13/04/2026: मसीहा ट्रंप| होर्मुज़ पर दबाव| तेल में आग| वोटिंग में बायोमेट्रिक| दलित छात्र मौत| कैंसर दवा घोटाला| आगबबूला मज़दूर| वसुंधरा का तंज़| हंगरी में महापरिवर्तन| डेटा जाल| गुरु ग्रंथ साहिब
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
ट्रंप बनाम पोप: बयानबाज़ी से बढ़ा वैश्विक वैचारिक टकराव
‘मसीहा’ तस्वीर से विवाद: ट्रंप और पोप लियो 14वें के बीच तीखी जुबानी जंग
अमेरिका-ईरान युद्ध गहराया: होर्मुज़ पर दबाव, तेल बाजार में उथल-पुथल
हंगरी में सत्ता परिवर्तन: ओर्बन युग का अंत, पीटर मग्यार की ऐतिहासिक जीत
डीयू में आरएसएस कार्यक्रम पर बवाल: विरोध कर रहे छात्रों से मारपीट, हिरासत में लिए गए
केरल में दलित छात्र की मौत: कन्नूर कॉलेज पर जातीय उत्पीड़न के गंभीर आरोप
वोटिंग में बायोमेट्रिक की मांग: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और केंद्र से जवाब तलब किया
कैंसर दवा घोटाला: असली वायल से नकली दवाओं का खतरनाक नेटवर्क उजागर
नोएडा में मजदूरों का उबाल: 20 हजार न्यूनतम वेतन की मांग पर हड़ताल तेज
पंजाब में सख्त कानून: गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी पर आजीवन कारावास का प्रावधान
वसुंधरा राजे के बयान से हलचल: राजस्थान भाजपा में अंदरूनी तनाव तेज
इस्लामाबाद वार्ता विफल: अमेरिका-ईरान टकराव में बढ़ता वैश्विक जोखिम
भारत की विदेश नीति पर सवाल: वैश्विक संकट में ‘मूकदर्शक’ क्यों?
दक्षिण चीन सागर विवाद: फिलीपींस ने चीन पर समुद्री ज़हर फैलाने का आरोप लगाया
ट्रंप अब जा भिड़े पोप से
राष्ट्रपति ट्रंप और पोप लियो 14वें के बीच आर-पार: ‘मसीहा’ वाली तस्वीर और तीखे हमलों से बढ़ा तनाव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और कैथोलिक धर्मगुरु पोप लियो 14वें के बीच वैचारिक युद्ध अब एक बेहद तल्ख मोड़ पर पहुँच गया है. न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्टर केटी रोजर्स, मोतोको रिच और क्लेयर मोसेस की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने पहले तो दुनिया के 1.4 अरब कैथोलिकों के सर्वोच्च धर्मगुरु को सोशल मीडिया पर जमकर कोसा और फिर खुद को ईसा मसीह (जीसस) के रूप में पेश करने वाली एक एआई निर्मित तस्वीर साझा कर दी. इस तनाव की शुरुआत तब हुई जब इतिहास के पहले अमेरिकी मूल के पोप लियो 14वें ने ईरान के साथ चल रहे अमेरिकी युद्ध की आलोचना की और इसे ‘अमानवीय हिंसा’ करार दिया. जवाब में ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक लंबी पोस्ट लिखकर पोप को “अपराध के प्रति नरम” और “कट्टरपंथी वामपंथियों का साथी” बता दिया. ट्रंप ने यहाँ तक दावा किया कि लियो केवल इसलिए पोप बन पाए क्योंकि वे (ट्रंप) व्हाइट हाउस में थे और चर्च ट्रंप से निपटने के लिए एक अमेरिकी पोप चाहता था.
विवाद तब और गहरा गया जब ट्रंप ने अपनी पोस्ट के कुछ ही देर बाद एक एआई फोटो साझा की, जिसमें वे सफेद और लाल चोगे में किसी ‘मसीहा’ की तरह अस्पताल के बिस्तर पर लेटे एक मरीज को ठीक करते दिख रहे हैं. इस तस्वीर में उनके पीछे अमेरिकी झंडा, लड़ाकू विमान और स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी जैसे प्रतीक दिखाई दे रहे हैं. यह तस्वीर सीधे तौर पर ईसा मसीह द्वारा बीमारों को चंगा करने वाली धार्मिक कलाकृतियों की नकल थी. यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने खुद को धार्मिक या शाही प्रतीकों के साथ जोड़ा हो; इससे पहले भी वे खुद को पोप के लिबास में और ताज पहने हुए ‘किंग’ के रूप में पेश कर चुके हैं, जिसकी भारी आलोचना हुई थी.
दूसरी ओर, वेटिकन के इस कड़े रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि वह झुकने को तैयार नहीं है. अल्जीरिया की 10 दिवसीय यात्रा पर रवाना होते समय विमान में पत्रकारों से बात करते हुए पोप लियो 14वें ने बड़ी बेबाकी से जवाब दिया. न्यूयॉर्क टाइम्स की मोतोको रिच के अनुसार, पोप ने कहा, “मुझे ट्रंप प्रशासन का कोई डर नहीं है. मैं यहाँ गॉस्पेल (सुसमाचार) का संदेश देने आया हूँ और वही करूँगा.” जब उनसे ट्रंप के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर किए गए हमलों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “यह विडंबना ही है कि उस साइट का नाम ‘सत्य’ (ट्रुथ) रखा गया है. बस इतना ही कहना काफी है.” पोप ने स्पष्ट किया कि वे किसी के साथ राजनीतिक बहस में नहीं पड़ना चाहते, लेकिन युद्ध के खिलाफ बोलना उनकी जिम्मेदारी है.
दोनों नेताओं के बीच यह टकराव पिछले कुछ महीनों से सुलग रहा था. ट्रंप प्रशासन के रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान को एक ‘ईसाई मिशन’ के रूप में पेश करने की कोशिश की थी, जिससे पोप ने खुद को पूरी तरह अलग कर लिया था. पिछले हफ्ते ट्रंप ने जब तेहरान को ‘मिटा देने’ की धमकी दी, तो पोप ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताते हुए ‘अस्वीकार्य’ कहा था. ट्रंप ने पलटवार करते हुए कहा कि पोप को “एक महान पोप बनने पर ध्यान देना चाहिए, न कि एक राजनीतिज्ञ बनने पर.” उन्होंने यह भी जोड़ा कि वे पोप के भाई लुई को ज्यादा पसंद करते हैं क्योंकि वे ट्रंप के ‘मागा’ आंदोलन के समर्थक हैं.
इस विवाद पर कैथोलिक समुदाय में भी तीखी प्रतिक्रिया हुई है. अमेरिकी कैथोलिक बिशप सम्मेलन के अध्यक्ष आर्कबिशप पॉल एस. कोकली ने ट्रंप के शब्दों को ‘निराशाजनक’ और ‘अपमानजनक’ बताया है. उन्होंने स्पष्ट किया कि पोप राष्ट्रपति के प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि मसीह के प्रतिनिधि हैं. वहीं, मशहूर जेसुइट पादरी जेम्स मार्टिन ने ट्रंप के आचरण को ‘अमर्यादित’ और ‘गैर-ईसाई’ करार देते हुए सवाल उठाया कि इस नैतिक पतन का अंत कहाँ होगा. फिलहाल, पोप लियो 14वें अपनी अफ्रीका यात्रा पर निकल चुके हैं, जहाँ वे शांति और संवाद का संदेश देना जारी रखेंगे, जबकि ट्रंप अपनी नीतियों और बयानों पर अडिग बने हुए हैं.
अमेरिका-ईरान युद्ध: होर्मुज़ की घेराबंदी, तेल के आसमान छूते दाम और सुलह की आख़िरी कोशिशें
अमेरिका और ईरान के बीच जारी 45 दिनों के युद्ध ने अब एक बेहद खतरनाक मोड़ ले लिया है. पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में 21 घंटे तक चली मैराथन शांति वार्ता बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त होने के बाद, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को ईरान के सभी बंदरगाहों की नौसैनिक घेराबंदी का आदेश दे दिया है. इस फ़ैसले के बाद दुनिया भर के बाज़ारों में हड़कंप मच गया है और ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 7 फ़ीसदी से ज़्यादा उछलकर 102 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँच गई है.
बातचीत की मेज़ पर क्या हुआ?
एक्सियोस के रिपोर्टर बराक राविद के अनुसार, बातचीत के दरवाज़े अभी पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं. पाकिस्तान, मिस्र और तुर्की के मध्यस्थ दोनों देशों के बीच की दूरियों को पाटने की कोशिश में जुटे हैं. अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि मुख्य विवाद परमाणु मुद्दों पर अटका है. अमेरिका चाहता है कि ईरान यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह रोक दे और अपने भंडार को सरेंडर कर दे, जबकि ईरान इसके बदले में अपनी ज़ब्त की गई भारी-भरकम राशि को छोड़ने की मांग कर रहा है. ईरानी विदेश मंत्री अब्बास आराघची ने आरोप लगाया कि वे समझौते के “बेहद करीब” थे, लेकिन ऐन वक़्त पर अमेरिका ने अपनी शर्तें बदल दीं. वहीं, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस वार्ता को “कठिन लेकिन रचनात्मक” बताया है.
होर्मुज़ की घेराबंदी और वैश्विक संकट
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने सोमवार सुबह 10 बजे (अमेरिकी समयानुसार) से ईरान के तटीय इलाकों की घेराबंदी शुरू कर दी है. ट्रंप का मक़सद ईरान की तेल से होने वाली कमाई को पूरी तरह रोकना है. ट्रंप ने सोशल मीडिया पर चेतावनी दी है कि जो भी जहाज़ ईरान को ‘अवैध टोल’ चुकाएगा, उसे अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में सुरक्षित रास्ता नहीं दिया जाएगा. हालांकि, अमेरिकी नौसेना गैर-ईरानी बंदरगाहों की ओर जाने वाले जहाज़ों को नहीं रोकेगी. इस फ़ैसले से यूरोपीय देश नाराज़ हैं; ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर और स्पेन के रक्षा मंत्री ने इस सैन्य कार्रवाई से खुद को अलग कर लिया है.
ईरान की जवाबी चेतावनी
’अल जज़ीरा’ के अनुसार, ईरान के ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स’ (आईआरजीसी) ने इस घेराबंदी को युद्धविराम का उल्लंघन बताया है. ईरानी सेना ने चेतावनी दी है कि अगर उनके बंदरगाहों को निशाना बनाया गया, तो ओमान की खाड़ी और फारस की खाड़ी में कोई भी बंदरगाह सुरक्षित नहीं रहेगा. ईरान के नौसेना प्रमुख ने ट्रंप की धमकी को “हास्यास्पद” करार दिया है. वहीं, ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने अमेरिका में बढ़ती पेट्रोल की कीमतों का मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि जल्द ही अमेरिकी जनता 4-5 डॉलर प्रति गैलन वाले पेट्रोल के दिनों को याद करेगी, क्योंकि कीमतें अब और बढ़ेंगी.
इज़राइल और लेबनान का मोर्चा
इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी घेराबंदी का समर्थन किया है. उन्होंने अपने कैबिनेट को बताया कि ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को न खोलकर युद्धविराम की शर्तों का उल्लंघन किया है. इस बीच, लेबनान में इज़राइली हमले जारी हैं. इज़राइली सेना ने दक्षिणी लेबनान के बिंत जबील कस्बे को घेर लिया है. हिज़्बुल्लाह ने भी जवाब में उत्तरी इज़राइल पर रॉकेटों की बौछार की है. मानवाधिकार संस्थाओं के अनुसार, इस युद्ध में अब तक ईरान में 1,701 नागरिक मारे गए हैं, जबकि लेबनान में यह संख्या 2,055 तक पहुँच गई है. अमेरिका ने भी इस संघर्ष में अपने 13 सैनिक खोए हैं.
मध्यस्थों को उम्मीद है कि 21 अप्रैल को युद्धविराम की मियाद खत्म होने से पहले बातचीत का एक और दौर संभव है. क्षेत्रीय सूत्रों का कहना है कि यह एक ‘बाज़ार’ की तरह है जहाँ दोनों पक्ष अपनी-अपनी बारगेनिंग कर रहे हैं. अगर ईरान लचीलापन दिखाता है, तो समझौता हो सकता है, वरना राष्ट्रपति ट्रंप ने बुनियादी ढांचों पर फिर से हवाई हमले शुरू करने के संकेत दिए हैं.
अपने ही शहर में शरणार्थी ‘सना’ : तेहरान की बमबारी में जीवित बचना, अपनी बिल्ली के साथ
‘अल जज़ीरा’ में आरिया फरहंद की यह रिपोर्ट ईरान पर हो हमलों के बीच तेहरान में रहने वाली 27 वर्षीय एक महिला सना के निजी अनुभवों और संघर्ष पर आधारित है. इसमें इस सच्चाई का मार्मिक चित्रण किया गया है कि कोई व्यक्ति जब अपने ही शहर में शरणार्थी बनकर जीता है तो उस पर क्या बीतती है?
सना, अपनी रूममेट फ़ातेमेह के साथ पश्चिमी तेहरान के दो कमरों वाले एक अपार्टमेंट में रहती है. अर्थशास्त्र की यह मास्टर छात्रा और एक निवेश फ़र्म में जोखिम नियंत्रण विश्लेषक पहले से ही जून 2025 के इज़राइल-ईरान युद्ध का सामना कर चुकी थी. जब फ़रवरी के अंत में ताज़ा युद्ध शुरू हुआ, तो उसने खुद से वादा किया कि वह फिर कभी शहर छोड़कर नहीं भागेगी.
उसने बताया, युद्ध की पूर्व संध्या पर, मेरे फ़ोन पर आने वाली हर ख़बर की दो ही संभावनाएँ थीं: या तो वे हमला करेंगे, या नहीं करेंगे. मैं देर रात तक इंतज़ार करती रही. पहले के हमले आधी रात के आसपास हुए थे, इसलिए मैं देखती रही. जब कुछ नहीं हुआ, तो मैंने कुछ फ़ारसी संगीत बजाया, घबराहट कम करने के लिए एक ड्रिंक ली और सोने चली गई. मैंने खुद से कहा कि रात बिना किसी हमले के बीत गई है.
मैं ग़लत थी.
28 फ़रवरी की सुबह 9:40 बजे थे जब तेहरान पर पहली मिसाइलें गिरीं. मैं शहर के पश्चिम में अपने अपार्टमेंट में नींद और जागने के बीच की स्थिति में थी. मेरे पड़ोस को अभी तक निशाना नहीं बनाया गया था. मैंने कोई धमाका नहीं सुना था. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या उम्मीद करूँ.
मेरा फ़ोन मैसेज की आवाज़ों से बजने लगा लेकिन मुझमें उठकर देखने की हिम्मत नहीं थी. जब फ़ोन की घंटी बजी, तो मुझे अहसास हुआ कि यह ज़रूरी है. यह मेरा बॉयफ़्रेंड था, उसकी कांपती हुई आवाज़ पूछ रही थी कि क्या मैं ठीक हूँ. इससे पहले कि मैं जवाब देती, वह बोल पड़ा: “उन्होंने हमला कर दिया. उन्होंने हमला कर दिया.”
उसे आगे कुछ समझाने की ज़रूरत नहीं थी.
कुछ ही मिनटों में, उत्तर में मज़ंदरान प्रांत के सारी शहर से, जहाँ मेरे माता-पिता और छोटी बहन रहते हैं, उनके फ़ोन आने लगे. वे मुझसे राजधानी छोड़ने की मिन्नतें कर रहे थे. मैंने अपनी बिल्ली, फ़नदोक़ की ओर देखा. उसने मुझे पलटकर देखा. मैंने खुद से एक वादा किया: चाहे कुछ भी हो जाए, मैं तेहरान छोड़कर नहीं जाऊँगी.
पिछले जून के 12 दिनों के युद्ध ने मेरे भीतर कुछ तोड़ दिया था. उसके तीसरे दिन, मेरे परिवार के दबाव ने मुझे शहर छोड़ने पर मजबूर कर दिया था. सारी तक का सफ़र बेहद कष्टदायक था, और मेरे माता-पिता का घर भीड़भाड़ वाला था; हममें से किसी को भी शांति नहीं मिली. इस बार, मैंने मना कर दिया. मेरे बॉयफ़्रेंड ने मुझसे किसी सुरक्षित जगह जाने का आग्रह किया. मैंने ना कह दिया.
दोपहर तक, मेरी रूममेट फ़ातेमेह आख़िरकार काम से घर पहुँच गई, जाम की वजह से उसकी डेढ़ घंटे की सामान्य यात्रा में चार घंटे लग गए थे. वह अंदर आई, अभी भी अपना कोट पहने हुए थी, बैठक के बीच में बैठ गई और रोने लगी – उसने बताया कि पहला धमाका उसके ऑफ़िस के ठीक पास हुआ था.
दिनचर्या
युद्ध एक भयावह दिनचर्या में बदल गया. हमने कुछ ख़ास समय पर हमलों की उम्मीद करना सीख लिया था: सुबह-सुबह, दोपहर में, और रात 11 बजे के बाद. बमबारी कभी भी इतनी अनुमानित नहीं थी कि सुरक्षित रहा जा सके, लेकिन ये वे घंटे थे जब हम स्वाभाविक रूप से खुद को संभाल लेते थे. बाहर जाने से बचने के लिए हम सुपरमार्केट डिलीवरी पर निर्भर रहते थे. अगर हमें बहुत ज़्यादा ज़रूरत होती, तो हम दुकानों तक दौड़कर जाते और तुरंत वापस आ जाते.
इंटरनेट एक अलग तरह का दम घुटने जैसा था. जब विदेश गए दोस्तों ने सुना कि “इंटरनेट नहीं है”, तो उन्होंने सोचा कि शायद सोशल मीडिया ब्लॉक हो गया है. लेकिन, ज़्यादातर लोगों के लिए, यह पूरी तरह से ब्लैकआउट था – हम गूगल भी लोड नहीं कर सकते थे. हम वीपीएन ख़रीदते रहते जो एक दिन काम करते और फिर बंद हो जाते. मेरा दैनिक जीवन पॉडकास्ट और यूट्यूब पर चलता था. अब वहाँ कुछ नहीं था. मैंने अपना दिमाग व्यस्त रखने के लिए उन स्थानीय सर्वरों से विदेशी टीवी सीरीज़ डाउनलोड कीं जो अभी भी चल रहे थे. मैंने किताबें पढ़ीं. मुझे ‘बग़दाद डायरीज़’ (2003 की एक किताब जो इराक़ युद्ध के बारे में है) की एक प्रति मिली, और मेरी अपनी वास्तविकता के साथ उसकी समानता ने मुझे सिहरा दिया. मैं बार-बार सोचती रही कि हम जिस दौर से गुज़र रहे हैं, उस पर पूरी एक किताब लिखी जा सकती है.
16 मार्च मेरे जीवन की सबसे बुरी रातों में से एक थी – हालाँकि इसकी शुरुआत काफी शांति से हुई थी.
दोस्तों के आग्रह पर, मैं उस शाम पास के एक कैफ़े में गई थी, हफ़्तों में पहली बार कुछ पलों के लिए सब कुछ सामान्य सा लगा. मैं रात करीब 9 बजे घर आई, थोड़ी सफ़ाई की और 11 बजे तक सो गई.
रात के 2:30 बजे, एक बड़े धमाके ने सन्नाटे को चीर दिया. उसकी ताक़त ने मुझे झकझोर कर उठा दिया. फ़ातेमेह पहले से ही जाग रही थी. हम लड़खड़ाते हुए गलियारे में आए, खिड़की से बाहर झांका – और तभी प्रकाश की एक तीव्र लहर ने अपार्टमेंट को भर दिया, जिसके बाद इतना ज़ोरदार धमाका हुआ कि हम दोनों चीख पड़ीं. हम अभी भी अपने पाजामे में थीं, बिना अपना फ़ोन उठाए, हम पार्किंग गैराज के सबसे निचले स्तर तक जाने वाली आग से बचने वाली सीढ़ियों की ओर भागे. कई पड़ोसी पहले से ही वहाँ मौजूद थे.
सात या आठ और धमाके हुए. वे हमारे पास मेहराबाद हवाई अड्डे के पास बमबारी कर रहे थे. मुझे सच में लगा कि मैं मरने वाली हूँ.
जब मैं आख़िरकार ऊपर गई, तो मेरी बिल्ली अलमारी में छिपी हुई थी और कांप रही थी. मेरा परिवार और बॉयफ़्रेंड घंटों से बिना किसी जवाब के कॉल और मैसेज कर रहे थे, वे हवाई अड्डे के पास हमलों की ख़बरें देख रहे थे और अनहोनी की आशंका जता रहे थे. अपनी बिल्ली को पीछे छोड़ जाने के कारण मुझमें अपराधबोध भर गया. मैंने सबको कॉल करके बताया कि मैं जीवित हूँ.
परिणाम
मुझे अपने ही शहर में एक शरणार्थी जैसा महसूस हुआ.
उस रात से पहले ही दिन अंधकारमय होने लगे थे. एक दिन, एक तेल डिपो पर हमला हुआ. मैं सड़क के कोने पर कुछ खरीदारी करने के लिए निकली थी. मैं रुकी और ऊपर देखा. दोपहर का समय था, लेकिन आसमान काला हो गया था. बिल्कुल काला. जैसे दुनिया का अंत हो रहा हो.
4 अप्रैल दफ़्तर में मेरा पहला दिन था – और वही दिन जब हमें पता चलना था कि हमारे अनुबंधों का नवीनीकरण किया जा रहा है या नहीं. जब मैं पहुँची, तो एक सहकर्मी पहले से ही गलियारे में हाथ में टर्मिनेशन लेटर लिए खड़ी रो रही थी कि वह अपना किराया कैसे देगी, युद्ध के बीच उसे काम कैसे मिलेगा. मैं उसके आँसू कभी नहीं भूलूँगी. दोपहर तक, आधे कर्मचारी – 41 में से 18 – निकाल दिए गए थे. किसी ने कोई काम नहीं किया.
मेरी नौकरी बच गई. तीन दिन बाद, घर लौटते समय सड़कें लगभग खाली थीं – जो यात्रा कभी एक घंटे से अधिक समय लेती थी, वह 20 मिनट से भी कम में पूरी हो गई. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हमला करने और हमारी “पूरी सभ्यता” को नष्ट करने की धमकी देने के बाद, सुनसान सड़कों पर सिर्फ़ पेट्रोल पंपों पर ही कतारें लगी थीं. लिफ्ट में, मेरा पड़ोसी पानी की बोतलों के दो बड़े पैक लेकर आया और बिल्डिंग के जनरेटर के लिए पैसे इकट्ठा करने के बारे में घबराहट में बात करने लगा. उस रात, फ़ातेमेह जल्दी सो गई, यह कहते हुए कि उसे अब किसी चीज़ की परवाह नहीं है. वह पूरी शाम अपने नाखून काट रही थी. वह सोने से पहले नहाई – ताकि वह साफ़ रहे, उसने मुझे बताया, अगर हमले के बाद पानी काट दिया जाए.
जब युद्धविराम की घोषणा हुई, तो मुझे विश्वास नहीं हुआ. मैं उस खंडन का इंतज़ार करती रही जो कभी नहीं आया. जब अंततः स्पष्ट हो गया कि युद्ध रुक गया है, तो ऐसा महसूस हुआ जैसे मेरे सीने से 100 किलोग्राम का बोझ उतर गया हो.
मैंने अपने सिर पर कंबल ओढ़ लिया, लेकिन पाया कि मैं अभी भी सो नहीं पा रही थी. अब आगे क्या होगा?
अगली सुबह मैंने सबसे पहले अपने बाल कटवाने और नाखून बनवाने का अपॉइंटमेंट बुक किया. दूसरी चीज़ जो मैंने की वह थी एक हाई-ग्रेड वीपीएन (VPN) खरीदना – जो महंगा था, लगभग 4 डॉलर प्रति गीगाबाइट — और हफ़्तों में पहली बार इंस्टाग्राम स्क्रॉल किया.
छोटी-छोटी चीज़ें. वैसी चीज़ें जो आपको फिर से इंसान महसूस कराती हैं.
इस लेख में इस्तेमाल किए गए नाम सुरक्षा कारणों से चुने गए उपनाम हैं.
बॉबी घोष: इस्लामाबाद के बाद की सुबह
विदेश मामलों के जानकार बॉबी घोष ने “घोषवर्ल्ड” में लिखा है कि इस्लामाबाद में शांति वार्ता विफल रही. अब हम एक ऐसे अनिश्चित मोड़ पर हैं जहाँ दोनों पक्षों द्वारा एक-दूसरे की मंशा को ग़लत समझने का गंभीर ख़तरा है.
ईरान और पश्चिम के बीच कूटनीति का एक अपना पुराना सिलसिला रहा है, जो अब अज़ान की आवाज़ की तरह परिचित हो चुका है. प्रतिनिधिमंडल किसी तटस्थ स्थान पर पहुँचते हैं, चर्चा शुरू होती है, दोनों पक्ष अपनी माँगों से पीछे हटने से इनकार कर देते हैं, वे तय करते हैं कि बात जारी रखने का कोई मतलब नहीं है, और विदाई लेते समय प्रतिनिधिमंडल इस विफलता के लिए एक-दूसरे को दोषी ठहराते हैं. उन लोगों के लिए जिन्होंने सालों तक चली उस बातचीत पर नज़र रखी थी जिसके परिणामस्वरूप अंततः 2015 का परमाणु समझौता हुआ था, इस्लामाबाद का यह गतिरोध पूरी तरह से अपेक्षित था, हालाँकि यह उम्मीद से थोड़ा पहले ही हो गया.
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस 21 घंटे की बातचीत के बाद रविवार को पाकिस्तान से रवाना हो गए, जिसका कोई परिणाम नहीं निकला. उन्होंने घोषणा की कि ईरान ने अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को छोड़ने की प्रतिबद्धता जताने से इनकार कर दिया है. दूसरी ओर, तेहरान के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाक़ेर ग़ालिबाफ़ ने वॉशिंगटन की “अत्यधिक माँगों” को इस विफलता का ज़िम्मेदार ठहराया.
दोनों पक्षों को मेज़ पर लाने वाला वह कमज़ोर युद्धविराम अब संदेह के घेरे में है. भले ही सैन्य संघर्ष तुरंत शुरू न हों, लेकिन यह युद्ध अपना असर डालना जारी रखेगा — और सिर्फ़ लड़ने वाले देशों पर ही नहीं. ईरान ने हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अपनी पकड़ बना रखी है, जिससे खाड़ी अरब देशों से हाइड्रोकार्बन और अन्य महत्वपूर्ण वस्तुएं वैश्विक बाज़ारों तक नहीं पहुँच पा रही हैं. इस बीच, राष्ट्रपति ट्रंप ईरान को इसी जलडमरूमध्य के ज़रिए अपना तेल भेजने से रोकने के लिए ‘जैसे को तैसा’ की तर्ज़ पर नाकाबंदी की धमकी दे रहे हैं.
लेकिन इससे पहले कि हम वार्ता के एक विफल दौर को कूटनीति के अंत के रूप में देख लें, यह विचार करना ज़रूरी है कि यह क्षण किसके समान है — और इससे भी महत्वपूर्ण यह कि यह समानता कहाँ ख़त्म होती है.
मैं ख़ास तौर पर अप्रैल 2013 के बारे में सोच रहा हूँ, जब ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर दो दौर की वार्ता के लिए वार्ताकार कज़ाकिस्तान के अल्माटी में मिले थे. अमेरिकियों और ईरानियों के अलावा, वहाँ दुनिया की बड़ी शक्तियों के राजनयिक भी मौजूद थे. यह समझौता करने की मंशा का एक गंभीर प्रदर्शन था. इसके बावजूद, बातचीत बिना किसी समझौते के और भविष्य की बैठकों की किसी तारीख़ के बिना समाप्त हो गई. आर्म्स कंट्रोल एसोसिएशन के रिकॉर्ड के अनुसार “दोनों पक्षों के बीच दूरियाँ बरक़रार रहीं.”
हालाँकि, बाद में वार्ता फिर से शुरू हुई. और 27 महीनों के बाद — एक अंतरिम समझौते, समय सीमा में चार विस्तारों और ग्यारह शहरों में विदेश मंत्री जॉन केरी और विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ के बीच अठारह मुलाक़ातों के बाद — दुनिया के पास अंततः वियना में हस्ताक्षरित ‘जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ़ एक्शन’ (जेसीपीओए) था.
लेकिन अगर आप उस मिसाल से तसल्ली पाने की कोशिश कर रहे हैं, तो मैं आपको बता दूँ कि हमें ऐसा क्यों नहीं करना चाहिए.
2013 की वे वार्ताएं उन विरोधियों के बीच हुई थीं जो ‘शीत शांति’ (कोल्ड पीस) की स्थिति में थे. तब कोई अमेरिकी पायलट इस्फहान के ऊपर उड़ान नहीं भर रहा था. हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में कोई ईरानी समुद्री सुरंगें नहीं तैर रही थीं. अल्माटी वार्ता प्रतिबंधों और आपसी संदेह की पृष्ठभूमि में विफल हुई थी; जबकि इस्लामाबाद वार्ता छह हफ़्तों के युद्ध, एक मारे गए सर्वोच्च नेता और एक वैश्विक तेल संकट की पृष्ठभूमि में विफल हुई है जो अभी भी जारी है. सक्रिय संघर्ष की छाया में की जाने वाली कूटनीति पूरी तरह से अलग मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक दबावों के तहत काम करती है. यहाँ समय तेज़ी से बीतता है और अस्पष्टता के लिए जगह ख़त्म हो जाती है. घरेलू राजनीति के मंच पर हर रियायत समर्पण का काम लगने लगती है.
अल्माटी का उदाहरण यह स्पष्ट करता है कि इस तरह की कूटनीति का स्वरूप कैसा होता है: यह महीनों और वर्षों तक चलने वाला कठिन, तकनीकी और दोहराव वाला काम है, न कि केवल सप्ताहांत के शिखर सम्मेलन. इसमें मेज़ के चारों ओर बैठे हाई-प्रोफ़ाइल राजनेताओं के अलावा भौतिकविदों, पूर्व आईएईए (अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी) निरीक्षकों और अनुभवी राजनयिकों की फ़ौज की मेहनत शामिल होती है — वे लोग जो एक वास्तविक रियायत और सामरिक चाल के बीच अंतर कर सकते हैं, जिन्हें पता होता है कि ईरान की कौन सी ‘रेड लाइन’ बुनियादी है और कौन सी केवल शुरुआती बोली है.
‘जेसीपीओए’ टीम के पास यह सब था और वे कहीं अधिक अनुकूल परिस्थितियों में बातचीत कर रहे थे. फिर भी अल्माटी से वियना तक पहुँचने में 27 महीने लगे.
इस बार, ईरानी इस्लामाबाद में 70 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल लेकर आए, जिसमें ‘जेसीपीओए’ के अनुभवी विदेश मंत्री अब्बास अराक़ची भी शामिल थे. ट्रंप ने वेंस, विटकॉफ़ और कुशनर को भेजा, जो इस कार्य के लिए बेहद अनुपयुक्त हैं. प्रतिनिधिमंडलों की गुणवत्ता में यह असमानता इस्लामाबाद के गतिरोध को समाप्त करने की संभावनाओं को और जटिल बना देगी.
जहाँ तक मेरी बात है, मैं इस बारे में थोड़ा आशावादी हूँ कि दोनों पक्ष फिर से मिलेंगे. कब, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है. जब वे उन 21 घंटों की बातचीत से मिले सबक़ का आकलन करेंगे, तो प्रत्येक पक्ष दूसरी बैठक से प्रगति की संभावनाओं की गणना करेगा. गतिरोध दबाव और धैर्य की परीक्षा होते हैं. दबाव प्रतिद्वंद्वी के विकल्पों को कम करता है; धैर्य दोनों पक्षों को धीरे-धीरे उन रास्तों को खोजने की अनुमति देता है जिन्हें दोनों स्वीकार कर सकें. ये कोई अदल-बदल कर इस्तेमाल होने वाली चीज़ें नहीं हैं. आपको दोनों की ज़रूरत है और तब तक ज़रूरत है जब तक कि लक्ष्य हासिल न हो जाए.
यह समझना मुश्किल नहीं है कि दोनों पक्षों में से किसके पास ये गुण अधिक मात्रा में हैं. इस्लामिक गणराज्य ने चार दशकों के प्रतिबंधों, परमाणु वैज्ञानिकों की हत्याओं, अपने सेंट्रीफ्यूज पर साइबर हमलों और अब एक युद्ध जिसमें उसके सर्वोच्च नेता मारे गए, के बावजूद दर्द सहने की एक उल्लेखनीय राष्ट्रीय क्षमता का प्रदर्शन किया है. छह हफ़्तों की कड़ी सज़ा के बाद भी, इस्लामाबाद में उसकी शुरुआती चाल अधिकतमवादी माँगें रखने की थी.
लेकिन क्या तेहरान की शासन व्यवस्था तीन महीने और दबाव सह सकती है? या छह महीने? या बारह? ट्रंप के पास तेहरान के विद्रोही रवैये को परखने का एकमात्र तरीक़ा दबाव बनाए रखना है. लेकिन वह अपने धैर्य के लिए नहीं जाने जाते — और उनके पास बहुत अधिक समय भी नहीं है.
नवंबर में मध्यावधि चुनाव हैं, और हर बीतते हफ़्ते के साथ युद्ध की आर्थिक क़ीमत बढ़ती जा रही है, जिसका राजनीतिक ख़ामियाज़ा राष्ट्रपति और उनकी पार्टी को भुगतना पड़ सकता है.
आर्थिक कष्टों के साथ तेहरान का राजनीतिक संबंध उस लोकतांत्रिक नेता से अलग है जिसे चुनाव का सामना करना है. ईरान के शासक पेट्रोल पंप पर खड़े मतदाताओं के प्रति जवाबदेह नहीं हैं. वहाँ के राजनीतिक वर्ग ने पैंतालीस साल तक ‘प्रतिरोध’ की एक ऐसी कहानी गढ़ी है जो कठिनाई को राष्ट्रीय गुण के प्रमाण में बदल देती है.
घड़ियों की अलग-अलग गति और दर्द सहने की क्षमता के इस समीकरण में एक और जटिलता जोड़ दीजिए: यह वास्तविक संभावना कि प्रत्येक पक्ष अपनी ताक़त को बहुत अधिक और दूसरे के संकल्प को बहुत कम आँक रहा है.
इस्लामाबाद से रवाना होने वाली ईरानी टीम ने माना होगा कि वेंस की “अंतिम और सर्वश्रेष्ठ पेशकश” की घोषणा एक क्लासिक कूटनीतिक चाल थी — दूसरे पक्ष को झुकाने का एक तरीक़ा. लेकिन वे जिस चीज़ का ग़लत आकलन कर सकते हैं, वह है राजनीतिक विरोध के बावजूद ट्रंप द्वारा हमले के एक और दौर का आदेश देने की इच्छा. अमेरिकी सैन्य संपत्ति क्षेत्र में लगातार पहुँच रही है. अमेरिकी जहाज़ समुद्री सुरंगों को हटाने के अभियान के लिए जलडमरूमध्य से गुज़रे हैं. राष्ट्रपति का मानना है कि ईरानी सभ्यता को समाप्त करने की उनकी पिछली धमकी ही ग़ालिबाफ़ और उनके साथियों को बातचीत की मेज़ पर लाई थी; वे सोच सकते हैं कि अपनी गंभीरता का प्रदर्शन करने से वे ईरान को अपनी शर्तें मानने पर मजबूर कर देंगे.
इस्लामिक गणराज्य के इतिहास में ऐसा बहुत कम है जो यह संकेत दे कि हमलों का एक और दौर उसे आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर देगा. इसके बजाय, ईरान पूरी तरह से युद्धविराम के ढांचे को छोड़ने और इज़राइल, खाड़ी अरब देशों और आस-पास के अमेरिकी सैन्य ठिकानों के ख़िलाफ़ मिसाइल और ड्रोन हमले फिर से शुरू करने का फ़ैसला कर सकता है.
होर्मुज़ जितना अधिक समय तक बंद रहेगा, दोनों पक्षों द्वारा ग़लत आकलन का ख़तरा उतना ही बढ़ जाएगा. अब पीछे मुड़कर देखने पर, अप्रैल 2013 में अल्माटी में वार्ता की विफलता एक मामूली झटका लगती है. इतिहास अप्रैल 2026 में इस्लामाबाद की विफलता के प्रति शायद इतना उदार न रहे.
आकार पटेल : वैश्विक मूकदर्शक
मुझे पता नहीं क्यों, लेकिन हमें अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का विचार अरुचिकर लगता है. यह अरुचि मध्यस्थता किए जाने वालों और मध्यस्थ, दोनों के लिए है. हम यह इसलिए जानते हैं क्योंकि हमारा ज़ोर हमेशा इस बात पर रहता है — और यह कहा जाना चाहिए कि यह हमारी सभी सरकारों के तहत रहा है — कि चीज़ें द्विपक्षीय हैं और उन्हें द्विपक्षीय रूप से ही सुलझाया जाना चाहिए. यह ज़ाहिर तौर पर विशेष रूप से एक पड़ोसी के संदर्भ में है. और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थों के बारे में हमारी तिरस्कारपूर्ण राय विदेश मंत्री द्वारा व्यक्त की गई थी जिन्होंने उन्हें ‘दलाल’ कहा था.
जो समस्या हमें शामिल करती है और प्रभावित करती है, उसे हल करने के लिए हम अभी क्या कर रहे हैं, यह फ़िलहाल स्पष्ट नहीं है. हम इसमें शामिल हैं क्योंकि हम भी दुनिया के बाकी हिस्सों की तरह कीमतों और कमी के मामले में पीड़ित हैं, लेकिन हम मूकदर्शक बने रहने और यह उम्मीद करने में संतुष्ट हैं कि संकट खुद ही सुलझ जाएगा, या कोई और आकर इसे सुलझा देगा, ताकि हमारे लिए चीज़ें फिर से सामान्य हो जाएँ. भारत ने चल रहे युद्ध के प्रति यही नज़रिया अपनाने का फ़ैसला किया है और हम इस बात पर सहमत या असहमत हो सकते हैं कि क्या भारत को कुछ और या कुछ अलग करना चाहिए था या कर सकता था. वह ठीक है.
मैं उस दूसरे दृष्टिकोण के बारे में लिखना चाहता था, जिसका इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है. हमें इसके बारे में अटकलें लगाने की ज़रूरत नहीं है कि वह क्या हो सकता है क्योंकि पिछली सरकार ने हमारे लिए एक दस्तावेज़ छोड़ा है जो हमें बताता है कि इसे क्या होना चाहिए.
4 नवंबर 2013 को, तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारतीय मिशनों के 120 से अधिक प्रमुखों को संबोधित किया और उन पांच सिद्धांतों को रेखांकित किया जिन्होंने उनकी विदेश नीति को परिभाषित किया था. ये थे:
पहला, यह स्वीकार करना कि दुनिया — प्रमुख शक्तियों और एशियाई पड़ोसियों — के साथ भारत के संबंध उसकी विकासपरक प्राथमिकताओं से आकार लेते हैं. सिंह ने कहा था कि ‘भारतीय विदेश नीति का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य एक ऐसा वैश्विक वातावरण बनाना होना चाहिए जो हमारे महान देश की भलाई के लिए अनुकूल हो’.
दूसरा, विश्व अर्थव्यवस्था के साथ अधिक एकीकरण से भारत को लाभ होगा और भारतीय अपनी रचनात्मक क्षमता को साकार कर सकेंगे. तीसरा, सभी प्रमुख शक्तियों के साथ स्थिर, दीर्घकालिक और पारस्परिक रूप से लाभकारी संबंध खोजना. और सभी राष्ट्रों के लिए फ़ायदेमंद वैश्विक आर्थिक और सुरक्षा वातावरण बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर काम करना. चौथा, यह पहचानना कि भारतीय उपमहाद्वीप की साझा नियति के लिए अधिक क्षेत्रीय सहयोग और संपर्क की आवश्यकता है.
पांचवां, एक ऐसी विदेश नीति जो न केवल हितों से, बल्कि भारतीयों के प्रिय मूल्यों से भी परिभाषित हो: ‘एक बहुलवादी, धर्मनिरपेक्ष और उदार लोकतंत्र के ढांचे के भीतर आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने के भारत के प्रयोग ने दुनिया भर के लोगों को प्रेरित किया है और इसे जारी रखना चाहिए’.
संक्षेप में: भारत अपनी आर्थिक प्रगति को आगे बढ़ाने के लिए विदेश नीति का उपयोग करेगा; यह वैश्विक महाशक्तियों और अपने पड़ोसियों के साथ मैत्रीपूर्ण रहेगा; और एक बहुलवादी और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बने रहकर उसे ऐसा करने में मदद मिलेगी.
चूंकि यह इस बात का स्पष्ट विवरण था कि क्या हासिल करने की कोशिश की गई थी, हम इसे आज यह देखने के लिए लागू कर सकते हैं कि हम क्या अलग करेंगे. आइए हम प्रत्येक को बारी-बारी से लें.
यदि हम इस बात से सहमत हैं कि ‘भारतीय विदेश नीति का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य भारत की भलाई के अनुकूल वैश्विक वातावरण बनाना होना चाहिए’, तो यह स्पष्ट है कि हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि वातावरण दूषित न हो. इसका मतलब उन लोगों के साथ जुड़ना है जिनके पास हमारे विकास को नुकसान पहुँचाने की शक्ति है. भारत उन कुछ देशों में से एक है, और शायद अकेला देश है, जिसके अमेरिका, इज़राइल और ईरान के साथ अच्छे संबंध हैं. पाकिस्तान इनमें से दो के साथ मैत्रीपूर्ण है. यह जानते हुए कि खाड़ी में युद्ध हमारी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाएगा, उर्वरकों और ईंधन की आपूर्ति को चोट पहुँचाएगा और सामान्य अराजकता पैदा करेगा, हमें यह सुनिश्चित करने की कोशिश करनी चाहिए थी कि यह युद्ध शुरू न हो. हमने ऐसा न करने का विकल्प चुना.
एकीकरण पर दूसरा बिंदु वह है जिसके बारे में हम पिछले दशक में सावधान, यदि सतर्क नहीं, तो हो गए हैं. हमने क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) में शामिल नहीं होने का विकल्प चुना जिसमें लगभग 15 एशिया प्रशांत देश शामिल थे और अर्थशास्त्रियों की राय, जिनमें वे भी शामिल हैं जो प्रधानमंत्री को पसंद करते हैं, यह है कि भारत अनावश्यक रूप से संरक्षणवादी बन गया है.
“सभी शक्तियों” के साथ दीर्घकालिक पारस्परिक रूप से लाभकारी संबंध तलाशने के तीसरे बिंदु का अर्थ चीन के संबंध में है. 2020 के बाद से हमने इस पर कितनी सक्रियता दिखाई है और चीज़ें कहाँ खड़ी हैं, यह स्पष्ट है और हमें यहाँ उस पर रुकने की ज़रूरत नहीं है.
सिंह द्वारा उठाए गए चौथे और पांचवें बिंदु मेरे विचार में वे हैं जहाँ 2014 के बाद से अधिकतम विचलन हुआ है. दक्षिण एशिया में सीमाएँ या तो कठोर हैं या बंद हैं, मुक्त आवाजाही असंभव है और ऐसा इसलिए है क्योंकि हम एकमात्र शक्ति के रूप में जो बाकी सभी के साथ सीमाएँ साझा करते हैं, ऐसा ही चाहते हैं.
अंत में, 1947 के बाद पहली बार, हम एक बड़े और लोकप्रिय राजनीतिक आंदोलन का सामना कर रहे हैं जो बहुलवादी, धर्मनिरपेक्ष और उदार भारत के विचार के प्रति शत्रुतापूर्ण है. इज़राइल के साथ हमारी नई गहरी दोस्ती को इसी आलोक में समझा जाना चाहिए. इज़राइल हमारा 49वां सबसे बड़ा निर्यात और 48वां सबसे बड़ा आयात भागीदार है, जो सबसे कम में से एक है. हम इज़राइल के प्रति इतने आसक्त क्यों हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि हम अपने अल्पसंख्यकों के साथ वही करने के लिए लालायित हैं जो इज़राइल अपने अल्पसंख्यकों के साथ कर रहा है.
हम यहाँ खड़े हैं और हमने यही करने का चुनाव किया है. अगर हमें लगता है कि हमें रास्ता सुधारने की ज़रूरत है, तो डेढ़ दशक पहले की मनमोहन सिंह की बुद्धिमान, दयालु और नपी-तुली सलाह शुरू करने के लिए एक बेहतरीन जगह है.
हंगरी में महापरिवर्तन: विक्टर ओर्बन के ‘अभेद्य’ किले को ढहाकर पीटर मग्यार ने रचा इतिहास; यूरोप और अमेरिका तक गूँजी जीत की धमक
हंगरी की राजनीति में 13 अप्रैल 2026 की सुबह एक नए युग के आगाज़ के रूप में दर्ज हुई है. रिपोर्ट्स और विश्लेषणों के अनुसार, प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन का 16 साल पुराना सत्ता पर कब्ज़ा अब खत्म हो गया है. उनके पूर्व सहयोगी से कट्टर विरोधी बने 45 वर्षीय पीटर मग्यार और उनकी ‘तिस्ज़ा’ पार्टी ने रविवार के चुनाव में ऐसी ऐतिहासिक जीत हासिल की है, जिसे दुनिया भर के राजनीतिक विश्लेषक ‘असंभव’ मान रहे थे. चुनाव के जो नतीजे सामने आ रहे हैं, उनमें मग्यार की पार्टी 137 सीटों के साथ दो-तिहाई बहुमत की ओर बढ़ रही है. यह केवल एक चुनावी जीत नहीं है, बल्कि उस ‘इलिबरल डेमोक्रेसी’ (अनुदार लोकतंत्र) के मॉडल की हार है जिसे ओर्बन ने वर्षों की मेहनत से खड़ा किया था.
न्यूयॉर्क टाइम्स के लिए अकोस स्टिलर की रिपोर्ट मग्यार के उदय की दिलचस्प कहानी बताती है. मग्यार कोई बाहरी व्यक्ति नहीं थे; वे दो दशकों तक ओर्बन की ‘फिडेज़’ पार्टी के वफादार सिपाही रहे, ब्रुसेल्स में राजनयिक रहे और उनकी पूर्व पत्नी जूडित वर्गा ओर्बन सरकार का प्रमुख चेहरा थीं. लेकिन 2024 में एक बाल यौन शोषण मामले के अपराधी को माफी देने के घोटाले ने मग्यार के ज़मीर को झकझोर दिया और उन्होंने ओर्बन से नाता तोड़ लिया. मग्यार ने अपनी राजनीति को भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग और यूरोपीय संघ के साथ बिगड़े रिश्तों को सुधारने पर केंद्रित किया. उन्होंने ओर्बन के उन प्रोपेगेंडा हथियारों को कुंद कर दिया, जिनका इस्तेमाल वे विपक्ष को डराने के लिए करते थे. मग्यार ने यूक्रेन युद्ध या एलजीबीटीक्यू जैसे मुद्दों पर ओर्बन के बिछाए जाल में फंसने के बजाय सीधे तौर पर बदहाल स्वास्थ्य सेवा, भ्रष्टाचार और आर्थिक सुस्ती को मुद्दा बनाया.
सीएनएन के क्रिस्टियन एडवर्ड्स बुडापेस्ट से रिपोर्ट करते हैं कि ओर्बन की हार ने ‘लोकलुभावनवाद’ के अंत की ओर इशारा किया है. ओर्बन ने खुद को हंगरी की संप्रभुता का इकलौता रक्षक बताया था, लेकिन उनकी हार तब हुई जब वे पूरी तरह विदेशी ताकतों पर निर्भर हो गए. चुनाव से ठीक पहले डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें ‘असली फाइटर’ बताकर वोट देने की अपील की और उनके उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जे.डी. वेंस ने खुद बुडापेस्ट आकर ओर्बन के लिए लॉबिंग की. एडवर्ड्स के अनुसार, यह बेहद विरोधाभासी था कि एक राष्ट्रवादी नेता अपनी जीत के लिए विदेशी ताकतों की मदद ले रहा था, जिसे हंगरी की जनता ने पसंद नहीं किया. बुडापेस्ट की सड़कों पर उमड़ी हज़ारों की भीड़ का जोश 1989 में सोवियत संघ के पतन के समय जैसा था. लेखक और कवि आंद्रास पेटोज़ ने सीएनएन को बताया कि मग्यार की जीत ‘शासन परिवर्तन’ जैसी महसूस हो रही है.
यूरोपीय संघ के नज़रिए से यह जीत कितनी बड़ी है, इसका अंदाज़ा न्यूयॉर्क टाइम्स की दूसरी रिपोर्ट से मिलता है. विक्टर ओर्बन वर्षों से यूरोपीय संघ के हर अहम फैसले में रोड़ा अटका रहे थे, चाहे वह रूस पर प्रतिबंध हों या यूक्रेन को आर्थिक मदद. अब पीटर मग्यार के आने से यूक्रेन के लिए रुका हुआ 90 बिलियन यूरो का ऋण मिलने का रास्ता साफ हो गया है. यूरोपीय संघ की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसे ‘मज़बूत संघ’ की शुरुआत बताया है. हालांकि, मग्यार पूरी तरह से ई.यू. के हाथ की कठपुतली नहीं बनेंगे; उन्होंने साफ़ किया है कि हंगरी की ऊर्जा ज़रूरतों के लिए रूस पर निर्भरता रातों-रात खत्म नहीं की जा सकती. राजनीति शास्त्र के विशेषज्ञ मुजतबा रहमान के अनुसार, ओर्बन की हार ने ई.यू. को उस ‘ब्लैकमेल’ से बचा लिया है जो ओर्बन अक्सर वीटो के ज़रिए करते थे.
पॉलिटिको के अलेक्जेंडर बर्न्स का विश्लेषण इस जीत का एक और सिरा अमेरिका से जोड़ता है. बर्न्स लिखते हैं कि ओर्बन की हार ट्रंप और उनके ‘मागा’ आंदोलन के लिए एक बड़ी शर्मिंदगी है. लेकिन सबसे बड़ा सबक अमेरिकी डेमोक्रेट्स के लिए है. मग्यार की जीत यह सिखाती है कि जब व्यवस्था जड़ हो जाए, तो पुराने और ‘सुरक्षित’ चेहरों (जैसे हिलेरी क्लिंटन या जो बाइडन) के बजाय ऐसे विद्रोही नेतृत्व की ज़रूरत होती है जो पुरानी राजनीतिक संरचनाओं को ध्वस्त कर सके. मग्यार ने साबित किया कि एक नई पार्टी बनाकर और ज़मीनी स्तर पर जनता से जुड़कर तानाशाही शासन को भी उखाड़ा जा सकता है.
वहीं, द अटलांटिक की ऐन एप्पलबॉम का मानना है कि ओर्बन की हार ने ‘इलिबरलिज़्म’ की अपरिहार्यता को खत्म कर दिया है. उन्होंने उन खोजी पत्रकारों (जैसे Direkt26 के साबोल्क्स पनी) की तारीफ की जिन्होंने ओर्बन के उस झूठ को पकड़ा जिसमें वे खुद को राष्ट्रवादी कहते थे लेकिन गुप्त रूप से पुतिन और लावरोव के साथ मिलकर यूरोपियन यूनियन (ईयू) की सूचनाएं लीक कर रहे थे.
पीटर मग्यार के सामने अब कांटों भरा रास्ता है. ओर्बन ने जाते-जाते सरकारी खज़ाना खाली कर दिया है और महत्वपूर्ण संस्थानों में अपने वफादारों को तैनात कर रखा है. मग्यार ने अपने विजय भाषण में साफ़ कर दिया कि वे ओर्बन को केवल ‘कार्यवाहक’ प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं और जल्द ही संवैधानिक पदों पर बैठे ओर्बन के लोगों को इस्तीफा देना होगा. एप्पलबाउम के अनुसार, यह चुनाव एक ऐतिहासिक मोड़ है क्योंकि इसने साबित किया कि ‘असली जनता’ अंततः भ्रष्टाचार और झूठ से थक जाती है. मग्यार की जीत के बाद बुडापेस्ट के हीरोज़ स्क्वायर में “यूरोप, यूरोप” और “रूसी, घर जाओ” के नारे गूँज रहे थे, जो इस बात का प्रमाण है कि हंगरी ने अपनी जड़ों की ओर लौटने का फैसला कर लिया है.
दिल्ली यूनिवर्सिटी में आरएसएस के कार्यक्रम का विरोध, छात्रों के साथ मारपीट
मक्तूब मीडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. भीमराव आंबेडकर कॉलेज में सोमवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के एक कार्यक्रम का विरोध कर रहे छात्रों के साथ सुरक्षा गार्डों और आयोजकों द्वारा कथित तौर पर मारपीट की गई.
यह घटना कॉलेज के ऑडिटोरियम में आयोजित कार्यक्रम “सेवा, संगठन, संस्कृति और विकसित भारत में युवाओं की भूमिका” के दौरान हुई. रिपोर्ट के मुताबिक, जब छात्रों ने “आरएसएस गो बैक” के नारे लगाए, तो उन्हें हिंसक तरीके से रोका गया. सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में सुरक्षाकर्मियों और आयोजकों को प्रदर्शनकारी छात्रों और छात्राओं पीटते हुए देखा जा सकता है.
इस मामले में दिल्ली पुलिस ने चार छात्रों को हिरासत में लेकर ज्योतिनगर पुलिस स्टेशन में रखा है. इनमें से तीन छात्र एसएफआई के और एक फ्रेटरनिटी मूवमेंट का सदस्य है. फ्रेटरनिटी के राष्ट्रीय महासचिव लुबैब बशीर ने छात्रों की तत्काल रिहाई की मांग करते हुए कि एक सार्वजनिक विश्वविद्यालय में आरएसएस जैसे संगठन को कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति कैसे दी जा रही है.
केरल: कन्नूर डेंटल कॉलेज में जातिगत उत्पीड़न से तंग आकर दलित छात्र ने की आत्महत्या
मक्तूब मीडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, केरल के कन्नूर जिले स्थित कन्नूर डेंटल कॉलेज में जाति-आधारित उत्पीड़न के चलते एक दलित छात्र द्वारा आत्महत्या का हृदयविदारक मामला सामने आया है. 22 वर्षीय आर. एल. नितिन राज, कॉलेज में बीडीएस प्रथम वर्ष के छात्र थे. नितिन कॉलेज परिसर के पीछे गंभीर रूप से घायल अवस्था में मिले थे, जिसके बाद उन्हें तुरंत कन्नूर मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया गया, जहाँ दोपहर करीब 3 बजे उन्होंने दम तोड़ दिया.
नितिन के पिता, राजन ने आरोप लगाया है कि कॉलेज के शिक्षक उनके बेटे को जातिसूचक शब्दों और अपमानजनक टिप्पणियों से लगातार प्रताड़ित कर रहे थे. उन्होंने बताया कि नितिन को सार्वजनिक रूप से उनकी जाति, रंग और पिता के पेशे को लेकर निशाना बनाया जाता था. पिता के अनुसार, “एक शिक्षक ने मेरे बेटे को ‘सड़ा हुआ कुत्ता’ कहकर सार्वजनिक रूप से अपमानित किया था.”
नितिन की मृत्यु के बाद एक ऑडियो क्लिप भी सामने आई है, जिसमें वे अपनी पीड़ा व्यक्त कर रहे हैं. क्लिप में नितिन को यह कहते सुना जा सकता है– “मैंने इन अपमानों को जहाँ तक संभव था सहा. उन्होंने मेरी माँ और उनकी सर्जरी तक का मजाक उड़ाया. मेरी उत्तर पुस्तिका को दूसरे छात्रों के बीच घुमाया गया ताकि मेरी स्पेलिंग की गलतियों पर सब हँस सकें.”
इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए फ्रेटरनिटी मूवमेंट के प्रदेश अध्यक्ष नईम गफूर एन.के. ने इसे “आत्महत्या नहीं, बल्कि एक संस्थागत हत्या” करार दिया है. वहीं, कांग्रेस नेता रमेश चेन्निथला ने भी चिंता जताते हुए कहा कि प्रगतिशील समाज का दावा करने के बावजूद शिक्षण संस्थानों में इस तरह का जातिगत भेदभाव बना रहना बेहद शर्मनाक है.
मामले की गंभीरता को देखते हुए कॉलेज प्रशासन ने विभाग प्रमुख डॉ. एम. के. राम और डॉ. के. टी. संगीता नंबियार को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है. साथ ही, केरल राज्य मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान लेते हुए पुलिस को एक सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है.
दिल्ली दंगा: उमर खालिद ने जमानत खारिज होने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की
स्क्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली दंगों से जुड़े साजिश के मामले में जेल में बंद कार्यकर्ता उमर खालिद ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. उन्होंने अपनी जमानत याचिका खारिज करने के शीर्ष अदालत के जनवरी के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की है.
जनवरी में जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की अध्यक्षता वाली पीठ ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया था. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि वे सभी ‘सुरक्षित गवाहों’ के बयान दर्ज होने के बाद या एक साल बीत जाने के बाद फिर से जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं.
यह मामला फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़की सांप्रदायिक हिंसा से जुड़ा है. यह हिंसा नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के समर्थकों और विरोधियों के बीच झड़प के बाद शुरू हुई थी, जिसमें 53 लोगों की जान चली गई थी और सैकड़ों घायल हुए थे. मृतकों में अधिकांश मुस्लिम समुदाय के लोग थे.
दिल्ली पुलिस ने उमर खालिद और अन्य कार्यकर्ताओं पर यूएपीए , आर्म्स एक्ट और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने जैसी गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है. पुलिस का दावा है कि यह हिंसा मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए एक सोची-समझी ‘बड़ी साजिश’ का हिस्सा थी और इसे नागरिक विरोध के नाम पर अंजाम दिया गया था. पुलिस ने कोर्ट में दाखिल हलफनामे में इसे “सत्ता परिवर्तन अभियान” की संज्ञा दी है.
दूसरी ओर, उमर खालिद के वकीलों का तर्क है कि वे केवल शांतिपूर्ण विरोध के अपने अधिकार का प्रयोग कर रहे थे. उन्होंने दलील दी है कि लंबे समय तक जेल में रखना बिना दोषसिद्धि के सजा देने जैसा है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपने जनवरी के आदेश में स्पष्ट किया था कि यूएपीए मामलों में मुकदमे में देरी को जमानत पाने के लिए ‘ट्रम्प कार्ड’ के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट का चुनाव आयोग और केंद्र को नोटिस: क्या अब बायोमेट्रिक से होगी वोटिंग?
स्क्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने मतदान केंद्रों पर बायोमेट्रिक पहचान लागू करने की मांग वाली याचिका पर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार से जवाब मांगा है. इस याचिका में चुनावी धांधली रोकने के लिए मतदान केंद्रों पर फिंगरप्रिंट और आईरिस आधारित बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली लागू करने की मांग की गई है.भारतीय जनता पार्टी के सदस्य और वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत यह याचिका दायर की है. उनका तर्क है कि मौजूदा व्यवस्था के बावजूद रिश्वतखोरी, फर्जी मतदान और एक ही व्यक्ति द्वारा बार-बार वोट डालने जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं.
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि वर्तमान में चल रहे विधानसभा चुनावों के लिए इन बदलावों पर विचार नहीं किया जा सकता. अदालत ने कहा कि, “क्या भविष्य के संसदीय और राज्य विधानसभा चुनावों के लिए इस तरह के रास्तों को अपनाया जाना चाहिए, इसका परीक्षण किया जाना आवश्यक है” बेंच ने यह भी रेखांकित किया कि इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए नियमों में बदलाव की जरूरत होगी और इससे सरकारी खजाने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा.
याचिकाकर्ता का कहना है कि बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण से केवल वास्तविक और पंजीकृत मतदाता ही वोट डाल सकेंगे, जिससे ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव’ के संवैधानिक जनादेश का पालन होगा. उन्होंने बताया कि उन्होंने मार्च में चुनाव आयोग को भी इस संबंध में आवेदन दिया था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई.
वर्तमान में असम, केरल और पुडुचेरी में मतदान हो चुका है, जबकि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के कुछ चरणों के लिए मतदान होना अभी बाकी है. चुनाव के नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे.
हरकारा डीप डाइव
डेटा के जाल में फंसे नागरिक अधिकार, डिजिटल सिस्टम पर गंभीर सवाल
निधीश त्यागी ने ‘हरकारा’ डीप डाइव के इस एपिसोड में राजेन्द्रन नारायणन और पद्मिनी रमेश के साथ भारत में डिजिटल सिस्टम और डेटा के बढ़ते इस्तेमाल पर विस्तार से बातचीत की. इस चर्चा में बताया गया कि जिस डिजिटल तकनीक को लोगों की मदद और सुविधा के लिए लाया गया था, वही अब खासकर गरीब और हाशिये पर खड़े लोगों को सिस्टम से बाहर कर रही है और उनके अधिकार कमजोर हो रहे हैं.
चर्चा में यह भी समझाया गया कि 1990 के दशक में आर्थिक सुधारों के बाद से सरकार और नागरिकों के बीच संबंध बदलने लगे। आईटी और डिजिटल सिस्टम के आने से सरकारी योजनाओं को तेज और पारदर्शी बनाने की कोशिश हुई, लेकिन धीरे-धीरे यह सिस्टम इतना जटिल हो गया कि इंसान की जगह डेटा ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया. अब हालात ऐसे हैं कि अगर किसी व्यक्ति का डेटा सिस्टम में नहीं दिखता, तो उसे उसका हक नहीं मिल पाता.
उन्होंने “इंक्लूजन और एक्सक्लूजन एरर” की समस्या को भी समझाया. सरकार इस बात पर ज्यादा ध्यान देती है कि गलत व्यक्ति को फायदा न मिले, लेकिन इस प्रक्रिया में असली जरूरतमंद लोग ही बाहर हो जाते हैं. झारखंड का उदाहरण देते हुए बताया गया कि एक महिला की भूख से मौत हो गई, लेकिन सिस्टम में दिखाया गया कि उसने राशन ले लिया था. इससे साफ होता है कि कंप्यूटर की सच्चाई और जमीन की सच्चाई अलग-अलग हो सकती है.
इस चर्चा का एक बड़ा मुद्दा यह रहा कि डिजिटल सिस्टम के कारण जवाबदेही उलट गई है. पहले सरकार नागरिकों के प्रति जवाबदेह थी, लेकिन अब नागरिकों को बार-बार खुद को साबित करना पड़ता है, जैसे बायोमेट्रिक देना, पहचान सत्यापित करना. साथ ही, डेटा के लगातार संग्रह और निगरानी से “सर्विलांस स्टेट” बनने की चिंता भी जताई गई, जहां लोगों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा सकती है.
मनरेगा जैसे उदाहरणों में बताया गया कि लाखों मजदूरों के नाम काम करने की इच्छा नहीं जैसे कारणों से हटा दिए गए, जबकि यह कानूनी कारण भी नहीं है. इससे यह भी सामने आया कि सरकार बड़े आंकड़े और “एफिशिएंसी” दिखाने के चक्कर में सटीकता और वास्तविकता को नजरअंदाज कर रही है.
चर्चा के अंत में सुझाव दिए गए कि डिजिटल सिस्टम के साथ ऑफलाइन विकल्प भी होने चाहिए, नीतियों में लोगों की भागीदारी बढ़ानी चाहिए और एक मजबूत कानूनी ढांचा बनाना जरूरी है. पद्मिनी रमेश ने यह भी कहा कि टारगेटिंग की बजाय शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं को यूनिवर्सल बनाया जाना चाहिए, ताकि हर व्यक्ति को बराबर मौका मिल सके.
1.5 लाख की ‘कैंसर दवा’ का फ़र्ज़ी खेल: अस्पतालों से लीक असली वायल, मरीजों को बेची गई नकली दवा
द इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत में कैंसर की महंगी दवा कीट्रूडा को लेकर एक बड़ा फ़र्ज़ीवाड़ा सामने आया है. इस मामले में अस्पतालों के कर्मचारियों, फार्मासिस्टों और बिचौलियों का एक नेटवर्क नक़ली दवाएं बेचता पाया गया है, जिससे गंभीर रूप के बीमार मरीज़ों की जान ख़तरे में पड़ गई है. यह दवा अमेरिकी कंपनी मर्क एंड कंपनी बनाती है और इसकी क़ीमत 100 एमजी की एक वायल के लिए 1.5 लाख रुपये से अधिक है. रिपोर्ट के अनुसार, महंगी क़ीमत के कारण कई मरीज़ इसे सस्ते में खरीदने की कोशिश करते हैं और इसी का फ़ायदा उठाकर नक़ली दवाओं का बाज़ार तैयार हो गया है.
इस मामले का इंकिशाफ़ तब हुआ जब चंडीगढ़ में लिवर कैंसर से पीड़ित एक 56 वर्षीय महिला को डॉक्टरों ने कीट्रूडा लेने की सलाह दी थी, लेकिन दवाई महंगी होने के कारण परिवार ने सितंबर और दिसंबर 2022 के बीच 12 वायल एक स्थानीय मेडिकल स्टोर से लगभग 16 लाख रुपये में डिस्काउंट पर खरीदीं थी. जिसे बाद में दिल्ली पुलिस ने बताया कि यह दवाएं नक़ली थी.
रिपोर्ट के मुताबिक़ एक संगठित नेटवर्क के ज़रिये असली वायल दवाओं को अस्पतालों से इकट्ठा किया जाता था फिर इन वायल को खाली कर उनमे दूसरी दवाएं भर दी जाती थी. इन्हें बाज़ार में क़रीब 90 हज़ार रुपये में बेचा जाता था, जो असली क़ीमत से 40% कम है. इस मामले में राजीव गाँधी कैंसर इंस्टिट्यूट एंड रिसर्च सेंटर के दो फार्मासिस्ट को पकड़ा गया है. यह वायल को अस्पताल से बाहर ले जा रही थीं और अपने नेटवर्क के दूसरे सदस्यों को दी जा रही थीं. इस मामले में मुख्य आरोपी नीरज चौहान को गिरफ्तार किया गया है. जांच में यह भी सामने आया कि अस्पतालों में इस्तेमाल के बाद वायल की सही गिनती का कोई मजबूत सिस्टम नहीं था। इसी कमी का फायदा उठाकर वायल बाहर निकाली जा रही थीं.
नोएडा में मज़दूरों की हड़ताल में हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़, 20 हज़ार न्यूनतम वेतन की मांग
तरुण साहू की रिपोर्ट के मुताबिक़, नोएडा के एक कारख़ाना में मज़दूर पिछले शुक्रवार से वेतन बढ़ाने और बेहतर कामकाजी हालात की मांग को लेकर हड़ताल पर हैं. उनकी मुख्य मांग न्यूनतम वेतन 20 हज़ार रुपये, ओवरटाइम का पूरा पैसा और छुट्टियां हैं. अभी उन्हें लगभग 12 से 13 हज़ार रुपये वेतन मिलता है, जो इस बढ़ती महंगाई के लिए काफी नहीं है.
यह विवाद तब शुरू हुआ जब कुछ मज़दूर वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर एचआर से मिले, लेकिन कंपनी ने सिर्फ 300 से 360 रुपये बढ़ाने का नोटिस दिया. इससे नाराज़ होकर 9 अप्रैल से विरोध शुरू हुआ और 11 अप्रैल तक चला. सोमवार को प्रदर्शन उग्र हो गया, जहां कुछ जगहों पर आगज़नी, तोड़फोड़ और पत्थरबाजी की घटनाएं हुईं. पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया और 50 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया. कुछ मजदूर नेताओं और महिलाओं को भी न्यायिक हिरासत में भेजा गया.
मजदूरों का कहना है कि उनका खर्च लगातार बढ़ रहा है, वे हर महीने 4,000 से 7,000 रुपये किराया देते हैं, बच्चों की पढ़ाई और अन्य खर्च अलग है. उनका आरोप है कि कंपनियां उनकी समस्याएं नहीं सुनतीं. कई मजदूरों ने काम के हालात को भी कठिन बताया. उनका कहना है कि थोड़ी सी देरी पर वेतन काट लिया जाता है, पानी पीने या वॉशरूम जाने तक का समय नहीं मिलता और छुट्टी के दिन भी काम कराया जाता है. ओवरटाइम के पैसे में गड़बड़ी के आरोप भी लगाए गए हैं.
मकतूब मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, नोएडा इंडस्ट्रियल एरिया में मजदूरों की हड़ताल के दौरान शनिवार को 8 श्रमिक कार्यकर्ताओं, जिनमें 3 महिलाएं शामिल हैं, को पुलिस ने हिरासत में लिया है. ये कार्यकर्ता बोटैनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से उठाए गए थे. पुलिस पर उन्हें घसीटने के वीडियो भी सामने आए हैं, हालांकि डीसीपी कार्यालय ने इस कार्रवाई की जानकारी से इनकार किया.
सभी कार्यकर्ता “मजदूर बिगुल” संगठन से जुड़े बताए जा रहे हैं. आरोप है कि 4 लोगों को बाद में रिहा कर दिया गया, जबकि पहले गिरफ्तार 4 कार्यकर्ताओं को 15 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया.
श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी करने पर आजीवन कारावास, पंजाब में कड़े दंड का प्रावधान
हरप्रीत बाजवा की रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब विधानसभा ने सोमवार को सर्वसम्मति से ‘जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) विधेयक, 2026’ पारित कर दिया. इस विधेयक के माध्यम से श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी करने वालों के लिए काफी कड़े दंड का प्रावधान किया गया है. संत समाज के सदस्यों और विभिन्न डेरों के नेताओं की उपस्थिति में एक विशेष सत्र के दौरान पारित इस कानून का उद्देश्य बेअदबी की घटनाओं को रोकना और सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखना है.
बेअदबी के मामलों में न्यूनतम 10 वर्ष की कैद, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है. 5 लाख रुपये से लेकर 25 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान. यदि बेअदबी की घटना सांप्रदायिक अशांति फैलाने की किसी साजिश का हिस्सा पाई जाती है, तो संपत्ति जब्त करने का भी प्रावधान है.
भूमि अधिग्रहण पर वसुंधरा राजे की टिप्पणी से राजस्थान भाजपा में चर्चाएं तेज
‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ में जयपुर से राजेश असनानी की रिपोर्ट है कि राजस्थान में एक हाई-प्रोफाइल रिफाइनरी का उद्घाटन करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा से बमुश्किल एक हफ्ते पहले, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के हालिया बयान से राज्य भाजपा में शुरू हुआ राजनीतिक घमासान थमने का नाम नहीं ले रहा है.
राजे की टिप्पणी, जिसने पिछले गुरुवार को सुर्खियां बटोरीं, उनके बेटे और सांसद दुष्यंत सिंह की बारां-झालावाड़ क्षेत्र में ‘जनसंवाद यात्रा’ के दौरान आई थी. उन्होंने कहा था, “लोग मुझसे कहते हैं, ‘मेरा काम नहीं हुआ; इसे करवा दीजिए… लेकिन भाई, अब मैं और नहीं लड़ सकती. जब मैं अपना ही नहीं बचा पाई, तो मैं किसी और का क्या बचाऊंगी?”
इस बयान ने पार्टी हलकों में चर्चा छेड़ दी है, जिसमें कई लोग इसे दिसंबर 2023 में राजस्थान के सीएम पद के लिए दरकिनार किए जाने पर उनकी नाराजगी के रूप में देख रहे हैं. इसने उनके पुराने बयानों की यादें भी ताजा कर दी हैं, जिसमें उन्होंने भाजपा मुख्यालय में कार्यकर्ताओं की चिंताओं को दूर करने में असमर्थता और उनके प्रति सम्मान की कमी का मुद्दा उठाया था.
सप्ताहांत में यह विवाद तब और गहरा गया जब राजस्थान भाजपा अध्यक्ष मदन राठौड़ ने शनिवार को एक बयान दिया, जिसे एक परोक्ष तंज के रूप में देखा गया. एक कहावत का हवाला देते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि व्यक्ति को जो मिलता है, उसमें संतोष करना चाहिए और संकेत दिया कि राजे हर बार मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद नहीं कर सकतीं.
इस विमर्श को आगे बढ़ाते हुए, यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने टिप्पणी की कि राजनीति स्वाभाविक रूप से अस्थिर है, जहाँ किस्मत अप्रत्याशित रूप से बन या बिगड़ सकती है और अंततः केवल कुछ ही लोग शीर्ष तक पहुँच पाते हैं.
संगठन और सरकार दोनों के प्रमुख नेताओं की इन टिप्पणियों ने पार्टी में राजे की स्थिति को लेकर नई अटकलें शुरू कर दी हैं, खासकर विधानसभा चुनावों के बाद उन्हें दरकिनार कर पहली बार के विधायक भजन लाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद.
बाद में, राजे ने विवाद पर स्पष्टीकरण देने के लिए औपचारिक रूप से मीडिया को संबोधित किया. उन्होंने समझाया कि भाषण के दौरान, कुछ स्थानीय लोग उनके पास हाईवे प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण की शिकायत लेकर आए थे. जवाब में, राजे ने धौलपुर में अपने स्वयं के महल का उदाहरण देते हुए उन्हें बताया कि जब जमीन विकास परियोजनाओं के दायरे में आती है, तो उसके अधिग्रहण को रोका नहीं जा सकता.
मीडिया को संबोधित करते हुए, उन्होंने अपने बयानों को जानबूझकर गलत तरीके से पेश करने का आरोप लगाया और व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “कुछ ‘शुभचिंतकों’ ने हमारे पीछे लोग लगा रखे हैं. वे हमारे भाषणों की बारीकी से जांच करते हैं और ऐसी पंक्तियाँ चुनते हैं जिन्हें तोड़-मरोड़कर पूरी तरह से विकृत अर्थ निकाला जा सके. ये वही साजिशकर्ता हैं जो अतीत में भी ऐसी गतिविधियों में लिप्त रहे हैं.”
उनके स्पष्टीकरण के बाद, राजस्थान भाजपा अध्यक्ष मदन राठौड़ ने भी एक बयान जारी कर दावा किया कि उनकी बात का गलत अर्थ निकाला गया. उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उनकी टिप्पणी का उद्देश्य केवल यह बताना था कि “ईश्वर जो कुछ भी प्रदान करता है, उसी में संतोष करना चाहिए.”
राठौड़ बाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करने वाले थे, लेकिन इसे अचानक रद्द कर दिया गया. भाजपा के भीतर के सूत्रों ने संकेत दिया कि उन्हें पार्टी आलाकमान से कड़ी फटकार मिली है और फिलहाल उन्हें मीडिया से बात करने से बचने के लिए कहा गया है.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पार्टी द्वारा इस मुद्दे को दबाने की कोशिश प्रधानमंत्री के दौरे से पहले नुकसान को कम करने की एक चाल है.
पंचायत से संसद तक घटती महिलाओं की भागीदारी, जमीनी स्तर पर ज्यादा लेकिन ऊपरी राजनीति में कम
भारत में पंचायत स्तर पर महिलाओं की बड़ी संख्या में भागीदारी है, लेकिन जैसे जैसे राजनीति का स्तर ऊपर जाता है, उनकी भागीदारी घटती जाती है. इंडियास्पेंड में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है, जिसमे बताया गया है कि देशभर में पंचायती राज संस्थाओं में 15 लाख से ज़्यादा महिला चुनी हुई प्रतिनिधि हैं. कई राज्यों में पंचायत सीटों का एक तिहाई से लेकर आधा हिस्सा महिलाओं के लिए आरक्षित है. इसके विपरीत 18वीं लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी सिर्फ 13.8% है. महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33% आरक्षण देने के लिए 2023 में संविधान संशोधन 106वां पारित हुआ, लेकिन इसे 2026 के बाद होने वाली परिसीमन प्रक्रिया के बाद ही लागू किया जायेगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 9 अप्रैल 2026 को कहा कि 2029 का चुनाव महिलाओं के आरक्षण के साथ होगा.
1992 में 73वै संविधान संशोधन के ज़रिये पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण दिया गया था. बिहार, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना और गुजरात जैसे राज्यों में यह बढ़ाकर 50% तक कर दिया गया है. 18 राज्यों में अब पंचायतों में आधे से ज़्यादा प्रतिनिधि महिलाएं हैं.
हालाँकि रिपोर्ट बताती है कि केवल सीट मिलने से महिलाओं को पूरी ताक़त नहीं मिल जाती है. कई मामलों में उनके फैसले परिवार या समाज के दबाव में होते हैं. कई जगह उन्हें सिर्फ नाम मात्र का प्रतिनिधि माना जाता है और उनकी जगह यह फैसले पुरुष लेते हैं. लेकिन एक अध्य्यन के अनुसार जिन क्षेत्रों में महिलाएं विधायक बनीं, वहां आर्थिक विकास ज़्यादा हुआ है. फिर भी संसद में महिलाओं की संख्या बहुत कम है.
पंचायत में ज़्यादा संख्या होने के बावजूद महिलाएं आगे बढ़कर विधायक या संसद नहीं बन पाती. उदाहरण के लिए हिमाचल प्रदेश के पंचायतों में 50% ज़्यादा महिलाएं हैं, लेकिन 68 विधायकों में केवल एक महिला है. कर्नाटक में भी पंचायतों में लगभग 53% महिलाएं हैं, लेकिन विधायकों में सिर्फ 4.5% और सांसदों में 11% से भी कम महिलाएं है. विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाओं के लिए राजनीति में ऊपर तक पहुंचने के रास्ते सीमित हैं. आरक्षण के कारण वे पंचायत तक पहुंचती हैं, लेकिन आगे बढ़ने में सामाजिक बाधाएं, परिवार की जिम्मेदारियां और राजनीतिक दलों का समर्थन न मिलना बड़ी समस्या है.
महिलाओं की संख्या लोकसभा में 1957 में 5.5% थी, जो 2024 में बढ़कर 13.79% हुई है, लेकिन यह अभी भी कम है. वैश्विक स्तर पर संसदों में महिलाओं की औसत हिस्सेदारी 27.5% है, जबकि भारत 149वें स्थान पर है. केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी महिलाओं की हिस्सेदारी 2015 में 17.8% थी, जो 2024 में घटकर 9.7% रह गई है. वोटिंग में महिलाएं पुरुषों के बराबर या कई जगह उनसे ज्यादा हिस्सा ले रही हैं. 2024 के चुनाव में कई राज्यों में महिलाओं का मतदान 70% से ज्यादा रहा, लेकिन फिर भी वहां से कोई महिला उम्मीदवार नहीं जीत सकी.
फिलीपींस का चीन पर आरोप: विवादित समुद्री इलाके में ज़हर मिलाने से मछलियों को नुक़सान
द हिन्दू की रिपोर्ट के मुताबिक़, फिलीपींस ने चीन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि चीनी मछुआरे दक्षिण चीन सागर के विवादित समुद्री इलाक़े में सायनाइड डालकर समुद्री जीव को नुकसान पहुंचा रहे हैं. यह घटना स्प्रैटली द्वीप समूह के पास हुई है, जो दक्षिण चीन सागर का एक संवेदनशील और विवादित क्षेत्र है. यहाँ पहले भी चीन और फिलीपींस के बीच कई बार टकराव हो चुका है.
फिलीपींस की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने आरोप लगाया है कि यह ज़हर डालने की गतिविधि पिछले साल से सेकंड थॉमस शोल के वक़्त से जारी है. यह इलाक़ा समुद्री व्यापार मार्गों के पास स्थित है और खनिज संपदा से भी भरपूर माना जाता है. फिलीपींस की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का कहना है कि सायनाइड का इस्तेमाल करने का मक़सद मछलियों को मारना और वहां तैनात फिलीपींस नवसेना के जावानो के भोजन के स्त्रोत को ख़त्म करना है.
फिलीपींस नौसेना के प्रवक्ता रियर एडमिरल रॉय विंसेंट त्रिनिदाद ने बताया कि फरवरी, जुलाई और अक्टूबर 2025 में सैनिकों ने चीनी मछुआरों की नावों से 10 बोतल सायनाइड ज़ब्त की थीं. उन्होंने यह भी कहा कि पिछले महीने सैनिकों ने एक और चीनी नाव को पानी में जहर डालते हुए देखा था, जिसके बाद उस इलाके के पानी की जांच में सायनाइड की पुष्टि हुई. हालांकि जहाज पर मौजूद किसी भी सैनिक में जहर के लक्षण नहीं पाए गए.
अपील :
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