13/05/2026: रुपया नहीं मान रहा | प्याज का दाम भी | 2 साल का बैन | एससी-एसटी | विजय 144 | 9 दिनी ड्रामा | बंदी का 'सुपुत्र' | जेयू में 'शाखा' | होसबोले पर श्रवण गर्ग | सीबीआई निदेशक | फरक्का
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आज की सुर्खियां
बांग्लादेश ने भारत के फरक्का बांध के ‘नकारात्मक’ प्रभाव को खत्म करने के लिए नई बैराज परियोजना को मंजूरी दी
वेणुगोपाल या सतीशन? कांग्रेस कल खत्म करेगी केरल के मुख्यमंत्री पद का सस्पेंस
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.80 के अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर गिरा रुपया
भाजपा के केंद्रीय मंत्री के बेटे को पॉक्सो केस में क्यों नहीं गिरफ़्तार कर रही रेवंत सरकार?
अमेरिका ने फेंटेनाइल को लेकर भारतीय कंपनी से जुड़े 13 लोगों पर वीजा प्रतिबंध लगाए
तमिलनाडु विधानसभा: मुख्यमंत्री विजय की टीवीके ने 144 ‘पक्ष’ मतों के साथ विश्वास मत जीता
अमेरिका ने ओपीटी वीजा धोखाधड़ी को लेकर भारतीयों सहित 10,000 विदेशी छात्रों की पहचान की
सुप्रीम कोर्ट ने कहा: एससी/एसटी एक्ट तभी लागू होगा जब जातिगत अपमान ‘सार्वजनिक रूप’ से किया गया हो
बंगाल में भाजपा की सरकार बनते ही ‘जेयू’ में आरएसएस की शाखा शुरू, राज्य का पहला विवि परिसर
अर्थव्यवस्था पर बढ़ते दबाव के बीच नीति आयोग ने निर्माण कार्यों पर दो साल के प्रतिबंध की सिफारिश की
‘पक्षपातपूर्ण प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनना चाहता’: राहुल गांधी ने सीबीआई निदेशक के चयन पर असहमति दर्ज की
महाराष्ट्र में प्याज के दाम ₹1 तक गिरे; गुस्से में किसान ने फेंके 2,500 किलो प्याज
श्रवण गर्ग | आरएसएस, पाकिस्तान, विदेश नीति और भारत के मुसलमान
शोभन सक्सेना | ईरान-इज़राइल युद्ध, अमेरिका की रणनीति और पेट्रो-डॉलर व्यवस्था
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.80 के अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर गिरा रुपया
भारतीय रुपया बुधवार, 13 मई को एक नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर गिर गया. विदेशी ऋण अदायगी और आयातकों की हेजिंग मांग, कीमती धातुओं के आयात पर बढ़े हुए शुल्क से मिलने वाले सीमित समर्थन पर भारी पड़ी, जिससे गिरावट का सिलसिला जारी रहा.
‘लाइव मिंट’ में धन्या नागसुंदरम के अनुसार, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा 95.80 के सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुँच गई, जो दिन के उच्चतम स्तर से लगभग 30 पैसे कमजोर हुई. रुपया सोमवार के सत्र के 95.63 के मुकाबले गिरकर आज 95.71 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ.
अमेरिका-ईरान संघर्ष के बीच ऊर्जा की बढ़ती कीमतों के निरंतर दबाव ने भारत के व्यापक आर्थिक परिदृश्य को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया है. अर्थशास्त्रियों ने इसके जवाब में विकास दर के अनुमानों में कटौती की है, मुद्रास्फीति (महंगाई) के अनुमानों को बढ़ाया है और चेतावनी दी है कि निकट भविष्य में रुपया निरंतर दबाव में रह सकता है.
हाल ही में टैरिफ (शुल्क) में की गई वृद्धि के कारण बुधवार, 13 मई को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.61 पर 2 पैसे की मामूली बढ़त के साथ खुला था. हालांकि, तेल की ऊंची कीमतों और बढ़ती अमेरिकी मुद्रास्फीति ने इस बढ़त को सीमित कर दिया. भारत ने मुद्रा पर दबाव कम करने के लिए कीमती धातुओं पर टैरिफ 6% से बढ़ाकर 15% कर दिया है, जो ईरान में जारी संघर्ष से जुड़ी कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से प्रभावित हुई है. 28 फरवरी को संघर्ष शुरू होने के बाद से, ब्रेंट कच्चे तेल की कीमतें लगभग 50% बढ़ गई हैं, जिसके परिणामस्वरूप रुपये में 5% से अधिक की गिरावट आई है.
महाराष्ट्र में प्याज के दाम ₹1 तक गिरे; गुस्से में किसान ने फेंके 2,500 किलो प्याज
‘इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक, महाराष्ट्र के नासिक जिले में प्याज़ किसानों का गुस्सा अब सड़कों पर खुलकर दिखाई देने लगा है. मंगलवार को नंदगांव कृषि उपज मंडी समिति (एपीएमसी) के बाहर एक किसान ने अपनी लगभग ढाई टन प्याज़ सड़क पर फेंक दी. किसान सुबह से अपनी फसल की नीलामी का इंतज़ार कर रहे थे, लेकिन पूरे दिन उसकी उपज की बोली नहीं लगाई गई. शाम तक इंतज़ार और प्रशासनिक उदासीनता से परेशान किसान ने आखिरकार विरोध में अपनी पूरी प्याज़ मंडी परिसर के बाहर उड़ेल दी.
घटना के बाद नंदगांव एपीएमसी के बाहर किसानों ने जोरदार प्रदर्शन किया. किसानों ने प्रशासन और व्यापारियों के खिलाफ नारेबाज़ी करते हुए एपीएमसी को भंग करने की मांग उठाई. प्रदर्शनकारी किसानों का कहना था कि मंडी समिति पूरी तरह निष्क्रिय हो चुकी है और किसानों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है.
महाराष्ट्र राज्य प्याज़ उत्पादक संघ के सदस्य बालकृष्ण सांगले ने बताया कि किसान सुबह अपनी प्याज़ बेचने मंडी पहुंचा था, लेकिन देर शाम तक उसकी फसल की नीलामी नहीं कराई गई. इससे नाराज़ होकर उसने विरोध स्वरूप अपनी 2500 किलो से अधिक प्याज़ मंडी के बाहर फेंक दी. उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक किसान का गुस्सा नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के किसानों की पीड़ा है.
दरअसल महाराष्ट्र में इस समय प्याज़ की कीमतों में भारी गिरावट आई हुई है. कई मंडियों में औसत गुणवत्ता वाली प्याज़ केवल 800 से 1000 रुपये प्रति क्विंटल बिक रही है. वहीं छोटी प्याज़ की कीमतें इतनी नीचे गिर चुकी हैं कि किसानों को एक रुपये से चार रुपये प्रति किलो तक का भाव मिल रहा है. यह कीमत खेती की लागत और परिवहन खर्च से भी कम बताई जा रही है.
प्याज़ किसानों का कहना है कि बीज, खाद, दवाइयों, सिंचाई और ट्रांसपोर्ट पर भारी खर्च करने के बाद भी उन्हें लागत निकालना मुश्किल हो गया है. लगातार गिरती कीमतों ने हजारों किसानों को आर्थिक संकट में धकेल दिया है. कई किसान कर्ज़ के दबाव में हैं और उन्हें अगली फसल की तैयारी के लिए भी पैसे जुटाने में दिक्कत हो रही है.
महाराष्ट्र राज्य प्याज़ उत्पादक संघ के अध्यक्ष भारत दिघोले ने नंदगांव एपीएमसी पर गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि मंडी समिति सिर्फ कागज़ों में बची हुई है और किसानों के हितों की रक्षा करने में पूरी तरह विफल साबित हुई है. उनके मुताबिक मंडी में प्रशासनिक नियंत्रण लगभग खत्म हो चुका है और किसान अव्यवस्था के बीच परेशान हो रहे हैं.
हालांकि भारत दिघोले ने यह भी कहा कि सिर्फ एपीएमसी को भंग कर देना समाधान नहीं होगा. उनका मानना है कि मौजूदा संकट के समय मंडी समिति को बंद करने से हालात और खराब हो सकते हैं. उन्होंने कहा कि जब बाजार पहले ही टूट चुका हो, तब किसानों के लिए एक संगठित मंडी व्यवस्था का खत्म होना और अधिक नुकसानदायक साबित होगा.
दिघोले ने मांग की कि नंदगांव एपीएमसी के पूरे निदेशक मंडल को तत्काल बर्खास्त किया जाए और लापरवाह अधिकारियों तथा कर्मचारियों पर कार्रवाई हो. उन्होंने सरकार से मांग की कि मंडी संचालन के लिए तत्काल प्रशासक नियुक्त किया जाए ताकि किसानों की उपज की समय पर नीलामी सुनिश्चित हो सके.
अर्थव्यवस्था पर बढ़ता दबाव: नीति आयोग ने निर्माण कार्यों पर दो साल के प्रतिबंध की सिफारिश की
पश्चिम एशिया में जारी संकट के कारण निर्माण लागत में भारी वृद्धि और बढ़ते आयात का सामना करते हुए, सरकारी थिंक टैंक ‘नीति आयोग’ ने केंद्र सरकार को भारत भर में सभी प्रमुख निर्माण कार्यों को दो साल के लिए रोकने की सलाह दी है. इसमें राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में निर्माण भवन, उद्योग भवन और शास्त्री भवन जैसे मंत्रालयी परिसरों को ढहाने और उनके पुनर्निर्माण का कार्य भी शामिल है.
अनिमेष सिंह के अनुसार, नीति आयोग ने संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों को यह सिफारिश भेजी है. इसमें स्पष्ट किया गया है कि लागत में बढ़ोत्तरी, बढ़ते आयात और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान के कारण कच्चे माल की उपलब्धता प्रभावित हो रही है, इसलिए सभी बड़े पैमाने के निर्माण कार्यों पर दो साल के लिए रोक लगा दी जानी चाहिए. निर्माण और तोड़फोड़ (डिमोलिशन) के काम को स्थगित करने की सुझाई गई यह अवधि ईरान युद्ध से उत्पन्न स्थिति की गंभीरता को दर्शाती है. संयोग से, यह सिफारिश नीति आयोग के नए उपाध्यक्ष अशोक लाहिड़ी और पूर्णकालिक सदस्यों की पूरी तरह से नई टीम की नियुक्ति से पहले की गई थी.
थिंक टैंक की यह सिफारिश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 10 मई को नागरिकों से की गई उस अपील के कुछ ही दिन बाद आई है, जिसमें उन्होंने पश्चिम एशिया संकट के बीच वैश्विक ऊर्जा कीमतों में उछाल को देखते हुए ईंधन की खपत कम करने, ‘वर्क फ्रॉम होम’ (घर से काम) को फिर से शुरू करने, सोने की खरीद रोकने और विदेश यात्राओं में कटौती करने का आग्रह किया था.
इस बीच, निर्माण भवन परिसर (जिसमें केंद्रीय शहरी विकास और स्वास्थ्य मंत्रालय स्थित हैं) को ढहाने का काम रोक दिया गया है. इसके अलावा, पड़ोसी उद्योग भवन (जिसमें एमएसएमई, इस्पात और वाणिज्य मंत्रालय हैं) को ढहाने की शुरुआती तैयारी, जो पिछले महीने पूरे परिसर की घेराबंदी के साथ शुरू हुई थी, उसे भी नीति आयोग की सिफारिश के बाद अब रोका जा सकता है.
सूत्रों ने ‘द ट्रिब्यून’ को बताया कि इन घटनाक्रमों के बाद, शास्त्री भवन (जिसमें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय सहित सबसे अधिक संख्या में केंद्रीय मंत्रालय हैं) और उससे सटे कृषि भवन परिसर (कृषि, ग्रामीण विकास, पंचायती राज और खाद्य मंत्रालय का मुख्यालय) को ढहाने के प्रस्तावित कार्य को भी फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा: एससी/एसटी एक्ट तभी लागू होगा जब जातिगत अपमान ‘सार्वजनिक रूप’ से किया गया हो
सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि किसी व्यक्ति पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला केवल तभी चलाया जा सकता है, जब जातिगत अपमानजनक टिप्पणी “सार्वजनिक रूप” से की गई हो. कोर्ट ने बिना किसी गवाह के निजी स्थानों पर होने वाले ऐसे अपराधों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा है.
‘टेलीग्राफ ब्यूरो’ के अनुसार, न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने गुंजन उर्फ गिरिजा कुमारी और कुछ अन्य अपीलकर्ताओं द्वारा दायर एक अपील को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया. इन अपीलकर्ताओं ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा उनके खिलाफ तय किए गए आरोपों को रद्द करने से इनकार कर दिया था. इन लोगों पर कीर्ति नगर पुलिस स्टेशन में एससी/एसटी एक्ट और आईपीसी की धारा 506 (आपराधिक धमकी) तथा 34 (समान मंशा) के तहत कथित अपराधों के लिए आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे.
शीर्ष अदालत ने संज्ञान लिया कि अपीलकर्ताओं द्वारा कथित जातिगत गाली-गलौज शिकायतकर्ता और आरोपी व्यक्तियों के आवासीय परिसर के भीतर हुई बताई गई थी, जो एक ही स्थान पर रहते थे और वैवाहिक संबंध के कारण आपस में रिश्तेदार थे.
पीठ ने अपने फैसले में कहा, “तमाम भौतिक तथ्य यह संकेत देते हैं कि कथित घटना एक निजी स्थान पर और प्रतिवादी संख्या 2-शिकायतकर्ता (दलित) और अपीलकर्ताओं, जो सभी परिवार के सदस्य हैं, के घर की चारदीवारी के भीतर हुई थी.”
कोर्ट ने आगे कहा, “यह कहा जा सकता है कि एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध बनने के लिए घटना का ‘सार्वजनिक दृश्य वाले स्थान’ पर होना अन्य घटकों के बीच एक तरह की प्रमुख आवश्यकता है. अन्य पहलू जैसे ‘जानबूझकर अपमान या धमकी’ और ‘अपमानित करने का इरादा’, तब और अधिक गंभीर हो जाते हैं जब अपमान, धमकी या अपमानजनक शब्द सार्वजनिक सदस्यों की उपस्थिति में ‘सार्वजनिक दृश्य वाले स्थान’ पर कहे जाते हैं.”
शीर्ष अदालत के पिछले फैसलों का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति अंजारिया ने कहा कि एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) के तहत अपराध बनने के लिए यह आवश्यक है कि जाति के नाम पर जानबूझकर किया गया अपमान, धमकी या गाली-गलौज ‘सार्वजनिक दृश्य वाले स्थान’ पर हो और उसका उद्देश्य व्यक्ति को उसकी जाति को लेकर अपमानित करना हो.
न्यायमूर्ति अंजारिया ने स्पष्ट किया, “एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) और/या धारा 3(1)(s) के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए, घटना और जाति-आधारित गालियाँ देने का आचरण ‘सार्वजनिक दृश्य वाले स्थान’ पर होना चाहिए. यह सार्वजनिक दृष्टि के भीतर का स्थान होना चाहिए. यदि यह एक निजी स्थान भी है, तो ऐसी स्थिति में वहाँ तक सार्वजनिक पहुँच होनी चाहिए ताकि यह देखा जा सके कि वहाँ क्या हो रहा है, तभी उसे ‘सार्वजनिक दृश्य वाला स्थान’ माना जाएगा.”
तमिलनाडु: मुख्यमंत्री विजय की ‘टीवीके’ ने 144 ‘पक्ष’ मतों के साथ विश्वास मत जीता
‘द हिंदू’ ब्यूरो के मुताबिक, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने बुधवार (13 मई, 2026) को विधानसभा में अपनी पहली बाधा पार कर ली. उन्होंने सदन में 144 ‘पक्ष’ मतों के साथ विश्वास मत जीत लिया. वहीं, 22 विधायकों ने विश्वास प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया और 5 विधायक मतदान से ‘अनुपस्थित’ रहे.
मतदान शुरू होने से पहले, विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन ने टीवीके सरकार की आलोचना करते हुए भाषण दिया और उसके बाद सभी डीएमके विधायकों और एकमात्र डीएमडीके विधायक प्रेमलता विजयकांत के साथ सदन से वॉकआउट किया. उदयनिधि ने 12 मई को अन्नाद्रमुक के बागियों से मिलने के लिए मुख्यमंत्री विजय पर तीखा हमला किया और सवाल उठाया कि जो हो रहा है वह “परिवर्तन” है या “विनिमय”.
इस बीच, सदन में उस समय हंगामा शुरू हो गया जब अन्नाद्रमुक के बागी नेता एस.पी. वेलुमणि ने सभी बागी विधायकों का नेतृत्व करते हुए टीवीके के पक्ष में मतदान किया.
वेणुगोपाल या सतीशन? कांग्रेस कल खत्म करेगी केरल के मुख्यमंत्री पद का सस्पेंस
नौ दिनों के कड़े ड्रामे, भारी लॉबिंग और मैराथन चर्चाओं के बाद, कांग्रेस ने बुधवार को कहा कि केरल में मुख्यमंत्री पद के चयन की घोषणा गुरुवार को की जाएगी. हालांकि पार्टी हाईकमान ने दावा किया है कि इस मुद्दे पर विचार-विमर्श पूरा हो चुका है, लेकिन फैसले में हो रही देरी यह संकेत देती है कि तीनों दावेदारों — केरल विधानसभा के निवर्तमान विपक्ष के नेता वी.डी. सतीशन, एआईसीसी महासचिव (संगठन) के.सी. वेणुगोपाल और पूर्व नेता प्रतिपक्ष रमेश चेन्निथला — के बीच सर्वमान्य फॉर्मूले पर अभी भी काम चल रहा है.
इस बीच, तीनों दावेदार एक और लंबी रात के लिए तैयार नजर आ रहे हैं, क्योंकि पार्टी हाईकमान एक अभूतपूर्व स्थिति से जूझ रहा है. हाल के वर्षों में नेतृत्व ने राजस्थान, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी मुख्यमंत्री तय करने में इतना समय नहीं लिया था, जहाँ दावेदारों के बीच कड़े मुकाबले ने नेतृत्व को समझौता फॉर्मूला निकालने पर मजबूर किया था.
यद्यपि चेन्निथला ने अपना दावा नहीं छोड़ा है, लेकिन मुकाबला मुख्य रूप से वेणुगोपाल और सतीशन के बीच सिमट गया है. वेणुगोपाल, हालांकि विधायक नहीं हैं, लेकिन उन्हें नवनिर्वाचित विधायकों के बहुमत और राज्य के नेताओं के एक बड़े वर्ग का समर्थन प्राप्त है. दूसरी ओर, सतीशन को यूडीएफ सहयोगियों, विशेष रूप से इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का समर्थन हासिल है, जो 22 सीटों के साथ गठबंधन का दूसरा सबसे बड़ा घटक है. पार्टी के भीतर एक धारणा यह भी है कि जनभावना सतीशन के पक्ष में है.
मनोज सी. जी के अनुसार, यह घोषणा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के बीच लगभग 40 मिनट की बैठक के बाद आई. कांग्रेस संचार प्रमुख जयराम रमेश ने कहा, “केरल में कांग्रेस विधायक दल के सदस्यों द्वारा अधिकृत किए जाने के अनुसार, कांग्रेस हाईकमान ने सभी चर्चाएं पूरी कर ली हैं, और केरल का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा, इसका निर्णय कल (गुरुवार) घोषित किया जाएगा.”
भाजपा के केंद्रीय मंत्री के बेटे को पॉक्सो केस में क्यों गिरफ़्तार नहीं कर रही रेवंता सरकार?
बंदी संजय कुमार का बेटा, नाबालिग़ लड़की और सिस्टम की खामोशी
हैदराबाद की एक नाबालिग़ लड़की. उम्र 17 साल. और एक ऐसा आरोपी जिसके पिता देश के गृह मंत्रालय में राज्यमंत्री हैं. यह सिर्फ़ एक पॉक्सो केस नहीं है. यह उस पूरे तंत्र का आईना है जो तब अपनी आँखें मूँद लेता है जब आरोपी के पीछे राजनीतिक ताक़त खड़ी हो. यह रिपोर्ट साउथ फर्स्ट और स्वतंत्र पत्रकार रेवती (@revathitweets) की ज़मीनी दस्तावेज़ों पर आधारित है.
8 मई 2026 की रात तक़रीबन 10 बजे, हैदराबाद के पेट बशीराबाद पुलिस स्टेशन में एक माँ ने अपनी बेटी के साथ हुए ज़ुल्म की शिकायत दर्ज कराई. शिकायत में आरोप था कि 25 साल के बंदी साई भगीरथ — जो केंद्रीय गृह राज्यमंत्री बंदी संजय कुमार के बेटे हैं — ने जून 2025 से नाबालिग़ लड़की को भावनात्मक रूप से फँसाया, शादी का झाँसा दिया, उसे परिवार और दोस्तों से अलग-थलग किया और हैदराबाद के बाहरी इलाक़ों में स्थित फ़ार्महाउसों और अपार्टमेंट्स में बार-बार उसके साथ यौन उत्पीड़न किया.
शिकायत की भाषा साफ़ थी — “ग्रूमिंग, इमोशनल मैनीपुलेशन और सेक्सुअल एक्सप्लॉइटेशन का सुनियोजित सिलसिला.” अदालत को सौंपे गए दस्तावेज़ों में पुलिस इंस्पेक्टर के. विजयवर्धन ने बताया कि माँ की चार पेज लंबी शिकायत में उन तमाम जगहों के नाम दर्ज हैं जहाँ कथित उत्पीड़न हुआ. पीड़िता की तरफ़ से सबूत के तौर पर जमा की गई चैट्स में कथित तौर पर आरोपी ने खुद स्वीकार किया कि वो उसे “टॉर्चर” कर रहा था.
एफआईआर से लेकर भागने तक — पाँच दिनों की कहानी
जिस रात एफ.आई.आर. दर्ज हुई, उसी रात आरोपी भगीरथ का फ़ोन बंद हो गया. पुलिस ने कहा वो “अनट्रेसेबल” है. पॉक्सो क़ानून के तहत ऐसे मामलों में त्वरित गिरफ़्तारी की अपेक्षा होती है, मगर यहाँ पुलिस ने पहले तीन दिन यह कहते हुए बिता दिए कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हैदराबाद दौरे में “व्यस्त” थी. इस दौरान आरोपी के ख़िलाफ़ कोई ठोस क़दम नहीं उठाया गया.
इसी बीच एक और एफ.आई.आर. दर्ज हुई — इस बार पीड़िता और उसके परिवार के ख़िलाफ़. आरोप था “हनी-ट्रैप और ब्लैकमेल” का. तेलंगाना के मुख्यमंत्री और गृहमंत्री रेवंत रेड्डी ने एक “चिट-चैट” कार्यक्रम में सार्वजनिक रूप से इसी नैरेटिव को आगे बढ़ाया. उन्होंने बंदी संजय को अपना “बेस्ट फ्रेंड” बताया. एक कांग्रेस मंत्री पोनम प्रभाकर ने तो यह सुझाया कि “मुन्नुरू कापू” समुदाय के नेता मामले का “सेटलमेंट” करवाएँ — यानी आरोपी की पीड़िता से शादी. यौन उत्पीड़न के एक गंभीर मुक़दमे में “समझौते” की बात ने देशभर में गहरा आक्रोश पैदा किया.
12 मई को पुलिस ने पीड़िता का अतिरिक्त बयान दर्ज किया और मामले की धाराएँ बदल दीं. शुरुआत में एफ.आई.आर. भारतीय न्याय संहिता की धारा 74 और 75 तथा पॉक्सो की धारा 11 सहपठित 12 के तहत दर्ज की गई थी. अब इसमें पॉक्सो की धारा 5(ल) सहपठित धारा 6 जोड़ी गईं — यानी “नाबालिग़ पर एग्रेवेटेड पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट” — जिसमें न्यूनतम 20 साल की सज़ा का प्रावधान है और अधिकतम आजीवन कारावास. इसी दिन एक एस.आई.टी. (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम) भी गठित की गई — जो एक सामान्य पॉक्सो मामले में असाधारण क़दम माना जाता है — और आरोपी को 13 मई दोपहर 2 बजे तक पेश होने का नोटिस दिया गया. नोटिस उसके मामा, करीमनगर के डॉक्टर सी.एच. वमशी कृष्ण के ज़रिए तामील की गई.
13 मई को भगीरथ नहीं आया. उसने पेट बशीराबाद थाने के एस.एच.ओ. को एक पत्र भेजा जिसमें दो दिन और माँगे. पत्र में लिखा — “मुझे बेहद कम समय दिया गया है और एक पर्सनल इनकन्वीनिएंस है. मैं जाँच में सहयोग देना चाहता हूँ, मगर रेलेवेंट दस्तावेज़ जुटाने के लिए दो दिन चाहिए ताकि मैं जाँच में सार्थक मदद कर सकूँ.” पत्र में उसने शिकायत को “झूठे आरोप” भी बताया. उधर उसकी एंटिसिपेटरी बेल पिटीशन तेलंगाना हाई कोर्ट की वेकेशन बेंच के सामने पेश की गई, जिसकी सुनवाई 14 मई को होनी थी.
पिता का जवाब — सियासी ढाल और धार्मिक चादर
12 मई को हनुमान जयंती के मौक़े पर बंदी संजय कुमार एक “हिंदू एकता रैली” में आए. स्वामीजियों और भगवा झंडों से घिरे मंच पर खड़े होकर उन्होंने इस मामले की तुलना लंका दहन से की. उन्होंने कहा कि जिस तरह हनुमान ने लंका जलाई, वो भी अपने दुश्मनों को जलाकर रख देंगे. उन्होंने खुद को और अपने बेटे को राजनीतिक षड्यंत्र का शिकार बताया — बिना यह स्पष्ट किए कि उनका बेटा जाँच में सहयोग क्यों नहीं कर रहा.
भाजपा में अंदरूनी बेचैनी
साउथ फर्स्ट के वरिष्ठ पत्रकार जी.एस. वासु की रिपोर्ट के अनुसार, तेलंगाना बी.जे.पी. के सात सांसदों (बंदी संजय को छोड़कर) और सात विधायकों में से किसी ने भी संजय के बचाव में एक शब्द नहीं कहा. कुछ नेता खामोशी से यह देख रहे थे कि संजय किस तरह खुद अपना नुक़सान कर रहे हैं, जबकि कुछ को पार्टी की दीर्घकालिक छवि की चिंता सताने लगी.
एक वरिष्ठ बी.जे.पी. नेता ने बेबाकी से कहा — “संजय ने ख़ुद ही इसे एक फेत अकोम्पली बना दिया है. जब कोई ख़ुद को फाँसी देना चाहे तो उसे कौन बचा सकता है?”
एक दूसरे नेता ने तर्क दिया — “जब दोनों पक्षों ने ख़ुद माना कि उनके बीच कोई रिश्ता था, तो कोई मुक़दमा कैसे गढ़ा जा सकता है? और जब पुलिस ने तमाम रेकॉर्ड्स की जाँच के बाद पॉक्सो में केस दर्ज किया, तो किस बात को ‘झूठ’ बताया जा रहा है?”
आर.एस.एस. पृष्ठभूमि के एक वरिष्ठ बी.जे.पी. पदाधिकारी ने संजय की भाषा पर भी सख़्त ऐतराज़ जताया. उन्होंने कहा — “यह वो संस्कृति नहीं जिसे संघ कभी प्रोत्साहित करता है. यह तो संघ को स्वीकार्य ही नहीं है.”
बी.जे.पी. के तेलंगाना प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र राव ने कहा कि पार्टी या संजय को उनके बेटे के आचरण के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराना चाहिए — मगर इस पर भी पार्टी में नाराज़गी थी. नेताओं का कहना था कि उन्हें बस इतना कहना था कि “क़ानून अपना काम करेगा.” कई नेताओं ने यह भी पूछा कि जब बेटा बेगुनाह है, तो फिर वो छुप क्यों रहा है — “कम से कम अदालत उसे पुलिस के सामने पेश होने का निर्देश देती. वो उस निर्देश का इंतज़ार क्यों कर रहा है?”
मिसिंग के पोस्टर, धमकियाँ और पीड़िता की पहचान उजागर
13 मई को हैदराबाद में “बंदी भगीरथ मिसिंग” के पोस्टर लग गए. पुलिस स्टेशन के बाहर महिला संगठनों का प्रदर्शन हुआ जिसे लाठीचार्ज से तितर-बितर किया गया. सोशल मीडिया पर संजय के समर्थकों और कुछ पत्रकारों ने पीड़िता की “दो जन्मतिथियों” का मुद्दा उठाया — एक 2008, दूसरा 2010. साउथ फर्स्ट की रिपोर्ट में साफ़ कहा गया कि दोनों में से किसी भी साल के हिसाब से वो अभी भी नाबालिग़ है, और उम्र तय करना अदालत का नहीं बल्कि पुलिस का काम है — जो वो कर चुकी है.
इससे भी गंभीर यह है कि पीड़िता की पहचान, तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल की गईं — जो सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का सीधा उल्लंघन है. पीड़िता के परिवार को धमकियाँ मिल रही हैं. मुख्यधारा का तेलुगू मीडिया इस मामले पर बड़े पैमाने पर खामोश रहा या काउंटर-नैरेटिव को आगे बढ़ाता रहा.
इस पूरे मामले में जब मेनस्ट्रीम मीडिया चुप रहा, तब स्वतंत्र पत्रकार रेवती (@revathitweets) ने अपने ट्विटर थ्रेड के ज़रिए पूरे घटनाक्रम को दस्तावेज़ीकृत किया. पुलिस की वीडियो, रैली की क्लिप्स, शिकायत की डिटेल्स, और टाइमलाइन — सब कुछ उनके ट्वीट्स में दर्ज है. यही सार्वजनिक दबाव था जिसने पुलिस को धाराएँ अपग्रेड करने और एस.आई.टी. गठित करने पर मजबूर किया.
भगीरथ पहले भी विवादों में रहा है. वो कॉलेज ड्रॉपआउट है और पहले असॉल्ट के आरोप में रस्टिकेट भी हो चुका है. कर्नाटक में जे.डी.(एस.) के एम.पी. प्रज्वल रेवन्ना के बलात्कार मामले में त्वरित कार्रवाई हुई और उन्हें आजीवन कारावास मिला. यहाँ भगीरथ अभी भी आज़ाद है.
बंदी साई भगीरथ एस.आई.टी. के सामने पेश नहीं हुआ. उसकी एंटिसिपेटरी बेल पिटीशन तेलंगाना हाई कोर्ट की वेकेशन बेंच के सामने 14 मई को सुनवाई के लिए लंबित थी. पीड़िता का परिवार धमकियों और पब्लिक विलिफिकेशन झेल रहा है. बंदी संजय कुमार केंद्रीय मंत्री बने हुए हैं. और पॉक्सो — जो इसीलिए बना था कि ताक़तवर लोग भी बच न सकें — एक बार फिर ताक़त के सामने घुटने टेकता दिख रहा है.
सवाल सीधे हैं — तेलंगाना पुलिस, डी.जी.पी., सी.एम. रेवंत रेड्डी और बी.जे.पी. नेतृत्व से: क़ानून कब सबके लिए बराबर होगा? एक नाबालिग़ को न्याय कब मिलेगा जब उसके ज़ख्मों को राजनीतिक चारे में बदल दिया गया हो?
बंगाल में भाजपा की सरकार बनते ही ‘जेयू’ में आरएसएस की शाखा शुरू, राज्य का पहला विवि परिसर
पश्चिम बंगाल में पहली बार भाजपा की सरकार बनते ही आरएसएस ने मंगलवार को जादवपुर विश्वविद्यालय (जेयू) में एक ‘शाखा’ शुरू की, जिसमें इसके कुछ सदस्यों ने घोषणा की कि वे कैंपस से “माओवाद को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे.”
‘द टेलीग्राफ’ में शुभंकर चौधरी ने बताया है कि विश्वविद्यालय के कर्मचारियों का एक समूह सुबह करीब 6:30 बजे फुटबॉल मैदान में इकट्ठा हुआ, शपथ ली और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की शाखा के शुभारंभ के अवसर पर शारीरिक व्यायाम किया. भौतिकी विभाग के एक वरिष्ठ प्रयोगशाला परिचारक पलाश माझी ने कहा, “जादवपुर विश्वविद्यालय की स्थापना ऋषि अरबिंदो के मार्गदर्शन में राष्ट्रवाद के मंत्र पर हुई थी. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, विश्वविद्यालय उस रास्ते से भटक गया और नक्सली गतिविधियों तथा माओवाद में डूब गया. हमें इस माओवाद को जड़ से उखाड़ना है.”
शाखा का नेतृत्व कर रहे माझी ने आगे कहा, “हमने उन नक्सली तत्वों को हटाने का संकल्प लिया है जिनकी वजह से जेयू की बदनामी हुई है. हमें कैंपस को बचाना है. बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण से पहले एक चुनावी रैली के दौरान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जेयू को “राष्ट्रविरोधी नारों” का केंद्र बताया था.
मंगलवार की ड्रिल ‘ब्लू अर्थ’ वर्कशॉप के सामने आयोजित की गई थी, जो अपनी लेथ और मैकेनिकल कार्य सुविधाओं के लिए जानी जाती है. आरएसएस शाखा की योजना हर सुबह परिसर में एक घंटे की सभा आयोजित करने की है. माझी ने कहा कि शारीरिक अभ्यास में जल्द ही “दंड प्रयोग” या लाठी खेल शामिल होगा, जो आरएसएस प्रशिक्षण शिविरों की एक नियमित विशेषता है.
माझी ने गर्व के साथ कहा कि जेयू बंगाल का पहला विश्वविद्यालय परिसर है जहाँ आरएसएस ने औपचारिक रूप से शाखा शुरू की है. जेयू अक्सर अपनी राजनीतिक गतिविधियों, भित्तिचित्रों और विरोध के नारों को लेकर दक्षिणपंथी समूहों की आलोचना का पात्र रहा है.
इससे पहले कैंपस की दीवारों पर “आज़ाद कश्मीर” और “स्टॉप ऑपरेशन कगार” जैसे नारे दिखाई दिए थे—’ऑपरेशन कगार’ 2022-23 में छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा पर केंद्र के तीव्र माओवाद विरोधी अभियानों के संदर्भ में था. विरोध के बाद विश्वविद्यालय ने “आज़ाद कश्मीर” के नारे पर सफेदी पुतवा दी थी और दूसरे नारे पर काला रंग फेर दिया था.
नाम न छापने की शर्त पर जेयू के एक प्रोफेसर ने कहा कि विधानसभा चुनाव में भाजपा के मजबूत प्रदर्शन ने आरएसएस समर्थकों को कैंपस में खुद को स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया है. लेकिन, वामपंथी छात्र समूहों ने इस कदम की कड़ी आलोचना की है.
जेयू में अति-वामपंथी ‘रिवोल्यूशनरी स्टूडेंट्स फ्रंट’ के यूनिट अध्यक्ष इंद्रानुज रे ने कहा: “आरएसएस कैंपस से वामपंथ को खत्म करना चाहता है, क्योंकि वे उन लोगों को बर्दाश्त नहीं कर सकते जो उनके विभाजनकारी एजेंडे पर सवाल उठाते हैं. वे छात्रों को डराने की कोशिश कर रहे हैं. हम उनसे वैचारिक और संगठनात्मक रूप से लड़ेंगे.”
हरकारा डीप डाइव
श्रवण गर्ग | अगर होसबोले जैसा नेता पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने की बात कर रहा है, तो इसे केवल निजी राय नहीं माना जा सकता.
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस विस्तृत इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी और वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले के हालिया बयान, भारत-पाकिस्तान संबंधों, संघ की राजनीति, विदेश नीति और भारतीय मुसलमानों की स्थिति पर गंभीर चर्चा की. बातचीत की शुरुआत होसबोले के उस बयान से होती है जिसमें उन्होंने पाकिस्तान के साथ संवाद के रास्ते खुले रखने, सांस्कृतिक रिश्ते मजबूत करने और “पीपल टू पीपल कॉन्टैक्ट” बढ़ाने की बात कही. इस बयान को लेकर दोनों पत्रकारों ने सवाल उठाया कि क्या यह संघ की सोच में बदलाव का संकेत है या बदलते अंतरराष्ट्रीय हालात के बीच एक रणनीतिक मजबूरी.
श्रवण गर्ग ने कहा कि दत्तात्रेय होसबोले केवल आरएसएस के सामान्य पदाधिकारी नहीं बल्कि संगठन के दूसरे सबसे ताकतवर व्यक्ति माने जाते हैं और भविष्य में मोहन भागवत के उत्तराधिकारी भी हो सकते हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे में पाकिस्तान पर दिया गया उनका बयान केवल “निजी राय” नहीं माना जा सकता. गर्ग ने इस बात पर जोर दिया कि जिस संगठन ने दशकों तक पाकिस्तान, मुसलमानों और विभाजन की राजनीति को अपने विस्तार का आधार बनाया, उसी संगठन के शीर्ष नेता का अब पाकिस्तान से संवाद और सांस्कृतिक संबंधों की बात करना एक बड़ी राजनीतिक घटना है.
बातचीत में यह सवाल भी उठा कि क्या आरएसएस अब पहली बार पाकिस्तान के अस्तित्व को वास्तविक रूप से स्वीकार कर रहा है. श्रवण गर्ग ने कहा कि संघ लंबे समय तक “अखंड भारत” और विभाजन को अस्वीकार करने की राजनीति करता रहा है. इसलिए पाकिस्तान के साथ रिश्ते सामान्य बनाने की बात अपने आप में एक वैचारिक बदलाव जैसी लगती है. उन्होंने इसकी तुलना उन देशों से की जो लंबे समय तक इजराइल को मान्यता नहीं देते थे और बाद में कूटनीतिक यथार्थ के कारण संबंध स्थापित करने पड़े.
आखिर एक “सांस्कृतिक संगठन” का नेता सार्वजनिक रूप से विदेश नीति जैसे संवेदनशील विषयों पर क्यों बोल रहा है. क्या यह बयान सरकार और विदेश नीति प्रतिष्ठान की सहमति से दिया गया है. उन्होंने राम माधव और अन्य संघ पृष्ठभूमि वाले नेताओं के हालिया बयानों का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसा लगता है मानो विदेश नीति के संकेत अब औपचारिक सरकारी संस्थाओं से ज्यादा गैर-निर्वाचित वैचारिक समूहों से आ रहे हैं.
इंटरव्यू में बदलते वैश्विक हालात और पाकिस्तान की बढ़ती रणनीतिक अहमियत पर भी विस्तार से चर्चा हुई. श्रवण गर्ग ने कहा कि ईरान, चीन, अमेरिका और दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति में पाकिस्तान की भूमिका फिर से महत्वपूर्ण होती दिख रही है. उन्होंने आशंका जताई कि भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव हो सकता है कि वह पाकिस्तान के साथ रिश्ते सामान्य करे ताकि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बनाए रखा जा सके. बातचीत में ट्रंप की चीन यात्रा, ईरान संकट, शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स जैसे मंचों का भी उल्लेख हुआ.
हालांकि बातचीत का सबसे तीखा हिस्सा भारत के मुसलमानों और संघ की घरेलू राजनीति को लेकर रहा. श्रवण गर्ग ने कहा कि अगर संघ वास्तव में पाकिस्तान से “पीपल टू पीपल कॉन्टैक्ट” चाहता है, तो उसे सबसे पहले भारत के मुसलमानों के साथ संवाद और भरोसे की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए. उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले वर्षों में भाजपा और उससे जुड़े नेताओं ने लगातार ध्रुवीकरण, मुस्लिम विरोधी बयानबाजी और राजनीतिक बहिष्कार की राजनीति की है. बातचीत में असम, बंगाल और उत्तर प्रदेश की राजनीति, मुस्लिम प्रतिनिधित्व में गिरावट और भाजपा द्वारा मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट न देने जैसे मुद्दों का जिक्र किया गया.
यह भी कहा गया कि भारत की विदेश नीति और घरेलू राजनीति के बीच गहरा विरोधाभास दिखाई देता है. एक तरफ सरकार मुस्लिम देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ा रही है. वहीं दूसरी तरफ देश के भीतर मुसलमानों के प्रति अविश्वास और बहिष्कार का माहौल बना हुआ है.
‘पक्षपातपूर्ण प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनना चाहता’: राहुल गांधी ने सीबीआई निदेशक के चयन पर असहमति दर्ज की
‘द हिंदू’ में संदीप फुकन की खबर है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के अगले निदेशक की नियुक्ति पर निर्णय लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति की बैठक मंगलवार (12 मई, 2026) शाम को हुई. इस बैठक में लोकसभा में विपक्ष के नेता (एलओपी) राहुल गांधी ने एक असहमति नोट प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने सरकार पर राजनीतिक विरोधियों, पत्रकारों और आलोचकों को निशाना बनाने के लिए एजेंसी पर “संस्थागत कब्जे” का आरोप लगाया.
प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले इस पैनल में विपक्षी नेता के अलावा भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत भी शामिल हैं. यह बैठक प्रधानमंत्री के 7, लोक कल्याण मार्ग स्थित आवास पर हुई और एक घंटे से अधिक समय तक चली.
वर्तमान सीबीआई निदेशक प्रवीण सूद का कार्यकाल 24 मई, 2026 को समाप्त होने वाला है और अंततः उनको ही एक और साल की सेवावृद्धि प्रदान कर दी गई है. गांधी ने अपने सोशल मीडिया हैंडल ‘एक्स’ पर अपना कड़ा असहमति नोट साझा किया और सरकार पर चयन प्रक्रिया का “मजाक” उड़ाने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा, “आपकी सरकार ने बार-बार सीबीआई का दुरुपयोग किया है, जिसका उद्देश्य भारत की प्रमुख जांच एजेंसी होना था, ताकि राजनीतिक विरोधियों, पत्रकारों और आलोचकों को निशाना बनाया जा सके. ऐसे संस्थागत कब्जे को रोकने के लिए ही चयन समिति में विपक्ष के नेता को शामिल किया जाता है. खेद है कि आपने मुझे इस प्रक्रिया में किसी भी सार्थक भूमिका से वंचित रखना जारी रखा है.”
गांधी ने कहा कि बार-बार लिखित अनुरोध के बावजूद उन्हें पात्र उम्मीदवारों की ‘सेल्फ-अप्रेजल’ रिपोर्ट या ‘360-डिग्री’ रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराई गई. उन्होंने आगे कहा, “इसके बजाय, मुझसे यह उम्मीद की गई कि मैं पहली बार समिति की बैठक के दौरान ही 69 उम्मीदवारों के मूल्यांकन रिकॉर्ड की जांच करूँ. 360-डिग्री रिपोर्ट देने से तो मुझे साफ मना कर दिया गया. प्रत्येक उम्मीदवार के इतिहास और प्रदर्शन का आकलन करने के लिए इन रिकॉर्ड्स की विस्तृत समीक्षा महत्वपूर्ण है. बिना किसी कानूनी आधार के सूचना देने से यह जानबूझकर किया गया इनकार, चयन प्रक्रिया का मजाक बनाता है और यह सुनिश्चित करता है कि केवल आपके द्वारा पहले से तय उम्मीदवार ही चुना जाए.”
विपक्ष के नेता ने पीएम मोदी को याद दिलाया कि उन्होंने 5 मई, 2025 को हुई पिछली बैठक में भी अपनी असहमति दर्ज की थी और 21 अक्टूबर, 2025 को उन्हें पत्र लिखकर एक निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया के लिए उपाय सुझाए थे.
“चयन समिति को महत्वपूर्ण जानकारी देने से इनकार करके, सरकार ने इसे महज एक औपचारिकता बना दिया है. विपक्ष का नेता कोई रबर स्टैंप नहीं है. मैं इस पक्षपातपूर्ण प्रक्रिया में भाग लेकर अपने संवैधानिक कर्तव्य का परित्याग नहीं कर सकता. इसलिए, मैं कड़े शब्दों में अपनी असहमति दर्ज करता हूँ,” राहुल गांधी ने कहा.
बांग्लादेश ने भारत के फरक्का बांध के ‘नकारात्मक’ प्रभाव को खत्म करने के लिए नई बैराज परियोजना को मंजूरी दी
बांग्लादेश ने बुधवार को पद्मा नदी पर एक मेगा बैराज परियोजना के निर्माण को मंजूरी दे दी है. बांग्लादेश का कहना है कि यह परियोजना ऊपरी प्रवाह में स्थित भारत के फरक्का बांध के “नकारात्मक प्रभाव को खत्म करने” में मदद करेगी.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, यह घटनाक्रम भारत-बांग्लादेश गंगा जल साझाकरण संधि के दिसंबर में समाप्त होने से कुछ महीने पहले आया है. भारत में जिसे गंगा कहा जाता है, उसे बांग्लादेश में पद्मा के नाम से जाना जाता है.
प्रधानमंत्री तारिक रहमान की अध्यक्षता में राष्ट्रीय आर्थिक परिषद की कार्यकारी समिति ने पद्मा बैराज परियोजना के पहले चरण को मंजूरी दी है, जिसकी अनुमानित लागत 34,497.25 करोड़ टका (लगभग 280 मिलियन अमेरिकी डॉलर) है.
जल संसाधन मंत्री शाहिदउद्दीन चौधरी एनी ने पत्रकारों को बताया कि इस परियोजना का एक मुख्य उद्देश्य बांग्लादेश की ओर पानी का संचय करना है ताकि गंगा पर “फरक्का बांध के नकारात्मक प्रभाव को खत्म” किया जा सके. हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत और बांग्लादेश के बीच साझा की जाने वाली 54 नदियों से जुड़े मुद्दे इस परियोजना से संबंधित नहीं हैं.
मंत्री ने कहा कि बैराज का निर्माण बांग्लादेश के राष्ट्रीय हित में किया जा रहा है और इसके लिए भारत के साथ किसी चर्चा की आवश्यकता नहीं है. उन्होंने कहा, “पद्मा बैराज बांग्लादेश के अपने हित का मामला है और इस मुद्दे पर भारत के साथ किसी भी चर्चा की जरूरत नहीं है.”
हालांकि, एनी ने कहा कि गंगा जल पर भारत के साथ चर्चा जारी है. उन्होंने कहा, “गंगा के संबंध में बातचीत आवश्यक है और वह चल रही है.”
भारत ने 1975 में पश्चिम बंगाल में 2,240 मीटर लंबे फरक्का बैराज को चालू किया था ताकि गंगा के पानी को हुगली नदी की ओर मोड़कर तलछट को हटाया जा सके और कोलकाता बंदरगाह की नौगम्यता (जलयान के आवागमन) को बनाए रखा जा सके.
बांग्लादेश में फरक्का का मुद्दा लंबे समय से एक संवेदनशील विषय रहा है. वहां की सरकारों और विशेषज्ञों का आरोप रहा है कि शुष्क मौसम में पानी के कम बहाव के कारण खारेपन की समस्या, नदियों का क्षरण और कृषि एवं पारिस्थितिकी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है.
वहीं, भारत का लगातार यह रुख रहा है कि फरक्का बैराज मुख्य रूप से कोलकाता बंदरगाह को बचाने के लिए बनाया गया था और जल-साझाकरण के मुद्दों को द्विपक्षीय तंत्र और समझौतों (जैसे 1996 की गंगा जल संधि) के माध्यम से सुलझाया गया है.
अमेरिका ने फेंटेनाइल को लेकर भारतीय कंपनी से जुड़े 13 लोगों पर वीजा प्रतिबंध लगाए
संयुक्त राज्य अमेरिका ने कहा है कि वह भारतीय ऑनलाइन फार्मेसी केएस इंटरनेशनल ट्रेडर्स से जुड़े 13 लोगों पर वीजा प्रतिबंध लगा रहा है. इन पर फेंटेनाइल मिश्रित नकली दवाओं की गोलियां बेचने का आरोप है.
अमेरिकी विदेश विभाग ने मंगलवार को कहा कि ये 13 लोग भारत से संचालित होने वाली कंपनी ‘केएस इंटरनेशनल ट्रेडर्स’ और उसके मालिक के करीबी सहयोगी हैं. ‘रॉयटर्स’ के मुताबिक, अमेरिकी सरकारी रिकॉर्ड में सूचीबद्ध इस मुंबई स्थित कंपनी की वेबसाइट तक पहुँच संभव नहीं हो सकी और न ही इसके वरिष्ठ अधिकारियों के नाम या संपर्क विवरण उपलब्ध थे.
भारत के विदेश और स्वास्थ्य मंत्रालयों ने इस पर टिप्पणी के अनुरोधों का तुरंत कोई जवाब नहीं दिया. विदेश विभाग के अनुसार, केएस इंटरनेशनल ट्रेडर्स ने फेंटेनाइल की तस्करी के माध्यम से राजस्व अर्जित किया, जिसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने “सामूहिक विनाश का हथियार” घोषित किया है.
फेंटेनाइल एक शक्तिशाली सिंथेटिक ओपिओइड है, जिसका उपयोग दर्द निवारण के लिए किया जाता है, लेकिन इसकी अत्यधिक क्षमता और अवैध उपयोग से होने वाली मौतों के कारण अमेरिका में इस पर कड़े प्रतिबंध हैं.
विदेश विभाग के प्रवक्ता थॉमस पिगोट ने एक बयान में कहा, “अवैध फेंटेनाइल बहुत सारे अमेरिकियों की जान ले रहा है. अमेरिकियों को जहर देने में शामिल लोगों को संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रवेश से वंचित कर दिया जाएगा.”
यह पहली बार नहीं है जब अमेरिकी सरकार ने केएस इंटरनेशनल ट्रेडर्स पर कार्रवाई की है. इस ऑनलाइन फार्मेसी के साथ-साथ दो भारतीय नागरिकों पर पिछले साल भी फेंटेनाइल मिश्रित नकली गोलियों की आपूर्ति करने के लिए प्रतिबंध लगाए गए थे.
विदेश विभाग ने मंगलवार को कहा कि कंपनी ने संयुक्त राज्य अमेरिका में लोगों को अवैध फेंटेनाइल वाली लाखों नकली गोलियां बेचीं, जिससे देश भर में परिवारों और समुदायों को नुकसान पहुँचा है. संयुक्त राज्य अमेरिका ने पिछले साल एक नई वीजा प्रतिबंध नीति की घोषणा की थी, जिसका उद्देश्य देश में फेंटेनाइल और अन्य अवैध नशीली दवाओं के प्रवाह को रोकना है.
अमेरिका ने ओपीटी वीजा धोखाधड़ी को लेकर भारतीयों सहित 10,000 विदेशी छात्रों की पहचान की
अमेरिकी आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन (आईसीई) ने ‘ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग’ (ओपीटी) कार्यक्रम के कथित दुरुपयोग के लिए कई भारतीयों सहित लगभग 10,000 विदेशी छात्रों की पहचान की है. अधिकारियों का दावा है कि छात्र वीजा का यह हिस्सा धोखाधड़ी और राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं का एक प्रमुख स्रोत बन गया है.
मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए, कार्यवाहक आईसीई निदेशक टॉड लियोन ने कहा कि छात्र वीजा कार्यक्रम का ओपीटी घटक “धोखाधड़ी के लिए एक चुंबकीय आकर्षण” बन गया है और होमलैंड सुरक्षा विभाग द्वारा इसकी कई जांच की जा रही हैं.
‘टेलीग्राफ वेब डेस्क और पीटीआई’ के मुताबिक, ओपीटी विदेशी नागरिकों को छात्र वीजा पर अमेरिका में पढ़ाई के दौरान 12 महीने, या कुछ विशेष मामलों में 24 महीने तक काम करने की अनुमति देता है. यह कार्यक्रम छात्रों को नियोक्ता-प्रायोजित एच-1बी वीजा में स्थानांतरित होने में भी सक्षम बनाता है.
लियोन ने कहा, “हमने ऐसे मामले देखे हैं जिनमें जासूसी, जैविक खतरे, बौद्धिक संपदा की चोरी, वीजा और रोजगार धोखाधड़ी, और यहाँ तक कि बुजुर्ग अमेरिकियों को निशाना बनाने वाले घोटाले भी शामिल हैं. ये सभी उन व्यक्तियों द्वारा किए गए हैं जिन्होंने छात्र के रूप में अपनी स्थिति (स्टेटस) का दुरुपयोग किया.” उन्होंने आगे कहा, “हमारा देश विदेशी छात्र कार्यक्रम से उत्पन्न सुरक्षा खतरों को बर्दाश्त नहीं करेगा.”
लियोन्स और अन्य संघीय अधिकारियों ने बताया कि जांचकर्ताओं ने कार्यस्थलों का दौरा किया और कई अनियमितताओं का खुलासा किया, जिनमें ऐसे मामले भी शामिल थे, जहाँ ओपीटी लाभार्थियों को कथित तौर पर भारत में स्थित कर्मचारियों द्वारा “प्रबंधित” किया जा रहा था. अधिकारियों ने कहा कि यह कार्यक्रम के नियमों का उल्लंघन है, जो यह अनिवार्य करते हैं कि प्रशिक्षण और पर्यवेक्षण संयुक्त राज्य अमेरिका के भीतर से ही किया जाना चाहिए.
उन्होंने कहा, “इसके बजाय, ओपीटी एक अनियंत्रित ‘गेस्ट वर्कर’ पाइपलाइन बन गया है, जिसके तहत लाखों विदेशी छात्र संयुक्त राज्य अमेरिका में काम कर रहे हैं. जैसे-जैसे इस कार्यक्रम के आकार में विस्फोट हुआ है, वैसे-वैसे धोखाधड़ी भी बढ़ी है.”
डेटा और न्याय: भारत की अदालतों और एआई उपकरणों पर सवाल
न्यायपालिका को डिजिटलीकृत करने की लंबे समय से चल रही कोशिशों के तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने पीठ से दो नई पहलों की घोषणा की. ‘वन केस, वन डेटा’ (ओसीओडी), जो एकीकृत न्यायिक आँकड़ा मंच है, और ‘सु-सहायक’, जो भारत के उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट पर आधारित कृत्रिम बुद्धिमत्ता संचालित संवाद सहायक है. ओसीओडी का उद्देश्य किसी विवाद के विभिन्न अदालतों में आगे बढ़ने के दौरान उसका एकीकृत डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना है. इसके तहत अदालत के रिकॉर्ड और वादकारियों की कार्रवाइयों, जैसे अपील, के बीच जोड़ स्थापित होगा, विभिन्न दस्तावेज़ों तक आसान पहुँच मिलेगी, मैनुअल सत्यापन की आवश्यकता कम होगी, उच्च न्यायालयों और अन्य अदालतों के बीच पारस्परिक पहुँच संभव होगी, और न्यायिक आँकड़े अधिक सटीक बन सकेंगे.
यह पहल इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत की हज़ारों जिला और अधीनस्थ अदालतों में सॉफ़्टवेयर प्रक्रियाओं और रिकॉर्ड की गुणवत्ता में भारी भिन्नता है. यदि यह कार्यक्रम सफल होता है, तो मानकीकृत आँकड़ों की मदद से प्रशासन यह पहचान सकेगा कि मुकदमे कहाँ अटक रहे हैं, प्रक्रियागत बाधाओं को कम किया जा सकेगा, और आँकड़ों पर आधारित निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होगी. ‘सु-सहायक’ को उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट के अग्रभाग से जोड़ा गया है ताकि उपयोगकर्ताओं को मुकदमों की स्थिति, कारण सूची, आदेश और निर्णय, ई-सेवाओं तथा अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों तक पहुँचने में मदद मिल सके.
हालाँकि, भारत में किसी भी बड़े सरकारी तकनीकी कार्यक्रम की तरह यहाँ भी पारस्परिक समन्वय, पुराने रिकॉर्ड की विश्वसनीयता, निजी जानकारी की सुरक्षा और कर्मचारियों के प्रशिक्षण जैसे सवाल बने हुए हैं. प्रत्येक मामले के लिए एक केंद्रीकृत डिजिटल पहचान तैयार करने की महत्वाकांक्षा के कारण ओसीओडी के दुरुपयोग की आशंका भी मौजूद है.
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ये नए उपकरण “न्याय तक पहुँच” को आसान बनाएँगे, लेकिन इनके लागू होने से डिजिटल विभाजन और गहरा हो सकता है. ओसीओडी के कारण वकीलों को डिजिटल स्कैनर, क्लाउड बैकअप और अद्यतन सॉफ़्टवेयर बनाए रखने की आवश्यकता पड़ सकती है. महानगरों की बड़ी कॉरपोरेट विधि फ़र्में इन खर्चों को आसानी से वहन कर लेंगी, लेकिन ज़िला और तहसील स्तर के स्वतंत्र वकीलों के लिए यह आर्थिक बोझ होगा. यह व्यवस्था उन वादकारियों के लिए डिजिटल बिचौलियों की नई परत भी पैदा कर सकती है जो ई-फाइलिंग पोर्टल का उपयोग नहीं कर पाते, जिससे अनियमित खर्च बढ़ने की आशंका है.
हालाँकि सरकार ने ‘जन सहायक’ जैसे आवाज़ आधारित सहायक विकसित किए हैं, लेकिन ‘सु-सहायक’ मुख्यतः लिखित पाठ आधारित है. इससे वे लोग बाहर छूट सकते हैं जो टाइप करने या जटिल वेबसाइट मेनू समझने में सहज नहीं हैं. सरकार और न्यायपालिका को यह सुनिश्चित करना होगा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल हाशिये पर रहने वाले समुदायों के प्रति पक्षपाती न हो, क्योंकि इतिहास में इन्हीं समुदायों के लोगों को अनुपातहीन रूप से अधिक गिरफ़्तार किया गया है या ज़मानत से वंचित रखा गया है.
भारत की अदालतें अब तक कृत्रिम बुद्धिमत्ता को मुख्यतः सहायक उपकरण के रूप में अपनाने में अधिक सहज रही हैं, न कि न्यायिक तर्क के आधार के रूप में. ‘सु-सहायक’ से पहले ‘सुवास’ का उपयोग निर्णयों के अनुवाद के लिए और ‘सुपेस’ का उपयोग तथ्यों तथा कानूनी उदाहरणों के विश्लेषण के लिए किया जा चुका है. जैसे-जैसे न्यायपालिका अधिक शक्तिशाली तकनीकों को अपनाएगी, यह सीमा बनाए रखना आवश्यक होगा, क्योंकि अन्य क्षेत्रों में ऐसे उपकरणों के दुरुपयोग के उदाहरण पहले ही सामने आ चुके हैं.
यह ‘द हिन्दू’ में छपा अंग्रेजी लेख का हिंदी रूपांतरण है. मूल लेख यहाँ पढ़ा जा सकता है.
हरकारा डीप डाइव
शोभन सक्सेना | अगर अमेरिका अपना हाथ खींच ले, तो इज़राइल आर्थिक और राजनीतिक तौर पर टिक नहीं पाएगा
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस विस्तृत इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी और ब्राज़ील से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार शोभन सक्सेना ने ईरान-इज़राइल युद्ध, डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के रिश्तों, अमेरिका की वैश्विक रणनीति, पेट्रो-डॉलर राजनीति, भारत की विदेश नीति और पश्चिम एशिया के बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत की शुरुआत इस सवाल से होती है कि आखिर क्यों अमेरिका और इज़राइल द्वारा शुरू किया गया युद्ध अब उनके नियंत्रण से बाहर जाता दिखाई दे रहा है और क्यों दुनिया भर के बाज़ार, तेल व्यापार और कूटनीतिक समीकरण इससे अस्थिर हो गए हैं.
शोभन सक्सेना ने कहा कि शुरुआत में दावा किया गया था कि ईरान को “दो दिन” या “दो हफ्तों” में झुका दिया जाएगा, लेकिन कई हफ्ते गुजरने के बाद भी युद्ध निर्णायक स्थिति तक नहीं पहुंच पाया है. उनके अनुसार ईरान लगातार अपनी “रेड लाइंस” दोहराता रहा है और उसने जल्दबाज़ी में युद्धविराम स्वीकार करने के संकेत नहीं दिए.उन्होंने कहा कि इस स्थिति ने अमेरिका और इज़राइल की उस छवि को कमजोर किया है जिसमें वे स्वयं को निर्णायक सैन्य शक्ति के रूप में पेश करते रहे हैं.
बातचीत में कहा गया कि अमेरिका के भीतर भी इस युद्ध को लेकर दबाव बढ़ रहा है. शोभन सक्सेना ने दावा किया कि डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता गिर रही है, तेल और गैसोलीन की कीमतें बढ़ रही हैं, महंगाई का दबाव बढ़ रहा है और आगामी चुनावों को देखते हुए ट्रंप के लिए लंबे युद्ध को राजनीतिक रूप से संभालना कठिन होता जा रहा है. चर्चा में यह भी कहा गया कि अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी देश जैसे सऊदी अरब, यूएई और कुवैत अब पहले की तरह अमेरिकी सैन्य रणनीति के साथ खुलकर खड़े दिखाई नहीं दे रहे हैं.
इंटरव्यू में यह दावा भी किया गया कि कई गल्फ देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचा है और अमेरिका के “सुरक्षा कवच” की छवि कमजोर हुई है. चर्चा के दौरान अमेरिकी और इज़राइली रणनीति को “अव्यवस्थित” बताते हुए कहा गया कि लगातार बदलते बयान यह संकेत देते हैं कि कोई स्पष्ट दीर्घकालिक रणनीति मौजूद नहीं है. शोभन सक्सेना ने कहा कि बड़ी शक्तियां आम तौर पर “ग्रैंड स्ट्रेटजी” पर चलती हैं, लेकिन ट्रंप प्रशासन का रवैया प्रतिक्रियात्मक और तात्कालिक दिखाई देता है.
चर्चा में अमेरिका की अर्थव्यवस्था और डॉलर की वैश्विक भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए गए. शोभन सक्सेना ने कहा कि अमेरिका पर भारी कर्ज है और उसकी आर्थिक शक्ति काफी हद तक “पेट्रो-डॉलर” व्यवस्था पर आधारित है, जिसमें दुनिया का तेल व्यापार डॉलर में होता है. उन्होंने कहा कि यदि देश तेल व्यापार स्थानीय मुद्राओं में करने लगें तो डॉलर की वैश्विक स्थिति कमजोर हो सकती है. इसी संदर्भ में चीन, रूस और ईरान के बीच बढ़ते सहयोग को अमेरिका के लिए रणनीतिक चुनौती बताया गया.
भारत और इज़राइल के रिश्तों पर भी बातचीत का महत्वपूर्ण हिस्सा केंद्रित रहा. निधीश त्यागी ने सवाल उठाया कि आखिर क्यों बेंजामिन नेतन्याहू बार-बार यह दावा करते हैं कि भारत में उनके लिए भारी समर्थन मौजूद है. शोभन सक्सेना ने कहा कि भारत और इज़राइल के बीच व्यापार अपेक्षाकृत सीमित है और मुख्य रूप से रक्षा, अंतरिक्ष और निगरानी तकनीक तक केंद्रित है. उन्होंने यह भी कहा कि भारत के वास्तविक आर्थिक हित खाड़ी देशों से अधिक जुड़े हुए हैं, जहां बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं और जहां से भारत को भारी मात्रा में ऊर्जा आपूर्ति मिलती है.
भारतीय विदेश नीति पर शोभन सक्सेना ने कहा कि भारत को अपने दीर्घकालिक हितों के आधार पर निर्णय लेने चाहिए, न कि “दोस्ती” की भावनात्मक राजनीति के आधार पर. उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्थायी दोस्ती नहीं बल्कि स्थायी हित होते हैं.
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