19/06/2026: बिना क़ुसूर लाखों बेचैन | अरावली विवाद | मुस्लिम डिलीवरी बॉय | दाढ़ी-टोपी | फॉरेस्ट फाइल्स | बेटा या राख | टी.एम. कृष्णा | राहुल के बर्थ डे और पार्टीशन पर | क्या मोदी ने जवाब मांगा?
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आज की सुर्खियां
अरावली पर विवाद: सुप्रीम कोर्ट की समिति में सिर्फ सेवानिवृत्त अधिकारी और वरिष्ठ नौकरशाह भरे हुए हैं, बदलाव की मांग
टी.एम. कृष्णा | सीधे-सादे लोग
‘मुस्लिम डिलीवरी बॉय मत भेजना’: जयपुर के स्विगी डिलीवरी बॉय ने कट्टरता का सामना किया, बदले में मिला अपनापन
वीवीपी शर्मा | संस्थापक और उत्तराधिकारी: संकट क्यों बन जाता है राजनीतिक उत्तराधिकार
गुटों को एक इकाई में एकजुट करना ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है
पीएमओ की फॉरेस्ट फाइल्स: बंद कमरों में हुए फैसलों ने कैसे बदल दी संरक्षण की नियमपुस्तिका
‘अगर भारत नहीं तो कौन, अगर अभी नहीं तो कब?’ फिलिस्तीन ने भारत से मांगी तत्काल मदद
‘मेरा कसूर सिर्फ दाढ़ी और टोपी है’: मुंबई के मुस्लिम कारोबारी ने लगाया सांप्रदायिक उत्पीड़न का आरोप
“मुझे मेरा बेटा दिखाइए या उसकी राख”: मां की गुहार से घिरी आंध्र प्रदेश पुलिस
एक राष्ट्र, एक पार्टी: क्या दलबदल विरोधी कानून मर चुका है?
श्रवण गर्ग | पर पार्टीशन वापस नहीं जाएगा !
तीन भारतीयों की मौत पर क्या अमेरिका से जवाब मांग पाए मोदी?
श्रवण गर्ग | राहुल गांधी का जन्मदिन नहीं, जनता की बेचैनी और उम्मीदों का प्रदर्शन
घोटाले से प्रभावित नीट दोबारा देने से पहले ‘बेचैनी’ से लड़ रहे हैं 20 लाख से अधिक मेडिकल उम्मीदवार
यदि भारत की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक में बैठना ही अपने आप में पर्याप्त रूप से थका देने वाला नहीं था, तो अब 20 लाख से अधिक मेडिकल कॉलेज के उम्मीदवार अत्यधिक मानसिक तनाव का सामना कर रहे हैं क्योंकि उन्हें बिना किसी गलती के रविवार को यह परीक्षा दोबारा देनी पड़ रही है.
‘रॉयटर्स’ के लिए शराफ़त अली और राजेश कुमार सिंह ने बताया है कि नीट-यूजी के अभ्यर्थियों ने शुरुआत में 3 मई को यह परीक्षा दी थी, लेकिन सोशल मीडिया पर प्रश्नपत्र पहले से ही लीक होने के आरोपों के बाद अधिकारियों ने अंततः परिणामों को रद्द कर दिया. इस परीक्षा को नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट के नाम से जाना जाता है और इसमें बैठने वाले केवल 5% से 6% छात्रों को ही मेडिकल कॉलेजों में सीटें मिल पाती हैं.
श्रीनगर की एक 20 वर्षीय छात्रा अलीमा जावेद, जो इस परीक्षा को दोबारा देने की योजना बना रही हैं, ने कहा, “यह परीक्षा हमें मानसिक रूप से निचोड़ देती है. हम सालों की कड़ी मेहनत लगाते हैं, और फिर पेपर लीक हो जाता है और नतीजे रद्द कर दिए जाते हैं.”
इस विवाद ने नई दिल्ली और अन्य शहरों में छात्रों के बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया है, जिसमें प्रति प्रदर्शन सैकड़ों छात्र शामिल हो रहे हैं. यह स्थिति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के लिए एक राजनीतिक सिरदर्द बन गई है. इस नाकामी के कारण कुछ छात्रों ने आत्महत्याएं की हैं, हालांकि ऐसे दावों की पुष्टि करना कठिन है.
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि अधिकारी एक “निष्पक्ष और पारदर्शी” पुनरीक्षा सुनिश्चित करेंगे. इस उद्देश्य के लिए, सरकार ने परीक्षा समाप्त होने तक मैसेजिंग ऐप टेलीग्राम पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया है, हालांकि इस कदम की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कार्यकर्ताओं ने आलोचना की है.
शुक्रवार को टेलीग्राम इस प्रतिबंध को पलटने की अपनी कानूनी लड़ाई हार गया, जब एक भारतीय अदालत ने फैसला सुनाया कि सरकार की कार्रवाई कानूनी और उचित थी. इस प्रतिबंध ने केवल टेलीग्राम को प्रभावित किया, क्योंकि सरकार का तर्क था कि यह ऐप एक विशिष्ट मामला है. सरकार ने इसके पीछे टेलीग्राम की गोपनीयता की विशेषताओं और ब्लॉक किए गए चैनलों को आसानी से दोबारा बनाने की सुविधा का हवाला दिया.
अधिकारियों ने कथित लीक की बहु-एजेंसी जांच शुरू कर दी है, जिसमें जांचकर्ता लीक के स्रोत का पता लगाने और संदिग्ध नकल गिरोहों से जुड़े वित्तीय लेनदेन की जांच करने में जुटे हैं.
लेकिन कई छात्रों का कहना है कि इन उपायों से उनका दबाव कम करने में कोई खास मदद नहीं मिली है.
20 वर्षीय आलिया जलाल ने कहा, “मैं अपने पिछले प्रयास से बहुत खुश थी.” उन्होंने आगे बताया कि दोबारा होने वाली परीक्षा ने उन्हें इतना चिंतित कर दिया है कि उन्हें मनोरोग विशेषज्ञ की मदद लेनी पड़ी है.
अरावली पर विवाद: सुप्रीम कोर्ट की समिति में सिर्फ सेवानिवृत्त अधिकारी और वरिष्ठ नौकरशाह भरे हुए हैं, बदलाव की मांग
अरावली पर्वतमाला की सुरक्षा से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समीक्षा के लिए गठित नई समिति पर विवाद खड़ा हो गया है. देश भर के वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों, नीति विशेषज्ञों और नौकरशाहों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को कम से कम 10 पत्र सौंपकर इस समिति में तत्काल बदलाव और इसके पुनर्गठन की मांग की है.
जितेंद्र चौबे के मुताबिक, हस्ताक्षरकर्ताओं का आरोप है कि 25 मई, 2026 को गठित यह समिति पक्षपातपूर्ण है. समिति की अध्यक्ष (आईसीएफआरई की महानिदेशक कंचन देवी) केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव को रिपोर्ट करती हैं. पूर्व आईएफएस अधिकारी प्रकृति श्रीवास्तव के अनुसार, उसी प्रशासनिक पदानुक्रम से जुड़ी रिपोर्ट की समीक्षा करना सीधे तौर पर ‘हितों के टकराव’ को दर्शाता है.
आलोचकों का कहना है कि समिति में केवल सेवानिवृत्त अधिकारी और वरिष्ठ नौकरशाह भरे हुए हैं. इसमें स्वतंत्र विषय विशेषज्ञों जैसे—पारिस्थितिकी, जल विज्ञान, वन्यजीव, जीआईएस पेशेवरों और भू-तकनीकी विज्ञान के दिग्गजों को जगह नहीं मिली है.
पर्यावरणविद डॉ. रवि चोपड़ा सहित अन्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि सरकारी अधिकारियों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण समिति में स्वतंत्र वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी है. इसके अलावा, सदस्यों के पास हरियाणा और राजस्थान जैसे उन प्रमुख राज्यों का जमीनी अनुभव नहीं है, जहाँ अरावली पर खनन और रियल एस्टेट का सबसे अधिक दबाव है.
विशेषज्ञों ने याद दिलाया कि इसी प्रशासनिक ढांचे ने पहले अरावली की परिभाषा बदलकर छोटी पहाड़ियों को कानूनी सुरक्षा से बाहर कर दिया था, जिससे वहां खनन को बढ़ावा मिला.
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि वर्तमान ढांचा पर्यावरण सुरक्षा उपायों को कमजोर कर सकता है. उन्होंने मुख्य न्यायाधीश से मांग की है कि ‘गोदावर्मन ढांचे’ के तहत वन सीमांकन का अधूरा कार्य पहले पूरा किया जाए. साथ ही, अरावली क्षेत्र की जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए समिति का विस्तार कर इसमें स्वतंत्र वैज्ञानिकों, जलविदों और सामाजिक-आजीविका विशेषज्ञों को शामिल करके इसे अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और व्यापक बनाया जाए.
‘मुस्लिम डिलीवरी बॉय मत भेजना’: जयपुर के स्विगी डिलीवरी बॉय ने कट्टरता का सामना किया, बदले में मिला अपनापन
जयपुर में स्विगी के डिलीवरी पार्टनर आफ़ताब खान हाल ही की एक दोपहर अपने स्मार्टफोन की स्क्रीन पर चमके एक डिलीवरी निर्देश को देखकर दंग रह गए: “किसी मुस्लिम डिलीवरी बॉय को मत भेजना.”
देबायन दत्ता के अनुसार, खान के लिए, जो एक उभरते हुए रैपर भी हैं और ‘रॉकिंग आफ़ताब’ के नाम से जाने जाते हैं, ये शब्द एक तीखे और अप्रत्याशित डंक की तरह थे. वह चाहते तो ऑर्डर रद्द कर सकते थे या अपने स्थानीय व्हाट्सएप ग्रुप में किसी अन्य राइडर को इसे सौंप सकते थे. खान ने याद करते हुए कहा, “एक इंसान के तौर पर मुझे यह देखकर बहुत दुख हुआ. लेकिन मैं इस निर्देश के पीछे छिपे व्यक्ति को जानना चाहता था. मैं उसकी राय जानना चाहता था.”
हाथ में ऑर्डर लिए तीसरी मंजिल के अपार्टमेंट की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए, खान ने डर की एक सिहरन महसूस की, क्योंकि वे देश के संवेदनशील सामाजिक माहौल से अच्छी तरह वाकिफ थे. लेकिन इसके बाद जो हुआ उसने उनकी सारी चिंताओं को पूरी तरह से दूर कर दिया. ग्राहक ने गर्मजोशी भरी मुस्कान के साथ दरवाजा खोला. खान ने कहा कि जब उन्होंने नम्रता से उस भेदभावपूर्ण नोट के बारे में पूछा, तो उस व्यक्ति के हाव-भाव भ्रम से तुरंत गहरी शर्मिंदगी में बदल गए.
ग्राहक ने समझाया कि यह एक पुराना संदेश निर्देश था जो उसने अपने जीवन के एक अलग दौर में गुस्से के क्षण में छोड़ दिया था और वह नहीं जानता था कि उस निर्देश को ऐप से कैसे डिलीट किया जाए.
खान ने कोई बहस या उपदेश नहीं दिया. उन्होंने ग्राहक का फोन लिया, ऐप में गए और उस लिखे हुए टेक्स्ट को हटा दिया. इस मुलाक़ात का अंत हाथ मिलाने और एक गिलास पानी के प्रस्ताव के साथ हुआ.
खान ने सीधे शब्दों में कहा, “गलतियाँ हर किसी से होती हैं. उन्होंने मुझसे माफ़ी मांगी और इससे मेरे दिल को सुकून मिला. हमारा उद्देश्य देश में प्यार फैलाना है.”
एक सपने की कीमत
आर्थिक रूप से तंग परिवार में पले-बढ़े खान के पिता एक सब्जी विक्रेता हैं. खान को समय से पहले ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी. उनके रूढ़िवादी पड़ोस में, उनके संगीत के सपनों का शुरू-शुरू में मज़ाक उड़ाया गया या इसे ध्यान भटकाने वाली चीज़ कहकर खारिज कर दिया गया.
फिर भी, संगीत उनकी जीवनरेखा बना रहा. अपने स्कूली दिनों में भारतीय रैप के अचानक आए उफान से प्रेरित होकर, उन्होंने 2015 में गीत लिखना शुरू किया. साल 2024 तक, उन्होंने ‘स्विगीज़ पार्टनर’ नामक एक ओरिजिनल ट्रैक पर परफॉर्म करके स्विगी का कॉपोरेट टैलेंट हंट, ‘स्विगी विगी’ जीत लिया.
खान ने कहा, “मैं जिस समाज से आता हूँ, वहाँ सपना देखना उसे पूरा करने से ज़्यादा महंगा है. ज़्यादातर लोग बस भेड़चाल का हिस्सा बनते हैं. लेकिन मेरा मानना है कि केवल मेरा हुनर ही मुझे इस स्थिति से बाहर निकाल सकता है.”
उनके नवीनतम ट्रैक के एक अंश में, खान के बोल आम इंसानियत की ओर लौटने की गुहार लगाते हैं:
“राम ने बोला नहीं, मारो मुसलमान को, अल्लाह ने फ़रमाया नहीं, मारो इंसान को... जिसने तुझे बनाया, उसने ही मुझे बनाया, इंसान की औकात का है मेल नहीं.”
खान ने कहा कि “डिलीवरी निर्देश” वाली यह घटना उनके गृहनगर (जयपुर) पर कोई कलंक या उसकी पहचान नहीं है. उन्होंने बताया कि उन्हें अपने डिलीवरी रूट पर अक्सर गहरी दयालुता का अनुभव होता है, जैसे पिछले साल जुलाई में मानसून की एक दोपहर, जब एक ग्राहक ने उन्हें पूरी तरह से भीगा हुआ देखा और उन्हें एक कप गर्म दूध दिया था.
एक कट्टरता भरे डिलीवरी नोट को सुलह के एक शांत पल में बदलकर, रॉकिंग आफ़ताब ने साबित कर दिया कि कभी-कभी, किसी कड़वी कहानी को बदलने का सबसे शक्तिशाली तरीका उस पर चिल्लाना नहीं, बल्कि आमने-सामने जाकर सच्चाई की डिलीवरी करना है.
‘मेरा कसूर सिर्फ दाढ़ी और टोपी है’: मुंबई के मुस्लिम कारोबारी ने लगाया सांप्रदायिक उत्पीड़न का आरोप
‘गीता सुनील पिल्लई’ की रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई के जुहू इलाके से सामने आई एक घटना ने सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक भेदभाव, भीड़ की राजनीति और पुलिस की भूमिका को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं. मन्नत एथनिक डिज़ाइनर शोरूम के मालिक रफ़त हुसैन ने आरोप लगाया है कि उन्हें उनकी धार्मिक पहचान की वजह से निशाना बनाया गया. उनका कहना है कि चार महिलाओं के साथ शुरू हुई एक सामान्य ग्राहक बातचीत देखते ही देखते धार्मिक टिप्पणियों, कथित गाली-गलौज और हिंसक व्यवहार में बदल गई.
रफ़त हुसैन के मुताबिक घटना शनिवार शाम करीब साढ़े तीन बजे की है. चार महिलाएं उनके शोरूम में शादी के लिए शेरवानी और अन्य कपड़े देखने पहुंचीं. शुरुआत में बातचीत सामान्य थी, लेकिन कुछ ही देर बाद माहौल बदल गया. हुसैन का आरोप है कि महिलाओं ने उनकी धार्मिक पहचान को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां करनी शुरू कर दीं और कहा, “तुम मुसलमान हो, तुम लोग ऐसे ही होते हो.”
हुसैन का दावा है कि इसके बाद महिलाओं ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया और स्थिति इतनी बिगड़ गई कि उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए शोरूम छोड़कर सांताक्रूज़ पुलिस स्टेशन भागना पड़ा. लेकिन उनके अनुसार मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं. उनका कहना है कि जब वह शिकायत दर्ज कराने पुलिस स्टेशन पहुंचे, तब तक वहां बड़ी संख्या में लोग जमा हो चुके थे. हुसैन का आरोप है कि करीब 150 लोगों की भीड़ थाने के बाहर मौजूद थी और 20 से 30 युवक पुलिस स्टेशन के अंदर तक पहुंच गए थे.
सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में रफ़त हुसैन भावुक होते हुए कहते हैं, “मेरा एकमात्र अपराध यह है कि मैं जुहू में अपने शोरूम में दाढ़ी और टोपी पहनकर बैठा हूं.” उनका आरोप है कि पूरी घटना सुनियोजित थी और इसके पीछे धार्मिक नफरत की भावना काम कर रही थी.
हुसैन ने पुलिस के रवैये पर भी सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि उन्होंने पूर्व विधायक वारिस पठान से संपर्क किया, जिन्होंने थाने के ड्यूटी अधिकारी से बात की. लेकिन हुसैन के अनुसार पुलिस अधिकारी ने थाने के बाहर किसी भीड़ के मौजूद होने से ही इनकार कर दिया. यह दावा हुसैन को और अधिक परेशान करने वाला लगा, क्योंकि उनके मुताबिक बड़ी संख्या में लोग उन्हें घेरने के इरादे से वहां पहुंचे थे.
घटना के बाद हुसैन खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. उनका कहना है कि उन्हें डर है कि भविष्य में कोई भी भीड़ उनके शोरूम में घुस सकती है. उन्होंने यह भी बताया कि पुलिस स्टेशन में उन्हें करीब पांच घंटे तक रुकना पड़ा, जिसके कारण उनका कारोबार भी प्रभावित हुआ.
रफ़त हुसैन का मानना है कि यह घटना किसी अचानक हुए विवाद का परिणाम नहीं थी. उनका दावा है कि जिस तरह चार महिलाएं कपड़े खरीदने के बहाने शोरूम पहुंचीं और बाद में बड़ी संख्या में लोग पुलिस स्टेशन तक पहुंच गए, उससे उन्हें पूरी घटना पूर्व नियोजित लगती है. हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है.
सीसीटीवी फुटेज को लेकर भी सवाल उठे हैं. हुसैन ने बताया कि कुछ समय पहले शोरूम में आग लगने की घटना के बाद कैमरे काम नहीं कर रहे थे. उनका कहना है कि अब उन्हें दोबारा चालू कर दिया गया है. पिछले 12 से 15 वर्षों से कारोबार कर रहे हुसैन का कहना है कि उन्होंने इससे पहले कभी इस तरह की स्थिति का सामना नहीं किया.
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के बाद बड़ी संख्या में लोगों ने निष्पक्ष जांच की मांग की है. यह मामला केवल एक कारोबारी के आरोपों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल भी उठा रहा है कि क्या धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाए जाने की आशंकाएं बढ़ रही हैं और ऐसे मामलों में पुलिस की भूमिका कितनी पारदर्शी और निष्पक्ष है. फिलहाल घटना के सभी पक्षों की जांच और आधिकारिक तथ्यों का सामने आना बाकी है.
“मुझे मेरा बेटा दिखाइए या उसकी राख”: मां की गुहार से घिरी आंध्र प्रदेश पुलिस
‘साउथ फर्स्ट’ की रिपोर्ट के अनुसार, आंध्र प्रदेश सरकार ने बुधवार, 17 जून को विजयवाड़ा के 25 वर्षीय गाडे साई कृष्णा के लापता होने के मामले में कृष्णा लंका सर्किल इंस्पेक्टर (सीआई) नागाराजू को निलंबित कर दिया और एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी से निष्पक्ष जांच कराने का आदेश दिया.
साई कृष्णा के परिवार ने आरोप लगाया है कि उन्हें पुलिस हिरासत में प्रताड़ित किया गया और बाद में पूरे मामले को दबाने की कोशिश की गई.
मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ मामले की समीक्षा की और बढ़ते राजनीतिक विवाद के बीच स्वतंत्र जांच के निर्देश दिए.
मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया, “विजयवाड़ा के कृष्णा लंका क्षेत्र से गाडे साई कृष्णा के लापता होने के मामले को सरकार ने गंभीरता से लिया है. इस मामले से जुड़े पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर नागाराजू को निलंबित करने का फैसला किया गया है.”
हिरासत में यातना और लीपापोती के आरोप
साई कृष्णा की मां गाडे विजय लक्ष्मी का आरोप है कि 9 मई को प्रकाशम जिले के मार्कापुरम से कृष्णा लंका पुलिस उनके बेटे को अपने साथ ले गई थी. तब से उसका कोई पता नहीं है.
4 जून को विजय लक्ष्मी ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की. उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि उनके बेटे को अदालत के सामने पेश किया जाए, चाहे वह जीवित हो या नहीं.
याचिका में आंध्र प्रदेश सरकार, पुलिस महानिदेशक, एनटीआर जिले के पुलिस आयुक्त और कृष्णा लंका तथा मार्कापुरम पुलिस थानों के अधिकारियों को पक्षकार बनाया गया.
इसके बाद हाई कोर्ट ने कृष्णा लंका पुलिस स्टेशन के स्टेशन हाउस ऑफिसर को साई कृष्णा का पता लगाकर 15 जून तक अदालत के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया.
लेकिन 15 जून को आंध्र प्रदेश के महाधिवक्ता कार्यालय ने अदालत को बताया कि साई कृष्णा का पता नहीं चल सका है और उसे खोजने के प्रयास जारी हैं.
मामले की सुनवाई के दौरान विजय लक्ष्मी की ओर से पेश अधिवक्ता के.वी. आदित्य चौधरी ने आरोप लगाया कि साई कृष्णा की हिरासत में यातना के कारण मौत हो सकती है और पुलिस सच्चाई छिपाने की कोशिश कर रही है.
अदालत ने पुलिस को तत्काल कदम उठाकर साई कृष्णा को जल्द से जल्द पेश करने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई 29 जून के लिए तय की.
हाई कोर्ट के बाहर मीडिया से बातचीत में विजय लक्ष्मी ने कहा कि 9 मई को कृष्णा लंका पुलिस स्टेशन के दो कांस्टेबल उनके घर आए थे और उन्हें पुलिस स्टेशन ले गए, जहां उनसे उनके बेटे के बारे में पूछताछ की गई तथा उनका मोबाइल फोन जब्त कर लिया गया.
उन्होंने सीआई नागाराजू पर धमकी देने का भी आरोप लगाया.
विजय लक्ष्मी के मुताबिक, “उन्होंने कहा था कि वह मेरे बेटे को मार देंगे और मुझे उससे मिलने की कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए.”
उन्होंने कहा, “जो मेरे और मेरे बेटे के साथ हुआ, वह किसी और के साथ नहीं होना चाहिए. अगर मेरा बेटा जीवित है तो मुझे दिखाइए. अगर नहीं है तो कम से कम उसकी राख मुझे दे दीजिए. मुझे बता दीजिए कि वह कहां है. मैं वहां चली जाऊंगी. मैं इस गंदी राजनीति का हिस्सा नहीं बनना चाहती.”
विजय लक्ष्मी का कहना है कि वह कई बार कृष्णा लंका पुलिस स्टेशन गईं लेकिन उन्हें अपने बेटे के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई.
उनके वकील आदित्य चौधरी ने कहा कि 2 जून को विजय लक्ष्मी उनसे मिली थीं, जब पुलिस कथित तौर पर कोई जानकारी देने से इनकार कर रही थी. उन्होंने यह भी दावा किया कि परिवार के पास ऐसे प्रत्यक्षदर्शियों के बयान हैं जिन्होंने साई कृष्णा को पुलिस द्वारा ले जाते हुए देखा था.
चौधरी का कहना है कि इस मामले में न्याय तभी संभव है जब किसी स्वतंत्र राष्ट्रीय स्तर की एजेंसी से जांच कराई जाए.
इस दौरान स्थानीय बार एसोसिएशन के कुछ सदस्य और अन्य कथित पीड़ित भी विजय लक्ष्मी के समर्थन में मौजूद रहे. उनका आरोप था कि कृष्णा लंका पुलिस स्टेशन हिरासत में यातना के मामलों के लिए बदनाम रहा है.
दूसरी ओर कुछ अपुष्ट रिपोर्टों में दावा किया गया कि साई कृष्णा कई मामलों में जांच के दायरे में रहने वाला हिस्ट्रीशीटर था. हालांकि परिवार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है.
कृष्णा लंका पुलिस स्टेशन के एक सब-इंस्पेक्टर ने कहा कि साई कृष्णा के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज नहीं है. हालांकि उन्होंने यह पुष्टि करने से इनकार कर दिया कि उसे पुलिस ने हिरासत में लिया था या नहीं.
सीसीटीवी फुटेज जारी करने की विपक्ष की मांग
इस मामले ने आंध्र प्रदेश की राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है.
पूर्व मंत्री और वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के नेता अंबाती रामबाबू ने आरोप लगाया कि साई कृष्णा की पुलिस हिरासत में हत्या कर दी गई और सबूत मिटाने के लिए उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया.
उन्होंने राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर सवाल उठाते हुए सरकार से जवाब मांगा.
वाईएसआर कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के नेताओं ने कृष्णा लंका पुलिस स्टेशन की सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक करने की मांग की है.
विपक्ष का कहना है कि यदि पुलिस के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है तो पूरे घटनाक्रम की वीडियो रिकॉर्डिंग सामने लाई जानी चाहिए. दूसरी ओर सरकार ने निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया है.
अब सबकी निगाहें हाई कोर्ट की अगली सुनवाई और उस जांच पर टिकी हैं, जिससे यह साफ हो सके कि गाडे साई कृष्णा के साथ आखिर क्या हुआ.
पीएमओ की फॉरेस्ट फाइल्स: बंद कमरों में हुए फैसलों ने कैसे बदल दी संरक्षण की नियमपुस्तिका
वन संरक्षण नियमों में तीन साल में किए गए तीन संशोधनों ने प्रतिपूरक वनीकरण के लिए निम्नीकृत वन भूमि के उपयोग पर लगे प्रतिबंधों को धीरे-धीरे खत्म कर दिया है. इसके तहत महत्वपूर्ण फैसले प्रधानमंत्री कार्यालय में बंद कमरों में हुई बैठकों में लिए गए.
‘न्यू दिल्ली पोस्ट’ में अक्षय देशमाने की यह खोजी रिपोर्ट पर्यावरण मंत्रालय द्वारा वन संरक्षण नियमों में तीन वर्षों (नवंबर 2023 से अगस्त 2025) के भीतर किए गए तीन बड़े संशोधनों और उनके पीछे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की भूमिका पर प्रकाश डालती है. इन बदलावों के माध्यम से बुनियादी ढांचा और खनन कंपनियों के लिए पुराने एवं घने जंगलों को नष्ट करने के बदले ‘निम्नीकृत वन भूमि’ (जैसे दलदल, बंजर भूमि, झाड़ियाँ) को प्रतिपूरक वनीकरण के रूप में इस्तेमाल करने का रास्ता आसान कर दिया गया है. सेवानिवृत्त अधिकारियों और पर्यावरणविदों के अनुसार, यह कदम सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन है और इससे देश के प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी.
मूल वन संरक्षण अधिनियम के तहत नियम था कि यदि कोई कंपनी बुनियादी ढांचे, खनन या बिजली परियोजना के लिए वन भूमि नष्ट करती है, तो उसे कानूनी रूप से किसी गैर-वन भूमि पर वन क्षेत्र तैयार करके इसकी भरपाई करनी होगी. पर्यावरण मंत्रालय ने वर्ष 2022 में नियमों को व्यापक रूप से संशोधित कर ‘वन (संरक्षण) नियम, 2022’ जारी किए थे. इसमें निम्नीकृत वन भूमि का उपयोग केवल “असाधारण परिस्थितियों” तक सीमित था.
मार्च 2023 में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) और सिक्किम सरकार से मिले पत्रों ने इस कड़े नियम को बदलने की नींव रखी. एनएचएआई के अध्यक्ष संतोष कुमार यादव ने शिकायत की थी कि वन अधिकारी गैर-वन भूमि की मांग कर रहे हैं, जिससे परियोजनाओं में देरी हो रही है. वहीं, सिक्किम के पर्यावरण सचिव प्रदीप कुमार ने तर्क दिया कि राज्य का 82.3% हिस्सा वन भूमि है, इसलिए प्रतिपूरक वनीकरण के लिए गैर-वन भूमि उपलब्ध नहीं है. उन्होंने चेतावनी दी कि इस नियम से सीमावर्ती क्षेत्रों का विकास और इको-टूरिज्म ठप हो जाएगा. इन अनुरोधों के बाद मंत्रालय की एक सलाहकार समिति ने छूट की सिफारिश की.
तीन वर्षों में किए गए तीन संशोधन
पहला संशोधन (नवंबर 2023): इसके तहत ‘वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023’ लागू किए गए. इसमें 2022 के नियमों के “असाधारण परिस्थितियों” वाले प्रतिबंध को हटाकर एक “विशेष व्यवस्था” शुरू की गई. इसके तहत 33% से अधिक वन क्षेत्र वाले राज्यों, ट्रांसमिशन लाइनों, ऑप्टिकल फाइबर बिछाने, और संपर्क सड़कों के निर्माण जैसी कई परिस्थितियों में गैर-वन भूमि के बजाय निम्नीकृत वन भूमि के उपयोग की अनुमति दे दी गई.
दूसरा संशोधन (2024): फरवरी 2024 में ‘ग्रीन क्रेडिट नियम 2023’ के तहत एक कार्यप्रणाली जारी की गई, जिसमें निजी कंपनियों को वृक्षारोपण के माध्यम से ग्रीन क्रेडिट कमाने के लिए निम्नीकृत वन भूमि सौंपने का निर्देश दिया गया. इसके बाद सितंबर 2024 में नियमों की भाषा को और लचीला बनाया गया. दस्तावेजों से पता चलता है कि दिसंबर 2024 में पीएमओ के एक सलाहकार द्वारा बुलाई गई बैठक में कोयला और खान मंत्रालयों के खनन हितों की वकालत करने वाले अनुरोधों पर चर्चा हुई, जिसके बाद एक स्पष्टीकरण जारी कर केंद्रीय और कुछ राज्य कंपनियों को यह बड़ी छूट दी गई.
तीसरा संशोधन (अगस्त 2025): यह सबसे बड़ा और सबसे विवादास्पद बदलाव था. इसके तहत परमाणु ऊर्जा अधिनियम के अंतर्गत आने वाले महत्वपूर्ण एवं रणनीतिक खनिजों (जैसे कोबाल्ट, लिथियम, यूरेनियम, थोरियम आदि) का खनन करने वाली कंपनियों को प्रतिपूरक वनीकरण के लिए निम्नीकृत वन भूमि के उपयोग की मंजूरी दी गई. नियमों को सार्वजनिक करने से ठीक पहले पीएमओ में बंद कमरे की बैठक में “गहरे दबे” खनिजों को भी इस सूची में जोड़ दिया गया. खान मंत्रालय के सचिव वी.एल. कांत राव ने तर्क दिया था कि अधिकांश महत्वपूर्ण खनिज वन क्षेत्रों में हैं, अतः बिना किसी प्रतिबंध के दोगुनी निम्नीकृत भूमि पर वनीकरण की अनुमति मिलनी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश और कानूनी चुनौतियाँ
नियमों में इन बदलावों को न्यायपालिका में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है: न्यायालय का अंतरिम आदेश: वर्ष 2024 में सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी अशोक कुमार शर्मा और अन्य पर्यावरणविदों ने याचिका दायर की. याचिका में आगाह किया गया कि भारत का वन क्षेत्र पहले से ही राष्ट्रीय वन नीति के 33% के लक्ष्य के मुकाबले केवल 21% है. यदि वन भूमि के विनाश की भरपाई के लिए किसी दूसरी वन भूमि (निम्नीकृत) को ही गिना जाएगा, तो कुल वन क्षेत्र कभी नहीं बढ़ पाएगा. इस पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने 3 फरवरी 2025 को अंतरिम आदेश दिया कि बिना अदालती आदेश के केंद्र या राज्य ऐसा कोई कदम नहीं उठाएंगे जिससे वन भूमि में कमी आए.
अवमानना याचिका: अगस्त 2025 में तीसरे संशोधन के आने के बाद, सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी प्रकृति श्रीवास्तव ने पर्यावरण सचिव तन्मय कुमार के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की. याचिका के अनुसार, सरकार का यह कदम कोर्ट के ‘भूमि के बदले भूमि, पेड़ के बदले पेड़’ के सिद्धांत और संवैधानिक दायित्वों (अनुच्छेद 48A और 51A(g)) को सीधी चुनौती देता है.
श्रीवास्तव ने सरकार के राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा संबंधी तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि पारिस्थितिक सुरक्षा भी उतनी ही अनिवार्य है और संरक्षण ही हमारा असली और दीर्घकालिक बचाव है. सरकार को नियमों को अधिसूचित करने से पहले सुप्रीम कोर्ट से अनुमति लेनी चाहिए थी.
(अक्षय देशमाने एक पर्यावरण पत्रकार हैं, यह उनकी खोजी रपट का हिंदी में अनुदित सारांश है)
टी.एम. कृष्णा | सीधे-सादे लोग
प्रसिद्ध संगीतकार और सार्वजनिक बुद्धिजीवी टी.एम. कृष्णा द्वारा लिखित इस लेख में भारतीय राजनीति के एक बेहद चिंताजनक पहलू—‘चुनावी दलबदल, अवसरवाद और मतदाता की राजनीतिक साक्षरता’—का तीखा और दार्शनिक विश्लेषण किया गया है. कृष्णा ने यह समझाने का प्रयास किया है कि कैसे राजनीतिक दलों ने भाषा और राष्ट्रवाद का दुरुपयोग करके लोकतांत्रिक मूल्यों को विकृत कर दिया है, और कैसे हम (मतदाता) इस पूरे तमाशे के मूक गवाह और अनजाने में भागीदार बन चुके हैं. ‘द टेलीग्राफ’ में अंग्रेजी में प्रकाशित इस लेख का हिंदी में अनुदित सारांश प्रस्तुत है:
अपने व्यक्तिगत अनुभवों से शुरुआत करते हुए टी.एम. कृष्णा बताते हैं कि उन्होंने पहली बार ‘ऑपरेशन’ शब्द 1980 के दशक में ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के दौरान सुना था. इस घटना के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई और सिख विरोधी दंगे भड़के. अन्यथा, चिकित्सा क्षेत्र से अलग, ‘ऑपरेशन’ शब्द हमेशा से सैन्य कार्रवाई, बाहरी आक्रमण के खिलाफ प्रतिरोध, या देश के भीतर पनप रहे राष्ट्र-विरोधी तत्वों को कुचलने की भावना से जुड़ा रहा है. इस शब्द के साथ एक ऐसी अति-राष्ट्रवादी भावना जुड़ी होती है, जिसमें कार्रवाई के दौरान या उसके ठीक बाद किसी भी प्रकार की आलोचना, सवाल या असहमति को ‘देशद्रोह’ करार दे दिया जाता है. सवाल उठाने वालों को ‘बाधक’ मान लिया जाता है.
नागरिकों को बिना शर्त समर्थन देने के लिए मजबूर किया जाता है. सोशल मीडिया पर लोग अपनी प्रोफाइल पिक्चर (डीपी) बदलकर तिरंगा लगा लेते हैं, दुश्मनों का मजाक उड़ाने वाले और हिंसा को महिमामंडित करने वाले मीम्स साझा किए जाते हैं, और नागरिक समाज एकजुटता के कार्यक्रम आयोजित करता है.
लेकिन हाल के वर्षों में, ‘ऑपरेशन’ शब्द का प्रयोग सैन्य बैरकों से निकलकर भारतीय राजनीति के गलियारों में होने लगा है. आज ‘ऑपरेशन लोटस’ भारतीय राजनीतिक विमर्श का एक सामान्य हिस्सा बन चुका है. ‘ऑपरेशन लोटस’ का सीधा अर्थ भारतीय जनता पार्टी द्वारा विपक्षी दलों के विधायकों और सांसदों को तोड़कर अपने पाले में लाना है. विपक्षी नेता अचानक अपनी मूल पार्टी से मोहभंग का दावा करते हैं और भाजपा व नरेंद्र मोदी के प्रति निष्ठा व्यक्त करने लगते हैं.
जैसे ही यह दलबदल पूरा होता है, इन नेताओं के खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार और अन्य आपराधिक मामले जादुई रूप से गायब हो जाते हैं. इसे समाज में ‘भाजपा वाशिंग मशीन’ का नाम दिया गया है. इनमें से कई पाला बदलने वाले नेताओं को ईनाम के तौर पर मुख्यमंत्री या मंत्री पद तक सौंप दिया जाता है.
कृष्णा ताज़ा उदाहरण देते हुए बताते हैं कि कैसे तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में एक अज्ञात पार्टी (नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया) को मुखौटा बनाकर विभाजन कराया गया, और कैसे शिवसेना (यूबीटी) के खिलाफ ‘ऑपरेशन टाइगर’ की सुगबुगाहट है. हालांकि भारत में कपटपूर्ण दलबदल का पुराना इतिहास रहा है (जैसे तमिलनाडु में एआईएडीएमके के विधायकों को रिसॉर्ट में बंद करना), लेकिन आज के दौर में जो बात अलग है, वह है—इस अवसरवाद को बिना किसी छुपाव के, पूरी बेशर्मी के साथ अंजाम देना.
राजनीतिक दलबदल के लिए ‘ऑपरेशन’ शब्द का उपयोग करना बेहद खतरनाक और दुर्भावनापूर्ण है. इसके पीछे एक गहरा मनोवैज्ञानिक और वैचारिक खेल काम कर रहा है: चूंकि ‘ऑपरेशन’ शब्द में एक अंतर्निहित राष्ट्रवादी गूंज होती है, इसलिए आम जनता को अचेतन रूप से लगने लगता है कि सत्ता का यह केंद्रीकरण देश को मजबूत करने और आंतरिक-बाहरी दुश्मनों से लड़ने के लिए जरूरी है. इसके बाद, साम, दाम, दंड, भेद से सत्ता हासिल करना ‘धर्म’ मान लिया जाता है.
जो नेता पाला नहीं बदलते या भाजपा का विरोध करते हैं, उन्हें ‘दुश्मन लड़ाके’ या ‘जासूस’ मान लिया जाता है, जो देश में ‘रावणराज’ लाना चाहते हैं. यहाँ ‘रावण’ शब्द वास्तव में वामपंथियों, मुसलमानों और उदारवादियों को निशाना बनाने का एक राजनीतिक कोड बन जाता है. यह नैरेटिव नरेंद्र मोदी और अमित शाह की उस छवि के साथ बिल्कुल फिट बैठता है जिसमें वे खुद को हिंदुत्व राज की रक्षा करने वाले राष्ट्र के योद्धाओं के रूप में पेश करते हैं. इस युद्ध में संवैधानिक नैतिकता या नियमों के लिए कोई जगह नहीं है; या तो आप उनके सामने आत्मसमर्पण कर दें या फिर नष्ट हो जाएं.
कृष्णा इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त करते हैं कि इस पूरे तमाशे को देखकर देश के नागरिकों और मतदाताओं की प्रतिक्रिया क्या है. सोशल मीडिया फीड्स को देखने पर एक कड़वी सच्चाई सामने आती है: इस अनैतिक व्यवहार को लेकर जनता में कोई वास्तविक गुस्सा या आक्रोश नहीं दिखता. लोग इस पर लतीफे और व्यंग्य बनाकर हंसते हैं. इन दलबदलों के रणनीतिकार अमित शाह की चतुराई और बंद कमरों के ऑपरेशनों का जश्न मनाया जाता है. उन्हें ‘चाणक्य’ का खिताब देकर उनके मंच-कौशल की सराहना की जाती है. यहाँ तक कि विपक्ष के समर्थक भी उनकी इस कला के कायल दिखते हैं.
अपने विधायकों को एकजुट न रख पाने के लिए विपक्षी दलों का मजाक उड़ाया जाता है. जनता के मन में यह अंतर्निहित धारणा बन चुकी है कि यदि राजनेता अपनी जांच बचाने या पैसे के लिए पाला बदल रहे हैं, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है. लोग चतुर और चालाक भाजपा की शिकायत तो करते हैं, लेकिन इस बात से बेखबर हैं कि इस प्रक्रिया में उन्होंने एक नागरिक के तौर पर खुद का क्या हश्र कर लिया है.
टी.एम. कृष्णा का सबसे कड़ा प्रहार भारतीय मतदाताओं पर है. वे कहते हैं कि इस पूरी लोकतांत्रिक गिरावट की असली जड़ उस क्षण में है जब हम अपना वोट डालते हैं. बड़े-बड़े उदारवादी भी मतदाता की आलोचना करने से डरते हैं. सिर्फ इसलिए कि मतदाताओं ने किसी पार्टी को बहुमत दे दिया, इसका मतलब यह नहीं है कि उनके फैसले की तार्किक समीक्षा नहीं की जा सकती. मतदाता हमेशा सही नहीं होता.
चाहे कोई अमीर हो या गरीब, शिक्षित हो या अशिक्षित—हमारा वोट हमेशा सामाजिक बुराइयों (जाति, धर्म, भाषा, जातीयता और लिंग) से दूषित रहता है. मतदान का निर्णय व्यापक सामाजिक भलाई के बजाय तात्कालिक लाभ और तर्कहीन भावनाओं से संचालित होता है.
(अंग्रेजी में मूल लेख यहां पढ़ा जा सकता है)
हरकारा डीप डाइव
श्रवण गर्ग | राहुल गांधी का जन्मदिन नहीं, जनता की बेचैनी और उम्मीदों का प्रदर्शन
हरकारा डीप डाइव के इस लाइव एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग और निधिश त्यागी ने राहुल गांधी के 56वें जन्मदिन के बहाने भारतीय राजनीति, विपक्ष की चुनौतियों, नरेंद्र मोदी की अंतरराष्ट्रीय स्थिति और भारत के लोकतांत्रिक भविष्य पर विस्तार से चर्चा की.
श्रवण गर्ग ने कहा कि राहुल गांधी के जन्मदिन पर इस बार जो भीड़ और उत्साह दिखाई दिया, वह केवल एक राजनीतिक नेता के प्रति समर्थन नहीं है. उनके अनुसार यह देश के भीतर बढ़ती बेचैनी और बदलाव की इच्छा का संकेत है. खासकर युवाओं के बीच यह भावना मजबूत हुई है कि अब सत्ता से सवाल पूछे जाने चाहिए और किसी वैकल्पिक नेतृत्व की तलाश जरूरी है.
उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा से मुकाबला भर नहीं है. असली चुनौती विपक्ष के भीतर बढ़ती टूट-फूट, दल-बदल और राजनीतिक दबावों की है. राज्यसभा चुनावों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश और झारखंड की घटनाएं बताती हैं कि विपक्षी एकता को कमजोर करने की कोशिशें लगातार जारी हैं. उनके अनुसार यह केवल चुनावी लड़ाई नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और राजनीतिक संतुलन की लड़ाई भी है.
श्रवण गर्ग ने यह भी कहा कि सत्ता के भीतर शक्ति संरचना बदलती दिखाई दे रही है. उनके अनुसार 2014 के शुरुआती वर्षों की तुलना में अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अनुपस्थिति में भी फैसले लगातार होते रहते हैं, जिससे संकेत मिलता है कि निर्णय लेने वाली एक अलग व्यवस्था सक्रिय है.
जी-7 सम्मेलन और डोनाल्ड ट्रंप के साथ नरेंद्र मोदी की मुलाकात का जिक्र करते हुए श्रवण गर्ग ने कहा कि इस बार प्रधानमंत्री की प्रस्तुति पहले जैसी आत्मविश्वासपूर्ण नहीं दिखी. उन्होंने ट्रंप के बयानों को भारत की राजनीति और विदेश नीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण संकेत माना. उनके अनुसार भारत पर अमेरिका का प्रभाव लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है और यह स्थिति लोकतांत्रिक स्वायत्तता के लिए चिंता का विषय है.
ईरान से जुड़े घटनाक्रम और भारतीय नाविकों की मौत का उल्लेख करते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि भारत सरकार ने इस मुद्दे पर अपेक्षित दृढ़ता क्यों नहीं दिखाई. उनका कहना था कि यह केवल विदेश नीति नहीं बल्कि राष्ट्रीय सम्मान और नागरिकों की सुरक्षा का प्रश्न भी है.
श्रवण गर्ग ने कहा कि भारत के सामने आज आंतरिक और बाहरी दोनों तरह की चुनौतियां खड़ी हैं. एक तरफ विपक्षी दलों को कमजोर करने की कोशिशें हैं, तो दूसरी तरफ वैश्विक शक्ति संतुलन के दबाव हैं. ऐसे माहौल में राहुल गांधी के प्रति बढ़ता जनसमर्थन केवल लोकप्रियता का संकेत नहीं, बल्कि लोकतंत्र को लेकर जनता की बढ़ती चिंता और उम्मीदों की अभिव्यक्ति है.
चर्चा के अंत में श्रवण गर्ग ने कहा कि राहुल गांधी का जन्मदिन इस बार एक राजनीतिक उत्सव से ज्यादा एक संदेश की तरह दिखाई देता है. लोगों की उम्मीदें उनके साथ जुड़ती जा रही हैं और यही उम्मीदें उनकी जिम्मेदारियों को भी बढ़ा रही हैं. उनके अनुसार आने वाले समय की लड़ाई केवल सत्ता परिवर्तन की नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक चरित्र और संस्थागत स्वतंत्रता को बचाए रखने की लड़ाई होगी.
वीवीपी शर्मा| संस्थापक और उत्तराधिकारी: संकट क्यों बन जाता है राजनीतिक उत्तराधिकार
वरिष्ठ पत्रकार वीवीपी शर्मा ने राजनीति विज्ञान के एक बेहद जटिल और शाश्वत प्रश्न का विश्लेषण किया है: “संगठन अपने संस्थापकों के बाद कैसे जीवित रहते हैं?” उनका तर्क है कि किसी भी राजनीतिक दल के लिए सबसे बड़ा संकट चुनावी हार नहीं, बल्कि नेतृत्व परिवर्तन और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में अधिकार का हस्तांतरण होता है.
इस विषय को भारतीय राजनीति के ऐतिहासिक उदाहरणों और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के हालिया संकट के संदर्भ में समझा जा सकता है.
राजनीतिक सिद्धांतों के माध्यम से शर्मा स्पष्ट करते हैं कि करिश्माई नेतृत्व वाले दलों में संस्थागत ढांचा अक्सर कमजोर होता है. मसलन, मैक्स वेबर का सिद्धांत, जो कहता है कि ‘करिश्माई अधिकार’ किसी औपचारिक नियम या संस्था के बजाय नेता के व्यक्तिगत गुणों से पैदा होता है. यह समर्थकों को एकजुट करने में तो प्रभावी है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमजोरी ‘उत्तराधिकार’ के समय दिखती है. नेता को इस व्यक्तिगत प्रभाव को टिकाऊ व्यवस्था में बदलना होता है, जिसे वेबर ने “करिश्मे का रूढ़िवादीकरण” कहा है.
इसी तरह रॉबर्ट मिशेल्स ने अपनी पुस्तक ‘पॉलिटिकल पार्टीज़’ (1911) में बताया कि सफल दल सत्ता को एक छोटे समूह में केंद्रित कर लेते हैं, जिससे नेता और संगठन का अंतर मिट जाता है. नेता जितना अनिवार्य होता जाता है, उसके बिना पार्टी की कल्पना उतनी ही असंभव हो जाती है.
एंजेलो पनेबियांको और सैमुअल हंटिंगटन: पनेबियांको का मानना है कि पार्टियाँ तब स्थिर होती हैं जब अधिकार व्यक्ति के बजाय संगठन में निहित हो. वहीं हंटिंगटन ने ‘पॉलिटिकल ऑर्डर इन चेंजिंग सोसाइटीज’ में तर्क दिया कि मजबूत व्यवस्थाएं मजबूत नेताओं पर नहीं, बल्कि उन नियमों और आदतों पर निर्भर करती हैं जो नेतृत्व बदलने के बाद भी बची रहें.
पार्टियाँ तब कमजोर होती हैं जब उनके संस्थापक इस कठिन बातचीत और प्रक्रिया को तब तक टालते रहते हैं, जब तक कि उनका खुद का प्रभाव कम नहीं होने लगता.
शर्मा ने भारतीय राजनीति के विभिन्न क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों के उदाहरण देकर स्पष्ट किया है कि केवल पद सौंपने से ‘राजनैतिक अधिकार’ हस्तांतरित नहीं होता, उसे अर्जित करना पड़ता है:
कांग्रेस पार्टी: नेहरू से शास्त्री और इंदिरा गांधी तक का बदलाव एक स्थापित संगठनात्मक ढांचे के तहत हुआ. लेकिन बाद में सत्ता गांधी परिवार के इर्द-गिर्द सिमट गई. राजीव और सोनिया गांधी ने विपरीत परिस्थितियों में कमान संभाली, लेकिन राहुल गांधी के मामले में यह साबित हुआ कि ‘विरासत’ और ‘स्वीकार्यता’ दो अलग बातें हैं. पद औपचारिक रूप से दिया जा सकता है, पर स्वीकार्यता कमानी पड़ती है.
शिवसेना बनाम द्रमुक (डीएमके): शिवसेना में बाल ठाकरे के जीते जी उत्तराधिकार का सवाल टाला गया, जिसका परिणाम उनकी मृत्यु के बाद पार्टी के ऐतिहासिक बिखराव के रूप में सामने आया. इसके विपरीत, द्रमुक में एम. करुणानिधि ने एम.के. स्टालिन को सीधे थोपा नहीं. स्टालिन ने दशकों तक संगठन में काम किया, चुनाव लड़े और अपनी जमीन बनाई. इसलिए जब औपचारिक बदलाव हुआ, तो पार्टी ने उन्हें सहजता से स्वीकार कर लिया.
समाजवादी पार्टी: मुलायम सिंह यादव से अखिलेश यादव तक का सफर भले ही कड़वा और पारिवारिक विवाद से भरा रहा, लेकिन अखिलेश ने पार्टी के भीतर राजनैतिक मुकाबला जीतकर संगठन और विधायकों का वास्तविक समर्थन हासिल किया, न कि केवल घोषणा के दम पर.
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का वर्तमान संकट
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की वर्तमान दुर्दशा का कारण केवल चुनाव हारना या भाजपा की रणनीति नहीं है. हार ने केवल उस आंतरिक असंतोष को सतह पर ला दिया जो वर्षों से दबा हुआ था.
अभिषेक बनर्जी बनाम पुरानी पीढ़ी: संकट के केंद्र में यह सवाल था कि ममता बनर्जी के इर्द-गिर्द बनी पार्टी अभिषेक बनर्जी की बढ़ती भूमिका को कैसे स्वीकार करे? विद्रोह ममता के कद के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस ‘सिकुड़ते दायरे’ के खिलाफ है जिसके तहत बिना संगठनात्मक सहमति के अभिषेक को आगे बढ़ाया जा रहा था.
वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा: वरिष्ठ नेता सौगत रॉय के सार्वजनिक बयानों ने इसी दर्द को हवा दी. जब तक पार्टी चुनाव जीतती रही, स्थानीय नेताओं और प्रतिनिधियों ने इस बात को दबाए रखा कि पार्टी में प्रभाव काम के बजाय शीर्ष तक पहुंच से तय हो रहा है. लेकिन हारते ही यह फुसफुसाहट संगठनात्मक बगावत में बदल गई.
बाहरी गठबंधन बनाम आंतरिक समझ: ममता बनर्जी की सोनिया गांधी से हालिया मुलाकातें यह दिखाती हैं कि वे संकट के समय बाहर रास्ते तलाश रही हैं, जबकि तृणमूल का असली संकट सहयोगियों की कमी नहीं, बल्कि आंतरिक अधिकार के प्रयोग और उसके हस्तांतरण के नियमों का अभाव है.
कुलमिलाकर, तृणमूल कांग्रेस के इस संकट से राजनीति जगत को एक सीधा और कड़ा सबक मिलता है. ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत—यानी व्यक्तिगत प्रभाव से पूरी पार्टी पर हावी रहने की क्षमता—ही अंततः उनकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई. उन्होंने अपने राजनैतिक विरोधियों का आकलन तो सही किया, लेकिन उत्तराधिकार के अनुचित तौर-तरीकों को लेकर अपनी ही पार्टी के भीतर पनप रहे गहरे असंतोष को कम आंक गईं.
कोई भी राजनैतिक उत्तराधिकारी केवल इसलिए सफल नहीं होता क्योंकि उसे ‘चुन’ लिया गया है; वह तब सफल होता है जब उसके चुने जाने से पहले ही संगठन का हर स्तर उसे अपना नेता स्वीकार कर चुका होता है. यदि यह आंतरिक स्वीकार्यता गायब हो, तो उत्तराधिकार कभी भी शांतिपूर्ण नेतृत्व परिवर्तन नहीं बनता, बल्कि वह विनाशकारी नियंत्रण का संघर्ष बन जाता है.
(वीवीपी शर्मा के लेख का यह हिंदी में अनुदित सारांश है)
आशुतोष | गुटों को एक इकाई में एकजुट करना ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है
सत्य हिंदी के सह-संस्थापक और पत्रकार, लेखक आशुतोष ने ‘फ्री प्रेस जर्नल’ में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के हालिया विभाजन, क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व पर संकट और भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक रणनीति का गहन विश्लेषण किया है, जिसका हिंदी में अनुदित सारांश कहता है:
पश्चिम बंगाल के बाद अब टीएमसी संसदीय दल भी औपचारिक रूप से विभाजित हो चुका है. यह विभाजन बेहद जटिल है क्योंकि टीएमसी दो स्तरों पर टूटी है: राज्य स्तर पर: कोलकाता का विद्रोही गुट खुद को ‘असली टीएमसी’ बता रहा है और ममता बनर्जी को अपना मुख्य सलाहकार मानता है. राष्ट्रीय स्तर पर: यह गुट ‘नेशनल सिटीजन्स पार्टी’ (एनसीपी) नामक एक नई इकाई में विलीन हो गया है, जिसका ममता बनर्जी से कोई सीधा संबंध नहीं है. ममता गुट: वर्तमान में ममता बनर्जी के साथ केवल मुट्ठी भर विधायक और सांसद बचे हैं.
आशुतोष का स्पष्ट मानना है कि टीएमसी का यह पतन भाजपा के इशारे पर हुआ है. राष्ट्रीय स्तर का विद्रोही गुट एनडीए को समर्थन दे रहा है, लेकिन कोलकाता गुट के सामने खुद को राज्य में मुख्य विपक्ष साबित करने की बड़ी चुनौती है. यदि वे भाजपा और सुवेंदु अधिकारी के प्रति नरम रुख अपनाते हैं, तो वे अपनी विश्वसनीयता खो देंगे और विपक्ष का स्थान कांग्रेस, वामपंथ या ममता गुट के पास चला जाएगा.
भाजपा का ‘विन-विन’ परिदृश्य और क्षेत्रीय दलों का भय
भाजपा के लिए यह स्थिति पूरी तरह से फायदेमंद है. ममता बनर्जी जैसी तीन बार की ताकतवर मुख्यमंत्री की पार्टी को ताश के पत्तों की तरह बिखेरकर भाजपा ने पूरे ‘इंडिया’ गठबंधन को कड़ा संदेश दिया है. इससे क्षेत्रीय दलों में अस्तित्व का डर पैदा हो गया है. दलबदल के इसी डर के कारण उद्धव ठाकरे की बुलाई बैठक में सभी सांसद नहीं पहुंचे, और अखिलेश यादव ने यहाँ तक कह दिया कि यदि भाजपा दोबारा जीती, तो यह देश का आखिरी चुनाव होगा.
विश्लेषण में तर्क है कि 24 से अधिक बिखरे हुए दलों के बजाय विपक्ष को दलबदल से बचने के लिए तीन मुख्य वैचारिक मंचों के तहत एकजुट होना चाहिए:
कांग्रेस का मंच: जो दल पहले कांग्रेस से अलग हुए थे—जैसे ममता की टीएमसी, जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस और शरद पवार की राकांपा—उन्हें वापस कांग्रेस में विलय कर लेना चाहिए ताकि वे सुरक्षित और मजबूत हो सकें.
समाजवादी मंच: 1989 के पुराने ‘जनता दल’ की तरह राजद (आरजेडी), सपा (समाजवादी पार्टी) और बीजद (बीजेडी) जैसी बिखरी हुई समाजवादी ताकतों को आपस में लड़ने के बजाय एक छत के नीचे आना चाहिए.
वामपंथी मंच: वामपंथी दलों को अपने पुराने मतभेद भुलाकर 1960 के दशक की तरह फिर से एकजुट हो जाना चाहिए.
आशुतोष के अनुसार, 24 अलग-अलग पार्टियों के मुकाबले इन तीन वैचारिक समूहों के बीच समन्वय करना बहुत आसान होगा. ये तीनों मिलकर ‘प्रतिरोध के अग्रदूत’ का निर्माण कर सकते हैं. वह राहुल गांधी की भूमिका पर भी सवाल उठाते हैं कि क्या वे भाजपा से लड़ने के पारंपरिक तरीके को छोड़कर इन तीन मंचों और एक समन्वय समिति को आकार देने की पहल करेंगे? यह आज की राजनीति का सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है.
(यह आशुतोष के लेख का हिंदी में अनुदित सारांश है. अंग्रेजी में पूरा लेख यहां पढ़ सकते हैं.)
एक राष्ट्र, एक पार्टी: क्या दलबदल विरोधी कानून मर चुका है?
एक राष्ट्र, एक कर. एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड. एक राष्ट्र, एक चुनाव.
मोदी सरकार को इस तरह के नारे पसंद हैं. हालिया राजनीतिक घटनाक्रम को देखते हुए आलोचक अब एक नया नारा गढ़ रहे हैं – एक राष्ट्र, एक पार्टी.
‘स्क्रोल’ के मुताबिक, पिछले कुछ समय में कई विपक्षी दलों में टूट और विलय की घटनाएं सामने आई हैं. पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के सांसदों और विधायकों के एक बड़े समूह ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ बगावत की. इसी तरह महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) में टूट की अटकलें लगाई जा रही हैं. इससे पहले आम आदमी पार्टी के कई राज्यसभा सांसदों के भाजपा के साथ जाने की खबरें भी सुर्खियों में रहीं.
इन घटनाओं ने एक बार फिर दलबदल विरोधी कानून की प्रासंगिकता और प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
विपक्ष का अंत
दलबदल विरोधी कानून में एक प्रावधान है जिसके तहत यदि किसी दल के दो-तिहाई विधायक या सांसद किसी दूसरे दल के साथ विलय का समर्थन करें तो उसे वैध माना जा सकता है. इसी प्रावधान का सहारा लेकर कई राजनीतिक समूह अपनी स्थिति को कानूनी बताने की कोशिश करते हैं.
लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल सांसदों और विधायकों का समूह किसी दूसरे दल में शामिल होकर विलय का दावा कर सकता है, या फिर मूल राजनीतिक दल का औपचारिक विलय भी जरूरी है? यही विवाद आज कई राजनीतिक घटनाओं के केंद्र में है.
विपक्षी दलों का आरोप है कि इन टूटों के पीछे केवल राजनीतिक मतभेद नहीं बल्कि सत्ता और संसाधनों का दबाव भी काम कर रहा है. यदि बड़े पैमाने पर विपक्षी दल कमजोर होते हैं, तो भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पर असर पड़ना तय है.
विरोधी या समर्थक?
भारत में दलबदल विरोधी कानून 1985 में लागू किया गया था. इसका उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों को पार्टी छोड़कर दूसरी राजनीतिक ताकतों के साथ जाने से रोकना था.
उस समय कांग्रेस पार्टी को आशंका थी कि लगातार बढ़ते राजनीतिक विभाजन और टूट-फूट से उसकी स्थिति कमजोर हो सकती है. इसलिए पार्टी अनुशासन बनाए रखने के लिए कानूनी रास्ता चुना गया.
हालांकि आलोचकों का तर्क रहा है कि इस कानून ने निर्वाचित प्रतिनिधियों की स्वतंत्रता को सीमित कर दिया. सांसद और विधायक कई मामलों में अपने मतदाताओं से अधिक अपनी पार्टी के प्रति जवाबदेह हो गए.
इसके बावजूद कानून का मूल उद्देश्य, यानी दलबदल रोकना, कभी पूरी तरह सफल नहीं हुआ. व्यक्तिगत दलबदल की जगह अब सामूहिक दलबदल और विलय की रणनीति अपनाई जाने लगी.
भाजपा और अदालतों ने कानून को कमजोर किया
हाल के वर्षों में कई न्यायिक फैसलों ने दलबदल विरोधी कानून की व्याख्या को लेकर नई बहस छेड़ दी है.
कर्नाटक और महाराष्ट्र के राजनीतिक संकटों के दौरान अदालतों के फैसलों ने ऐसी परिस्थितियां पैदा कीं जिनसे सरकारें बदलीं और सत्ता संतुलन बदल गया. वहीं गोवा में कांग्रेस के विधायकों के भाजपा में शामिल होने को अदालत द्वारा वैध ठहराए जाने के बाद यह बहस और तेज हो गई कि कानून वास्तव में क्या कहता है और उसकी सीमाएं क्या हैं.
आलोचकों का कहना है कि इन फैसलों ने दलबदल विरोधी कानून को कमजोर किया है. दूसरी ओर समर्थकों का तर्क है कि लोकतंत्र में निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपनी राजनीतिक पसंद बदलने की स्वतंत्रता भी होनी चाहिए.
एक वास्तविक समस्या
दलबदल विरोधी कानून की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि उसने समस्या को खत्म नहीं किया, बल्कि उसका स्वरूप बदल दिया. अब व्यक्तिगत दलबदल की बजाय बड़े समूहों में टूट देखने को मिलती है.
फिर भी जिस समस्या को यह कानून संबोधित करता है, वह वास्तविक है. अधिकांश सांसद और विधायक केवल अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता के कारण नहीं, बल्कि अपनी पार्टी के प्रतीक, संगठन और नेतृत्व के कारण चुनाव जीतते हैं.
उदाहरण के लिए, तृणमूल कांग्रेस को मिलने वाले वोटों में ममता बनर्जी की लोकप्रियता की बड़ी भूमिका है. इसी तरह भाजपा ने भी कई चुनावों में मतदाताओं से सीधे नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट मांगे हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि यदि कोई प्रतिनिधि पार्टी के नाम पर चुना गया हो, तो क्या उसे कार्यकाल के बीच में मतदाताओं की राय लिए बिना राजनीतिक निष्ठा बदलने का अधिकार होना चाहिए?
चुनावों में भरोसे का अंत
यहीं दलबदल की राजनीति लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बन जाती है.
यदि मतदाता किसी पार्टी को वोट दें और कुछ समय बाद उनका प्रतिनिधि किसी दूसरी पार्टी में चला जाए, तो जनादेश का अर्थ कमजोर पड़ जाता है. इससे चुनावी प्रक्रिया में जनता का भरोसा प्रभावित हो सकता है.
यह चिंता ऐसे समय में और बढ़ जाती है जब चुनावी वित्तपोषण, संस्थागत निष्पक्षता और लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा को लेकर पहले से ही सवाल उठ रहे हैं.
दलबदल विरोधी कानून की आलोचना की जा सकती है, लेकिन उसका मूल प्रश्न आज भी कायम है. यदि निर्वाचित प्रतिनिधि बिना जनता के पास वापस गए अपना राजनीतिक पक्ष बदल सकते हैं, तो आखिर मतदाता के जनादेश की कीमत क्या रह जाती है?
श्रवण गर्ग | पर पार्टीशन वापस नहीं जाएगा !
प्रसिद्ध पाकिस्तानी फ़िल्ममेकर उमर नासिर अली ने इम्तियाज़ अली की बहुचर्चित फ़िल्म ‘ मैं वापस आऊँगा‘ को अत्यंत भावनात्मक और मास्टरक्लास करार देते हुए कहा है कि फ़िल्म ख़त्म हो जाने के भी काफ़ी समय तक दर्शकों के साथ बनी रहती है !
‘नायाब’ जैसी फीचर फ़िल्म के लिए पहचान रखने वाले उमर नासिर से क्या पूछा जा सकता है कि पार्टीशन को लेकर ऐसी ही कोई फ़िल्म क्या वे पाकिस्तान में बना सकते हैं ? ऐसी फ़िल्म जिसमें लोकेशन सरगोधा की ही हो पर इम्तियाज़ की फ़िल्म के 95 साल के सिख मुख्य नायक (ईशर सिंह ग्रेवाल ) की जगह कोई मुस्लिम हो जिसके अधूरे प्यार की नायिका कोई सिख युवती पार्टीशन के बाद भारत के हिस्से वाले पंजाब के किसी शहर में बस गई हो और जिसे तलाशने उसका पोता सीमा पार करके भारत आता हो ? क्या फ़िल्म पाकिस्तान में बनाने दी जाएगी ? क्या ऐसी कोई फ़िल्म भारत में रिलीज़ होने दी जाएगी ?
ईशर सिंह ग्रेवाल उर्फ़ कीनू की 78 साल पुरानी प्रेम कहानी हक़ीक़त में उन ज़ख्मों को ही हरा करती है जिन्हें वे सत्तर लाख से ज़्यादा लोग जो पार्टीशन के बाद गठरियों में बांधकर भारत पहुँचे थे अब भूल जाना चाहते हैं. तो फिर क्या बहस फ़िल्म को एक अधूरे प्यार की कहानी की क़ैद से आज़ाद कर उसकी स्क्रिप्ट में डाले गए ‘द कश्मीर फ़ाइल्स’ की तरह के हिंसक दृश्यों या शरणार्थियों से भरी ट्रेनों के अमृतसर पहुँचने के स्टॉक फूटेज के इस्तेमाल की ज़रूरत या निर्माताओं के इरादों पर भी नहीं की जानी चाहिये ?
सत्तारूढ़ दल का समूचा तंत्र भी तो बार-बार ‘विभाजन की विभीषिका’ के क्षणों और लाशों से पटी ट्रेनों के सीमा पार से अमृतसर रेलवे स्टेशन पर पहुँचने की याद दिलाता रहता है. अधूरी प्रेम कहानी के बहाने क्या इम्तियाज़ की फ़िल्म भी जाने-अनजाने उसी एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम नहीं करती ?
दर्शकों की तरफ़ से हम यह मानकर चलना चाहते हैं कि अगर फ़िल्म में यह सब शामिल नहीं किया जाता तो फिर पूरी कहानी युवा ईशर के सरगोधा में इश्क़ के शॉट्स, पोते निर्वेर (दिलजीत दोसांझ) के इंग्लैंड से लौटकर भारत आने और सीमा पर करके सरगोधा जाने के दृश्यों और ईशर (नसीरूद्दीन) के घर और अस्पताल के बिस्तरों पर व्यक्त हुई अधूरे प्रेम की स्मृतियों तक बंध कर रह जाती ! यानी असली फ़िल्म इंटरवल के बाद शुरू होती ! पर पार्टीशन की व्यथा को कमर्शियली बेचने के लिए तीन घंटे तक खींचा जाना ज़रूरी था.
हक़ीक़त यह है कि पार्टीशन की हिंसक स्मृतियों को अगर इतिहास के कूड़ेदान में डाल दिया जाए तो फिर न तो सत्ता की सांप्रदायिक राजनीति को चुनावी बारूद मिलेगा और न मुंबइया फ़िल्मों के लिए कहानियाँ. फ़िल्म के शुरुआती हिस्से में जब पार्टीशन की खबर सरगोधा पहुँचती है तो युवा ईशर पहले यह डायलॉग बोलता है: मैं बटवारे को नहीं मानता’ ! जब उसे ज़बरदस्ती ट्रेन पर चढ़ाकर सीमापार धकेला जाने लगता है तो अपने प्यार से वह वादा करता है :’ मैं वापस आऊँगा’ !
ईशर( नसीरूद्दीन) के 78 साल तक प्यार में डूबे रहने और किए गए वायदे के मुताबिक़ वापस नहीं पहुँच पाने की कहानी का अदृश्य भाग यह है कि पार्टीशन को न सिर्फ़ स्वीकार कर लिया गया है उसके ज़ख्मों को बार-बार कुरेदकर गहरा करते रहना भी वक्त की ज़रूरत बन गया है.
पार्टीशन को लेकर बनाने वाली फ़िल्में अधूरे प्रेम की पीड़ा और बेबसी को जिस अन्दाज़ में उजागर करती हैं अपनी स्क्रिप्ट्स में एक मुल्क के तौर पर पाकिस्तान के लिए नफ़रत की गुंजाइशें भी छोड़ती जाती हैं. इम्तियाज़ भी अगर उस गुंजाइश को नहीं छोड़ते तो फिर फ़िल्म में ग्लोरिफ़िकेशन सिर्फ़ दो कोमों के युवा प्रेमियों के बीच पनपे निश्चल प्रेम का ही होता उससे इतर कुछ नहीं. वैसी स्थिति में फ़िल्म दिलजीत दोसांझ की सरगोधा यात्रा के शॉट्स के बाद नसीरूद्दीन शाह के चेहरे पर छाने वाली शांति के अंतिम दृश्य पर ख़त्म कर दी जाती ! वैसा नहीं किया गया ! नसीरुद्धीन की शानदार भूमिका को ओवरशैडो करते दोसांझ के गाने ‘कमाल है ‘ के साथ फ़िल्म का अंत दिखाया गया. एक मार्मिक प्रेम कहानी पर ग़ज़ा के विज़ुअल्स की ग़ैरज़रूरी बमबारी के बारे में किसी भी समीक्षक ने सवाल नहीं किया !
टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश
तीन भारतीयों की मौत पर क्या अमेरिका से जवाब मांग पाए मोदी?
‘टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश’ के इस एपिसोड में पत्रकार निधीश त्यागी ओमान की खाड़ी में एक तेल टैंकर पर हुए अमेरिकी हमले में मारे गए तीन भारतीय नाविकों आदित्य शर्मा, शिवानंद चौरसिया और सुरेश पटनाला की मौत और उससे जुड़े राजनीतिक व कूटनीतिक सवालों की पड़ताल करते हैं. वह इस घटना को केवल तीन भारतीय नागरिकों की मौत नहीं, बल्कि विदेश में काम कर रहे लाखों भारतीयों की सुरक्षा और भारत सरकार की जिम्मेदारी से जुड़ा मुद्दा बताते हैं.
एपिसोड में तीनों नाविकों की पृष्ठभूमि पर चर्चा की गई है. आदित्य शर्मा हिमाचल प्रदेश के युवा डेक कैडेट थे, शिवंद चौरसिया उत्तर प्रदेश के देवरिया से थे और सुरेश पटनाला आंध्र प्रदेश के वरिष्ठ चीफ इंजीनियर थे. तीनों समुद्री व्यापार से जुड़े जहाजों पर काम कर रहे थे और अपने परिवारों की आजीविका का आधार थे.
निधीश त्यागी भारत सरकार की प्रतिक्रिया का भी विश्लेषण करते हैं. उनके अनुसार विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी अधिकारियों के समक्ष विरोध दर्ज कराया और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो से बातचीत की, लेकिन भारत ने अमेरिकी कार्रवाई की स्पष्ट और सीधे शब्दों में निंदा नहीं की. वह ईरान और अमेरिका के बयानों का भी उल्लेख करते हैं और सवाल उठाते हैं कि क्या भारत अपने नागरिकों की मौत के मामले में अधिक मजबूत रुख अपना सकता था.
एपिसोड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के संबंधों, जी-7 शिखर सम्मेलन में हुई बातचीत और विपक्ष द्वारा उठाए गए सवालों पर भी चर्चा होती है. निधीश त्यागी का कहना है कि यह मामला केवल तीन नाविकों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत-अमेरिका संबंधों, विदेश नीति और राष्ट्रीय सम्मान से भी जुड़ा है.
अंत में वह दर्शकों के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न रखते हैं कि यदि विदेश में किसी भारतीय नागरिक के साथ अन्याय होता है, तो क्या भारत सरकार उसके लिए मजबूती से खड़ी होगी या मामला केवल औपचारिक बयानों तक सीमित रह जाएगा. यही सवाल इस पूरे एपिसोड का केंद्रीय विषय बनकर उभरता है.
‘अगर भारत नहीं तो कौन, अगर अभी नहीं तो कब?’ फिलिस्तीन ने भारत से मांगी तत्काल मदद
‘द वायर’ के मुताबिक, नई दिल्ली में शुक्रवार को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारत में फिलिस्तीन के राजदूत अब्दुल्ला एम.ए. अबुशावेश ने भारत सरकार, चिकित्सा संस्थानों और नागरिक समाज से फिलिस्तीन के स्वास्थ्य क्षेत्र को बचाने के लिए तत्काल सहायता की अपील की. उन्होंने कहा कि इजरायली हमलों के कारण फिलिस्तीन का स्वास्थ्य तंत्र गंभीर संकट में है और समय पर मदद मिलने पर हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है.
अबुशावेश ने कहा, “अगर भारत और भारतीय लोग नहीं, तो कौन? और अगर अभी नहीं, तो कब?” उन्होंने कहा कि फिलिस्तीन इस समय केवल राजनीतिक संघर्ष का नहीं, बल्कि एक बड़ी मानवीय और स्वास्थ्य आपदा का सामना कर रहा है.
स्वास्थ्य व्यवस्था पर गहराता संकट
राजदूत ने बताया कि फिलिस्तीन में अस्पतालों को बुनियादी चिकित्सा संसाधनों की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है. एनेस्थीसिया, एंटीबायोटिक्स, डायलिसिस सामग्री, रक्त इकाइयों, सर्जिकल उपकरणों और अस्पतालों के जनरेटर चलाने के लिए ईंधन जैसी आवश्यक चीजें तेजी से खत्म हो रही हैं.
फिलिस्तीनी दूतावास के अनुसार, पिछले वर्ष वेस्ट बैंक के सरकारी अस्पतालों में लगभग 65 हजार सर्जरी हुई थीं. लेकिन इस वर्ष अब तक केवल 19,500 सर्जरी हो सकी हैं, जबकि दवाओं और संसाधनों की कमी के कारण 11 हजार से अधिक निर्धारित ऑपरेशन टालने पड़े हैं.
अबुशावेश ने कहा कि विस्थापन शिविरों में बढ़ती भीड़, खराब स्वच्छता व्यवस्था और साफ पानी की कमी ने हालात को और गंभीर बना दिया है.
युद्धविराम के बावजूद जारी हिंसा
राजदूत ने आरोप लगाया कि गाजा शांति योजना लागू होने के बावजूद इजरायल ने युद्धविराम का पालन नहीं किया. उनके अनुसार समझौते पर हस्ताक्षर के बाद भी एक हजार से अधिक फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं.
उन्होंने कहा कि फिलिस्तीन के कई हिस्सों में मानवीय संकट अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच चुका है. उनके मुताबिक चिकित्सा ढांचे का विनाश, लगातार सैन्य हमले और आर्थिक दबाव ने स्वास्थ्य व्यवस्था को लगभग ठप कर दिया है.
अबुशावेश ने कहा कि फिलिस्तीन की बड़ी आबादी सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर है. युद्ध और आर्थिक संकट के कारण लाखों लोग निजी इलाज कराने की स्थिति में नहीं हैं, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है.
भारत से सहयोग की उम्मीद
राजदूत ने भारत और फिलिस्तीन के ऐतिहासिक संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत लंबे समय से फिलिस्तीनी मुद्दे का समर्थन करता रहा है. उन्होंने महात्मा गांधी के विचारों, फिलिस्तीन मुक्ति संगठन को भारत की मान्यता और संयुक्त राष्ट्र में दो-राष्ट्र समाधान के समर्थन का जिक्र किया.
उन्होंने कहा कि भारत पहले भी गाजा को चिकित्सा सहायता भेज चुका है. साथ ही उन्होंने उस अस्पताल परियोजना का उल्लेख किया जिसकी घोषणा 2017 में की गई थी और जिसके पूरा होने की अभी भी प्रतीक्षा है. हाल ही में भारत द्वारा फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए जारी 25 लाख डॉलर की सहायता का भी उन्होंने स्वागत किया.
मीडिया और नागरिक समाज से अपील
अबुशावेश ने भारतीय मीडिया, युवाओं और सामाजिक संगठनों से फिलिस्तीन के मानवीय संकट को प्रमुखता से उठाने की अपील की. उन्होंने कहा कि यह केवल राजनीतिक या कूटनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि मानवता और नैतिक जिम्मेदारी का सवाल है.
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘मैत्री’ पहल का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत ने मानवीय संकट झेल रहे देशों को चिकित्सा सहायता देने का संकल्प लिया था. उनके अनुसार फिलिस्तीन आज ऐसे ही एक संकट से गुजर रहा है और यह वह समय है जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से भारत, मदद के लिए आगे आ सकता है.
अपील :
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