16/04/2026: ममता की जीत | परिसीमन का 'बुलडोजर' | दागी उम्मीदवार | वंदे मातरम विवाद | 'बेटा सुधारो' नीति | छत्तीसगढ़ में यूसीसी | 'ट्रंप मॉडल' पर सवाल | 'फर्जी' धर्मांतरण केस | इंश्योरेंस का धोखा
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 का किया प्रयोग; चुनाव आयोग से कहा- बंगाल के 34 लाख से अधिक नाम मतदाता सूची में शामिल किए जाएं; ममता प्रसन्न
‘सरकार महिला कोटे के जरिए परिसीमन को ‘बुलडोज़’ कर रही है’
संसद में महिला आरक्षण कानून पारित कराने के लिए एनडीए के पास संख्या बल की कमी
मोदी ने कहा- परिसीमन में किसी राज्य के साथ भेदभाव नहीं होगा; महिला आरक्षण पर विपक्ष को चेताया
बंगाल चुनाव: पहले चरण के 23% उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले; भाजपा सबसे आगे
1947 से अब तक केवल 18 मुस्लिम महिलाएं पहुंचीं लोकसभा
हरियाणा: राज्यसभा चुनाव में ‘क्रॉस वोटिंग’ चलते कांग्रेस ने 5 विधायकों को किया निलंबित
इंदौर: ‘वंदे मातरम’ पर विवाद, कांग्रेस की दो पार्षदों के खिलाफ मामला दर्ज
जेंडर संकट का असली समाधान: ‘बेटी बचाओ’ नहीं, ‘बेटा सुधारो’
अब छत्तीसगढ़ में भी यूसीसी की सुगबुगाहट, ड्राफ्ट तैयार करने के लिए समिति का गठन
दुनिया की बदलती राजनीति: हंगरी-ब्राज़ील के संकेत और ‘ट्रंप मॉडल’ पर सवाल
झूठे केसों पर सख्त इलाहबाद हाईकोर्ट: धर्मांतरण कानून के दुरुपयोग पर यूपी सरकार से जवाब तलब
कागज़ की सुरक्षा या धोखा? भारत में हेल्थ इंश्योरेंस का टूटता भरोसा
सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी: समय से पहले परिसीमन से चुनावी ढांचा अस्थिर हो सकता है
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा- बंगाल के 34 लाख से अधिक नाम मतदाता सूची में शामिल किए जाएं; ममता प्रसन्न
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह यह सुनिश्चित करे कि अपीलीय न्यायाधिकरणों द्वारा मंजूरी पाए गए उन मतदाताओं के नाम, जिन्हें पहले हटा दिया गया था, बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले और दूसरे चरण से पहले मतदाता सूची में शामिल किए जाएं.
‘द टेलीग्राफ ब्यूरो’ के अनुसार, संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को किसी भी विचाराधीन मामले में “पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक” डिक्री या आदेश पारित करने की शक्ति प्रदान करता है. इस प्रकार पारित की गई कोई भी डिक्री या किया गया आदेश पूरे भारत के क्षेत्र में उसी तरह लागू होता है जैसा संसद द्वारा बनाए गए कानून या राष्ट्रपति के आदेश द्वारा निर्धारित किया गया हो.
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने अनुच्छेद 142 के तहत अदालत की शक्तियों का उपयोग किया और भारत निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि, “जहाँ कहीं भी अपीलीय न्यायाधिकरण 21 अप्रैल या 27 अप्रैल (जैसा भी मामला हो) तक अपीलों पर निर्णय लेने में सक्षम होते हैं, वहां उन अपीलीय आदेशों को एक पूरक संशोधित सूची जारी करके प्रभावी किया जाएगा, और मतदान के अधिकार के संबंध में सभी आवश्यक परिणाम लागू होंगे.”
चुनाव का पहला चरण 23 अप्रैल को होगा और इसके लिए पूरक सूची को 21 अप्रैल तक अपडेट करना होगा. वहीं 29 अप्रैल को होने वाले दूसरे चरण के लिए सूची अपडेट करने की अंतिम तिथि 27 अप्रैल है.
पीठ ने स्पष्ट किया, “यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष बाहर किए गए व्यक्तियों द्वारा केवल अपील लंबित होने मात्र से वे अपने मताधिकार का प्रयोग करने के हकदार नहीं हो जाएंगे।”
कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा शीर्ष अदालत को सौंपी गई एक रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि न्यायाधिकरणों के पास लगभग 34.45 लाख अपीलें लंबित थीं.
अब अपीलीय न्यायाधिकरणों के सामने इन 34 लाख से अधिक अपीलों में से अधिक से अधिक का निपटारा करने का कठिन कार्य है—पहले चरण (152 विधानसभा क्षेत्रों) के लिए 21 अप्रैल तक और शेष 144 निर्वाचन क्षेत्रों में अंतिम चरण के लिए 27 अप्रैल तक.
पिछले रविवार को सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने कहा था कि बंगाल में विचाराधीन सूची में डाले गए मतदाताओं के मामलों पर निर्णय लेने में लगे एक न्यायिक अधिकारी ने प्रति दिन 250 मामलों की जांच की. यदि प्रत्येक न्यायिक अधिकारी दिन में 10 घंटे काम करता है, तो यह हर घंटे 25 मामलों के बराबर है.
9 अप्रैल को न्यायाधिकरणों द्वारा चार मामलों का फैसला किए जाने के बाद से प्रगति के बारे में बहुत कम सुना गया है. बता दें कि 9 अप्रैल वही दिन था जब 29 अप्रैल को होने वाले दूसरे चरण के मतदान के लिए मतदाता सूची को ‘फ्रीज’ (अंतिम रूप) कर दिया गया था.
चुनाव आयोग को मतदान की तारीख से दो दिन पहले तक अपडेटेड सूची के साथ पूरक सूचियाँ जारी करनी होंगी. एक तृणमूल नेता ने कहा, “हमें उम्मीद है कि मतदाताओं के नाम हटाने में जो तत्परता दिखाई गई थी, वही तत्परता सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार पूरक सूची तैयार करने में भी दिखाई जाएगी.”
गुरुवार को चुनाव प्रचार के दौरान बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जिन्होंने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के खिलाफ व्यक्तिगत रूप से सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी, ने शीर्ष अदालत के आदेश का स्वागत किया. कूचबिहार के दिनहाटा में मुख्यमंत्री ने कहा, “मैं न्यायपालिका से बहुत खुश और गौरवान्वित हूँ. मैंने यह मामला खुद लड़ा और हमें यह फैसला मिला. आज मुझसे ज्यादा खुश कोई नहीं है.”
ममता बनर्जी ने सूची से हटाए गए मतदाताओं से न्यायाधिकरणों में अपील करने का आग्रह किया. उन्होंने कहा, “हर किसी को न्यायाधिकरणों में आवेदन करना चाहिए और आपको अपना अधिकार वापस मिल जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला दे दिया है. पहले चरण की पूरक सूची 21 अप्रैल को प्रकाशित होगी. मैं अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहूँगी कि वे इस सूची के आधार पर वोटर फॉर्म बनाएं ताकि लोग वोट देने जा सकें.”
मोदी ने कहा- परिसीमन में किसी राज्य के साथ भेदभाव नहीं होगा; महिला आरक्षण पर विपक्ष को चेताया
‘टीएनआईई’ के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को विपक्ष से आग्रह किया कि महिला आरक्षण कानून को लागू करने के लिए लोकसभा में पेश किए गए विधेयकों को राजनीतिक रंग न दें. उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि जिन्होंने अतीत में इसका विरोध किया था, उन्हें चुनावों में भारी नुकसान उठाना पड़ा है.
लोकसभा में चर्चा के दौरान बोलते हुए, मोदी ने विपक्ष को आगाह किया कि महिला कोटा कानून में संशोधन और परिसीमन आयोग के गठन से संबंधित तीन विधेयकों का विरोध करने के लिए उन्हें “लंबे समय तक इसकी कीमत चुकानी होगी.”
उन्होंने कहा, “जब से महिला आरक्षण चर्चा में आया है, अतीत में जिन लोगों ने इसका विरोध किया था, उन्हें देश की महिलाओं ने माफ नहीं किया और उसके बाद हुए चुनावों में उनका बुरा हाल हुआ.”
उन्होंने आगे कहा, “पिछले 25-30 वर्षों में, महिलाएं जमीनी स्तर पर नेता बनकर उभरी हैं. वे केवल यहाँ (संसद में) ही नहीं हैं... वे वहाँ भी हैं और आपके फैसलों को प्रभावित कर रही हैं. जो आज इसका विरोध करेंगे, उन्हें लंबे समय तक इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा.”
प्रधानमंत्री ने परिसीमन को लेकर जताई जा रही चिंताओं को दूर करने की भी कोशिश की. उन्होंने आश्वासन दिया कि पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक किसी भी राज्य के साथ अन्याय नहीं किया जाएगा. उन्होंने कहा, “मैं आज इस सदन से बड़ी जिम्मेदारी के साथ कहना चाहता हूँ कि चाहे दक्षिण हो, उत्तर हो, पूर्व हो, पश्चिम हो, छोटे राज्य हों या बड़े राज्य, यह निर्णय लेने की प्रक्रिया किसी भी राज्य के साथ भेदभाव नहीं करेगी और न ही किसी के साथ अन्याय करेगी.”
मोदी ने स्पष्ट किया कि परिसीमन की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप किसी भी राज्य में लोकसभा सीटों का अनुपात कम नहीं होगा. उन्होंने कहा, “(लोकसभा सीटों के) उस अनुपात में भी कोई बदलाव नहीं होगा, और जो वृद्धि होगी वह भी उसी अनुपात में होगी.”
लोकसभा में 815 सीटें होंगी, जिनमें 272 महिलाओं के लिए
केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने महिला कोटा कानून में संशोधन और परिसीमन आयोग के गठन के लिए पेश किए गए तीन विधेयकों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि सदन की 815 सीटों में से 272 सीटें महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का सीधा फॉर्मूला है. मंत्री ने कहा, “महिला आरक्षण विधेयक के अनुसार, लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़कर 815 हो जाएगी, जिसमें महिलाओं का कोटा 272 सीटों का होगा.” उन्होंने यह भी जोड़ा कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिला कोटे के भीतर ही एससी और एसटी श्रेणियों की महिलाओं के लिए भी आरक्षण होगा.
संसद में बहस: ‘सरकार महिला कोटे के जरिए परिसीमन को ‘बुलडोज़’ कर रही है’
लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकार इस महिला आरक्षण कानून के नाम पर परिसीमन को “बुलडोज” करना चाहती है. तीन विधेयकों पर चर्चा की शुरुआत करने वाले कांग्रेस के उपनेता गौरव गोगोई ने कहा कि ये विधेयक “महिला-विरोधी, जाति जनगणना-विरोधी, संविधान-विरोधी और देश के संघीय ढांचे के विरोधी” हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि सरकार वास्तव में महिला कोटा कानून लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है, तो उसे लोकसभा की वर्तमान सदस्य संख्या के आधार पर इसे तुरंत करना चाहिए.
निचले सदन में अपनी बात रखते हुए गोगोई ने सरकार पर परिसीमन और चुनावी क्षेत्रों में हेरफेर के माध्यम से राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करने का आरोप लगाया. सदन में कांग्रेस के उपनेता ने कहा, “जो इन्होंने जम्मू-कश्मीर और असम में परिसीमन के माध्यम से किया, वही वे महिला आरक्षण के नाम पर पूरे देश में करना चाहते हैं.” उन्होंने सरकार के इन कदमों को “शर्मनाक” बताया.
‘द टेलीग्राफ’ के अनुसार, गोगोई ने आगे कहा, “हमारी पार्टी महिला आरक्षण के पक्ष में है, लेकिन आपको इसे सरल बनाना चाहिए. इसे सदन की वर्तमान सदस्य संख्या — 543 — पर ही लागू किया जाना चाहिए और इसे परिसीमन से नहीं जोड़ा जाना चाहिए.”
उन्होंने जाति जनगणना पर भी चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा कि दूसरी आशंका यह है कि सरकार जाति जनगणना के पक्ष में नहीं है और इसे लागू नहीं करना चाहती है.
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि ये विधेयक राज्यों और संसद के बीच के संतुलन को प्रभावित करते हैं. ओवैसी ने कहा, संविधान संशोधन विधेयक लोकतंत्र के संसदीय स्वरूप और संघवाद का उल्लंघन करता है, जो दोनों ही संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हैं. यह महिला आरक्षण के बारे में नहीं है. मुख्य लक्ष्य दक्षिण पर शासन करना और विधायिका से ओबीसी के प्रतिनिधित्व को पूरी तरह से मिटाना है.” हिंदी भाषी क्षेत्र की सीटें 38.1 प्रतिशत से बढ़कर 43.1 प्रतिशत हो जाएंगी, जबकि दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी 24 प्रतिशत से घटकर 20 प्रतिशत रह जाएगी.”
उन्होंने यह भी कहा, “यह नियमों का भी उल्लंघन करता है. मंत्री को सदन में विधेयक पेश करने के लिए सात दिन का नोटिस देना होता है. विधेयक की प्रतियां पेश किए जाने से दो दिन पहले सदस्यों को दी जानी चाहिए. यह आरपीए 1951 की धारा 123 बी का स्पष्ट उल्लंघन है. वोटिंग से एक हफ्ते पहले, मैं इसे एक भ्रष्ट आचरण मानता हूँ. ”
समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने इस बहस को जाति जनगणना से जोड़ दिया। उन्होंने सदन में कहा, “सरकार इतनी जल्दी में क्यों है? हम महिला आरक्षण विधेयक के पक्ष में हैं; वे जनगणना नहीं कराना चाहते क्योंकि तब हम जातिगत आरक्षण की मांग करेंगे, आप गुमराह करना चाहते हैं.”
टीएमसी नेता काकोली घोष दस्तीदार ने कहा, “हम इन विधेयकों को पेश किए जाने का विरोध करते हैं. हमने 2023 में महिला आरक्षण अधिनियम पारित होने से पहले ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू कर दिया था.” 40 मिनट की चर्चा और मत विभाजन के बाद विधेयकों को पेश किया गया, जिसमें 251 सदस्य समर्थन में और 185 विरोध में थे. अध्यक्ष द्वारा घोषित 15-18 घंटे की बहस के बाद तीनों विधेयकों पर मतदान शुक्रवार शाम 4 बजे निर्धारित है.
महिला आरक्षण कानून पारित कराने के लिए एनडीए के पास संख्या बल की कमी
सत्तारूढ़ एनडीए के पास संसद में महिला आरक्षण विधेयकों को आवश्यक दो-तिहाई बहुमत से पारित कराने के लिए पर्याप्त संख्या नहीं है, जब तक कि वह अन्य दलों का समर्थन हासिल नहीं कर लेता या वोटिंग के दौरान कुछ सदस्यों की अनुपस्थिति सुनिश्चित नहीं करता.
‘टीएनआईई’ के मुताबिक, वर्तमान में एनडीए के पास लोकसभा के 293 सदस्यों का समर्थन है, जो सदन का 54 प्रतिशत है, जबकि विपक्ष के पास 233 सांसद हैं. जहाँ 7 सांसद निर्दलीय हैं, वहीं सात सांसद वाईएसआरसीपी, एआईएमआईएम, और शिरोमणि अकाली दल जैसे दलों के हैं, जिन्होंने अभी तक विधेयकों का खुलकर समर्थन नहीं किया है.
उच्च सदन (राज्यसभा) में संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए, सत्ताधारी गठबंधन को उपस्थित और मतदान करने वाले 163 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता है, जो सदन का दो-तिहाई बहुमत है. राज्यसभा में जहाँ भाजपा के 107 सांसद हैं, वहीं कांग्रेस के 28, टीएमसी के 13, आप के 10 और डीएमके के 8 सांसद हैं.
सूत्रों के अनुसार, भाजपा के कई सांसदों ने निजी तौर पर स्वीकार किया है कि उनके पास इन महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए पर्याप्त संख्या नहीं है.
संविधान में संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है: पहला- कुल सदस्यता का बहुमत (50 प्रतिशत से अधिक). दूसरा- उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत. यदि वर्तमान में सदन में मौजूद सभी 540 सदस्य उपस्थित रहते हैं और मतदान करते हैं, तो दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा 360 होगा.
विपक्ष की भूमिका और समीकरण
नियमों के अनुसार संविधान संशोधन विधेयक समेत अन्य विधेयकों के लिए 360 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता है. लोकसभा से मंजूरी पाने के लिए, मुख्य विपक्षी दलों—समाजवादी पार्टी (37 सांसद), तृणमूल कांग्रेस (28 सांसद) या डीएमके (22 सांसद)—में से कम से कम दो प्रमुख दलों को मतदान से बाहर रहना होगा.
लोकसभा में कांग्रेस के पास 98 सांसद हैं. दूसरी ओर, एनडीए की ओर से भाजपा के पास 240, टीडीपी के 16 और जद (यू) के 12 सांसद हैं. यदि इन विधेयकों को लोकसभा की मंजूरी नहीं मिलती है, तो उन्हें राज्यसभा में नहीं ले जाया जाएगा.
राज्यसभा में, एनडीए के पक्ष में 141 सदस्य हैं, जो उच्च सदन का 58 प्रतिशत है, और विपक्ष के पास 83 सांसद हैं. बीआरएस, वाईएसआरसीपी, बीजेडी और बीएसपी जैसे दलों और निर्दलीयों के पास उच्च सदन में 20 सांसद हैं, और उनके वोट निर्णय को बदलने में सहायक हो सकते हैं.
1947 से अब तक केवल 18 मुस्लिम महिलाएं पहुंचीं लोकसभा
मकतूब मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, 1947 से लेकर अब तक लोकसभा के लिए केवल 18 मुस्लिम महिलाएं निर्वाचित हो पाई हैं. यह आंकड़ा न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि भारतीय राजनीति के समावेशी होने के दावों पर भी सवाल खड़ा करता है. आजादी के 75 से अधिक वर्षों के बाद भी भारतीय लोकतंत्र में मुस्लिम महिलाओं का प्रतिनिधित्व बेहद निराशाजनक रहा है.
रशीद किदवई और अंबर कुमार घोष की पुस्तक “मिसिंग फ्रॉम द हाउस” इस संकट को गहराई से उजागर करती है. निर्वाचित हुई 18 में से 13 महिलाएं राजनीतिक परिवारों से ताल्लुक रखती थीं. वहीं दक्षिण भारत के किसी भी राज्य (केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश या तेलंगाना) से आज तक एक भी मुस्लिम महिला लोकसभा नहीं पहुंची है. वर्तमान लोकसभा में केवल एक मुस्लिम महिला सांसद हैं. समाजवादी पार्टी की इक्रा हसन चौधरी.
सदन में मुस्लिम और ओबीसी महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है. समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसद धर्मेंद्र यादव ने मांग की कि आरक्षण के भीतर इन वर्गों को जगह मिलनी चाहिए, अन्यथा उनकी पार्टी इसका विरोध करेगी.
इस पर पलटवार करते हुए गृह मंत्री अमित शाह और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने स्पष्ट किया कि धर्म के आधार पर आरक्षण असंवैधानिक है. रिजिजू ने जोर देकर कहा कि कोटा धर्म के आधार पर नहीं दिया जा सकता और सांसदों को “पूरे देश की महिलाओं” के बारे में बात करनी चाहिए. वहीं सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सवाल उठाया कि क्या मुस्लिम महिलाएं “आधी आबादी” का हिस्सा नहीं हैं?
बंगाल चुनाव: पहले चरण के 23% उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले; भाजपा सबसे आगे
इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) द्वारा गुरुवार को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में चुनाव लड़ रहे 1,475 उम्मीदवारों में से 23 प्रतिशत ने अपने हलफनामों में आपराधिक मामलों की घोषणा की है. भारतीय जनता पार्टी ने लंबित आपराधिक मामलों वाले सबसे अधिक उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है. इसके 152 उम्मीदवारों में से 106 (70 प्रतिशत) ने आपराधिक मामलों की घोषणा की है. इसके बाद तृणमूल कांग्रेस के 63, माकपा (सीपीएम) के 43 और कांग्रेस के 39 उम्मीदवार इस सूची में शामिल हैं.
‘द टेलीग्राफ ब्यूरो’ के अनुसार, यह रिपोर्ट उस दिन जारी की गई जब लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा हो रही थी. रिपोर्ट में पाया गया कि बंगाल में पहले चरण के मतदान में केवल 11 प्रतिशत उम्मीदवार महिलाएं हैं. बंगाल में गंभीर अपराधों वाले उम्मीदवारों की कुल संख्या 294 है, जो पहले चरण में चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवारों का 20 प्रतिशत है.
भाजपा के लगभग 63 प्रतिशत यानी 96 उम्मीदवारों ने अपने नामांकन पत्रों के साथ जमा किए गए हलफनामों में गंभीर अपराधों की घोषणा की है. तृणमूल कांग्रेस में, उसके 148 नामांकित व्यक्तियों में से 48 उम्मीदवारों (लगभग 32 प्रतिशत) ने गंभीर अपराध घोषित किए हैं. माकपा द्वारा खड़े किए गए 98 उम्मीदवारों में से 36 और कांग्रेस के 151 उम्मीदवारों में से 33 ने गंभीर अपराधों की जानकारी दी है.
महिलाओं के खिलाफ अपराध से जुड़े मामलों में आरोपी 98 उम्मीदवारों में से, 6 पर बलात्कार और एक पर महिला के साथ बार-बार यौन उत्पीड़न का मामला दर्ज है.
एडीआर की रिपोर्ट में कहा गया है कि कई दलों ने आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को नामांकित करने के पीछे “लोकप्रियता,” “अच्छा सामाजिक कार्य करता है,” और मामले “राजनीति से प्रेरित” होने जैसे कारणों का हवाला दिया.
रिपोर्ट में कहा गया: “यह डेटा स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि हमारे राजनीतिक दलों की चुनावी प्रणाली में सुधार करने में कोई रुचि नहीं है और हमारा लोकतंत्र उन कानून तोड़ने वालों के हाथों पीड़ित होता रहेगा जो कानून निर्माता (विधायक) बन जाते हैं.”
करोड़पति उम्मीदवारों की भरमार
पहले चरण में चुनाव लड़ रहे कुल 309 उम्मीदवारों ने 1 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति घोषित की है. इनमें से 35 उम्मीदवारों के पास 10 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति है, जबकि 46 ने 5 करोड़ से 10 करोड़ रुपये के बीच की संपत्ति घोषित की है. कुल मिलाकर, लगभग 15.5 प्रतिशत उम्मीदवार (1,475 में से 228) करोड़पति हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, प्रमुख राजनीतिक दलों ने 24% से 72% के बीच करोड़पति उम्मीदवार और 26% से 70% के बीच आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवार उतारे हैं. धनबल और बाहुबल का यह मेल राजनीतिक व्यवस्था में गहराई से समा गया है. तृणमूल कांग्रेस के सबसे अधिक 106 करोड़पति उम्मीदवार, भाजपा के 71 करोड़पति उम्मीदवार, कांग्रेस के 50 करोड़पति उम्मीदवार.
बंगाल के सबसे अमीर उम्मीदवार जाकिर हुसैन हैं, जो जंगीपुर से विधायक हैं और तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर पुन: चुनाव लड़ रहे हैं. उनकी घोषित संपत्ति 133 करोड़ रुपये से अधिक है. तृणमूल के बरजोरा से उम्मीदवार गौतम मिश्रा के पास 105 करोड़ रुपये की संपत्ति है, जबकि दुर्गापुर पश्चिम के उम्मीदवार कवि दत्ता 72 करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ तीसरे स्थान पर हैं. मैदान में 708 उम्मीदवार ऐसे हैं, जिनकी शैक्षणिक योग्यता कक्षा 5 से उच्चतर माध्यमिक (12वीं) के बीच है. 698 उम्मीदवार स्नातक या उससे ऊपर हैं, 26 डिप्लोमा धारक हैं, 29 उम्मीदवार साक्षर (लिखना-पढ़ना जानने वाले) और 14 उम्मीदवार निरक्षर हैं.
हरियाणा: राज्यसभा चुनाव में ‘क्रॉस वोटिंग’, कांग्रेस ने 5 विधायकों को किया निलंबित
स्क्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, हरियाणा कांग्रेस ने अनुशासनहीनता के खिलाफ सख्त कदम उठाते हुए अपने पांच विधायकों को पार्टी से निलंबित कर दिया है. इन विधायकों पर आरोप है कि उन्होंने मार्च में हुए राज्यसभा चुनाव के दौरान पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ मतदान किया था.
पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित किए गए विधायकों में शैले चौधरी, रेनू बाला, जर्नैल सिंह, मोहम्मद इल्यास और मोहम्मद इस्राइल शामिल हैं. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह के अनुसार, इन विधायकों ने संगठनात्मक अनुशासन का उल्लंघन किया है, जिसके चलते यह कार्रवाई की गई है.
दरअसल राज्यसभा की दो सीटों के लिए 16 मार्च को मतदान हुआ था. भाजपा के संजय भाटिया ने आसानी से एक सीट जीत ली थी. दूसरी सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार करमवीर बौध की जीत तो हुई, लेकिन जीत का अंतर उम्मीद से बहुत कम रहा. बौध ने भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार सतीश नांदल को मात्र एक वोट से हराया.
अनुमान के मुताबिक करमवीर बौध को बड़े अंतर से जीतना चाहिए था, लेकिन कम वोटों ने पार्टी के भीतर ‘क्रॉस वोटिंग’ के संदेह को जन्म दिया. हालांकि, निलंबित किए गए विधायकों में से शैले चौधरी, रेनू बाला और जर्नैल सिंह ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. 90 सदस्यीय हरियाणा विधानसभा में कांग्रेस के पास वर्तमान में 37 विधायक हैं.
दिल्ली एयरपोर्ट पर आकासा एयर से टकराया स्पाइसजेट का विमान, एटीसी अधिकारी और पायलटों को हटाया
दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर गुरुवार को पार्किंग बे की ओर जा रहा स्पाइसजेट का एक विमान वहां पहले से खड़े आकासा एयर के विमान से टकरा गया. इस टक्कर में दोनों विमानों को नुकसान पहुँचा है.
एस. ललिता के मुताबिक, दोनों विमानों (स्पाइसजेट और आकासा एयर) में सवार लगभग 300 यात्रियों में से किसी को भी चोट नहीं आई और सभी सुरक्षित हैं. टक्कर में शामिल दोनों विमान बोइंग 737 सीरीज के हैं और क्षति पहुँचने के कारण उन्हें फिलहाल परिचालन से बाहर (ग्राउंडेड) कर दिया गया है.
यह घटना टर्मिनल 1 के एप्रन क्षेत्र में दोपहर करीब 2:15 बजे हुई. स्पाइसजेट की उड़ान एसजी124 का दायां विंगलेट क्षतिग्रस्त हो गया, जबकि आकासा एयर की उड़ान क्यूपी 1406 का बायां हॉरिजॉन्टल स्टेबलाइजर क्षतिग्रस्त हुआ है.
स्पाइसजेट की उड़ान लेह से आई थी और पार्किंग बे की ओर जा रही थी. उसी समय, आकासा एयर का एक विमान पार्किंग बे से निकलकर हैदराबाद के लिए उड़ान भरने हेतु एप्रन क्षेत्र में इंतजार कर रहा था.
इस बीच विमानन नियामक, नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) ने आईजीआईए के एयर ट्रैफिक कंट्रोल (एटीसी) के एक अधिकारी और टक्कर में शामिल स्पाइसजेट विमान के दोनों पायलटों को ड्यूटी से हटा दिया है. सूत्रों ने कहा कि इस घटना में एटीसी के एक सरफेस मूवमेंट कंट्रोलर की गलती होने की प्रबल संभावना है, जिसके कारण नियामक ने संबंधित व्यक्ति को तत्काल प्रभाव से ड्यूटी से हटा दिया है. घटना की सटीक तस्वीर डीजीसीए द्वारा की जाने वाली विस्तृत जांच और एयरलाइंस की आंतरिक जांच के बाद ही साफ होगी.
भाजपा विधायक के बेटे की तेज़ रफ़्तार ‘थार’ की टक्कर से पांच घायल, बेटा बोला- बाइक पर तीन क्यों बैठे थे
मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करेरा इलाके में गुरुवार को भाजपा के पहली बार विधायक बने प्रीतम लोधी के बेटे द्वारा कथित तौर पर चलाई जा रही एक तेज़ रफ़्तार थार रॉक्स ने पांच लोगों को पीछे से टक्कर मार दी, जिससे दो युवतियों सहित पांच लोग घायल हो गए.
‘एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस’ की खबर के अनुसार, यह घटना करेरा कस्बे में उस समय हुई जब तीन युवा मजदूर—संजय परिहार, आशीष परिहार और अंशुल परिहार—एक मोटरसाइकिल पर काम पर जा रहे थे.
एक काली थार रॉक्स, जिस पर रजिस्ट्रेशन प्लेट के साथ सामने की ओर कथित तौर पर “प्रीतम लोधी” और “विधायक” के स्टिकर लगे थे, ने उन्हें पीछे से टक्कर मार दी, जिससे तीनों घायल हो गए. इसके बाद, एसयूवी ने कथित तौर पर कॉलेज जा रही दो युवतियों—सीता वर्मा और पूजा सोनी—को भी टक्कर मार दी.
घायल आशीष परिहार और अंशुल परिहार ने दावा किया कि वाहन दिनेश लोधी चला रहा था. उन्होंने बताया कि कार के सामने “प्रीतम लोधी” और आगे-पीछे दोनों तरफ “विधायक” लिखा हुआ था.
बाद में एक वीडियो भी सामने आया जिसमें दिनेश लोधी को कथित तौर पर घायलों से यह कहते सुना जा सकता है कि उन्होंने सायरन और हॉर्न बजाया था, फिर वे रास्ते से क्यों नहीं हटे और एक बाइक पर तीन लोग क्यों सवार थे.
सूत्रों के अनुसार, दिनेश लोधी क्षेत्र में अपनी सक्रियता बढ़ाने के लिए पिछले कुछ दिनों से करेरा विधानसभा क्षेत्र में रह रहा था. घटना के समय वह कथित तौर पर जिम जा रहा था. हालांकि घायलों ने आरोप लगाया कि विधायक का बेटा थार चला रहा था, लेकिन स्थानीय पुलिस ने संजय परिहार की शिकायत पर करेरा थाने में अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ धारा 281 और 125(ए) के तहत लापरवाही और तेज़ गति से वाहन चलाने का मामला दर्ज किया है.
इंदौर: ‘वंदे मातरम’ पर विवाद, कांग्रेस की दो पार्षदों के खिलाफ मामला दर्ज
मध्य प्रदेश के इंदौर में वंदे मातरम’ को लेकर उठा विवाद अब कानूनी रूप ले चुका है. नगर निगम के बजट सत्र के दौरान इस राष्ट्रीय गीत को गाने से इनकार करने पर कांग्रेस की दो मुस्लिम महिला पार्षदों, रूबीना इकबाल खान और फौजिया शेख अलीम के खिलाफ पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है.
स्क्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना 8 अप्रैल की है, जब निगम की कार्यवाही शुरू होने पर ‘वंदे मातरम’ गाया जा रहा था. रिपोर्ट्स के अनुसार, फौजिया शेख अलीम ने सवाल किया कि क्या इसे गाना कानूनी रूप से अनिवार्य है और वे सदन से बाहर चली गईं. वहीं, रूबीना खान ने अपनी धार्मिक मान्यताओं का हवाला देते हुए इसे गाने से मना कर दिया.
इस व्यवहार पर भाजपा पार्षदों ने कड़ा विरोध जताया और सदन के भीतर “भारत में रहना है तो वंदे मातरम कहना होगा” जैसे नारे लगाए. पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की उन धाराओं के तहत केस दर्ज किया है जो विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता बढ़ाने और सद्भाव बिगाड़ने से संबंधित हैं.
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस घटना को “दुर्भाग्यपूर्ण” करार देते हुए कहा कि यह देशभक्तों के बलिदान का अपमान है. उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व से इस व्यवहार पर स्पष्टीकरण भी मांगा.
उल्लेखनीय है कि हाल ही में गृह मंत्रालय ने एक सर्कुलर जारी किया था जिसमें ‘वंदे मातरम’ के सभी छह छंदों को गाने का निर्देश दिया गया है. जहाँ भाजपा इसे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक मानती है, वहीं संवैधानिक रूप से केवल ‘जन गण मन’ ही राष्ट्रगान है, जबकि ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त है.
जेंडर संकट का असली समाधान: ‘बेटी बचाओ’ नहीं, ‘बेटा सुधारो’
आर्टिकल 14 में प्रकाशित प्रिया रमानी की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का जेंडर संकट महिलाओं को बचाने का नहीं, बल्कि उन पुरुषों और लड़कों को सुधारने का है जो उन्हें नुकसान पहुँचाते हैं. सरकार की नीतियां अब भी “बेटी बचाओ” के इर्द-गिर्द घूमती हैं, जबकि सवाल यह है कि बेटियों को आखिर बचाना किससे है? जवाब साफ है उसी समाज से, जहां हिंसा करने वाले अधिकतर पुरुष हैं.
रिपोर्ट बताती है कि सरकार ने महिला सशक्तिकरण के नाम पर कई योजनाएं चलाई हैं, लेकिन इनमें कहीं भी लड़कों को संवेदनशील बनाने या उनकी मानसिकता बदलने पर फोकस नहीं है. ऐसे में जेंडर हिंसा की जड़ जस की तस बनी रहती है. जब घर के भीतर ही पिता या रिश्तेदारों द्वारा मासूम बच्चियों का शोषण होता है, तो समस्या की जड़ लड़कों की परवरिश और उनकी मानसिकता में है. अब समय आ गया है कि सरकार एक ‘बेटा बचाओ’ जैसी नीति लाए, जिसका लक्ष्य भारतीय लड़कों को संवेदनशील बनाना और उनमें पितृसत्तात्मक सोच को खत्म करना हो.
नारी शक्ति के नाम पर गैस कनेक्शन, महिला अग्निवीर या अभियान जरूर दिखते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि बच्चियों से लेकर वयस्क महिलाओं तक, हिंसा का खतरा घर और समाज दोनों जगह मौजूद है. ऐसे में केवल सुरक्षा उपाय काफी नहीं, बल्कि मानसिक बदलाव जरूरी है.
महिला सशक्तिकरण के नाम पर करोड़ों रुपये मीडिया अभियानों और ‘बाइक रैलियों’ पर खर्च किए जाते हैं, जिनका ज़मीनी स्तर पर खास असर नहीं दिखता. इसकी जगह स्कूलों में जेंडर संवेदनशीलता की पढाई करायी जाए, ऐसी फिल्मों और कहानियों को बढ़ावा देना बंद हो जो ‘टॉक्सिक मस्कुलिनिटी’ (जहरीली मर्दानगी) का महिमामंडन करती हो और सरकार को अपनी मशीनरी का उपयोग यह सुनिश्चित करने के लिए करना चाहिए कि हर लड़के को जेंडर हिंसा के परिणामों का स्पष्ट आभास हो.
अब छत्तीसगढ़ में भी यूसीसी की सुगबुगाहट, ड्राफ्ट तैयार करने के लिए समिति का गठन
स्क्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा शासित राज्य उत्तराखंड और गुजरात के बाद अब छत्तीसगढ़ भी समान नागरिक संहिता को लागू करने की दिशा में बढ़ रहा है. बुधवार को छत्तीसगढ़ कैबिनेट ने राज्य के लिए यूसीसी का मसौदा तैयार करने हेतु एक उच्च स्तरीय समिति के गठन का निर्णय लिया.
इस महत्वपूर्ण पैनल की कमान सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई को सौंपी गई है. न्यायमूर्ति देसाई ने ही उत्तराखंड और गुजरात के यूसीसी बिलों की सिफारिश करने वाली समितियों का नेतृत्व किया था. सरकार का कहना है कि यह समिति नागरिकों और विशेषज्ञों से सुझाव आमंत्रित करेगी ताकि एक ऐसा कानून बनाया जा सके जो “सरल और एकीकृत” हो.
यूसीसी का अर्थ है विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत मामलों के लिए सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून. वर्तमान में, विभिन्न धार्मिक और जनजातीय समूहों के व्यक्तिगत मामले उनके अपने विशिष्ट कानूनों द्वारा शासित होते हैं. संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य को पूरे भारत में एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का निर्देश देता है, हालांकि यह कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है.
छत्तीसगढ़ में इस कदम का विरोध भी शुरू हो गया है. कांग्रेस और आदिवासी संगठनों का तर्क है कि यूसीसी से राज्य की 30 फीसदी से अधिक आदिवासी आबादी के हितों को नुकसान पहुँच सकता है. राज्य कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज के अनुसार, आदिवासियों को संविधान के तहत विशेष सुरक्षा और नागरिक अधिकार प्राप्त हैं, जिन्हें यूसीसी प्रभावित कर सकता है.
दुनिया की बदलती राजनीति: हंगरी-ब्राज़ील के संकेत और ‘ट्रंप मॉडल’ पर सवाल
हरकारा डीप डाइव में शोभन सक्सेना के साथ बातचीत में हंगरी से ब्राज़ील तक आए राजनीतिक बदलावों और “ट्रंप मॉडल” की राजनीति पर विस्तार से चर्चा की गई. हंगरी में लंबे समय से सत्ता में रहे विक्टर ओरबान की हार को एक बड़े संकेत के तौर पर देखा जा रहा है, खासकर इसलिए क्योंकि उन्हें व्लादिमीर पुतिन और डोनाल्ड ट्रंप का करीबी माना जाता रहा है. यह परिणाम उन देशों की श्रृंखला में जुड़ता है जहां जनता ने सत्ता के केंद्रीकरण और आक्रामक राजनीति के खिलाफ प्रतिक्रिया दी है.
चर्चा में यह भी सामने आया कि ब्राज़ील में जैर बोल्सोनारो की हार और अन्य देशों के चुनावी नतीजे इस बात की ओर इशारा करते हैं कि दुनिया भर में एक खास तरह की राजनीति को चुनौती मिल रही है. हालांकि यह भी साफ किया गया कि यह रुझान एकतरफा नहीं है, कुछ देशों में इसी तरह की राजनीति नए रूप में उभर भी रही है, जिससे वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य और जटिल हो गया है. शोभन सक्सेना ने बताया कि “ट्रंप मॉडल” केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक नेटवर्क की तरह कई देशों में फैलता गया. इस मॉडल में राष्ट्रवाद, माइग्रेशन विरोध, बड़े कॉर्पोरेट समूहों से नज़दीकी और सांस्कृतिक मुद्दों को राजनीतिक केंद्र में रखना शामिल है. लेकिन हाल के चुनावों और जन प्रतिक्रियाओं से संकेत मिल रहे हैं कि जनता अब इस मॉडल पर सवाल उठाने लगी है.
बातचीत में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बदलते पैटर्न पर भी जोर दिया गया है. 2008 की आर्थिक मंदी के बाद पारंपरिक राजनीतिक दलों की पकड़ कमजोर हुई, जिससे नई तरह की राजनीति को जगह मिली. इसी दौर में अमेरिका में ट्रंप और अन्य देशों में इसी तरह के नेता उभरे. लेकिन अब कई जगहों पर जनता खुद नए विकल्प तलाशती दिख रही है, जिससे यह साफ होता है कि राजनीति लगातार परिवर्तनशील है. इस पूरी चर्चा का निष्कर्ष यही रहा कि हंगरी से लेकर ब्राज़ील तक जो बदलाव दिख रहे हैं, वे केवल अलग-अलग घटनाएं नहीं, बल्कि एक बड़े वैश्विक ट्रेंड का हिस्सा हैं. “ट्रंप मॉडल” की राजनीति पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन उसकी जमीन कई जगहों पर डगमगाती जरूर नजर आ रही है, और आने वाले समय में इसका असर दुनिया की राजनीति पर और स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है.
झूठे केसों पर सख्त इलाहाबाद हाईकोर्ट: धर्मांतरण कानून के दुरुपयोग पर यूपी सरकार से जवाब तलब
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक़ इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तरप्रदेश में धर्मांतरण क़ानून के तहत दर्ज झूठी एफआईआर पर चिंता ज़ाहिर की है. कोर्ट ने राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को निर्देश दिया है कि वे व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर बताएं कि ऐसे मामलों में क्या कार्रवाई की जा रही है. जस्टिस अब्दुल मोईन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की बेंच ने कहा कि 2021 के धर्मांतरण क़ानून के तहत बिना सोचे समझे एफआईआर दर्ज की जा रही है, जो बाद में गलत साबित होती हैं.
कोर्ट ने यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें एक मुस्लिम युवा मोहम्मद फैज़ान ने इसी तरह की एक एफआईआर को रद्द करने के लिए एक अर्ज़ी दाखिल की थी. एफआईआर में यह आरोप है कि वह 18 वर्षीय एक लड़की को बहला फुसला कर ले गया और उसका धर्म बदल कर शादी करने की कोशिश की.
हालाँकि लड़की ने अपने बयान में इन आरोपों से इंकार किया है और कहा है कि वह पिछले तीन साल से उसके साथ रिश्ते में है. उसने धर्मांतरण और जबरन शादी या किसी तरह के दबाव जैसे आरोपों को ख़ारिज करते हुए यह भी कहा कि वह उसी व्यक्ति के साथ रहना चाहती है और उसे हिंदू संगठनों से डर है कि वे उसे और उसके परिवार को परेशान कर सकते हैं.
कोर्ट ने कहा कि लड़की के बयान से साफ है कि उसे अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर डर है. इसके बावजूद जांच अधिकारी ने केवल रेप का आरोप हटाया, लेकिन अपहरण, हमला और धर्मांतरण कानून के तहत जांच जारी रखी.
कागज़ की सुरक्षा या धोखा? भारत में हेल्थ इंश्योरेंस का टूटता भरोसा
फ्रंटलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हेल्थ इंश्योरेंस जिस सुरक्षा के वादे के साथ बेचा जाता है, वह अक्सर अस्पताल में क्लेम के समय टूट जाता है. कई मामलों में बीमा कंपनियां पॉलिसी के छोटे-छोटे नियमों (फाइन प्रिंट) का हवाला देकर इलाज का खर्च देने से मना कर देती हैं, जिससे लोगों का भरोसा टूट जाता है.
रिपोर्ट में एक उदाहरण दिया गया है, जहां बेंगलुरु में एक मरीज का इलाज कराने के दौरान एचडीएफसी एर्गो ने क्लेम यह कहकर खारिज कर दिया कि “पहले से बीमारी की जानकारी नहीं दी गई थी”, जबकि आधार 25 साल पुराना एक मेडिकल नोट था. कई दिनों तक शिकायत करने के बावजूद क्लेम मंजूर नहीं हुआ.
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में यह समस्या अब बड़े स्तर पर दिख रही है. एक तरफ इलाज का खर्च तेजी से बढ़ रहा है, दूसरी तरफ सरकारी स्वास्थ्य खर्च जीडीपी का सिर्फ लगभग 2% है. ऐसे में लोगों को जेब से खर्च करना पड़ता है. इसी कमी को भरने के लिए पिछले दो दशकों में हेल्थ इंश्योरेंस को बढ़ावा मिला है. सरकार ने 2008 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना और 2018 में आयुष्मान भारत शुरू की, जिसके तहत करोड़ों गरीब परिवारों को इलाज का कवरेज देने की कोशिश हुई. लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, कई निजी अस्पताल कम भुगतान और देरी के कारण इस योजना से बाहर हो रहे हैं, जिससे मरीजों को परेशानी हो रही है.
रिपोर्ट बताती है कि भारत में बीमारियों का बोझ भी बढ़ रहा है. हार्ट, डायबिटीज और कैंसर जैसी बीमारियां अब कम उम्र में हो रही हैं और उनका इलाज बहुत महंगा है, जिससे परिवारों की बचत खत्म हो जाती है. इसी बीच, बीमा कंपनियां अब ज्यादा मुनाफे पर ध्यान दे रही हैं. पॉलिसियों में कई शर्तें, लिमिट और छूट जोड़ दी गई हैं. नई तकनीक और डेटा, जैसे ऐप, वियरेबल डिवाइस के जरिए लोगों के स्वास्थ्य के आधार पर प्रीमियम तय किया जा रहा है. इससे जोखिम को साझा करने की बजाय हर व्यक्ति को अलग-अलग श्रेणी में बांटा जा रहा है.
हॉस्पिटल और बीमा कंपनियों के बीच भी विवाद रहता है, हॉस्पिटल कहते हैं कि भुगतान कम और देर से होता है, जबकि बीमा कंपनियां इलाज के बिल ज्यादा होने का आरोप लगाती हैं. इसके अलावा निजी अस्पतालों के लिए कोई एक समान रेट तय करने वाली व्यवस्था नहीं है, जिससे एक ही इलाज का खर्च अलग-अलग जगहों पर अलग होता है.
भारत में हेल्थ इंश्योरेंस सिस्टम अब तीन स्तरों में बंट गया है, सबसे नीचे सरकारी योजनाएं, बीच में नौकरी से मिलने वाला बीमा, और ऊपर महंगे निजी प्लान. इसके बावजूद करीब 40 से 60 करोड़ लोग ऐसे हैं जो किसी भी तरह के बीमा से बाहर हैं। इन्हें “मिसिंग मिडिल” कहा जाता है.
सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी: समय से पहले परिसीमन से चुनावी ढांचा अस्थिर हो सकता है
द हिन्दू की रिपोर्ट के मुताबिक़, सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में परिसीमन को लेकर एक चेतावनी दी थी. कोर्ट ने कहा था कि 2026 के बाद होने वाली जनगणना से पहले अगर सीटों का पुनर्विन्यास किया गया तो इससे देश के चुनावी ढांचे की सामंता बिगड़ सकती है और संविधान और राजनीति के बीच की स्पष्ट सीमा धुंधली हो सकती है.
यह मामला के.पुरुषोत्तम रेड्डी केस से जुड़ा है. जिसमें आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में परिसीमन की मांग की गई थी. याचिकाकर्ता का तर्क था कि जम्मू-कश्मीर में 2022 में परिसीमन हुआ, लेकिन इन राज्यों में नहीं, जिससे भेदभाव हो रहा है. हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को खारिज कर दिया है. कोर्ट ने साफ़ कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के तहत यह स्पष्ट नियम है कि 2026 के बाद पहली जनगणना के आंकड़े आने तक सीटों का पुनर्विन्यास नहीं किया जा सकता और अगर एक दो राज्यों के लिए इस नियम को तोड़ा गया तो यह समानता के अधिकार के खिलाफ होगा.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि अगर तय समय से पहले परिसीमन किया गया, तो इससे चुनावी व्यवस्था अस्थिर हो सकती है और यह तय करना मुश्किल हो जाएगा कि क्या फैसला संविधान के आधार पर लिया गया है या राजनीतिक हित में. यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि संसद में अब एक नया बिल लाया जा रहा है, जिसमें लोकसभा सीटों को बढ़ाकर करीब 850 करने और सीटों के पुनर्विन्यास पर लगी रोक हटाने की बात है. इसमें 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करने की संभावना भी जताई जा रही है.
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.






