17/04/2026: मोदी सरकार की हार | महिला आरक्षण अटका | परिसीमन पर घमासान | राहुल पर जाँच | आरएसएस विज्ञापन | असम हिंसा | निदा खान | अडानी नंबर-1 | बंगाली मुसलमानों में डर | 'कॉमेडी' पर पहरा
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
12 साल में पहली बार मोदी सरकार विफल; महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक गिरा, इसलिए परिसीमन समेत दोनों विधेयकों पर वोटिंग नहीं कराई
‘निदा खान घर पर हैं, कोई पुलिस नहीं आई’: नासिक टीसीएस मामले की आरोपी के परिवार ने कहा- रची जा रही साजिश
संभल जिला प्रशासन ने इमामबाड़ा और ईदगाह को ‘अवैध’ बताते हुए ढहाया
नए ट्रांसजेंडर कानून से अभिभावकों में दहशत, डॉक्टरों ने जताई चिंता
‘अतिक्रमणकारियों’ को हिरासत में लेने पर असम में हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़, कई घायल
इलाहाबाद हाईकोर्ट: राहुल गांधी की दोहरी नागरिकता के आरोपों पर एफआईआर और जाँच के निर्देश
पहलगाम का असर: ट्यूलिप गार्डन में पर्यटकों की संख्या में 50% से अधिक की गिरावट; 8.5 लाख का बना था रिकॉर्ड
‘जादूगर पकड़ा गया है’: राहुल ने मोदी पर साधा निशाना, महिला आरक्षण को चुनावी नक्शा बदलने की कोशिश बताया
जंग की ‘काली बारिश’: जब युद्ध लीलने लगे कुदरत का आँचल
‘राजनीतिक नोटबंदी’ साबित होगा परिसीमन: लोकसभा में शशि थरूर
गौतम अडानी ने मुकेश अंबानी को पछाड़ा; फिर बने एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति
कुशीनगर में 5 साल की बच्ची से रेप का आरोप नईमुद्दीन पर लगाया, असली दोषी निकला सुरेन्द्र सिंह
आरएसएस के 100 साल पर केंद्र ने विज्ञापनों पर 76.13 लाख रुपये खर्च किए
महिला आरक्षण कानून लागू, लेकिन परिसीमन और जनगणना से जुड़ी शर्तें बनी बाधा
पश्चिम एशिया युद्ध का असर: फिरोजाबाद की ग्लास इंडस्ट्री ठप, कारीगरों की रोजी-रोटी पर संकट
नोएडा फैक्ट्री विवाद: सिर्फ वेतन नहीं, रोज़गार व्यवस्था की गहरी समस्या
पवन कल्याण पर टिप्पणी के आरोप में एक और कॉमेडियन हिरासत में, दो दिन में दूसरी कार्रवाई
बंगाली मुसलमानों के सामने मरो या टीएमसी को वोट देने वाली स्तिथि
12 साल में पहली बार मोदी सरकार विफल; महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक गिरा, शेष विधेयकों पर वोटिंग नहीं
‘पीटीआई’ के मुताबिक, नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा लोकसभा की सदस्य संख्या को वर्तमान 543 से बढ़ाकर 850 तक करने के लिए परिसीमन से जुड़े एक विवादास्पद विधेयक सहित तीन विधेयकों को पारित कराने का प्रयास शुक्रवार को लोकसभा में विफल हो गया. बीते 12 साल में यह पहली बार है कि मोदी सरकार कोई विधेयक पास नहीं करा पाई.
इन विधेयकों में 131 वां संविधान संशोधन भी शामिल था, जिसके बारे में सरकार का कहना था कि इसका उद्देश्य 2029 से विधायिकाओं में महिला आरक्षण लागू करना है. लगभग 21 घंटे की चर्चा के बाद मतदान हुआ और कुल 298 सांसदों ने इसका समर्थन किया और 230 ने विरोध किया; यह संख्या आवश्यक दो-तिहाई बहुमत से कम रह गई. मतदान करने वाले 528 सदस्यों में से, दो-तिहाई बहुमत के लिए 352 मतों की आवश्यकता थी. इस प्रकार 54 वोटों के अंतर से संविधान संशोधन विधेयक गिर गया. लोकसभा में सदस्य संख्या 543 है, लेकिन तीन सीटें रिक्त हैं. विधेयक के गिरने के बाद, इससे जुड़े दो अन्य बिल—जिनमें परिसीमन और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव था—वोटिंग के लिए नहीं लाए गए.
संविधान संशोधन विधेयक के अनुसार, 2011 की जनगणना पर आधारित परिसीमन अभ्यास के बाद, 2029 के संसदीय चुनावों से पहले महिला आरक्षण कानून को “प्रभावी” बनाने के लिए लोकसभा सीटों को वर्तमान 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 किया जाना था.
महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में भी सीटों की संख्या बढ़ाई जानी थी.
लोकसभा में विधेयकों के गिरने के बाद केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा, “हम यह सुनिश्चित करेंगे कि महिलाओं को विधायिकाओं में आरक्षण मिले. महिलाओं को अधिकार देने के लिए मोदी सरकार का संघर्ष जारी रहेगा. विपक्ष ने महिलाओं को सम्मानित करने का ऐतिहासिक अवसर खो दिया है.”
विपक्ष, जिसका कहना था कि यदि महिला आरक्षण को विवादास्पद परिसीमन प्रक्रिया से अलग कर दिया जाए तो वे इसे लागू करने में मदद के लिए तैयार हैं, उसने सरकार की इस विफलता पर खुशी मनाई. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन, जिन्होंने परिसीमन विधेयक को “काला कानून” करार दिया था, ने कहा, “तमिलनाडु ने दिल्ली को हरा दिया.”
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा, “मैं प्रधानमंत्री से कहना चाहता हूँ कि अगर वे वास्तव में महिला आरक्षण चाहते हैं, तो उन्हें 2023 वाला कानून लाना चाहिए और पूरा विपक्ष उसका समर्थन करेगा.” राहुल ने ‘एक्स’ पर लिखा, “संशोधन विधेयक गिर गया. उन्होंने महिलाओं के नाम पर, संविधान को तोड़ने के लिए, असंवैधानिक तरकीब का इस्तेमाल किया. भारत ने देख लिया. INDIA ने रोक दिया. जय संविधान.”
‘जादूगर पकड़ा गया है’: राहुल ने मोदी पर साधा निशाना, महिला आरक्षण को चुनावी नक्शा बदलने की कोशिश बताया
विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोला. उन्होंने परिसीमन अभ्यास के साथ महिला आरक्षण विधेयक में संशोधन के प्रस्तावित बिलों को देश के चुनावी नक्शे को बदलने की एक “घबराहट में की गई प्रतिक्रिया” करार दिया और कहा कि “जादूगर पकड़ा गया है.”
‘टीएनआईई’ के अनुसार, लोकसभा में बहस के दौरान गांधी ने कहा कि इस कानून का महिला सशक्तिकरण से बहुत कम लेना-देना है. उन्होंने भाजपा पर अपनी राजनीतिक ताकत के “क्षरण” से डरे होने का आरोप लगाया और कहा कि सरकार इन प्रस्तावित बदलावों के जरिए भारत के राजनीतिक मानचित्र में “फेरबदल” करने की कोशिश कर रही है.
राहुल ने कहा, “यहाँ कुछ सच बताने की जरूरत है. यह महिलाओं का बिल नहीं है; इसका महिला सशक्तिकरण से कोई लेना-देना नहीं है. यह चुनावी नक्शे को बदलने की एक कोशिश है.”
यह दावा करते हुए कि भाजपा जानती थी कि यह बिल पास नहीं हो सकता, कांग्रेस सांसद ने इस कानून को चुनावी मानचित्र को फिर से तैयार करने और प्रधानमंत्री की महिला-हितैषी छवि पेश करने की एक “घबराहट भरी प्रतिक्रिया” बताया.
उन्होंने कहा, “भाजपा जानती थी, वे (सत्ता के लोग) बहुत स्पष्ट रूप से जानते थे कि यह बिल वास्तव में पारित नहीं किया जा सकता. वे मूर्ख नहीं हैं. उन्हें पता था कि विपक्ष का हर व्यक्ति इसका विरोध करेगा. यह बिल पास नहीं हो सकता. यह एक घबराहट वाली प्रतिक्रिया थी, क्योंकि प्रधानमंत्री को किसी भी कीमत पर दो संदेश भेजने थे. पहला, उन्हें भारत के चुनावी नक्शे को बदलने की जरूरत थी. और दूसरा, उन्हें फिर से यह संदेश देना था कि वे महिला-हितैषी हैं. वे ऐसा क्यों कर रहे हैं, यह मैं आपकी कल्पना पर छोड़ता हूँ.”
राहुल ने आगे कहा, “सच तो यह है कि जादूगर पकड़ा गया है. बालाकोट का जादूगर, नोटबंदी का जादूगर, सिंदूर का जादूगर अचानक पकड़ा गया है.”
“प्रधानमंत्री और मुझे पत्नी वाली समस्या नहीं है”
एक दोस्ताना नोकझोंक के दौरान, राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके पास “पत्नी वाली समस्या” नहीं है. कांग्रेस सांसद ने इस बात पर जोर दिया कि हर किसी ने अपने जीवन में महिलाओं से बहुत कुछ सीखा है.
गांधी ने कहा, “यहां मौजूद हम सभी लोग अपने जीवन में महिलाओं—माताओं, बहनों, पत्नियों—से प्रभावित हुए हैं, उन्होंने हमें सिखाया है और हमने उनसे बहुत कुछ सीखा है.” उन्होंने संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू की उस हल्की-फुल्की टिप्पणी का जिक्र करते हुए कहा, “बेशक, प्रधानमंत्री और मेरे पास पत्नी वाली समस्या नहीं है, इसलिए हमें वह इनपुट नहीं मिलता, लेकिन हमारी माताएँ और बहनें हैं.” दरअसल, रिजिजू ने मज़ाक में कहा था कि उन्हें घर पर डांट पड़ी, क्योंकि उन्होंने केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल की तरह अपनी पत्नी के लिए कविता नहीं लिखी थी.
राहुल गांधी ने अपना हमला तेज करते हुए सरकार पर आरोप लगाया कि वह दक्षिण, पूर्वोत्तर और छोटे राज्यों को यह संकेत दे रही है कि भाजपा को सत्ता में बनाए रखने के लिए उनका प्रतिनिधित्व कम कर दिया जाएगा. उन्होंने इस कदम को “देशद्रोही कृत्य से कम नहीं” बताया और कहा कि विपक्ष संसद में इसे हराने के लिए एकजुट होगा.
गांधी ने कहा, “मैं देश भर के अपने दोस्तों, भाइयों और बहनों, विशेष रूप से दक्षिणी राज्यों, छोटे राज्यों और पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों को आश्वस्त करना चाहता हूँ कि वे चिंता न करें. हम ऐसा नहीं होने देंगे. हम भारत संघ पर किसी भी हमले की अनुमति नहीं देंगे. आप भारत संघ में समान भागीदार हैं, और कोई भी आपके प्रतिनिधित्व को कम करने की हिम्मत नहीं करेगा.”
विपक्ष के नेता ने सरकार से 2023 के महिला आरक्षण विधेयक को तत्काल लागू करने के लिए वापस लाने का आग्रह किया और कहा कि विपक्ष “इसी सेकंड” इसे पारित करने में समर्थन देगा.
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार ओबीसी को पर्याप्त शक्ति और प्रतिनिधित्व देने से बचने की कोशिश कर रही है, और यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही है कि अगले 15 वर्षों तक राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर जाति जनगणना का कोई प्रभाव न पड़े.
राहुल ने कहा, “यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि भारतीय समाज ने दलितों, ओबीसी और उनकी महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार किया... यहाँ जो कोशिश की जा रही है, वह जाति जनगणना को बायपास करने की है. यहाँ वे मेरे ओबीसी भाइयों और बहनों को शक्ति और प्रतिनिधित्व देने से बचने और उनसे शक्ति छीनने की कोशिश कर रहे हैं.”
राहुल गांधी की दोहरी नागरिकता के आरोपों पर एफआईआर और जाँच के निर्देश
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने शुक्रवार को कहा कि राहुल गांधी की कथित दोहरी नागरिकता के विवाद से जुड़े दावों की जाँच की जानी चाहिए और अधिकारियों को कानूनी कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया.
अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि वह या तो स्वयं जाँच शुरू करे या इस मामले को केंद्रीय जाँच एजेंसियों को सौंप दे. इसके साथ ही, अदालत ने पुलिस को लोकसभा में विपक्ष के नेता से जुड़े इस मामले में प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज करने का भी निर्देश दिया है.
‘टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के मुताबिक, यह जाँच कर्नाटक निवासी और भाजपा कार्यकर्ता एस. विग्नेश शिशिर की एक याचिका के संदर्भ में शुरू की गई है. इस याचिका में लखनऊ की एक विशेष सांसद/विधायक अदालत के 28 जनवरी के फैसले को चुनौती दी गई थी.
निचली अदालत ने तब सूचित किया था कि उसके पास नागरिकता से संबंधित मामलों में एफआईआर दर्ज करने या जाँच शुरू करने का अधिकार नहीं है. यह शिकायत पहली बार 17 दिसंबर, 2025 को रायबरेली की एक विशेष एमपी/एमएलए अदालत में दर्ज की गई थी, जिसके बाद इसे लखनऊ स्थानांतरित कर दिया गया था.
याचिकाकर्ता ने भारतीय न्याय संहिता, आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, पासपोर्ट अधिनियम और विदेशी अधिनियम के प्रावधानों के तहत उल्लंघन का आरोप लगाते हुए व्यापक जाँच की मांग की थी.
विग्नेश ने दावा किया कि उनके पास ब्रिटेन के अधिकारियों के ईमेल के रूप में ऐसे सबूत हैं जो उनके दावों को साबित करेंगे. उन्होंने तर्क दिया कि यह राहुल गांधी को भारतीय चुनाव लड़ने या लोकसभा सदस्य के रूप में पद संभालने के लिए अयोग्य बनाता है.
परिसीमन की प्रक्रिया ‘राजनीतिक नोटबंदी’ की तरह : लोकसभा में शशि थरूर
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, लोकसभा में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयकों पर चर्चा के दौरान कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद शशि थरूर ने कहा कि “नए भारत” की ओर हमारे कदम ऐसे नहीं होने चाहिए जो अंततः एक “विभाजित भारत” की ओर ले जाएं. थरूर ने परिसीमन की प्रक्रिया को ‘राजनीतिक नोटबंदी’ करार देते हुए इस पर व्यापक विचार-विमर्श की मांग की.
थरूर ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि जिस जल्दबाज़ी में नोटबंदी लागू की गई थी, उसी जल्दबाज़ी में परिसीमन लाया जा रहा है. उन्होंने चेतावनी दी कि इसके परिणाम देश के संघीय ढांचे के लिए विनाशकारी हो सकते हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सदन में सदस्यों की संख्या 850 तक पहुँच गई, तो संसद की कार्यक्षमता और चर्चा का स्तर क्या रह जाएगा?
कांग्रेस सांसद ने सरकार से अपील की कि महिला आरक्षण और परिसीमन के मुद्दों को आपस में न उलझाया जाए. उन्होंने कहा, “महिला आरक्षण बिल आज ही पास करें, हम समर्थन करेंगे. इसे अगले चुनावों से ही लागू करें. नारी शक्ति पर केवल भाषण न दें, बल्कि उसे हकीकत में बदलें.” उनके अनुसार, महिला आरक्षण के लिए परिसीमन का इंतजार करना केवल एक बहाना है.
सदन में डीएमके सांसद कनिमोझी ने भी थरूर का समर्थन करते हुए इसे सरकार का “चुनावी जाल” बताया. उन्होंने परिसीमन आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया और राज्यों के अधिकारों के हनन पर सवाल उठाए. विपक्ष ने एकजुट होकर कहा कि राज्यों को दिल्ली के आदेशों का गुलाम नहीं समझा जाना चाहिए.
महिला आरक्षण कानून लागू, लेकिन परिसीमन और जनगणना से जुड़ी शर्तें बनी बाधा
केंद्र सरकार ने 2023 के महिला आरक्षण कानून को 16 अप्रैल 2026 से लागू कर दिया है. यह जानकारी कानून मंत्रालय द्वारा जारी गजट नोटिफिकेशन में दी गई है. इस कानून के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है. हालांकि, कानून लागू होने के बावजूद इसे तुरंत लागू नहीं किया जा सकता. इसके लिए पहले परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होनी जरूरी है, जो नई जनगणना के आधार पर होगी. मौजूदा व्यवस्था के अनुसार, यह प्रक्रिया 2027 के बाद ही पूरी होने की संभावना है, यानी आरक्षण लागू होने में अभी समय लगेगा.
यह फैसला ऐसे समय आया है जब संसद में इसी कानून से जुड़े नए संवैधानिक संशोधनों पर चर्चा चल रही है. इन संशोधनों का उद्देश्य महिला आरक्षण को अगले लोकसभा चुनाव 2029 तक लागू करना है. इन संशोधनों को लोकसभा और राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत से पास करना होगा. लेकिन केंद्र की सत्तारूढ़ एनडीए सरकार के पास लोकसभा में यह बहुमत नहीं है, इसलिए उसे अन्य दलों के समर्थन की जरूरत होगी. 2023 में इस कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल चुकी थी, लेकिन इसे लागू करने के लिए सरकार को तारीख घोषित करनी थी, जो अब की गई है. कांग्रेस ने इस कानून को संसद में संशोधन पर चर्चा के दौरान लागू करने के फैसले को “अजीब” बताया है.
‘अतिक्रमणकारियों’ को हिरासत में लेने पर असम में हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़, कई घायल
असम के चिरांग जिले में शुक्रवार को वन भूमि पर कथित रूप से अतिक्रमण करने वाले कुछ स्थानीय लोगों को हिरासत में लिए जाने के विरोध में भीड़ ने वन विभाग के ‘रुनीखाता रेंज कार्यालय’ में जमकर तांडव मचाया.
‘एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस’ के अनुसार, उग्र भीड़ ने रेंज कार्यालय के साथ-साथ आवासीय क्वार्टरों में भी तोड़फोड़ की, परिसर में खड़े सात से आठ सरकारी वाहनों को आग के हवाले कर दिया और कुछ हथियार भी छीन लिए. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि बाद में उन हथियारों को बरामद कर लिया गया है.
पुलिस ने स्थिति पर नियंत्रण पाने के लिए बल प्रयोग किया, लेकिन हिंसा जारी रही. इस घटना में 30 से अधिक लोग घायल हुए हैं, जिनमें से अधिकांश पुलिसकर्मी हैं. पुलिस ने कम से कम चार प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया है.
भूटान सीमा के पास रिपु-चिरांग आरक्षित वन में अतिक्रमण करने वाले आदिवासी समुदाय के कुछ लोगों को हिरासत में लिए जाने के बाद, गुरुवार रात से ही इलाके में तनाव बना हुआ था.
महिलाओं सहित स्थानीय लोगों ने गुरुवार रात को ही वन कार्यालय का घेराव कर हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई की मांग की थी, लेकिन वन कर्मियों ने उन्हें तितर-बितर कर दिया था. हालांकि, शुक्रवार सुबह लाठी-डंडों से लैस भीड़ फिर से वहां पहुंची और हमला कर दिया. हिंसा भड़कते ही पुलिस बल मौके पर पहुंचा। पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिसके जवाब में प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया.
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि पिछली रात वन कर्मियों ने महिलाओं सहित कुछ स्थानीय लोगों के साथ मारपीट की थी. उन्होंने दोषी कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की.
मौके पर मौजूद एक प्रदर्शनकारी ने मीडिया से कहा कि जब तक दोषियों की गिरफ्तारी नहीं होती, वे शांत नहीं बैठेंगे. उन्होंने कहा, “प्रशासन ने हमें आश्वासन दिया है कि दोषी वन कर्मियों को गिरफ्तार किया जाएगा. तभी हमें शांति मिलेगी, अन्यथा यह अशांति जारी रहेगी.”
प्रदर्शनकारी ने आगे बताया, “2014 की जातीय हिंसा में हमारे लोगों ने अपनी जमीन खो दी थी और जंगल की जमीन पर कब्जा कर लिया था. कल, जमीन पर कब्जा करने के आरोप में प्रशासन ने हमारे 25 लोगों को उठा लिया. उनकी हिरासत के विरोध में ही आज यह हिंसा हुई.” ताजा रिपोर्ट मिलने तक क्षेत्र में स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई थी.
संभल जिला प्रशासन ने इमामबाड़ा और ईदगाह को ‘अवैध’ बताते हुए ढहाया
संभल जिला प्रशासन ने गुरुवार को सरकारी भूमि पर अवैध निर्माण का हवाला देते हुए बिचौली गांव में एक इमामबाड़ा और एक ईदगाह को ध्वस्त कर दिया. कानून-व्यवस्था की स्थिति न बिगड़े, इसके लिए भारी सुरक्षा घेरे के बीच कई बुलडोजरों की मदद से यह कार्रवाई की गई.
अधिकारियों के अनुसार, संबंधित भूमि आधिकारिक रिकॉर्ड में ‘घूरा’ (खाद के गड्ढे) के रूप में दर्ज थी. तहसील न्यायालय ने जनवरी में बेदखली का आदेश जारी करते हुए स्थल से अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया था. उसी आदेश पर कार्रवाई करते हुए, प्रशासन ने राजस्व अधिकारियों की एक विशेष टीम गठित कर पहले से ही तैयारियां पूरी कर ली थीं.
‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की खबर है कि प्रशासनिक टीम चार बुलडोजरों के साथ मौके पर पहुंची. उपजिलाधिकारी (एसडीएम) निधि पटेल की मौजूदगी में ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू हुई, जिसके तहत इमामबाड़ा और ईदगाह के ढांचों को योजनाबद्ध तरीके से गिरा दिया गया.
अभियान के दौरान स्थानीय निवासियों की भारी भीड़ जमा हो गई, जिसे देखते हुए अधिकारियों ने सतर्कता बढ़ा दी. जिलाधिकारी राजेंद्र पैंसिया और पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार विश्नोई सहित वरिष्ठ अधिकारी स्थिति की निगरानी करने और क्षेत्र के कर्मियों को आवश्यक निर्देश देने के लिए मौके पर पहुंचे.
ऑपरेशन की संवेदनशीलता को देखते हुए पूरे इलाके को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया था. शांति व्यवस्था बनाए रखने और बिना किसी बाधा के ध्वस्तीकरण सुनिश्चित करने के लिए रैपिड रिस्पांस फोर्स (आरआरएफ) और स्थानीय पुलिस के जवानों को बड़ी संख्या में तैनात किया गया था.
जिलाधिकारी राजेंद्र पैंसिया ने स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई पूरी तरह से अदालती आदेशों के अनुपालन में की गई थी और इसका उद्देश्य सरकारी भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराना था.
गौतम अडानी ने मुकेश अंबानी को पछाड़ा; फिर बने एशिया के सबसे अमीर
‘द टेलीग्राफ’ की रिपोर्ट के अनुसार, अडानी समूह के शेयरों में आई ज़बरदस्त तेज़ी के कारण उद्योगपति गौतम अडानी ने एक बार फिर मुकेश अंबानी को पीछे छोड़ दिया है. इस उछाल के साथ अडानी न केवल भारत, बल्कि एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति बन गए हैं.
ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, गौतम अडानी की कुल संपत्ति अब $92.6 बिलियन पहुँच गई है, जबकि रिलायंस इंडस्ट्रीज के प्रमुख मुकेश अंबानी की नेटवर्थ $90.8 बिलियन पर है. वैश्विक स्तर पर अडानी अब ब्लूमबर्ग बिलियनेयर इंडेक्स में 19वें स्थान पर काबिज हैं. अडानी और अंबानी ही मात्र दो ऐसे भारतीय हैं जो दुनिया के शीर्ष 50 अमीरों की सूची में शामिल हैं.
अडानी और अंबानी के बीच शीर्ष स्थान को लेकर पिछले कुछ वर्षों से कड़ी प्रतिस्पर्धा रही है. अडानी पहली बार फरवरी 2022 में अंबानी को पछाड़कर नंबर वन बने थे. हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के बाद अडानी समूह को $100 बिलियन का घाटा सहना पड़ा, जिससे अंबानी पुनः शीर्ष पर आ गए. लेकिन साल 2024-25 में बुनियादी ढांचे और ऊर्जा क्षेत्र में विस्तार के चलते अडानी के शेयरों में फिर से जान लौटी और उन्होंने अपना खोया हुआ स्थान वापस पा लिया.
अडानी समूह आज भारत का सबसे बड़ा निजी बंदरगाह नेटवर्क, निजी हवाई अड्डा संचालक और नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादक है. समूह का पोर्टफोलियो रक्षा, डेटा सेंटर, सीमेंट और मीडिया जैसे विविध क्षेत्रों में फैला हुआ है. अडानी भारत के पहले ऐसे ‘फर्स्ट-जनरेशन’ उद्यमी हैं, जिन्होंने $200 बिलियन से अधिक मार्केट कैप वाला कारोबारी साम्राज्य खड़ा किया है.
अगर वैश्वियक सूची पर नज़र डालें तो एलन मस्क $656 बिलियन के साथ दुनिया में सबसे अमीर उद्योगपति हैं. वहीं लैरी पेज: $286 बिलियन के साथ दूसरे एवं जेफ बेजोस $269 बिलियन के साथ तीसरे नंबर पर हैं.
कुशीनगर में 5 साल की बच्ची से रेप का आरोप नईमुद्दीन पर लगाया, असली दोषी निकला सुरेन्द्र सिंह
ऑल्ट न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में एक 5 वर्षीय बच्ची के साथ हुई दरिंदगी की घटना को सोशल मीडिया पर गलत और सांप्रदायिक रंग देकर पेश किया गया. घटना 10 अप्रैल 2026 की है, जिसके बाद कई सोशल मीडिया हैंडल्स और सुदर्शन न्यूज़ जैसे चैनलों ने बिना किसी जांच के स्कूल के प्रधानाध्यापक नईमुद्दीन अंसारी को दोषी ठहराना शुरू कर दिया. उन पर “हैवान” जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए इस पूरी घटना को हिंदू-मुस्लिम रंग देने की कोशिश की गई.
शुरुआत में, बच्ची की बड़ी बहन द्वारा आशंका जताने और हिंदू संगठनों के भारी विरोध व जन दबाव के कारण, पुलिस ने प्रधानाध्यापक नईमुद्दीन अंसारी को हिरासत में ले लिया था. 11 अप्रैल को पुलिस ने भी अपने बयान में आरोपी को हिरासत में लेने की पुष्टि की थी, जिससे सोशल मीडिया पर नैरेटिव को और बल मिला.
कुशीनगर पुलिस द्वारा की गई गहन जांच के बाद 13 अप्रैल को यह स्पष्ट हुआ कि नईमुद्दीन अंसारी निर्दोष हैं. असली अपराधी सुरेंद्र सिंह निकला, जो पीड़िता के परिवार का परिचित था.
घटना वाले दिन जब बच्ची स्कूल के पास आम के बगीचे में गई थी, तब सुरेंद्र सिंह ने उसके भरोसे का फायदा उठाकर उसे एकांत में ले जाकर बलात्कार किया. आरोपी सुरेंद्र सिंह ने पूछताछ में अपना जुर्म कबूल कर लिया है और पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है.
आरएसएस के 100 साल पर केंद्र ने विज्ञापनों पर 76.13 लाख रुपये खर्च किए
संस्कृति मंत्रालय ने राष्ट्र्य स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 वर्ष पूरे होने के मौक़े पर प्रिंट विज्ञापनों पर तक़रीबन 76.13 लाख रुपये ख़र्च किए. द हिन्दू की रिपोर्ट के मुताबिक़, यह जानकारी आरटीआई कार्यकर्ता अजय बसुदेव बोस द्वारा दाखिल सूचना के अधिकार आवेदन के जवाब में सामने आई.
बोस ने अपने आरटीआई आवेदन में संस्कृति मंत्रालय से यह जानकारी मांगी थी कि आरएसएस के 100 वर्ष पूर्ण होने अवसर पर कितना सरकारी पैसा खर्च किया गया. जिसके जवाब में संस्कृति मंत्रालय ने लिखा कि कई प्रिंट मीडिया को आरएसएस के विज्ञापन के लिए 76,13,129 रुपये खर्च किए गए थे.
पश्चिम एशिया युद्ध का असर: फिरोजाबाद की ग्लास इंडस्ट्री ठप, कारीगरों की रोजी-रोटी पर संकट
पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध का असर भारत के उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद, जिसे “ग्लास सिटी” कहा जाता है, पर गहराई से पड़ रहा है. यहां के कारीगर, मजदूर और उद्योग संकट से जूझ रहे हैं. आउटलुक ने इस व्यवसाय पर आई इस मुसीबत पर ग्राउंड रिपोर्टिंग की है. फिरोजाबाद के छोटे-छोटे वर्कशॉप, जो पहले हर समय काम से भरे रहते थे, अब खाली पड़े हैं. कारीगर शैलेश कुमार जैसे लोग अब काम के बजाय मोबाइल पर खबरें देख रहे हैं. उन्हें सबसे ज्यादा चिंता स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ में जारी तनाव और गैस सप्लाई पर उसके असर को लेकर है.
युद्ध शुरू होने के बाद शहर में कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर गायब हो गए हैं और रिगैसिफाइड लिक्विफाइड नेचुरल गैस की सप्लाई भी कम कर दी गई है. यही गैस ग्लास उद्योग के लिए सबसे जरूरी है. इसके बिना भट्टियां नहीं चल सकतीं, जिससे उद्योग बंद होने की कगार पर है. फिरोजाबाद की ग्लास इंडस्ट्री में असंगठित क्षेत्र का बड़ा हिस्सा है, जो देश में बनने वाले कुल कांच का करीब 70% उत्पादन करता है. यहां हर दिन करीब 1500 टन कांच की चूड़ियां बनती हैं और 5 से 7 लाख लोगों को सीधे या अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है. करीब 50,000 परिवार इसी पर निर्भर हैं. यहां से करीब 2000 करोड़ रुपये के कांच उत्पाद विदेशों में भी निर्यात होते हैं, जिनमें अमेरिका और पश्चिम एशिया के देश शामिल हैं.
कुशवाहा नगर जैसे इलाकों में, जहां 400 से ज्यादा कारीगर काम करते हैं, अब ज्यादातर लोग बेरोजगार बैठे हैं. गैस की कमी के कारण छोटे वर्कशॉप बंद हो गए हैं और मजदूरों को छुट्टी पर भेज दिया गया है. कई कारीगरों का कहना है कि अगर स्थिति लंबी चली, तो उन्हें रोजमर्रा के खर्च के लिए कर्ज लेना पड़ेगा.
बड़े उद्योग भी प्रभावित हुए हैं. करीब 200 फैक्ट्रियां रिगैसिफाइड लिक्विफाइड नेचुरल गैस पर निर्भर हैं, जिसकी सप्लाई लगभग 20% कम हो गई है. इससे उत्पादन घटकर 30-40% रह गया है. कुछ फैक्ट्रियों ने काम बंद कर दिया है और ठेका मजदूरों को हटाया जा रहा है. मजदूर कॉलोनियों में हालात और खराब हैं. हजारों मजदूर कई दिनों से बिना काम के बैठे हैं. कुछ को मार्च में सिर्फ कुछ दिन की मजदूरी मिली. वे रोज फैक्ट्री जाते हैं, लेकिन काम नहीं मिलता है.
नोएडा फैक्ट्री विवाद: सिर्फ वेतन नहीं, रोज़गार व्यवस्था की गहरी समस्या
13 अप्रैल को नोएडा के औद्योगिक इलाक़ों में मज़दूरों ने न्यूनतम वेतन बढ़ाने के लिए प्रदर्शन की खबरें सामने आई, जो बाद में हिंसक रूप भी अपना चूका था. लेकिन यह सिर्फ न्यूनतम वेतन बढ़ाने के जद्दोजहद को नहीं दिखती है, बल्कि भारत के श्रम बाज़ार की गहरी संरचनात्मक समस्या को भी दिखाता है. द हिन्दू की रिपोर्ट के अनुसार, भले ही फैक्ट्रियां औपचारिक रूप से रजिस्टर्ड हों, लेकिन वहां काम करने वाले मज़दूरों को अक्सर बुनियादी अधिकार नहीं मिलते. आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के 2025 के आंकड़ों के मुताबिक़ , गैर कृषि क्षेत्र में काम करने वाले नियमित कर्मचारियों में से 58.2% के पास लिखित कॉन्ट्रैक्ट नहीं है, 51.7% को कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं. मिलती है और 47.3% को पेड लीव तक नहीं मिलती.
उत्तरप्रदेश में स्तिथि और ख़राब है. यहाँ 67.8% मज़दूरों के पास लिखित अनुबंधन नहीं है, 62.4% को पेड लीव नहीं मिलती और 59.2% को कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है. क़रीब 46.3% मज़दूर ऐसे हैं जिन्हें ये तीनों सुविधाएं नहीं मिलती हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह ठेका मज़दूरों की बढ़ती संख्या है. वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण के अनुसार, उद्योगों में ठेका मज़दूरों की हिस्सेदारी 2014-15 के 35% से बढ़ कर 2023-24 में 42% हो गई है. ऐसे मज़दूरों को आमतौर पर कम सुरक्षा और अधिकार मिलते हैं.
वेतन वृद्धि भी असली समस्या का पूरा समाधान नहीं है. उदहारण के लिए, उत्तर प्रदेश में असंगठित मज़दूरों का न्यूनतम वेतन 2016 में 7,107 रुपये था, जो 2026 में 11,313 हुआ है. हाल के विरोध के बाद सरकार ने इसे बढ़ाकर क़रीब 13,690 कर दिया है, लेकिन मज़दूरों का कहना है कि यह पर्याप्त नहीं है. लेबर ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, 2016 से अब तक दिल्ली-एनसीआर के औद्योगिक इलाक़ों में क़ीमतें 45% से 52% तक बढ़ चुकी हैं. ऐसे वक़्त में वेतन बढ़ोतरी का असर काम हो जाता है. मजदूर संगठनों का कहना है कि फैक्ट्रियों पर भले ही लागत बढ़ने का दबाव हो, जैसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार या तेल आपूर्ति में बाधा, लेकिन इसका बोझ मजदूरों पर नहीं डाला जाना चाहिए
पवन कल्याण पर टिप्पणी के आरोप में एक और कॉमेडियन हिरासत में, दो दिन में दूसरी कार्रवाई
द वायर के मुताबिक़, आंध्र प्रदेश पुलिस ने राज्य के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा इस्तेमाल करने के आरोप में एक और स्टैंड-अप कॉमेडियन को हिरासत में लिया है. यह दो दिनों के भीतर ऐसा दूसरा मामला है, जिसमें पुलिस ने इस तरह की कार्रवाई की है. पुलिस ने कॉमेडियन रफीक मोहम्मद को विशाखापट्टनम में उनके घर से हिरासत में लिया.
कॉमेडियन के खिलाफ यह एफआईआर जन सेना पार्टी से करीब आठ साल तक जुड़े रहे एक पूर्व कार्यकर्ता की शिकायत पर दर्ज की गई है. शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक वीडियो देखा, जिसमें रफीक मोहम्मद ने पवन कल्याण और मंत्री नैरा लोकेश के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया. वीडियो में रफीक मोहम्मद उपमुख्यमंत्री की निजी जिंदगी और उनकी हालिया राजनीतिक भूमिका पर टिप्पणी करते हुए नज़र आ रहे हैं.
बंगाली मुसलमानों के सामने टीएमसी को वोट देने के अलावा कोई विकल्प नहीं
स्क्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक़, पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद बड़ी संख्या में वोटरों के नाम हटाए जाने से बंगाली मुसलमानों में गहरा गुस्सा और डर पैदा हो गया है. इस प्रक्रिया में क़रीब 91 लाख लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, जिसमें सबसे ज़्यादा नाम मुसलमानों के शामिल हैं.
मुर्शिदाबाद के जंगीपुर में 10 अप्रैल को एक चुनावी सभा में पहुंचे 28 वर्षीय रमज़ान शेख, जिनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है, उनका कहना था कि ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस इस मुद्दे पर खुल कर बात नहीं कर रही है. रिपोर्ट के मुताबिक़ मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल इलाक़ों में यह मुद्दा चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है. कई लोगों को डर है कि असम की तरह उन्हें भी ‘डिटेंशन सेंटर’ और ‘फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल’ का सामना करना पड़ सकता है. हालांकि, नाराज़गी के बावजूद ज़्यादातर बंगाली मुसलमान अब भी ममता बनर्जी को ही अपना एकमात्र सहारा मान रहे हैं. रमज़ान शेख कहते हैं कि सिर्फ दीदी ही हमारे नाम फिर से वोटर लिस्ट में जुड़वा सकती हैं, लेकिन साथ ही वह यह भी मानते हैं कि पार्टी अपने वादों पर खरी नहीं उतरी है.
मेहबूब शेख का मामला भी ऐसा ही है, जिन्हें पहले मुंबई से गलत तरीके से बांग्लादेश भेज दिया गया था, बाद में उनकी भारतीय नागरिकता साबित हुई. एसआईआर के दौरान उनके परिवार को फिर से जांच का सामना करना पड़ा और उनके पिता का नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया. उनके भाई मजीबुर शेख ने साफ कहा, “हमारे पास कोई विकल्प नहीं है. जीना हो या मरना, हमें इन्हीं (तृणमूल) को वोट देना है, क्योंकि कोई और पार्टी पूरे राज्य में जीत नहीं सकती.”
हालांकि चुनाव मैदान में इंडियन नेशनल कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया और आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद जैसी पार्टियां चुनाव लड़ रही हैं लेकिन लोगों का मानना है कि इनका संगठन कमज़ोर है. रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कुछ कांग्रेस उम्मीदवारों के नाम भी वोटर लिस्ट से हटाए गए थे, लेकिन उन्होंने सुप्रीम कोर्ट जाकर अपना नाम वापस जुड़वा लिया. इससे आम लोगों में नाराजगी बढ़ी क्योंकि उनके मामलों में इतनी तेजी नहीं दिखाई गई.
पर्यावरण को तबाह कर देते हैं युद्ध; कुवैत की 90% मिट्टी दूषित हो चुकी
युद्ध केवल सीमाओं पर गोलियों और धमाकों तक सीमित नहीं होते; उनका सबसे गहरा और स्थायी घाव हमारी धरती और पर्यावरण पर पड़ता है. पूर्व वन बल प्रमुख (कर्नाटक) बी.के. सिंह की हालिया रिपोर्ट युद्ध के उन ‘अदृश्य’ शिकारों की ओर इशारा करती है, जिनकी भरपाई सदियों तक संभव नहीं है.
हाल ही में जब तेहरान की तेल रिफाइनरियों और डिपो पर हमले हुए, तो आसमान में गहरा काला धुआं इस कदर छा गया कि दिन और रात का फर्क मिट गया. रिपोर्ट के अनुसार, इन धमाकों से भारी मात्रा में विषैले हाइड्रोकार्बन, सल्फर और नाइट्रोजन ऑक्साइड उत्सर्जित हुए. जब यह जहर बारिश के साथ नीचे गिरा, तो इसे ‘काली बारिश’ कहा गया. यह अम्लीय वर्षा न केवल त्वचा और फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुँचाती है, बल्कि जल स्रोतों को भी जहरीला बना देती है.
बी.के. सिंह लिखते हैं कि यह तबाही 1990 के दशक की याद दिलाती है, जब सद्दाम हुसैन ने कुवैत के 700 तेल कुओं को फूँक दिया था. उस समय लगी आग को बुझाने में 10 महीने लगे और उसका असर इतना व्यापक था कि दूर हिमालय में काली बर्फ जमी थी. आज वही मंजर फिर से लौट आया है. कुवैत में 90% मिट्टी दूषित हो चुकी है जिसकी रिकवरी में 100 साल और लगेंगे. साइंटिस्ट्स फॉर ग्लोबल रेस्पॉन्सिबिलिटी के अनुसार, इराक युद्ध में 254 मेगाटन, गाजा युद्ध में 32 मेगाटन और रूस-यूक्रेन युद्ध में 340 मेगाटन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य उत्सर्जन हुआ. यह मात्रा फ्रांस के सालाना उत्सर्जन के बराबर है.
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के कुल वार्षिक उत्सर्जन का लगभग 5% (520 मेगा टन) हिस्सा केवल रक्षा और सैन्य अभियानों से आता है. अमेरिकी सेना दुनिया की सबसे बड़ी कार्बन उत्सर्जक मानी जाती है. मिसाइलों का मलबा, समुद्री खदानें और जंगलों की आग मिलकर पृथ्वी के सुरक्षा कवच (ओजोन परत) और पारिस्थितिकी तंत्र को छिन्न-भिन्न कर रहे हैं.
‘निदा खान घर पर हैं, कोई पुलिस नहीं आई’: नासिक टीसीएस मामले की आरोपी के परिवार ने कहा- रची जा रही साजिश
26 वर्षीय निदा खान, जिन्हें नासिक स्थित टीसीएस द्वारा संचालित बीपीओ में “फरार मास्टरमाइंड” के रूप में पेश किया गया है, वे वास्तव में मुंबई में हैं और अपने पहले बच्चे के जन्म का इंतजार कर रही हैं. उनके परिवार ने “हिंदुस्तान टाइम्स” को यह जानकारी दी है.
परिवार ने यह भी पुष्टि की कि खान बीपीओ की एचआर (मानव संसाधन) टीम में काम नहीं करती हैं, जैसा कि टेलीविजन चैनलों और सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से रिपोर्ट किया जा रहा है. उनका पद ‘टेली-कॉलर’ का है और वह सेल्स टीम का हिस्सा हैं. उन्होंने दिसंबर 2021 में इस बीपीओ में नौकरी शुरू की थी और वह वरिष्ठ कर्मचारियों में शामिल नहीं हैं. कई स्रोतों ने पुष्टि की है कि उनके ऊपर वरिष्ठ कर्मियों के कम से कम तीन स्तर और हैं.
सूत्रों ने पुष्टि की, “उनका एचआर टीम से कभी कोई संबंध नहीं रहा है.” उनके छोटे भाई ने (जो प्रताड़ित होने के डर से अपना नाम नहीं बताना चाहते थे) कहा, “सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनकी एक तस्वीर वायरल हुई है जिसमें उनके पद को नासिक इकाई का ‘एचआर हेड’ बताया गया है, और अब इसे टीवी समाचार चैनलों द्वारा भी दिखाया जा रहा है. उनकी यह तस्वीर उनके इंस्टाग्राम अकाउंट से ली गई थी और उस पर यह पद (डिजीग्नेशन) फर्जी तरीके से जोड़ दिया गया है.”
निदा खान पर आरोप
खान उन 8 कर्मचारियों में शामिल हैं, जिन पर टीसीएस के नासिक बीपीओ में अपने सहकर्मियों के साथ कथित बलात्कार, यौन उत्पीड़न, धार्मिक जबरदस्ती और अन्य प्रकार के उत्पीड़न का आरोप लगाया गया है. आठ आरोपियों में से सात गिरफ्तार किए जा चुके हैं, जबकि पुलिस का दावा है कि निदा खान फरार हैं.
परिवार ने साजिश का आरोप लगाया
गुरुवार को ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ से बात करते हुए उनके पिता, जिन्हें कभी अपनी बेटी पर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी पाने के लिए गर्व था, अब कहते हैं कि उन्हें उसे काम करने के लिए प्रोत्साहित करने पर पछतावा है. शहर में लकड़ी का व्यवसाय चलाने वाले पिता ने कहा, “बेहतर होता अगर उसने काम ही न किया होता. उसके बारे में ऐसी भयानक बातें कही जा रही हैं, जिनमें से कोई भी सच नहीं है. हम बहुत परेशान हैं. उसकी माँ की तबीयत बिगड़ गई है.” उन्होंने दावा किया, “मेरी बेटी ने इनमें से कुछ भी नहीं किया है, वह बस रोज़ काम पर जाती थी और लोगों को ‘हाय और बाय’ कहने की वजह से ही मुसीबत में फंस गई है.”
परिवार के अनुसार, खान और उनके दो भाई-बहन (एक छोटा भाई और एक बड़ी बहन) की शिक्षा नासिक में हुई थी. उन्होंने कॉमर्स में स्नातक किया है और वर्तमान में काम करने के साथ-साथ पत्राचार के माध्यम से एमबीए की पढ़ाई भी कर रही हैं. खान के मामा ने बताया कि पिछले साल शादी के बाद, निदा खान इस साल जनवरी में अपने पति के पास मुंबई चली गई थीं, जहाँ वह 9 अप्रैल को निलंबित होने तक मालाड स्थित कंपनी के बीपीओ में काम कर रही थीं. खान के मामा ने कहा, “वह किसी भी चीज़ से भाग नहीं रही हैं. और मैं यह कहना चाहता हूँ कि अब तक कोई भी पुलिस अधिकारी हमारे दरवाजे पर उनका पता पूछने के लिए नहीं आया है.”
उनके वकील बाबा सैयद ने कहा कि वे नासिक के सत्र न्यायालय (सेशंस कोर्ट) में उनके लिए अग्रिम जमानत याचिका दायर करने की प्रक्रिया में हैं. उन्होंने आगे कहा, “यह एक-दो दिनों में कर दिया जाएगा.”
खान के भाई ने बताया, “शुरुआत के कुछ दिनों में जब पुलिस ने पूरे मामले को सार्वजनिक किया, तो हमें लगा कि शायद उसी नाम की कोई दूसरी महिला होगी जिसके खिलाफ पुलिस ने मामला दर्ज किया है, लेकिन फिर उसने खुद हमें बताया कि उसके खिलाफ केस दर्ज किया गया है. हमारे पूरे परिवार को भारी मानसिक आघात पहुँचा है.”
दर्ज की गई नौ एफआईआर में से, खान का नाम 26 मार्च को देवलाली पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई एक एफआईआर में शामिल है, जो धार्मिक उत्पीड़न से संबंधित है.
क्या है नासिक टीसीएस मामला?
यह पूरा मामला तब सुर्खियों में आया जब नासिक पुलिस ने बीपीओ की एक 23 वर्षीय कर्मचारी की शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज की. पीड़िता ने अपने वरिष्ठ सहकर्मी दानिश शेख पर यौन उत्पीड़न और शादी के झूठे झांसे में यौन संबंध बनाने का आरोप लगाया. यह मामला भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज किया गया, जिसमें धारा 69 (शादी के झूठे वादे के माध्यम से यौन संबंध बनाना), 75 (यौन उत्पीड़न), 299 (धर्म या धार्मिक विश्वास का अपमान करना), और 3(5) (संयुक्त दायित्व) शामिल हैं.
शिकायत में महिला ने दानिश पर यह बात छिपाने का आरोप लगाया कि वह पहले से ही शादीशुदा है और उसे गुमराह कर उसके साथ यौन संबंध बनाए. महिला ने यह भी आरोप लगाया कि दानिश और एक अन्य सहकर्मी तौसीफ ने उसे हिंदू धर्म की तुलना में इस्लाम की खूबियों के बारे में समझाने की कोशिश की. इसके अलावा, उसने निदा खान और तौसीफ पर एक हिंदू देवता के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगाया. ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ द्वारा देखी गई 26 मार्च की एफआईआर में शिकायतकर्ता ने निदा खान के खिलाफ इसके अलावा कोई अन्य आरोप नहीं लगाया है.
इस बीच टीसीएस के सीईओ और एमडी के. कृतिवासन ने एक बयान में कहा कि टीसीएस की प्रेसिडेंट और सीओओ, आरती सुब्रमण्यन के नेतृत्व में चल रही आंतरिक जाँच के लिए स्वतंत्र परामर्शदाता के रूप में डेलॉयट और एक प्रमुख लॉ फर्म ट्राइलीगल की विशेषज्ञ टीमों की सेवाएँ ली हैं.
टीसीएस के स्वतंत्र निदेशक केकी मिस्त्री की अध्यक्षता में एक निगरानी समिति का गठन किया है. आंतरिक जाँच के निष्कर्षों को समीक्षा और सिफारिशों के कार्यान्वयन के लिए निगरानी समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा. निदा खान, जिनका प्रेस में बार-बार टीसीएस की एचआर मैनेजर के रूप में उल्लेख किया जा रहा है, न तो एचआर मैनेजर हैं और न ही भर्ती के लिए जिम्मेदार हैं. उन्होंने एक ‘प्रोसेस एसोसिएट’ के रूप में काम किया और उनके पास कोई नेतृत्वकारी जिम्मेदारी नहीं थी. नासिक में हमारी यूनिट लगातार काम कर रही है और हमारे क्लाइंट्स को सेवाएँ दे रही है. प्रेस में यूनिट के बंद होने की खबरें पूरी तरह से असत्य हैं.
पहलगाम का असर: ट्यूलिप गार्डन में पर्यटकों की संख्या में 50% से अधिक की गिरावट; 8.5 लाख का बना था रिकॉर्ड
क्या यह पहलगाम की आतंकी घटना का असर है, क्योंकि श्रीनगर स्थित एशिया के सबसे बड़े ट्यूलिप गार्डन और पर्यटकों के मुख्य आकर्षण का केंद्र— इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्यूलिप गार्डन में इस साल आगंतुकों की संख्या में भारी गिरावट देखी गई है. अधिकारियों ने शुक्रवार को बताया कि पिछले साल के मुकाबले इस बार फुटफॉल (पर्यटकों की संख्या) में 50 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है.
‘टेलीग्राफ वेब डेस्क और पीटीआई’ के अनुसार, पिछले साल इस बगीचे ने रिकॉर्ड 8.55 लाख पर्यटकों को आकर्षित किया था. इसके विपरीत, अधिकारियों के अनुसार इस सीजन में केवल 3.90 लाख पर्यटक ही यहाँ पहुँचे, जिनमें लगभग 1,200 विदेशी पर्यटक शामिल थे.
ट्यूलिप गार्डन के प्रभारी सहायक फ्लोरीकल्चर अधिकारी इमरान अहमद ने कहा, “इस साल 3.90 लाख दर्शकों ने ट्यूलिप गार्डन का दीदार किया. इनमें 1,222 विदेशी और 2.89 लाख घरेलू पर्यटक थे.” उन्होंने यह भी बताया कि लगभग 1.6 लाख स्थानीय लोगों ने भी बगीचे की सैर की।
वसंत ऋतु के दौरान पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहने वाला यह बगीचा फूलों के खिलने का समय (ब्लूम) समाप्त होने के साथ ही गुरुवार को जनता के लिए बंद कर दिया गया. प्रसिद्ध डल झील के किनारे स्थित इस गार्डन को जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने 16 मार्च को जनता के लिए खोला था. बढ़ते तापमान के कारण फूल जल्दी खिलने की वजह से इसे निर्धारित समय से एक सप्ताह पहले ही खोल दिया गया था.
कश्मीर के पर्यटन स्थलों में इस बगीचे को 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद द्वारा शामिल किया गया था, ताकि वसंत के ‘लीन सीजन’ (कम भीड़ वाले समय) में भी पर्यटकों को घाटी की ओर आकर्षित किया जा सके.
इस साल फ्लोरीकल्चर विभाग ने बगीचे की सुंदरता बढ़ाने के लिए फूलों के बल्बों की सघनता बढ़ा दी थी, जिससे ट्यूलिप की 70 से अधिक किस्में प्रदर्शन पर थीं. पिछले साल यह गार्डन अप्रैल में बंद हुआ था—पहलगाम हमले के दो दिन बाद, जिसके कारण अधिकांश पर्यटकों को अपना दौरा छोड़ना पड़ा था या बुकिंग रद्द करनी पड़ी थी.
नए ट्रांसजेंडर कानून से अभिभावकों में दहशत, डॉक्टरों ने जताई चिंता
‘द टेलीग्राफ’ में रोहिणी घोष की रिपोर्ट है कि मार्च 2026 की शुरुआत से ही भारत के ट्रांसजेंडर समुदाय और उनके अभिभावकों के बीच चिंता और असुरक्षा का माहौल व्याप्त है. ‘द रेनबो रूम’ की संस्थापक महुआ सेठ और सहायता समूह ‘स्वीकार’ के अनुसार, नए संशोधन अधिनियम ने समुदाय को कानूनी और सामाजिक संकट के मुहाने पर खड़ा कर दिया है. मार्च की शुरुआत से ही उनके पास घबराए हुए माता-पिता और ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों के कॉल और संदेशों की बाढ़ आ गई है.
आलोचकों और कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह नया कानून न केवल प्रतिगामी है, बल्कि मौलिक मानवाधिकारों का सीधा उल्लंघन भी करता है.
इस संशोधन अधिनियम की सबसे बड़ी आलोचना इसकी अस्पष्ट परिभाषाओं और मेडिकल गेटकीपिंग को लेकर हो रही है. जहाँ 2014 के ‘नालसा’ फैसले ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपनी पहचान स्वयं चुनने का अधिकार दिया था, वहीं नया कानून सख्त प्रमाणीकरण प्रक्रियाओं को अनिवार्य बनाता है.
मेडिकल बोर्ड की अनिवार्यता: अब ट्रांसजेंडर आईडी कार्ड (जो सरकारी योजनाओं के लिए आवश्यक है) प्राप्त करने के लिए मेडिकल बोर्ड की मंजूरी अनिवार्य कर दी गई है. यह प्रक्रिया जिला मजिस्ट्रेट के अधीन होगी, जो चिकित्सा विशेषज्ञों की सहायता लेंगे. इससे समुदाय के लिए कानूनी मान्यता प्राप्त करना एक जटिल और अपमानजनक प्रक्रिया बन सकती है.
अधिनियम में ‘ट्रांसजेंडर’ शब्द की व्याख्या को बहुत संकुचित कर दिया गया है. इसे केवल पारंपरिक सामाजिक-सांस्कृतिक समूहों (जैसे हिजड़ा, जोगती, किन्नर) और इंटरसेक्स व्यक्तियों तक सीमित करने का प्रयास किया गया है.
‘ब्रिज इंडिया’ के एक सर्वे के अनुसार, 900 उत्तरदाताओं में से अधिकांश ने खुद को ट्रांस-मेन, ट्रांस-वूमेन, जेंडरफ्लुइड या नॉन-बाइनरी के रूप में पहचाना. केवल एक छोटा हिस्सा पारंपरिक समूहों से जुड़ा था. यह कानून उन लाखों लोगों की पहचान को कानूनी रूप से मिटाने का जोखिम पैदा करता है जो इन विशिष्ट पारंपरिक श्रेणियों में फिट नहीं बैठते.
रिपोर्ट के अनुसार, अभिभावकों, जैसे नीलांजन मजूमदार और इंद्राणी चक्रवर्ती, ने इस कानून को बच्चों के सपनों पर “बुलडोजर” चलाने के समान बताया है. अभिभावक इस बात को लेकर डरे हुए हैं कि क्या उनके बच्चों के मौजूदा आईडी कार्ड मान्य रहेंगे या उन्हें हॉस्टल और शिक्षण संस्थानों से बाहर कर दिया जाएगा.
थेरेपिस्ट्स का मानना है कि जेंडर बाइनरी (स्त्री-पुरुष के खांचे) में जबरन फिट करने की कोशिश से समुदाय में जेंडर डिस्फोरिया (लैंगिक व्याकुलता), अवसाद और आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ सकती है. चिकित्सा विशेषज्ञों ने इसे एक ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल’ के रूप में देखा है. डॉ. संजय शर्मा के अनुसार, कानून के दंडात्मक प्रावधानों ने डॉक्टरों में डर पैदा कर दिया है.
डॉक्टर अब ‘जेंडर-अफर्मिंग केयर’ (लिंग-पुष्टि देखभाल) प्रदान करने में हिचकिचा रहे हैं, क्योंकि वे वैज्ञानिक मानकों और कानूनी निर्देशों के बीच फंस गए हैं. डर के कारण लोग विनियमित स्वास्थ्य सेवाओं के बजाय असुरक्षित और निजी नीम-हकीमों के पास जा सकते हैं, जो उनके जीवन के लिए घातक हो सकता है.
रोहिणी की रिपोर्ट का निष्कर्ष यह कहता है कि ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम 2026 को लेकर विरोध का मुख्य स्वर यह है कि यह ‘सशक्तिकरण’ के नाम पर फरेब का साधन बन गया है. जहाँ सरकार इसे कानूनी सुदृढ़ीकरण मान रही है, वहीं ज़मीनी स्तर पर यह समुदाय को अदृश्य करने और उनके गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार को छीनने जैसा प्रतीत होता है. कार्यकर्ताओं की मांग है कि सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कलंक जैसे वास्तविक मुद्दों पर ध्यान दे, न कि उनकी पहचान पर पहरा बैठाए.
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.








