20/04/2026: बंगाल में 'दिल्ली दरबार' बनाम ममता |गोमूत्र-गोबर का सेवन अनिवार्य | नेपाल में जेन जी इन्क़लाब | लॉर्डशिप के बच्चे | महंगी होती पढ़ाई | विरोध का गीत ‘दोनना’
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
इंसानों के सेवन के लिए अनुपयुक्त है गोमूत्र, इसमें हानिकारक बैक्टीरिया होते हैं: पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान
गंगोत्री मंदिर में अब गोमूत्र-गोबर से बने पंचगव्य का सेवन अनिवार्य, इसके बाद ही मिलेगा प्रवेश
मोदी बनाम ममता: पूरा दिल्ली दरबार उतर आया है एक राज्य के चुनाव को जीतने?
बंगाल चुनाव में आरएसएस का ‘साइलेंट’ अभियान: हिंदुत्व के एकीकरण के लिए ज़मीनी घेराबंदी
मतदाता सूची से नाम कटने का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से मांगी रिपोर्ट
लॉर्डशिप के बच्चे! सीबीआई की ‘अनजानी चूक’ या न्यायिक संस्कृति की सड़न
आकार पटेल: ईरान को छोड़कर किसी भी अन्य देश की तुलना में भारतीयों ने सबसे अधिक कष्ट झेला है और झेल रहे हैं
नेपाल में जेन जी का इन्क़लाब: ‘ट्रॉमा’ से ‘उम्मीद’ तक का सफ़र
महंगी होती पढ़ाई: स्कूल फीस, कोचिंग और बढ़ता ख़र्च परिवारों पर भारी
“लेकिन तुम हमारे बिना क्या हो?” कुछ भी नहीं! फ़िलिस्तीन के समर्थन में उठा सुर: ‘दोनना’ बना दमन के खिलाफ वैश्विक प्रतिरोध का गीत
देश में आज दो अलग-अलग दुर्घटनाओं में 46 लोगों की जान चली गई. पहली घटना जम्मू के उधमपुर की है, जहां एक यात्री बस का टायर फट गया और वह सड़क से 110 मीटर नीचे गिरकर पलट गई. जिससे 21 यात्रियों की मौत हो गई और करीब 60 घायल हो गए. उधर, सुदूर तमिलनाडु में एक पटाखा फैक्ट्री में हुए विस्फोट में 25 मजदूरों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. मृतकों में 22 महिलाएं हैं. दिल्ली दंगा साजिश मामले में उमर खालिद की तरफ से दायर समीक्षा याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है. शीर्ष अदालत ने इसी वर्ष जनवरी में खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था. खालिद ने इस फैसले को चुनौती देते हुए समीक्षा याचिका दाखिल की थी. हैदराबाद से हुबली जा रही फ्लाय-91 की एक फ्लाइट लगभग 3 घंटे तक हवा में ही चक्कर काटती रही, जिससे यात्री घबरा गए. खराब मौसम के कारण ऐसा हुआ. यात्रियों को वायुयान में तेज झटके महसूस हुए, जिससे उनके बेचैनी और दिल की धड़कनें बढ़ गईं. विमान के अंडर की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए. अंत में फ्लाइट को बेंगलुरु डायवर्ट करना पड़ा. एक स्थानीय अदालत ने टीसीएस की कर्मचारी निदा खान को गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण देने से इनकार कर दिया है. निदा खान पर टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) की नासिक इकाई में यौन उत्पीड़न और धार्मिक जबरदस्ती के मामले में कथित संलिप्तता का आरोप है. अदालत ने पुलिस को उनकी याचिका पर 27 अप्रैल तक अपना जवाब दाखिल करने का भी निर्देश दिया है.
पूर्वोत्तर के राज्य मणिपुर में हालात सामान्य होने का नाम नहीं ले रहे. इस महीने की शुरुआत में दो बच्चों और कुछ नागरिकों की हत्या के विरोध में बढ़े तनाव के बीच सोमवार को मणिपुर के कुछ हिस्सों में विरोध प्रदर्शन जारी रहे. मैतेई समुदाय के पांच घाटी जिलों और नागा-बहुल उख्रुल एवं सेनापति जिलों में शैक्षणिक संस्थान और बाजार बंद रहे, जबकि सार्वजनिक परिवहन सड़कों से नदारद रहा. राजधानी के उरीपोक और नगामपाल इलाकों सहित इंफाल घाटी के विभिन्न हिस्सों में धरना-प्रदर्शन किया गया. महिला संगठन ‘मीरा पैबी’ ने रविवार से पांच दिवसीय बंद का आह्वान किया है. प्रभावशाली संगठन ‘कोऑर्डिनेटिंग कमेटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी’ (कोकोमी) ने राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा के बहिष्कार की घोषणा की है. कांग्रेस सांसद अंगोमचा बिमोल अकोइजाम ने मणिपुर में बढ़ती अशांति को रेखांकित किया है और मणिपुर के प्रति प्रधानमंत्री मोदी के उपेक्षापूर्ण रवैये और इसे ‘पराया’ समझने की कड़ी निंदा की है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश ने राहुल गांधी की दोहरी नागरिकता से जुड़े मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है. यह फैसला याचिकाकर्ता द्वारा सोशल मीडिया पर की गई ‘दुर्भावनापूर्ण’ पोस्ट के बाद लिया गया है. दूसरी ओर, दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायाधीश, न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने कथित आबकारी नीति घोटाले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तथा 22 अन्य को बरी किए जाने के खिलाफ सीबीआई की चुनौती पर सुनवाई से खुद को अलग करने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि वह “मीडिया-चालित नैरेटिव” (मीडिया द्वारा गढ़े गए विमर्श) के आगे नहीं झुकेंगी और अपने कर्तव्य का त्याग नहीं करेंगी.
मध्यप्रदेश में भाजपा विधायक के बेटे ने 5 लोगों पर पहले थार चढ़ाई और अब विधायक पिता ने पुलिस को चेतावनी दी है कि ‘वह चुनाव लड़ेगा, रोक सको तो रोक लो.’ भाजपा विधायक प्रीतम सिंह लोधी एक वीडियो सामने आने के बाद विवादों में घिर गए हैं, जिसमें वे कथित तौर पर अपने बेटे के खिलाफ की गई कार्रवाई को लेकर एक पुलिस अधिकारी को धमकाते हुए दिखाई दे रहे हैं. वीडियो में, लोधी कथित तौर पर अपने बेटे दिनेश लोधी के खिलाफ पुलिस जांच पर गुस्से में प्रतिक्रिया देते हुए और करैरा एसडीओपी आयुष जाखड़ को निशाना बनाते हुए दिख रहे हैं. आनंद मोहन जे के मुताबिक, विधायक लोधी कहते हैं, “करैरा के एसडीओपी ने जो कहा है, वह मुझे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं है. उन्होंने मेरे बेटे को चेतावनी दी कि वह यहाँ दोबारा न दिखे. मैं एसडीओपी से पूछना चाहता हूँ, क्या करैरा तुम्हारे बाप का है? सामान्य तौर पर मैं ऐसा नहीं कहता, लेकिन अब मैं यह साफ कर देना चाहता हूँ... मेरा बेटा करैरा वापस आएगा, और वह चुनाव लड़ेगा. अगर तुम्हारे बाप में दम है, तो उसे रोक कर दिखाए.”
इस बीच सीबीआई ने उद्योगपति अनिल अंबानी के नियंत्रण वाली कंपनी मेसर्स रिलायंस कम्युनिकेशंस के दो वरिष्ठ अधिकारियों को 2,929 करोड़ रुपये की बैंक धोखाधड़ी के मामले में गिरफ्तार किया है. गिरफ्तार किए गए आरोपियों की पहचान डी. विश्वनाथ और अनिल काल्या के रूप में हुई है.
उधर, राजस्थान के बालोतरा जिले में सोमवार दोपहर एक तेल रिफाइनरी में भीषण आग लगने के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकार्पण कार्यक्रम को स्थगित कर दिया गया है, जो मंगलवार को निर्धारित था. आग अचानक भड़कने के बाद पूरे रिफाइनरी परिसर को खाली करा लिया गया, जिससे इलाके में हड़कंप मच गया. राजेश असनानी के अनुसार, चूंकि प्रधानमंत्री मोदी मंगलवार को रिफाइनरी का उद्घाटन करने वाले थे, इसलिए इस घटना ने वहां की सुरक्षा व्यवस्था और तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अनुसार, नई तारीख की घोषणा उचित समय पर की जाएगी.
मोदी बनाम ममता: पूरा दिल्ली दरबार उतर आया है एक राज्य के चुनाव को जीतने?
कोलकाता में केंद्रीय बल प्रमुखों की बैठक: ममता बनर्जी ने ‘हस्तक्षेप’ का आरोप लगाया
टेलीग्राफ की ब्यूरो रिपोर्ट के अनुसार, रविवार को सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, एसएसबी और आईटीबीपी के महानिदेशकों ने कोलकाता में एक उच्च स्तरीय बैठक की. इस बैठक का उद्देश्य बंगाल चुनाव के लिए एक “मजबूत और तकनीक आधारित सुरक्षा ढांचा” तैयार करना था. चुनाव के दौरान बंगाल में केंद्रीय बलों की लगभग 2,500 कंपनियां (करीब 2 लाख जवान) तैनात की जाएंगी.
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए आरोप लगाया कि केंद्र सरकार राज्य के चुनावों में “मिलिट्री” भेज रही है और सभी एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है. वहीं, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने सोशल मीडिया पर इसे बीजेपी के “पालतू आईपीएस अधिकारियों” का जमावड़ा बताया, जो चुनाव में हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रहे हैं. दूसरी ओर, सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि यह बैठक निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करने के लिए एक सामान्य प्रक्रिया थी.
विभिन्न रिपोर्टों और संकलनों के अनुसार, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार और केंद्र के बीच लगभग बहुत सारे मुद्दों और मोर्चों पर टकराव चल रहा है. इनमें प्रमुख रूप से चुनावी रणनीतिकार संस्था I-PAC के दफ्तरों पर ईडी के छापे और उसके सह-संस्थापक विनेश चंदेल की गिरफ्तारी शामिल है. ममता बनर्जी का आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियां उनके 800 से ज्यादा बूथ एजेंटों को गिरफ्तार करने की योजना बना रही हैं. इसके अलावा, केंद्र द्वारा मनरेगा और आवास योजनाओं के ₹2 लाख करोड़ के फंड को रोकना, मतदाता सूची से 12% मतदाताओं (करीब 90 लाख) के नाम हटाना और मुस्लिम बहुल ज़िलों में भारी संख्या में नाम काटे जाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं. ममता बनर्जी ने यह भी दावा किया है कि चुनाव आयोग और केंद्रीय बल बीजेपी के इशारे पर काम कर रहे हैं, जो संघीय ढांचे के लिए खतरा है. इसके बारे में आप ‘हरकारा’ यूट्यूब चैनल पर निधीश त्यागी की वरिष्ठ पत्रकार राजेश चतुर्वेदी से बातचीत को सुन सकते हैं.
बंगाल चुनाव में आरएसएस का ‘साइलेंट’ अभियान: हिंदुत्व के एकीकरण के लिए ज़मीनी घेराबंदी
द टेलीग्राफ इंडिया के लिए स्नेहमय चक्रवर्ती की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में बीजेपी के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) इस बार ‘परदे के पीछे’ से एक अभूतपूर्व अभियान चला रहा है. 2021 के चुनावों में निष्क्रिय रहने वाला संघ इस बार अपने 35 सहयोगी संगठनों के साथ मिलकर हिंदुओं के बीच पैठ बना रहा है. संघ के स्वयंसेवक और कार्यकर्ता इसे “अस्तित्व की लड़ाई” बताकर घर-घर जा रहे हैं. बंगाल में संघ की शाखाओं की संख्या 15 साल पहले के 530 से बढ़कर अब 4,300 हो गई है. संघ ने पूरे बंगाल को उत्तर, मध्य और दक्षिण ज़ोन में बांटा है. इनके कार्यकर्ता बड़ी रैलियों के बजाय चाय की दुकानों, मंदिरों और घरों में छोटी बैठकें कर रहे हैं.
इस अभियान में करीब 38 आश्रम और कई हिंदू सामाजिक-धार्मिक संगठन भी शामिल हैं. संघ का मुख्य ज़ोर तीन ‘मंत्रों’ पर है: “पहले मतदान, फिर जलपान”, शत-प्रतिशत मतदान सुनिश्चित करना और ‘नोटा’ से बचना. रिपोर्ट बताती है कि संघ न केवल मतदाताओं को जागरूक कर रहा है, बल्कि बीजेपी के पुराने नेताओं और सुवेंदु अधिकारी जैसे नए चेहरों के बीच के मतभेदों को दूर करने के लिए ‘समन्वय बैठकें’ भी कर रहा है. संघ का लक्ष्य भ्रष्टाचार और सुरक्षा के मुद्दों पर हिंदू मतदाताओं को एकजुट करना है.
मतदाता सूची से नाम कटने का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से मांगी रिपोर्ट
द हिंदू की 20 अप्रैल 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मामले में कड़ा रुख अपनाया है. वरिष्ठ वकील देवदत्त कामत ने अदालत को बताया कि मतदाता सूची से जुड़े विवादों को सुलझाने के लिए बनाए गए अपीलीय ट्रिब्यूनल काम नहीं कर रहे हैं और वहां वकीलों को अनुमति नहीं दी जा रही है. इस पर मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने गहरी नाराजगी जताई और उसी दिन कलकत्ता हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से रिपोर्ट तलब करने की बात कही.
अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि जिन लोगों की अपील 21 या 27 अप्रैल तक स्वीकार कर ली जाती है, उनके नाम पूरक मतदाता सूची में शामिल किए जाएं ताकि वे वोट डाल सकें. हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल अपील लंबित होने के आधार पर किसी को वोट देने का अधिकार नहीं मिलेगा. बंगाल में मतदाता सूची के इस विशेष पुनरीक्षण के दौरान करीब 90 लाख नाम हटाए गए हैं, जिसे लेकर तृणमूल कांग्रेस ने “बीजेपी-चुनाव आयोग की साजिश” करार दिया है.
गंगोत्री मंदिर में अब ‘गोमूत्र-गोबर’ से बने पंचगव्य का सेवन अनिवार्य, इसके बाद ही मिलेगा प्रवेश
रविवार से शुरू हुई चारधाम यात्रा के साथ ही गंगोत्री और यमुनोत्री मंदिरों के कपाट खुल गए हैं, लेकिन इस बार गंगोत्री में भक्तों के लिए एक शर्त रख दी गई है, जिससे प्रवेश सीमित हो सकता है.
ऐश्वर्या राज के मुताबिक, गंगोत्री मंदिर समिति ने पहली बार प्रवेश के लिए पंचगव्य (गोमूत्र, गोबर, घी, दूध और दही का मिश्रण) का सेवन अनिवार्य कर दिया है, वहीं यमुनोत्री सभी के लिए खुला रहेगा.
गंगोत्री मंदिर समिति के अध्यक्ष धर्मेंद्र सेमवाल ने कहा कि इस कदम का उद्देश्य “अविश्वासियों को बाहर निकालना” और यह सुनिश्चित करना है कि केवल वही लोग दर्शन करें जिनकी “अटूट आध्यात्मिकता” है. उन्होंने कहा, “जब कपाट खुलेंगे, तो हम प्रवेश से पहले यह मिश्रण पिलाने के लिए द्वारों पर कुछ लोगों को तैनात करेंगे. जो लोग सनातन का सम्मान करते हैं, उन्हें इसके सेवन में कोई समस्या नहीं होगी. भक्तों को इसे अपना सौभाग्य समझना चाहिए कि उन्हें यह पवित्र पदार्थ उपलब्ध कराया जा रहा है. पहले, केवल पुजारी और गर्भगृह में प्रवेश करने वाले ही इसका सेवन करते थे. यह अभ्यास विश्वास और आध्यात्मिकता को बढ़ाएगा.”
गंगोत्री के विधायक सुरेश सिंह चौहान ने कहा कि गंगा आध्यात्मिकता का केंद्र है. “यह तीर्थस्थल गैर-हिंदुओं को अधिक आकर्षित नहीं करता है, और इसकी पवित्रता को धूमिल करने का कभी कोई प्रयास नहीं हुआ है. इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है. हालांकि, इस क्षेत्र का समुदाय इसके बारे में दृढ़ता से महसूस करता है; इसलिए उन्होंने शुद्धिकरण समारोह शुरू किया है. गोमूत्र हमारे लिए पवित्र है, तो जो लोग गाय का सम्मान नहीं करते, वे गंगा का सम्मान कैसे करेंगे?”
इससे पहले, बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति ने अपने प्रबंधन के तहत दो मुख्य धामों और 45 अन्य मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी. इसके अध्यक्ष ने कहा था कि जो लोग प्रवेश करना चाहते हैं, उन्हें “सनातन” में विश्वास की पुष्टि करने वाला एक शपथ पत्र (एफ़िडेविट) देना होगा. इस घोषणा के तुरंत बाद, गंगोत्री ने पंचगव्य की अनिवार्यता पेश कर दी है.
नए नियमों पर प्रतिक्रिया देते हुए, केदारनाथ की विधायक आशा नौटियाल ने कहा कि जो लोग सनातन की “भावनाओं को ठेस पहुँचाते हैं”, उन्हें प्रतिबंधित किया जाना चाहिए. “जो लोग धर्म को चोट पहुँचाते हैं और इसके पूजनीय वातावरण पर धब्बा लगाते हैं, उन्हें प्रवेश की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. ये स्थान विशेष रूप से उन लोगों के लिए होने चाहिए जो प्रार्थना के लिए आते हैं. यह निर्णय धर्म को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा.” नौटियाल ने यह स्पष्ट नहीं किया कि अधिकारी इन प्रतिबंधों को कैसे लागू करेंगे, खासकर जब अकेले केदारनाथ में पिछले साल 17.68 लाख लोग आए थे. नवंबर 2025 तक, पर्यटन विभाग ने चारों धामों में 51 लाख आगंतुकों को दर्ज किया—जो पिछले वर्ष की तुलना में 4.35 लाख अधिक है.
संयोगवश, नौटियाल ने पहले भी प्रवेश को प्रतिबंधित करने पर चर्चा शुरू की थी. उन्होंने पिछले मार्च में कहा था, “मैंने स्थानीय लोगों के साथ एक बैठक की थी, जिन्होंने कहा था कि गैर-हिंदू धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचा रहे हैं. बाबा केदार की पूजा करने के लिए दुनिया भर से लोग आते हैं, इसलिए ऐसे लोगों पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए. स्थानीय व्यापारियों ने भी मांग की है कि इसे हतोत्साहित किया जाए.” उन्होंने यह भी जोड़ा कि चारों धामों को गैर-हिंदुओं को प्रतिबंधित करना चाहिए.
इंसानों के सेवन के लिए अनुपयुक्त है गोमूत्र, इसमें हानिकारक बैक्टीरिया होते हैं: पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान
देश के प्रमुख संस्थान, भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) के नवीनतम अध्ययन ने यह निष्कर्ष निकाला है कि ताजे गोमूत्र में हानिकारक बैक्टीरिया होते हैं, जो इसे मानवीय सेवन के लिए अनुपयुक्त बनाते हैं.
गायों और बैलों के मूत्र के नमूनों पर विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित किए गए इस शोध में कम से कम 14 प्रकार के हानिकारक बैक्टीरिया पाए गए, जिनमें ‘एस्चेरिचिया कोलाई’ (ई. कोलाई) बैक्टीरिया की उपस्थिति भी शामिल है, जो आमतौर पर मनुष्यों में पेट के संक्रमण का कारण बनता है.
इस अध्ययन का नेतृत्व करने वाले भोज राज सिंह ने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ को बताया, “गायों, भैंसों और मनुष्यों के मूत्र के 73 नमूनों के सांख्यिकीय विश्लेषण से पता चलता है कि भैंस के मूत्र में एंटीबैक्टीरियल (जीवाणुरोधी) गतिविधि गायों की तुलना में कहीं अधिक बेहतर थी. भैंस का मूत्र ‘एस. एपिडर्मिडिस’ और ‘ई. रापोंटिकी’ जैसे बैक्टीरिया पर काफी अधिक प्रभावी था.”
संस्थान में महामारी विज्ञान विभाग के प्रमुख सिंह ने अपने तीन पीएचडी छात्रों के साथ जून 2022 से नवंबर 2022 के बीच स्थानीय डेयरी फार्मों की तीन प्रकार की गायों—साहिवाल, थारपारकर और विंदावानी (क्रॉस ब्रीड)—पर यह शोध किया था. अध्ययन में मनुष्यों और भैंसों के नमूनों को भी शामिल किया गया था. उन्होंने गौर किया कि “प्रत्यक्ष रूप से स्वस्थ व्यक्तियों के मूत्र के नमूनों का एक बड़ा हिस्सा संभावित रोगजनक बैक्टीरिया ले जाता है.”
लॉर्डशिप के बच्चे! सीबीआई की ‘अनजानी चूक’ या न्यायिक संस्कृति की सड़न
‘फ्रंटलाइन’ में सौरव दास ने लिखा है कि केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई को लगता है कि उसने ‘रिक्यूजल’ (सुनवाई से हटने) के मामले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के तर्क की निरर्थकता को उजागर कर दिया है, लेकिन वास्तव में उसने व्यापक न्यायिक संस्कृति की सड़न और एक लागू करने योग्य ‘न्यायिक आचार संहिता’ की सख्त आवश्यकता को बेनकाब किया है. सीबीआई ने केजरीवाल के उस अतिरिक्त हलफनामे पर अपनी नवीनतम प्रतिक्रिया दी है, जो उन्होंने न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा से खुद को मामले से अलग करने की मांग के समर्थन में दायर किया था. यह मामला दिल्ली आबकारी नीति मामले में केजरीवाल और 22 अन्य को ट्रायल कोर्ट द्वारा बरी किए जाने के खिलाफ सीबीआई की चुनौती से जुड़ा है; सीबीआई के इस जवाब में एक गलती है.
और यह कोई छोटी-मोटी गलती नहीं है. केजरीवाल के तर्क को बेतुका बताकर खारिज करने की कोशिश में, सीबीआई ने संभवतः भारत की न्यायिक संस्कृति की स्थिति के बारे में कुछ ऐसा स्वीकार कर लिया है जो कहीं अधिक निंदनीय है.
दास की यह रिपोर्ट भारतीय न्यायिक प्रणाली में ‘हितों के टकराव’ और न्यायाधीशों द्वारा स्वयं को मामले से अलग करने की प्रक्रिया पर एक गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती है. उन्होंने अरविंद केजरीवाल बनाम सीबीआई मामले के माध्यम से न्यायपालिका की आंतरिक संस्कृति और पारदर्शिता की कमी पर कड़े सवाल उठाए हैं.
शुरुआत सीबीआई की एक दलील से होती है, जिसे दास ने ‘फ्रायडियन स्लिप’ (अनजानी चूक) कहा है. सीबीआई का मानना था कि उसने सुनवाई से हटने की केजरीवाल की मांग को ‘बेतुका’ सिद्ध कर दिया है, लेकिन जांच एजेंसी ने अनजाने में भारत की न्यायिक संस्कृति की एक कड़वी सच्चाई स्वीकार कर ली है. सीबीआई का तर्क था कि यदि रिश्तेदारों के सरकारी पैनल में होने के आधार पर न्यायाधीश हटने लगे, तो देशभर में न्यायिक कामकाज ठप हो जाएगा. लेकिन यह दलील बचाव नहीं, बल्कि इस बात का सबूत है कि हितों का टकराव सिस्टम में कितना गहरा और ‘सामान्य’ हो चुका है.
दिल्ली आबकारी नीति मामले में न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा द्वारा सुनवाई किए जाने पर केजरीवाल और अन्य आरोपियों ने 10 से अधिक आधारों पर आपत्ति जताई थी. मुख्य आपत्तियां निम्नलिखित थीं:
पिछला आचरण: ‘आप’ नेताओं के मामलों में उनके आदेशों का लहजे और तेवर.
वैचारिक जुड़ाव: आरएसएस की कानूनी शाखा ‘अधिवक्ता परिषद’ के कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति.
असामान्य जल्दबाजी: इस राजनीतिक मामले में उनकी अत्यधिक रुचि और त्वरित सुनवाई, जो उनके सामान्य न्यायिक पैटर्न से भिन्न थी.
पारिवारिक जुड़ाव: सबसे गंभीर आरोप न्यायमूर्ति शर्मा के बच्चों (ईशान और शांभवी शर्मा) के केंद्र सरकार के विभिन्न कानूनी पैनलों (जैसे सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली हाई कोर्ट, डीडीए) में नियुक्त होने से संबंधित था.
दास ने आरटीआई और सार्वजनिक रिकॉर्ड्स के हवाले से बताया कि न्यायमूर्ति शर्मा की बेटी, जिन्हें वकालत का मात्र चार साल का अनुभव है, उन्हें सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट के महत्वपूर्ण सरकारी पैनलों में जगह दी गई. वहीं उनके बेटे ईशान शर्मा को पिछले तीन वर्षों में बड़ी संख्या में सरकारी मामले आवंटित किए गए. विवाद का मुख्य बिंदु यह था कि इन वकीलों (शर्मा के बच्चों) को काम आवंटित करने वाले शीर्ष सरकारी अधिकारी वही हैं, जो न्यायमूर्ति शर्मा की अदालत में सरकार का पक्ष रख रहे हैं. यह स्थिति स्पष्ट रूप से निष्पक्षता के सिद्धांत को प्रभावित करती है.
दास ने भारतीय न्यायिक प्रणाली की एक विचलित करने वाली प्रवृत्ति की ओर इशारा किया है. वर्षों से यहां पेशेवर और व्यक्तिगत संबंधों के घालमेल को ‘हल्की पृष्ठभूमि की आवाज’ समझकर नजरअंदाज किया जाता रहा है. जब तक कोई पत्रकार या वादी इस पर उंगली न उठाए, सिस्टम चुप्पी साधे रहता है. सीबीआई का यह कहना कि ‘ऐसा तो हर जगह होता है’, यह दर्शाता है कि न्यायिक नैतिकता किस कदर गिर चुकी है. दास के अनुसार, जो स्थिति बेतुकी लगनी चाहिए थी, उसे व्यवस्था ने स्वीकार्य बना लिया है.
इस रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा न्यायाधीशों के ‘स्वैच्छिक खुलासे’ पर केंद्रित है. सवाल यह नहीं है कि न्यायाधीश के बच्चे सक्षम हैं या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या न्यायमूर्ति शर्मा को सुनवाई की शुरुआत में ही यह तथ्य सार्वजनिक नहीं करना चाहिए था? न्याय का एक पुराना सिद्धांत है: “न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए.” यदि न्यायाधीश शुरू में ही तथ्यों का खुलासा कर देते, तो शायद यह विवाद इतना बड़ा नहीं होता. लेकिन खुलासे के बजाय, न्यायमूर्ति और सीबीआई दोनों ने प्रतिरोध का रास्ता चुना, जिससे संस्थान की छवि को नुकसान पहुँचा.
उन्होंने 1997 के “न्यायिक जीवन के मूल्यों का पुनर्कथन” का हवाला देते हुए कहा कि वर्तमान आचार संहिता अपर्याप्त है. इसमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है: जैसे कि-
अनिवार्य प्रकटीकरण: न्यायाधीशों के लिए यह अनिवार्य हो कि वे किसी भी सरकारी एजेंसी या पक्ष के साथ अपने या अपने परिवार के संबंधों का पहली ही सुनवाई में खुलासा करें.
लिखित और संरचित नियम: इसे न्यायाधीश के ‘निजी विवेक’ पर नहीं छोड़ा जा सकता.
प्रक्रियात्मक निष्पक्षता: खुलासे के बाद यदि कोई पक्ष आपत्ति जताता है, तो उस पर खुली अदालत में गंभीरता से विचार होना चाहिए.
यह मामला केवल एक ट्वीट या एक व्यक्ति (केजरीवाल) के बारे में नहीं है. यह सत्ता के अनौपचारिक ढांचे और न्यायिक नैतिकता के बीच के संघर्ष की कहानी है. सीबीआई ने भले ही इसे केजरीवाल की चाल बताया हो, लेकिन वास्तव में इसने न्यायपालिका के सामने एक आईना रख दिया है. यह मामला एक ‘नज़ीर’ बन गया है—यह देखने के लिए कि क्या भारतीय न्यायपालिका अपने भीतर की इस संरचनात्मक कमी को सुधारने और एक कड़े आचार संहिता को लागू करने के लिए तैयार है या नहीं.
कुलमिलाकर, न्यायपालिका की विश्वसनीयता केवल न्यायाधीशों के व्यक्तिगत विश्वास पर नहीं, बल्कि जनता के उस भरोसे पर टिकी है जो पारदर्शी और निष्पक्ष प्रक्रिया से पैदा होता है. सीबीआई की दलीलें अनजाने में उस सुधार की आवश्यकता की पुष्टि करती हैं, जिसे न्यायपालिका लंबे समय से टालती आ रही है.
(सौरव दास एक खोजी पत्रकार हैं जो कानून, न्यायपालिका, अपराध और नीति पर लिखते हैं)
| विश्लेषण
आकार पटेल: ईरान को छोड़कर किसी भी अन्य देश की तुलना में भारतीयों ने सबसे अधिक कष्ट झेला है और झेल रहे हैं
हमारी अक्षमता को हम कैसे समझते हैं? या, यदि हम थोड़ी उदारी बरतें तो हमारी झिझक को, जो हमारे आस-पास की दुनिया को प्रभावित करने में आड़े आती है. दुनिया के बाक़ी हिस्सों की तरह, भारत भी ईरान पर अमेरिकी-इज़रायली युद्ध से नकारात्मक रूप से प्रभावित है. वास्तव में, ईरान को छोड़कर किसी भी अन्य देश की तुलना में भारतीयों ने सबसे अधिक कष्ट झेला है और झेल रहे हैं. इसका कारण, निश्चित रूप से, यह है कि खाड़ी में लगभग एक करोड़ भारतीय हैं, जो छह जीसीसी (खाड़ी सहयोग परिषद) देशों में से पाँच की संयुक्त नागरिक आबादी से भी बड़ी जनसंख्या है.
हिंसा के कारण इन भारतीयों का जीवन और आजीविका जोखिम में है. उनके ऊपर अनिश्चितता मंडरा रही है, और यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए कठिन है जो संपन्न नहीं हैं. और ये ज्यादातर लोग हैं, जिसमें खाड़ी में भारतीय प्रवासी श्रमिक वर्ग के सदस्य शामिल हैं, चाहे वे सेवाओं में हों या उद्योग में.
इस युद्ध के बाद जीसीसी देशों का दीर्घकालिक भविष्य और आर्थिक दिशा सवालों के घेरे में है, और इन लाखों भारतीयों का भविष्य उसी परिणाम से जुड़ा हुआ है. यही कारण है कि भारत अधिकांश देशों की तुलना में इस युद्ध से अधिक गहराई से प्रभावित और उलझा हुआ है, साथ ही ईंधन और गैस से जुड़ी साझा चुनौतियों का भी सामना कर रहा है. जो हमें मुख्य प्रश्न पर लाता है: युद्धरत देशों, अमेरिका और इज़रायल की कार्रवाइयों को प्रभावित करने में अक्षमता या यहाँ तक कि अनिच्छा क्यों?
यह कहने के अलावा कि शिपिंग को फिर से शुरू करने की अनुमति दी जानी चाहिए, हमारी सरकार ने इस समस्या पर सार्थक रूप से कोई बात नहीं की है. शिपिंग क्यों रुकी है? हमने इसका कोई संदर्भ नहीं दिया है. इसे दोबारा कैसे शुरू किया जा सकता है?
वहाँ भी कोई बुद्धिमत्ता नहीं दिखती: केवल एक दलील, माँग या अनुरोध (यह स्पष्ट नहीं है कि कौन सा, क्योंकि शब्द खोखले हैं) कि शिपिंग को फिर से शुरू करने की अनुमति दी जाए. यहाँ यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि भारत ने, स्वतः ही, यूरोप के उपनिवेशवादी देशों के रुख के साथ खुद को जोड़ लिया है, जो युद्ध में कोई हिस्सा नहीं लेना चाहते, इसके अपराधियों का कोई ज़िक्र नहीं करते, और केवल माल के निर्बाध प्रवाह की तलाश करते हैं.
आइए प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करें. यह संभव है, और शायद इसकी संभावना भी है, कि इसका कोई एक कारण नहीं है बल्कि कारकों का एक समूह है जिसने कार्रवाई की तुलना में चुप्पी को अधिक आकर्षक बना दिया है. आइए बारी-बारी से उनकी जाँच करें.
भारतीय विदेश नीति में असंगति है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा तक फैली हुई है. एक बुनियादी उदाहरण: हम अभी भी स्पष्ट नहीं हैं कि चीन मित्र है या शत्रु, क्या उसके साथ व्यापार के माध्यम से जुड़ना चाहिए या रणनीतिक रूप से अलग होना चाहिए. सामंजस्य की यह कमी किसी सिद्धांत (डॉक्ट्रिन) के अभाव से उत्पन्न होती है. हमारी विदेश नीति का एक बड़ा हिस्सा घरेलू दर्शकों के लिए होता है, और एक बार, जैसा कि आज इस युद्ध के साथ हो रहा है, जब यह स्पष्ट हो जाता है कि “विश्व गुरु” होने के दावे खोखले हैं, तो हम शर्मिंदगी में पीछे हट जाते हैं.
राष्ट्रीय हित के विचार को त्यागकर, हम व्यक्तिगत कूटनीति के कायल हो गए हैं, जो अटूट रूप से व्यक्तिगत हित से जुड़ी हुई है. हमने मान लिया था कि व्यक्तिगत घनिष्ठता विदेश नीति बनाने के लिए एक ठोस आधार थी. उपयुक्त रूप से, इस प्रयास में या तो हमें धोखा दिया गया है (ट्रंप द्वारा) या इस्तेमाल किया गया है (नेतन्याहू द्वारा), जबकि विरोधी पक्ष यथार्थवादी और दृढ़ बना हुआ है. हमारी दुविधा यह है कि हमारे दोस्तों ने ही भारतीयों को इतनी मुसीबत में डाला है, फिर भी हमें लगता है कि हमारे पास उन्हें रुकने के लिए कहने की क्षमता तक नहीं है.
एक अन्य कारण यह है कि अन्य जगहों पर कूटनीतिक प्रयासों ने हमें आशंकित कर दिया है. ऐसा लगता है कि हम भारतीयों को पीड़ित देखना पसंद करेंगे बजाय इसके कि उन लोगों के प्रयासों से युद्ध समाप्त हो जाए जिन्हें हम नापसंद करते हैं. यह न केवल संकीर्ण और तुच्छ है, जो कि यह है, बल्कि अत्यंत हास्यास्पद भी है. यह उन लोगों के कार्यों को दर्शाता है जो साथ ही साथ हमें इस बारे में उपदेश देते हैं कि दुनिया एक परिवार है.
एक और कारण है, जिसे लोक कहावत में कैद किया गया है: “मुल्ले की दौड़ मस्जिद तक.” इंटरनेट इसकी व्याख्या इस प्रकार करता है “एक व्यक्ति जो केवल उतना ही आगे जाता है जितना उसका ज्ञान, संसाधन या रुचियाँ अनुमति देती हैं,” या “वह व्यक्ति जिसके कार्य हमेशा उसी परिचित दायरे या विशेषज्ञता के क्षेत्र में लौट आते हैं.”
“नया भारत” एक उग्र अंतर्मुखी राष्ट्रवाद की विशेषता रखता है. समाचार पत्र खोलें या टेलीविज़न चालू करें, और यह राग स्पष्ट हो जाता है. अतीत के लिए अल्पसंख्यकों को दोषी ठहराया जाता है, उदारवादियों पर एक गौरवशाली भविष्य के मार्ग में बाधा डालने का आरोप लगाया जाता है, और प्रगति होने से पहले दोनों को “ठीक” किया जाना चाहिए. जब तक यह हमारा प्राथमिक ध्यान रहेगा, हम इसी में तल्लीन रहेंगे. जब राष्ट्र के बारे में इतनी संकुचित स्पष्टता हो, तो बाहरी दुनिया एक व्याकुलता बन जाती है, कुछ ऐसा जिसे अगर नज़रअंदाज़ किया जाए, तो शायद अपने आप सुलझ जाए. आज हम यहीं खड़े हैं.
शुक्रवार को एक संवाददाता सम्मेलन में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता से पूछा गया:
“ट्रंप आसिम मुनीर की प्रशंसा कर रहे हैं और पाकिस्तान की यात्रा कर सकते हैं. पाकिस्तान की युद्धविराम भूमिका को भारत कैसे देखता है? क्या भारत को इससे कोई दिक्कत होगी यदि ट्रंप एक ही यात्रा में भारत और पाकिस्तान दोनों देशों का दौरा करते हैं?”
(प्रश्न के केंद्र पर ध्यान दें, जो हमारे और हमारे प्रेस कोर के बारे में बहुत कुछ बताता है.)
प्रवक्ता ने उत्तर दिया:
“मेरे पास एक सरल उत्तर है. भारत पश्चिम एशिया के घटनाक्रमों पर करीब से नज़र (फॉलोइंग) रख रहा है.”
“फॉलोइंग” (अनुसरण करना) शब्द का प्रयोग शायद ही कभी इतना उपयुक्त या इतना खुलासा करने वाला रहा हो.
आकार पटेल भारतीय लेखक, स्तंभकार, और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. वे ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया’ के पूर्व कार्यकारी निदेशक रह चुके हैं. पटेल अपने तीखे राजनीतिक विश्लेषण और समसामयिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने “Price of the Modi Years” और “Our Hindu Rashtra” जैसी चर्चित और प्रभावशाली पुस्तकें लिखी हैं. वे देश के विभिन्न प्रमुख समाचार पत्रों के लिए नियमित रूप से राजनीति, समाज और विदेश नीति जैसे विषयों पर लेख लिखते हैं.
नेपाल में जेन जी का इन्क़लाब: ‘ट्रॉमा’ से ‘उम्मीद’ तक का सफ़र
पिछले साल सितंबर में 28 साल के बबलू गुप्ता नेपाल की संसद के बाहर गोलियों की गूँज के बीच लाशें हटा रहे थे. उनके हाथ में ‘पायरेट फ़्लैग’ था, जो दुनिया भर में ज़ी-जनरेशन के प्रतिरोध का प्रतीक बन चुका है. लेकिन आज मंज़र बदल चुका है. मार्च में हुए चुनावों ने नेपाल की सियासत में वो कर दिखाया है जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी. बबलू गुप्ता अब महज़ एक प्रदर्शनकारी नहीं, बल्कि सांसद हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स में हाना बीच, बिनोद घिमिरे और सजल प्रधान का लंबा फीचर इस बारे में छपा है.
नेपाल के युवाओं ने दशकों पुराने सियासी निज़ाम को उखाड़ फेंका है. इस चुनाव में ‘राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी’ (आरएसपी) को ज़बरदस्त जनादेश मिला है. नई संसद में लगभग 10 प्रतिशत सांसद 30 साल या उससे कम उम्र के हैं, जबकि पिछली संसद में यह आँकड़ा 2 प्रतिशत भी नहीं था. इस बदलाव का सबसे बड़ा चेहरा हैं 35 साल के बालेन्द्र शाह, जिन्हें दुनिया ‘बालेन’ के नाम से जानती है. आँखों पर काला चश्मा और तीखे रैप गानों के ज़रिए सत्ता को चुनौती देने वाले बालेन ने नेपाल के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली है. उन्होंने चार बार प्रधानमंत्री रहे के.पी. शर्मा ओली को उन्हीं की सीट पर मात दी. बालेन की जीत महज़ एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और परिवारवाद के ख़िलाफ़ युवाओं का खुला विद्रोह है. नेपाल का युवा वर्ग थक चुका था—उस भ्रष्टाचार से जिसने उन्हें विदेशों में मज़दूरी करने पर मजबूर किया, उस भाई-भतीजावाद से जिसने सत्ता सिर्फ़ ऊँची जाति के रईस परिवारों तक सीमित रखी, और उस डिजिटल पाबंदी से जिसने उनकी आवाज़ छीनने की कोशिश की. बबलू गुप्ता कहते हैं, “हम हताश थे. हमें पता था कि चीज़ें बदलनी होंगी. हमने अपने दर्द (ट्रॉमा) को एक खूबसूरत भविष्य में बदलने का फ़ैसला किया है.”
इस क्रांति की लहर में सिर्फ़ राजनीति नहीं, बल्कि सामाजिक ढाँचा भी बदल रहा है. 30 साल की रंजू दर्शना, जिन्होंने एक सिंगल मदर की बेटी के रूप में संघर्ष किया, अब संसद की सबसे प्रभावशाली आवाज़ों में से एक हैं. रंजू कहती हैं, “यह जीत उन युवाओं के ख़ून पर टिकी है जिन्होंने शहादत दी. अब हमारी ज़िम्मेदारी है कि उनके सपनों को सच करें.”
यही नहीं, नेपाल को पहली ट्रांसजेंडर सांसद भी मिली है, जो समावेशी लोकतंत्र की एक नई मिसाल है. हालाँकि जीत का जश्न ज़ोरों पर है, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त अब भी सख़्त है. नेपाल की 56 प्रतिशत आबादी 30 साल से कम उम्र की है, लेकिन रोज़गार के अभाव में हर साल लाखों युवा देश छोड़ रहे हैं. एयरपोर्ट पर आज भी ‘रोमानिया’ और ‘खाड़ी देशों’ के वीज़ा लिए युवाओं की कतारें लगी हैं.
बालेन शाह की सरकार ने 12 लाख नौकरियाँ पैदा करने और डिजिटल गवर्नेंस का वादा किया है. क्या एक रैपर प्रधानमंत्री और ये युवा सांसद नेपाल की तक़दीर बदल पाएंगे? पूरी दुनिया की नज़रें अब इस हिमालयी देश पर हैं, जो जेन जी की आकांक्षाओं का ग्लोबल टेस्ट केस बन गया है.
बबलू गुप्ता के शब्दों में, “पूरी दुनिया को थोड़े बदलाव की ज़रूरत है, और इसकी शुरुआत नेपाल से हो चुकी है.”
महंगी होती पढ़ाई: स्कूल फीस, कोचिंग और बढ़ता ख़र्च परिवारों पर भारी
भारत में बच्चों की पढ़ाई का ख़र्च लगातार बढ़ रहा है. परिवार अब स्कूल के साथ-साथ निजी कोचिंग पर भी ज़्यादा पैसा ख़र्च कर रहे हैं. 2025 के शिक्षा सर्वे के अनुसार, सेकेंडरी स्कूल के लगभग 38% छात्र कोचिंग लेते हैं, जबकि प्राइमरी स्तर पर यह संख्या 25% से भी कम है. विजय जाधव की इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के मुताबिक़ यह सर्वे अप्रैल से जून 2025 के बीच 52,085 घरों में किया गया था. इसमें यह भी सामने आया कि करीब 38% बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं, जहां प्रति छात्र खर्च सरकारी स्कूलों के मुकाबले लगभग 10 गुना ज़्यादा है. कुल मिलाकर, परिवार अपनी मासिक आय का 5% से 10% तक हिस्सा बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर रहे हैं.
शिक्षाविद किशोर दरक के अनुसार, शिक्षा सिर्फ फीस तक सीमित नहीं है. कई बार बच्चों की देखभाल के लिए मां को काम छोड़ना पड़ता है, जिससे परिवार की आय कम होती है. इसे भी शिक्षा की लागत माना जाना चाहिए. सर्वे के मुताबिक, प्री-प्राइमरी (नर्सरी) में एक बच्चे पर औसतन ₹9,807 सालाना खर्च होता है, जो सेकेंडरी स्कूल के खर्च का लगभग दो-तिहाई है.
प्री-प्राइमरी सेक्टर में नियम-कानून की भी कमी है, जिससे फीस पर कोई नियंत्रण नहीं है और अक्सर लोग इसे पढ़ाई पर ख़र्च हुए पैसे के तौर पर कम, बल्कि स्टेटस सिंबल की तरह देखते हैं.
शहरी इलाकों में पढ़ाई का ख़र्च गांवों से ज़्यादा है. शहरों में मिडिल स्कूल तक होने वाला ख़र्च गांव में होने वाले ख़र्च से लगभग तीन गुना ज़्यादा है. जबकि हायर सेकेंडरी तक आते आते यह ख़र्च दो गुना रह जाता है. इतना ही नहीं सरकारी स्कूल बनाम निजी स्कूल भी एक ऐसी बहस है जिसको लांघना मुश्किल है. सरकारी स्कूल में औसतन 2,863 रुपये ख़र्च होते हैं, और यही सालाना खर्च निजी स्कूल में बढ़ कर 28,693 रुपये होजाता है.
सरकारी स्कूलों में किताबें और स्टेशनरी कुल खर्च का 40% होती हैं, जबकि निजी स्कूलों में फीस करीब 65% होती है.
हाल के वर्षों में सरकारी स्कूलों में नामांकन घटा है, जबकि निजी स्कूलों में बढ़ा है. माता-पिता बेहतर शिक्षा की उम्मीद में निजी स्कूल का चयन कर रहे हैं.
आज उच्च शिक्षा में दाखिला काफी हद तक प्रतियोगी परीक्षाओं पर निर्भर है और कोचिंग संस्थान इसमें अहम भूमिका निभाते हैं. प्री-प्राइमरी में 11.6% बच्चे कोचिंग लेते हैं, सेकेंडरी में यह बढ़कर 38.1% हो जाता है. प्री प्राइमरी तक इसके लिए 525 रुपये ख़र्च करना पड़ता है और हायर सेकेंडरी तक यह ख़र्च बढ़कर 6,311 हो जाता है.
अलग-अलग वर्गों में ख़र्च में भी अंतर देखा गया है. अनुसूचित जनजाति सालाना 7,363 ख़र्च करती है. वहीं अन्य वर्ग इससे 2 से 3 गुना ज़्यादा ख़र्च करने पर यक़ीन रखती है. हायर सेकेंडरी स्तर पर अन्य वर्ग के परिवार 40,348 प्रति छात्र खर्च करते हैं, जबकि ST परिवार 15,303 ख़र्च करते हैं.
“लेकिन तुम हमारे बिना क्या हो?” कुछ भी नहीं!
फ़िलिस्तीन के समर्थन में उठा सुर: ‘दोनना’ बना दमन के खिलाफ वैश्विक प्रतिरोध का गीत
बर्लिन की कलाकार सिबा अलखियामी द्वारा लिखा और गाया गया गीत दोनना साल 2026 में सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो रहा है, जबकि यह गीत मूल रूप से 2024 में बनाया गया था. आर्टिस्ट मंकी मैन के साथ तैयार किया गया यह ट्रैक अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर रहा है.
यह गाना अरबी में लिखा गया है. “दोनना” का अर्थ है “हमारे बिना”, और यह गीत अपने गहरे राजनीतिक और मानवीय संदेश के कारण लोगों को प्रभावित कर रहा है. इस गाने को व्यापक रूप से इज़राइल द्वारा फ़िलिस्तीनियों पर किए जा रहे दमन के खिलाफ एक कलात्मक प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा रहा है. गीत में उपनिवेशवाद, शोषण ,नस्लवाद और मानवता के खिलाफ अत्याचार जैसे मुद्दों को उठाया गया है.
गीत के बोल बेहद भावनात्मक और तीख़े हैं, इसका हिंदी में अनुवाद कुछ यूं है:
हमारी जड़ों को उखाड़ फेंको
हमारे घरों को ढहा दो…
हमारे वजूद को अपराध घोषित करो और
हमारी हक़ीक़त को झूठा
हमारे अपनों को हमसे जुदा कर दो
हमारे बच्चों का क़त्ल
हमारे ख़ून को पानी करो
हमारी आवाज़ और इंक़लाब को बदनाम
हमारा ज्ञान छीन लो
हमारी जनता को बदगुमां रखो
हमारे देशों पर क़ब्ज़ा करो
हमारे शासक खुद चुनो…
हमारे देवताओं को अपना लो
हमारे पेड़ों को जला दो…
“लेकिन तुम हमारे बिना क्या हो?”
कुछ भी नहीं!
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है. इंस्टाग्राम पर सिबा अलखियामी के प्रोफाइल पर इस गाने को 4.4 मिलियन से ज़्यादा बार देखा जा चुका है, जबकि ‘एक्स’ पर इसके क्लिप्स को 2 लाख 58 हजार से अधिक व्यूज़ मिल चुके हैं. कई लोग इस गाने को डिजिटल विरोध के रूप में साझा कर रहे हैं, खासकर युवा पीढ़ी के बीच यह तेजी से फैल रहा है. “दोनना” ने वैश्विक स्तर पर एक नई बहस को जन्म दिया है और यह दिखाता है कि संगीत किस तरह सीमाओं के पार जाकर लोगों की आवाज़ बन सकता है.
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.










