18/06/2026: नीट ने एक और जान | हत्यारी मशीन | चूंकि प्रियांक खड़गे दलित हैं | क्रॉस वोटिंग से शिकस्त | रथिन रॉय की खरी-खरी | भारत-अमेरिका दरार | मोदी-नेतन्याहू | आया राम गया राम | डिजिटल मंच
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
खड़गे को लेकर भाजपा सांसद की जातिवादी टिप्पणी: ‘एक दलित को आरएसएस की परवाह क्यों होनी चाहिए?’
नीट दोबारा परीक्षा से कुछ दिन पहले, अब अहमदाबाद में 17 वर्षीय छात्र ने आत्महत्या कीकैथोलिक चर्च ने विदेशी अंशदान विधेयक पर फिर जताई चिंता, 28 जून को राष्ट्रीय प्रार्थना दिवस का आव्हान
भारत को और अधिक डॉक्टरों और मेडिकल कॉलेजों की आवश्यकता है, न कि अधिक प्रवेश परीक्षाओं की
रथिन रॉय | औसत दर्जे के दायरे में फंसा भारत एक गंभीर रोजगार और मजदूरी संकट का सामना कर रहा है
ईरान युद्ध के बाद भारत-अमेरिका रिश्तों में दरार, भरोसे का संकट गहराया
हाईकोर्ट ने हिंदू मंदिर के पास चर्च के निर्माण पर लगाई रोक
नेतन्याहू और मोदी: एक असंभावित गठबंधन का निर्माण
आया राम, गया राम से आगे: कैसे दल-बदल और पार्टी विभाजन भारतीय राजनीति की वैध सत्ता-रणनीति बन गए हैं
पश्चिम बंगाल से महाराष्ट्र तक विपक्ष के टूटने की आशंका
कुणाल पुरोहित | मुझे नहीं लगता प्लेटफॉर्म्स की कोई आइडियोलॉजी है, वे सत्ता और धंधे के साथ हैं
सहयोगियों द्वारा क्रॉस-वोटिंग से कांग्रेस ने झारखंड में राज्यसभा सीट गंवाई, खड़गे के सचिव को शिकस्त
कश्मीर के सरकारी कर्मचारी पर ‘नार्को-टेरर’ का मामला कैसे बना, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने छह साल बाद दी जमानत
भारत में देशव्यापी बारिश में 41% की कमी, महाराष्ट्र के ऊपर रुका दक्षिण-पश्चिम मानसून
नीट दोबारा परीक्षा: अब अहमदाबाद में 17 वर्षीय छात्र ने आत्महत्या की
अहमदाबाद के त्रागड़ इलाके में गुरुवार सुबह राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा स्नातक (नीट-यूजी) की दोबारा परीक्षा की तैयारी कर रहे एक 17 वर्षीय छात्र ने आत्महत्या कर ली.
‘एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस’ के मुताबिक, लड़का अहमदाबाद में अपनी मां और 13 वर्षीय भाई के साथ रहता था, जबकि उसके पिता एक वकील हैं और वे सूरत में रहते हैं और वहीं वकालत करते हैं.
पुलिस के सहायक आयुक्त डी. वी. राणा ने बताया कि नाबालिग की मौत अपनी इमारत से गिरने के कारण आई गंभीर चोटों की वजह से हुई थी. उन्होंने कहा, “सोसाइटी के एक निवासी रात 12:45 बजे अपने घर जा रहे थे, तभी उन्होंने लड़के को इमारत के नीचे पड़ा देखा. यह महसूस करते हुए कि लड़का अभी भी सांस ले रहा है, निवासी ने एम्बुलेंस सेवा को फोन किया. हालांकि, जब पैरामेडिक्स (स्वास्थ्य कर्मी) पहुंचे, तो उन्होंने उसे मृत घोषित कर दिया.”
एसीपी राणा ने कहा, “लड़के के मामा ने बताया कि उसने 12वीं कक्षा पास कर ली थी और पिछली नीट परीक्षा दी थी, जिसे रद्द कर दिया गया था. आत्म-मूल्यांकन (सेल्फ असेससमेंट) में उसे अच्छे अंक मिलने की उम्मीद थी. वह 21 जून को होने वाली नीट की दोबारा परीक्षा भी देने वाला था.”
मामा ने पुलिस को बताया कि वह अंतर्मुखी स्वभाव का था, लेकिन उसे अपनी पढ़ाई या उससे जुड़े किसी दबाव की कोई समस्या नहीं थी. लड़का नीट की दोबारा परीक्षा देने की योजना बना रहा था और उसने फार्मेसी में प्रवेश के लिए एक फॉर्म भी भरा था. मामा ने पुलिस को बताया कि वह ट्यूशन क्लास जाता था जहाँ सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर सख्त पाबंदी थी.
21 जून को नीट दोबारा परीक्षा से पहले राजस्थान, तमिलनाडु, दिल्ली और उत्तराखंड के छात्रों ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली, जिसमें उनके परिवारों और अधिकारियों ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा के बढ़ते अत्यधिक दबाव की ओर इशारा किया है.
कोयंबटूर की एक 19 वर्षीय नीट उम्मीदवार ने रद्द हुई परीक्षा को लेकर डर और तनाव व्यक्त करते हुए अपने रिश्तेदारों को व्हाट्सएप पर एक भावुक संदेश भेजने के बाद बुधवार को कथित तौर पर आत्महत्या कर ली.
दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के पालम इलाके में रेनू नाम की एक अन्य उम्मीदवार ने अपने घर पर कथित तौर पर आत्महत्या कर ली. देहरादून के चंद्रबनी इलाके में मंगलवार को रिया नाम की एक 23 वर्षीय नीट उम्मीदवार ने अपने आवास पर कथित तौर पर आत्महत्या कर ली. इस सप्ताह की शुरुआत में, राजस्थान के सीकर जिले में उमेश माली नाम के एक 22 वर्षीय नीट उम्मीदवार ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी.
उल्लेखनीय है कि मई 3 को आयोजित हुई शुरुआती परीक्षा के पेपर लीक होने के कारण रद्द हो जाने के बाद, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी स्नातक मेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश के इच्छुक छात्रों के लिए 21 जून को नीट यूजी 2026 की दोबारा परीक्षा आयोजित करने जा रही है.
भारत को और अधिक डॉक्टरों और मेडिकल कॉलेजों की आवश्यकता है, न कि अधिक प्रवेश परीक्षाओं की
“आई लव यू, पापा.”
ये उन आखिरी शब्दों में से थे जो कथित तौर पर देहरादून की एक युवा छात्रा अपने पीछे छोड़ गई थी, जिसने भारत की राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) की तैयारी में सालों बिताए थे—जो मेडिकल शिक्षा और चिकित्सा क्षेत्र में करियर का प्रवेश द्वार है. जब उसने आत्महत्या की, तब वह पेपर लीक के आरोपों और परीक्षा प्रक्रिया की ईमानदारी पर बढ़ते संदेहों के बीच दोबारा परीक्षा की तैयारी कर रही थी.
वह महज़ 24 वर्ष की थी और अपनी 12वीं कक्षा में टॉपर रही थी – दूसरे शब्दों में, एक अच्छी और गंभीर छात्रा जिसे ‘भारतीय शिक्षा प्रणाली’ नाम की हत्यारी मशीन ने तोड़ दिया था.
उसकी मृत्यु कोई अकेली त्रासदी नहीं है, बल्कि यह भारतीय शिक्षा प्रणाली की उस क्रूर वास्तविकता को दर्शाती है जो हर साल लाखों युवाओं को एक बेहद कठिन परीक्षा के चक्रव्यूह में धकेल देती है. मध्यमवर्गीय परिवार कोचिंग संस्थानों पर अपनी जीवन भर की कमाई लुटा देते हैं, और कोटा जैसे शहर छात्रों की इसी चिंता और उम्मीदों पर फल-फूल रहे हैं. अक्सर इस पूरी प्रक्रिया को ‘गुणवत्ता बनाए रखने’ के नाम पर सही ठहराया जाता है, लेकिन यह व्यवस्था मेधावी छात्रों को तोड़ने वाली एक मशीन बन चुकी है.
countercurrents.org में सत्य सागर की यह विस्तृत रिपोर्ट भारतीय स्वास्थ्य नीति के एक बड़े विरोधाभासी पहलू को उजागर करती है. एक तरफ भारत दुनिया की लगभग पांचवीं आबादी का घर है, जहाँ बीमारियों का भारी बोझ है और डॉक्टरों की अत्यधिक कमी है. ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खाली पड़े हैं, विशेषज्ञों की भारी किल्लत है और लोग इलाज के लिए झोलाछाप डॉक्टरों पर निर्भर हैं. दूसरी तरफ, हमारा चिकित्सा शिक्षा तंत्र डॉक्टरों को तैयार करने के बजाय, डॉक्टर बनने की इच्छा रखने वाले युवाओं को बाहर निकालने की तकनीक पर काम करता है.
सरकार अक्सर यह दावा करती है कि भारत ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) के डॉक्टर-आबादी अनुपात को हासिल कर लिया है, लेकिन इन आंकड़ों में एलोपैथिक (एमबीबीएस) डॉक्टरों के साथ आयुष प्रणालियों के डॉक्टरों को भी जोड़ दिया जाता है. पारंपरिक प्रणालियों की महत्ता अपनी जगह हो सकती है, लेकिन उन्हें आधुनिक एलोपैथिक डॉक्टरों के साथ गिनने से वास्तविक साक्ष्य-आधारित चिकित्सा की कमी दूर नहीं होती. इसके अलावा, दक्षिण और पश्चिम भारत में मेडिकल कॉलेजों की संख्या अधिक है, जबकि मध्य और पूर्वी भारत अपनी क्षेत्रीय आवश्यकताओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
दशकों से कड़े नियमों, लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं और सीटों के प्रतिबंधों के कारण चिकित्सा शिक्षा को एक दुर्लभ वस्तु बना दिया गया है. इस कृत्रिम कमी को हमेशा ‘मेरिट’ और ‘योग्यता’ के तर्क से सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाता है. हालांकि, नीट जैसी परीक्षाओं की निष्पक्षता अब पूरी तरह संदिग्ध हो चुकी है. पेपर लीक, संगठित नकल गिरोह और भ्रष्टाचार के आरोपों ने जनता के भरोसे को पूरी तरह तोड़ दिया है. जब मेडिकल सीटों को पैसे और रसूख से खरीदा जा सकता है, तो योग्यता की रक्षा के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा का तर्क खोखला साबित होता है. इस विफलता के कारण राजनीतिक स्तर पर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग उठ रही है, लेकिन यह मांग इस गहरे संकट का कोई स्थायी समाधान नहीं है.
दुनिया के कई देशों ने अपनी स्वास्थ्य प्राथमिकताओं को सही दिशा में लागू किया. भारत जैसी विशाल आबादी और क्षेत्रीय असमानता का सामना करने के लिए चीन ने प्रवेश परीक्षाओं को कठिन बनाने के बजाय मेडिकल कॉलेजों का बड़े पैमाने पर विस्तार किया. नए संस्थान खोले और सरकारी निवेश से डॉक्टरों की संख्या बढ़ाई, क्योंकि चीन का मानना था कि डॉक्टरों की कमी का इलाज केवल अधिक डॉक्टर पैदा करना ही है.
सीमित आर्थिक संसाधनों के बाद भी क्यूबा में दुनिया का सबसे बेहतर डॉक्टर-आबादी अनुपात है. वहाँ स्वास्थ्य सेवा को व्यापार के बजाय एक सार्वजनिक भलाई माना जाता है, जिससे वे संकट के समय विदेशों में भी अपनी टीमें भेज पाते हैं.
बिना निजीकरण के केवल सार्वजनिक निवेश के दम पर थाईलैंड ने ‘यूनिवर्सल कवरेज स्कीम’ लागू की. उसने सरकारी राजस्व से पिछड़े इलाकों में डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों को प्रशिक्षित कर तैनात किया. ‘यूनिफाइड हेल्थ सिस्टम’ के जरिए ब्राजील ने स्वास्थ्य को बाजार की वस्तु बनाने के बजाय नागरिकों का संवैधानिक अधिकार बनाया.
जबकि भारत इन वैश्विक मॉडलों के विपरीत अमेरिकी मॉडल की तरफ बढ़ रहा है, जहाँ स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा एक बाजार बन चुके हैं. भारतीय परिवार केंद्र सरकार के वार्षिक शिक्षा बजट (₹1.39 लाख करोड़) की तुलना में निजी शिक्षा पर अपनी जेब से कहीं अधिक (सालाना ₹7.28 लाख करोड़ से ज्यादा) खर्च कर रहे हैं. अमेरिकी मॉडल को अपनाने का नतीजा यह हुआ है कि भारत में चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों महंगे हो गए हैं और पूरा कार्यबल वहाँ केंद्रित है जहाँ मुनाफा ज्यादा है, न कि वहाँ जहाँ जरूरत है.
भारत की प्राथमिकताओं में विरोधाभास को इंजीनियरिंग शिक्षा के उदाहरण से समझाते हुए सत्य सागर कहते हैं कि दशकों से भारत ने आईआईटी और तकनीकी शिक्षा का भारी विस्तार किया, जिसे राष्ट्रीय उपलब्धि माना जाता है. वहाँ कोई यह नहीं कहता कि गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सीटों को कृत्रिम रूप से कम रखा जाए. तो फिर चिकित्सा के साथ ऐसा भेदभाव क्यों? एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर आर्थिक मूल्य बनाता है, लेकिन एक डॉक्टर माँ की जान बचाता है, टीबी का इलाज करता है और शिशु मृत्यु दर को कम करता है. डॉक्टरों का सामाजिक प्रतिफल किसी भी इंजीनियर से कहीं अधिक है.
अब समय आ गया है कि बहस को प्रवेश परीक्षाओं को बदलने के बजाय चिकित्सा शिक्षा के व्यापक विस्तार पर केंद्रित किया जाए. भारत को निम्नलिखित कदम उठाने की आवश्यकता है:
बुनियादी ढांचे का विस्तार: देश को अधिक सरकारी मेडिकल कॉलेजों, जिला-स्तरीय प्रशिक्षण केंद्रों, नर्सिंग स्कूलों और रेजिडेंसी पदों की आवश्यकता है.
अनौपचारिक प्रदाताओं का प्रशिक्षण: इस हकीकत को स्वीकार करना होगा कि ग्रामीण भारत आज भी अनौपचारिक या पारंपरिक चिकित्सकों पर निर्भर है. उन्हें अपराधी घोषित करने या नजरअंदाज करने के बजाय एक राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत ‘ब्रिज कोर्स’ और वैज्ञानिक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि वे बुनियादी जैव-चिकित्सा कौशल सीख सकें। एक अप्रशिक्षित झोलाछाप से बेहतर एक प्रशिक्षित और प्रमाणित स्वास्थ्य कार्यकर्ता होता है.
निष्कर्ष यह है कि भारत सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) के क्षेत्र में वैश्विक महाशक्ति इसलिए बन सका क्योंकि उसने तकनीकी शिक्षा के द्वार सबके लिए खोले. स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी यही चमत्कार तब होगा जब हम ‘कमी की राजनीति’ को छोड़कर ‘प्रचुरता की राजनीति’ को अपनाएंगे. भारत को मेडिकल छात्रों की संख्या कम करने की नहीं, बल्कि लाखों नए डॉक्टरों की आवश्यकता है. लिहाजा, देश में “लाखों मेडिकल कॉलेजों को खिलने देना चाहिए.”
(यह हिंदी में अनुदित सारांश है, अंग्रेजी में मूल रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है)
खड़गे को लेकर भाजपा सांसद की जातिवादी टिप्पणी: ‘एक दलित को आरएसएस की परवाह क्यों होनी चाहिए?’
कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने आरएसएस से कुछ सवाल क्या पूछे, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद रमेश जिगाजिनागी ने उनके खिलाफ एक विवादित और जातिवादी टिप्पणी कर डाली. विजयपुरा में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जिगाजिनागी ने खड़गे की दलित पहचान को निशाना बनाते हुए सवाल किया कि एक दलित नेता होने के नाते उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की परवाह क्यों होनी चाहिए. उन्होंने इस मुद्दे को खड़गे के लिए अप्रासंगिक बताया और कहा कि आरएसएस का पंजीकरण कराना गृह मंत्री का काम नहीं है. इसके साथ ही उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जिसने भी आरएसएस से लोहा लिया है, वह टिक नहीं पाया है.
‘मकतूब’ के मुताबिक, भाजपा सांसद ने प्रियांक खड़गे की योग्यता और गृह मंत्रालय चलाने की उनकी बौद्धिक क्षमता पर भी सवाल उठाए. उन्होंने दावा किया कि खड़गे का राजनीतिक उत्थान केवल उनके पिता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की पार्टी के प्रति लंबी सेवा की वजह से हुआ है, न कि उनकी खुद की क्षमता के कारण.
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को एक खुला पत्र लिखा. इस पत्र में उन्होंने आरएसएस से एक कानूनी संस्था के रूप में औपचारिक पंजीकरण कराने और अपनी पूरी व्यवस्था को पारदर्शी बनाने की मांग की थी. खड़गे ने कहा कि आरएसएस को अपनी कानूनी स्थिति, नेतृत्व संरचना, फंडिंग के स्रोत, खर्च, टैक्स और सार्वजनिक कार्यक्रमों की अनुमतियों की जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए.
आरएसएस की 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए खड़गे ने बताया कि संगठन अकेले कर्नाटक में 4,127 दैनिक शाखाएं, 1,389 साप्ताहिक मिलन और सैकड़ों अन्य कार्यक्रम आयोजित करता है. उन्होंने तर्क दिया कि इतने बड़े पैमाने पर काम करने वाले संगठन को ट्रस्टों, कंपनियों और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओज़) की तरह पारदर्शिता, वित्तीय खुलासे और नियामक अनुपालन के दायरे में आना चाहिए और संवैधानिक मानदंडों के तहत काम करना चाहिए.
सहयोगियों द्वारा क्रॉस-वोटिंग से कांग्रेस ने झारखंड में राज्यसभा सीट गंवाई, खड़गे के सचिव को शिकस्त
झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस को अपने ही ‘इंडिया’ गठबंधन के सहयोगियों की क्रॉस-वोटिंग के कारण बड़ा झटका लगा है. इस चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के उम्मीदवार बैद्यनाथ राम ने आसानी से जीत दर्ज की, जबकि दूसरी सीट पर एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार और रिलायंस इंडस्ट्रीज के कॉपोर्रेट मामलों के निदेशक परिमल नथवाणी विजयी रहे. नथवाणी ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के सचिव प्रणव झा को शिकस्त दी.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के अनुसार, 81 सदस्यीय विधानसभा में जीत के लिए प्रथम वरीयता के 28 वोटों की आवश्यकता थी. जेएमएम गठबंधन के पास कुल 56 विधायक थे, जिससे दोनों उम्मीदवारों की जीत तय मानी जा रही थी. हालांकि, चुनाव परिणाम में बैद्यनाथ राम और परिमल नथवाणी दोनों को 30-30 वोट मिले (दो वोट अमान्य), जबकि कांग्रेस के प्रणव झा केवल 21 वोट ही हासिल कर सके.
इस हार के बाद कांग्रेस ने अपने सहयोगियों पर “विश्वासघात” और भाजपा पर “खरीद-फरोख्त” का आरोप लगाया. कांग्रेस का दावा है कि राजद के चार और भाकपा (माले) लिबरेशन के दो विधायकों ने उनके पक्ष में मतदान नहीं किया.
पार्टी महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य और विधायक अरूप चटर्जी ने कांग्रेस के आरोपों को पूरी तरह खारिज किया. उन्होंने कहा कि उनके दोनों विधायकों ने तय रणनीति के तहत कांग्रेस को ही वोट दिया था और छोटी पार्टियों पर बिना तथ्यों के उंगली उठाना गलत है. राजद के प्रवक्ता सुबोध कुमार मेहता ने कहा कि जेएमएम की जीत से गठबंधन मजबूत है और वे हार की परिस्थितियों का आकलन कर रहे हैं. चौथी बार राज्यसभा पहुंचने पर नथवाणी ने भावुक पोस्ट साझा कर विधायकों का आभार माना और झारखंड को अपनी कर्मभूमि बताते हुए विकास का संकल्प दोहराया.
भारत में देशव्यापी बारिश में 41% की कमी, महाराष्ट्र के ऊपर रुका दक्षिण-पश्चिम मानसून
भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून के दक्षिणी महाराष्ट्र में रुकने के कारण 4 से 18 जून के बीच देश में 41% बारिश की कमी दर्ज की गई है. इस दौरान सामान्य 72.2 मिमी के मुकाबले केवल 42.6 मिमी वर्षा हुई. क्षेत्र-वार देखा जाए तो मध्य भारत में 67%, पूर्व और पूर्वोत्तर में 42%, दक्षिणी प्रायद्वीप में 22% और उत्तर-पश्चिम भारत में 6% की कमी आई है. अनुकूल मौसमी दशाओं की कमी के कारण मानसून आगे नहीं बढ़ पा रहा है.
धीमी गति के मुख्य कारण हैं: अरब सागर में मानसून प्रवाह में नमी और व्यापक बारिश लाने वाले मजबूत उछाल की कमी है. अरब सागर के ऊपर दक्षिण-पश्चिमी हवाएं कमजोर पड़ने से तटीय व आंतरिक महाराष्ट्र में नमी कम हुई है, पश्चिमी हिंद महासागर और अरब सागर के ऊपर मुख्य नमी स्रोत कमजोर हो गया है, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में कम दबाव के क्षेत्र, चक्रवाती परिसंचरण और ‘ऑफशोर ट्रफ’ गायब हैं, मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन के निष्क्रिय होने से दक्षिण भारत में पर्याप्त बादल नहीं बन पा रहे हैं.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, मानसून की इस धीमी रफ्तार और प्रशांत महासागर में अल नीनो के उभरने से खरीफ फसलों पर संकट मंडरा रहा है. स्थिति को देखते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रभावित जिलों की पहचान कर राज्य सरकारों के साथ मिलकर ‘आकस्मिक योजना’ बनाने के निर्देश दिए हैं.
कैथोलिक चर्च ने विदेशी अंशदान विधेयक पर फिर जताई चिंता, 28 जून को राष्ट्रीय प्रार्थना दिवस का आव्हान
भारत में कैथोलिक चर्च ने प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है. इसके विरोध में आगामी 28 जून को देशव्यापी ‘राष्ट्रीय प्रार्थना दिवस’ मनाने का निर्णय लिया गया है. ‘कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया’ (सीबीसीआई) के अध्यक्ष कार्डिनल एंथनी पूला द्वारा जारी एक परिपत्र में सभी ईसाई समुदायों से एकजुट होकर प्रार्थना करने, उपवास रखने और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के माध्यम से केंद्र सरकार को विरोध-ज्ञापन सौंपने का आग्रह किया गया है. चर्च का मानना है कि इस कानून से उनके द्वारा संचालित धर्मार्थ, शैक्षणिक और स्वास्थ्य सेवाओं पर बेहद नकारात्मक असर पड़ेगा.
‘द टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा 25 मार्च को लोकसभा में पेश किया गया यह विधेयक कई वजहों से विवादों में है. अल्पसंख्यक संगठनों का आरोप है कि यह कानून शक्तियों के अत्यधिक केंद्रीकरण और अधिकारियों के विवेकाधीन हस्तक्षेप को बढ़ावा देता है. सीबीसीआई के महासचिव महाधर्माध्यक्ष अनिल जे.टी. कूटो के अनुसार, विधेयक में पूजा स्थलों को तो सीमित सुरक्षा दी गई है, लेकिन धर्मार्थ और शैक्षणिक संस्थानों के लिए किसी सुरक्षा उपाय का प्रावधान नहीं है. इससे संस्थाओं के आंतरिक प्रबंधन में सरकारी दखल का खतरा बढ़ेगा.
कांग्रेस सहित प्रमुख विपक्षी दलों ने इस विधेयक को अल्पसंख्यकों, नागरिक समाजों और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओज़) पर सीधा हमला बताया है. विपक्ष इसकी तुलना वक्फ (संशोधन) विधेयक से कर रहा है, जिससे ईसाई समुदाय में असुरक्षा की भावना पैदा हो सकती है. इस सिलसिले में तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और कांग्रेस नेता के.सी. वेणुगोपाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इसे वापस लेने की मांग की है. संसद में भी विपक्ष द्वारा इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया जा चुका है.
रथिन रॉय | औसत दर्जे के दायरे में फंसा भारत एक गंभीर रोजगार और मजदूरी संकट का सामना कर रहा है
‘द इकनॉमिक टाइम्स’ में रथिन रॉय ने लिखा है कि भारत की अर्थव्यवस्था मंदी का सामना कर रही है. ऊंची विकास दर और कम मुद्रास्फीति (महंगाई) ने कमजोर मांग और खराब उत्पादकता जैसी अंतर्निहित समस्याओं को छिपा रखा है. यह स्थिति भारत को एक ‘मध्यम-आय के जाल’ की ओर धकेल रही है, जिस रास्ते पर पहले भी अन्य देश चल चुके हैं. बाहरी झटके रोजगार और मजदूरी के संकट जैसी संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर कर रहे हैं.
रॉय के मुताबिक, भारतीय अर्थव्यवस्था एक प्रकार के ‘सिज़ोफ्रेनिया’ (विरोधाभासी स्थिति) से पीड़ित है, जो बाहरी आर्थिक झटकों के कारण और बढ़ गई है. विकास दर ऊंची है, उपभोक्ता मुद्रास्फीति कम है. लेकिन घरेलू निवेशक सतर्क रुख अपनाए हुए हैं (निवेश करने से कतरा रहे हैं) और विदेशी निवेशक बाहर निकलने की होड़ में हैं. शेयर बाजार में गिरावट का रुख है. हमारे बेहतरीन संस्थानों से नए पास-आउट स्नातक ऐसी शुरुआती नौकरियों को स्वीकार कर रहे हैं, जो उन्हें आयकर भुगतान के योग्य बनाने जितना वेतन भी नहीं देती हैं.
दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, कुछ ही महीनों में सिमटकर छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई है. वैश्विक निवेशक दो विकास क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं: एआई और कमोडिटीज. भारत दोनों में से किसी में भी प्रमुख खिलाड़ी नहीं है.
यह स्थिति 2019 से ही पूर्वानुमानित थी. आंतरिक रूप से, भारत लंबे समय से दो संरचनात्मक समस्याओं का सामना कर रहा है: स्थिर (रुकी हुई) घरेलू मांग और कम उत्पादकता. अच्छे समय में, कोई भी इन पर पर्दा डाल सकता है और भविष्य के दावों के साथ ‘सभ्यतागत गौरव’ की अफीम में इंद्रियों को सुन्न करके शेखी बघार सकता है.
लेकिन जैसे ही कोई बाहरी संकट आता है, चीजें बिखरने लगती हैं. विदेशी निवेशक और राजनीतिक नेता ढोंगी चाटुकारिता (चापलूसी) को छोड़कर सीधे-सीधे तिरस्कार पर उतर आते हैं. अंधभक्त आलोचक बन जाते हैं और घबराहट फैलने लगती है.
लेकिन यह घबराहट बेवजह है. आर्थिक औसत दर्जे की ओर भारत का यह पूर्वानुमानित झुकाव, मध्यम-आय के जाल की ओर जाने वाले एक पहले से तय रास्ते पर ही आगे बढ़ रहा है. ब्राजील से लेकर मिस्र, थाईलैंड और फिलीपींस जैसे देशों ने इसी राह को चुना है, जिसकी अक्सर अनदेखी कर दी जाती है, क्योंकि दक्षिण कोरिया, चीन और ताइवान की शानदार सफलताओं को ही प्रमुखता से दिखाया जाता है. आखिर दुखद खबरें किसे पसंद आती हैं?
मध्यम-आय के जाल का रास्ता संरचनात्मक कमजोरी के बावजूद, उच्च विकास दर और कम मुद्रास्फीति (महंगाई) के दौर से चिन्हित होता है. विदेशी निवेशक किसी अर्थव्यवस्था को ‘अगली बड़ी चीज’ बताकर उसकी खूब तारीफ करते हैं — लेकिन संकट आते ही वे उसे छोड़ देते हैं, क्योंकि संकट उन अंतर्निहित कमजोरियों को उजागर कर देता है जो हमेशा एक जैसी होती हैं: एक संरचनात्मक मांग की समस्या और लगातार बनी रहने वाली कम उत्पादकता.
कमजोर सत्तावादी शासन अक्सर तब सत्ता में आते हैं जब नागरिक असमानता बढ़ाने वाली प्रगति से निराश होते हैं. लेकिन ये शासन इन कमजोरियों पर पर्दा डालने के लिए केवल ध्रुवीकरण, नारे और अहंकार ही प्रदान करते हैं. लेकिन जब कोई बाहरी संकट आता है, तो ये बेअसर साबित होते हैं.
अर्थव्यवस्था 7.5%+ की दर से बढ़ रही है, और मुद्रास्फीति (महंगाई) निचले एकल अंक में है. यह एक शानदार समष्टि आर्थिक परिणाम है. लेकिन यह क्या दे रहा है? जब कोई विकासशील देश समृद्ध होता है, तो विकास के परिणामस्वरूप सकारात्मक संरचनात्मक बदलाव आते हैं: उत्पादन का मूल्य बढ़ता है, साथ ही औपचारिक क्षेत्र और विनिर्माण की हिस्सेदारी भी बढ़ती है. भारत में ऐसा नहीं हुआ है.
जीडीपी में विनिर्माण का हिस्सा इस सदी के सबसे निचले स्तर पर आ गया है. चूंकि एआई के उभार के साथ आईटी क्षेत्र की रफ्तार थम गई है, इसलिए अनौपचारिक सेवाएं—व्यक्तिगत और मध्यवर्ती सेवाएं—विकास की रीढ़ रही हैं. परिणामस्वरूप, रोजगार ठहर सा गया है.
भारत एक गंभीर रोजगार और मजदूरी संकट का सामना कर रहा है. युवाओं ने इसका सबसे अधिक प्रभाव महसूस किया है. आबादी का केवल 7% हिस्सा ही अब इतना समृद्ध है कि वह आयकर (इनकम टैक्स) दे सके, और नौकरी के बाजार में प्रवेश करने वाले किसी भी युवा को—भले ही उसके पास पेशेवर या स्नातकोत्तर योग्यताएं हों—इतना वेतन नहीं दिया जाता कि वह सबसे निचले टैक्स स्लैब में भी आ सके. सैमसंग या ऐप्पल में एक शीर्ष ब्लू-कॉलर (शारीरिक श्रम वाली) नौकरी के लिए प्रति माह ₹25,000 से कम मिलते हैं, जो आयकर सीमा का एक-चौथाई हिस्सा है.
लिहाजा, अर्थव्यवस्था में मांग कमजोर है. एक बार जब कंपनियां अमीरों की मांग को पूरा कर लेती हैं, तो कीमतों में छोटे बदलाव भी अत्यधिक आपूर्ति का कारण बनते हैं, जैसा कि हाल ही में इंडिगो और एयर इंडिया ने महसूस किया है, और ऑटोमोबाइल व एफएमसीजी कंपनियों ने भी देखा है. कम निवेश का मतलब है पूंजीगत वस्तुओं की कम मांग. ऋण-आधारित (न कि मजदूरी-आधारित) खपत का मतलब है विवेकाधीन खरीदारी के मामले में अत्यधिक मूल्य संवेदनशीलता. इसके साथ ही भोजन की कम मांग को जोड़ दें, तो आपको कम मुद्रास्फीति देखने को मिलती है. लेकिन यह आर्थिक कमजोरी का संकेत है, ताकत का नहीं.
उच्च जीडीपी वृद्धि जो अधिक और बेहतर नौकरियों में तब्दील नहीं होती है, और कमजोर मांग के कारण कम मुद्रास्फीति का परिणाम देती है, वह मध्यम-आय के जाल का संकेत देती है. ब्राजील से लेकर मिस्र और थाईलैंड तक, अपर्याप्त संरचनात्मक परिवर्तन के कारण कम उत्पादकता, और व्यापक रूप से मजदूरी में कटौती व लगातार बनी रहने वाली अनौपचारिकता के कारण कमजोर मांग ने मिलकर एक ऐसी स्थिति पैदा की जहाँ, आय में वृद्धि के बावजूद, ये देश औसत दर्जे के दायरे में फंसे रहे.
खराब शिक्षा और स्वास्थ्य, झुग्गी-बस्तियां, उच्च अपराध दर, कमजोर संस्थाएं—जो कि एक कम आय वाले देश की पहचान हैं—किसी देश के मध्यम-आय का स्तर प्राप्त करने के बाद भी बनी रहती हैं. हर बाहरी झटके के साथ हर किसी का जीवन अस्थिर हो जाता है. संस्थाएं बिगड़ने लगती हैं.
बाहरी झटका बस इन चीजों को सुर्खियों में ला देता है क्योंकि सरकारों के पास विकल्प खत्म हो जाते हैं. तेल की कीमतों में वृद्धि का मतलब चालू खाता घाटा (सीएडी) का बढ़ना है. कम उत्पादकता का मतलब है कि निर्यात में वृद्धि करके या चीनी आयातों (यहाँ तक कि गणेश मूर्तियों तक) के आयात प्रतिस्थापन के माध्यम से उस घाटे को कम करना व्यवहार्य नहीं है. और घरेलू निजी निवेश सुस्त है.
इसलिए, हम चाहते हैं कि विदेशी निवेश चालू खाता घाटा (सीएडी) की भरपाई करे. लिहाजा, दूसरा उपाय—मूल्य में भारी गिरावट—कोई विकल्प नहीं रह जाता. हम जितना अधिक अवमूल्यन करेंगे, विकास दर चाहे जो भी हो, विदेशियों के लिए निवेश के प्रस्ताव के रूप में भारत उतना ही कम आकर्षक होगा. इसलिए, भारत सरकार को विदेशियों को विदेशी मुद्रा हेज और अन्य आकर्षक शर्तों की पेशकश करके भारत में निवेश करने के लिए लुभाना पड़ता है. लेकिन इसमें से कुछ भी आर्थिक समृद्धि में सुधार नहीं करेगा, क्योंकि इनमें से कोई भी कम उत्पादकता, ठहरे हुए रोजगार, मजदूरी और इसके परिणामस्वरूप कमजोर मांग को प्रभावित नहीं करता है.
निराशाजनक, औसत दर्जे के देश की इस रणनीति में आपका स्वागत है. हमारे जीवनकाल में कई देशों ने इस रणनीति को अपनाया है. हम शायद 2019 में इस औसत दर्जे के खेल के खिलाड़ी रहे होंगे. अहंकार में डूबे होने के कारण किसी ने नहीं सुना. अब, एक संकट आ गया है और यह अपने साथ अनुमानित उदासी लेकर आया है.
कहा जाता है कि मिनर्वा का उल्लू (ज्ञान का प्रतीक) शाम ढलने पर ही उड़ान भरता है. कोई उम्मीद करता है कि वह वास्तव में उड़ान भरे. क्योंकि अगर वह अब भी अहंकार के घोंसले में ही बैठा रहा, तो इसका मतलब आने वाली पीढ़ियों के जीवन और संभावनाओं को स्थायी, अपरिवर्तनीय आर्थिक नुकसान पहुंचना होगा.
(रथिन रॉय प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य हैं. अंग्रेजी में उनका लेख यहां पढ़ा जा सकता है.)
ईरान युद्ध के बाद भारत-अमेरिका रिश्तों में दरार, भरोसे का संकट गहराया
अमेरिकी पत्रिका फॉरेन पॉलिसी में प्रकाशित एक विश्लेषण में कहा गया है कि ईरान युद्ध भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन इसके कारण भारत और अमेरिका के रिश्तों में आई खटास लंबे समय तक बनी रह सकती है. लेखक का तर्क है कि हालिया घटनाओं ने दोनों देशों के बीच मौजूद रणनीतिक भरोसे को गंभीर नुकसान पहुंचाया है.
लेख के अनुसार, तनाव की शुरुआत तब हुई जब 9 जून को ओमान की खाड़ी में अमेरिकी हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई. भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से इस घटना पर कड़ा विरोध दर्ज कराया, लेकिन अमेरिका की ओर से न तो माफी मांगी गई और न ही भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने का कोई आश्वासन दिया गया. इससे नई दिल्ली में असंतोष बढ़ा.
विश्लेषण में कहा गया है कि ईरान युद्ध का सबसे बड़ा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ा. भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 89 प्रतिशत आयात करता है, इसलिए युद्ध के दौरान तेल की कीमतों में उछाल ने महंगाई बढ़ा दी. उर्वरक, रसोई गैस और अन्य आयातित वस्तुएं महंगी हुईं. पश्चिम एशिया में काम कर रहे भारतीयों से आने वाली धनराशि (रेमिटेंस) भी प्रभावित हुई. इसके साथ ही समुद्री व्यापार की लागत बढ़ने और आपूर्ति श्रृंखलाओं में बाधा आने से भारतीय निर्यात क्षेत्र पर दबाव बढ़ा.
लेख में दावा किया गया है कि इन परिस्थितियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को झटका दिया, रुपये पर दबाव बढ़ा और विदेशी निवेशकों ने पूंजी निकालनी शुरू कर दी. ऐसे समय में सरकार के लिए राहत पैकेज या बड़े सार्वजनिक निवेश कार्यक्रम चलाना भी मुश्किल हो गया है.
राजनीतिक स्तर पर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने चुनौती बढ़ी है. लेखक के अनुसार, मोदी ने लंबे समय से भारत को एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है, लेकिन भारतीय नाविकों की मौत और क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या भारत अपने नागरिकों और अपने समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित कर पा रहा है.
लेख पाकिस्तान की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताता है. लेखक के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई, जिससे इस्लामाबाद की कूटनीतिक अहमियत बढ़ी. यह भारत की उस नीति के उलट माना गया है जिसके तहत वह पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की कोशिश करता रहा है.
मई में भारत आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की यात्रा को भी इस पृष्ठभूमि में देखा गया है. लेख का कहना है कि दोनों देशों ने सार्वजनिक रूप से रिश्तों को मजबूत बताया, लेकिन वास्तविक उपलब्धियां सीमित रहीं. वहीं अमेरिका द्वारा भारत से अगले पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर के अमेरिकी सामान खरीदने की अपेक्षा भी नई दिल्ली के लिए असहज करने वाली मानी गई.
विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की रणनीति बदल रही है. ट्रंप प्रशासन चीन के खिलाफ व्यापक रणनीतिक गठबंधन की जगह अधिक लेन-देन आधारित संबंधों पर जोर दे रहा है. इसका असर क्वाड और भारत-अमेरिका साझेदारी पर भी पड़ सकता है.
हालांकि रक्षा सहयोग, संयुक्त सैन्य अभ्यास और महत्वपूर्ण तकनीकों पर काम जैसी परियोजनाएं जारी रहेंगी, लेकिन लेखक का मानना है कि भरोसे की कमी इन पहलों की गति को धीमा कर सकती है. लेख के अंत में कहा गया है कि भारत को अब केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय अपनी घरेलू आर्थिक और सामरिक क्षमता मजबूत करनी होगी तथा वैश्विक स्तर पर अपने विकल्पों का विस्तार करना होगा.
नेतन्याहू और मोदी: एक असंभावित गठबंधन का निर्माण
जैसे-जैसे ग़ज़ा को लेकर बढ़ते गुस्से के बीच इजरायल का वैश्विक अलगाव बढ़ रहा है, भारत के साथ उसके संबंध गहरे होते जा रहे हैं; जिसे प्रधानमंत्री मोदी और नेतन्याहू के समान विश्वदृष्टिकोण से मदद मिल रही है. ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ में माइकल स्टॉट, एंड्रेस शिपाणी और जेम्स शोटर ने लिखा है: जब अक्टूबर 2023 में हमास के आतंकवादियों ने इजरायल पर हमला किया, जिसमें लगभग 1,200 लोग मारे गए, तो इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को पहला फोन कॉल अमेरिका या यूरोप से नहीं, बल्कि नई दिल्ली से आया था. बातचीत की पुष्टि करने वाले इस मामले से वाकिफ दो लोगों के अनुसार, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना समर्थन व्यक्त करने के लिए इस बातचीत का उपयोग किया.
मोदी का यह कदम उस मजबूत बंधन का प्रतीक था जो पिछले 12 वर्षों में उनके और नेतन्याहू के बीच विकसित हुआ है. इसकी जड़ें इस बात में हैं कि दोनों नेता खुद को आतंकवाद के खिलाफ साझा लड़ाई के रूप में कैसे देखते हैं, साथ ही अपने देशों को अपने धार्मिक बहुसंख्यकों के लिए मातृभूमि के रूप में देखने के उनके दृष्टिकोण में भी हैं.
आलोचकों का तर्क है कि दोनों नेताओं में सत्तावादी प्रवृत्तियाँ भी समान हैं. दोनों ने अपने-अपने देशों में दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया है, जिसमें उनके आलोचकों का कहना है कि मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यकों के प्रति शत्रुता तेज हुई है, स्वतंत्र संस्थानों की शक्ति कमजोर हुई है और विदेशी गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) की गतिविधियों को प्रतिबंधित किया गया है.
रक्षा और सुरक्षा साझेदारी
यह साझेदारी खुफिया जानकारी साझा करने, निगरानी, हथियारों की बिक्री, संयुक्त विकास, व्यापार, कृषि प्रौद्योगिकी और सांस्कृतिक संबंधों तक फैली हुई है. राजनयिकों का कहना है कि मोदी और नेतन्याहू नियमित रूप से बात करते हैं और एक-दूसरे को अच्छी तरह समझते हैं.
भारतीय सेना द्वारा व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली बराक एंटी-मिसाइल प्रणाली का निर्माण कई कंपनियों द्वारा संयुक्त रूप से किया जाता है, जिसमें इजरायल की राफेल और आईएआई और भारत की भारत डायनेमिक्स तथा भारत फोर्ज की एक सहायक कंपनी शामिल है. इजरायल की मोसाद जासूसी एजेंसी इस्लामी चरमपंथियों की तलाश में भारत की विदेशी खुफिया सेवा के साथ सहयोग करती है.
वैश्विक दृष्टिकोण में बदलाव
गौतम अडानी, जो भारत के सबसे अमीर व्यक्ति हैं, के पास इजरायल के एल्बिट के साथ काम करने वाली कंपनियां हैं, जो हेमीज़ टोही ड्रोन विकसित और निर्मित करती हैं. इसके अलावा इजरायल वेपन्स इंडस्ट्रीज भारत में छोटे हथियार बनाने के लिए सहयोग करती है.
भारतीय अधिकारी अब इजरायल की सेना के मुख्यालयों में लगातार आते-जाते रहते हैं. एक वरिष्ठ भारतीय सरकारी अधिकारी ने कहा, “रक्षा वास्तव में वह चीज़ है जो इजरायल के साथ इस रिश्ते को मजबूती देती है.
(यह हिंदी में अनुदित सारांश है. अंग्रेजी में पूरा लेख यहां पढ़ा जा सकता है.)
हाईकोर्ट ने ‘दुर्भावना’ का जिक्र कर मंदिर के पास चर्च के निर्माण पर लगाई रोक
यह मानते हुए कि एक हिंदू मंदिर के आसपास के क्षेत्र में चर्च बनाने के प्रस्ताव में दुर्भावनापूर्ण इरादे से इनकार नहीं किया जा सकता, मद्रास हाईकोर्ट ने कोयंबटूर में इसके निर्माण पर रोक लगा दी है.
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में सुरेशकुमार की रिपोर्ट है कि जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायणन की खंडपीठ ने कहा, “कोयंबटूर एक सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील शहर है. इसने बम विस्फोट और खूनी धार्मिक दंगे देखे हैं. प्रस्तावित चर्च मौजूदा मरिअम्मन मंदिर से कुछ ही दूरी पर (पत्थर फेंकने जितनी दूरी पर) बनने वाला था. वहाँ केवल मुट्ठी भर ईसाई परिवार हैं. यदि मरिअम्मन मंदिर के आसपास के क्षेत्र में एक बड़े चर्च के निर्माण का प्रस्ताव है, तो दुर्भावनापूर्ण इरादों से इनकार नहीं किया जा सकता.”
अदालत ने कहा कि वह याचिकाकर्ता की इस दलील को भी रिकॉर्ड पर लेगी कि जब से सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व में एक नई सरकार बनी है, “तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में पोस्टर सामने आए हैं जिनमें ‘हर गाँव में चर्च के निर्माण’ का आव्हान किया गया है.”
यह अंतरिम आदेश एन. बालासुब्रमण्यम की याचिका पर पारित किया गया था. “याचिकाकर्ता ने संकेत दिया है कि नई इमारत के धर्मांतरण गतिविधियों का केंद्र होने की संभावना है. हम एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र हैं. हम एक बहुलवादी समाज हैं. धार्मिक सौहार्द को बनाए रखा जाना चाहिए. यदि कोई धार्मिक अधिकार स्थापित होता है, तो उसके प्रवर्तन (लागू करने) में सहायता करना राज्य का कर्तव्य है,” न्यायाधीशों ने कहा.
अदालत ने कहा कि स्थिति अलग होती यदि निर्माण का प्रस्ताव ऐसी पट्टा भूमि पर होता जिसका मालिकाना हक निर्विवाद होता, तत्काल आसपास के क्षेत्र में किसी अन्य समुदाय का कोई धार्मिक ढांचा नहीं होता या यदि कोई विरोध नहीं होता. हालांकि, वर्तमान मामले में, राजस्व रिकॉर्ड से संकेत मिलता है कि वह स्थान एक सार्वजनिक सड़क थी, वह स्थान एक पुराने मंदिर के बहुत करीब था, और इसका कड़ा विरोध हो रहा था, हाईकोर्ट ने आगे कहा.
अदालत ने याचिकाकर्ता की इस दलील को भी रिकॉर्ड पर लिया कि तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष जे.सी.डी. प्रभाकर ने विधानसभा में अपने उद्घाटन भाषण में बाइबिल की आयतों को उद्धृत किया था और विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म के उन्मूलन का आव्हान किया था.
आया राम, गया राम से आगे: कैसे दल-बदल और पार्टी विभाजन भारतीय राजनीति की वैध सत्ता-रणनीति बन गए हैं
एक समय था जब “आया राम, गया राम” भारतीय राजनीति में अवसरवाद और विश्वासघात का प्रतीक माना जाता था. दल-बदल और पार्टी विभाजन को लोकतंत्र के लिए खतरा समझा जाता था. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह तस्वीर बदल गई है. आज कानूनी प्रावधान, चुनावी नतीजे और राजनीतिक व्यवहार यह संकेत देते हैं कि दल-बदल और राजनीतिक पुनर्संरेखण भारतीय राजनीति का सामान्य हिस्सा बन चुके हैं.
साउथ फर्स्ट में पी. वी. कोंडल राव लिखते हैं, महाराष्ट्र में जून 2026 में शिवसेना (यूबीटी) के भीतर पैदा हुआ संकट इसका ताजा उदाहरण है. उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी के कई सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में जाने की खबरों ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है. बताया जा रहा है कि यदि दो-तिहाई सांसद अलग गुट के पक्ष में खड़े हो जाते हैं तो दल-बदल विरोधी कानून के तहत उन्हें अयोग्यता से सुरक्षा मिल सकती है.
उद्धव ठाकरे और उनके सहयोगी इसे राजनीतिक खरीद-फरोख्त और विश्वासघात बता रहे हैं. लेकिन दूसरी ओर यह भी तर्क दिया जा रहा है कि यह पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष, नेतृत्व शैली को लेकर नाराजगी और बदलते राजनीतिक समीकरणों का परिणाम है. इस दृष्टिकोण से देखें तो यह केवल बगावत नहीं, बल्कि राजनीतिक पुनर्संरेखण की प्रक्रिया है.
लगभग एक जैसी पटकथा वाले विभाजन
महाराष्ट्र की राजनीति में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है. 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना के विधायकों ने उद्धव ठाकरे सरकार के खिलाफ विद्रोह किया था. इसके बाद शिंदे गुट ने न केवल सत्ता हासिल की बल्कि निर्वाचन आयोग से शिवसेना का नाम और धनुष-बाण चुनाव चिह्न भी प्राप्त कर लिया. बाद में महायुति गठबंधन ने 2024 के विधानसभा चुनावों में स्पष्ट बहुमत हासिल किया.
राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में भी 2023 में लगभग ऐसा ही हुआ. अजित पवार बड़ी संख्या में विधायकों के साथ अलग हुए और भाजपा-शिवसेना गठबंधन में शामिल हो गए. निर्वाचन आयोग ने बाद में पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न उनके गुट को दे दिया. इन घटनाओं ने यह धारणा मजबूत की कि भारतीय राजनीति में संख्या बल और संगठनात्मक नियंत्रण अक्सर वैचारिक विरासत से अधिक महत्वपूर्ण हो चुके हैं.
आम आदमी पार्टी भी इस प्रवृत्ति से अछूती नहीं रही. 2026 में पार्टी के कुछ राज्यसभा सांसदों ने भाजपा का दामन थाम लिया. उन्होंने नेतृत्व के केंद्रीकरण और संगठनात्मक समस्याओं को इसका कारण बताया. इससे यह स्पष्ट हुआ कि नई राजनीति का दावा करने वाले दल भी आंतरिक असंतोष और टूटन से सुरक्षित नहीं हैं.
वैध होती राजनीतिक तरलता और उसके सकारात्मक पहलू
महाराष्ट्र के ये उदाहरण पूरे देश में दिखाई दे रही एक व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा हैं. कांग्रेस नेताओं का भाजपा में जाना, क्षेत्रीय दलों के नेताओं का नए राजनीतिक मंचों की ओर बढ़ना और छोटे दलों के लगातार बदलते गठबंधन अब सामान्य राजनीतिक घटनाएं बन चुकी हैं.
संविधान की दसवीं अनुसूची में मौजूद विलय संबंधी प्रावधान, निर्वाचन आयोग के फैसले और न्यायपालिका की सीमित दखलंदाजी ने इस राजनीतिक तरलता को वैधता प्रदान की है. इसके कारण दल-बदल को केवल नैतिक प्रश्न के रूप में नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति के रूप में भी देखा जाने लगा है.
हालांकि इसके खतरे भी हैं. खरीद-फरोख्त, धनबल और जनादेश के साथ खिलवाड़ जैसे आरोप लगातार लगते रहे हैं. जब निर्वाचित प्रतिनिधि कार्यकाल के बीच दल बदलते हैं तो मतदाताओं के बीच अविश्वास बढ़ सकता है. इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ता है.
फिर भी हर राजनीतिक विभाजन को लोकतंत्र विरोधी मान लेना उचित नहीं होगा. कई बार दलों के भीतर नेतृत्व संकट, वैचारिक भ्रम और बदलती जन अपेक्षाएं ऐसे पुनर्संरेखण को जन्म देती हैं. अंततः इन फैसलों की वास्तविक परीक्षा चुनावों में होती है, जहां मतदाता तय करते हैं कि किस राजनीतिक गठबंधन या नेतृत्व को स्वीकार करना है.
भारतीय राजनीति आज पहले से कहीं अधिक गतिशील और लचीली हो चुकी है. महाराष्ट्र में चल रहा “ऑपरेशन टाइगर” इसी नई राजनीतिक वास्तविकता का हिस्सा है. यह केवल एक और बगावत नहीं, बल्कि उस दौर का संकेत है जिसमें दल-बदल और राजनीतिक पुनर्संरेखण भारतीय लोकतंत्र के नए सामान्य बन चुके हैं.
पश्चिम बंगाल से महाराष्ट्र तक विपक्ष के टूटने की आशंका
पश्चिम बंगाल की राजनीति में चल रहा मौजूदा संकट केवल दल-बदल या टूट का पुराना भारतीय राजनीतिक किस्सा नहीं है. मई के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जीत के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर जो हलचल दिख रही है, वह एक नए तरह के सत्ता-संयोजन और विपक्ष के विघटन की दिशा में इशारा करती है. यह केवल विधायकों या सांसदों के पाला बदलने की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे संगठन और राजनीतिक विरासत के एक साथ खींच लिए जाने की प्रक्रिया बनती जा रही है.
‘नीलाद्रि चटर्जी और अरिल्ड एंगेल्सेन रूड’ के मुताबिक, ताजा घटनाक्रम अभी पूरी तरह स्थिर नहीं है, लेकिन संकेत गंभीर हैं. तृणमूल के एक बागी नेता रितब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि 80 में से 65 विधायक उनके साथ हैं. लोकसभा में पार्टी के 28 में से 20 सांसदों ने कथित तौर पर एक छोटे सहयोगी दल में विलय की इच्छा जताई है. राज्यसभा में भी कुछ इस्तीफों के बाद स्थिति और कमजोर दिख रही है. यह सिर्फ संख्या का संकट नहीं, बल्कि संगठनात्मक नियंत्रण के टूटने का संकेत है.
भारत की राजनीति अब तक व्यक्तिगत दल-बदल की आदी रही है. नेता एक-एक करके पाला बदलते रहे हैं और नई पार्टी उन्हें अपने वोट बैंक और संगठन के साथ समाहित कर लेती है. लेकिन इसमें कानूनी अड़चनें और नैतिक असहजता दोनों रहे हैं. यह प्रक्रिया धीमी होती थी और मतदाताओं के लिए जवाबदेही का सवाल भी खड़ा करती थी.
लेकिन बंगाल में जो नया मॉडल उभरता दिख रहा है, उसे कुछ विश्लेषक “पार्टी एब्ज़ॉर्प्शन” कह रहे हैं. यानी अब लक्ष्य केवल व्यक्ति नहीं है, बल्कि पूरी पार्टी संरचना है. विधायक, सांसद, बूथ स्तर के कार्यकर्ता, स्थानीय नेटवर्क और राजनीतिक विरासत तक को एक साथ खींचकर सत्ता के नए केंद्र में समाहित करने की कोशिश. यह केवल विभाजन नहीं, बल्कि विपक्ष को उपयोगी बनाकर उसकी स्वतंत्रता खत्म करने की रणनीति है.
इस प्रक्रिया की खास बात यह है कि बागी सिर्फ तृणमूल छोड़ नहीं रहे हैं, बल्कि उसकी विरासत पर दावा भी कर रहे हैं. वे अभी भी पार्टी के संगठनात्मक वजन और ममता बनर्जी की प्रतीकात्मक सत्ता को अपने साथ जोड़कर चलने की कोशिश कर रहे हैं. यह एक तरह से पुरानी पार्टी बनाम नई व्याख्या की लड़ाई बन जाती है.
यह भी दिलचस्प है कि इस पूरे विमर्श में ममता बनर्जी का प्रतीकात्मक प्रभाव बरकरार रखा जा रहा है, जबकि निशाने पर संगठनात्मक उत्तराधिकारी हैं. बागियों की दलील है कि शुरुआती तृणमूल आंदोलन संघर्ष, कल्याण और बंगाली अस्मिता पर आधारित था, लेकिन बाद में वह सत्ता-केंद्रित और केंद्रीकृत हो गया. यह नैरेटिव उन्हें नैतिक पुनर्स्थापना का आधार देता है, भले ही वे खुद उसी व्यवस्था का हिस्सा रहे हों.
इस प्रवृत्ति को समझने में राजनीतिक वैज्ञानिक द्वैपायन भट्टाचार्य का “फ्रेंचाइज़ी पॉलिटिक्स” वाला विश्लेषण मदद करता है. उनके अनुसार स्थानीय नेता एक तरह की क्षेत्रीय सत्ता चलाते हैं, जो ऊपर से पार्टी ब्रांड से जुड़ी होती है. जब सत्ता कमजोर पड़ती है, तो वही नेटवर्क अपने अस्तित्व के लिए नए संरक्षक की तलाश करने लगता है.
इसी तरह एंजेलो पनाबीआन्को का पार्टी संगठन पर अध्ययन बताता है कि जब किसी करिश्माई नेता का प्रभाव संस्थागत ढांचे में नहीं बदलता, तो हार के बाद विचारधारात्मक बहस नहीं होती, बल्कि विरासत पर कब्जे की होड़ शुरू हो जाती है.
महाराष्ट्र का अनुभव भी इस प्रवृत्ति का उदाहरण माना जाता है, जहां बड़े गुटों ने खुद को असली पार्टी बताकर सत्ता पक्ष में विलय किया. इससे क्षेत्रीय पार्टियों की संगठनात्मक पकड़ कमजोर हुई और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी.
बंगाल का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां तृणमूल कांग्रेस केवल एक पार्टी नहीं, बल्कि बंगाली पहचान और केंद्र-विरोधी राजनीति का प्रतीक रही है. अगर इसका बड़ा हिस्सा सत्ताधारी खेमे में समाहित हो जाता है, तो यह केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं रहेगा, बल्कि क्षेत्रीय राजनीतिक पहचान का पुनर्गठन होगा.
भारतीय जनता पार्टी की रणनीति भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण है. एक ओर वह वैचारिक रूप से हिंदुत्व की राजनीति पर आधारित है, दूसरी ओर वह सत्ता विस्तार के लिए स्थानीय नेताओं को समाहित करने में सक्षम दिखती है. यह एक तरह का संगठनात्मक विस्तार है, जिसमें पार्टी अपने नेटवर्क को समाज और प्रशासन तक फैलाती है.
कानूनी स्तर पर यह स्थिति जटिल है. संविधान की दसवीं अनुसूची दल-बदल रोकने के लिए बनी थी, लेकिन इसमें एक बड़ा प्रावधान यह है कि अगर दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में विलय करते हैं, तो इसे वैध माना जा सकता है. यही प्रावधान अब व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक दल-बदल को बढ़ावा देता दिखता है.
इसका परिणाम यह होता है कि अवसरवाद खत्म नहीं होता, बल्कि सामूहिक रूप ले लेता है. और जब यह सामूहिक रूप लेता है, तो विपक्ष का वोट बैंक ही नहीं, बल्कि उसकी संगठनात्मक रीढ़ भी टूट जाती है.
दीर्घकाल में इसका असर केवल बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा. यह मॉडल अगर मजबूत होता है, तो क्षेत्रीय पार्टियों का भविष्य इस पर निर्भर करेगा कि वे चुनाव जीतने के बाद भी हार को संगठनात्मक रूप से झेल पाने में सक्षम हैं या नहीं. क्योंकि अब असली सवाल यह नहीं है कि कोई पार्टी चुनाव जीत सकती है, बल्कि यह है कि क्या वह हारने के बाद भी पार्टी बनी रह सकती है.
अगर संगठन, विचारधारा और आंतरिक लोकतंत्र कमजोर है, तो चुनावी हार केवल अंत नहीं होगी, बल्कि पूरी पार्टी के एब्ज़ॉर्प्शन की प्रक्रिया की शुरुआत बन जाएगी.
नीलाद्रि चटर्जी स्वीडन के लिनियस विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक अध्ययन विभाग में वरिष्ठ व्याख्याता और शोधकर्ता हैं एवं अरिल्ड एंगेल्सेन रूड नॉर्वे के ओस्लो विश्वविद्यालय में दक्षिण एशियाई अध्ययन के प्रोफेसर हैं.
हरकारा डीप डाइव
कुणाल पुरोहित | मुझे नहीं लगता प्लेटफॉर्म्स की कोई आइडियोलॉजी है, वे सत्ता और धंधे के साथ हैं
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने पत्रकार, लेखक और शोधकर्ता कुणाल पुरोहित से बातचीत की. चर्चा का केंद्र हिंदुत्व पॉप संगीत, उससे जुड़े नफरत फैलाने वाले गीतों और डिजिटल मंचों की भूमिका रही. हाल ही में कुणाल पुरोहित और उनके सहयोगियों ने एक अध्ययन तैयार किया है, जिसमें यह समझने की कोशिश की गई है कि किस तरह नफरत फैलाने वाला संगीत आज एक बड़े डिजिटल कारोबार का हिस्सा बन चुका है.
बातचीत की शुरुआत इस सवाल से हुई कि कुछ वर्षों पहले तक सीमित दायरे में दिखाई देने वाला यह संगीत आज देशभर में इतनी तेजी से कैसे फैल गया. कुणाल पुरोहित ने बताया कि जब उन्होंने अपनी पुस्तक एच-पॉप लिखी थी, तब ऐसे गीत मुख्य रूप से छोटे शहरों और कस्बों में सुनाई देते थे. लेकिन अब यह स्थिति बदल चुकी है. आज ऐसे गीत बड़े शहरों, धार्मिक आयोजनों, जुलूसों और सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच चुके हैं. उनके अनुसार यह केवल संगीत नहीं है, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक और सांस्कृतिक परियोजना का हिस्सा है.
अध्ययन के अनुसार चार प्रमुख डिजिटल मंचों पर 523 ऐसे गीतों की पहचान की गई है, जिनमें मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ घृणा, अपमानजनक भाषा या हिंसा को बढ़ावा दिया गया है. इनमें से 263 गीत सीधे तौर पर हिंसा की बात करते हैं. चर्चा के दौरान नितीश त्यागी ने इस तथ्य पर विशेष ध्यान दिलाया कि लाखों छोटी वीडियो और करोड़ों दर्शकों तक पहुंचने वाले ये गीत अब केवल मनोरंजन की सामग्री नहीं रह गए हैं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव पैदा करने का माध्यम बन चुके हैं.
कुणाल पुरोहित का कहना था कि इस पूरी प्रक्रिया में डिजिटल मंचों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. उनके अनुसार इन मंचों के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज दर्शकों की भागीदारी और उससे होने वाली कमाई है. नफरत, उत्तेजना और टकराव पैदा करने वाली सामग्री अधिक लोगों का ध्यान खींचती है. इसी कारण ऐसे गीतों को बार-बार आगे बढ़ाया जाता है. उन्होंने इसे “नफरत का एल्गोरिदम” बताते हुए कहा कि मंच अप्रत्यक्ष रूप से रचनाकारों को संकेत देते हैं कि अधिक भड़काऊ सामग्री अधिक लोकप्रिय और लाभदायक है.
बातचीत में यह सवाल भी उठा कि इस पूरी व्यवस्था में केवल गीत बनाने वाले ही नहीं, बल्कि विज्ञापनदाता और बड़ी कंपनियां भी कहीं न कहीं शामिल दिखाई देती हैं. अध्ययन में अनेक ऐसे ब्रांडों का उल्लेख किया गया है जिनके विज्ञापन इन वीडियो के साथ प्रदर्शित हुए. नितीश त्यागी ने पूछा कि क्या कंपनियों को यह पता है कि उनके विज्ञापन किस प्रकार की सामग्री के साथ दिखाए जा रहे हैं. इस पर कुणाल पुरोहित ने कहा कि कंपनियों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए कि वे नफरत और हिंसा फैलाने वाली सामग्री का समर्थन नहीं करतीं.
चर्चा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा युवाओं पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर भी रहा. कुणाल पुरोहित के अनुसार हिंदुत्व पॉप की पूरी संरचना युवा पीढ़ी को ध्यान में रखकर तैयार की गई है. लोकप्रिय संस्कृति, छोटे वीडियो और आकर्षक प्रस्तुतियों के माध्यम से विचारधारा को मनोरंजन के रूप में पेश किया जाता है. यही कारण है कि यह केवल डिजिटल सामग्री का प्रश्न नहीं, बल्कि समाज के भविष्य और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ा मुद्दा भी है.
बातचीत के अंत में निधीश त्यागी और कुणाल पुरोहित ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि जब सत्ता, कारोबार और डिजिटल मंचों के हित एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं, तब जवाबदेही का संकट और गहरा हो जाता है. उन्होंने कहा कि नागरिकों को यह समझना होगा कि नफरत का यह कारोबार केवल आभासी दुनिया तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका असर समाज, राजनीति और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचता है. इसलिए इस पर सवाल उठाना और जवाबदेही की मांग करना लोकतांत्रिक समाज की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है.
कश्मीर के सरकारी कर्मचारी पर ‘नार्को-टेरर’ का मामला कैसे बना, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने छह साल बाद दी जमानत
जम्मू-कश्मीर के ग्रामीण विकास विभाग में कार्यरत सरकारी कर्मचारी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जून 2020 में नार्को-टेररिज्म यानी मादक पदार्थों की तस्करी के जरिए आतंकवाद को फंडिंग देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. लगभग छह साल जेल में बिताने के बाद मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी. जमानत आदेश में अदालत ने कई ऐसे सवाल उठाए, जिन्होंने जांच एजेंसियों के पूरे मामले पर गंभीर संदेह खड़ा कर दिया.
बेतवा शर्मा की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अंद्राबी या उनके कार्यस्थल से न तो कोई नकदी बरामद हुई थी और न ही कोई मादक पदार्थ. उनके खिलाफ जिन आत्मस्वीकृतिपूर्ण बयानों का इस्तेमाल किया गया, वे भारतीय कानून के तहत स्वीकार्य नहीं थे. अदालत ने यह भी नोट किया कि उनका पहले कभी आतंकवादी गतिविधियों या ड्रग तस्करी से कोई संबंध नहीं पाया गया था. उल्टा, वे एक सरकारी कर्मचारी और मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के सक्रिय कार्यकर्ता थे.
यह मामला अगस्त 2019 से शुरू होता है, जब अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर निवारक हिरासतें की गईं. अंद्राबी को भी पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) के तहत हिरासत में लिया गया. उस समय पुलिस द्वारा तैयार किए गए डोजियर में उन्हें एक राजनीतिक कार्यकर्ता बताया गया था. कहीं भी आतंकवादी संगठनों से संबंध या ओवरग्राउंड वर्कर होने का आरोप नहीं लगाया गया था.
हालांकि अप्रैल 2020 में उनकी निवारक हिरासत रद्द कर दी गई और वे रिहा हो गए. लेकिन रिहाई के कुछ ही सप्ताह बाद, 11 जून 2020 को उन्हें एनडीपीएस कानून के तहत एक नए मामले में गिरफ्तार कर लिया गया. बाद में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने जांच अपने हाथ में ले ली और दावा किया कि यह सिर्फ ड्रग तस्करी का मामला नहीं बल्कि आतंकवाद को फंडिंग से जुड़ा नेटवर्क है.
एनआईए के आरोपपत्र के अनुसार, अंद्राबी के दामाद और अन्य आरोपियों से हेरोइन और बड़ी मात्रा में नकदी बरामद हुई. एजेंसी ने दावा किया कि अंद्राबी के पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा और हिज्बुल मुजाहिदीन से जुड़े लोगों से संबंध थे. उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने 2016 और 2017 में पाकिस्तान की यात्रा के दौरान आतंकवादी नेटवर्क से मुलाकात की थी और ड्रग्स के कारोबार से प्राप्त धन आतंकवादी संगठनों तक पहुंचाया था.
लेकिन बचाव पक्ष ने इन दावों को अदालत में चुनौती दी. वरिष्ठ अधिवक्ता शादन फरासत ने कहा कि जिन दो कथित आतंकवादी कमांडरों से अंद्राबी के संबंध होने का दावा किया गया, उनमें से एक व्यक्ति वर्ष 2000 में ही मर चुका था जबकि दूसरा जम्मू-कश्मीर में सरकारी कर्मचारी था. उन्होंने कहा कि जांच एजेंसियां यह साबित ही नहीं कर सकीं कि आरोपपत्र में जिन लोगों का उल्लेख किया गया है, वे वास्तव में कौन थे.
फरसात ने यह भी बताया कि अंद्राबी के कॉल डिटेल रिकॉर्ड में किसी आतंकवादी से संपर्क का कोई प्रमाण नहीं मिला. जब अभियोजन पक्ष ने व्हाट्सऐप चैट का हवाला दिया, तब सुप्रीम कोर्ट ने वे चैट रिकॉर्ड दिखाने को कहा. अदालत के अनुसार, अभियोजन पक्ष ऐसा करने में विफल रहा.
मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू कथित बरामदगी से जुड़ा था. एनआईए का कहना था कि अंद्राबी के खुलासे के आधार पर हेरोइन और नकदी बरामद हुई. लेकिन बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि उनका कथित बयान इतना अस्पष्ट था कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता. कानून के अनुसार, किसी आरोपी की पुलिस के सामने दी गई जानकारी तभी स्वीकार्य होती है जब वह किसी वस्तु की सटीक और प्रत्यक्ष बरामदगी तक ले जाए.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी गौर किया कि अंद्राबी को गिरफ्तार हुए लगभग छह साल हो चुके थे और मुकदमे में अभी भी 350 गवाहों की गवाही बाकी थी. अदालत ने माना कि निकट भविष्य में मुकदमे के समाप्त होने की कोई संभावना नहीं है. ऐसे में उन्हें अनिश्चितकाल तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शीघ्र सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन होगा.
अपने फैसले में न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि यदि मुकदमे में अत्यधिक देरी हो रही है तो यूएपीए जैसे कठोर कानूनों में भी जमानत दी जानी चाहिए. अदालत ने यह भी याद दिलाया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में भी संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
अंद्राबी का मामला केवल एक व्यक्ति की लंबी कैद की कहानी नहीं है. यह उस व्यापक सवाल को भी सामने लाता है कि क्या कठोर आतंकवाद-रोधी कानूनों का इस्तेमाल ऐसे मामलों में किया जा रहा है जहां सबूत कमजोर हैं, लेकिन आरोपी वर्षों तक जेल में रहने को मजबूर हो जाते हैं. सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां इस बात की ओर संकेत करती हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर लगाए गए आरोपों की भी न्यायिक जांच उतनी ही कठोर होनी चाहिए जितनी किसी अन्य आपराधिक मामले में होती है. वरना मुकदमे से पहले की लंबी कैद ही अपने आप में सजा बन जाती है.
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