15/04/2026: परिसीमन पर सवाल | सरकार की चाल | दक्षिण की 'सजा' | ''दो भारत' का डर | 250 रोहिंग्या लापता | 'चिता' आंदोलन | राघव चड्ढा के कारण | कॉमेडियन गिरफ्तार
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संसद का विशेष सत्र आज से, इंडिया गठबंधन परिसीमन विधेयक का विरोध करेगा; कहा—महिला आरक्षण से जोड़कर सरकार चल रही है ‘चालें’
श्रावस्ती दासगुप्ता के अनुसार, मोदी सरकार द्वारा बुलाए गए संसद के विशेष सत्र से पहले, इंडिया गठबंधन के विपक्षी दलों ने बुधवार (15 अप्रैल) को घोषणा की कि वे उस संविधान संशोधन विधेयक के खिलाफ मतदान करेंगे, जो महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को “लागू” करने के उद्देश्य से लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखता है. विपक्षी दलों ने एक संयुक्त बैठक की, जिसके बाद उन्होंने कहा कि हालांकि वे महिला आरक्षण का समर्थन करते हैं, लेकिन सरकार परिसीमन का उपयोग करके “चालें चलने” की कोशिश कर रही है, और इसलिए विपक्ष एकजुट होकर सरकार के विधेयकों का विरोध करेगा.
मंगलवार (14 अप्रैल) को केंद्र सरकार ने तीन विधेयकों की प्रतियां वितरित कीं: संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026, परिसीमन विधेयक, 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026. 16 से 18 अप्रैल तक चलने वाला यह विशेष सत्र 2023 के महिला आरक्षण अधिनियम को लागू करने के लिए बुलाया जा रहा है, जिसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान था.
हालांकि, उस कानून को परिसीमन और जनगणना से जोड़ दिया गया था. गुरुवार को एक साथ लाए जा रहे इन तीन विधेयकों के माध्यम से केंद्र सरकार, महिला आरक्षण को “क्रियान्वित” करने का उद्देश्य बताते हुए, बड़े पैमाने पर ऐसे बदलाव लाना चाहती है जिससे न केवल लोकसभा की संख्या बढ़कर 850 हो जाएगी, बल्कि इसके परिणामस्वरूप संसदीय गणित, जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व और केंद्र-राज्य संबंधों में भी महत्वपूर्ण बदलाव आएंगे.
बुधवार को सभी विपक्षी दलों की बैठक के बाद, कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि महिला आरक्षण के समर्थन में सभी विपक्षी दल एकजुट हैं.
खड़गे ने संवाददाताओं से कहा, “हम सभी महिला आरक्षण के पक्ष में हैं, लेकिन जिस तरह से उन्होंने इसे किया है, वह विपक्षी दलों को दबाने के लिए राजनीतिक रूप से प्रेरित है.”
खड़गे ने आगे कहा कि महिला आरक्षण का 2010 और 2023 में भी सर्वसम्मति से समर्थन किया गया था और सरकार को इसके बजाय सीधे ‘महिला आरक्षण अधिनियम, 2023’ को लागू करना चाहिए.
उन्होंने कहा, “वे परिसीमन के साथ चालें चल रहे हैं. इसलिए सभी दल एक रुख अपनाएंगे और संसद में एकजुट होकर लड़ेंगे. हम इस विधेयक का विरोध करेंगे, लेकिन हम महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं.”
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने कहा कि 2023 में पारित महिला आरक्षण को लोकसभा की वर्तमान सदस्य संख्या 543 के आधार पर ही लागू किया जाना चाहिए.
उन्होंने कहा, “हमने मांग की थी कि महिला आरक्षण को 2024 के लोकसभा चुनावों से ही लागू किया जाना चाहिए. हमारी मांग को अनसुना कर दिया गया. अब अचानक, उन्होंने चुनावों के बीच में यह फैसला लिया है. वे बंगाल और तमिलनाडु में हारने वाले हैं. वे इन तीन विधेयकों को चुनावों के बीच में लेकर आए हैं. उन्होंने परिसीमन और महिला आरक्षण को जोड़कर एक ही विधेयक में डाल दिया है.”
रमेश ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा बहुमत हासिल करने के लिए परिसीमन आयोग का इस्तेमाल एक ‘हथियार’ के रूप में किया जा रहा है.
इस बैठक में कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी, जेएमएम, आरजेडी, शिवसेना (यूबीटी), एनसीपी (शरद पवार), आप, जेकेएनसी, सीपीआई(एम), आईयूएमएल, सीपीआई, आरएसपी, केरल कांग्रेस और वीसीके सहित अन्य दलों के नेता शामिल हुए. समाजवादी पार्टी ने भी ऑनलाइन टिप्पणियों के माध्यम से अपना समर्थन दिया है.
बीजेडी प्रमुख और ओडिशा विधानसभा में विपक्ष के नेता, पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भी मुख्यमंत्री मोहन माझी को पत्र लिखकर “48 घंटे के भीतर” विशेष सत्र बुलाने की मांग की है. उन्होंने मांग की है कि एक प्रस्ताव पारित किया जाए कि केंद्र सरकार के प्रस्तावित परिसीमन विधेयक के माध्यम से “ओडिशा के राजनीतिक अधिकारों का 0.001% हिस्सा भी अन्य राज्यों को छीनने की अनुमति नहीं दी जाएगी.”
स्क्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार का तर्क है कि 1971 के बाद से देश की जनसांख्यिकीय स्थिति बदल चुकी है. शहरीकरण और पलायन के कारण निर्वाचन क्षेत्रों के बीच जनसंख्या का बड़ा अंतर पैदा हो गया है. सरकार के अनुसार, 2023 के महिला आरक्षण अधिनियम को प्रभावी बनाने के लिए नए परिसीमन की आवश्यकता है ताकि महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो सके.
संसदीय गणित
सरकार द्वारा पेश किया जाने वाला 131वां संविधान संशोधन विधेयक पारित करने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी. वर्तमान में सत्ताधारी एनडीए के पास दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत नहीं है, जिससे इस विधेयक पर टकराव और भी रोचक हो गया है. विपक्ष ने इसे “संघीय ढांचे और संविधान के खिलाफ” बताते हुए सदन में इसे हराने का संकल्प लिया है.
‘संघवाद’ दिल्ली द्वारा थोपी गई कोई प्रशासनिक व्यवस्था नहीं; एक पार्टी के लाभ के लिए सत्ता का पुनर्गठन: स्टालिन
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को दिए इंटरव्यू में परिसीमन विधेयक को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है. परिसीमन के मुद्दे पर केंद्र सरकार को “अंतिम चेतावनी” देने के एक दिन बाद, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने बयानबाजी से आगे बढ़ते हुए तेजी से लामबंदी शुरू कर दी है. उन्होंने बुधवार को द्रमुक (डीएमके) जिला सचिवों की एक आपात बैठक बुलाई और गुरुवार को राज्यव्यापी काले झंडे के विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया. तमिलनाडु के राजनीतिक मुखरता के इतिहास का हवाला देते हुए, स्टालिन ने संकेत दिया कि यदि संस्थागत प्रतिक्रियाएं विफल रहीं, तो जनता अपनी अभिव्यक्ति खुद करेगी.
अरुण जनार्दनन के अनुसार, स्टालिन ने कहा कि भारत का निर्माण अंकगणित के माध्यम से नहीं हुआ था; इसका निर्माण विश्वास, संयम और एक साझा संवैधानिक दृष्टिकोण पर हुआ था. संविधान ने राज्यों से जनसांख्यिकीय दौड़ में प्रतिस्पर्धा करने के लिए नहीं कहा था; उसने उनसे जिम्मेदारी से शासन करने के लिए कहा था. जिन राज्यों ने जनसंख्या स्थिरीकरण, शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य में निवेश किया, उन्होंने राष्ट्र की सेवा में ऐसा किया, इसलिए नहीं कि इस प्रक्रिया में उनकी आवाज़ कम कर दी जाए.
आज हम जो देख रहे हैं वह परिसीमन से कहीं आगे की बात है; यह इस बारे में है कि कैसे सत्ता को एक पार्टी के लाभ के लिए पुनर्गठित किया जा रहा है. क्या यह लोकतंत्र को मजबूत करने, महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए है या राजनीतिक सुविधा के लिए इसे फिर से व्यवस्थित करने के लिए?
हमने यह दृष्टिकोण पहले भी देखा है. विमुद्रीकरण (नोटबंदी) के दौरान, जल्दबाजी में लिए गए फैसलों ने मेहनत से कमाई गई मुद्रा को बेकार कर दिया था. आज यह परिसीमन है - तमिलों को लगभग मताधिकार से वंचित करने और उनकी आवाज़ दबाने के लिए. यह केवल संख्याओं के बारे में नहीं है. यह आवाज़ के बारे में है - और उस आवाज़ के वजन के बारे में. संसदीय लोकतंत्र में हर वोट मायने रखता है. अटल बिहारी वाजपेयी सहित कई सरकारें एक वोट से गिर चुकी हैं. मामूली सा झुकाव भी राष्ट्रीय परिणामों को बदल सकता है. सुरक्षा उपायों के बिना आनुपातिक विस्तार तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के बीच की खाई को और चौड़ा कर देगा.
यही कारण है कि वाजपेयी ने परिसीमन को रोक दिया था - ताकि जब तक देश अधिक समान रूप से विकसित न हो जाए, तब तक संतुलन बना रहे. अब उस बुद्धिमानी को क्यों त्यागा जा रहा है? जब तक वास्तविक समानता हासिल नहीं हो जाती, तब तक इसे जारी क्यों नहीं रखा जाता? यदि प्रतिनिधित्व केवल जनसंख्या वृद्धि को पुरस्कृत करने लगे और शासन के परिणामों को अनदेखा कर दे, तो हम असंतुलन को ठीक नहीं कर रहे हैं; हम एक नया अन्याय पैदा कर रहे हैं. जिन राज्यों ने राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को बनाए रखा, उन्हें अब राजनीतिक रूप से हाशिए पर नहीं धकेला जा सकता. यह सहकारी संघवाद की आत्मा पर प्रहार होगा.
मुख्यमंत्री ने कहा कि तमिलनाडु की आवाज़ आकस्मिक नहीं है; यह विशिष्ट है. जैसा कि हमारे नेता और द्रमुक संस्थापक पेरारिग्नर अन्ना (सी.एन. अन्नादुराई) ने कहा था, हम एक द्रविड़ मूल से हैं, जिसके पास देने के लिए कुछ ठोस है - सामाजिक न्याय, तर्कवाद, राज्य की स्वायत्तता और समावेशी शासन. उस आवाज़ को सुना जाना चाहिए, संसद में मौन नहीं किया जाना चाहिए. संघवाद दिल्ली द्वारा थोपी गई कोई प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है; यह एक संवैधानिक अनुबंध है. यदि वह अनुबंध कमजोर होता है, तो भारत की अवधारणा ही कमजोर हो जाती है.
प्रश्न सरल है: न्याय दिया जाना चाहिए या टाला जाना चाहिए? महिला आरक्षण एक नैतिक और लोकतांत्रिक अनिवार्यता है. इसे परिसीमन या देरी से चल रही जनगणना जैसी अनिश्चित प्रक्रियाओं पर सशर्त नहीं बनाया जा सकता. दोनों को जोड़ने से, व्यापक राष्ट्रीय सहमति के बावजूद, एक लंबे समय से लंबित सुधार के अनिश्चित भविष्य में धकेले जाने का जोखिम है.
अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सुधार के चरित्र को बदल देता है. जो लैंगिक समानता के लिए एक निर्णायक कदम होना चाहिए था, वह अब एक विवादास्पद राजनीतिक अभ्यास में उलझ गया है. यह एक वैध चिंता पैदा करता है कि सामाजिक न्याय के उपाय का उपयोग प्रतिनिधित्व के गहरे पुनर्गठन के लिए एक मुखौटे के रूप में किया जा रहा है.
भारत ने स्थानीय निकायों के माध्यम से पहले ही यह प्रदर्शित कर दिया है कि महिला आरक्षण को तुरंत लागू किया जा सकता है. तमिलनाडु में, हमने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50% प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया है. हमारे पास 50% महिला मेयर हैं, जिनमें चेन्नई, कोयंबटूर और मदुरै शामिल हैं. मुद्दा व्यवहार्यता का नहीं है; यह राजनीतिक इच्छाशक्ति का है.
साथ ही, निष्पक्षता चयनात्मक नहीं हो सकती. यदि अवसरों का विस्तार करते हुए, हम सीमाओं को इस तरह से फिर से खींचते हैं जो कुछ राज्यों को कमजोर करता है - विशेष रूप से उन राज्यों को जिन्होंने विकास लक्ष्यों को पूरा किया है - तो हम एक हाथ से न्याय को आगे बढ़ाते हैं और दूसरे हाथ से उसे कमजोर करते हैं.
मुझे पूछने दीजिए: विपक्ष के बीच द्रमुक द्वारा जोर दिए जाने के बावजूद, सरकार को 2024 में मौजूदा 543 सीटों के भीतर 33% आरक्षण लागू करने से किसने रोका था? नई शर्तें क्यों थोपी जा रही हैं? ‘गोलपोस्ट’ क्यों बदला जा रहा है? आप अपनी ही समयसीमा से पीछे क्यों हट रहे हैं? परिसीमन के साथ इसकी जल्दबाजी और गड़बड़ी अधिक संदेह पैदा करती है.
एक परिपक्व लोकतंत्र को इस बात में अंतर करना चाहिए कि क्या तत्काल है और क्या जटिल. महिलाओं के अधिकार तत्काल हैं - वे प्रतीक्षा नहीं कर सकते. परिसीमन पूरी तरह से अलग अभ्यास है जिसकी गतिशीलता और परिणाम भिन्न हैं. हमें दोनों करना चाहिए, लेकिन हमें एक को दूसरे में देरी करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए.
इतिहास ऐसी चीज़ नहीं है जिसे हम हल्के में लेते हैं. 1950 और 1960 के दशक के आंदोलन भारत के खिलाफ नहीं थे - वे भारत को एक ऐसे संघ के रूप में आकार देने के प्रयास थे जो विविधता, गरिमा और संघीय संतुलन का सम्मान करता हो.
उन्होंने दिखाया कि जब संस्थान कम पड़ जाते हैं और संवाद में ईमानदारी की कमी होती है, तो लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति फीकी नहीं पड़ती - बल्कि यह गहरी होती है और लोगों के बीच ताकत पाती है. तमिलनाडु में, वह अभिव्यक्ति हमेशा शांतिपूर्ण, सैद्धांतिक और संवैधानिक मूल्यों में निहित रही है.
मैं केवल यह याद दिला रहा हूँ कि ऐसी परंपरा मौजूद है - टकराव के लिए नहीं, बल्कि सुधार के लिए. यह एक ऐसे समाज को दर्शाता है जो निष्पक्षता दांव पर होने पर शामिल होगा, सवाल करेगा और मजबूती से खड़ा रहेगा. यदि वह याद दिलाना कुछ लोगों को परेशान करता है, तो उन्हें पूछना चाहिए कि क्यों. यह कोई धमकी नहीं है; यह ‘कोर्स करेक्शन’ (मार्ग सुधार) का आह्वान है. यदि इस पर ध्यान दिया गया, तो यह संघ को मजबूत करेगा. यदि इसे नजरअंदाज किया गया, तो जिम्मेदारी उन लोगों की होगी जिन्होंने नहीं सुनने का विकल्प चुना.
यह एक ऐतिहासिक क्षण है - न केवल तमिलनाडु के लिए, बल्कि पूरे दक्षिणी क्षेत्र के लिए. द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री के रूप में, न्याय के लिए खड़े होने की मेरी गहरी जिम्मेदारी है क्योंकि आज जो तय किया जा रहा है उसके परिणाम आने वाली पीढ़ियों को आकार देंगे. इसके मूल में, यह एक मौलिक प्रश्न के बारे में है: भारत के सत्ता के गलियारों में तमिल कहाँ खड़े हैं?
यह दक्षिण भारत के करोड़ों लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है. यह चुनावी राजनीति से कहीं परे है. यह भारतीय संघ के भीतर हमारे लोगों की राजनीतिक आवाज़, प्रासंगिकता और गरिमा की रक्षा के बारे में है. इस मुद्दे की गंभीरता को पहचानते हुए, मैंने निष्पक्ष परिसीमन पर विचार करने के लिए सात राज्यों के मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन बुलाने की पहल की. वह प्रयास राजनीति के बारे में नहीं था - वह सिद्धांतों के बारे में था.
यदि हम अब कार्य करने में विफल रहते हैं, यदि हम इस महत्वपूर्ण मोड़ पर अपनी बात मजबूती से नहीं रखते हैं, तो जो असंतुलन पैदा होगा वह स्थायी हो सकता है. यह कोई गुजरता हुआ मुद्दा नहीं है; यह एक निर्णायक क्षण है.
मैं इसे न केवल एक राजनीतिक जिम्मेदारी के रूप में देखता हूँ, बल्कि एक ऐतिहासिक पुकार के रूप में देखता हूँ - यह सुनिश्चित करने के लिए कि तमिलनाडु और दक्षिण की आवाज़ मजबूत, सम्मानित और भारत के भविष्य के लिए अभिन्न बनी रहे.”
महिला आरक्षण तो बहाना: नज़र परिसीमन पर; पहले से कमजोर वित्तीय संघवाद पर और चोट पहुंचेगी
‘द हिंदू’ ने लिखा है कि 16 अप्रैल से बुलाए गए संसद सत्र में, केंद्र सरकार महिला सशक्तिकरण को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही है, लेकिन यह एक व्यापक विधायी पैकेज के हिस्से के रूप में है: संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 और एक सहायक परिसीमन विधेयक. इसका घोषित तर्क ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (2023 का 106वां संशोधन) को क्रियान्वित करना है, जो लोकसभा और विधानसभा की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करता है, लेकिन इसे जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन से जोड़ दिया गया था. महिला आरक्षण को परिसीमन के साथ बांधने पर सरकार का जोर यह संकेत देता है कि आरक्षण का उपयोग परिसीमन के लिए एक ‘राजनीतिक आवरण’ के रूप में किया जा रहा है: यानी लोकसभा सीटों का एक ऐसा व्यापक पुनर्वितरण जो संसद के संघीय ढांचे को उन राज्यों के पक्ष में बदल देगा जहाँ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का चुनावी वर्चस्व है, और उन राज्यों की कीमत पर जहाँ वह ऐतिहासिक रूप से कमजोर रही है.
जब भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की ओर से बिना किसी निश्चित या तर्कसंगत स्पष्टीकरण के भारत की दशकीय जनगणना में पांच साल से अधिक की देरी की गई, तो इसके पीछे के राजनीतिक तर्क को समझना मुश्किल नहीं था. 2021 की जनगणना को पहले कोविड-19 का हवाला देते हुए स्थगित किया गया था, लेकिन उसके बाद होने वाली लगातार देरी के लिए कोई कारण नहीं बताया गया, जब तक कि चुपचाप यह घोषणा नहीं कर दी गई कि यह कवायद 2026-27 में की जाएगी. संविधान के तहत, 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों के अंतर-राज्यीय वितरण पर लगी रोक केवल वर्ष 2026 के बाद आयोजित होने वाली पहली जनगणना के प्रकाशित होने के बाद ही समाप्त होनी थी. इसका अर्थ यह था कि सामान्य परिस्थिति में, परिसीमन 2031 की जनगणना पर आधारित होता. जनगणना को 2026-27 तक टालकर, सरकार ने यह सुनिश्चित कर लिया कि परिसीमन की प्रक्रिया को उसकी पसंदीदा समय-सीमा पर शुरू किया जा सके, जिसमें 2031 की जनगणना के बजाय 2026-27 की जनगणना का उपयोग हो.
लोकसभा की सीटों को वर्तमान 543 से बढ़ाकर 850 (राज्यों से 815 और केंद्र शासित प्रदेशों से 35) करने का प्रस्ताव है. अब तक संविधान में ‘जनसंख्या’ का अर्थ 1971 की जनगणना (सीट आवंटन के लिए) और 2001 की जनगणना (सीमा निर्धारण के लिए) था. नए विधेयक में इसे बदलकर “जनसंख्या का अर्थ वह जनगणना होगा जिसे संसद कानून द्वारा निर्धारित करे” कर दिया गया है. यानी अब संविधान के बजाय साधारण बहुमत से सरकार तय करेगी कि कौन सी जनगणना इस्तेमाल करनी है. 1976 और 2001 के संशोधनों ने उन राज्यों (खासकर दक्षिण के) को सुरक्षा दी थी जिन्होंने अपनी जनसंख्या को सफलतापूर्वक स्थिर किया था. अब यह सुरक्षा हटा दी गई है.
2011 की जनगणना के आधार पर 850 सीटों का आवंटन क्षेत्रों के बीच भारी असमानता पैदा करेगा. हिंदी भाषी राज्य (यूपी, बिहार, राजस्थान आदि): इनकी सीटें 207 से बढ़कर 366 हो जाएंगी (77% की वृद्धि). इनका लोकसभा में हिस्सा 38.1% से बढ़कर 43.1% हो जाएगा. जबकि दक्षिणी राज्यों (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक आदि) की सीटें 132 से बढ़कर केवल 176 होंगी. इनका हिस्सा 24.3% से घटकर 20.7% रह जाएगा. पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों के हिस्से में भी गिरावट आएगी.
जिन राज्यों ने दशकों तक स्वास्थ्य, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण पर निवेश किया और प्रजनन दर को नियंत्रित किया, वे अब अपनी लोकतांत्रिक शक्ति खोने की कगार पर हैं. इसके विपरीत, जो राज्य इन संकेतकों में पिछड़ गए, उन्हें सबसे अधिक सीटें मिलेंगी. यह पहले से ही कमजोर वित्तीय संघवाद को और चोट पहुँचाएगा.
महिला आरक्षण को वर्तमान 543 सीटों में भी रोटेशन के आधार पर लागू किया जा सकता था. इस विधेयक को बिना सार्वजनिक बहस के और चुनावों से ठीक पहले जल्दबाजी में लाना इसकी मंशा पर सवाल खड़ा करता है. इस विधेयक का विरोध किया जाना चाहिए जो भारतीय संघ की संघीय नींव पर प्रहार करता है. केंद्र सरकार महिला आरक्षण की आड़ में परिसीमन की ऐसी प्रक्रिया थोप रही है जिससे दक्षिण और पूर्व भारत की राजनीतिक शक्ति कम हो जाएगी और उत्तर भारत (विशेषकर हिंदी बेल्ट) का वर्चस्व बढ़ जाएगा.
भाजपा की कमजोरी और मजबूती से मेल खाता है लाभ और नुकसान का पैटर्न: योगेंद्र यादव
योगेंद्र यादव ने भी ‘एक्स’ पर अपना संशोधित आकलन साझा करते हुए बताया है कि विधेयकों में प्रस्तावित परिसीमन लोकसभा में राज्यों की हिस्सेदारी को कैसे प्रभावित करेगा. यादव के मुताबिक, नुकसान और लाभ उठाने वाले राज्यों का राजनीतिक पैटर्न लगभग पूरी तरह से भाजपा की कमजोरी और मजबूती वाले क्षेत्रों से मेल खाता है.
कुल सीटें: 850 (जिनमें से 35 केंद्र शासित प्रदेशों के लिए). शेष सीटें 2011 की जनगणना में जनसंख्या की हिस्सेदारी के अनुसार आवंटित की गई हैं.
‘लाभ/हानि’ वाला कॉलम महत्वपूर्ण है, क्योंकि 850 सीटों वाले सदन में हर राज्य को अधिक सीटें मिलेंगी. यहाँ लाभ और हानि की तुलना उन सीटों से की गई है जो प्रत्येक राज्य को तब मिलतीं यदि उनकी वर्तमान हिस्सेदारी बरकरार रखी जाती: उदाहरण के लिए, केरल को 23 सीटें मिलेंगी (3 अतिरिक्त), लेकिन यदि उसकी वर्तमान हिस्सेदारी बनी रहती तो उसे 31 सीटें मिलनी चाहिए थीं. इसलिए, यह 8 सीटों का नुकसान है. इसी तरह, उत्तर प्रदेश को 125 सीटें मिलनी चाहिए थीं, लेकिन उसे 138 मिलेंगी, जो कि 13 सीटों का लाभ है.”
लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाने वाले विधेयकों पर सवाल; बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को सजा दी जा रही है?
श्रावस्ती दासगुप्ता की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने हाल ही में संसद के तीन दिनी विशेष सत्र (16 से 18 अप्रैल) से ठीक पहले तीन महत्वपूर्ण विधेयक—संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, परिसीमन विधेयक 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक—पेश किए हैं. सरकार का तर्क है कि ये विधेयक 2023 के महिला आरक्षण अधिनियम को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक हैं. हालांकि, इन विधेयकों की गहरी समीक्षा करने पर यह स्पष्ट होता है कि इनका प्रभाव केवल महिला आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि ये भारत के संसदीय ढांचे, जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व और केंद्र-राज्य संबंधों की नींव को बदलने की क्षमता रखते हैं.
विधेयकों के प्रमुख प्रावधान और संरचनात्मक बदलाव
इन विधेयकों का सबसे बड़ा प्रस्ताव लोकसभा की सदस्य संख्या को वर्तमान 543 से बढ़ाकर 850 करना है. इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 में संशोधन प्रस्तावित किए गए हैं. अनुच्छेद 82 में संशोधन: सरकार उस खंड को हटाना चाहती है जो यह अनिवार्य करता था कि अगला परिसीमन 2027 की जनगणना के बाद होगा. अनुच्छेद 170 में बदलाव: राज्य विधानसभाओं की सीटों पर लगी 2001 की जनगणना आधारित रोक को हटाने का प्रावधान है. जनगणना का आधार: सबसे विवादास्पद पहलू यह है कि विधेयक “नवीनतम प्रकाशित जनगणना” के आधार पर परिसीमन की बात करता है. चूंकि 2021 की जनगणना टल गई थी, इसका सीधा अर्थ 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करना है. विपक्ष का सवाल है कि जब 2027 की जनगणना की प्रक्रिया वर्तमान में जारी है, तो सरकार 15 साल पुराने आंकड़ों को आधार क्यों बना रही है?
1971 के संतुलन का अंत और उत्तर-दक्षिण विभाजन
1970 के दशक से भारत में लोकसभा सीटों का आवंटन 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर कर दिया गया था. इसका उद्देश्य उन राज्यों को दंडित होने से बचाना था जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय लक्ष्य को सफलतापूर्वक हासिल किया था.
प्रस्तावित विधेयक इस संतुलन को समाप्त करता है. आंकड़ों के अनुसार, 1971 से 2011 के बीच उत्तर भारत के राज्यों (जैसे राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार) की जनसंख्या में 150% से अधिक की वृद्धि हुई है, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों (जैसे केरल, तमिलनाडु) में यह वृद्धि 100% से काफी कम रही है. यदि परिसीमन जनसंख्या के आधार पर होता है, तो उत्तर भारतीय राज्यों की सीटों में भारी उछाल आएगा, जबकि दक्षिण भारत का राजनीतिक प्रतिनिधित्व तुलनात्मक रूप से काफी कम हो जाएगा. विपक्ष इसे दक्षिण भारत को उत्तर का “राजनीतिक उपनिवेश” बनाने की रणनीति करार दे रहा है.
वित्तीय और संघीय चुनौतियां
संसदीय प्रतिनिधित्व के अलावा, इस बदलाव के गहरे वित्तीय निहितार्थ भी हैं. भारत में केंद्रीय करों का बंटवारा काफी हद तक जनसंख्या के आधार पर होता है. यदि जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व बढ़ता है, तो विकास के संसाधनों का बड़ा हिस्सा उत्तर भारत की ओर मुड़ जाएगा.
वर्तमान आंकड़े बताते हैं कि दक्षिणी राज्य और महाराष्ट्र केंद्रीय कोष में सबसे अधिक योगदान देते हैं, लेकिन बदले में उन्हें बहुत कम मिलता है. उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र को प्रत्येक 1 रुपये के योगदान पर मात्र 0.08 रुपये और केरल को 0.62 रुपये वापस मिलते हैं. परिसीमन के बाद यह असंतुलन और गहराने की आशंका है, जो पहले से ही तनावपूर्ण केंद्र-राज्य संबंधों को और बिगाड़ सकता है.
संक्षेप में, ये विधेयक भारतीय लोकतंत्र के सामने एक नई चुनौती पेश करते हैं. जहाँ एक ओर महिला आरक्षण का स्वागत हो रहा है, वहीं दूसरी ओर परिसीमन की प्रक्रिया राज्यों के बीच शक्ति संतुलन को हिला सकती है. “एक व्यक्ति, एक वोट” के लोकतांत्रिक सिद्धांत और “राज्यों के संघ” के रूप में भारत की संघीय भावना के बीच संतुलन बनाए रखना इस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है. बिना व्यापक राजनीतिक सहमति और पारदर्शी चर्चा के इन बदलावों को लागू करना देश की एकता और संघीय ढांचे के लिए दीर्घकालिक संकट पैदा कर सकता है.
क्या उत्तर और दक्षिण भारत की आर्थिक खाई देश की अखंडता के लिए खतरा है?
“भारत और चीन के बीच आज केवल एक ही चीज़ में मुकाबला है—जनसंख्या. बाकी हर आर्थिक पैमाने पर चीन हमसे कोसों आगे है. ठीक यही स्थिति आज उत्तर और दक्षिण भारत के बीच पैदा हो गई है.” यह गंभीर चेतावनी प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और भारत सरकार के पूर्व आर्थिक सलाहकार डॉ. रथिन राय ने हरकरा डीपडाइव में दी है. डॉ. रथिन राय की यह बातचीत हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम एक राष्ट्र के तौर पर एकजुट होकर इस आर्थिक खाई को पाट पाएंगे, या यह अंतर हमारे भविष्य की बुनियाद हिला देगा. निधीश त्यागी के साथ इस विस्तृत बातचीत में डॉ. राय ने भारत के भीतर पनप रहे ‘दो भारत’ की तस्वीर पेश की, जहाँ विकास के आंकड़े केवल वित्तीय अंतर नहीं, बल्कि एक ‘एग्जिस्टेंशियल डेंजर’ (अस्तित्व का खतरा) की ओर इशारा कर रहे हैं.
डॉ. राय इस पूरे अंतर को “सेम सेम बट डिफरेंट” के फ्रेम में देखते हैं. उनका तर्क है कि सामाजिक बुराइयों के मामले में उत्तर और दक्षिण भारत एक जैसे हैं. चाहे वह जातिवाद हो, स्त्रियों के प्रति नफरत हो या राजनीति और फिल्मों में हावी ‘वंशवाद’—दक्षिण भी इन्हीं कुरीतियों से जूझ रहा है.
लेकिन आर्थिक मोर्चे पर ये दोनों बिल्कुल अलग हैं. जहाँ दक्षिण के राज्य (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक) प्रति व्यक्ति आय और मानव विकास में इंडोनेशिया, रोमानिया और हंगरी जैसे देशों को टक्कर दे रहे हैं, वहीं उत्तर प्रदेश और बिहार की स्थिति नेपाल, बांग्लादेश और यहाँ तक कि सहारा अफ्रीका के देशों (जैसे बुर्किना फासो और चाड) से भी बदतर है. केरल जैसे राज्य स्वास्थ्य के मामले में अमेरिका तक को पीछे छोड़ रहे हैं.
इस चर्चा का सबसे ज्वलंत मुद्दा ‘राजनीतिक और आर्थिक असंतुलन’ रहा. डॉ. राय ने बताया कि भारत के गणतंत्र में ‘जनसंख्या’ ही राजनीतिक ताकत है.
चिंता का विषय: अगर भविष्य में लोकसभा सीटों का आवंटन जनसंख्या के आधार पर हुआ, तो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य संसद में स्थायी बहुमत हासिल कर लेंगे.
खतरा: दक्षिण के राज्य, जो देश की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा योगदान दे रहे हैं, महसूस करेंगे कि निर्णय लेने की शक्ति उनके पास नहीं है. डॉ. राय ने चेतावनी दी कि दुनिया में यूगोस्लाविया और सोवियत संघ जैसे देश इसी तरह के आर्थिक और राजनीतिक असंतुलन के कारण टूट गए थे.
डॉ. राय ने एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सवाल उठाया—आखिर उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर (मोदीनगर, कानपुर, मुरादाबाद, इलाहाबाद) खंडहर में कैसे बदल गए? 1960 के दशक में यूपी का औद्योगिक हिस्सा तमिलनाडु के बराबर था. उन्होंने सवाल किया कि ₹3500 की ब्रांडेड शर्ट तो भारत में बनती है, लेकिन आम आदमी के लिए ₹300 की शर्ट वियतनाम और बांग्लादेश से क्यों आयात करनी पड़ती है? उन्होंने “जहाँ घर, वहीं नौकरी” का नारा देते हुए उत्तर भारत में टेक्सटाइल जैसे श्रम-प्रधान उद्योगों को फिर से जीवित करने की वकालत की.
देश के 30 साल से कम उम्र के युवाओं को संबोधित करते हुए डॉ. राय ने कहा कि अब केवल ‘मेहनत और पढ़ाई’ से समृद्धि नहीं आएगी. उन्होंने युवाओं से अपनी सामाजिक विरासत—जातिवाद और स्त्री-विरोध—को त्यागने की अपील की. उन्होंने कहा, “राजनीति हमेशा समाज के पीछे चलती है. अगर आप समाज बदलेंगे, तो राजनीति खुद-ब-खुद बदल जाएगी.”
उन्होंने युवाओं को ‘अफीम की धुंध’ (धर्म और जाति का उन्माद) से बाहर निकलकर अपने हक की समृद्धि के लिए एकजुट होने की सलाह दी.
परिसीमन पर नई सियासत: दक्षिण बनाम केंद्र टकराव तेज, महिलाओं के आरक्षण के पीछे छिपा बड़ा खेल?
टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश के लाइव शो में हमने समझा कि आखिर परिसीमन को लेकर दक्षिण के राज्यों में इतनी नाराज़गी क्यों बढ़ रही है, और इसी मुद्दे पर पत्रकार राजेश चतुर्वेदी से विस्तार से बातचीत की. इस बातचीत में राजेश चतुर्वेदी ने बताया कि सरकार जिस तरह अचानक विशेष सत्र बुलाकर महिलाओं के आरक्षण के नाम पर बिल ला रही है, उसके पीछे असली मकसद परिसीमन प्रक्रिया को जल्दी लागू करना हो सकता है. विपक्ष और खासकर दक्षिण भारत के राज्यों ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई है.
चर्चा में बताया गया कि 2023 में संविधान संशोधन के तहत यह तय हुआ था कि पहले 2026 के बाद जनगणना होगी और उसके बाद ही परिसीमन लागू किया जाएगा. लेकिन अब बिना जनगणना के ही इसे आगे बढ़ाने की कोशिश पर सवाल उठ रहे हैं. दक्षिणी राज्यों का कहना है कि यह कदम उन्हें राजनीतिक रूप से कमजोर करने की दिशा में है.
राजेश चतुर्वेदी ने कहा कि अगर सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 के आसपास की जाती है, तो इसका सबसे ज्यादा फायदा उत्तर भारत के राज्यों, जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान, को मिलेगा. उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर लगभग 120 हो सकती हैं, जबकि तमिलनाडु की सीटें 39 से सिर्फ 59 तक ही बढ़ेंगी. इससे दोनों के बीच का अंतर और बढ़ जाएगा.
दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि वे देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देते हैं और जनसंख्या नियंत्रण में भी सफल रहे हैं, लेकिन परिसीमन के जरिए उन्हें “सजा” दी जा रही है. उनका यह भी कहना है कि वे देश के कुल टैक्स का बड़ा हिस्सा देते हैं, लेकिन राजनीतिक ताकत उत्तर भारत में केंद्रित होती जा रही है. इससे आर्थिक और राजनीतिक संतुलन और बिगड़ सकता है.
चर्चा में यह भी सामने आया कि सरकार महिलाओं के आरक्षण को आगे कर रही है, जबकि यह आरक्षण पहले भी लागू किया जा सकता था. साथ ही, पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान यह विशेष सत्र बुलाने पर भी सवाल उठे कि क्या इसका राजनीतिक फायदा लेने की कोशिश हो रही है. कुल मिलाकर, यह बहस सिर्फ परिसीमन तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के संघीय ढांचे, लोकतंत्र और राजनीतिक संतुलन पर भी बड़े सवाल खड़े करती है.
‘आप’ सांसद अशोक मित्तल पर ईडी का शिकंजा, राघव चड्ढा की जगह उप नेता बनते ही रडार पर आए चांसलर!
प्रवर्तन निदेशालय ने बुधवार को आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सांसद अशोक मित्तल के आवास और उनसे जुड़े पंजाब व हरियाणा के कई ठिकानों पर छापेमारी की. यह कार्रवाई विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम के कथित उल्लंघन से जुड़ी जांच के तहत की गई है.
स्क्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, अशोक मित्तल लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के संस्थापक और चांसलर हैं. ईडी की टीमों ने पंजाब के फगवाड़ा स्थित एलपीयू कैंपस के अलावा गुरुग्राम स्थित ‘टेट्रा कॉलेज ऑफ बिजनेस’ और ‘मास्टर्स यूनियन कॉलेज ऑफ बिजनेस’ में भी तलाशी ली. इसके साथ ही ‘लवली ग्रुप’ से जुड़ी अन्य संस्थाओं जैसे लवली ऑटो, लवली स्वीट्स और लवली डिस्टेंस एजुकेशन सेंटर पर भी छापे मारे गए. सांसद के भाइयों, रमेश और नरेश मित्तल के परिसरों को भी इस जांच के दायरे में लिया गया है.
यह छापेमारी अशोक मित्तल को राज्यसभा में राघव चड्ढा की जगह पार्टी का उप-नेता बनाए जाने के महज दो सप्ताह बाद हुई है. आम आदमी पार्टी ने इस कार्रवाई को “विशुद्ध रूप से राजनीतिक” करार दिया है.
आप संयोजक अरविंद केजरीवाल ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगले साल होने वाले पंजाब चुनावों की तैयारियां शुरू कर दी हैं, लेकिन पंजाब की जनता इसका मुंहतोड़ जवाब देगी.
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इसे “विशिष्ट मोदी शैली” बताते हुए आरोप लगाया कि भाजपा चुनावों से पहले विपक्ष को डराने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल कर रही है.
महाराष्ट्र में अब टैक्सी और रिक्शा चालकों के लिए मराठी भाषा अनिवार्य
स्क्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के परिवहन क्षेत्र में बदलाव करते हुए 1 मई (महाराष्ट्र दिवस) से सभी टैक्सी और ऑटोरिक्शा चालकों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य करने का फैसला किया है. परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के अनुसार, जो चालक इस नियम का पालन नहीं करेंगे या बुनियादी मराठी परीक्षा पास करने में विफल रहेंगे, उनका लाइसेंस रद्द किया जा सकता है.
सरकार केवल नियम लागू नहीं कर रही, बल्कि इसके लिए राज्यव्यापी निरीक्षण अभियान भी चलाया जाएगा. चालकों की दक्षता जाँचने के लिए एक बुनियादी टेस्ट लिया जाएगा, जिसमें मराठी में साइनबोर्ड और दस्तावेज़ पढ़ना, साधारण वाक्य लिखना एवं यात्रियों के साथ मराठी में बातचीत करने जैसे टेस्ट से गुजरना होगा.
मंत्री सरनाईक ने कहा कि स्थानीय भाषा के नियम पहले से मौजूद थे, लेकिन उनका सख्ती से पालन नहीं हो रहा था. मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन, छत्रपति संभाजी नगर और नागपुर जैसे क्षेत्रों से लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि चालक यात्रियों से मराठी में संवाद करने में असमर्थ या अनिच्छुक हैं.
शिवसेना नेता ने जोर देते हुए कहा कि जिस क्षेत्र में आप व्यवसाय करते हैं, वहां की भाषा सीखना हर किसी का कर्तव्य है. उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि उन परिवहन अधिकारियों पर भी कार्रवाई होगी जो नियमों का उल्लंघन कर लाइसेंस जारी करेंगे.
ओडिशा: सरकारी स्कूल में दूषित भोजन से छात्रा की मौत, 100 से अधिक बच्चे बीमार
ओडिशा के मयूरभंज जिले के सरकारी आदिवासी आवासीय विद्यालय (काकाबंद्धा आश्रम स्कूल) में दूषित भोजन खाने से 5वीं कक्षा की एक छात्रा की मौत हो गई और 100 से अधिक छात्र बीमार पड़ गए.
स्क्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, रासगोविंदपुर ब्लॉक स्थित इस स्कूल के छात्रों ने रविवार को भोजन किया था, जिसमें ‘पखला भात’ (किण्वित चावल), मसले हुए आलू और आम की चटनी परोसी गई थी.अधिकारियों का दावा है कि ये व्यंजन स्कूल के अधिकृत मेनू में शामिल नहीं थे. भोजन के बाद छात्रों ने बेचैनी की शिकायत की. हालत बिगड़ने पर 100 से अधिक बच्चों को स्वास्थ्य केंद्रों में भर्ती कराया गया, जिनमें से 67 की गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्हें बारीपदा के अस्पताल में स्थानांतरित किया गया.
आईसीयू में भर्ती छात्रा रूपाली बेसरा ने मंगलवार को इलाज के दौरान दम तोड़ दिया. मयूरभंज के जिला कलेक्टर हेमा कांता साय ने बताया कि रूपाली की मां की शिकायत पर पुलिस केस दर्ज कर लिया गया है. इस लापरवाही के लिए स्कूल के मुख्य शिक्षक जयंत कुमार पाणिग्रही को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है.
मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने घटना पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए पीड़ित परिवार को 3 लाख रुपये के मुआवजे की घोषणा की है. वहीं, स्थानीय प्रशासन ने कुल 7 लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने की बात कही है.
मंगलवार को मृत छात्रा के अंतिम संस्कार के दौरान स्थिति तनावपूर्ण हो गई. न्याय और अधिक मुआवजे की मांग को लेकर स्थानीय लोगों की पुलिस के साथ झड़प हुई. प्रदर्शनकारियों ने शव ले जा रहे पुलिस वाहन पर पटाखे फेंके और रास्ता रोकने की कोशिश की, जिसके बाद स्थिति पर काबू पाने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा.
रोहिंग्या शरणार्थियों को ले जा रही नाव अंडमान सागर में डूबी, 250 लापता
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक़, मलेशिया जा रही एक नाव के अंडमान सागर में डूबने से कम से कम 250 लोग लापता हो गए. इनमें रोहिंग्या शरणार्थी और बांग्लादेशी नागरिक शामिल हैं. संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों यूएनएचसीआर और इंटरनेशनल आर्गेनाइजेशन फॉर माइग्रेशन ने बताया कि यह नाव बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार ज़िले के टेकनाफ से रवाना हुई थी.
नाव के डूबने का समय और बचाव अभियान की स्थिति 15 अप्रैल तक स्पष्ट नहीं थी. एजेंसियों के अनुसार नाव में ज़्यादा भीड़, तेज़ हवाएं और ख़राब समुद्री हालात के कारण यह हादसा हुआ है. संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों ने कहा कि यह घटना दिखाती है कि शरणार्थी शिविरों में शिक्षा और रोज़गार के सीमित अवसर, कम मानवीय सहायता और म्यांमार के रखाइन राज्य में जारी हिंसा के कारण रोहिंगया सुरक्षित वापसी नहीं कर पा रहे हैं.
आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण पर मज़ाक़ करना भारी पड़ा, कॉमेडियन गिरफ्तार
द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक़, स्टैंड-अप कॉमेडियन अनुदीप कटिकला को आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण के ख़िलाफ़ एक वीडियो में आपत्तिजनक बातें करने पर हिरासत में ले लिया गया है. उन्हें पुलिस प्रयागराज से गिरफ्तार कर काकीनाडा ले जा रही है, उनके वकील के अनुसार यह यह गिरफ्ताररी नहीं बल्कि उन्हें हिरासत में लिया गया है.
कॉमेडियन के खिलाफ यह शिकायत पवन कल्याण की पार्टी जन सेना पार्टी के कार्यकर्ता ने की है. शिकायत के मुताबिक़ एक यूट्यूब वीडियो में पवन और उनके परिवार के बारे में आपत्तिजनक, व्यंग्यात्मक और अश्लील बातें कही गई हैं, जिनसे उनकी छवि को नुकसान पहुंचा है. कतिकाला सिली साउथ कॉमेडी क्लब के संस्थापक हैं, ने हाल ही में “द हॉलीवुड रोस्ट शो” नाम से प्रदर्शन किया था. उन्होंने वायरल वीडियो में पवन कल्याण की शादियों पर मज़ाक़ किया था, हालाँकि बाद में उन्होंने माफ़ी भी मांगी थी.
पश्चिम एशिया संघर्ष का वैश्विक असर: 3.25 करोड़ लोग गरीबी में जा सकते हैं
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के मुताबिक़ पश्चिम एशिया में जारी जंग 162 देशों के 30 मिलियन से ज़्यादा लोगों को गऱीबी की तरफ़ धकेल सकती है. मकतूब मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ यूएनडीपी ने चेतावनी दी है कि जैसे जैसे यह जंग आगे बढ़ रही है, इससे ऊर्जा संकट, खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी और आर्थिक गिरावट हो सकती है और यह 3.25 लोगों को गरीबी रेखा तक पहुँचाने का कारण बन सकता है.
यूएनडीपी के अनुसार, संघर्ष के पहले महीने में ही ईरान ने मानव विकास के लगभग डेढ़ साल की प्रगति खो दी है. अब यह संकट छठे हफ्ते में है और अस्थायी युद्धविराम के बावजूद लंबे समय तक असर डाल सकता है.
गल्फ देशों समेत एशिया, अफ्रीका और छोटे द्वीपीय देशों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ने की आशंका है. अरब देशों में जीडीपी में 3.7% से 6% तक गिरावट हो सकती है, जो 120 से 194 अरब डॉलर के नुकसान के बराबर है.
एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 14 देशों में करीब 88 लाख लोग गरीबी में जा सकते हैं, जिनमें 50 लाख से ज्यादा ईरान में हैं. भारत में भी करीब 25 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे जा सकते हैं.
बिहार में नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों में तेज़ बढ़ोतरी
आउटलुक के लिए मोहम्मद असग़र खान की रिपोर्ट के मुताबिक़, बिहार में पिछले तीन महीनों में यौन हिंसा के एक दर्जन से अधिक मामले सामने आए हैं, जिनमे अधिकतर पीड़ित नाबालिग लड़कियां हैं, कई की उम्र पांच साल से भी कम हैं. इसी महीने के 3 अप्रैल को पटना के पास परसा में तीन साल की बच्ची से कथित गैंगरेप का मामला सामने आया. पुलिस ने दो आरोपियों को भी गिरफ्तार किया है, जिनमे बच्ची का चाचा भी शामिल है. फिर 6 अप्रैल को जहानाबाद में एक पांच साल की बच्ची के साथ स्कूल हॉस्टल में दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या कर दी गई.
इसके अलावा जनवरी से अप्रैल के दरमियान ऐसे कई गंभीर घटनाएं सामने आई हैं. , पटना में नीट की छात्रा के साथ दुष्कर्म के बाद मौत, पूर्णिया में चलती कार में गैंगरेप, बक्सर में 15 साल की लड़की का अपहरण कर गैंगरेप, सारण में छात्रा को कुएं में फेंकना, पटना में. महिला के साथ होटल और ऑटो में गैंगरेप जैसे मामले शामिल हैं.
हालांकि पुलिस के अनुसार 2025 में , 2,025 रपे केस दर्ज हुआ हुए, जो 2024 के मुक़ाबले 8.2% कम हैं, लेकिन सामाजिक संगठनों का कहना है कि नाबालिग़ों के ख़िलाफ़ अपराध बढ़ रहे हैं. एनआरसीबी के आंकड़ों के अनुसार 2022 -23 में बच्चोँ के ख़िलाफ़ अपराधों में 9.2 % बढ़ोतरी हुई है.
विशेषज्ञों के अनुसार, नशे का बढ़ता उपयोग इन अपराधों का बड़ा कारण है. 2016 में शराबबंदी के बाद बिहार में ड्रग्स का अवैध कारोबार तेजी से बढ़ा है. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कई मामलों में पीड़ित दलित और पिछड़े समुदाय से होते हैं. बिहार में एससी समुदाय के खिलाफ अपराधों के मामले में राज्य देश में चौथे स्थान पर है. दोषसिद्धि दर केवल 7–10% है और 90% से ज्यादा मामले अदालतों में लंबित हैं. कानूनी प्रक्रिया में भी गंभीर कमियां सामने आई हैं, 91% मामलों में जांच अधिकारी अदालत में गवाही देने नहीं पहुंचे और कई मामलों में मेडिकल रिपोर्ट तक नहीं मिली. इससे आरोपी आसानी से छूट जाते हैं.
केन-बेतवा परियोजना के खिलाफ ‘चिता आंदोलन’ तेज, जमीन और मुआवजे को लेकर किसान-आदिवासी अड़े
आलिमा और रचना की खबर लहरिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ , केन-बेतवा लिंक परियोजना और बांध के कारण जमीन जाने के विरोध में किसानों और आदिवासियों का आंदोलन अब बड़ा रूप ले चुका है, जिसे उन्होंने “चिता आंदोलन” नाम दिया है.
यह आंदोलन 23 मार्च 2026 को पन्ना से शुरू हुई पदयात्रा से शुरू हुआ, जो छतरपुर के गांवों तक पहुंचा. 28 मार्च को प्रदर्शनकारियों ने अपने खून से पत्र लिखकर प्रधानमंत्री मोदी तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश की. इसके बाद 5 अप्रैल को पन्ना से दिल्ली के जंतर-मंतर तक यात्रा निकाली गई, लेकिन प्रशासन ने रास्ते में ही हजारों प्रदर्शनकारियों को रोक दिया.
ग्रामीणों का आरोप है कि इस दौरान उनके साथ सख्ती की गई और राशन-पानी तक छीन लिया गया. दिल्ली नहीं पहुंच पाने के बाद प्रदर्शनकारी पन्ना नेशनल पार्क के कोर इलाके में बने बांध स्थल पर पहुंच गए और वहीं धरना शुरू कर दिया, जिससे परियोजना का काम रुक गया. हजारों लोग जमीन पर चिता बनाकर उस पर लेटकर तेज धूप में विरोध कर रहे हैं.
इस परियोजना से पन्ना और छतरपुर के करीब 24 गांवों के लगभग 6,628 परिवार प्रभावित हो रहे हैं और करीब 9,000 हेक्टेयर जमीन डूब क्षेत्र में आएगी, जिसमें पन्ना टाइगर रिजर्व का हिस्सा भी शामिल है. इस विरोध में शामिल छतरपुर की कल्लू बाई का कहना है कि उनके पास 7 एकड़ जमीन है लेकिन पूरा मुआवजा नहीं मिल रहा है. उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने उन्हें बच्चों के साथ रोका, लाठीचार्ज किया और खाना तक खराब कर दिया. उनका कहना है कि करीब 5 लाख रुपये का मुआवजा पर्याप्त नहीं है.
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि प्रशासन गाड़ियों की चाबियां छीन लेता है, राशन खराब करता है और मीडिया को भी रोकता है। आंदोलन स्थल पर लोग नमक-रोटी खाकर गुजारा कर रहे हैं और कई बीमार हो चुके हैं. सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने आरोप लगाया कि परियोजना में ग्राम सभाओं की प्रक्रिया ठीक से नहीं हुई और कई जगह फर्जी बैठकें कराई गईं. उन्होंने कहा कि अगर 10% प्रक्रिया भी सही साबित हो जाए तो वे आंदोलन खत्म कर देंगे. वहीं छतरपुर कलेक्टर पार्थ जायसवाल ने कहा कि जिन किसानों को मुआवजा नहीं मिला है, उनके लिए टीम बनाई जाएगी और प्रक्रिया पूरी की जाए.
| टिप्पणी : राकेश कायस्थ
बिहार के हाफिटडिफीट वाले नये गारजीवन
प्राचीन आर्यावर्त की राजनीति में शकुनि का अनुपम स्थान था. महाभारत में उलूक नामक शकुनि पुत्र का भी उल्लेख मिलता है, जो कौरवों के दूत बनकर पांडव शिविर में उन्हें युद्ध से ठीक पहले उन्हें हड़काने गये थे. लेकिन कृष्ण ने शिशुपाल एक्ट के तहत उनपर कोई कार्रवाई नहीं की और सकुशल वापस जाने दिया. महाभारत के युद्ध में शकुनि वीरगति को प्राप्त हुए थे और शकुनि नंदन ‘उलूक’ कथा से उसी तरह गायब हो गये जैसे शोले खत्म हो जाने पर किसी ने ध्यान नहीं दिया कि गब्बर के जाने के बाद अनाथ हुए टोली वालों का क्या हुआ होगा।.
आधुनिक पाटलिपुत्र में भी एक शकुनि हुए—शकुनि चौधरी. बिहार की सवर्ण वर्चस्वादी राजनीति को ब्राहण-भूमिहारों आदि ने 1990 में यह कहते हुए लठिया कर भगा दिया था कि सब त ठिक्के है, बाकी मजा जरा कम आ रहा है, काहे कि मियवां सब ठीक से पिट नहीं रहा है. सीएम डीएम तो हमलोग आगे भी बनबे करेंगे, लाइफ में किक ई अडवनिये देगा. तो बिहार में सत्ता परिवर्तन हो गया लेकिन बदकिस्मती से कुर्सी बीजेपी नहीं बल्कि लालूजी के पास आ गई.
आधुनिक शकुनि इसी लालू दरबार की शोभा बढ़ाया करते थे. आधुनिक शकुनि नंदन का नाम उलूक नहीं अपितु राकेश कुमार था. एक दिन मुंगेर में राजनीति महाभारत मचा. दूत बने शकुनि पुत्र भी वहां दल-बल के साथ पहुंचे लेकिन इतने में गोली,कट्टा चक्कू और बम सबके के सब उसी तरह चलने लगे जैसे मिथिला के भोज में तरह तरह के पकवान बारी-बारी से चलते हैं और मना करने वाले हर आदमी को दोगुना परोसा जाता है.
खा-पीकर कुल सात आदमी खर्च हुए. राजनीति के भोज भात में त ई सब होइबे करता है लेकिन कुछ दुष्टों ने इल्जाम कई लोगों के साथ फूल सरीखे मासूम शकुनि नंदन राकेश कुमार पर मढ़ दिया. एफआईआर कटा और जेल के मेस में तुरंत नाम दर्ज हो गया. बाप बेचारे मूर्छित हो रहे थे. लेकिन जिसका नाम ही शकुनि हो क्या उसकी मदद आंखों गांधरी की तरह आंखों पर पट्टी बांधने वाली न्याय की देवी नहीं करेंगी, उ त बहिने ना हुईं जी.
तो शकुनि बाबू ने कानून के रास्ते हाफिटडिफीट बनवाकर यह साबित कर दिया कि उनका बालक तो अभी मात्र 14 साल का है. वह हत्या आदि के जघन्य कामों में कैसे लिप्त हो सकता है. मान लीजिये अगर किसी ने फुसलाकर ये सब करवा ही दिया तो फिर कानून के तहत बाल सुधार गृह भेजिये. और इस तरह 14 साल के हाफिटडिफीट धारी राकेश कुमार जेल से बाल सुधार गृह पहुंच गये.
बाद में हरिकृपा से दूध का दूध पानी का पानी हो गया, न्यायालय ने राकेश कुमार को बाइज्जत बरी कर दिया और सत्यनारायण भगवान ने सबकुछ ब्याज समेत वापस कर दिया. राकेश कुमार राबड़ी देवी सरकार में सीधे कैबिनेट मंत्री बन गये. उस समय बिहार के गवर्नर जिन्हें आरजेडी वाले गोबर नर कहते थे, बीजेपी के एक बड़े नेता हुआ करते थे. उन्होंने कहा—ऐ जी तुम जो हाफिटडिफीट दिये हो, उसके हिसाब से तो अभी लइका हो, मने एकदम्मे नाबालिग हो, उतरो कुर्सी से.
राबड़ी देवी मना करती रहीं लेकिन गर्वनर साहब ने मनमाने तरीके नाप-तौल विभाग के कैबिनेट मंत्री श्रीमान राकेश कुमार को बर्खास्त कर दिया लेकिन भगवान सब देखता है. नर होत नाही हाफिटडिफीट होत बलवान. तो नये हाफिटडिफीट के आधार पर शकुनि पुत्र राकेश कुमार से सम्राट चौधरी बन गये, आरजेडी और जेडीयू से होते हुए उस पुण्य सलिला के तीर पर जाकर तपस्या करने लगे, जिसे कलजुग की भासा में बीजेपी कहते हैं. कलुजग में पाप और बढ़ा, मोदीजी का मनुज अवतार हुआ और जिस बीजेपी ने शकुनि पुत्र को अपमानित करके कुर्सी से उतारा था, उसे बिहार का चक्रवर्ती सम्राट बना दिया.
अब जरा तनिक सोचिये कि अगर भारत में मोदी युग नहीं आया होता क्या राकेश कुमार उर्फ सम्राट चौधरी के साथ न्याय हो पाता? हास्य-व्यंग्य के रचनाकार संपत सरल ने लिखा है “ यह जानना सुखद है कि हमारे प्रधानमंत्री सिर्फ एमए ही नहीं बल्कि बीए भी हैं. उनका बीए होना आश्वस्त करता है कि उन्होंने मैट्रिक भी जरूर किया होगा.”
सम्राट चौधरी पर इल्जाम लगता है कि दसवीं फेल हैं लेकिन कानून की देवी जिसकी सगी बुआ हो उसे ऐसे सवालों से क्या घबराना! कहते हैं कि उन्होंने हाफिटडिफीट देकर बताया है कि वो एक जाने-माने विश्वविद्यालय से पीएचडी हैं. इस नाचीज ने एक वीडियो शेयर किया है जिसमें एक टीवी पत्रकार सम्राट चौधरी से पूछ रही है कि आपने दसवीं किस साल पास की थी. जवाब में सम्राट चौधरी कह रहे हैं कि जब हाफिटडिफीट देके सब बताइये दिये हैं तो इहां पब्लिक में दोबारा काहे ला पूछ पूछ रही हैं, हाफिटडिफीट पढ़िये, हम अपने मुँह से नही बताएंगे.
2025 के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रशांत किशोर ने सम्राट चौधरी को यह कहते हुए घेरा कि ऐ जी महराज चुनाव वाले हाफिटडिफीट के हिसाब से अभी आपकी उमर 52 साल है, तो मुंगेर मर्डर कांड के बाद 14 साल कैसे हो गये थे? उस समय तो आप 26 साल के थे. आप पर फिर से मुकदमा चलना चाहिए. प्रशांत किशोर जी बड़े-बड़े कालेज में गये लेकिन उनको नालेज नहीं है कि सम्राट चौधरी शकुनि पुत्र हैं, आंखों में पट्टी बांधने वाली कानून की देवी के सगे भतीजे.
इस कथा का सुखद समापन यह है कि अब डबल नहीं ट्रिपल इंजन है. दुनिया में ट्रंप है, भारत में मोदीजी हैं और बिहार में हाफिटडिफीट धारी सम्राट चौधरी हैं. दुनिया आगे बढ़ेगी और अभी झूठ लग रहा लेकिन भारत 2047 तक सचमुच विकसित हो जाएगा. तब तक प्रदेश को स्वर्ग और प्रदेशवासियों को सशरीर स्वर्गवासी बनाने के लिए योगीजी, हिमंता जी और सम्राट जी में जबरदस्त कंपीटिशन चलता रहेगा.
पुनश्च: हाफिटडिफीट बिहारी हिंदी का वैसा ही शब्द है, जैसा गार्जियन नहीं हमारे यहां गारजीवन है. इसलिए यहाँ आकर कोई ज्ञान ना दे कि अंग्रेजी का मूल शब्द तो एफिडेविट है. बिहार के नये गारजीवन के सामने हमारी संस्कृति का मजाक उड़ाइयेगा तो समझ जाइये! भाग के कहीं नहीं जा पाइयेगा काहे कि जे है सेकी बगलवा में जोगी बाबा की एनकाउंटर मंडली ना बइठल है जी. संक्षेप में इस कथा से शिक्षा यह मिलती है कि भगवान सब देखता है और अच्छे आदमी को सही जगह जरूर पहुंचाता है.
मन में एक ठो अउर बात है, हम सोच रहे हैं कि सम्राट नाम मेरे नाम राशि वालों को बहुत फलता है. हम भी एक ठो हाफिटडिफीट देके नमवा बदलवा ले का जी?
हंगरी चुनाव में 16 साल की सत्ता का अंत: लोकतंत्र की वापसी और उससे मिलने वाले सबक
हरकारा डीप डाइव में हमने प्रोफेसर अपूर्वानंद के साथ हंगरी में हुए हालिया चुनाव पर विस्तार से बात की. 12 अप्रैल को हुए संसदीय चुनाव में 16 साल से सत्ता में रहे दक्षिणपंथी नेता विक्टर ओरबान को बड़ी हार का सामना करना पड़ा और पीटर माग्यार की तिसजा पार्टी ने 199 में से 138 सीटें जीतकर 53% से ज्यादा वोट हासिल किए, जबकि ओरबान की फिड्स पार्टी सिर्फ 37% पर सिमट गई. यह चुनाव इसलिए भी अहम रहा क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सहयोगियों जेडी वेंस और रूबियो को ओरबान के समर्थन में भेजा था, फिर भी उनकी हार हुई.
चर्चा में यह भी सामने आया कि ओरबान का शासन पिछले 16 सालों में एक तरह की निरंकुश व्यवस्था में बदल गया था, जहां न्यायपालिका, मीडिया और अधिकारों पर नियंत्रण बढ़ गया था. उन्हें ट्रंप और पुतिन दोनों का करीबी माना जाता था और यूरोपियन यूनियन में भी उनकी अलग लाइन थी. हालांकि इस बदलाव को लोकतंत्र की वापसी के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन प्रोफेसर अपूर्वानंद ने सावधानी बरतने की बात कही, क्योंकि नए नेता माग्यार भी उसी राजनीतिक धारा से आए हैं और उन्हें भी दो-तिहाई बहुमत मिला है, जिससे सत्ता के केंद्रीकरण का खतरा बना रहता है.
हमने इस चुनाव से मिलने वाली सीख पर भी बात की. यह सामने आया कि कोई भी तानाशाही या मजबूत दिखने वाला नेता अजेय नहीं होता. जनता का भरोसा टूटे तो सबसे ताकतवर शासन भी गिर सकता है. हंगरी में भी अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और युवाओं का समर्थन घटने जैसे कारणों से ओरबान की पकड़ कमजोर हुई. साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ कि सकारात्मक और वैकल्पिक राजनीति के जरिए, बिना नफरत के अभियान चलाकर भी जीत हासिल की जा सकती है.
भारत के संदर्भ में चर्चा करते हुए यह कहा गया कि मीडिया की भूमिका बेहद अहम है और अगर मीडिया कमजोर पड़े तो लोगों को खुद आगे आकर सवाल उठाने होंगे. भ्रष्टाचार, नीतिगत फैसले, विदेश नीति और छोटे-छोटे रोजमर्रा के मुद्दों, जैसे पेट्रोल, गैस, शिक्षा या मजदूरों के अधिकार, को भी मुद्दा बनाना जरूरी है. यह भी चेतावनी दी गई कि अगर किसी एक समुदाय के अधिकार छीने जाते हैं, तो धीरे-धीरे यह पूरे समाज को प्रभावित करता है.
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