटके लग चुके हैं, मोदी की सार्वजनिक छवि और विवादास्पद घटनाओं में कथित संलिप्तता ने मतदाताओं को शत्रुतापूर्ण बना दिया है. जहाँ मोदी और शाह रैलियाँ करना जारी रखे हुए हैं, वहीं आरएसएस शांत ज़मीनी अभियान चला रहा है और पार्टी के भीतर के मतभेदों को पाटने की कोशिश कर रहा है. इसकी गतिविधियाँ इसके शताब्दी वर्ष (2025-2026) के अनुरूप भी हैं, जिसमें अपने सामाजिक आधार का विस्तार करने के लिए गृहसंपर्क जैसे संपर्क कार्यक्रमों पर ज़ोर दिया जा रहा है.
2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की हार और मोदी की गिरती छवि के साथ, आरएसएस ने एक अधिक सक्रिय और पर्दे के पीछे वाली भूमिका अपना ली है—जिसे समन्वित, सूक्ष्म और “छाया” नेतृत्व के रूप में वर्णित किया गया है—जो मोदी-शाह के नेतृत्व को पूरी तरह से बदलने के बजाय हिंदू वोटों को एकजुट करने पर केंद्रित है.
2021 के विधानसभा चुनावों में, अमित शाह ने दावा किया था कि भाजपा 200 से अधिक सीटें जीतेगी लेकिन पार्टी केवल 77 सीटें ही हासिल कर पाई थी. उस समय मोदी और शाह के बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों के कारण आरएसएस ने भाजपा की राजनीतिक गतिविधियों से दूरी बना ली थी. तब से, भगवा कार्यकर्ताओं ने राज्य के 294 निर्वाचन क्षेत्रों में से लगभग 250 में लगभग 1.75 लाख मतदाता जागरूकता बैठकें आयोजित की हैं, जो अपनी बहुलवादी सामाजिक-राजनीतिक लोकाचार के लिए जाने जाने वाले राज्य में हिंदुत्व को बढ़ावा दे रही हैं.
निष्क्रिय स्वयंसेवकों को फिर से सक्रिय किया गया है और वे उन संदेशों के साथ घरों का दौरा कर रहे हैं जो प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक नहीं हैं, बल्कि हिंदुत्व के अनुरूप “भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों” को बढ़ावा देते हैं. जहाँ आरएसएस ने बंगाली संवेदनाओं के अनुकूल एक शांत और रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाया है, वहीं अमित शाह राज्य मशीनरी पर अपनी निर्भरता बनाए हुए हैं.
मतदान से ठीक एक सप्ताह पहले, प्रवर्तन कार्रवाइयाँ तेज़ हो गईं. ममता बनर्जी ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा बार-बार छापेमारी का आरोप लगाया और अधिकारियों पर चुनाव के दौरान उनकी पार्टी को निशाना बनाने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि पार्टी कार्यकर्ताओं पर पश्चिम बंगाल छोड़ने का दबाव बनाया जा रहा है और दावा किया कि उनकी सरकार नौकरियों की रक्षा करेगी और डराने-धमकाने का विरोध करेगी.
इन कार्रवाइयों ने आरएसएस नेतृत्व को मुश्किल स्थिति में डाल दिया है, क्योंकि इस तरह के ज़बरदस्ती के हथकंडे मतदाताओं को दूर कर देते हैं. शाह का दृष्टिकोण अनजाने में ममता बनर्जी के प्रति सार्वजनिक सहानुभूति बढ़ा सकता है. सत्ता विरोधी लहर दिखने के बावजूद, मोदी और शाह के आक्रामक हथकंडे उस पर भारी पड़ते दिख रहे हैं, जिससे उनके पीछे समर्थन एकजुट हो रहा है. हाल ही में TMC के लिए राजनीतिक विश्लेषण करने वाली संस्था I-PAC सहित अन्य जगहों पर ED की छापेमारी ने राजनीतिक माहौल को और अस्थिर कर दिया है, और संबंधित हितधारक खुद को पार्टी से दूर करने की कोशिश कर रहे हैं.
अरुण श्रीवास्तव एक वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह लेख काउंटर करंट्स वेबसाइट से लिया गया. उनका आभार.
लाइव बातचीत के साथ मोदी का मॉरल कोड
अपूर्वानंद: लोकतंत्र की अप्रत्याशित घर वापसी
131वें संविधान संशोधन विधेयक को हराने का विपक्ष का कदम महिला आरक्षण के बारे में बिल्कुल नहीं था. यह सशक्तिकरण की आड़ में सरकार को भारत के चुनावी मानचित्र को फिर से तैयार करने से रोकने के बारे में था.
17 अप्रैल, 2026 को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण तारीखों में से एक के रूप में दर्ज किया जाएगा. इस दिन, विपक्षी दलों ने लोकतांत्रिक ढांचे के प्रति उस खतरे के बारे में एक सामूहिक जागरूकता प्रदर्शित की, जो 2019 में नदारद थी—जब नागरिकता संशोधन विधेयक पारित किया गया था या जब अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया था. इस बार, वे एक साथ खड़े हुए और संसद की संरचना और संगठन को बदलने के सरकार के प्रयास को विफल कर दिया.
भारतीय लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए यह हार ज़रूरी थी. इसे न केवल सरकार की हार, बल्कि विपक्ष की जीत के रूप में देखा जाना चाहिए. इसने विपक्ष में आत्मविश्वास बहाल किया है. जनता के बीच भी अब विपक्ष के नज़रिए को लेकर उत्सुकता बढ़ रही है. नागरिकों ने इस बार संसदीय बहसों को बहुत ध्यान से देखा और सुना. वे यह समझने के लिए “मुख्यधारा” के मीडिया से इतर देख रहे हैं कि सरकार कहाँ और कैसे धोखे का सहारा लेती है. ऐसा प्रतीत होता है कि जनता सरकार के इस दावे को स्वीकार करने वाली नहीं है कि वह केवल महिलाओं के प्रतिनिधित्व के लिए कानून ला रही थी और उसे एक “स्त्री-द्वेषी” विपक्ष ने रोक दिया.
आज की जनता विपक्ष के इस तर्क को सुनने के लिए अधिक तैयार है: यदि सरकार विधायिकाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर इतनी चिंतित है, तो उसने सितंबर 2023 में संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित महिला आरक्षण अधिनियम को अभी तक लागू क्यों नहीं किया? उसने 16 अप्रैल, 2026 तक—संविधान संशोधन विधेयक पर मतदान की पूर्व संध्या तक—अधिनियम को अधिसूचित क्यों नहीं किया? क्या महिला आरक्षण को 543 सदस्यों की मौजूदा संख्या के भीतर लागू नहीं किया जा सकता? महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए सदन का विस्तार क्यों आवश्यक है?
सिद्धार्थ वरदराजन जैसे टिप्पणीकारों ने सही गौर किया है कि सरकार का असली इरादा महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाना नहीं, बल्कि विधायिकाओं में पुरुष वर्चस्व को बनाए रखना था. विपक्षी दलों ने भी सही आरोप लगाया है कि महिला सशक्तिकरण की बयानबाज़ी के पीछे छिपा असली मक़सद संसदीय सीटों का पुनर्वितरण है, जो गैर-हिंदी भाषी राज्यों को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाएगा और हिंदी पट्टी के वर्चस्व को मज़बूत करेगा.
सरकार का खोखला बचाव
सरकार का बचाव दयनीय रूप से कमज़ोर है. उसका दावा है कि यदि विपक्ष सहमत होता, तो वह सीटों की संख्या में 50 प्रतिशत की एकसमान वृद्धि का प्रावधान जोड़ देती. यदि वास्तव में ऐसा था, तो जैसा कि विपक्षी दलों ने रेखांकित किया, यह विधेयक के मूल पाठ (टेक्स्ट) का हिस्सा क्यों नहीं था?
सरकार, मज़ेदार रूप से, इस बात से दुखी है कि विपक्ष इतना “असभ्य” है कि वह प्रधानमंत्री के आश्वासन पर भी विश्वास करने से इनकार करता है. ऐसा नहीं है कि सरकार ने यह दिखाया हो कि उस पर भरोसा किया जा सकता है; और सरकारें तथा अदालतें लिखित शब्दों पर चलती हैं, विश्वास या मौखिक आश्वासनों पर नहीं.
प्रियंका गांधी यह दावा करने में सही हैं कि इस प्रधानमंत्री और उनकी सरकार की बातों पर भरोसा नहीं किया जा सकता. जो सरकार योजनाबद्ध तरीके से हर संवैधानिक प्रक्रिया को नष्ट करती है, वह भरोसे की मांग नहीं कर सकती. नरेंद्र मोदी और उनके मंत्री सच बोलने में असमर्थ हैं. यहाँ तक कि सरकार के समर्थक भी स्वीकार करते हैं कि इसने खुद को झूठ और धोखे का उस्ताद साबित किया है—वे इस बात पर गर्व करते हैं कि इसके झूठ को लगातार सच के रूप में स्वीकार किया गया है. वे इसे “चतुराई” कहते हैं.
जनता इन झूठों को क्यों स्वीकार करती है? मुख्य रूप से इसलिए क्योंकि मीडिया उन्हें स्थापित तथ्य के रूप में प्रसारित करता है. अब भी, मीडिया ने यह दावा करते हुए शोर मचाया कि विपक्ष ने महिला आरक्षण विधेयक को “गिरा” दिया है. यह झूठ है. सच तो यह है कि विपक्ष ने महिला आरक्षण के बहाने संसद और राज्य विधानसभाओं की संरचना और ढांचे को बदलने के सरकार के प्रयास को विफल कर दिया. यदि ऐसा नहीं है, तो निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन को महिला आरक्षण से क्यों जोड़ा गया? उद्देश्य महिलाओं के लिए जगह बढ़ाना नहीं था, बल्कि भारत के चुनावी मानचित्र को फिर से तैयार करने के लिए उन्हें एक बहाने के रूप में इस्तेमाल करना था. दक्षिण और पूर्वोत्तर के राज्यों के प्रतिनिधित्व को हाशिए पर डालने और उन्हें अप्रभावी बनाने की साज़िश को समझना मुश्किल नहीं है. हम पहले ही देख चुके हैं कि कैसे असम और जम्मू-कश्मीर में परिसीमन की प्रक्रिया का उपयोग मुसलमानों को राजनीतिक रूप से अधिकारहीन करने के लिए किया गया था. महिलाओं को उनका हक देने के लिए परिसीमन क्यों आवश्यक है?
यह सबसे सरल सवाल है जो मीडिया को पूछना चाहिए, लेकिन वह चुप है. इसके बजाय, वह सरकारी दुष्प्रचार का ऐसा तूफ़ान खड़ा करता है कि लोग देख ही न सकें कि वास्तव में क्या किया जा रहा है. विश्लेषकों की एक जमात अब पूरे घटनाक्रम की व्याख्या नरेंद्र मोदी के एक और “मास्टरस्ट्रोक” के रूप में करने में व्यस्त है. इस टोली का दावा है कि सरकार जानती थी कि विधेयक गिर जाएगा, लेकिन फिर भी उसने इसे इसलिए पेश किया ताकि विपक्ष को महिला-विरोधी चित्रित किया जा सके. अब, वे कहते हैं, विपक्ष को इसे गलत साबित करना होगा.
यह तर्क खोखला है. सरकार इतनी दूरदर्शी नहीं है कि उसे पहले से पता हो कि वह इस बार विपक्ष को तोड़ने में असफल रहेगी. उसने कोशिश की. लेकिन बिहार, बंगाल और अन्य जगहों पर एसआईआर (SIR) प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने के सामूहिक अन्याय ने विपक्ष की सतर्कता को पहले ही बढ़ा दिया था. उन्होंने पहचान लिया है कि यह सरकार अपने स्थायित्व को सुनिश्चित करने के लिए हर उपलब्ध साधन का उपयोग करती है. यह लोकतांत्रिक सतर्कता ही थी जिसने विपक्ष को सरकार के चारे को स्वीकार करने से इनकार करने पर अडिग रखा.
संसद में हारने के बाद, सरकार अब सड़कों पर उतर आई है—जैसे कि वह खुद विपक्ष हो—महिला आरक्षण के लिए अभियान चलाने के लिए. एक ऐसा विधेयक जो 2023 में ही पारित हो गया था! एक निर्णायक हार की टीस को छिपाने के लिए, उसने पुराने हथकंडों का सहारा लिया है, लेकिन वे केवल इस एहसास को फैला रहे हैं कि नरेंद्र मोदी—जो खुद को अजेय पेश करते हैं—को वास्तव में हराया जा सकता है.
प्रधानमंत्री ने विधेयक की विफलता के लिए विपक्ष पर हमला करने के लिए दूरदर्शन पर राष्ट्र के नाम संबोधन की पवित्रता का उपयोग किया. मोदी ने विशेष रूप से कांग्रेस, तृणमूल और द्रमुक को निशाना बनाया—तीनों ही पार्टियाँ आगामी तमिलनाडु और बंगाल चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका में हैं. यह सरकार अपनी ओछी और अनैतिक राजनीति के लिए जानी जाती है, लेकिन चुनावों की पूर्व संध्या पर ऐसा संबोधन अस्वीकार्य है. चुनाव आयोग को नोटिस जारी करना चाहिए था और मोदी को चुनाव प्रचार से रोकना चाहिए था. लेकिन हम जानते हैं कि चुनाव आयोग अब भाजपा की एक शाखा के रूप में कार्य करता है, जिसका उद्देश्य भाजपा की चुनावी हार को जीत में बदलना है.
यह देखना दिलचस्प होगा कि कितने अखबार और टेलीविजन चैनल प्रधानमंत्री के इस अनैतिक कृत्य की आलोचना करते हैं. इससे पता चलेगा कि इस देश में वास्तव में लोकतंत्र के अस्तित्व की किसे परवाह है.
चाहे मीडिया या किसी और को लोकतंत्र की परवाह हो या न हो, हमें—जनता को—होनी चाहिए. जिस तरह नोएडा और पानीपत के मज़दूर या ओडिशा के आदिवासी अपने अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं, हमें अपनी लोकतांत्रिक आज़ादी की रक्षा के लिए विपक्ष के साथ एकजुट होना चाहिए. यह लोकतंत्र की घर वापसी का क्षण हो सकता है, या हम अपनी लापरवाही से इसे हमेशा के लिए खो सकते हैं. चुनाव हमारा है.
अपूर्वानंद दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाते हैं और साहित्यिक एवं सांस्कृतिक आलोचना लिखते हैं. यह लेख फ्रंटलाइन के ऑनलाइन संस्करण से साभार लिया गया.
“अब नहीं आऊंगा दोस्त…”: सूरत से पलायन की पीड़ा के बीच नोएडा से तमिलनाडु तक मज़दूर असंतोष
देश के औद्योगिक परिदृश्य पर इस समय एक गहरी बेचैनी साफ़ दिखाई दे रही है. नोएडा के कारखानों से लेकर तमिलनाडु के उत्पादन केंद्रों तक, बिहार, उत्तराखंड, गुजरात, हरियाणा और राजस्थान के भिवाड़ी तक, हर जगह मज़दूर या तो सड़कों पर उतर आए हैं या फिर भूख, असुरक्षा और अनिश्चितता के बीच अपने गांवों की ओर लौटते नज़र आ रहे हैं. यह केवल अलग-अलग घटनाएं नहीं, बल्कि एक व्यापक राष्ट्रीय संकट का संकेत है. इसी पृष्ठभूमि में सूरत से एक प्रवासी मज़दूर का वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें वह यह कहते सुनाई दे रहे हैं, “अब नहीं आऊंगा दोस्त, बता देना”. यह वाक्य लाखों मज़दूरों की सामूहिक पीड़ा और टूटन का प्रतीक बन गया है. ये वही लोग हैं जो छोटे कस्बों और गांवों से बड़े शहरों में रोज़गार की तलाश में आए थे, लेकिन अब परिस्थितियां उन्हें वापस लौटने पर मजबूर कर रही हैं. कोविड-19 के दौरान जो तस्वीरें देश ने देखी थीं, वैसी ही बेचैनी एक बार फिर उभरती दिखाई दे रही है.
गुजरात के सूरत में उदना रेलवे स्टेशन पर उमड़ी भीड़ इस संकट की सबसे स्पष्ट तस्वीर पेश करती है. हजारों प्रवासी मज़दूर लंबी कतारों में खड़े होकर अपने घर लौटने की कोशिश करते दिखे. इकनोमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़ यह मज़दूर एलपीजी की कमी और बढ़ती कीमतों ने उनके लिए शहर में रहना मुश्किल कर दिया है. नोएडा में यह असंतोष खुले विरोध के रूप में सामने आया. हज़ारों फैक्ट्री मज़दूर सड़कों पर उतर आए और ऊंचे वेतन तथा बेहतर कामकाजी परिस्थितियों की मांग करने लगे. इनमें अधिकतर गैर-यूनियन ठेका मज़दूर थे, जो ऑटो पार्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और कपड़ा उद्योग में काम करते हैं. उनकी मासिक आय 10,000 से 15,000 रुपये के बीच है, जो वर्षों से लगभग स्थिर बनी हुई है. बढ़ती महंगाई के बीच यह आय उनके जीवनयापन के लिए पर्याप्त नहीं रह गई है.
इस असंतोष को और बढ़ाया राज्यों के बीच वेतन में असमानता ने, हरियाणा सरकार द्वारा 1 अप्रैल 2026 से न्यूनतम वेतन में 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी किए जाने के बाद, आसपास के राज्यों के मज़दूरों में भी समान वृद्धि की मांग तेज़ हो गई. लेकिन जब अन्य राज्यों में ऐसी बढ़ोतरी नहीं हुई, तो यह असंतोष और गहरा गया. दरअसल 2021 से 2026 के बीच महंगाई में लगभग 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई, लेकिन कई राज्यों में बेस न्यूनतम वेतन का समय पर संशोधन नहीं किया गया. भारत की न्यूनतम वेतन प्रणाली दो हिस्सों पर आधारित है, पहला बेस वेतन और दूसरा महंगाई भत्ता, लेकिन बेस वेतन में देरी के कारण कुल आय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाई. नतीजतन, मज़दूरों की वास्तविक आय घटती गई.
फरवरी 2026 से ही यह असंतोष अलग-अलग औद्योगिक क्षेत्रों में दिखाई देने लगा था. 2 फरवरी को बिहार के बरौनी में इंडियन ऑइल (आईओसीएल) की रिफाइनरी के मज़दूरों ने लंबे काम के घंटे, बिना भुगतान के ओवरटाइम और खराब कामकाजी परिस्थितियों के खिलाफ प्रदर्शन किया. इसके बाद 23 फरवरी को पानीपत रिफाइनरी में करीब 30,000 मज़दूरों का विरोध उग्र हो गया, जिसमें पथराव और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं. 27 फरवरी को सूरत के हजीरा में आर्सेलरमित्तल/निप्पॉन स्टील इंडिया (एम/एनएस) प्रोजेक्ट साइट पर भी मजदूरों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई. इन सभी आंदोलनों के केंद्र में एक साझा कारण रहा, महंगाई और ठहरे हुए वेतन के बीच बढ़ता अंतर. खासकर एलपीजी संकट ने मज़दूरों की स्थिति को और कठिन बना दिया. पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण गैस आपूर्ति प्रभावित हुई, जिससे सिलेंडरों की कीमत काला बाज़ार में 3-4 गुना तक बढ़ गई. इसका सीधा असर मज़दूरों के भोजन और दैनिक जीवन पर पड़ा.
द फ़ेडरल की रिपोर्ट के मुताबिक़ तमिलनाडु में 12 फरवरी को हुए “भारत बंद” ने इस असंतोष को राष्ट्रीय स्तर पर उजागर किया. मज़दूर संगठनों और किसान समूहों ने मिलकर केंद्र सरकार की नीतियों और नए श्रम कानूनों का विरोध किया. सेंटर ऑफ़ इंडियन ट्रेड यूनियनस ने आरोप लगाया कि ये कानून मज़दूरों की सुरक्षा को कमज़ोर करते हैं और कॉरपोरेट हितों को बढ़ावा देते हैं.
नए श्रम कानूनों को लेकर भी मज़दूरों में भ्रम और निराशा है. ऑक्यूपेशनल सेफ्टी हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड 2020 साप्ताहिक 48 घंटे का कार्य समय निर्धारित करता है, लेकिन दैनिक काम के घंटों को स्पष्ट नहीं करता. इसका फायदा उठाकर कई जगह 12 घंटे की शिफ्ट लागू की जा रही है, बिना उचित ओवरटाइम भुगतान के. उत्तराखंड के मोटाहल्दू और राजस्थान के भिवाड़ी जैसे क्षेत्रों में भी मजदूर सड़कों पर उतर आए. उत्तराखंड में मज़दूरों ने ₹20,000 न्यूनतम वेतन और 8 घंटे की शिफ्ट की मांग की, साथ ही बिना भुगतान ओवरटाइम और असुरक्षित कामकाजी हालात की शिकायत की. महिला कर्मचारियों ने अमानवीय व्यवहार और बुनियादी सुविधाओं की कमी के आरोप भी लगाए.
भारत के श्रम बाजार की एक बड़ी सच्चाई यह भी है कि 90 प्रतिशत से अधिक मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जहां न्यूनतम वेतन का कानून अक्सर कागज़ों तक सीमित रह जाता है. 31 करोड़ से अधिक श्रमिक बिना किसी ठोस सामाजिक सुरक्षा के काम कर रहे हैं.
इन प्रदर्शनों की एक खास बात यह रही कि इनमें किसी बड़े ट्रेड यूनियन का नेतृत्व नहीं था. वहीं उद्योग जगत का कहना है कि अचानक वेतन बढ़ाना उनके लिए भी आसान नहीं है. छोटे और मध्यम उद्योग सीमित मुनाफे पर चलते हैं, और लागत बढ़ने से उनके लिए संचालन कठिन हो सकता है.
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