14/08/2026: मणिपुर में हिंसा | आम-चावल-मसालों पर सवाल | पीएम की तरह कब बोलेंगे मोदी | शोम्पेन पर संकट | राहुल गांधी को राहत | जाति जनगणना | सुखबीर बादल पर हमला | सिकल सेल की मुश्किल | 90% रेलवे स्टेशन
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, विश्वजीत कुमार
आज़ादी के राष्ट्रीय पर्व की आप सबको बहुत बहुत बधाई. 15 अगस्त के अवसर पर ‘टीम हरकारा’ अवकाश पर होगी. आपको अगला अंक सोमवार 17 अगस्त को मिलेगा. बने रहें हमारे साथ.
आज की सुर्खियां
मणिपुर: हिंसक घटनाएँ और चर्च-मकानों में आगजनी, सुप्रीम कोर्ट ने कहा-“लड़ते-लड़ते थक गए होगे”
जापान आमों को वापस लौटा रहा, चीन की चावल पर रोक और यूरोपीय निरीक्षक मसालों पर सवाल उठा रहे हैं, क्यों?
अंडमान-निकोबार के मुख्य सचिव ने कहा था कि शोम्पेन जनजाति को ‘आधुनिक जीवनशैली अपनानी होगी’: जनजातीय परिषद का आरोप
सुप्रीम कोर्ट ने सावरकर पर टिप्पणी को लेकर राहुल गांधी के खिलाफ नफरती भाषण का मामला खारिज किया
रेलवे स्टेशनों पर यात्री सुविधाओं की बदहाली, 90% स्टेशनों में कमी और कई जगह दूषित पानी: कैग
जनगणना 2027 में जाति की गिनती, 40 सवालों में कोविड टीकाकरण से बैंक खातों तक
‘भगवान ने आदेश दिया’: सुखबीर बादल पर तलवार से हमला करने वाले निहंग का पुलिस को बयान
रक्त संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों तक दिव्यांगता सहायता अब भी क्यों नहीं पहुंच पाती
बिनु मैथ्यू | संसद में युवाओं का भरोसा जीतने के लिए विपक्ष को अपनानी चाहिए ये 11 रणनीतियां
राकेश कायस्थ | मैं 12 साल से कह रहा हूं, प्रधानमंत्री लाल किले से भारत के प्रधानमंत्री की तरह कब बोलेंगे?
मणिपुर: हिंसक घटनाएँ और चर्च-मकानों में आगजनी, सुप्रीम कोर्ट ने कहा-“लड़ते-लड़ते थक गए होंगे”
मणिपुर के हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे. बीते मंगलवार को कुकी आबादी वाले कांगपोकपी जिले के तोकपा नागा गांव में हथियारबंद लोगों ने गोलियां चलाईं, और इसके बाद उन्होंने लगभग दस घरों, एक चर्च और अन्य संपत्तियों को आग के हवाले कर दिया. ‘द प्रिंट’ में समृद्धि तिवारी याद दिलाती हैं कि कुछ दिन पहले ही एक कुकी समूह ने आरोप लगाया था कि हथियारबंद लोगों ने — जिन्हें उन्होंने नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (इसाक-मुइवा) से जुड़ा बताया था — कांगपोकपी के ही कैलेनजांग गांव में भी घरों को जला दिया था.
राष्ट्रीय राजमार्गों पर आर्थिक नाकाबंदी की स्थिति
मणिपुर की अन्य खबरों में, कुकी समूहों ने इंफाल और उखरुल के बीच चलने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 202 की अपनी दो सप्ताह पुरानी ‘काउंटर-इकोनॉमिक नाकाबंदी’ वापस ले ली है. उन्होंने यह फैसला सरकार द्वारा यह आश्वासन दिए जाने के बाद लिया कि नागा और मैतेई समूहों ने कुकी समुदाय को निशाना बनाने वाली सड़क नाकाबंदी खत्म करने का भरोसा दिया है.
हालाँकि, यूनाइटेड नागा काउंसिल (यूएनसी) राज्य को दो हिस्सों में बाँटने वाले अधिक रणनीतिक राष्ट्रीय राजमार्ग-2 को अवरुद्ध करना जारी रखे हुए है. उसने दोनों समुदायों के बीच बंधक संकट के दौरान कुकी समूहों द्वारा नागा ग्रामीणों के अपहरण के विरोध में यह कदम उठाया था. यूएनसी की ज़िद है कि पहले उसकी मांगें पूरी की जाएं, जिसमें 20 से अधिक कुकी उग्रवादी संगठनों के साथ सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस समझौते को रद्द करना शामिल है.
इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने आज शुक्रवार को कुकी और मैतेई समुदायों से कहा, “आप निश्चित रूप से लड़ते-लड़ते थक गए होंगे. अब शांति बहाल करने और सड़कों व राजमार्गों को सुचारू बनाने के बारे में सोचें.” दोनों समुदाय तीन साल से अधिक समय से जातीय हिंसा में उलझे हुए हैं.
पूर्वोत्तर में एक और आर्थिक नाकाबंदी जारी है: ऊपरी असम के धेमाजी में आदिवासी गोलीबारी की घटना के विरोध में अरुणाचल प्रदेश जाने वाली सड़कों को बंद कर रहे हैं. इस हफ्ते की शुरुआत में हुई गोलीबारी में 18 लोग घायल हो गए थे. यह घटना तब हुई जब असम के निवासियों का एक समूह गाँव की सीमा विवाद को सुलझाने के लिए अरुणाचल में दाखिल हुआ — उनका दावा है कि वे शांतिपूर्वक गए थे लेकिन उन पर गोलियां चलाई गईं. संबंधित क्षेत्र उन पाँच विवादित क्षेत्रों (जिसमें 52 गांव शामिल हैं) में से एक है, जहाँ इस तरह के सीमा विवाद बने हुए हैं.
जापान आमों को वापस लौटा रहा, चीन की चावल पर रोक और यूरोपीय निरीक्षक मसालों पर सवाल उठा रहे हैं, क्यों?
दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कृषि उत्पादक होने के बावजूद, वैश्विक कृषि-निर्यात में भारत की हिस्सेदारी केवल 2.4 प्रतिशत है. हाल के दिनों में जापान, चीन, हांगकांग और यूरोपीय संघ (ईयू) जैसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बाजारों ने भारतीय कृषि उत्पादों की गुणवत्ता, कीटनाशक अवशेषों और प्रमाणन प्रक्रियाओं पर सवाल उठाते हुए सख्त कदम उठाए हैं.
‘अलजज़ीरा’ में कामरान यूसुफ की रिपोर्ट है कि मार्च 2026 में लखनऊ स्थित ‘वेपर हीट ट्रीटमेंट’ (वीएचटी) सुविधा के निरीक्षण के बाद जापानी निरीक्षकों ने मानक प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए और 25 मार्च के बाद के सभी भारतीय आम शिपमेंट पर रोक लगा दी. लगभग दो दशकों में यह पहला बड़ा व्यवधान है, जिससे अल्फांसो और केसर सहित छह प्रमुख किस्में प्रभावित हुई हैं. यद्यपि जापान का बाजार मात्रा में छोटा है, लेकिन यह वैश्विक व्यापार में विश्वसनीयता का प्रतीक माना जाता है.
चीन के सीमा शुल्क विभाग (जीएसी) ने जीएमओ के अंश मिलने का दावा करते हुए तीन भारतीय चावल निर्यातकों के लाइसेंस रद्द कर दिए, जबकि निर्यातकों और भारत सरकार का कहना है कि भारतीय धान पूरी तरह जीएमओ-मुक्त है.
हांगकांग ने कीटनाशक अवशेषों के कारण भारतीय मसालों पर रोक लगाई, और यूरोपीय संघ ने भारतीय जीरे के निरीक्षण की आवृत्ति बढ़ाकर 30% कर दी.
किसान से लेकर व्यापारी और प्रोसेसर तक फैली लंबी श्रृंखला में कीटनाशकों के उपयोग और छिड़काव का सटीक रिकॉर्ड गायब हो जाता है. अधिकांश कड़े जीएमओ और प्रोटीन परीक्षण केंद्र केवल दिल्ली और हैदराबाद में केंद्रित हैं, जिससे दूर-दराज के किसानों को परेशानी होती है. थाईलैंड और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में भारत में फार्म-टू-शिपमेंट ट्रेसेबिलिटी और कोल्ड-चेन नेटवर्क कमजोर है.
भारत के 86% से अधिक किसान 2 हेक्टेयर से कम भूमि वाले हैं, जिससे बड़े पैमाने पर एक समान गुणवत्ता मानक लागू करना कठिन हो जाता है. रिपोर्ट कहती है कि प्रतिबंधों के कारण किसानों और निर्यातकों को भारी वित्तीय नुकसान, रद्द अनुबंधों और गिरते स्थानीय दामों का सामना करना पड़ रहा है. हालाँकि, भारत सरकार ने प्रयोगशालाओं का विस्तार करने, डिजिटल ट्रेसेबिलिटी शुरू करने और जोखिम-आधारित निरीक्षण कड़े करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को केवल “उत्पादन बढ़ाने” के बजाय “खेत से निर्यात तक गुणवत्ता साबित करने” की रणनीति पर ध्यान केंद्रित करना होगा.
हरकारा डीप डाइव
राकेश कायस्थ | मैं 12 साल से कह रहा हूं, प्रधानमंत्री लाल किले से भारत के प्रधानमंत्री की तरह कब बोलेंगे?
15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले से देश को संबोधित करेंगे. लेकिन इस बार सवाल सिर्फ यह नहीं है कि प्रधानमंत्री क्या बोलेंगे, बल्कि यह भी है कि किन मुद्दों पर चुप रहेंगे. हरकारा डीप डाइव में निधीश त्यागी ने लेखक और व्यंग्यकार राकेश कायस्थ के साथ इसी सवाल पर चर्चा की.
राकेश कायस्थ ने पिछले प्रधानमंत्रियों के स्वतंत्रता दिवस भाषणों को याद करते हुए कहा कि उनके भाषणों में देश के सामने मौजूद वास्तविक चुनौतियों और भविष्य की दिशा की स्पष्ट तस्वीर दिखाई देती थी. नरसिम्हा राव ने आर्थिक सुधारों की घोषणा की, देवेगौड़ा ने सामाजिक न्याय की बात की, गुजराल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान का संकल्प लिया, अटल बिहारी वाजपेयी ने “जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान” कहा और मनमोहन सिंह ने कहा, “हम वादे करने नहीं आए हैं वादे निभाने आए हैं.”
इसके बरक्स राकेश कायस्थ का सवाल है कि नरेंद्र मोदी के 12 वर्षों के भाषणों से ऐसी कौन सी बात याद रह गई जो देश की दिशा तय करती हो. उनका कहना था, “मैं इस हेडलाइन का इंतजार कर रहा हूं कि भारत के प्रधानमंत्री लाल किले से भारत के प्रधानमंत्री की तरह कब बोलेंगे? यह इंतजार मैं 12 साल से कर रहा हूं.”
इस बातचीत में शिक्षा, रोजगार, राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सद्भाव और विदेश नीति को उन बड़े सवालों के तौर पर रखा गया, जिन पर प्रधानमंत्री से जवाब की उम्मीद की जाती है. कायस्थ के मुताबिक प्रधानमंत्री के भाषणों से प्रेम, करुणा, भाईचारा और सहिष्णुता जैसे शब्द लगभग गायब हैं. उनका आरोप है कि राष्ट्रीय एकता की जगह विभाजनकारी राजनीति को ज्यादा जगह मिली है.
शिक्षा और युवाओं के सवाल पर जंतर-मंतर के प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई का संदर्भ आया. रोजगार के पुराने वादों और शिक्षा व्यवस्था की स्थिति पर सवाल उठाते हुए कायस्थ ने कहा कि प्रधानमंत्री को देश के युवाओं के भविष्य पर बात करनी चाहिए, लेकिन पिछले 12 वर्षों के अनुभव से उन्हें इसकी उम्मीद नहीं है.
विदेश नीति पर अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप के साथ भारत के रिश्तों का सवाल भी अहम रहा. वहीं राम मंदिर से जुड़े आरोप, किसानों के सवाल, अल्पसंख्यकों की स्थिति और संसद में सरकार की जवाबदेही को लेकर भी प्रधानमंत्री से स्पष्ट जवाब की अपेक्षा रखी गई.
राकेश कायस्थ ने कहा, “बिना कारण के दहाड़ सकते हैं मोदी जी, उनको कोई कारण नहीं चाहिए होता दहाड़ने का.” यानी इस बार भी भाषण में आक्रामक तेवर और राजनीतिक पलटवार की संभावना है, लेकिन असली सवाल यह होगा कि क्या उन मुद्दों पर जवाब मिलेगा जिनसे सरकार इस समय घिरी हुई है.
15 अगस्त का भाषण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रधानमंत्री को सिर्फ उपलब्धियां नहीं गिनानी हैं, बल्कि यह भी बताना है कि देश किस दिशा में जा रहा है. अगर रोजगार, शिक्षा, लोकतंत्र, सामाजिक एकता और विदेश नीति जैसे सवालों पर जवाब नहीं मिलता, तो सवाल यही रहेगा कि लाल किले से दिया गया भाषण देश की वास्तविक चिंताओं का जवाब था या एक बार फिर राजनीतिक दावों का झुनझुना.
अंडमान-निकोबार के मुख्य सचिव ने कहा था कि शोम्पेन जनजाति को ‘आधुनिक जीवनशैली अपनानी होगी’: जनजातीय परिषद का आरोप
ग्रेट और लिटिल निकोबार की जनजातीय परिषद ने अंडमान एवं निकोबार द्वीप प्रशासन पर ₹91,000 करोड़ की ‘ग्रेट निकोबार द्वीप’ (जीएनआई) विकास परियोजना के ज़रिए स्थानीय जनजातियों की जीवनशैली और अधिकारों को अनदेखा करने का गंभीर आरोप लगाया है. उनमें चिंता इस बात की है कि जब ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट स्थायी रूप से शुरू हो जाएगा, तब बाहरी दुनिया से अलग-थलग रहने वाले शोम्पेन आदिवासियों की जीवनशैली का क्या होगा?
अभिनय लक्ष्मण की रिपोर्ट है कि 300 से भी कम आबादी वाली ‘विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह’ (पीवीटीजी) शोम्पेन जनजाति की बस्तियों के पास बिजली संयंत्र प्रस्तावित है. परिषद का आरोप है कि तत्कालीन मुख्य सचिव चंद्र भूषण कुमार ने कहा था कि शोम्पेन अपनी पारंपरिक शिकारी-संग्राहक जीवनशैली जारी नहीं रख सकते और उन्हें “आधुनिक जीवनशैली अपनानी होगी”. यह बयान पर्यावरण मंत्रालय के उस पुराने वादे के विपरीत है, जिसमें किसी को विस्थापित न करने की बात कही गई थी.
16 जुलाई की बैठक में जनजातीय परिषद ने पैतृक गांवों में पुनर्वसन और वन्यजीव अभयारण्यों की अधिसूचना पर अपनी चिंताओं को उठाया था. हालांकि, प्रशासन के आधिकारिक निर्देशों में इन नए मुद्दों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया और केवल 2017 व 2019 की पुरानी मैपिंग का संदर्भ दिया गया.
परिषद के अनुसार अभयारण्य जनजातियों की बिना सहमति के अधिसूचित किए गए हैं. हालांकि प्रशासन ने शिकार के अधिकार बनाए रखने का आश्वासन दिया है, फिर भी विस्थापन और बुनियादी ढांचे से जुड़ी लंबे समय से लंबित मांगें अब भी अनसुलझी हैं.
याद दिला दें कि दुनिया भर के कुछ शिक्षाविदों ने चेतावनी दी है कि यह परियोजना शोम्पेन आदिवासियों के लिए “मृत्युदंड” के समान साबित हो सकती है. अमृत ढिल्लों ने इस बारे में विस्तार से लिखा था.
सावरकर पर टिप्पणी : सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी के खिलाफ नफरती भाषण का मामला खारिज किया
सुप्रीम कोर्ट ने 14 अगस्त, 2026 को लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ हिंदुत्व विचारक वी.डी. सावरकर पर दिए गए कथित नफरती भाषण (हेट स्पीच) के मामले को रद्द कर दिया. कोर्ट ने यह फैसला इसलिए सुनाया क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की वैधानिक अनुमति देने में विफल रही.
कृष्णदास राजगोपाल के मुताबिक, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 196 के अनुसार, राज्य के खिलाफ नफरत या वैमनस्य फैलाने जैसे मामलों में अदालत द्वारा संज्ञान लेने से पहले सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य है. पीठ की अध्यक्षता कर रहे जस्टिस दीपांकर दत्ता ने स्पष्ट किया कि बिना सरकारी अनुमति के कानूनन कोई मामला नहीं बनता. इसके बाद पीठ ने नृपेंद्र पांडे की शिकायत और लखनऊ मजिस्ट्रेट द्वारा जारी समन दोनों को रद्द करने का आदेश पारित किया.
लखनऊ के निवासी नृपेंद्र पांडे ने 2022 की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के दौरान सावरकर पर अपमानजनक टिप्पणी करने के आरोप में राहुल गांधी पर आईपीसी की धारा 153ए और 505 के तहत मामला दर्ज कराया था.
रेलवे स्टेशनों पर यात्री सुविधाओं की बदहाली, 90% स्टेशनों में कमी और कई जगह दूषित पानी: कैग
‘डाउन टू अर्थ’ के मुताबिक, भारतीय रेलवे के गैर-उपनगरीय स्टेशनों पर यात्री सुविधाओं की स्थिति को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग की रिपोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं. 12 अगस्त 2026 को जारी रिपोर्ट के मुताबिक, जांच किए गए करीब 90 फीसदी रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों के लिए निर्धारित न्यूनतम जरूरी सुविधाओं में से एक या उससे अधिक की कमी पाई गई. कई स्टेशनों पर पीने के पानी की गुणवत्ता भी मानकों के अनुरूप नहीं मिली.
कैग ने 2019-20 से 2023-24 की अवधि का ऑडिट किया और देश के 5,908 गैर-उपनगरीय रेलवे स्टेशनों में यात्री सुविधाओं और स्वच्छता व्यवस्था की समीक्षा की. इन स्टेशनों पर 7,424 से अधिक यात्री ट्रेनें संचालित होती हैं और करीब 2,924 मिलियन यात्री इनका इस्तेमाल करते हैं.
512 में से 458 स्टेशनों पर सुविधाओं की कमी
कैग ने 512 रेलवे स्टेशनों का निरीक्षण किया. इनमें से 458 यानी 89 फीसदी से अधिक स्टेशनों पर न्यूनतम आवश्यक यात्री सुविधाओं में एक या उससे अधिक की कमी मिली. इन सुविधाओं में पीने का पानी, बैठने की व्यवस्था, शौचालय, प्लेटफॉर्म शेल्टर, पंखे, वाटर कूलर और संकेतक शामिल हैं.
सिर्फ 54 स्टेशनों पर निर्धारित मानकों के मुताबिक कोई कमी नहीं मिली. ये स्टेशन 13 रेलवे जोन में फैले हुए थे.
कैग ने फरवरी 2025 के पैसेंजर एमेनिटीज मैनेजमेंट सिस्टम के आंकड़ों का भी विश्लेषण किया. इसके मुताबिक अलग-अलग श्रेणी के स्टेशनों और रेलवे जोन में सुविधाओं की कमी बनी हुई थी. रिपोर्ट ने इसे किसी एक-दो स्टेशनों की समस्या के बजाय रेलवे व्यवस्था में मौजूद “सिस्टमेटिक गैप” बताया.
रिपोर्ट के मुताबिक, रेलवे बोर्ड के निर्देशों के बावजूद कमियों को दूर करने के लिए समयबद्ध कार्ययोजनाएं भी तैयार नहीं की गईं. यात्री सुविधाओं के मानक रेलवे बोर्ड ने पहली बार 1952 में तय किए थे, जिन्हें अप्रैल 2018 में संशोधित किया गया था.
रेलवे स्टेशनों पर पीने के पानी की गुणवत्ता पर सवाल
कैग ने रेलवे स्टेशनों पर उपलब्ध पीने के पानी की गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर चिंता जताई है. रिपोर्ट के अनुसार, पानी की जांच निर्धारित अंतराल पर नहीं की गई और अवशिष्ट क्लोरीन, बैक्टीरियोलॉजिकल संक्रमण तथा रासायनिक मानकों की जांच में भी कमी पाई गई.
2022-23 में 16 रेलवे जोन के 135 स्टेशनों और 2023-24 में 15 जोन के 139 स्टेशनों पर पानी में अवशिष्ट क्लोरीन की मात्रा निर्धारित 0.2 से 0.5 पार्ट्स प्रति मिलियन की सीमा से बाहर पाई गई. 63 स्टेशनों पर 11 जोन में किए गए आधे से अधिक परीक्षणों में क्लोरीन का स्तर निर्धारित सीमा में नहीं था.
प्लेटफॉर्म पर लगे नलों से लिए गए पानी के नमूनों में भी कई जगह बैक्टीरियोलॉजिकल संक्रमण मिला. 2022-23 में आठ रेलवे जोन के 49 स्टेशनों और 2023-24 में नौ जोन के 56 स्टेशनों पर कुल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया, जिसमें ई-कोलाई भी शामिल है, पाए गए.
कैग ने कहा कि पानी में क्लोरीन का स्तर निर्धारित सीमा से बाहर होना और ई-कोलाई जैसे बैक्टीरिया की मौजूदगी यात्रियों की सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है.
स्वच्छता और निगरानी में भी कमियां
रिपोर्ट में शौचालयों की स्थिति को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं. कई जगह शौचालय काम नहीं कर रहे थे और पे-एंड-यूज शौचालयों में भी सुविधाएं अपर्याप्त थीं. अनधिकृत प्रवेश मार्गों की मौजूदगी का असर स्टेशन की साफ-सफाई और सुरक्षा पर भी पड़ रहा था.
राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने रेलवे को प्रत्येक स्टेशन के लिए ऐसी वेबसाइट बनाने का निर्देश दिया था, जहां यात्री सुविधाओं, स्वच्छता व्यवस्था और कमियों को दूर करने की कार्ययोजनाओं की जानकारी उपलब्ध हो. लेकिन कैग के मुताबिक मार्च 2024 तक किसी भी रेलवे जोन ने ऐसी वेबसाइट शुरू नहीं की थी.
पैसे की कमी नहीं, खर्च करने में कमी
कैग की रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यात्री सुविधाओं के लिए बजट उपलब्ध होने के बावजूद उसका पूरा इस्तेमाल नहीं किया गया. 2019-20 से 2023-24 के बीच गैर-कोविड वर्षों में भी यात्री सुविधाओं के लिए निर्धारित बजट का 36 से 44 फीसदी हिस्सा खर्च नहीं किया गया.
कैग के मुताबिक, बार-बार आश्वासन और पर्याप्त धन उपलब्ध होने के बावजूद बजट का लगातार कम इस्तेमाल यह संकेत देता है कि समस्या सिर्फ पैसे की कमी की नहीं, बल्कि योजना बनाने और उसे लागू करने में भी है.
इस तरह कैग की रिपोर्ट रेलवे स्टेशनों पर यात्री सुविधाओं की समस्या को केवल कुछ जगहों की कमी नहीं मानती, बल्कि इसे व्यापक और लगातार बनी हुई व्यवस्था संबंधी समस्या के रूप में सामने रखती है. एक तरफ यात्रियों के लिए जरूरी सुविधाओं की कमी है और दूसरी तरफ उपलब्ध बजट का बड़ा हिस्सा खर्च नहीं हो रहा है, जबकि कई स्टेशनों पर पीने के पानी की गुणवत्ता भी सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए चिंता पैदा कर रही है.
जनगणना 2027 में जाति की गिनती, 40 सवालों में कोविड टीकाकरण से बैंक खातों तक
‘स्क्रोल’ के मुताबिक,केंद्र सरकार ने जनगणना 2027 के लिए 40 सवालों को अधिसूचित कर दिया है. इस बार जनगणना में जाति से जुड़ी जानकारी भी दर्ज की जाएगी. स्वतंत्र भारत में यह पहली बार होगा जब अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा देश के सभी समुदायों की जातियों की भी गणना की जाएगी.
अब तक स्वतंत्र भारत में होने वाली दशकीय जनगणना में केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी से जुड़ा जातिगत आंकड़ा दर्ज किया जाता था. अन्य जातियों की संख्या के लिए कोई व्यापक आधिकारिक जनगणना नहीं हुई है. भारत में सभी जातियों की आखिरी व्यापक गणना 1931 में ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी.
नई व्यवस्था में लोगों से पूछा जाएगा कि वे अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित हैं या नहीं. इसके अलावा अन्य समुदायों के लिए जाति बताने का खुला विकल्प होगा. यानी किसी सीमित सूची में से जाति चुनने के बजाय व्यक्ति अपनी जाति का नाम खुद दर्ज कर सकेगा. इस व्यवस्था से देश में अलग-अलग जातियों की वास्तविक संख्या का विस्तृत आंकड़ा सामने आने की उम्मीद है.
जाति जनगणना क्यों महत्वपूर्ण है.
भारत में जाति केवल सामाजिक पहचान का सवाल नहीं है, बल्कि शिक्षा, रोजगार, राजनीति और सरकारी योजनाओं से भी जुड़ी हुई है. खास तौर पर अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी की वास्तविक आबादी को लेकर लंबे समय से पर्याप्त आधिकारिक आंकड़ों का अभाव रहा है.
जाति जनगणना के समर्थकों का तर्क है कि अगर अलग-अलग जातियों की संख्या का सही आंकड़ा उपलब्ध होगा तो सरकार आरक्षण, शिक्षा, रोजगार और कल्याणकारी योजनाओं को अधिक सटीक तरीके से तैयार कर सकेगी. दूसरी ओर, जातिगत आंकड़ों के इस्तेमाल, वर्गीकरण और संभावित राजनीतिक प्रभाव को लेकर भी बहस होती रही है.
विपक्षी दल लंबे समय से राष्ट्रव्यापी जाति जनगणना की मांग करते रहे हैं. उनका कहना है कि देश की नीतियां केवल अनुमानित सामाजिक आंकड़ों के आधार पर नहीं, बल्कि वास्तविक जनसंख्या संरचना को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए.
सिर्फ जाति नहीं, 40 सवालों में कई दूसरी जानकारियां.
जनगणना 2027 के फॉर्म में जाति के अलावा लोगों से कोविड-19 टीकाकरण से जुड़ी जानकारी भी मांगी जाएगी. उनसे पूछा जाएगा कि उन्होंने कोविड-19 का टीका कहां लगवाया था. इसके अलावा उनके पास कुल कितने बैंक खाते हैं और वे डिजिटल रूप से कितने साक्षर हैं, इसकी जानकारी भी ली जाएगी.
फॉर्म में आधार नंबर, मोबाइल नंबर, पासपोर्ट नंबर और वोटर आईडी जैसी जानकारियां भी शामिल हैं. इससे जनगणना केवल आबादी की संख्या और सामाजिक संरचना तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि लोगों की सामाजिक, आर्थिक और डिजिटल स्थिति से जुड़े कई संकेतक भी दर्ज किए जाएंगे.
कोविड के कारण 2021 की जनगणना टली थी.
भारत में पिछली दशकीय जनगणना 2011 में हुई थी. 2021 में जनगणना की प्रक्रिया शुरू होनी थी, लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण इसे टाल दिया गया. अब लगभग डेढ़ दशक के अंतराल के बाद देश में नई जनगणना होने जा रही है.
जनगणना 2027 दो चरणों में होगी. लद्दाख और जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड के बर्फीले और असमकालिक क्षेत्रों में जनसंख्या गणना 1 सितंबर से 30 सितंबर 2026 के बीच होगी. दूसरे चरण के लिए ऑनलाइन स्व-गणना की सुविधा 17 अगस्त से 31 अगस्त तक उपलब्ध रहेगी. देश के बाकी हिस्सों में जनसंख्या गणना फरवरी 2027 में की जाएगी.
दूसरे चरण का पूर्व परीक्षण 1 जुलाई से 20 जुलाई तक 16 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में किया गया था. इसी परीक्षण के दौरान गैर-एससी और गैर-एसटी समुदायों की जाति दर्ज करने के लिए खुले कॉलम का इस्तेमाल किया गया था.
जाति के आंकड़ों से आगे क्या बदलेगा.
जाति की गणना का सबसे बड़ा असर उन नीतियों पर पड़ सकता है जो सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर बनाई जाती हैं. अगर जनगणना में अलग-अलग जातियों की संख्या का विश्वसनीय आंकड़ा सामने आता है, तो आरक्षण की सीमा, ओबीसी की हिस्सेदारी, सरकारी योजनाओं के लक्ष्य और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर नई बहस तेज हो सकती है.
हालांकि, केवल जनगणना में जाति दर्ज हो जाने से नीतियां अपने आप नहीं बदलेंगी. आंकड़ों को किस तरह वर्गीकृत किया जाएगा, उनकी जांच कैसे होगी और सरकार उनका इस्तेमाल किस नीति के लिए करेगी, ये सवाल भी उतने ही महत्वपूर्ण होंगे.
इस लिहाज से जनगणना 2027 सिर्फ देश की नई आबादी गिनने की कवायद नहीं है. यह स्वतंत्र भारत में पहली बार पूरे समाज की जातिगत संरचना का व्यापक सरकारी रिकॉर्ड तैयार करने की प्रक्रिया भी होगी, जिसके सामाजिक, राजनीतिक और नीतिगत प्रभाव आने वाले वर्षों में दिखाई दे सकते हैं.
‘भगवान ने आदेश दिया’: सुखबीर बादल पर तलवार से हमला करने वाले निहंग का पुलिस को बयान
‘इंडियन एक्सप्रेस’ के अनुसार, महाराष्ट्र के नांदेड़ में शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल पर कृपाण से हमला करने वाले निहंग सिख जसपाल सिंह ने पुलिस पूछताछ में दावा किया है कि उसे यह हमला करने का ‘आदेश’ वाहेगुरु से मिला था. जसपाल के मुताबिक, उसे यह आदेश नांदेड़ के गुरुद्वारे में प्रार्थना के दौरान मिला.
घटना गुरुवार को नांदेड़ के गुरुद्वारा माता साहिब देवन जी, मुगत में हुई. सुखबीर बादल गुरुद्वारे की सीढ़ियों से नीचे उतर रहे थे, तभी वहां तीन अन्य लोगों के साथ खड़े जसपाल सिंह ने उन पर कृपाण से हमला करने की कोशिश की. इस हमले में बादल के हाथ में चोट आई. उनकी सुरक्षा में तैनात महाराष्ट्र पुलिस का एक अधिकारी भी मामूली रूप से घायल हुआ. दोनों को इलाज के लिए स्थानीय अस्पताल ले जाया गया. सुखबीर बादल को शुक्रवार को अस्पताल से छुट्टी मिलने की संभावना है.
हमले के बाद पुलिस ने जसपाल सिंह को गिरफ्तार कर लिया और पूछताछ के लिए नांदेड़ पुलिस मुख्यालय ले गई. पुलिस के मुताबिक, पूछताछ में जसपाल ने बताया कि उसने 2023 में सांसारिक जीवन छोड़ दिया था. उसने पुणे में अपनी पत्नी और बेटी को छोड़कर नांदेड़ में निहंग संप्रदाय के सेवादार के रूप में रहना शुरू किया था.
पुलिस ने बताया कि जसपाल सिंह पेशे से वकील रहा है और निहंग बनने से पहले मुंबई की एक कॉरपोरेट फर्म में काम करता था. पूछताछ में उसने दावा किया कि हमला किसी पूर्व योजना के तहत नहीं किया गया था और उसने अकेले ही यह कदम उठाया.
एक पुलिस अधिकारी के अनुसार, जसपाल ने पूछताछ के दौरान कई कारणों का जिक्र किया है. इनमें पंजाब की मौजूदा स्थिति और वहां की नशीली दवाओं की समस्या भी शामिल है. अधिकारी ने कहा कि अब तक की जांच में ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि हमले में उसे बाहर से किसी व्यक्ति की मदद मिली हो.
पुलिस के मुताबिक, जसपाल ने शुरुआती पूछताछ में यह भी कहा था कि उसने सुखबीर बादल पर हमला ‘आवेश में’ किया. हालांकि, बाद में उसने अपने बयान में कहा कि उसे भीतर से हमला करने का आदेश महसूस हुआ था और इसे वाहेगुरु का आदेश बताया.
नांदेड़ के पुलिस अधीक्षक नीलाभ रोहन ने बताया कि जसपाल सिंह को शुक्रवार को अदालत में पेश किया जाएगा और पुलिस उसकी हिरासत की मांग करेगी. पुलिस अब उसके बयानों की जांच करने के साथ-साथ यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि हमले के पीछे वास्तव में कोई बड़ी साजिश थी या नहीं.
फिलहाल पुलिस की शुरुआती जांच में हमले को जसपाल सिंह का व्यक्तिगत कदम माना जा रहा है. हालांकि, उसके बयानों और हमले की परिस्थितियों की विस्तृत जांच अभी जारी है.
रक्त संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों तक दिव्यांगता सहायता क्यों नहीं पहुंच पाती
‘स्क्रोल’ की लेखिका नोलिना मिंज ने झारखंड में सिकल सेल एनीमिया और थैलेसीमिया से जूझ रहे परिवारों की स्थिति पर रिपोर्ट की है. भारत में इन बीमारियों को दिव्यांगता के रूप में मान्यता मिलने के बावजूद, जांच, इलाज और सरकारी सहायता तक पहुंच की कमी मरीजों के लिए बड़ी समस्या बनी हुई है.
सूर्योदय कुम्हार की बीमारी का पता संयोग से चला. झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के धाटकीडी गांव में रहने वाले छह वर्षीय सूर्योदय कुम्हार को अक्सर जोड़ों और मांसपेशियों में तेज दर्द और अत्यधिक थकान होती थी. उसके माता-पिता कई डॉक्टरों के पास गए, लेकिन बीमारी की सही पहचान नहीं हो सकी. उसकी 16 वर्षीय बहन सोनी में भी ऐसे ही लक्षण थे और वह हर साल कई महीनों तक स्कूल नहीं जा पाती थी.
परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है. पिता सुनील कुंभार राजमिस्त्री हैं और महीने में 12 से 15 हजार रुपये कमाते हैं. परिवार इलाज पर लाखों रुपये खर्च कर चुका है और इसके लिए कर्ज भी लिया है.
जून में सूर्योदय कुम्हार का आधार बनवाने के लिए परिवार गोइलकेरा गया था. वहां कर्मचारियों ने उसकी खराब हालत देखकर पास में लगे स्वास्थ्य शिविर में जाने की सलाह दी. सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की चिकित्सा अधिकारी डॉ. जयश्री पार्डिहा ने सिकल सेल एनीमिया की आशंका जताई और रैपिड टेस्ट कराया. रिपोर्ट में बीमारी के संकेत मिले. परिवार की जांच में सूर्योदय कुम्हार और उसके पिता में सिकल सेल से जुड़े संकेत सामने आए.
बाद में उसकी मेडिकल फाइल देखने पर पता चला कि जुलाई 2025 में राउरकेला के एक निजी क्लीनिक में सूर्योदय कुम्हार का सिकल सेल ट्रेट पॉजिटिव आया था. लेकिन डॉक्टर ने परिवार को इसकी जानकारी नहीं दी. परिवार अंग्रेजी की सीमित समझ के कारण रिपोर्ट भी नहीं समझ पाया.
भारत में सिकल सेल एनीमिया, थैलेसीमिया और हीमोफीलिया को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के तहत दिव्यांगता के रूप में मान्यता दी गई है. सरकार ने जुलाई 2023 में राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन शुरू किया था, जिसका लक्ष्य 2047 तक बीमारी को खत्म करना है. इसके तहत जागरूकता, स्क्रीनिंग और जांच सुविधाओं को बढ़ाने की योजना है.
इसके बावजूद ग्रामीण इलाकों में बीमारी की पहचान और इलाज बड़ी चुनौती है. झारखंड के पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम जिलों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण मरीजों को लंबे समय तक इलाज के लिए भटकना पड़ता है.
इलाज के साथ जानकारी की भी कमी
जमशेदपुर के बाबलू लोहरा के दो बच्चों शेखर और सुमन को सिकल सेल एनीमिया है. परिवार को लंबे समय तक यह नहीं बताया गया कि माता-पिता दोनों बीमारी के ट्रेट कैरियर हैं और भविष्य के बच्चों में बीमारी पहुंचने का जोखिम हो सकता है.
इलाज का खर्च भी परिवार के लिए बड़ी समस्या है. सरकारी अस्पतालों में कुछ दवाएं मुफ्त उपलब्ध होने के बावजूद वे अक्सर नहीं मिलतीं. परिवार को करीब 2,500 रुपये महीने दवाओं पर खर्च करने पड़ते हैं. बीमारी की जटिलताओं के कारण दोनों बच्चों के ऑपरेशन भी हुए, जिन पर लाखों रुपये खर्च हुए.
जनवरी में दोनों को यूनिक डिसेबिलिटी आईडी कार्ड मिले और वे 1,000 रुपये मासिक दिव्यांगता पेंशन के पात्र बने. लेकिन परिवार के अनुसार उन्हें अब तक पेंशन की राशि नहीं मिली है.
विशेषज्ञों का कहना है कि सिकल सेल बीमारी को केवल आदिवासी समुदायों तक सीमित मानना सही नहीं है. टाटा स्टील फाउंडेशन के डॉ. आकाश सत्पथी के मुताबिक स्क्रीनिंग बढ़ने पर अन्य समुदायों में भी इसके मामले सामने आ रहे हैं.
ग्रामीण मरीजों के लिए रक्त और इलाज की समस्या
18 वर्षीय अमृता करवा को बचपन में सिकल सेल एनीमिया का पता चला था. तीन साल पहले आठवीं कक्षा की परीक्षा देने जाते समय वह गर्मी और कमजोरी के कारण बेहोश हो गईं. इसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी.
अमृता को लगभग हर महीने रक्त चढ़ाने की जरूरत होती है. लेकिन इस साल फरवरी से मई तक चाईबासा में रक्त उपलब्ध नहीं था. परिवार को रक्त के लिए जमशेदपुर जाना पड़ा.
इस समस्या को पिछले साल सामने आए एक गंभीर मामले ने और बढ़ाया. झारखंड में थैलेसीमिया से पीड़ित पांच बच्चों में एचआईवी संक्रमण पाया गया था. जांच में इसका संबंध चाईबासा सदर अस्पताल के ब्लड बैंक में चढ़ाए गए रक्त से सामने आया. जांच के बाद पता चला कि ब्लड बैंक बिना लाइसेंस चल रहा था और उसे अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया.
अमृता की 21 वर्षीय बहन मधु की भी थैलेसीमिया से मौत हो गई. परिवार का आरोप है कि अस्पताल पहुंचने के बाद कई घंटे तक उन्हें डॉक्टर नहीं मिला.
बार-बार रक्त चढ़ाने वाले मरीजों में शरीर में अतिरिक्त आयरन जमा होने का खतरा रहता है, जिससे लिवर और हृदय को नुकसान हो सकता है. इसके लिए आयरन चेलेशन थेरेपी जरूरी होती है. लेकिन मरीजों और स्वास्थ्यकर्मियों में इसके बारे में भी पर्याप्त जानकारी नहीं है.
बेहतर सुविधा से बदल सकती है जिंदगी
चाईबासा की बसंती बिरुली की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है. उन्हें बचपन में थैलेसीमिया मेजर का पता चला था. परिवार के सहयोग और बेहतर इलाज की वजह से वह पढ़ाई जारी रख सकीं. उन्हें दिव्यांगता पहचान पत्र और पेंशन भी मिल रही है. वह अर्थशास्त्र की पढ़ाई कर रही हैं और शिक्षक बनना चाहती हैं.
बसंती का उदाहरण दिखाता है कि उचित इलाज, जानकारी और आर्थिक सहायता मिलने पर थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया से पीड़ित लोग सामान्य और सम्मानजनक जीवन जी सकते हैं.
लेकिन दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले मरीजों के लिए ऐसी सुविधाएं अब भी आसानी से उपलब्ध नहीं हैं. बीमारी की समय पर पहचान, विशेषज्ञ डॉक्टरों, नियमित दवाओं, सुरक्षित रक्त और दिव्यांगता पेंशन तक पहुंच की कमी उनकी मुश्किलें बढ़ाती है. सरकार की योजनाओं और जमीन पर उनकी पहुंच के बीच यह अंतर दूर करना जरूरी है.
बिनु मैथ्यू | युवाओं का भरोसा जीतने के लिए विपक्ष को अपनानी चाहिए ये 11 रणनीतियां
बिनु मैथ्यू के इस लेख में हालिया जेन जी प्रदर्शनों के जरिए सामने आए युवाओं के असंतोष को संसद की राजनीति और ठोस नीतियों से जोड़ने की जरूरत पर जोर दिया गया है.उनके मुताबिक, परीक्षा में गड़बड़ी, पेपर लीक, भर्ती में देरी और बेरोजगारी केवल अलग-अलग समस्याएं नहीं हैं, बल्कि शिक्षा और रोजगार के बीच गहरे संकट का हिस्सा हैं. विपक्ष को केवल अमित शाह के इस्तीफे या सरकार की विफलताओं को उठाने के बजाय युवाओं की आवाज को संसद में नीतिगत एजेंडे में बदलना चाहिए.
हालिया जेन जी आंदोलन मुख्य रूप से शिक्षित, शहरी और डिजिटल रूप से जुड़े युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन भारत के करोड़ों ग्रामीण युवाओं की समस्या भी इससे जुड़ी हुई है. उच्च शिक्षा तक नहीं पहुंच पाने वाले युवाओं के सामने स्थानीय रोजगार के अभाव और मजबूरी में शहरों की ओर पलायन की चुनौती है. इसलिए विपक्ष की रणनीति में दोनों समूहों को शामिल करना जरूरी है.
1. शिक्षा से रोजगार तक के संकट को केंद्रीय मुद्दा बनाना
पेपर लीक, परीक्षा रद्द होना, भर्ती में देरी, सरकारी नौकरियों की कमी, शिक्षा की बढ़ती लागत और अस्थायी रोजगार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. विपक्ष को शिक्षा से रोजगार तक की पूरी प्रक्रिया को संसद का स्थायी मुद्दा बनाना चाहिए. साथ ही उन युवाओं की समस्याओं पर भी ध्यान देना चाहिए जो प्रतियोगी परीक्षाओं तक पहुंच ही नहीं पाते.
2. सरकार से आंकड़ों के साथ जवाब मांगना
विपक्ष को सरकार से लगातार पूछना चाहिए कि कितने सरकारी पद खाली हैं, कितनी परीक्षाएं रद्द हुईं, कितने उम्मीदवार प्रभावित हुए और भर्ती में कितना समय लग रहा है. ग्रामीण भारत में युवाओं के पलायन, कृषि रोजगार, ग्रामीण एमएसएमई और कौशल प्रशिक्षण से जुड़े आंकड़े भी संसद में मांगे जाने चाहिए.
3. शिक्षा से रोजगार संकट पर जेपीसी की मांग
विपक्ष को शिक्षा से रोजगार तक के संकट पर संयुक्त संसदीय समिति बनाने की मांग करनी चाहिए. समिति को शिक्षा की गुणवत्ता और लागत से लेकर पेपर लीक, भर्ती में देरी, खाली पदों, बेरोजगारी और सुरक्षित रोजगार की कमी तक पूरे तंत्र की जांच करनी चाहिए. इसमें छात्र, शिक्षक, अर्थशास्त्री, बेरोजगार युवा, परिवार और विशेषज्ञों को भी सुना जाना चाहिए.
4. ग्रामीण भारत को मजबूत कर मजबूर पलायन कम करना
युवा संकट को केवल शहरी रोजगार तक सीमित नहीं किया जा सकता. कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, ग्रामीण उद्यम, एमएसएमई, शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण को मजबूत करना होगा, ताकि युवाओं को रोजगार के लिए घर छोड़ने की मजबूरी न हो.
5. आर्थिक नीति के केंद्र में रोजगार
सिर्फ बेहतर परीक्षा व्यवस्था से युवा संकट हल नहीं होगा. अर्थव्यवस्था को पर्याप्त उत्पादक रोजगार पैदा करना होगा. विनिर्माण, कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढांचे, एमएसएमई, देखभाल कार्य और पर्यावरण आधारित रोजगार को बढ़ावा देना चाहिए. जीडीपी वृद्धि के साथ रोजगार की संख्या और गुणवत्ता को भी आर्थिक सफलता का पैमाना बनाया जाना चाहिए.
6. युवाओं की बात सुनने के लिए यूथ कमीशन
विपक्षी सांसदों का एक आयोग बनाकर देशभर के शहरों, कस्बों और गांवों में युवाओं से सीधे संवाद किया जाना चाहिए. छात्रों, बेरोजगार स्नातकों, युवा किसानों, श्रमिकों, उद्यमियों और प्रवासी युवाओं की समस्याओं को दर्ज कर उनके आधार पर साझा युवा कार्यक्रम तैयार किया जा सकता है.
7. युवा आंदोलन को अपने राजनीतिक समर्थन में बदलने की कोशिश न हो
विपक्ष को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि प्रदर्शन कर रहे युवा उसके समर्थक हैं. कई युवा स्थापित राजनीतिक दलों से भी दूरी रखते हैं. इसलिए जरूरी है कि उनकी बात सुनी जाए और उनकी समस्याओं को बिना राजनीतिक स्वामित्व जताए संसद में उठाया जाए.
8. शांतिपूर्ण प्रदर्शन और लोकतांत्रिक रास्तों की रक्षा
युवाओं को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार मिलना चाहिए. विपक्ष को पुलिस कार्रवाई में अति होने पर जवाबदेही मांगनी चाहिए और साथ ही प्रदर्शन से उठे सवालों को संसदीय समितियों, प्रश्नों और कानून निर्माण की प्रक्रिया से जोड़ना चाहिए.
9. ग्रामीण युवाओं को बराबर राजनीतिक जगह
राष्ट्रीय युवा विमर्श केवल शिक्षित और डिजिटल रूप से जुड़े युवाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए. छोटे किसान, शहरों में काम करने वाले ग्रामीण युवा, उच्च शिक्षा से वंचित युवा महिलाएं और अस्थायी मजदूर भी युवा संकट का हिस्सा हैं. उनके रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और कृषि से जुड़े सवाल संसद में बराबर उठने चाहिए.
10. ग्रामीण उद्यम और स्थानीय रोजगार
ग्रामीण युवाओं को केवल कृषि मजदूर या प्रवासी श्रमिक मानने के बजाय उन्हें उद्यमी, तकनीशियन, कारीगर और छोटे उत्पादक बनने के अवसर दिए जाने चाहिए. कृषि को प्रसंस्करण, भंडारण, पैकेजिंग, परिवहन और विपणन से जोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार पैदा किया जा सकता है.
11. हर आलोचना के साथ वैकल्पिक प्रस्ताव
विपक्ष की राजनीति का मूल सिद्धांत होना चाहिए कि हर आलोचना के साथ समाधान भी दिया जाए. भर्ती में देरी है तो समयबद्ध भर्ती व्यवस्था का प्रस्ताव हो, परीक्षा में गड़बड़ी है तो संस्थागत सुधार की योजना हो, खाली पद हैं तो वैकेंसी ऑडिट और भर्ती कैलेंडर हो और बेरोजगारी है तो रोजगार रणनीति पेश की जाए.
इस्तीफे की राजनीति से आगे बढ़कर बड़ी दृष्टि
लेखक के अनुसार किसी मंत्री की राजनीतिक जिम्मेदारी साबित होने पर इस्तीफे की मांग उचित हो सकती है, लेकिन अमित शाह या किसी अन्य मंत्री का इस्तीफा अपने आप उन समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता, जिनके कारण युवा सड़कों पर उतरे हैं.
असल सवाल उस भारत का है जो देश अपने युवाओं को दे रहा है. सुरक्षित नौकरी की तलाश में संघर्ष कर रहा शहरी स्नातक और रोजगार के लिए शहर की ओर पलायन करने वाला ग्रामीण युवा अलग दिखाई दे सकते हैं, लेकिन दोनों आर्थिक सुरक्षा और सम्मान की तलाश में हैं. भारत को ऐसा देश नहीं बनना चाहिए जहां अवसर पाने का एकमात्र रास्ता गांव से शहर की ओर पलायन हो या युवा वर्षों तक कुछ सुरक्षित नौकरियों के लिए अविश्वसनीय परीक्षाओं की तैयारी करते रहें.
विपक्ष को युवाओं के मुद्दे को स्थायी संसदीय एजेंडा बनाना चाहिए और हर वर्ष शिक्षा, रोजगार, भर्ती, ग्रामीण विकास, कृषि, पलायन, स्वास्थ्य, पोषण और आर्थिक अवसरों पर बहस करानी चाहिए. युवा विपक्ष पर केवल इसलिए भरोसा नहीं करेंगे कि सरकार विफल रही है. उन्हें यह भी जानना होगा कि सत्ता में आने का दावा करने वाले दलों के पास विश्वसनीय विकल्प क्या है.
इसलिए विपक्ष को आरोप से जवाबदेही और आलोचना से रचनात्मक राजनीति की ओर बढ़ना होगा. संसद का इस्तेमाल केवल सरकार की विफलताएं उजागर करने के लिए नहीं, बल्कि युवाओं की आकांक्षाओं को नीतियों में बदलने के लिए करना होगा. युवा भारत की आवाज केवल आंदोलनों और चुनावों के दौरान नहीं, बल्कि संसद और देश की नीतियों में भी दिखाई देनी चाहिए.
बिनु मैथ्यू Countercurrents.org के संपादक हैं.
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