13/08/2026: बार काउंसिल का यू-टर्न | अरुणाचल में चीन | नोएडा एयरपोर्ट में पानी | ई20 पर सवाल | मोदी की दुविधा | चर्चों पर दबाव | 5 ट्रिलियन का वादा | प्रदर्शनकारियों की निगरानी | कहानी खत्म
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
बार काउंसिल का कुछ ही घंटों में यू टर्न, नालसार के छात्रों के पंजीकरण पर रोक हटाई, सीजेआई का विरोध बना था कारण
बारिश के बाद नोएडा के 11 हजार करोड़ के नए एयरपोर्ट में भर गया पानी, मोदी ने 4 माह पहले किया था उद्घाटन
भारत-चीन विवाद: अरुणाचल प्रदेश के छात्रों ने सीमा की ओर मार्च निकाला, पूर्व मंत्री ने पीएम मोदी पर उठाए सवाल
ई20 ईंधन को लेकर मारुति, टाटा और महिंद्रा ने भी उठाए थे सवाल, ई-मेल से चिंताओं का खुलासा
विरोध स्थलों पर पुलिस की चेहरे पहचानने वाली तकनीक के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई को तैयार
‘अब सरकार हमारी बात सुनती है’: बजरंग दल मुंबई के स्वतंत्र चर्चों पर हमले तेज कर रहा है
श्रवण गर्ग | ये सरकार सच का सामना करने से डर रही है
कहानी का प्लॉट खो गया: कैसे भगवा पार्टी के माहिर कहानीकारों के पास कहानी खत्म हो गई
वीवीपी शर्मा | कॉकरोच और पंडित की क्रिस्टल बॉल
मोदी के 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के वादे का क्या हुआ?
बार काउंसिल का कुछ ही घंटों में यू-टर्न, नालसार के छात्रों के पंजीकरण पर रोक हटाई, सीजेआई का विरोध बना था कारण
भारतीय बार काउंसिल (बीसीआई) ने गुरुवार (13 अगस्त, 2026) को सभी राज्य बार कौंसिलों को यह निर्देश दिया कि वे 2026 में हैदराबाद के ‘नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ’ से पास आउट हुए छात्रों का नामांकन न करें, लेकिन कुछ ही घंटों बाद इस आदेश को वापस ले लिया गया.
सोईबाम रॉकी सिंह के अनुसार, इसके कुछ घंटे पहले अपने पत्र में, बीसीआई ने राज्य बार काउंसिलों को अगले आदेश तक इन स्नातकों का पंजीकरण रोकने का निर्देश दिया था. यह कदम विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की प्रस्तावित भागीदारी का विरोध करने वाले छात्रों के एक अभियान की जांच लंबित होने के कारण उठाया गया था.
हालाँकि, बाद में अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा द्वारा जारी इस आदेश को वापस ले लिया गया और कहा गया कि सभी स्नातक अपनी पसंद के राज्य बार काउंसिल में नामांकित होने के लिए स्वतंत्र होंगे. नवीनतम पत्र में बीसीआई ने कहा कि उसके सदस्यों ने सर्वसम्मति से यह निष्कर्ष निकाला है कि 2026 के स्नातकों की “बड़ी संख्या” निर्दोष थी और बीसीआई द्वारा “अनादर के कदम” के रूप में वर्णित इस विरोध में शामिल होने की उनकी कोई मंशा नहीं थी.
हालाँकि, बीसीसाई ने कहा कि वह आगे की कार्रवाई पर फैसला करने से पहले नालसार के कुलपति की जांच रिपोर्ट का इंतजार करेगा. संशोधित बयान में कहा गया, “किसी भी छात्र को बिना उसकी किसी गलती के पीड़ित नहीं होने दिया जाएगा.”
यह विवाद नालसार के छात्रों द्वारा एक प्रतिनिधित्व पत्र (ज्ञापन) सौंपने के बाद शुरू हुआ, जिसमें देश की राजधानी में नीट प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की कथित बर्बरता से संबंधित सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत की टिप्पणियों का हवाला देते हुए दीक्षांत समारोह में उनके मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने का विरोध किया गया था.
अपने पिछले निर्देश में, बीसीआई ने नालसार के कुलपति से इस अभियान पर एक प्रामाणिक रिपोर्ट मांगी थी और विश्वविद्यालय से उन लोगों की पहचान करने को कहा था जो मुख्य रूप से इस अभियान को शुरू करने, आयोजित करने, तालमेल बिठाने या लामबंद करने में शामिल थे. विश्वविद्यालय को सौंपे गए ज्ञापन और उस पर हस्ताक्षर करने वालों का विवरण भी मांगा था.
अपने संशोधित पत्र में, बीसीआई ने कहा कि उसे “कुछ विश्वसनीय स्रोतों” से जानकारी मिली है कि “कुछ शिक्षक और बाहरी लोग” इन “निर्दोष छात्रों को उकसाने” में शामिल थे.
बीसीआई के शुरुआती पत्र में कहा गया था कि कानूनी पेशे में प्रवेश चाहने वाले व्यक्तियों से आचरण के जिन मानकों की उम्मीद की जाती है, उसके संदर्भ में इस अभियान में भागीदारी की जांच की जानी चाहिए. इसने जायज अभिव्यक्ति और ऐसे आचरण के बीच अंतर बताया था जिसमें किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति या संस्थागत कार्यक्रम के खिलाफ “संगठित धमकी, दबाव, व्यक्तिगत चरित्र हनन, बाधा, व्यवधान या बहिष्कार का संगठित आह्वान” शामिल हो.
बीसीआई ने अपने शुरुआती पत्र में कहा था, “कानून के एक छात्र से, जिसके मन में देश के सर्वोच्च न्यायिक पद के प्रति कोई सम्मान न हो, उससे एक जिम्मेदार या समझदार वकील, शिक्षक या न्यायाधीश बनने की उम्मीद नहीं की जा सकती. ऐसे व्यक्ति पेशे पर हमेशा एक बोझ रहेंगे.”
पत्र में आगे लिखा था, “इस तरह का आचरण कानूनी पेशे में प्रवेश या जुड़ाव के लिए व्यक्ति की उपयुक्तता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है और यह कानूनी पेशे की गरिमा, अनुशासन तथा नैतिक मानकों के असंगत है. हमारा अनुभव है कि ऐसे लोग हमेशा हड़ताल और बहिष्कार में लिप्त रहते हैं तथा कानूनी पेशे की छवि को धूमिल करते हैं.”
बीसीआई ने नालसार के कुलपति से तीन दिनों के भीतर एक प्रामाणिक रिपोर्ट जमा करने को कहा था, जिसमें सौंपा गया ज्ञापन पत्र भी शामिल था. विश्वविद्यालय को सीजेआई सूर्यकांत के खिलाफ अभियान शुरू करने वाले मुख्य छात्रों की पहचान करने का भी निर्देश दिया गया था.
सीजेपी ने दी थी चेतावनी
यहां गौरतलब यह है कि बार काउंसिल के यू टर्न के पहले कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास ने ‘एक्स’ पर कहा था, “भारतीय बार काउंसिल द्वारा सीजेआई सूर्य कांत को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किए जाने का विरोध करने के कारण नालसार के 2026 के स्नातक छात्रों के अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण (एनरोलमेंट) पर रोक लगाने का फैसला बेहद अनुपातहीन, काफी परेशान करने वाला और प्रथम दृष्टया अनुचित (असमर्थनीय) है. एक औपचारिक निमंत्रण पर असहमति व्यक्त करने के लिए छात्रों को सामूहिक रूप से दंडित नहीं किया जा सकता. कॉकरोच जनता पार्टी इस आदेश की कड़े शब्दों में निंदा करती है. यदि अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा इस आदेश को तुरंत वापस नहीं लेते हैं, तो सभी कानून के छात्र, अधिवक्ता, वरिष्ठ वकील और समाज के हितैषी युवा कॉकरोच बार काउंसिल के कार्यालय और मिश्रा के आधिकारिक आवास के बाहर विरोध प्रदर्शन करेंगे, और उनके संबंधित राज्यों में जवाबदेही तय की जाएगी.”
भारत-चीन विवाद: अरुणाचल प्रदेश के छात्रों ने सीमा की ओर मार्च निकाला, पूर्व मंत्री ने पीएम मोदी पर उठाए सवाल
‘ऑल अरुणाचल प्रदेश स्टूडेंट्स यूनियन’ (एएपीएसयू) ने गुरुवार को राज्य के ऊपरी सुबनसिरी जिले के एक सीमावर्ती गांव ताक्सिंग की ओर एक मार्च की शुरुआत की. इस मार्च ने सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है और उत्तर-पूर्वी राज्य में भारत-चीन सीमा तनाव पर ध्यान आकर्षित किया है.
“ताक्सिंग चलो, भारत बचाओ” के बैनर तले आयोजित यह मार्च तब आयोजित किया गया जब पूर्व भाजपा सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे आर.के. सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से सवाल किया कि भारत ने 2014 के बाद से कितने गश्ती बिंदु (पेट्रोलिंग पॉइंट्स) “छोड़” दिए हैं. सिंह ने उन रिपोर्टों का हवाला दिया जिनमें दावा किया गया था कि भारतीय बलों ने अरुणाचल प्रदेश के ताक्सिंग क्षेत्र में शेरा-5 पर गश्त बंद कर दी है, जिससे चीन को वहां अपनी उपस्थिति स्थापित करने का मौका मिल गया है.
‘ताक्सिंग चलो’ मार्च
एएपीएसयू (आपसू) के अध्यक्ष मेजे ताकू ने यूनियन के मुख्यालय से प्रतिनिधिमंडल को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया, जिसका नेतृत्व महासचिव मातो बुई कर रहे हैं. यह कहते हुए कि अरुणाचल प्रदेश के लोग और युवा भारत की क्षेत्रीय अखंडता को कमजोर करने के किसी भी प्रयास को स्वीकार नहीं करेंगे, ताकू ने सीमा पर मजबूत सुरक्षा और बुनियादी ढांचे की मांग की. ‘टेलीग्राफ वेब डेस्क और पीटीआई’ के अनुसार ताकू ने कहा, “अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अटूट हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा.”
ताकू ने आगे कहा, “हमारी सीमाएं केवल मानचित्र पर खींची गई रेखाएं नहीं हैं; वे हमारी सामूहिक जिम्मेदारी हैं.” उन्होंने याद दिलाया कि सीमावर्ती निवासी देश की प्रादेशिक अखंडता की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.
यूनियन ने यह भी कहा कि वह इस यात्रा के आधार पर एक ग्राउंड-असेसमेंट (ज़मीनी मूल्यांकन) रिपोर्ट तैयार करेगी और इसे केंद्र तथा अरुणाचल प्रदेश सरकार को सौंपेगी, जिसमें सीमावर्ती गांवों में कड़े सुरक्षा प्रबंधों और विकास परियोजनाओं के तेज़ी से क्रियान्वयन की मांग की जाएगी.
इस बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व गृह सचिव आर.के. सिंह ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किए गए एक वीडियो में कहा: “मैंने आज एक रिपोर्ट पढ़ी जिससे मुझे चिंता हो रही है, और यह हमारे देश के सभी नागरिकों को चिंतित करनी चाहिए. ऐसा लगता है कि हमने अरुणाचल के ताक्सिंग में शेरा-5 नामक एक गश्ती बिंदु को छोड़ दिया है, और चीनियों ने वहां एक प्रमुख स्थान स्थापित कर लिया है.”
यह समझाते हुए कि गश्त किस तरह उन क्षेत्रों में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भारत के दावे को बनाए रखने में मदद करती है जहाँ नई दिल्ली और बीजिंग की सीमा को लेकर अलग-अलग व्याख्याएँ हैं, उन्होंने कहा: “हमारी गश्त हमारी मानी गई वास्तविक नियंत्रण रेखा के बिंदुओं तक जाती है और चीनी गश्त उनकी मानी गई वास्तविक नियंत्रण रेखा के गश्ती बिंदुओं तक आती है.”
उन्होंने कहा, “जब आप अपनी दावा रेखा के साथ एक गश्ती बिंदु को छोड़ देते हैं, और चीनी उस पर कब्ज़ा कर लेते हैं, तो इसका मतलब है कि आपने अपना दावा छोड़ दिया है.”
“मैं जानना चाहता हूँ; देश जानना चाहता है कि सरकार ने 2014 से अब तक ऐसे कितने गश्ती बिंदु छोड़ दिए हैं. क्या यह अकेला गश्ती बिंदु है जिसे सरकार ने छोड़ दिया है और चीनियों ने कब्ज़ा कर लिया है? या फिर कुछ और गश्ती बिंदु हैं, जिन्हें इस सरकार ने छोड़ दिया—ऐसे गश्ती बिंदु जहाँ 2014 से पहले हमारी गश्त जाया करती थी?”
नवंबर 2025 में भाजपा से निलंबित किए गए सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री को इस आरोप का जवाब देना चाहिए. उन्होंने कहा, “रक्षा मंत्री और प्रधानमंत्री को यह जवाब देने की ज़रूरत है कि 2014 के बाद से कितने गश्ती बिंदु छोड़े गए हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री की मंज़ूरी के बिना किसी भी बिंदु पर दावा छोड़ना संभव नहीं है.”
इधर, अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने चीन की नई घुसपैठ की रिपोर्टों को खारिज कर दिया है, लेकिन कहा कि स्थानीय संगठनों द्वारा उठाई गई चिंताओं का सत्यापन निवासियों और भारतीय सेना के परामर्श से किया जाएगा.
खांडू ने कहा, “हमें नहीं लगता कि कोई घुसपैठ हुई है, क्योंकि सीमा क्षेत्र में तैनात भारतीय सेना क्षेत्र की बहुत अच्छी तरह से देखभाल कर रही है.” ताक्सिंग, अरुणाचल प्रदेश के सबसे रणनीतिक रूप से संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में से एक है. दरअसल, नाह वेलफेयर सोसाइटी (एनडब्ल्यूएस) ने भी आरोप लगाया था कि चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सदस्यों ने दोनों देशों को अलग करने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा को पार किया और ताक्सिंग सर्कल में याजा और टोगो गांवों के पास के क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया.
गुड बाय इंडिया... सरकार की तरफ से ऐक्शन नहीं
इस बीच आर. के. सिंह ने ‘एक्स’ पर अपना संदेश अपलोड करने के बाद सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण की दो दिन पुरानी एक पोस्ट को रीट्वीट किया. इसमें अरुणाचल प्रदेश का ताबा नागू नामक युवक कह रहा है, “गुड बाय इंडिया, बहुत जल्द आप सब लोग मुझे चीन में देखेंगे. सिर्फ मुझे ही नहीं, पूरा अरुणाचल चीन में दिखेगा.” युवक का दावा है कि चीन धीरे-धीरे अरुणाचल प्रदेश में धीरे-धीरे घुस रहा है और वहां की जमीन पर कब्जा कर रहा है. स्थानीय लोग इस मुद्दे को लेकर लगातार आवाज उठा रहे हैं. यहां के लोग, पब्लिक, जनता चिल्ला-चिल्लाकर सरकार को बोल रहा है कि एक्शन लो. लेकिन सरकार की तरफ से कोई ऐक्शन नहीं लिया जा रहा है. सिर्फ झूठ-मूठ की बातें. अगर ऐसा ही चलता रहा तो बहुत समय नहीं लगेगा... चाइना अरुणाचल को पूरा कैप्चर कर लेगा.” ताबा का यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है.
राहुल गांधी का दावा: चीन ने भारतीय गश्ती दल को रोका
इस बीच ‘रचनात्मक कांग्रेस’ के राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा, “अरुणाचल प्रदेश में हमारे गश्ती क्षेत्र (पेट्रोलिंग एरिया) में चीन ने हमें गश्त करने से रोक दिया है और कहा है कि.... ‘यह आपकी ज़मीन है लेकिन आप यहाँ गश्त नहीं कर सकते’.” उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह इस मामले में कुछ नहीं कर रहे हैं.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, लोकसभा में विपक्ष के नेता ने कहा, “वे क्या कर रहे हैं? ऑपरेशन जारी है और वे मीडिया संपादकों को फोन कर रहे हैं कि ‘इसे अपने अखबारों में मत छापो, इसे छिपाओ. बिना सोचे-समझे वे देश को नुकसान पहुँचा रहे हैं.”
बारिश के बाद नोएडा के 11 हजार करोड़ के नए एयरपोर्ट में भर गया पानी, मोदी ने 4 माह पहले किया था उद्घाटन
मंगलवार को हुई भारी बारिश के कारण ₹11,000 करोड़ की लागत से बने नए नोएडा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर जलभराव हो गया. इस पर विपक्ष ने “मेगा-भ्रष्टाचार” को लेकर सरकार पर निशाना साधा.
पीयूष श्रीवास्तव के अनुसार, सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में जेवर स्थित इस हवाई अड्डे के टर्मिनल को पार्किंग क्षेत्र से जोड़ने वाले हिस्से पर पानी जमा दिखाई दिया. बंद पड़े एस्केलेटरों से कुछ यात्रियों के देखते रहने के बीच कर्मचारी इलाके की सफाई करते नजर आए.
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने ‘एक्स’ पर ऐसा ही एक वीडियो साझा करते हुए पोस्ट किया: “क्या अब एयरपोर्ट पर नावें चलेंगी? जहाँ भी बीजेपी सरकार है, वहाँ बड़ा भ्रष्टाचार है!”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 मार्च 2026 को इसका उद्घाटन किया था और इस हवाई अड्डे से 15 जून को घरेलू सेवाएं शुरू हुई थीं. अक्टूबर से यहाँ से अंतर्राष्ट्रीय उड़ानें संचालित होने की उम्मीद है.
दिल्ली हवाई अड्डे पर दबाव कम करने के लिए जेवर में हवाई अड्डे का विचार दो दशक पहले लाया गया था. हालाँकि, मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने इसे खारिज कर दिया था, क्योंकि विशेषज्ञों ने कहा था कि 85 किलोमीटर के दायरे में दो हवाई क्षेत्र (एरियल ज़ोन) होना उचित नहीं है. 2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा के सत्ता में आने के बाद एनडीए सरकार ने इस परियोजना को दोबारा शुरू किया.
ई20 ईंधन को लेकर मारुति, टाटा और महिंद्रा ने भी उठाए थे सवाल, ई-मेल से चिंताओं का खुलासा
जब से देशभर में 20% एथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल (ई20) को अनिवार्य रूप से लागू किया गया है, तब से वाहनों में खराबी आने के मामले सामने आ रहे हैं. विशेषकर सोशल मीडिया में ई20 पेट्रोल से होने वाले नुकसान की व्यापक चर्चा है. अब पता चला है कि भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग की प्रमुख संस्था ‘एसआईएएम’ (सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स) ने भी 28 जुलाई को सरकार को एक शिकायत पत्र भेजकर ई20 ईंधन में संदूषण (मिलावट और अशुद्धि) की बात उठाई थी. लेकिन केंद्र सरकार ने जैसे हि ई20 ईंधन के सुरक्षित होने का आश्वासन दिया, इसके तुरंत बाद एसआईएएम ने अपना पत्र वापस ले लिया और कहा कि डेटा को और अधिक “प्रमाणीकरण” और जांच की आवश्यकता है.
‘रॉयटर्स’ द्वारा देखे गए आंतरिक ई-मेल और अप्रकाशित डेटा से यह खुलासा हुआ कि भारत के कार बाजार में 67% हिस्सेदारी रखने वाली तीन प्रमुख कंपनियों—मारुति सुजुकी, टाटा मोटर्स और महिंद्रा—ने आपस में इस मुद्दे पर गंभीर चिंता जताई थी.
अदिति शाह और आदित्य कालरा के अनुसार, कार निर्माताओं ने 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पेट्रोल पंपों से 250 से अधिक ईंधन नमूने एकत्र कर परीक्षण किया था. 18 राज्यों के नमूनों में क्लोराइड की मात्रा सरकारी मानक 3 पीपीएम की तुलना में बेहद चिंताजनक पाई गई. राजस्थान (6-570 पीपीएम), दिल्ली (1.4-420 पीपीएम) और महाराष्ट्र (10-357 पीपीएम) में इसका स्तर बहुत अधिक दर्ज किया गया. आंध्र प्रदेश (13,000 पीपीएम) और उत्तर प्रदेश (12,500 पीपीएम) में नमी का स्तर सरकारी सीमा 3,000 पीपीएम से कई गुना अधिक मिला.
उद्योग विशेषज्ञों एवं अधिकारियों ने निजी संचार में यह स्पष्ट किया था क्लोराइड से पुर्जों में जंग लगती है, जबकि मारुति के अधिकारियों के अनुसार वर्तमान फ्यूल इंजेक्टर्स केवल 1 पीपीएम तक ही क्लोराइड सहन कर सकते हैं.
महिंद्रा के वरिष्ठ इंजीनियर के अनुसार ऑर्गेनिक क्लोराइड वाहनों के इंजन को महज 200 किमी के भीतर खराब कर सकता है और ईंधन भरवाने के तुरंत बाद वाहन ठप होने का मुख्य कारण यही है. अंडरग्राउंड स्टोरेज टैंकों और पाइपलाइनों के खराब रखरखाव के कारण नमी ईंधन में मिल रही है, जिससे वाहन अचानक बंद हो जाते हैं.
हालांकि पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी का कहना है कि तेल विपणन कंपनियों ने कड़ा परीक्षण किया है और मिलावट के केवल 4 मामले पाए गए हैं. सरकार का दावा है कि स्थिति पूरी तरह सामान्य है और घबराने की कोई बात नहीं है.
‘एसआईएएम’ ने पत्र वापसी का कारण नमूनों का छोटा आकार और डेटा का अनधिकृत/प्राथमिक होना बताया. महिंद्रा ने ई-मेल से निकाले गए निष्कर्षों को निराधार और गलत करार दिया, जबकि मारुति और टाटा ने इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की.
हरकारा डीप डाइव
श्रवण गर्ग | ये सरकार सच का सामना करने से डर रही है
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी के साथ वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग चर्चा कर रहे हैं संसद के मानसून सत्र के उस अंत की, जिसमें सरकार और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी मांगों के साथ खड़े रहे, लेकिन संसद में सार्थक कामकाज नहीं हो सका. अब संसद का सत्र खत्म हो चुका है और देश की नजर 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन पर है. सवाल यह है कि मोदी इस बार देश से क्या कहेंगे?
श्रवण गर्ग इस पूरे घटनाक्रम को एक ऐसे राजनीतिक “सीरियल” की तरह देखते हैं, जिसका पहला हिस्सा संसद के भीतर खत्म हुआ, लेकिन जिसकी कहानी 15 अगस्त को लाल किले से आगे बढ़ेगी. उनके मुताबिक, संसद के अंतिम दिन गृह मंत्री अमित शाह सदन में आए जरूर, लेकिन जिस बयान की विपक्ष मांग कर रहा था, वह नहीं आया. कुछ ही मिनटों में वंदे मातरम के साथ सदन की कार्यवाही समाप्त हो गई. ऐसे में सवाल यह है कि अगर अमित शाह संसद में अपना पक्ष नहीं रख पाए, तो अब प्रधानमंत्री के पास क्या विकल्प बचा है?
श्रवण गर्ग के मुताबिक, प्रधानमंत्री के सामने सबसे बड़ी दुविधा यही है कि वे 20 जुलाई के बाद छात्रों और आंदोलन से जुड़े मुद्दे पर सोशल मीडिया के जरिए जिस मेल-मिलाप की भाषा बोलते रहे हैं, उसे 15 अगस्त के भाषण में आगे बढ़ाएं या फिर गृह मंत्रालय और सरकार के रुख का बचाव करें. अगर प्रधानमंत्री अमित शाह के रुख को दोहराते हैं तो इसका संदेश सरकार और गृह मंत्रालय के बचाव के तौर पर जाएगा. लेकिन अगर वे उससे दूरी बनाते हैं, तो सरकार के भीतर उसकी अपनी राजनीतिक कीमत हो सकती है.
यही वह जगह है जहां श्रवण गर्ग प्रधानमंत्री के लिए सबसे बड़ा संकट देखते हैं. छात्र आंदोलन, पुलिस कार्रवाई, पैलेट गन के इस्तेमाल और गिरफ्तारियों को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है. वहीं सरकार के कई मंत्री इन आरोपों को खारिज कर चुके हैं. ऐसे में प्रधानमंत्री के सामने यह सवाल भी रहेगा कि वे अपने मंत्रियों के बयानों का समर्थन करेंगे या उनसे अलग कोई नई लाइन रखेंगे.
लेकिन 15 अगस्त का भाषण केवल मौजूदा विवादों तक सीमित नहीं होगा. श्रवण गर्ग पिछले साल के लाल किले के भाषण को भी कसौटी मानते हैं. पिछले वर्ष प्रधानमंत्री ने 2047 के भारत का रोडमैप, ऑपरेशन सिंदूर, राष्ट्रीय सुरक्षा, आत्मनिर्भर भारत, आर्थिक सुधार और रोजगार जैसे मुद्दों पर बड़े ऐलान किए थे. अब सवाल यह है कि एक साल बाद उन घोषणाओं का कितना हिस्सा जमीन पर दिखाई देता है.
श्रवण गर्ग का सुझाव है कि इस बार प्रधानमंत्री के भाषण को केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि पिछले साल किए गए वादों की स्थिति से जोड़कर देखना चाहिए. क्या नई घोषणाओं से पहले पुरानी घोषणाओं का हिसाब दिया जाएगा? क्या प्रधानमंत्री देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों पर बात करेंगे या फिर एक बार फिर राजनीतिक विवादों को अपने इर्द-गिर्द केंद्रित कर देंगे?
और अंत में सबसे बड़ा सवाल यही है कि 15 अगस्त को लाल किले पर खड़े नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में देश से बात करेंगे या अपनी सरकार के संकट का जवाब देंगे? यही भाषण इस समय सबसे ज्यादा इंतजार और राजनीतिक जिज्ञासा का विषय बना हुआ है.
मोदी के 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के वादे का क्या हुआ?
‘स्क्रोल’ में प्रकाशित शोएब दानियाल का यह लेख मोदी सरकार के उस लंबे समय से किए जा रहे 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के वादे की पड़ताल करता है, जिसकी समय-सीमा बार-बार बदली गई और जिसके बावजूद भारत अभी तक 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था तक भी नहीं पहुंचा है.
पिछले सप्ताह केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में कहा कि भारत का सकल घरेलू उत्पाद 2029 में 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा.
यह एक सामान्य अनुमान है, जो चक्रवृद्धि वृद्धि की साधारण गणना पर आधारित है. करीब 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के रूप में भारत बढ़ रहा है, इसलिए किसी न किसी दिन 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचना स्वाभाविक है. लेकिन अधिकांश भारतीयों के लिए “5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था” शब्द सुनना एक असहज déjà vu जैसा है. मोदी युग में यह एक ऐसे राजनीतिक जुमले की तरह इस्तेमाल हुआ है, जिसका उद्देश्य अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति से ध्यान हटाना रहा है.
जैसे कोई माता-पिता बच्चे का गुस्सा शांत करने के लिए भविष्य में कोई मनपसंद चीज देने का वादा करते हैं, उसी तरह मोदी सरकार बार-बार भारतीयों के सामने 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य रखती रही, लेकिन इसे हासिल करने का तरीका स्पष्ट नहीं किया. और जब तय समय-सीमा बीत गई, तब भी कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया.
बड़े-बड़े दावे
2018 की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच पर वादा किया था कि भारत 2025 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाएगा. उसी वर्ष सरकार ने 2025 तक इस लक्ष्य को हासिल करने की रूपरेखा तैयार करने के लिए एक कार्यसमूह गठित करने की बात कही.
2019 में मोदी ने समय-सीमा और आगे कर दी. ब्राजील में ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान उन्होंने कहा कि भारत 2024 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाएगा. सरकार के आर्थिक मॉडल में अचानक यह बदलाव क्यों आया, इसकी कोई स्पष्ट व्याख्या नहीं की गई.
2020-21 वित्त वर्ष स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे खराब आर्थिक वर्ष रहा. केंद्र सरकार के कठोर और अव्यवस्थित कोविड लॉकडाउन के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था 7 प्रतिशत से अधिक सिकुड़ गई. कोविड के दौरान किसी अन्य बड़ी अर्थव्यवस्था को भारत जितना नुकसान नहीं हुआ.
इसके बावजूद 5 ट्रिलियन डॉलर के वादे पर कोई असर नहीं पड़ा. 2022 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि भारत 2025 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाएगा. कुछ महीने बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी साइप्रस में यही लक्ष्य दोहराया.
फिर 2025 की समय-सीमा वास्तव में आ गई और भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था नहीं बन पाया. सरकार ने इस विफलता को लगभग नजरअंदाज कर दिया.
विशेषज्ञ उस समय ही मोदी सरकार के इन दावों को अव्यावहारिक बता चुके थे.
भ्रम पैदा करने की राजनीति
इसके बावजूद सरकार ने 5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य का इस्तेमाल बंद नहीं किया. 2025 में प्रधानमंत्री मोदी ने इस लक्ष्य का उल्लेख तो किया, लेकिन कोई निश्चित समय-सीमा देने के बजाय कहा कि भारत के 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का “दिन दूर नहीं है”.
धीरे-धीरे सरकार ने इस लक्ष्य पर जोर कम कर दिया और एक नए लक्ष्य की बात शुरू कर दी. अब लक्ष्य 2047 तक 35 ट्रिलियन डॉलर की “पूर्ण विकसित अर्थव्यवस्था” बनना है. इतनी दूर की समय-सीमा पिछले 5 ट्रिलियन डॉलर वाले वादे की तरह तत्काल जवाबदेही के जोखिम को खत्म कर देती है.
5 ट्रिलियन डॉलर की पूरी कहानी भारतीय राजनीति पर एक तरह का व्यंग्य है. लेकिन यह मोदी की राजनीतिक रणनीति और भारतीय अर्थव्यवस्था के निकट भविष्य के बारे में महत्वपूर्ण संकेत भी देती है.
पहली बात, सरकार बड़े वादों में विश्वास करती है. संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के दौर के बाद मोदी ने भारत को बदलने का वादा करके लोकप्रियता हासिल की. “अच्छे दिन” इसका सबसे बड़ा नारा था. मनमोहन सिंह सरकार के कथित ठहराव के विपरीत मोदी को बेहतर भविष्य देने वाले नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया.
दूसरी समस्या सवालों और सार्वजनिक दबाव की कमी रही. अनुकूल मीडिया माहौल में सरकार के अवास्तविक लक्ष्यों पर गंभीर सवाल नहीं उठाए गए. वर्षों तक मोदी सरकार को अर्थव्यवस्था की एक भ्रामक तस्वीर पेश करने की अनुमति मिली.
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि के आंकड़ों पर भी सवाल उठाए गए हैं. इन कथित गणना संबंधी समस्याओं के बावजूद भारत की आर्थिक रैंक पिछले वर्ष के चौथे स्थान से गिरकर छठे स्थान पर पहुंच गई है. मंगलवार को सरकार ने संसद में बताया कि भारत की अर्थव्यवस्था 3.92 ट्रिलियन डॉलर की है. यानी 5 ट्रिलियन डॉलर तो दूर, भारत अभी 4 ट्रिलियन डॉलर तक भी नहीं पहुंचा है.
सरकार और उसके समर्थकों ने अपने अनुमानों और वास्तविकता के बीच अंतर के लिए रुपये और डॉलर की विनिमय दर को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की है. लेकिन यह तर्क अपने आप में गोल-गोल घूमता है. रुपये का कमजोर होना भी भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरी का संकेत है, क्योंकि विदेशी निवेशकों द्वारा देश से पैसा निकालना इसके पीछे एक प्रमुख कारण है.
जनता का बढ़ता गुस्सा
मोदी के लिए बुरी खबर यह है कि बड़े आर्थिक लक्ष्यों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का दौर शायद खत्म हो रहा है. मोदी के तीसरे कार्यकाल में उनके अपने शहरी और शिक्षित समर्थकों के बीच भी महत्वपूर्ण असंतोष दिखाई दिया है. यह पहले ऑनलाइन सामने आया और फिर तथाकथित कॉकरेच स्ट्रीट प्रदर्शनों में दिखाई दिया.
इससे भी बड़ी चुनौती भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के विस्तार से पैदा हो रही है. भारत का सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र गंभीर खतरे में है, क्योंकि उद्योग में किए जाने वाले कई दोहराव वाले काम अब जनरेटिव एआई से किए जा सकते हैं. इस क्षेत्र में करीब 60 लाख लोग काम करते हैं और यह सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 7 प्रतिशत योगदान देता है.
और चिंता की बात यह है कि भारत के पास पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा तंत्र भी नहीं है. मोदी सरकार की विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने की कोशिश इतनी सफल नहीं रही कि उनके कार्यकाल में जीडीपी में विनिर्माण की हिस्सेदारी वास्तव में घट गई है.
भारतीय अभी भी दुनिया के सबसे गरीब लोगों में शामिल हैं. देश की प्रति व्यक्ति जीडीपी निचले स्तर पर बनी हुई है और श्रीलंका तथा बांग्लादेश जैसे छोटे पड़ोसी देशों से भी पीछे है. झारखंड में जारी छात्र आंदोलनों से भी स्पष्ट है कि विपक्ष के पास भारत की आर्थिक समस्याओं की गहराई का समाधान पेश करने के लिए फिलहाल बहुत कम जवाब हैं.
5 ट्रिलियन डॉलर के अनुमान और वास्तविकता के बीच मौजूद बड़ा अंतर नरेंद्र मोदी और उनके समर्थकों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए. लेकिन यह सभी भारतीयों के लिए भी चिंता की बात है.
वीवीपी शर्मा | कॉकरोच और पंडित की क्रिस्टल बॉल
इस बात में कुछ लगभग छू लेने वाला है कि सम्मानित राजनीतिक विश्लेषण की दुनिया ने इतनी बेचैनी के साथ यह पूछना शुरू कर दिया है कि कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी आखिर जा कहां रही है. सीजेपी को अभी यह समझने का समय भी नहीं मिला है कि वह आखिर है क्या, और उससे पहले ही बड़े-बुजुर्ग यह समझाने के लिए जमा हो गए हैं कि उसे क्या बनना चाहिए.
11 अगस्त के एक ही समाचार चक्र में उसी अखबार में प्रकाशित तीन लेख इस सवाल तक अलग-अलग रास्तों से पहुंचे. द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में सीपी सुरेंद्रन ने 1968 के पेरिस की ओर लौटते हुए सुझाव दिया कि पारंपरिक राजनीति से बाहर का कोई आंदोलन, किसी संगठित पार्टी के नेतृत्व वाले अभियान से कहीं आगे जा सकता है. द टाइम्स ऑफ इंडिया में सयंतन घोष ने पूछा कि कॉकरोच को झाड़ू क्यों अपनानी चाहिए. वहीं, इसी अखबार में एन्नापदम एस कृष्णमूर्ति ने बड़ा सवाल उठाया: “उपज के बाद क्या होता है?”
इनके तर्क अलग हैं, लेकिन इन सबकी एक साझा धारणा चौंकाने वाली है: सीजेपी को जल्द ही अपनी राजनीतिक पहचान और, बेहतर हो तो, अपनी मंजिल घोषित कर देनी चाहिए. सवाल उचित है, लेकिन यह अधीरता उचित नहीं है.
सीजेपी ने राजनीतिक दल बने बिना ही राजनीतिक सक्रियता का प्रदर्शन कर दिया है. उसने हजारों युवाओं को लामबंद किया, 36 दिनों तक आंदोलन चलाया, कई रियायतें हासिल कीं और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का रास्ता बनाया. इसके बाद उसने अपने आंदोलन को मूल परीक्षा संबंधी मुद्दे से आगे ले जाने की बात शुरू कर दी है. दीपके ने ग्रामीण सरकारी स्कूलों पर केंद्रित राष्ट्रव्यापी अभियान की घोषणा की है, जिसकी शुरुआत 15 अगस्त को महाराष्ट्र के हिंगोली स्थित उनके गांव से होगी. इसमें कार्यकर्ता अभिभावकों से बुनियादी सुविधाओं का सोशल ऑडिट करने और स्थानीय नेताओं से उन्हें बेहतर बनाने की जिम्मेदारी लेने को कहेंगे.
यह राजनीति है. बस यह पार्टी वाली राजनीति नहीं है.
यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक मौन धारणा दिखाई देती है कि “पार्टी नहीं” होना महज एक अस्थायी अवस्था है. किसी आंदोलन को कुछ हफ्तों, शायद कुछ महीनों तक पारंपरिक राजनीति से बाहर रहने की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन आखिरकार उससे उम्मीद की जाती है कि वह बड़ा होकर किसी पहचाने जाने योग्य रूप में बदल जाए: भाजपा, कांग्रेस, वामपंथ, कोई नई पार्टी, एनजीओ, दबाव समूह या किसी और का मोर्चा.
क्यों?
सुरेंद्रन का यह देखना सही है कि खुद को राजनीतिक दल न मानने वाले आंदोलन में एक अलग तरह की राजनीतिक ताकत हो सकती है. उनका यह कहना उपयोगी है कि सीजेपी का “राजनीतिक बनने से इनकार” उसकी राजनीतिक ताकत का कारण हो सकता है, हालांकि इस वाक्य में एक जरूरी संशोधन होना चाहिए. सीजेपी ने राजनीति से इनकार नहीं किया है. उसने कम से कम अभी तक राजनीति के उस संस्थागत रूप को स्वीकार नहीं किया है, जिसके जरिए हम राजनीति को पहचानने के आदी हैं.
यही बात इसे दिलचस्प बनाती है और यही वजह है कि पहले के आंदोलनों से इसकी तुलना को संभावना के रूप में देखना चाहिए, भविष्यवाणी के रूप में नहीं. सुरेंद्रन की पेरिस 1968 वाली तुलना निरर्थक नहीं है. सोरबोन का विद्रोह छात्रों द्वारा शैक्षणिक सत्ता और पुलिस दमन को चुनौती देने से शुरू हुआ, फिर एक बड़े सामाजिक टकराव में बदल गया और अपने शुरुआती विश्वविद्यालयी दायरे से कहीं आगे निकल गया. सीजेपी से इसमें कुछ समानता जरूर है.
लेकिन यह समानता साबित क्या करती है? बहुत कम, जब तक हम ज्यादा सटीक सवाल न पूछें. पेरिस 1968 इस बात का एक उदाहरण है कि छात्र आंदोलन किस तरह विकसित हुआ. वह ऐसा रेलवे टाइमटेबल नहीं है, जो दिल्ली 2026 को बता दे कि आगे क्या होगा. सुरेंद्रन लिखते हैं कि “राजनीतिक न होने वाला आंदोलन अंततः बिखर गया, जैसा कि सीजेपी के साथ भी हो सकता है.” यहां महत्वपूर्ण शब्द है “हो सकता है.”
भारत खुद इसके कई संभावित रास्ते दिखाता है. जेपी आंदोलन छात्र असंतोष से निकलकर एक बहुत बड़ी राजनीतिक चुनौती में बदल गया. अन्ना हजारे आंदोलन ने एक नए राजनीतिक संगठन को जन्म देने में मदद की. निर्भया आंदोलन ने दिखाया कि बड़े पैमाने पर जन लामबंदी बिना राजनीतिक दल बने भी बड़े संस्थागत परिणाम हासिल कर सकती है. वहीं किसान आंदोलन ने यह साबित किया कि कोई बड़ा जनआंदोलन राजनीतिक दल बने बिना भी ठोस नीतिगत बदलाव हासिल कर सकता है.
इन उदाहरणों से सबक यह नहीं निकलता कि सीजेपी इनमें से किसी एक का रास्ता अपनाएगा. सबक यह है कि आंदोलनों का कोई पहले से तय भविष्य नहीं होता.
यहीं कृष्णमूर्ति का सवाल “उपज के बाद क्या होता है?” इस सवाल से ज्यादा उपयोगी हो जाता है कि सीजेपी राजनीतिक दल बनेगा या नहीं. किसी मंत्री का इस्तीफा और कुछ मांगों की स्वीकृति किसी आंदोलन की जिंदगी तय नहीं करती. असली कठिन सवाल तत्काल शिकायत की गर्मी कम होने के बाद शुरू होते हैं.
क्या सीजेपी लोगों को लगातार जोड़े रख सकता है? क्या वह विरोध की ऊर्जा को लंबे समय तक चलने वाली नागरिक कार्रवाई में बदल सकता है? क्या वह अपने भीतर मतभेदों को जगह दे सकता है? क्या वह उस शहरी, शिक्षित युवा वर्ग से आगे बढ़ सकता है जिसने उसे शुरुआती ताकत दी? और जैसे-जैसे वह बड़ा होगा, क्या उसका नेतृत्व उस प्रतिष्ठान का एक और रूप बनने से बच सकेगा, जिसे उसने चुनौती देने के लिए शुरुआत की थी?
ये गंभीर सवाल हैं. इनमें से किसी का जवाब हमें आज ही जानना जरूरी नहीं है.
ज्यादातर टिप्पणीकारों के साथ बड़ी समस्या यह है कि वे सीजेपी के संगठनात्मक स्वरूप पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, जबकि उस भौतिक और सामाजिक वास्तविकता पर कम, जिसने इसे जन्म दिया.
आइए इसे स्वीकार करें: इस आंदोलन ने युवाओं का संकट पैदा नहीं किया, लेकिन उसने उस संकट को व्यक्त करने के लिए एक भाषा जरूर खोज ली.
अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026 रिपोर्ट युवाओं, खासकर स्नातक युवाओं में बेहद ऊंची बेरोजगारी की ओर इशारा करती है और बताती है कि यह समस्या दशकों से बनी हुई है. इससे सीजेपी को महज एक चतुर डिजिटल प्रयोग या किसी पीढ़ीगत फैशन के रूप में खारिज करना मुश्किल हो जाता है. इसके हास्य के पीछे परीक्षा की असुरक्षा, पेशेवर शिक्षा के लिए जबरदस्त प्रतिस्पर्धा, बेरोजगारी, ठहरी हुई आकांक्षाएं, संस्थानों के प्रति अविश्वास और उस अजीब निराशा की कहानी है, जिसमें व्यक्ति तय रास्ते स्कूल, कोचिंग, डिग्री, परीक्षा, आवेदन पर चलता हुआ आखिरकार यह पाता है कि कतार जिंदगी से भी लंबी हो गई है. हास्य उस घाव की ओर इशारा करता है, जिसने इसे जन्म दिया.
इसीलिए घोष का “झाड़ू” वाला सवाल गंभीरता से लिया जाना चाहिए, लेकिन शाब्दिक अर्थ में नहीं. राजनीतिक आंदोलनों को अक्सर अपने भीतर समाहित किया जाता है, उनका इस्तेमाल किया जाता है या उन्हें नियंत्रित कर लिया जाता है. स्थापित राजनीतिक दल उन्हें अपना बनाने की कोशिश करेंगे. वे अपने प्रतिनिधियों को उनके मंचों पर भेजेंगे, समर्थन की पेशकश करेंगे, बयान जारी करेंगे, तस्वीरें खिंचवाएंगे और अंततः यह पता लगा लेंगे कि वे तो हमेशा से इस आंदोलन के समर्थन में थे.
लेकिन राजनीतिक संपर्क की संभावना और राजनीतिक कब्जे में अंतर है. युवा किसी एआईएसए कार्यकर्ता की बात सुन सकते हैं, बिना एआईएसए बने. वे किसी कांग्रेस नेता से बात कर सकते हैं, बिना कांग्रेस में शामिल हुए. वे वामपंथ से समर्थन स्वीकार कर सकते हैं और अगले ही दिन वामपंथ से असहमति जता सकते हैं. वे भाजपा की किसी बात की प्रशंसा कर सकते हैं और भाजपा को खारिज कर सकते हैं. वे सबकी बात सुन सकते हैं और किसी के साथ न जुड़ें.
वर्गीकरण की यह मानसिकता इस संभावना को शायद विशेष रूप से असहज मानती है.
राजनीतिक दलों के लिए “ये किसके लोग हैं?” पूछना रणनीतिक रूप से जरूरी है. पत्रकारों के लिए संबद्धताओं और फंडिंग की जांच करना पूरी तरह जायज है. आंदोलनों के साथ हेरफेर हो सकता है, उन्हें अपने भीतर समाहित किया जा सकता है और मासूम दिखने वाली भाषा के पीछे कुछ और छिपा हो सकता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर नई राजनीतिक घटना को तुरंत किसी परिचित वैचारिक खांचे में डाल दिया जाए.
काफ्का इस प्रक्रिया को पहचान लेते. यहां उनकी प्रासंगिकता ग्रेगर साम्सा के कीड़े में बदल जाने में नहीं, बल्कि उस नौकरशाही वाले दुःस्वप्न में है, जिसमें किसी इंसान के भीतर क्या घट रहा है, यह पूछे बिना ही उसे किसी श्रेणी में बदल दिया जाता है. सीजेपी ने अपना राजनीतिक इतिहास बनाने से पहले ही एक राजनीतिक पहचान हासिल कर ली है और बहुत-सी टिप्पणियां पहले से ही उस पहचान को भविष्यवाणी में बदल देना चाहती हैं.
यहीं राजी कोठारी का “नॉन-पार्टी पॉलिटिकल प्रोसेस” का विचार उपयोगी हो जाता है. 1984 में लिखते हुए कोठारी ने जन आंदोलनों को ऐसे प्रयासों के रूप में देखा था, जो “पार्टी और सरकार के सामान्य क्षेत्रों से बाहर वैकल्पिक राजनीतिक स्थान” खोलने की कोशिश करते हैं. दूसरे शब्दों में, ऐसे आंदोलनों का महत्व जरूरी नहीं कि सत्ता पर कब्जा करने की उनकी क्षमता में हो. राजनीतिक सक्रियता लामबंदी, जनदबाव, संस्थागत जवाबदेही और नई राजनीतिक भाषा के निर्माण के जरिए भी काम कर सकती है.
सुरेंद्रन खुद एक और दिलचस्प बात कहते हैं कि सीजेपी ने “एंटी-नेशनल” शब्द के “सिमेंटिक जूरिस्डिक्शन” को बदल दिया है. आखिरकार यह बदलाव शायद इस बात से ज्यादा महत्वपूर्ण साबित हो सकता है कि सीजेपी कभी चुनाव लड़ेगा या नहीं. आंदोलन सिर्फ तब महत्वपूर्ण नहीं होते जब वे सीटें जीतते हैं या सरकारें गिराते हैं. वे इस बात को बदल सकते हैं कि क्या कहा जा सकता है, कौन बोल सकता है, किन संस्थानों को चुनौती दी जा सकती है और कौन-सी राजनीतिक श्रेणियां अब काम नहीं करतीं.
इसलिए सवाल यह नहीं है कि सीजेपी आखिरकार क्या बनेगा, बल्कि यह है कि क्या वह उस राजनीतिक स्थान को बनाए रख सकता है, जिसे उसने पहले ही खोल दिया है.
यह एक राजनीतिक दल बन सकता है. यह बिखर सकता है, किसी के साथ समाहित हो सकता है, खत्म हो सकता है या एक दबाव समूह के रूप में बना रह सकता है. यह ऐसी चीज भी बन सकता है, जिसके लिए हमारे पास अभी कोई सुविधाजनक नाम नहीं है. मुद्दा यह है कि हमें आज ही यह तय करने की जरूरत नहीं है कि इनमें से कौन-सा रास्ता चुना जाएगा.
किसी आंदोलन को अपना राजनीतिक वर्तमान जीने की अनुमति होनी चाहिए, उससे यह मांग नहीं की जानी चाहिए कि वह तत्काल अपना राजनीतिक भविष्य भी पेश करे.
इस बात में कुछ खासा काफ्काईपन है कि एक कॉकरोच से उसके अंतिम रूप के बारे में तब स्पष्टीकरण मांगा जा रहा है, जब वह अभी रेंगना ही शुरू हुआ है.
वीवीपी शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह लेख उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.
विरोध स्थलों पर पुलिस की चेहरे पहचानने वाली तकनीक के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई को तैयार
स्क्रोल के मुताबिक, माकपा सांसद ए.ए. रहीम ने विरोध-प्रदर्शन स्थलों पर पुलिस द्वारा चेहरे की पहचान और अन्य जैवमेट्रिक निगरानी उपकरणों के इस्तेमाल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. याचिका में आरोप है कि प्रदर्शनकारियों का डेटा एकत्र कर सुरक्षित रखना डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम का उल्लंघन है.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका को दिल्ली के युवा प्रदर्शनों से जुड़ी अन्य याचिकाओं के साथ जोड़ दिया. ये प्रदर्शन प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, खासकर नीट से जुड़े मुद्दों को लेकर हुए थे.
20 जुलाई को संसद की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने लाठीचार्ज, आंसू गैस और पेलेट गन का इस्तेमाल किया था, जिसमें कई लोग घायल हुए. इसके बाद आंदोलन देश के कई हिस्सों में फैल गया.
रहीम की याचिका में पुलिस निगरानी के लिए इस्तेमाल हो रही तकनीक की वैधता, नागरिकों की निजता और प्रदर्शन के अधिकार से जुड़े सवाल उठाए गए हैं.
‘अब सरकार हमारी बात सुनती है’: बजरंग दल मुंबई के स्वतंत्र चर्चों पर हमले तेज कर रहा है
श्रीनाथ राव ने ‘आर्टिकल 14’ में प्रकाशित अपने लेख में लिखा है कि मार्च से अगस्त 2026 के बीच मुंबई और आसपास के इलाकों में बजरंग दल तथा उससे जुड़े हिंदुत्ववादी संगठनों ने छोटे स्वतंत्र चर्चों की प्रार्थना सभाओं को बार-बार बाधित किया और उन पर जबरन धर्मांतरण के आरोप लगाए. उनके मुताबिक, इस दौरान कम से कम 14 ऐसी घटनाएं सामने आईं, जबकि मुंबई और वसई पुलिस ने चर्च के पादरियों और सदस्यों के खिलाफ चार एफआईआर दर्ज कीं. इनमें से अधिकांश मामले महाराष्ट्र के अंधविश्वास और काला जादू विरोधी कानून के तहत दर्ज किए गए, क्योंकि जबरन धर्मांतरण को अपराध बनाने वाला महाराष्ट्र का कानून 30 जुलाई 2026 को लागू हुआ.
19 जुलाई को मुंबई के मारोल इलाके में बजरंग दल के करीब 20 कार्यकर्ताओं ने एक होटल में हो रही असेंबली ऑफ बिलीवर्स चर्च की प्रार्थना सभा के बाहर प्रदर्शन किया. कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि वहां हिंदुओं का धर्मांतरण कराया जा रहा है और पुलिस से सभा रुकवाने की मांग की. पुलिस के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर एक बाइक सवार, ऑटो रिक्शा और घटनाक्रम रिकॉर्ड कर रहे एक पादरी के साथ मारपीट की. बाद में पांच बजरंग दल कार्यकर्ताओं और 20-25 अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई.
अप्रैल से बजरंग दल लगभग हर रविवार को मुंबई और वसई में होने वाली प्रार्थना सभाओं को निशाना बना रहा है. संगठन सोशल मीडिया पर सभाओं की जानकारी हासिल कर वहां पहुंचता है और पुलिस को कथित धर्मांतरण की शिकायत करता है. कई चर्च स्कूलों, कॉलेजों, बैंक्वेट हॉल और किराए के अन्य स्थानों पर प्रार्थना सभाएं करते हैं.
विवाद का एक प्रमुख कारण ईसाई प्रार्थनाओं में होने वाली ‘हीलिंग’ यानी उपचार की प्रार्थनाएं हैं. बजरंग दल का आरोप है कि इन प्रार्थनाओं के जरिए बीमारियों को ठीक करने के नाम पर हिंदुओं का धर्मांतरण कराया जाता है. चर्च से जुड़े लोगों का कहना है कि ये सामान्य धार्मिक प्रार्थनाएं हैं और किसी दूसरे धर्म को अपमानित करने का उद्देश्य नहीं होता.
12 अप्रैल को वसई में बजरंग दल कार्यकर्ताओं ने मसिह एकता फाउंडेशन की प्रार्थना सभा में प्रवेश किया, जिसके दौरान झड़प हुई. पुलिस ने पादरी रवि गुप्ता पर हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने और छूकर बीमारी ठीक करने के दावे करने का मामला दर्ज किया, जबकि एक चर्च कर्मचारी की शिकायत पर बजरंग दल के दो सदस्यों के खिलाफ भी मामला दर्ज हुआ. इसके बाद फाउंडेशन ने वसई में अपनी प्रार्थना सभाएं बंद कर दीं.
10 मई को मालाड में एक स्कूल में प्रार्थना सभा को लेकर भी मामला दर्ज हुआ. बाद में महाराष्ट्र के गृह राज्य मंत्री पंकज भोयर ने विधानसभा में बताया कि पुलिस जांच में जबरन धर्मांतरण का कोई सबूत नहीं मिला.
जून में घाटकोपर में इमैनुएल वर्शिप मिनिस्ट्री की सभा में भी बजरंग दल कार्यकर्ता पहुंचे. पुलिस ने चार लोगों पर अंधविश्वास फैलाने का मामला दर्ज किया. चर्च के सहायक पादरी अर्जुन चव्हाण ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि प्रार्थना के दौरान किसी को बीमारी ठीक होने का दावा करके धर्म बदलने के लिए मजबूर नहीं किया जाता.
28 जून को सांताक्रूज ईस्ट में पुलिस द्वारा शिकायत दर्ज करने से इनकार करने के बाद बजरंग दल ने पुलिस पर ही पक्षपात का आरोप लगाया और एक सप्ताह के भीतर कार्रवाई नहीं होने पर चर्च के बाहर हनुमान चालीसा पढ़ने की चेतावनी दी. स्थानीय चर्च नेताओं के अनुसार, लगातार घटनाओं के कारण दो सप्ताह तक प्रार्थना सभाएं रोकनी पड़ीं और बाद में पुलिस सुरक्षा में उन्हें फिर शुरू किया गया.
12 जुलाई को भाजपा की मुंबई पार्षद सीमा शिंदे समर्थकों के साथ बोरीवली ईस्ट के एक कॉलेज में चल रही प्रार्थना सभा में पहुंचीं. उन्होंने धर्मांतरण के आरोप लगाते हुए पुलिस से एफआईआर की मांग की. हालांकि, एक पुलिस अधिकारी के अनुसार, कथित धर्मांतरण के लिए प्रलोभन दिए जाने का कोई प्रमाण सामने नहीं आया.
9 अगस्त को भयंदर में भी बजरंग दल और सकल हिंदू समाज के कार्यकर्ताओं ने प्रार्थना सभा बाधित करने की कोशिश की. पुलिस ने कहा कि उसे जबरन धर्मांतरण का कोई सबूत नहीं मिला और स्थिति गलतफहमी के कारण तनावपूर्ण हुई थी. इसके बाद शांति भंग करने के आरोप में हिंदुत्ववादी समूह के सदस्यों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई.
रिपोर्ट के मुताबिक, लगातार घटनाओं ने मुंबई के छोटे चर्चों और ईसाई समुदाय में भय पैदा किया है. कई चर्चों ने सुरक्षा बढ़ा दी है, नए सदस्यों की पहचान जांचने, रजिस्टर रखने और सीसीटीवी लगाने जैसे कदम उठाए हैं. कुछ चर्चों के लिए लगातार विरोध के कारण प्रार्थना के लिए किराए का स्थान मिलना भी मुश्किल हो रहा है.
मुंबई फॉर पीस समेत नागरिक संगठनों ने पुलिस को ज्ञापन देकर आरोप लगाया है कि बजरंग दल की गतिविधियों पर निष्क्रियता ने उसे और अधिक आक्रामक होने का हौसला दिया है. वहीं, बजरंग दल से जुड़े निलेश सिंह ने कहा कि संगठन अब कथित धर्मांतरण के खिलाफ कानूनी रास्ता अपनाता है. उनके शब्दों में, “अब सरकार हमारी बात सुनती है.”
रिपोर्ट में पुलिस और चर्च प्रतिनिधियों के बयानों से यह सवाल उठता है कि जबरन धर्मांतरण के ठोस प्रमाण नहीं मिलने के बावजूद धार्मिक सभाओं में बार-बार हस्तक्षेप और आरोपों का सिलसिला क्यों जारी है. लगातार बढ़ती ऐसी घटनाएं मुंबई में धार्मिक स्वतंत्रता, पुलिस की भूमिका और अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती हैं.
श्रीनाथ राव मुंबई में स्वतंत्र पत्रकार और लेखक हैं.
कहानी का प्लॉट खो गया: कैसे भगवा पार्टी के माहिर कहानीकारों के पास कहानी खत्म हो गई
निहार नलिनी सारंगी के मुताबिक, हर प्रभुत्वशाली राजनीतिक मशीन के सामने आखिरकार एक ही संरचनात्मक समस्या आती है: जिन औजारों ने उसका प्रभुत्व बनाया, वे जरूरी नहीं कि उसे बनाए रखने के लिए भी काम आएं. पिछले एक दशक में भारतीय जनता पार्टी का उभार बड़े पैमाने पर नैरेटिव इंजीनियरिंग की उपलब्धि रहा है — यानी हर बातचीत की दिशा तय करने की ऐसी क्षमता, जिसमें विपक्ष पिछली बात का जवाब देना भी पूरा नहीं कर पाता और सत्ता पक्ष अगली कहानी तय कर चुका होता है. अभी जो हो रहा है, वह कोई एक घोटाला या खबरों का कोई एक खराब दौर नहीं है. यह कुछ धीमा है: मशीनरी खुद अपनी गति और ताकत खो रही है. कोई घोटाला मौसम की एक घटना है. लेकिन मशीन का अपनी ताकत खोना एक बीमारी का निदान है.
बिना संपर्क की कमान
पार्टी का मूल नवाचार ऐसा नेता था, जो हर जगह दिखाई देता था और किसी एक व्यक्ति या संस्था के सामने जवाबदेह नहीं दिखता था . रैलियां, एकालाप, चुनिंदा साक्षात्कार, संचार की एकतरफा धारा, जिसे विपक्ष कभी ठीक से बाधित नहीं कर पाया. यह मॉडल एक शर्त पर निर्भर करता है: नेता के पास मंच का नियंत्रण हो. भारतीय लोकतंत्र में संसद वह एक मंच है, जहां उसके पास यह नियंत्रण नहीं है. इसे अपनी सुविधा के हिसाब से तय नहीं किया जा सकता, संपादित नहीं किया जा सकता और न ही बीच में वाक्य अधूरा छोड़कर इससे बाहर निकला जा सकता है.
यही वजह है कि हाल में दिखाई दिया परहेज का पैटर्न संवैधानिक रूप से जिन बैठकों का सामना करना मंत्रियों के लिए जरूरी है, उनसे उनकी अनुपस्थिति और जवाबदेही तब दिखाना, जब राजनीतिक कैलेंडर उसे सुरक्षित बना दे . महज रणनीतिक सावधानी से कहीं अधिक दिखाई देता है. जिस कमरे को ही एकतरफा संवाद की इस मशीन का सामना करने के लिए बनाया गया है, वहीं उसकी मूल कार्यप्रणाली विफल होती नजर आ रही है. आदेश और नियंत्रण की राजनीति किसी प्रसारण पर हावी हो सकती है. लेकिन जिस सदन की बहस को पहले से लिखकर नियंत्रित नहीं किया जा सकता, उसका उसके पास कोई स्वाभाविक जवाब नहीं है.
प्रतीकों की थकान
एक दशक तक पार्टी की सबसे खास राजनीतिक रणनीति यह रही कि विवादित नीतियों को स्थापित पहचान में बदल दिया जाए. विधायी सवाल को राष्ट्रवाद, आस्था और इस सवाल पर जनमत संग्रह में बदल देना कि वास्तव में कौन इस देश का हिस्सा है. यह रूपांतरण तभी तक काम करता है, जब तक वे प्रतीक शासन की सामान्य भ्रष्टताओं से अछूते बने रहें.
मंदिर के इर्द-गिर्द राजनीतिक पहचान बनाना एक बात है. लेकिन उसी संस्था पर लगे कथित चोरी के आरोपों को समझाना दूसरी बात है, जिसे ईमानदारी और पवित्रता का प्रतीक बनाने के लिए खड़ा किया गया था. जब कोई पवित्र प्रतीक रैली के नारे का आधार होने के बजाय संसद में पूछे जाने वाले सवाल का विषय बन जाता है, तो उसकी राजनीतिक उपयोगिता उलट जाती है. वह बहस खत्म नहीं करता, बल्कि बहस शुरू कर देता है.
ऐसा विपक्ष जिसने इंतजार करना सीख लिया
शायद इस राजनीतिक फीकेपन का सबसे कम आंका गया कारण वह नहीं है, जो भाजपा ने किया, बल्कि वह है, जो उसके विरोधियों ने करना बंद कर दिया. वर्षों तक विपक्ष सरकार द्वारा तय किए गए समाचार चक्र पर प्रतिक्रिया देता रहा, जिसका मतलब था कि वह हमेशा उस मशीन से एक कदम पीछे रहता था, जो गति के लिए बनाई गई थी. अब जो बदला है, वह है धैर्य. ऐसा विपक्ष, जो किसी अनुत्तरित सवाल को हफ्तों तक सामने रख सकता है, जो हर सत्र में एक खाली मंत्री की कुर्सी को अपने आप अर्थ पैदा करने देता है, एक अलग खेल खेल रहा है. ऐसा खेल जिसमें तेजी से ज्यादा धैर्य और निरंतरता मायने रखती है.
तेज समाचार चक्र के लिए तैयार की गई नैरेटिव मशीन के पास ऐसे प्रतिद्वंद्वी का कोई स्वाभाविक जवाब नहीं है, जिसने बस धीमा, लगातार और दृढ़ बने रहने का फैसला कर लिया हो. क्षरण, किसी वायरल क्षण की तरह, संदेशों से नहीं रोका जा सकता. उसका मुकाबला केवल इंतजार करके किया जा सकता है और हाल के दिनों में विपक्ष ने साबित किया है कि वह इंतजार करने में बेहतर है.
यह फीका पड़ना क्या नहीं है
इसे भाजपा के अंतिम पतन के रूप में पढ़ना एक गलती होगी और बौद्धिक रूप से आलसी निष्कर्ष भी. भाजपा के पास आज भी ऐसा संगठनात्मक विस्तार, कैडर नेटवर्क और मीडिया तंत्र है, जिसका कोई प्रतिद्वंद्वी मुकाबला नहीं करता. ये फायदे इससे भी कठिन राजनीतिक दौर झेल चुके हैं और यह गंभीर तर्क मौजूद है कि आज का व्यवधान ठीक उसी तरह का शोर है, जिसे पार्टी पहले भी झेल चुकी है और जिसके बाद वह और मजबूत होकर उभरी है. संसदीय गतिरोध भी निष्पक्ष रूप से देखें तो दोतरफा विफलता है वॉकआउट पर आधारित विपक्षी रणनीति की अपनी संस्थागत कीमत है और इसे सिद्धांत के बजाय महज अवरोध के रूप में देखे जाने का अपना जोखिम भी है.
यहां जिस फीकेपन की बात की जा रही है, वह ज्यादा सीमित और सटीक है: यह सत्ता के पतन की बात नहीं है, बल्कि उस एक चीज के स्पष्ट रूप से कमजोर पड़ने की बात है, जिसने इस मशीन को अजेय जैसा महसूस कराया था. हर कहानी को अपनी शर्तों पर खत्म करने की उसकी क्षमता.
असली संकेत
पार्टी के रणनीतिकारों को किसी एक विवाद से नहीं, बल्कि इस बदलाव से चिंतित होना चाहिए कि अब नियंत्रण आखिर कहां है. एक दशक तक भाजपा तय करती थी कि देश किस मुद्दे पर बहस करेगा. मानसून सत्र में पहली बार लंबे समय बाद विपक्ष एजेंडा तय करता दिखाई दिया. उसने सरकार को प्रतिक्रिया देने, हिसाब लगाने और संवाद का ऐसा प्रस्ताव तैयार करने के लिए मजबूर किया, जिसे उस समय रखा जा सके जब उसकी राजनीतिक कीमत सबसे कम हो. शर्तें तय करने के लिए बनी एक मशीन कुछ समय के लिए उन्हीं शर्तों पर प्रतिक्रिया देने तक सीमित हो गई.
यह उलटफेर चाहे जितने समय के लिए हो, असली कहानी यही है. राजनीति में जो व्यक्ति कहानी की शर्तें तय करता है, वह आमतौर पर नतीजे को भी नियंत्रित कर लेता है और एक दशक में पहली बार, कलम भगवा खेमे के हाथ में नहीं है.
निहार नलिनी सारंगी का यह लेख हिंदी में अनूदित है. मूल अंग्रेजी लेख यहां पढ़ सकते हैं
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