18/04/2026: आंध्र के घुटने | परिसीमन में पाकिस्तान | नीतीश का प्रस्थान | भाजपा के इरादे हारे | बच्चों की मौत पर हावी रसूख | न्यायपालिका पर बहस | असम में इंटरनेट बंद | मणिपुर में सेना का अफसर पिटा
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
परिसीमन पर बहस: ‘एकात्मक राज्य’ की सोच औरआरएसएस का विज़न
श्रवण गर्ग : विधेयक पर पराजय को राष्ट्रीय संकट में बदला जा रहा है ?
आंध्रप्रदेश ने दिल्ली दरबार के सामने घुटने टेके— और इसके पीछे एक कहानी है
66 बच्चों की मौत, क्लीन चिट और ‘गायब होने के नाटक’ के बाद, मेडेन फार्मा की नए नाम के साथ वापसी
न्यायिक प्रणाली की आलोचना सुधार का सुझाव है, निंदा नहीं – न्यायमूर्ति मनमोहन
नीतीश कुमार का निकास: राजनीति के असली खेल का खुलासा
असम: अतिक्रमण हटाने के दौरान वन अधिकारियों और आदिवासियों के बीच झड़प, इंटरनेट बंद
प्रधानमंत्री के संबोधन से पहले बड़े सवाल: क्या कहेंगे मोदी और किन मुद्दों पर रहेंगे खामोश?
अफवाह से भड़की हिंसा: मणिपुर में झूठी खबर ने आर्मी अधिकारी को भीड़ के हाथों पिटवाया
“आंध्रप्रदेश ने दिल्ली दरबार के सामने घुटने टेके— और इसके पीछे एक कहानी है”
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में संजय बारू ने लिखा है कि आंध्रप्रदेश के प्रमुख राजनीतिक दलों के नेतृत्व — चंद्रबाबू नायडू, वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी और पवन कल्याण — द्वारा एक संविधान संशोधन विधेयक पर भारतीय जनता पार्टी के सामने किया गया राजनीतिक आत्मसमर्पण, दक्षिण भारत के साथी राज्यों से अलग होने की राह चुनना, आंध्र के सत्ताधारी अभिजात वर्ग की राजनीतिक वैधता के गहरे संकट की ओर इशारा करता है. कई तरह की चूक और कमीशन के कृत्यों के आरोपी, तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी), जन सेना पार्टी और वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी) का वैचारिक रूप से खोखला नेतृत्व खुद को दिल्ली दरबार में ‘याचिकाकर्ताओं’ के रूप में एक ही पक्ष में खड़ा पाता है.
2024 के लोकसभा चुनावों के बाद से, जिसमें भाजपा ने संसद में अपना बहुमत खो दिया और सहयोगियों के समर्थन पर निर्भर हो गई, आंध्र के ये तीनों दल विभिन्न मुद्दों पर भाजपा के इच्छुक समर्थक रहे हैं. हालांकि, जनसांख्यिकीय और आर्थिक रूप से बेहतर प्रदर्शन करने वाले दक्षिणी राज्यों के खिलाफ संसदीय शक्ति के असंतुलन के प्रस्ताव पर अन्य दक्षिणी राज्यों का साथ छोड़ने का उनका निर्णय एक तरह की राजनीतिक गुलामी है.
विडंबना यह है कि टीडीपी और वाईएसआरसीपी दोनों का जन्म तेलुगु आत्मसम्मान और गौरव — ‘आत्मगौरवम्’ — की नींव पर हुआ था. टीडीपी के संस्थापक दिवंगत एन.टी. रामाराव ने प्रसिद्ध मुहावरा गढ़ा था कि “केंद्र एक वैचारिक मिथक है”. उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सत्ता के केंद्रीकरण के मॉडल को चुनौती दी थी और उन्हें केंद्र-राज्य संबंधों पर ‘न्यायमूर्ति सरकारिया आयोग’ नियुक्त करने के लिए मजबूर किया था. रेड्डी ने अपने पिता की मृत्यु के बाद कांग्रेस के भीतर एक दिल्ली-आधारित गुट द्वारा उनके और उनकी माँ के साथ किए गए व्यवहार के विरोध में अपनी पार्टी बनाई थी.
‘आत्मगौरवम्’ के इस विचार में रचे-बसे राजनेताओं के लिए, खुद को एक ऐसे राजनीतिक दल के नेतृत्व के सामने झुकने के लिए मजबूर पाना वास्तव में अपमानजनक होना चाहिए, जिसका तेलुगु लोगों के बीच कोई खास वजूद नहीं है. राजनीतिक प्रासंगिकता और सत्ता के केंद्रों की तलाश में उनकी गिड़गिड़ाने की इच्छा नए आंध्र प्रदेश में राजनीतिक नेतृत्व के गहरे संकट की ओर इशारा करती है.
सबसे पहले इस बात पर विचार करें कि तेलंगाना के दो प्रमुख राजनीतिक दलों ने संविधान संशोधन के मुद्दे पर कैसी प्रतिक्रिया दी. बीआरएस (पूर्व में तेलंगाना राष्ट्र समिति) और कांग्रेस दोनों ने अन्य दक्षिणी राज्यों के साथ हाथ मिलाया, जो क्षेत्रीय राजनीति में एक दिलचस्प मोड़ की ओर इशारा करता है. एक क्षेत्रीय दल होने के नाते, बीआरएस का अपने क्षेत्र के हितों के प्रति वफादार रहना समझ में आता है. दिलचस्प बात यह है कि कर्नाटक और तेलंगाना में कांग्रेस ने भी अपने शक्तिशाली राज्य-स्तरीय नेताओं के नेतृत्व में तमिलनाडु और केरल जैसे अपने दक्षिणी पड़ोसियों के साथ एकजुटता व्यक्त की.
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने खुद को एक क्षेत्रीय नेता के रूप में पेश करने का कोई मौका नहीं गंवाया है, और बीआरएस को इस मंच पर एकाधिकार करने की अनुमति नहीं दी है. तेलंगाना के विकास के प्रति बीआरएस और कांग्रेस दोनों के नेतृत्व द्वारा दिखाई गई इस प्रतिबद्धता ने उन्हें राज्य की राजनीति में भाजपा को हाशिए पर धकेलने में सक्षम बनाया है. हिंदुत्व की सक्रियता के शुरुआती उछाल के बाद, राज्य में भाजपा एक मामूली खिलाड़ी बनकर रह गई है.
तो फिर नए आंध्र प्रदेश में संकट क्या है?
सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात यह है कि यह क्रमिक नेतृत्व द्वारा अत्यधिक भ्रष्टाचार के कारण शासन का संकट है. नए आंध्र प्रदेश को यह गौरव प्राप्त है कि उसके दोनों मुख्यमंत्री — नायडू और रेड्डी — जेल की सजा काट चुके हैं.
भ्रष्टाचार की समस्या जितनी गंभीर है, उतनी ही कपटी ‘जातिवाद’ की समस्या भी है. तीन प्रमुख राजनीतिक दल तीन प्रमुख जातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं — टीडीपी पर कम्मा जाति का वर्चस्व है, वाईएसआरसीपी पर रेड्डी समुदाय का और जन सेना पर कापू समुदाय का. आंध्र के प्रशासन, राजनीति और व्यवसाय, विशेष रूप से रियल एस्टेट में जातिवाद हावी है.
राज्य की समस्याएं इसकी दयनीय वित्तीय स्थिति के कारण और भी बदतर हो गई हैं. विभाजन के बाद से ही यह स्पष्ट था कि आंध्र राजकोषीय सहायता के लिए केंद्र सरकार पर निर्भर हो जाएगा. अविभाजित आंध्र प्रदेश में राज्य का खजाना तेलंगाना के ‘राजकोषीय अधिशेष’ के कारण भरा रहता था, जो हैदराबाद के विकास का उपोत्पाद था. हैदराबाद के छिन जाने के बाद, नया आंध्र प्रदेश एक वित्तीय विकलांगता के साथ शुरू हुआ.
आंध्र की राजनीति ने शासन की इन चुनौतियों को और भी कठिन बना दिया है. नायडू एक महत्वाकांक्षी कल्याणकारी योजना के साथ सत्ता में लौटे, जिसमें उनके बेटे नारा लोकेश उनके ठीक पीछे हैं. टीडीपी के भीतर पीढ़ीगत बदलाव की राजनीति, जिसमें एन.टी. रामाराव का परिवार अभी भी नायडू के खिलाफ शिकायत पाले हुए है कि उन्होंने अपने ससुर के साथ विश्वासघात किया था, और अब यह चिंता कि लोकेश जल्द ही विरासत संभाल लेंगे, ने राज्य में शासन को और जटिल बना दिया है.
अमरावती में एक नई राज्य राजधानी बनाने के नायडू के जुनून ने शहरी विकास की अधिक दबाव वाली चुनौतियों से ध्यान हटा दिया है. आंध्र के व्यावसायिक अभिजात वर्ग से उम्मीद की जा रही थी कि वे हैदराबाद से आंध्र क्षेत्र में पलायन करेंगे, लेकिन वे अभी भी हैदराबाद या विदेशों (मुख्य रूप से अमेरिका) में निवेश कर रहे हैं. भाजपा और कांग्रेस में से कोई भी नायडू और रेड्डी को चुनौती देने की स्थिति में नहीं है, इसलिए राज्य की राजनीति और विकास व्यक्तिगत स्वार्थ और जातिगत राजनीति के एक दुष्चक्र में फंस गए हैं.
अंततः, तीन दशकों के बाद भी आंध्र के अभिजात वर्ग ने हैदराबाद को अपना घर मानना नहीं छोड़ा है. नए आंध्र की दिल्ली पर वित्तीय निर्भरता, दिल्ली की जाँच एजेंसियों की राज्य के नेतृत्व पर पकड़ और आंध्र अभिजात वर्ग का हैदराबाद के प्रति निरंतर लगाव — इन सबने मिलकर आंध्र के राजनीतिक नेतृत्व को कमजोर कर दिया है, जिससे वे ‘दिल्ली दरबार’ के कर्जदार बन गए हैं.
यदि बढ़ता हुआ हैदराबाद एक ऐसा चुंबक बना रहता है, जो आंध्र के अभिजात वर्ग को आकर्षित करता है, तो विशाखापत्तनम, विजयवाड़ा और तिरुपति जैसे शहर आधुनिक शहरी और सांस्कृतिक केंद्रों के रूप में विकसित होने में धीमे रहेंगे. एक अलग राज्य के रूप में खुद को स्थापित करने के बाद, आंध्र को अमरावती में एक भारी-भरकम पूंजी निवेश वाली राजधानी की उम्मीद करने के बजाय मौजूदा शहरों के आसपास स्थानीय व्यापार, शैक्षिक और सांस्कृतिक केंद्रों को पुनर्जीवित करना होगा.
(बारू एक लेखक और ‘द फाइनेंशियल एक्सप्रेस’ के पूर्व संपादक हैं)
“इस तरह का परिसीमन आरएसएस-भाजपा के वैचारिक लक्ष्यों को पूरा करता है, और इसमें पाकिस्तान की भी झलक”
प्रोफ़ेसर क्रिस्टोफ़ जाफ़्रेलोट, जो एक लेखक, राजनीति विज्ञानी और दक्षिण एशिया के विद्वान हैं और भारत के राजनीतिक परिदृश्य की गहरी समझ रखते हैं, ने ‘द वायर’ की संपादक सीमा चिश्ती से ‘जनसंघ के घोषणापत्र’ पर बात की, जिसमें भारत को एक ‘एकात्मक’ राज्य बनाने का आह्वान किया गया था.
यह बातचीत केंद्र सरकार द्वारा पेश किए गए संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 के बारे में थी, जो एक व्यापक परिसीमन अभ्यास और लोकसभा के विस्तार का मार्ग प्रशस्त करने के लिए था लेकिन दो तिहाई बहुमत के अभाव में गिर गया और सरकार इसे पास कराने में विफल हो गई. क्योंकि सरकार के इस कदम की विपक्षी दल कड़ी आलोचना कर रह हैं.
जाफ़्रेलोट कहते हैं, “इस संसद में एक मानचित्र है—अखंड भारत का मानचित्र—यह देश और इस क्षेत्र के प्रति उनका दृष्टिकोण है. हमें इस पर ध्यान देने की जरूरत है. मैं 1957 का जनसंघ का घोषणापत्र पढ़ रहा था. मैं इसकी दो पंक्तियाँ पढ़कर सुनाऊँगा: ‘जनसंघ संविधान में संशोधन करेगा और भारत को एकात्मक राज्य घोषित करेगा. एकात्मक राज्य की स्थापना का अर्थ सत्ता का केंद्रीकरण नहीं होगा, जनसंघ का लोकतंत्र में विश्वास है; देश के शासन में सभी लोगों को भागीदार बनाने के लिए, जनसंघ देश के सबसे निचले स्तर तक सत्ता का केंद्रीकरण करेगा.’ आप वहाँ क्या करते हैं?”
वे आगे कहते हैं, “आप राज्यों को दरकिनार करते हैं, और आप सीधे स्थानीय नगर पालिकाओं, पंचायतों तक पहुँचते हैं. वे कुछ और करना चाहते थे, वे ‘जनपद’ का आविष्कार करना चाहते थे, लेकिन विचार वही है. भाषाई राज्य—वे इसे स्वीकार नहीं कर पाए. जनसंघ अपने मुखपत्र ‘ऑर्गनाइज़र’ में कह रहा था, ‘हम छोटे-छोटे राष्ट्र बना रहे हैं, हम भारत को इस तरह विभाजित नहीं कर सकते.’ यह राष्ट्र के प्रति उनका गहरा दृष्टिकोण है—एक एकात्मक राष्ट्र राज्य के रूप में. यदि राष्ट्र में श्रद्धा के योग्य कुछ है, तो वह नदियाँ हैं, पवित्र नदियाँ; पर्वत हैं, पवित्र पर्वत. लोकसभा में लगे अखंड भारत के मानचित्र में नदियों और पहाड़ों के अलावा कुछ नहीं है—महाकाव्यों वाला भारत, पवित्र भूमि—यही उनका दृष्टिकोण है. और निश्चित रूप से, जब आप सत्ता का संतुलन बदल देते हैं और हिंदी पट्टी को इतना प्रभावशाली बना देते हैं कि दक्षिण और पूर्व के लिए विरोध करना असंभव हो जाए, तो राज्य सरकारों को अप्रासंगिक बनाना आसान हो जाता है.”
जाफ़्रेलोट का कहना है कि राज्यों और क्षेत्रीय पहचानों ने हमेशा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को चिंतित किया है और नगर पालिका जैसी कई छोटी इकाइयों और छोटे निर्वाचन क्षेत्रों का होना केंद्रीकरण की परियोजना को आगे बढ़ाता है, जो अंततः अखंड भारत की ओर ले जाता है. उन्होंने इस तथ्य पर भी बात की कि आने वाले वर्षों में कड़ी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा होगी और हंगरी के हालिया चुनाव परिणामों पर चर्चा की कि कैसे ओर्बन को सत्ता से उखाड़ फेंका गया, जो एक वैकल्पिक भविष्य का संकेत देता है.
जाफ़्रेलोट कहते हैं कि संयोग से और विडंबना यह है कि—यह वही दृष्टिकोण है जिसे पाकिस्तान की सेना भी विकसित कर रही है.
वे कहते हैं, “वे 18वें संशोधन (अप्रैल 2010 में पारित, पाकिस्तान में 18वां संवैधानिक संशोधन एक ऐतिहासिक सुधार था. इसने पाकिस्तान के संविधान को उसके मूल उद्देश्य—चार प्रांतों के विकेंद्रीकृत महासंघ के रूप में बहाल किया था, जैसा कि 1956 और 1973 के संविधानों में परिकल्पना की गई थी) के खिलाफ थे. वे हर उस चीज़ के खिलाफ थे जो उनकी राज्य सरकारों—सिंध, पंजाब, बलूचिस्तान, केपी—को शक्ति देती थी. विचार वही है. इन मध्यवर्तियों (राज्यों) को दरकिनार करने या शॉर्ट-सर्किट करने के लिए आपको सीधे स्थानीय निकायों तक पहुँचना होगा, क्योंकि ये मध्यवर्ती उन लोगों और राजनेताओं से बने हैं जो राष्ट्र को विभाजित करते हैं. और जब मुशर्रफ राष्ट्रपति बने, तो उन्होंने इन्हीं कारणों से स्थानीय ‘नाजिमों’ को बहुत शक्तिशाली बना दिया. इसलिए एकात्मक राज्य के समर्थक हर जगह एक ही काम कर रहे हैं.”
आरएसएस के पूर्व सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर की पुस्तक ‘बंच ऑफ थॉट्स’ (विचार नवनीत) में भी आह्वान किया गया था कि, “सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावी कदम हमारे देश के संविधान के संघीय ढांचे की तमाम बातों को गहराई में दफन करना होगा... और घोषित करना होगा कि ‘एक देश, एक राज्य, एक विधायिका, एक कार्यपालिका’.”
श्रवण गर्ग: विधेयक पर पराजय को राष्ट्रीय संकट में बदला जा रहा है ?
महिला आरक्षण संशोधन विधेयक पारित करवाने के लिए अमित शाह जिस ज़बर्दस्त तैयारी के साथ लोकसभा में आए थे उससे समझा जा सकता है कि 17 अप्रैल को हुई पराजय से सरकार को कितना बड़ा सदमा पहुँचा होगा! प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संदेश में विपक्ष के ख़िलाफ़ फूटा ग़ुस्सा इसका प्रमाण है. राष्ट्र के नाम संदेश के पीछे के और क्या कारण हो सकता था ? आख़िरी बार ऐसा कोई संदेश 7 जून 2021 को कोविड के राष्ट्रीय संकट के दौरान प्रसारित हुआ था! क्या संशोधन विधेयक पर पराजय को बीजेपी किसी राष्ट्रीय संकट में तब्दील करना चाहती है ?
(देश की जनता और नारी शक्ति क्या विपक्षी दलों-कांग्रेस, डीएमके, तृणमूल और सपा- के ख़िलाफ़ राष्ट्र के नाम संदेश में लगाए गए इन आरोपों में यक़ीन करेगी कि ये चार दल भ्रूण हत्या के अपराधी हैं और संशोधन विधेयक के विरोध का जो अपराध इन्होंने किया है उसकी उन्हें सज़ा ज़रूर मिलेगी ! )
अमित शाह द्वारा लोकसभा में दिये गये जवाब के पैंतीसवे मिनिट के दौरान जो हुआ उसके ज़रिए सरकार की पूर्व-तैयारी को समझा जा सकता है :
अमित शाह समझा रहे थे कि दक्षिण के पाँच राज्यों (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक ,आंध्र और तेलंगाना की वर्तमान में 129 सीटें हैं जो कुल 543 का 23.76 प्रतिशत होता है. परिसीमन पश्चात सीटों की संख्या 816 हो जाने के बाद इन पाँच राज्यों के सीटें भी बढ़कर 195 हो जाएँगी जो कि कुल सीटों का 23.87 प्रतिशत होगा. अतः डरने का कोई कारण नहीं है कि दक्षिण की सीटें कम हो जाएँगी. गृहमंत्री द्वारा यह नहीं बताया गया कि परिसीमन के ज़रिए ज़्यादा जनसंख्या वाले बीजेपी के राज्यों में सीटें दक्षिण भारत के मुक़ाबले कितने प्रतिशत बढ़ जाएँगी!
कांग्रेस के नेता के सी वेणुगोपाल द्वारा उठाई गई आपत्ति पर जब अमित शाह ने कहा कि विधेयक का विरोध करने का कारण अगर यह है कि आरक्षण के बाद सीटों की संख्या पचास प्रतिशत बढ़ जाएगी, ऐसा लिखित में चाहिये तो : ‘एक घंटे के लिए सदन स्थगित कर दीजिए. आधिकारिक संशोधन मेरे पास तैयार है. फोटो कॉपी करवा कर सभी सदस्यों को सर्कुलेट कर दूँगा.’
सत्तारूढ़ दल के सदस्यों की ओर से मेज़ों की थपथपाहट के बीच की गई अमित शाह की घोषणा ने कुछ क्षणों के लिए वेणुगोपाल की ज़मीन खिसका दी. वेणुगोपाल की आपत्ति का आधार यह था कि विधेयक की जो प्रतियाँ वितरित की गईं थीं उनमें पचास प्रतिशत वृद्धि को लेकर लिखित में उल्लेख नहीं है.
अखिलेश यादव ने मामले की नज़ाकत को समझ तुरंत हस्तक्षेप कर दिया कि : सरकार को लेकर पिछले ग्यारह साल का जो अनुभव है, उसे देखते हुए अगर वह यह भी लिखकर दे दे कि किसी महिला को प्रधानमंत्री बनाएगी तब भी उस पर भरोसा नहीं करेंगे.’
राहुल गांधी सदन में उपस्थित नहीं थे !
सरकार के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था कि विधेयक के जिस स्वरूप को संसद का विशेष सत्र बुलाकर सितंबर 2023 में पारित करवाया गया था उसका क्या हुआ ? लोकसभा की नई इमारत में सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 888 और राज्यसभा की 245(250) से बढ़ाकर 384 क्यों की गई थीं ? जिस विधेयक पर 17 अप्रैल को मतदान हुआ उसमें राज्यसभा की सीटें बढ़ाने का उल्लेख क्यों नहीं था ?
वर्ष 2024 के चुनाव परिणाम अगर सरकार की मंशा के अनुरूप (चार सौ पार) आ जाते तो देश का संसदीय भविष्य और संविधान तो अभी तक बदला जा चुका होता !
क्या सरकार 2029 के चुनाव परिणामों को लेकर इतनी डरी हुई है कि विधेयक के ज़रिए बिना जनगणना-जातिगणना कराए सीधे परिसीमन के ज़रिए भाजपा-शासित राज्यों की सीटों के बहुमत से बाज़ी अपने पक्ष में पलटना चाह रही थी ?
विधेयक पर हुई पराजय से आहत मोदी क्या 2029 के चुनावों तक प्रतीक्षा करेंगे ?
प्रधानमंत्री के संबोधन से पहले बड़े सवाल: क्या कहेंगे मोदी और किन मुद्दों पर रहेंगे खामोश?
आज के टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश के लाइव शो में वरिष्ठ पत्रकार राजेश चतुर्वेदी से बातचीत की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आज रात 8:30 बजे होने वाले राष्ट्र के नाम संबोधन से हुई. हमने यह समझने की कोशिश की कि इस संबोधन में क्या कहा जा सकता है और उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण क्या नहीं कहा जाएगा.
राजेश चतुर्वेदी ने साफ तौर पर कहा कि प्रधानमंत्री क्या बोलेंगे, इसका अनुमान लगाना आसान नहीं है, क्योंकि उनका संवाद अधिकतर एकतरफा होता है. प्रेस से सीधा संवाद कम होता है और राष्ट्र के नाम संबोधन ही मुख्य माध्यम बनता है.ऐसे में यह चर्चा ज्यादा इस बात पर केंद्रित रही कि किन सवालों से बचा जा सकता है. खासकर हाल ही में संसद में लाया गया संविधान संशोधन विधेयक, जो दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण गिर गया, उस पर सरकार की मंशा और रणनीति को लेकर कई सवाल उठाए गए.
बातचीत में महिला आरक्षण का मुद्दा भी प्रमुखता से सामने आया. उन्होंने ने बताया कि 2023 में ही महिला आरक्षण से जुड़ा विधेयक सर्वसम्मति से पास हो चुका था, जिसमें जनगणना और परिसीमन के बाद आरक्षण लागू करने की बात थी. लेकिन अब जिस तरह नए सिरे से इस मुद्दे को उठाया गया और उसे अलग तरीके से पेश किया गया, उसने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है. विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने जानबूझकर ऐसा कदम उठाया, जिससे एक खास नैरेटिव तैयार किया जा सके.
हमारी चर्चा में दक्षिण भारत और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों की चिंताओं का भी जिक्र हुआ. परिसीमन को लेकर यह आशंका जताई जा रही है कि कुछ राज्यों को सीटों का नुकसान हो सकता है. राजेश चतुर्वेदी ने इसे एक बड़े राजनीतिक खेल का हिस्सा बताया, जहां महिला आरक्षण, क्षेत्रीय असंतुलन और चुनावी रणनीति, तीनों एक साथ जुड़ते नजर आते हैं. खासकर आने वाले चुनावों को देखते हुए इस मुद्दे को और अहम माना जा रहा है.
बातचीत के दौरान यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री अपने संबोधन में यक़ीनन सरकार की उपलब्धियों और महिलाओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर जोर दे सकते हैं, जबकि कई जटिल सवाल, जैसे जनगणना में देरी, परिसीमन की टाइमिंग, या पहले से पास विधेयक को लागू करने में हुई देरी शायद सीधे तौर पर न उठाए जाएं. इसके अलावा बेरोजगारी, अर्थव्यवस्था, और अन्य ज्वलंत मुद्दों पर भी स्पष्टता की उम्मीद कम ही जताई गई.
न्यायिक प्रणाली की आलोचना सुधार का सुझाव है, निंदा नहीं – न्यायमूर्ति मनमोहन
‘द टेलीग्राफ’ की रिपोर्ट के अनुसार,सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनमोहन ने हाल ही में न्याय वितरण प्रणाली, तकनीक की भूमिका और कानूनी सुधारों पर अपने विचार साझा किए. सोसाइटी ऑफ इंडियन लॉ फर्म्स द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए, उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की कमियों पर चर्चा करना उसे नीचा दिखाना नहीं, बल्कि उसे और बेहतर बनाने की एक अनिवार्य प्रक्रिया है.
न्यायमूर्ति मनमोहन ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक प्रणाली की आलोचना को अक्सर गलत समझ लिया जाता है. उन्होंने कहा कि जब कोई सुधार की बात करता है, तो उसे अनिवार्य रूप से मौजूदा व्यवस्था की समस्याओं को उजागर करना पड़ता है. उन्होंने स्पष्ट किया, “सिस्टम की कमियों को बताना उसे कोसना नहीं है, बल्कि यह उसे अगले स्तर पर ले जाने का एक प्रयास है.” उन्होंने यह भी आगाह किया कि इस तरह की रचनात्मक आलोचना का इस्तेमाल उन लोगों द्वारा हथियार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए जो अपने निजी स्वार्थ के लिए अदालती कार्यवाही को प्रभावित करना चाहते हैं.
अपनी बात को पुख्ता करने के लिए उन्होंने एक पुराने मामले का उदाहरण दिया. यह मामला एक फिल्म निर्माता के खिलाफ दर्ज एफआईआर से जुड़ा था, जिसमें फिल्म में जाति व्यवस्था की कड़वी सच्चाई दिखाने के कारण उन पर एससी/एसटी एक्ट के तहत आरोप लगाए गए थे. न्यायमूर्ति मनमोहन ने उस एफआईआर को रद्द करते हुए कहा था कि यदि समाज की बुराइयों को पर्दे पर नहीं दिखाया जाएगा, तो जनता उनके प्रति जागरूक कैसे होगी? इसी तरह, सिस्टम की खामियों को बताए बिना उनमें सुधार संभव नहीं है.
आज के डिजिटल युग में एआई और तकनीक की बढ़ती पैठ पर न्यायाधीश ने एक संतुलित रुख अपनाया. उन्होंने कहा कि तकनीक को हमेशा एक ‘सहायक’ के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि निर्णय लेने वाली मुख्य शक्ति के रूप में. उनके अनुसार, तकनीक न्यायिक बोझ को कम करने का एक बेहतरीन उपकरण हो सकती है, लेकिन अंतिम फैसला हमेशा मानवीय मस्तिष्क और विवेक द्वारा ही लिया जाना चाहिए. तकनीक का नियंत्रण मनुष्य के हाथ में रहना अनिवार्य है.
अदालतों में बढ़ते बोझ पर चिंता जताते हुए उन्होंने मध्यस्थता प्रणाली की वर्तमान स्थिति पर सवाल उठाए. उन्होंने चिंता जताई कि मध्यस्थता, जिसे अदालती कार्यवाही के एक सरल और सस्ते विकल्प के रूप में पेश किया गया था, अब खुद एक जटिल समस्या बनती जा रही है. उन्होंने कहा कि मध्यस्थता की प्रक्रिया अब अदालती मुकदमों की कार्बन कॉपी बनती जा रही है, जिससे इसकी ‘संवेदनशीलता’ और ‘अनौपचारिकता’ खत्म हो गई है.
|टिप्पणी: वरिष्ठ पत्रकार वी.वी.पी. शर्मा
नीतीश कुमार का प्रस्थान: राजनीति के असली खेल का खुलासा
नीतीश कुमार का पद छोड़ना और सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना केवल एक नियमित राजनीतिक तालमेल नहीं है. इसकी जड़ें व्यक्तिगत निष्ठा, वैचारिक साथ और नपे-तुले राजनीतिक लेन-देन के लंबे इतिहास में निहित हैं. नीतीश कुमार का सम्राट चौधरी के पिता, शकुनी चौधरी के साथ जुड़ाव मंडल-युग के समाजवादी आंदोलन के शुरुआती वर्षों से है. जॉर्ज फर्नांडीस जैसे दिग्गजों के साथ, वे उस राजनीतिक धारा का हिस्सा थे जिसने सामाजिक न्याय और पिछड़ी जातियों के उत्थान पर जोर दिया. जब नीतीश कुमार लालू प्रसाद यादव की छाया से अलग होकर समता पार्टी बना रहे थे, तब शकुनी चौधरी उनके साथ मजबूती से खड़े रहे और उन्हें पारंपरिक राजनीतिक वफादारी से परे जाकर समर्थन दिया. इस संदर्भ में, सम्राट चौधरी के लिए नीतीश कुमार का समर्थन एक पुराने राजनीतिक कर्ज को चुकाने जैसा प्रतीत होता है—यह एक दुर्लभ उदाहरण है जहाँ व्यक्तिगत इतिहास समकालीन सत्ता व्यवस्था को आकार देता दिख रहा है.
लेकिन इस बदलाव को केवल ‘कृतज्ञता’ के रूप में देखना सरलीकरण होगा. इस प्रक्रिया में नीतीश कुमार का हस्तक्षेप असामान्य रूप से मुखर था, खासकर तब जब यह किसी दूसरी पार्टी (भाजपा) के आंतरिक नेतृत्व के फैसलों से जुड़ा था. सम्राट चौधरी को उत्तराधिकारी के रूप में उनका सार्वजनिक समर्थन और इस्तीफे से पहले भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से ठोस आश्वासन हासिल करने की उनकी जिद, उनके प्रभाव की सीमा को दर्शाती है. यह व्यवहार बताता है कि यह केवल एक प्रतीकात्मक इशारा नहीं था, बल्कि सत्ता का एक ‘सौदेबाजी वाला हस्तांतरण’ था जिसमें नीतीश कुमार ने अंत तक अपनी पकड़ बनाए रखी. उनके समर्थकों का तर्क है कि यह उनकी उस राजनीतिक शैली को दर्शाता है जहाँ वफादारी नियंत्रण के साथ जुड़ी होती है, और जहाँ पद से विदाई भी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए सावधानीपूर्वक नियोजित की जाती है.
साथ ही, ऐसे संकेत भी हैं कि इस पारस्परिकता के पीछे दूरदर्शी राजनीति छिपी है. नीतीश कुमार ने अपने बेटे निशांत कुमार को सक्रिय राजनीति में लाने के दबाव का हमेशा विरोध किया है और परिवार को शासन से अलग रखने का सार्वजनिक रुख बनाए रखा है. हालांकि, सम्राट चौधरी के उत्थान को सुगम बनाकर, वे अनौपचारिक रूप से अगली पीढ़ी तक ‘एहसान की इस श्रृंखला’ को आगे बढ़ा रहे हैं.
अपनी उम्र और स्वास्थ्य को लेकर उठ रहे सवालों के बावजूद, नीतीश कुमार बिहार में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के समीकरणों के केंद्र में बने हुए हैं. भाजपा के मुख्यमंत्री की नियुक्ति उस राज्य में पार्टी के लिए एक प्रतीकात्मक बड़ी जीत है, जहाँ वह ऐतिहासिक रूप से स्वतंत्र रूप से इस पद को पाने में असमर्थ रही थी. हालांकि, यह उपलब्धि अभी अधूरी है. पार्टी की तत्काल प्राथमिकता नीतीश कुमार को गठबंधन के ढांचे के भीतर बनाए रखना है ताकि सत्ता हस्तांतरण को स्थिर किया जा सके और संभावित राजनीतिक जोखिमों को कम किया जा सके. सम्राट चौधरी की सार्वजनिक छवि अभी विकसित हो रही है, और उनके व्यक्तिगत एवं राजनीतिक रिकॉर्ड के विवादास्पद पहलुओं की जांच शुरू हो चुकी है. विपक्ष, विशेष रूप से राजद , उन्हें उसी शासन की विफलता और ‘जंगल राज’ के प्रतीक के रूप में पेश करने की कोशिश कर सकता है जिसे भाजपा पहले राजद पर मढ़ती रही थी. ऐसी स्थिति में, नीतीश कुमार की उपस्थिति एक सुरक्षा कवच (बफर) के रूप में कार्य करती है, जो प्रशासन को विश्वसनीयता और निरंतरता प्रदान करती है जबकि नए मुख्यमंत्री अपनी स्थिति मजबूत करते हैं.
उतनी ही महत्वपूर्ण नीतीश कुमार की “सुशासन बाबू” वाली छवि है. उनका कार्यकाल प्रशासनिक सुधारों और बुनियादी ढांचे के विकास से जुड़ा रहा है, और वे आज भी प्रभावी शासन के एक मॉडल के रूप में पहचाने जाते हैं. वर्षों की मेहनत से बनाई गई यह छवि गठबंधन के लिए एक मूल्यवान राजनीतिक पूंजी बनी हुई है. हालांकि उनके बार-बार गठबंधन बदलने के फैसलों की आलोचना हुई है, लेकिन इसने उनके प्रशासनिक रिकॉर्ड के प्रति जनता के भरोसे को पूरी तरह खत्म नहीं किया है. भाजपा के पास बिहार में अपने रैंकों में ऐसा कोई समकक्ष चेहरा नहीं है, इसलिए वह इस संक्रमण काल में मतदाताओं का विश्वास बनाए रखने के लिए नीतीश की इसी विरासत पर निर्भर है.
पार्टी के भीतर नेतृत्व की कमी एक संरचनात्मक मुद्दा है जिसे यह घटनाक्रम स्पष्ट रूप से उजागर करता है. नीतीश कुमार सत्ताधारी गठबंधन के भीतर सबसे प्रभावशाली व्यक्ति बने हुए हैं, और भाजपा के भीतर ऐसा कोई नेता नहीं है जिसका सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में उनके जैसा समान अधिकार हो. इसके विपरीत, तेजस्वी यादव अपने पिता लालू प्रसाद यादव की विरासत को आगे बढ़ाते हुए अपने दम पर एक महत्वपूर्ण राजनीतिक खिलाड़ी के रूप में उभरे हैं. सम्राट चौधरी का उत्थान, जिनके राजनीतिक सफर में कई पार्टियां और विवाद शामिल रहे हैं, राज्य में भाजपा के भीतर एक स्थापित नेतृत्व पाइपलाइन की कमी को दर्शाता है. यह 2014 के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में स्थापित उस पैटर्न से भी अलग है, जिसमें अक्सर नए चेहरों को मुख्यमंत्री के पदों पर बैठाया जाता था. इस मामले में, चयन दीर्घकालिक रणनीतिक योजना के बजाय तात्कालिक राजनीतिक आवश्यकता से प्रेरित लगता है.
नेतृत्व की तात्कालिक गतिशीलता से परे, यह विकास बिहार में भाजपा की दीर्घकालिक महत्वाकांक्षाओं पर भी सवाल उठाता है. मुख्यमंत्री कार्यालय हासिल करना पार्टी को उस राज्य में अपना वैचारिक प्रभाव धीरे-धीरे फैलाने का अवसर देता है जहाँ उसे ऐतिहासिक रूप से प्रतिरोध का सामना करना पड़ा है. 1990 में लालू प्रसाद यादव के आदेश पर रथ यात्रा के दौरान एल.के. आडवाणी की गिरफ्तारी की याद आज भी बिहार में भाजपा की शुरुआती सीमाओं का प्रतीक है. हालांकि, ये महत्वाकांक्षाएं गठबंधन की वास्तविकताओं से बंधी हुई हैं. विधानसभा में भाजपा और जदयू के बीच सीटों का मामूली अंतर पार्टी को एकतरफा कार्रवाई करने से रोकता है. वर्चस्व स्थापित करने का कोई भी आक्रामक प्रयास गठबंधन को अस्थिर करने का जोखिम पैदा कर सकता है.
एक अधिक मौलिक बाधा बिहार के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य की प्रकृति है. राज्य में चुनावी परिणाम अभी भी जातिगत समीकरणों से भारी रूप से प्रभावित होते हैं, जो अक्सर वैचारिक अपीलों पर भारी पड़ जाते हैं. नीतीश कुमार की राजनीतिक सफलता का श्रेय आंशिक रूप से प्रमुख जाति समूहों के बीच गठबंधन के माध्यम से इन जटिल सामाजिक समीकरणों को प्रबंधित करने और उनमें तालमेल बिठाने की उनकी क्षमता को दिया गया है. जबकि सम्राट चौधरी की पृष्ठभूमि भाजपा को विशिष्ट समुदायों के बीच अपनी अपील मजबूत करने में मदद कर सकती है, लेकिन यह स्वचालित रूप से उस व्यापक सामाजिक एकजुटता में नहीं बदलती जिसे नीतीश कुमार बनाए रखने में सक्षम थे. इसलिए, पार्टी के राष्ट्रीय एजेंडे से जुड़े वैचारिक मुद्दों को आगे रखने के प्रयासों का तत्काल प्रभाव सीमित हो सकता है, जहाँ जातिगत पहचानें अभी भी गहराई से जमी हुई हैं.
गठबंधन सहयोगियों के बीच नीतिगत मतभेद भी घर्षण पैदा कर सकते हैं. नीतीश कुमार के शासन में लागू की गई शराबबंदी इसका एक उदाहरण है. हालांकि इसने मतदाताओं के कुछ वर्गों, विशेषकर महिलाओं के बीच राजनीतिक समर्थन हासिल किया है, लेकिन इसने राज्य पर भारी आर्थिक बोझ भी डाला है और अवैध शराब के बाजारों को बढ़ावा दिया है. ऐसे मुद्दों की निरंतरता राजनीतिक विचारों और शासन के परिणामों के बीच तनाव को उजागर करती है. यदि भाजपा इस नीति पर दोबारा विचार करने या इसमें संशोधन करने की कोशिश करती है, तो इससे गठबंधन के भीतर मतभेद पैदा हो सकते हैं.
इन सभी समीकरणों के नीचे आपसी सावधानी की एक परत है. नीतीश कुमार पर भाजपा की निर्भरता उनके गठबंधन बदलने के इतिहास की जागरूकता से जुड़ी है. इसलिए उन्हें गठबंधन में बनाए रखना एक रणनीतिक आवश्यकता और अनिश्चितता को प्रबंधित करने का एक साधन दोनों है. साथ ही, पार्टी को उन सामाजिक गठबंधनों से लाभ मिलता है जिन्हें उनकी उपस्थिति बनाए रखने में मदद करती है, खासकर चुनावी रूप से महत्वपूर्ण समुदायों के बीच. इस संतुलन को समय से पहले बिगाड़ना बड़े जोखिम पैदा कर सकता है.
हल्के स्तर पर, संबंधों के बिगड़ने की स्थिति में संस्थागत माध्यमों से राजनीतिक दबाव डालने की संभावना भी बनी रहती है. ‘सृजन घोटाले’ जैसे विवाद, जिन्होंने नीतीश कुमार के कार्यकाल के दौरान प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठाए थे, व्यापक राजनीतिक संदर्भ का हिस्सा बने हुए हैं. हालांकि वे सीधे तौर पर भ्रष्टाचार में संलिप्त नहीं पाए गए हैं, लेकिन ऐसी घटनाएं दिखाती हैं कि कैसे शासन की विफलताओं को राजनीतिक सुविधा के अनुसार दोबारा उछाला जा सकता है.
अंतिम विश्लेषण में, यह घटनाक्रम गठबंधन की राजनीति के विशुद्ध व्यावहारिक चरित्र को दर्शाता है. व्यक्तिगत निष्ठाएं, ऐतिहासिक संबंध, जातिगत गतिशीलता, शासन के विमर्श और वैचारिक महत्वाकांक्षाएं ऐसे तरीकों से आपस में टकराती हैं जो सरल व्याख्या को चुनौती देते हैं. जो एक सैद्धांतिक कृतज्ञता के कार्य के रूप में दिखाई देता है, वह वास्तव में सत्ता, निरंतरता और भविष्य की स्थिति को ध्यान में रखकर उठाया गया एक नपा-तुला कदम है.
(यह अंग्रेजी लेख का हिंदी रूपांतरण है)
अफवाह से भड़की हिंसा: मणिपुर में झूठी खबर ने आर्मी अधिकारी को भीड़ के हाथों पिटवाया
मणिपुर में 2023 से चल रही जातीय हिंसा के बीच अफवाह और गलत जानकारी लगातार भीड़ हिंसा को बढ़ा रही है. पत्रकारों ने कई बार बताया है कि सोशल मीडिया पर फैलने वाले झूठे वीडियो और खबरें लोगों को भड़काती हैं. पहले भी ऐसे वीडियो सामने आए थे, जिनमें कूकी-जो समुदाय की महिलाओं के साथ हिंसा हुई, जिसमें दो वैइफेई महिलाओं को नग्न घुमाने का मामला शामिल है. ग्रीष्मा कुठार की रिपोर्ट के अनुसार, 14 अप्रैल 2026 को एक ऐसे ही अफवाह ने एक आर्मी अधिकारी की जान लगभग ले ली थी.
यह घटना मणिपुर के मोइरांग और चुराचांदपुर के बीच हुई. इससे पहले 7 अप्रैल को त्रोंग्लाओबी में एक विस्फोट में दो मैतेई बच्चों की मौत हो गई थी. इस मामले की जांच एनआईए कर रही है और अभी तक तीन यूनाइटेड कूकी नेशनल आर्मी के सदस्यों को गिरफ्तार किया गया है. इस घटना के बाद अफवाह फैली कि सुरक्षा बल हमलावरों को छिपा रहे हैं. इसके चलते लोगों ने सीआरपीएफ कैंपों पर हमला किया. एक जगह जब भीड़ ने हथियार लूटने की कोशिश की, तो सीआरपीएफ ने गोली चलाई, जिसमें तीन लोगों की मौत हुई और कई घायल हुए. इसके बाद हालात और तनावपूर्ण हो गए. घाटी में विरोध प्रदर्शन और मशाल जुलूस निकाले गए, इंटरनेट बंद कर दिया गया और कर्फ्यू लगाया गया.
14 अप्रैल को जब ग्रीष्मा इलाके से लौट रही थीं, तो उन्होंने देखा कि भीड़ तेजी से बढ़ रही है और सड़कें ब्लॉक की जा रही हैं. थोड़ी दूर पर एक सफेद कार पर भीड़ ने हमला कर दिया. कार में मौजूद लोगों में से एक व्यक्ति, जो असम राइफल्स का अधिकारी था, भीड़ के हाथ लग गया. अफवाह फैल गई कि वह कूकी उग्रवादियों को अपने साथ लेकर जा रहा है, जबकि अधिकारी और पत्रकार दोनों ने कहा कि कार में कोई कूकी नहीं था, लेकिन भीड़ ने उनकी बात नहीं मानी.
भीड़ ने अधिकारी को बुरी तरह पीटा, पत्थरों और डंडों से हमला किया और उसे घसीटते हुए ले गई. बाद में सुरक्षा बलों ने किसी तरह उन्हें बचाया. अधिकारी के चेहरे पर गंभीर चोटें थीं और वह खून से लथपथ था. जांच में सामने आया कि यह अफवाह तब शुरू हुई जब एक बैरिकेड पर कुछ लोगों ने बिना देखे ही कार में कूकी होने का दावा कर दिया. कार के शीशे काले थे, इसलिए अंदर बैठे लोगों को साफ नहीं देखा जा सकता था. इसके बावजूद यह बात तेज़ी से फैल गई और वीडियो भी वायरल हो गया, जबकि इंटरनेट बंद था.
इसके बाद पूरे इलाके में यह धारणा फैल गई कि सुरक्षा बल कूकी लोगों की मदद कर रहे हैं. इस अफवाह ने लोगों को और भड़काया और हिंसा बढ़ गई. इस घटना में 30 से ज्यादा लोग घायल हुए. मणिपुर पुलिस ने कहा कि कार में मौजूद लोग सुरक्षा बल के सदस्य थे और वे ड्रग्स से जुड़े एक मामले की जांच कर रहे थे. राज्य के गृह मंत्री गोविंदास कोंथौजम ने इसे “गलतफहमी” बताया और चार लोगों को हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया गया.
असम: अतिक्रमण हटाने के दौरान वन अधिकारियों और आदिवासियों के बीच झड़प, इंटरनेट बंद
भारत-भूटान सीमा से सटे असम के चिरांग जिले में आरक्षित वन भूमि से अतिक्रमण हटाने के उद्देश्य से चलाए गए एक बेदखली अभियान के दौरान वन कर्मियों और आदिवासी प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें हुईं है. यह मामला आरक्षित वन भूमि पर कथित अतिक्रमण के आरोप में आदिवासियों को हिरासत में लिए जाने के बाद तनाव में बदल गया.
स्क्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, वन अधिकारियों ने रिपु-चिरांग रिजर्व फॉरेस्ट में अतिक्रमण के आरोप में 25 आदिवासियों को हिरासत में लिया. इसके विरोध में महिलाओं सहित कई स्थानीय लोग उनकी रिहाई की मांग को लेकर रुनीखाता फॉरेस्ट रेंज कार्यालय पर जमा हो गए. प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने महिलाओं सहित अन्य लोगों के साथ मारपीट की. जिस कारण भारी भीड़ कार्यालय पर जमा हुई और कथित तौर पर वहां तोड़फोड़ की. भीड़ ने वन विभाग के कम से कम चार वाहनों को आग लगा दी और कार्यालय को भी जलाने का प्रयास किया.
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब पुलिस ने मौके पर पहुंचकर प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया. भीड़ को नियंत्रित करने के लिए वन कर्मियों ने कथित तौर पर फायरिंग भी की. इस हिंसा में 30 से अधिक लोग घायल हुए हैं, जिनमें से अधिकांश पुलिसकर्मी हैं. पुलिस ने चार और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया है.
हिंसा को देखते हुए राज्य सरकार ने चिरांग और कोकराझार जिलों में इंटरनेट और डेटा सेवाओं को निलंबित करने का आदेश दिया है. ये दोनों जिले बोडोलैंड क्षेत्रीय क्षेत्र का हिस्सा हैं.
ऑल आदिवासी स्टूडेंट्स एसोसिएशन और ऑल संताल स्टूडेंट्स यूनियन ने आरोप लगाया है कि यह बेदखली अभियान विशेष रूप से आदिवासी समुदायों को निशाना बनाकर चलाया गया. संगठनों का कहना है कि उसी भूमि पर कई अन्य समुदाय भी रहते हैं, लेकिन कार्रवाई केवल आदिवासियों के खिलाफ की गई. इसके विरोध में संगठनों ने पूरे बोडोलैंड क्षेत्र में प्रदर्शन करने की घोषणा की है.
66 बच्चों की मौत, क्लीन चिट और ‘गायब होने के नाटक’ के बाद, मेडेन फार्मा की नए नाम के साथ वापसी
यदि सत्तारुढ़ दल के प्रभावशाली नेताओं के साथ आपके संबंध हैं या उठना-बैठना है तो फिर आपका कभी कुछ नहीं बिगड़ेगा. चाहे फिर आपकी कंपनी द्वारा निर्मित दवा कितने ही बच्चों की जान क्यों न ले ले, बाज़ार में कितना ही नाम खराब क्यों न हो जाए और नियम-कानूनों की परवाह न करें. आपकी सेहत पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता. आप नए नाम से काम करने लगते हैं. सबको सब पता है, मगर आपका बाल बाँका नहीं होता.
‘द न्यूज़ मिनट’ में मारिया टेरेसा राजू की यह रिपोर्ट ‘मेडेन फार्मास्यूटिकल्स’ और गाम्बिया में दूषित कफ सिरप के कारण हुई कम से कम 66 बच्चों की मौत की त्रासदी की एक गहरी पड़ताल करती है. यहाँ इस विस्तृत खोजी रिपोर्ट का सारांश दिया जा रहा है:
रिपोर्ट के अनुसार, गाम्बिया में हुई मौतों के बाद विवादों के घेरे में आई मेडेन फार्मास्यूटिकल्स ने फरवरी 2025 में चुपचाप अपना नाम बदलकर ‘क्योरक्लिप फार्मास्यूटिकल्स’ कर लिया. जाँचकर्ताओं ने पाया कि नई दिल्ली के जिस पते पर यह कंपनी पंजीकृत है, वहाँ किसी भी प्रकार का कोई बोर्ड या जीएसटी प्रमाणपत्र मौजूद नहीं है. इसके बजाय, वहाँ ‘किकास कॉस्मेटिक्स’ नामक एक नए ब्रांड का बोर्ड लगा है. दिलचस्प बात यह है कि कंपनी के रिकॉर्ड और जीएसटी फाइलिंग लगातार जारी हैं, जिससे पता चलता है कि कंपनी प्रशासनिक रूप से जीवित है, भले ही धरातल पर वह अपनी पहचान छिपा रही हो.
2022 में गाम्बिया के बच्चों में ‘एक्यूट किडनी इंजरी’ (गुर्दे की गंभीर मामलों एकेआई) के मामलों में अचानक बढ़ोतरी हुई. जाँच में पाया गया कि इन बच्चों ने मेडेन फार्मा द्वारा निर्मित चार प्रकार के कफ सिरप का सेवन किया था, जिनमें डायथिलीन ग्लाइकोल (डीईजी) और एथिलीन ग्लाइकोल (ईजी) जैसे जहरीले तत्व पाए गए. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसके खिलाफ ग्लोबल अलर्ट जारी किया.
वर्तमान में गाम्बिया उच्च न्यायालय में 19 पीड़ित परिवारों ने मुआवजे के लिए दीवानी मुकदमा दायर किया है. कंपनी ने अदालत के किसी भी समन का जवाब नहीं दिया है, जिसके कारण मामला एकपक्षीय तरीके से आगे बढ़ रहा है. गाम्बिया के वकीलों का कहना है कि कंपनी जानबूझकर जवाबदेही से बच रही है.
भारतीय नियामकों की भूमिका और ‘क्लीन चिट’ का रहस्य
इस मामले में सबसे बड़ा विवाद भारतीय और अंतरराष्ट्रीय प्रयोगशालाओं के परिणामों में भिन्नता को लेकर है. घाना, फ्रांस और स्विट्जरलैंड की प्रयोगशालाओं ने दवाओं में जहर की पुष्टि की थी, लेकिन भारतीय ‘क्षेत्रीय औषधि परीक्षण प्रयोगशाला’ (आरडीटीएल), चंडीगढ़ ने इन्हीं नमूनों को सुरक्षित घोषित कर दिया. इसी आधार पर तत्कालीन भारतीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया ने कंपनी को ‘क्लीन चिट’ दे दी और डबल्यूएचओ के दावों को भारत की छवि खराब करने की साजिश बताया.
रिपोर्ट में एक विस्फोटक आरोप का भी जिक्र है. हरियाणा के एक वकील, यशपाल ने आरोप लगाया था कि कंपनी ने परीक्षण के लिए भेजे जाने वाले नमूनों को बदलने के लिए तत्कालीन राज्य औषधि नियंत्रक को ₹5 करोड़ की रिश्वत दी थी. हालांकि, इस भ्रष्टाचार की जाँच फिलहाल ठंडी पड़ती दिखाई दे रही है और संबंधित वकील का भी अब कुछ अता-पता नहीं है.
नियामक विफलताएं और पुराना आपराधिक इतिहास
रिपोर्ट बताती है कि मेडेन फार्मा का इतिहास पहले से ही दागदार रहा है: 2011 में बिहार ने इसे घटिया दवाओं के लिए ब्लैकलिस्ट किया. 2013 में वियतनाम ने इसे गुणवत्ता उल्लंघन के लिए प्रतिबंधित किया. 2023 में सोनीपत की एक अदालत ने 2014 के एक पुराने मामले (घटिया रैनिटिडिन गोलियां) में इसके निदेशकों को ढाई साल की सजा सुनाई, हालांकि उन्हें जेल नहीं जाना पड़ा.
अधिकारियों का तर्क था कि ये सिरप केवल निर्यात के लिए थे, लेकिन जाँच में सामने आया कि मेडेन की दवाएं न केवल भारतीय बाजार में उपलब्ध थीं, बल्कि हरियाणा सरकार द्वारा भी खरीदी गई थीं.
जवाबदेही से बचने का जादुई नेटवर्क
जाँच के दौरान पता चला कि कंपनी के निदेशकों—नरेश कुमार गोयल और उनके बेटों—का कंपनियों का एक बड़ा नेटवर्क है. जैसे ही एक कंपनी विवाद में आती है, वे दूसरी कंपनियों के माध्यम से काम जारी रखते हैं. उदाहरण के लिए, ‘इंटैक्ट’ और ‘रियल ड्रग्स’ जैसी कंपनियों पर कोडीन आधारित कफ सिरप के अवैध निर्यात को लेकर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) की कार्रवाई भी हो चुकी है.
जब मारिया ने निदेशकों से मिलने की कोशिश की, तो कर्मचारी शत्रुतापूर्ण व्यवहार करने लगे. कार्यालयों के बोर्ड हटा दिए गए और सीसीटीवी के माध्यम से निगरानी कर दरवाजा खोलने से मना कर दिया गया. एक बेटे, मनीष गोयल ने दावा किया कि वह अब अपने पिता से अलग हो गया है, लेकिन उसने यह भी कहा कि मेडेन को केवल “बलि का बकरा” बनाया गया है.
आज स्थिति यह है कि मेडेन फार्मा ‘क्योरक्लिप’ बनकर सोनीपत के अपने कारखाने पर नया बोर्ड लगा चुकी है. भारतीय नियामक अब ‘गैस क्रोमैटोग्राफी’ (जीसी) जैसे कड़े परीक्षणों की बात कर रहे हैं, लेकिन अतीत की मौतों के लिए कोई स्पष्ट जवाबदेही तय नहीं की गई है. गरीब गाम्बियाई परिवार आज भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जबकि कंपनी के मालिक राजनाथ सिंह और मनोहर लाल खट्टर जैसी प्रभावशाली राजनीतिक हस्तियों के साथ तस्वीरों में नजर आते हैं और अपने व्यावसायिक साम्राज्य को रीब्रांडिंग के जरिए सुरक्षित करने में लगे हैं. यह रिपोर्ट भारतीय दवा उद्योग की निगरानी प्रणाली में मौजूद गहरे भ्रष्टाचार और वैश्विक स्तर पर मानव जीवन की कीमत पर मुनाफे को तरजीह देने की कड़वी सच्चाई को उजागर करती है. अंग्रेजी में पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है.
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