12/08/2026: हर शाख़ पर उल्लू | जज वर्मा पर आरोप साबित | काँवड़ियों का कचरा | बढ़ी महंगाई | 36 हजार फ़र्में | कश्मीरी पंडित | डराने वाले डरे | कांग्रेस-सपा विलय | परिसीमन पर तमिलनाडु | पाकिस्तान के संकट
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
नीट यूजी के बाद अब ‘पीजी’: एसएमएस पर गलत परीक्षा-केंद्र भेजे, अभ्यर्थियों का सोशल मीडिया पर गुस्सा फूटा, नड्डा केंद्र
कश्मीरी पंडितों की हत्याएँ: जम्मू-कश्मीर पुलिस ने 1990 के मामले फिर से खोले; कई स्थानों पर ली तलाशी
श्रवण गर्ग | जो डराने वाले हैं, वो डरे हुए हैं
हरिद्वार में कांवड़िए पीछे छोड़ गए 8,000 मीट्रिक टन कचरा: महिलाओं के चेंजिंग रूम में मिलीं पेशाब की बोतलें
वर्गीज के. जॉर्ज | गठबंधन से परे, कांग्रेस-सपा विलय के पक्ष में तर्क
डेटा | क्या भारत में क्षेत्रीय दल अपनी प्रासंगिकता खो रहे हैं?
जले हुए नोटों का मामला: न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ आरोप ‘साबित’
महाराष्ट्र में पिछले पांच वर्षों में 36,000 से अधिक फर्म बंद हुईं, सरकार ने संसद को बताया
भारत की खुदरा महंगाई जुलाई में बढ़कर 4.45%, लगातार दूसरे महीने आरबीआई के मध्य लक्ष्य से ऊपर
परिसीमन: तमिलनाडु विधानसभा ने लोकसभा की 543 सीटें बरकरार रखने का प्रस्ताव पारित किया
पाकिस्तान की मौजूदा वैश्विक प्रतिष्ठा उसके घरेलू पतन को नहीं छिपा सकती
नीट यूजी के बाद अब ‘पीजी’: एसएमएस पर गलत परीक्षा-केंद्र भेजे, अभ्यर्थियों का सोशल मीडिया पर गुस्सा फूटा, नड्डा केंद्र
“बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी है, हर शाख पे उल्लू बैठे हैं अंजाम-ऐ-गुलिस्तां क्या होगा.” अभी नीट-यूजी पेपर लीक का मामला सुलटा भी नहीं है कि नीट-पीजी परीक्षा को लेकर बिगड़े तंत्र की एक और खबर आ गई. अर्नब चटर्जी की रिपोर्ट के अनुसार, मेडिकल परीक्षाओं का आयोजन करने वाली संस्था ‘नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज’ (एनबीईएमएस) ने नीट-पीजी 2026 के उम्मीदवारों को आधी रात को एसएमएस भेजकर गलत परीक्षा केंद्र आवंटित कर दिए. उदाहरण के लिए, गुजरात के अभ्यर्थी को मणिपुर, बंगाल के अभ्यर्थी को यूपी/बिहार और केरल के अभ्यर्थियों को छत्तीसगढ़ या मुंबई में केंद्र आवंटित कर दिए गए.
जब अभ्यर्थियों ने स्थिति की पुष्टि के लिए एनबीईएमएस पोर्टल पर लॉगिन करने का प्रयास किया, तो पोर्टल पर सही शहर प्रदर्शित हो रहा था, जबकि एसएमएस में दूर-दराज का राज्य लिखा था. इस अंतर्विरोध ने अभ्यर्थियों के बीच गहरा असमंजस पैदा कर दिया.
अचानक और सुदूर राज्यों में केंद्र मिलने की गलत सूचना से डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों में भारी घबराहट फैल गई. अभ्यर्थियों के लिए एक महीने के भीतर ट्रेनों में कन्फर्म टिकट पाना और होटल बुक करना बेहद कठिन एवं अत्यधिक खर्चीला साबित होता है. 24 घंटे की ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों और तैयारी में जुटे छात्रों को इस प्रशासनिक लापरवाही के कारण भारी मानसिक प्रताड़ना सहनी पड़ी.
एनबीईएमएस ने बाद में एक अन्य एसएमएस जारी कर पहले संदेश को तकनीकी खराबी बताया और सही परीक्षा केंद्र की पुष्टि की (जैसे गाजियाबाद के स्थान पर कोलकाता). हालांकि, नीट-यूजी पेपर लीक विवाद के बाद पहले से ही आक्रोशित छात्रों का गुस्सा सोशल मीडिया पर फूट पड़ा.
सोशल मीडिया पर छात्रों ने बहुविकल्पीय प्रश्नों (एमसीक्यूस) और मीम्स के माध्यम से एनबीईएमएस के अधिकारियों पर तंज कसा. किसी ने इसे “अखिल भारतीय तीर्थयात्रा” बताया, तो किसी ने सरकार द्वारा समय से पहले “अप्रैल फूल्स डे” मनाना कहा. कई आवेदकों ने सवाल उठाए कि इस तरह की बड़ी गलती करने से पहले एनबीईएमएस के अधिकारियों ने किस श्रेणी की दवाओं का सेवन किया था.
एक आवेदक ने अपने एसएमएस का स्क्रीनशॉट साझा किया, जिसमें उसका परीक्षा केंद्र छत्तीसगढ़ दिख रहा था, और कहा, “राजस्थान से छत्तीसगढ़ तक, धन्यवाद एनबीईएमएस. क्या मुझे दिल्ली आकर आपको गाली देनी चाहिए, या मैं यहीं से ऐसा करूँ तो ठीक रहेगा?” कुछ अभ्यर्थियों ने पाकिस्तान के कराची में परीक्षा केंद्र आवंटित होने के स्क्रीनशॉट साझा कर इसे ‘धुरंधर-शैली का प्लॉट’ करार दिया.
केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से धर्मेंद्र प्रधान के हटने के बाद, यह मामला सीधे केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जे.पी. नड्डा के दायरे में आ गया, क्योंकि एनबीईएमएस स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत काम करता है. सोशल मीडिया पर मंत्री नड्डा की अक्षमता पर सवाल उठाए गए और उनके इस्तीफे की मांग की गई.
बहरहाल, इस घटना ने भारत में सरकारी परीक्षा पोर्टलों के सुस्त डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, खराब यूजर इंटरफेस और ऐन मौके पर सर्वर के अत्यधिक धीमे होने जैसी गंभीर खामियों को भी उजागर किया. यह प्रकरण केवल एक तकनीकी त्रुटि नहीं था, बल्कि इसने भारत की संपूर्ण प्रवेश परीक्षा प्रणाली, उसके लॉजिस्टिक्स और डेटा प्रबंधन पर अभ्यर्थियों के विश्वास को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है.
जले हुए नोटों का मामला: न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ आरोप ‘साबित’
‘न्यायाधीश (जांच) अधिनियम’ के तहत गठित और उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार के नेतृत्व वाली तीन सदस्यीय समिति ने पाया है कि न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ सभी आरोप “साबित” हो गए हैं.
लोकसभा समिति ने पाया कि न्यायमूर्ति वर्मा का स्पष्टीकरण “टालमटोल वाला और असंतोषजनक” रहा और वे “अपने आवास के स्टोर रूम में पाई गई नकदी की मौजूदगी और उसके स्वामित्व पर संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहे.”
रिपोर्ट में कहा गया, “तदनुसार, समिति यह रिपोर्ट, कार्यवाही के रिकॉर्ड, दस्तावेजों, प्रदर्शों और जांच का हिस्सा बनी सामग्री के साथ, कानून के अनुसार आगे की जाने वाली कार्रवाई के लिए सौंपती है.”
राज्यसभा और लोकसभा के महासचिवों ने अपने-अपने सदनों में यह रिपोर्ट पेश की. जांच के दौरान दर्ज किए गए मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ यह रिपोर्ट दो खंडों में है.
‘द हिंदू ब्यूरो’ के अनुसार, तीन सदस्यीय जांच समिति ने मई में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को अपने निष्कर्ष सौंप दिए थे. 14 मार्च 2025 की रात न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास में आग लग गई थी. आग बुझाने के लिए बुलाए गए दमकलकर्मियों को कथित तौर पर एक स्टोर रूम में भारी मात्रा में जले हुए नोट मिले थे. न्यायमूर्ति वर्मा ने तब से इस्तीफा दे दिया है, जिससे उन्हें पद से हटाने की कार्यवाही व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी हो गई है. हालांकि, उनके इस्तीफे को कानून मंत्रालय द्वारा अभी तक अधिसूचित नहीं किया गया है. वे दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश थे और इस विवाद के बाद उन्हें उनके मूल न्यायालय, इलाहाबाद हाईकोर्ट में वापस भेज दिया गया था.
भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना द्वारा गठित एक आंतरिक समिति ने निष्कर्ष निकाला था कि उस विशिष्ट स्टोर रूम पर न्यायमूर्ति वर्मा का “सक्रिय या मौन नियंत्रण” था, जहां नकदी छिपाई गई थी.
जुलाई 2025 में, 200 से अधिक सांसदों ने न्यायाधीश पर महाभियोग चलाने (संसद द्वारा हटाए जाने) के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे. पिछले साल अगस्त में, बिरला ने आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय ‘न्यायाधीश जांच समिति’ का गठन किया था.
हरिद्वार में कांवड़िए पीछे छोड़ गए 8,000 मीट्रिक टन कचरा: महिलाओं के चेंजिंग रूम में मिलीं पेशाब की बोतलें
हरिद्वार में 12 दिन की कांवड़ यात्रा के दौरान 4 करोड़ 80 लाख कांवड़िए 8 हजार मीट्रिक टन कचरा गंगा घाटों पर फैलाकर चले गए. सबसे बुरा हाल मां गंगा के आरती क्षेत्र हरकी पैड़ी का रहा. यहां कचरे के बड़े-बड़े ढेर दिखे. ‘भास्कर इंग्लिश’ के मुताबिक, महिलाओं के चेंजिंग रूम में पेशाब से भरी बोतलें मिलीं.
हालात को देखते हुए 1000 आउटसोर्स यानी बाहर से बुलाए कर्मचारियों की मदद ली जा रही है. हरिद्वार जिला प्रशासन ने 18 अगस्त तक विशेष सफाई अभियान चलाने के निर्देश दिए हैं. नगर आयुक्त नंदन कुमार के अनुसार, डाक कांवड़ के दो दिनों में ही पूरे शहर में 1700 मीट्रिक टन कूड़ा फैला.
अब कूड़े को ज्वालापुर स्थित सराय में कूड़ा ट्रीटमेंट प्लांट में रीसाइकिल के लिए भेजा जा रहा है. यहां से कूड़ा अलग-अलग करके आगे प्राइवेट कंपनियों को बेचा जाएगा और कुछ के कपड़े बनाए जाएंगे. नगर निगम दिन-रात अभियान चलाकर सफाई में जुटा है. सफाईकर्मियों का समूह सबसे पहले घाटों पर सफाई कर रहा है.
गंगा आरती से पहले हरकी पैड़ी क्षेत्र को सबसे पहले साफ किया गया. अभी घाटों की स्थिति पहली जैसी नहीं हो पाई है. शिवरात्रि की संध्या आरती के बाद जब घाट खाली हुए, तब श्रद्धालुओं से ज्यादा कचरे के ढेर दिखे. पिछले साल करीब 4 करोड़ 52 लाख कांवड़िए जल लेकर गए थे. तब 8 हजार मीट्रिक टन कूड़ा गंगा घाटों से हटाया गया था.
भारत की खुदरा महंगाई जुलाई में बढ़कर 4.45%, लगातार दूसरे महीने आरबीआई के मध्य लक्ष्य से ऊपर
‘मिंट’ में सुभाष नारायण के मुताबिक, भारत की खुदरा महंगाई जुलाई में बढ़कर 4.45% हो गई. खाद्य और ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई लगातार दूसरे महीने भारतीय रिजर्व बैंक के 4% के मध्य लक्ष्य से ऊपर रही. हालांकि यह अभी भी आरबीआई की 2% से 6% की सहनशीलता सीमा के भीतर है, लेकिन कीमतों में आगे बढ़ोतरी से आर्थिक वृद्धि और ब्याज दरों को लेकर दबाव बढ़ सकता है.
जुलाई की महंगाई 18 अर्थशास्त्रियों के अनुमान वाले ‘मिंट’ सर्वेक्षण के 4.4% के औसत अनुमान से भी थोड़ी अधिक रही. जनवरी 2025 के बाद यह दूसरी बार है जब खुदरा महंगाई लगातार दो महीनों तक आरबीआई के 4% मध्य लक्ष्य से ऊपर रही है.
खाद्य कीमतों का दबाव
खाद्य महंगाई जुलाई में बढ़कर 5.52% हो गई, जो जून में 5.32%, मई में 4.78% और अप्रैल में 4.20% थी. सब्जियों, खाद्य तेल और अन्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी ने महंगाई पर दबाव बढ़ाया.
जुलाई में प्याज, अदरक और लहसुन समेत कई सब्जियों तथा सोने, चांदी, हीरे और प्लैटिनम के आभूषणों में महंगाई का दबाव अधिक रहा. इसके विपरीत आलू, मटर, टमाटर, भिंडी तथा कार और जीप जैसी वस्तुओं में अखिल भारतीय स्तर पर महंगाई अपेक्षाकृत कम रही.
बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस के मुताबिक, मानसून और खेती के रकबे की स्थिति को देखते हुए आने वाले समय में महंगाई का दबाव बढ़ सकता है. जुलाई में मानसून में सुधार हुआ है, लेकिन अत्यधिक बारिश से फसलों को नुकसान की खबरें भी सामने आई हैं. इससे खासकर दालों की कीमतों पर असर पड़ सकता है. वैश्विक स्तर पर खाद्य तेलों की ऊंची कीमतों का असर घरेलू बाजार पर भी पड़ रहा है.
आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति ने अगस्त में वित्त वर्ष 2027 के लिए महंगाई का अनुमान 5.1% से घटाकर 5% किया था, लेकिन कमजोर मानसून, अल नीनो की आशंका, ऊर्जा की ऊंची और अस्थिर कीमतों तथा उत्पादन लागत बढ़ने से आने वाले महीनों में महंगाई बढ़ने के जोखिम को लेकर चेतावनी दी थी.
तेल की कीमतों से बढ़ा जोखिम
कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का कारण बनी हुई हैं. पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से समुद्री परिवहन को लेकर चिंताओं के कारण इस महीने ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 7-8% बढ़कर 89 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई.
इसका असर परिवहन सेवाओं की महंगाई पर भी दिखा, जो जुलाई में बढ़कर 4.43% हो गई, जबकि जून में यह 4.31% थी. हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की उम्मीद से आने वाले दिनों में तेल की कीमतों में कुछ नरमी आ सकती है.
पश्चिम एशिया के संघर्ष ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है, जिससे रुपये में कमजोरी और मुद्रास्फीति के साथ धीमी वृद्धि यानी स्टैगफ्लेशन का जोखिम बढ़ा है. इसके बावजूद वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में जीडीपी वृद्धि 7.8% रही और पूरे वित्त वर्ष की वृद्धि दर 7.7% दर्ज की गई.
वित्त वर्ष 2027 में भारत की आर्थिक वृद्धि धीमी होकर 6.7% रहने का अनुमान है. आरबीआई ने जून में 6.6% और अप्रैल में 6.9% का अनुमान लगाया था. विश्व बैंक ने भी चालू वित्त वर्ष में 6.6% वृद्धि का अनुमान लगाया है, जबकि एशियाई विकास बैंक ने अपना अनुमान 6.9% से घटाकर 6.6% कर दिया है.
महंगाई मापने का नया आधार
मौजूदा महंगाई आंकड़ों की पिछले साल की समान अवधि से सीधी तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि जनवरी में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की नई श्रृंखला शुरू की गई थी. इसमें 2024 को आधार वर्ष बनाया गया है.
नई श्रृंखला में घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023-24 में सामने आए खर्च के पैटर्न को शामिल किया गया है. इससे सूचकांक में वस्तुओं के भार में बदलाव आया है. मुख्य वस्तुओं का हिस्सा बढ़ा है, जबकि अस्थिर खाद्य कीमतों का भार घटा है. आवास को भी नए सूचकांक में अधिक महत्व दिया गया है.
जुलाई में आवास महंगाई 2.22% रही, जबकि जून में यह 2.10% थी.
नई श्रृंखला से नीति निर्माताओं को वास्तविक आय, खपत और लोगों की क्रय शक्ति का आकलन करने के लिए मौजूदा खर्च के पैटर्न पर आधारित आंकड़े मिल रहे हैं.
आरबीआई के सामने ब्याज दरों की चुनौती
आरबीआई ने 5 अगस्त को हुई मौद्रिक नीति समिति की बैठक में ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया. छह सदस्यीय समिति ने सर्वसम्मति से रेपो दर को 5.25% पर बनाए रखने और तटस्थ रुख जारी रखने का फैसला किया. इसका संकेत है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल खाद्य और ईंधन की कीमतों पर नजर रखते हुए प्रतीक्षा और निगरानी की नीति अपना रहा है.
बैंक ऑफ बड़ौदा के मदन सबनवीस के मुताबिक, आने वाले समय में महंगाई पर ऊपर की ओर दबाव बना रह सकता है और एक ब्याज दर बढ़ोतरी की संभावना भी बनी हुई है. उनके अनुमान के अनुसार, इस वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में खुदरा महंगाई औसतन 4.5-4.7% रह सकती है और सितंबर में आधार प्रभाव कमजोर होने के कारण इसमें मामूली बढ़ोतरी संभव है.
इस तरह जुलाई की 4.45% खुदरा महंगाई आरबीआई के लक्ष्य के भीतर होने के बावजूद नीति निर्माताओं के लिए चेतावनी का संकेत है. खाद्य कीमतें, मानसून और कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें आने वाले महीनों में महंगाई की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक रहेंगे.
महाराष्ट्र में पिछले पांच वर्षों में 36,000 से अधिक फर्म बंद हुईं, सरकार ने संसद को बताया
भारत के सबसे अमीर और सबसे अधिक औद्योगीकृत राज्यों में से एक, महाराष्ट्र में पिछले पांच वित्तीय वर्षों में 36,000 से अधिक निजी कंपनियों का परिसमापन, विघटन या नाम हटाया गया है. यानी, ये सभी बंद हो गई हैं. सरकार द्वारा संसद में दी गई इस जानकारी के बाद विपक्ष ने अत्यधिक सरकारी हस्तक्षेप, व्यापक भ्रष्टाचार और लगातार प्रतिकूल होते व्यावसायिक माहौल को लेकर सरकार की तीखी आलोचना की है.
‘पीटीआई’ के अनुसार, केंद्रीय कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने शिवसेना (यूबीटी) के सांसद राजाभाऊ वाजे द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में लोकसभा में यह जानकारी साझा की. वाजे ने बुधवार को कहा, “पिछले पांच वित्तीय वर्षों में व्यावसायिक सेवाओं की लगभग 14,000 कंपनियां और विनिर्माण क्षेत्र की लगभग 6,500 कंपनियां बंद हो गई हैं.”
उन्होंने पत्रकारों से कहा, “ये क्षेत्र काफी अधिक रोजगार पैदा करते हैं और इतनी बड़ी संख्या में कंपनियों का बंद होना चौंकाने वाला है.”
महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रवक्ता सचिन सावंत ने बताया कि मौजूदा शासन के तहत राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार राज्य के आर्थिक प्रगति पथ को गंभीर नुकसान पहुंचा रहे हैं.
उन्होंने उद्यम के लिए एक अनुकूल माहौल बनाने में राज्य सरकार की विफलता पर भी चिंता व्यक्त की और जोर देकर कहा कि कंपनियों के बंद होने का यह रुझान भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश के उपयोग के दावों का सीधे तौर पर खंडन करता है.
उन्होंने कहा, “महाराष्ट्र में मौजूदा शासन को केवल सत्ता का लालच है और कुछ नहीं. नए व्यवसाय या औद्योगिक इकाइयां कहां आएंगी, इसमें सरकार के बढ़ते हस्तक्षेप से इस क्षेत्र में राज्य के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. व्यापक भ्रष्टाचार और व्यापार क्षेत्र के लिए प्रतिकूल माहौल अब लोकसभा के इस जवाब में झलकता है.”
आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वित्तीय वर्षों में महाराष्ट्र में 36,211 निजी कंपनियों का परिसमापन, विघटन हुआ या उनका नाम रजिस्टर से हटा दिया गया.
इनमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी व्यावसायिक सेवाओं की रही, जो 14,613 (कुल का लगभग 40 प्रतिशत) थी. इसके बाद विनिर्माण, खनन, उत्खनन और अन्य क्षेत्र 6,582; व्यापार 4,196; तथा सामुदायिक, व्यक्तिगत और सामाजिक सेवाएं 3,361 रहीं.
निर्माण क्षेत्र की कुल 2,356 कंपनियों को भी इसी स्थिति का सामना करना पड़ा, इसके बाद भंडारण और संचार की 1,336; कृषि और संबद्ध गतिविधियां 1,178; रियल एस्टेट और रेंटिंग 1,149; वित्त 1,012; बिजली, गैस और जल कंपनियां 387; और बीमा कंपनियां 41 रहीं.
ज़िलों की बात करें तो मुंबई शहर में सबसे अधिक 12,009 कंपनियां बंद हुईं, इसके बाद पुणे में 6,433 और ठाणे में 4,704 कंपनियां बंद हुईं. बंद होने वाली कंपनियों में नागपुर की 1,478, नासिक की 840, रायगढ़ की 822 और औरंगाबाद की 654 कंपनियां शामिल थीं. इसके अलावा कोल्हापुर में 429, अहमदनगर में 308, सोलापुर में 262, सांगली में 247, जलगांव में 215, सातारा में 196, बांद्रा उपनगर में 172, नांदेड़ में 169, लातूर में 163 और अमरावती में 151 कंपनियां दर्ज की गईं. ‘अन्य’ श्रेणी में 5,636 कंपनियां शामिल थीं. मुंबई शहर, पुणे और ठाणे तीनों मिलकर महाराष्ट्र के कुल आंकड़ों का 23,146 यानी लगभग 64 प्रतिशत हिस्सा हैं.
आरएसएस पर तंज
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की उस हालिया टिप्पणी का हवाला देते हुए, जिसमें उन्होंने कहा था कि सभी युवा नौकरियां नहीं मांग सकते और कुछ को व्यवसाय शुरू करना होगा, सावंत ने कहा कि सरकार द्वारा साझा किए गए आंकड़े इस संदेश के विपरीत हैं.
सावंत ने कहा, “अब, केंद्र सरकार की अपनी स्वीकारोक्ति से पता चलता है कि भागवत जो उपदेश दे रहे हैं, उसे भाजपा नेता बिल्कुल भी लागू नहीं कर रहे हैं.” उन्होंने यह दावा भी किया कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित करने के मामले में महाराष्ट्र कर्नाटक से पीछे छूट रहा है.
वाजे ने इन कंपनियों के बंद होने से प्रभावित हुए श्रमिकों के डेटा की अनुपस्थिति की ओर भी इशारा किया.
उन्होंने कहा, “केंद्र सरकार के पास बंद हुई कंपनियों की संख्या के आंकड़े तो हैं, लेकिन दुर्भाग्य से उसके पास यह डेटा नहीं है कि इस तरह के बंद होने से कितने श्रमिक प्रभावित हुए.” उन्होंने आरोप लगाया कि नासिक जिले में एक स्थानीय कंपनी से निकाले जाने के बाद पिछले महीने एक मजदूर ने आत्महत्या कर ली थी. अपने लिखित उत्तर में केंद्र ने यह भी कहा कि वह निजी कंपनियों का परिचालन बंद होने से प्रभावित श्रमिकों की जानकारी नहीं रखता है.
कश्मीरी पंडितों की हत्याएँ: जम्मू-कश्मीर पुलिस ने 1990 के मामले फिर से खोले; कई स्थानों पर ली तलाशी
जम्मू-कश्मीर पुलिस की विशेष सेल ने बुधवार (12 अगस्त 2026) को केंद्र शासित प्रदेश में संदिग्ध आतंकवादियों के ठिकानों पर छापेमारी की और 1990 में एक कश्मीरी पंडित पिता-पुत्र की दोहरी हत्या के मामले की फिर से जांच शुरू की.
‘द हिंदू ब्यूरो’ के अनुसार, कश्मीरी पंडित लेखक सर्वानंद कौल ‘प्रेमी’ और उनके बेटे वीरेंद्र कौल की हत्या की जांच के लिए दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले के दुरु में कई स्थानों पर छापे मारे गए. एफआईआर के अनुसार, 1990 में पीड़ितों के शव अनंतनाग के कोकेरनाग में एक पेड़ से लटके मिले थे. जम्मू-कश्मीर पुलिस की विशेष सेल, राज्य जांच एजेंसी ने इस मामले को अपने हाथ में ले लिया है और इसकी नए सिरे से जांच शुरू कर दी है.
इस बीच, राजौरी जिले में भी तलाशी अभियान चलाया गया. अधिकारियों ने बताया कि राजौरी शहर, थानामंडी और मंजाकोट में कई स्थानों पर “आतंकी गतिविधियों और उनके कथित समर्थन नेटवर्क से जुड़े मामलों के सिलसिले में” छापे मारे गए. ये ताजा छापे स्वतंत्रता दिवस और कश्मीर में अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों को दी गई आतंकी धमकियों की रिपोर्टों के बीच मारे गए हैं.
पीरज़ादा आशिक़ के अनुसार, मंगलवार को भी 1990 में आतंकवादियों द्वारा 27 वर्षीय कश्मीरी पंडित महिला की हत्या की जांच के सिलसिले में श्रीनगर में आठ स्थानों पर छापेमारी की गई थी. यह मामला 36 साल पहले आतंकवादियों द्वारा क्रूरतापूर्वक मार दी गई एसकेआईएमएस (स्किम्स) सौरा (श्रीनगर) की एक नर्स कश्मीरी पंडित सरला भट की हत्या से संबंधित है.
दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग की रहने वाली नर्स सरला भट का 18 अप्रैल 1990 को सौरा के हब्बा खातून हॉस्टल से अपहरण कर लिया गया था. अगले दिन उमर कॉलोनी मल्लाबाग, सौरा में पीड़िता का गोलियों से छलनी शव देखा गया था.
ये छापे प्रतिबंधित जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के सदस्यों के आवासों पर मारे गए, जिनमें उसके प्रमुख यासीन मलिक और पूर्व सदस्य जावेद मीर शामिल हैं. जिन लोगों के घरों पर छापे मारे गए, उनमें पीर नूर उल हक शाह, रियाज कबीर शेख, बशीर अहमद गोजरी, फिरोज अहमद खान, कैसर अहमद टिपलू और गुलाम मोहम्मद टपलू भी शामिल हैं.
सरला भट की हत्या उन शुरुआती हत्याओं के मामलों में से एक थी, जिसके परिणामस्वरूप घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ था. इससे पहले 14 सितंबर 1989 को अधिवक्ता और वरिष्ठ भाजपा नेता पंडित टीका लाल टपलू और बाद में एक पूर्व न्यायाधीश पंडित नीलकंठ गंजू की आतंकवादियों द्वारा हत्या कर दी गई थी.
हरकारा डीप डाइव
श्रवण गर्ग | जो डराने वाले हैं, वो डरे हुए हैं
‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ मानसून सत्र के आखिरी दिन से पहले संसद में बने गतिरोध और अमित शाह के बयान को लेकर चल रही सियासी खींचतान पर चर्चा की।
मानसून सत्र का आखिरी दिन अब सिर्फ एक संसदीय औपचारिकता नहीं रह गया है. तीन हफ्तों से संसद में अमित शाह के बयान की मांग कर रहा विपक्ष अब उस मुकाम पर पहुंच गया है, जहां सरकार के लिए पीछे हटना भी मुश्किल है और आगे बढ़ना भी. 20 जुलाई को बिहार में छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर राहुल गांधी और विपक्ष लगातार सवाल पूछ रहे हैं कि गोली चलाने का आदेश किसने दिया और अगर गृह मंत्री के आदेश के बिना यह हुआ, तो उनके नाक के नीचे इतना बड़ा घटनाक्रम कैसे हो गया.
श्रवण गर्ग के मुताबिक, अब असली सवाल यह है कि अमित शाह आखिरी दिन क्या करते हैं. उनका मानना है कि अगर शाह सदन में पहुंचते हैं और बयान पढ़ना शुरू करते हैं, तो विपक्ष उन्हें रोकने की कोशिश कर सकता है. ऐसी स्थिति में सरकार के पास बयान को रिकॉर्ड पर रखने का रास्ता होगा. दूसरी संभावना यह है कि स्पीकर चर्चा की अनुमति दें और सत्र को आगे बढ़ाया जाए.
अमित शाह ने सदन में प्रवेश करते समय मीडिया के जरिए विपक्ष को संदेश दिया कि वह अगले दिन 3 बजे तक जवाब देने को तैयार हैं. लेकिन राहुल गांधी ने साफ कर दिया कि विपक्ष को भाषण नहीं, सिर्फ दो सवालों का जवाब चाहिए. अगर गोली चलाने का आदेश शाह ने दिया तो इस्तीफा दें और अगर उनके आदेश के बिना गोली चली तो भी उन्हें जिम्मेदारी लेनी चाहिए.
श्रवण गर्ग इस पूरे घटनाक्रम को पिछले कुछ वर्षों के राजनीतिक बदलाव के संदर्भ में देखते हैं. उनके मुताबिक, जिस अमित शाह की छवि सदन में बेहद आक्रामक और निर्णायक नेता की रही है, उनकी मौजूदा बॉडी लैंग्वेज और सदन से दूरी अपने आप में राजनीतिक संकेत है. वह कहते हैं, “जो डराने वाले हैं वो डरे हुए हैं.”
उनके मुताबिक राहुल गांधी इस मौके को सिर्फ अमित शाह के बयान तक सीमित नहीं रखना चाहते. विपक्ष अब इस्तीफे की मांग तक पहुंच चुका है. साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सदन में गैरमौजूदगी भी सवाल पैदा करती है. अगर विवाद गृह मंत्री से जुड़ा है, तो प्रधानमंत्री सदन में क्यों नहीं आ रहे हैं?
इस बीच श्रवण गर्ग ने अमित शाह के राजनीतिक भविष्य पर भी बड़ा सवाल उठाया. उनका कहना है कि छात्रों के आंदोलन से पहले तक “हू आफ्टर मोदी” की बहस में अमित शाह को सबसे मजबूत विकल्प माना जाता था, लेकिन मौजूदा घटनाक्रम ने उनकी राजनीतिक छवि को बड़ा नुकसान पहुंचाया है.
वह परिसीमन विधेयक को लेकर भी कहते हैं कि अब वह खत्म हो चुका है. तमिलनाडु विधानसभा में इसके खिलाफ प्रस्ताव और डीएमके के समर्थन को वह सरकार के लिए बड़ा झटका मानते हैं.
अब आखिरी सवाल यह है कि सरकार इस पूरे संकट का सामना किस तरह करेगी. क्या अमित शाह सदन में बयान देंगे, क्या विपक्ष को चर्चा का मौका मिलेगा या फिर पूरा मामला हंगामे और स्थगन में खत्म हो जाएगा? श्रवण गर्ग के शब्दों में, “शाह और मात है.” और अगर ऐसा हुआ, तो यह अमित शाह के करीब 40 साल के राजनीतिक करियर में शायद पहली बार होगा जब उनकी राजनीतिक पकड़ पर इतना बड़ा सवाल खड़ा होगा.
वर्गीज के. जॉर्ज | गठबंधन से परे, कांग्रेस-सपा विलय के पक्ष में तर्क
‘द हिंदू’ में वर्गीज के. जॉर्ज का यह विश्लेषण भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के विलय की बात करता है. उनका मानना है कि पारंपरिक गठबंधन केवल वोटों और सीटों का समन्वय करता है, जबकि विलय राजनीतिक उद्देश्य को एकजुट करता है. यद्यपि राजनीति में किसी प्रयोग की सफलता की पूर्ण गारंटी नहीं होती, लेकिन कांग्रेस-सपा का यह विलय भारत में एक मजबूत, सुसंगत द्विदलीय प्रणाली की नींव रख सकता है. जिस तरह भाजपा का उत्थान विपक्ष के बिखराव पर हुआ था, उसी तरह विपक्ष का पुनरुद्धार इस प्रकार के साहसिक राजनीतिक एकीकरण से संभव हो सकता है.
जॉर्ज लिखते हैं: राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस शायद अपना सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक और सामाजिक पुनर्गठन करने का प्रयास कर रही है. वह खुद को ‘बहुजनों‘—यानी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), उच्च जातियों के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और अल्पसंख्यकों के व्यापक सामाजिक गठबंधन—के मुख्य राजनीतिक वाहन के रूप में फिर से ढालने की कोशिश कर रही है.
ऐसा करके, कांग्रेस अपनी उस पुरानी छवि से सचेत रूप से बाहर निकलने का प्रयास कर रही है, जहाँ उसका नेतृत्व और संस्थागत संस्कृति सवर्णों के वर्चस्व वाली मानी जाती थी; भले ही उसे बाकी वर्गों से भी भारी समर्थन मिलता रहा हो. देशव्यापी जाति जनगणना पर राहुल गांधी का बार-बार जोर देना, उनका नारा “जितनी आबादी, उतना हक“, और राज्य की संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व की उनकी लगातार वकालत, एक बड़े राजनीतिक प्रोजेक्ट को दर्शाती है: कांग्रेस को सामाजिक न्याय और समान प्रतिनिधित्व का स्वाभाविक स्थान बनाना.
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी अपनी पार्टी के लिए इतने ही महत्वाकांक्षी प्रयोग में लगे हुए हैं. सपा पर लंबे समय से मुख्य रूप से ‘यादव-मुस्लिम‘ समीकरण वाली पार्टी होने का ठप्पा लगा रहा है—एक ऐसा समीकरण जिसने चुनावी सफलता तो दी, लेकिन साथ ही स्पष्ट राजनीतिक सीमाएं भी निर्धारित कर दीं. अखिलेश यादव अब उस सामाजिक आधार को विस्तार देना चाहते हैं. उनका पीडीए यानी ‘पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक’ का फार्मूला सपा को एक जाति-केंद्रित क्षेत्रीय दल से बढ़ाकर जाति और धर्म की सीमाओं से परे एक व्यापक गठबंधन में बदलने के प्रयास का संकेत है. अब तो उन्होंने यह भी कहना शुरू कर दिया है कि ‘पी’ का मतलब ‘पंडित‘ यानी ब्राह्मण भी है.
दरअसल, राहुल गांधी और अखिलेश यादव की राजनीति अब लगभग एक ही दिशा में आगे बढ़ती दिखाई दे रही है. दोनों सामाजिक न्याय, बराबरी का प्रतिनिधित्व और समावेशी लोकतंत्र की बात कर रहे हैं. दोनों की नजर लगभग एक ही सामाजिक समूह पर है.
अगर दोनों दल एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं, तो जिस सामाजिक आधार को वे मजबूत करना चाहते हैं, वही बंट सकता है. लेकिन अगर वे एक साथ आ जाते हैं, तो एक-दूसरे की ताकत बढ़ा सकते हैं.
फिलहाल दोनों उत्तर प्रदेश में चुनावी गठबंधन की तैयारी कर रहे हैं. हमेशा की तरह सीटों के बंटवारे को लेकर लंबी और कठिन बातचीत होगी और संभव है कि गठबंधन बन भी जाए. लेकिन सवाल यह है कि क्या मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में केवल गठबंधन से बीजेपी की ताकत का मुकाबला किया जा सकता है?
पिछले एक दशक में भाजपा की राजनीति का एक बड़ा आधार विपक्षी दलों में बिखराव रहा है. विपक्षी गठबंधनों को कमजोर किया गया, कई दलों में टूट हुई और क्षेत्रीय पार्टियों को एक-दूसरे से मुकाबला करने के लिए प्रेरित किया गया, ताकि वे साझा मंच पर एक साथ न आ सकें.
ऐसी स्थिति में सवाल यह है कि क्या इसका जवाब सिर्फ एक और गठबंधन हो सकता है, या उससे बड़ा कदम उठाने की जरूरत है? अगर उत्तर प्रदेश में भाजपा के दो सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी—कांग्रेस और समाजवादी पार्टी—गठबंधन करने के बजाय एक ही पार्टी बन जाएँ, तो क्या भारतीय राजनीति की तस्वीर बदल सकती है?
अगर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का विलय होता है, तो दोनों दलों को राजनीतिक, संगठनात्मक और चुनावी स्तर पर बड़ा फायदा मिल सकता है. इतना ही नहीं, इससे देश की राजनीति में भी नए सिरे से बदलाव की शुरुआत हो सकती है.
दोनों पार्टियां अपनी-अपनी पुरानी छवियों से बाहर निकल सकती हैं. कांग्रेस पर लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि वह सवर्णों और मुसलमानों की पार्टी है, जबकि समाजवादी पार्टी को अब भी मुख्यतः यादवों की पार्टी माना जाता है. दोनों के एक होने से इन सीमित पहचानों को पीछे धकेलकर एक ऐसी नई कांग्रेस सामने आ सकती है, जो हर जाति और हर समुदाय के लोगों के अधिकार और प्रगति का मंच बने.
ऐसी स्थिति में समाजवादी पार्टी को अपनी अलग संगठनात्मक पहचान छोड़नी पड़ सकती है. लेकिन इसका यह मतलब नहीं होगा कि समाजवादी विचारधारा खत्म हो जाएगी. उलटे, वह अपने मूल स्वरूप में लौट सकती है. आज़ादी की लड़ाई के दौरान समाजवादी धारा कांग्रेस के भीतर ही सक्रिय थी. बाद में वैचारिक और राजनीतिक मतभेदों के कारण समाजवादी नेताओं ने कांग्रेस से अलग रास्ता चुन लिया था.
आज राहुल गांधी उसी कांग्रेस की राजनीति को बदलने की कोशिश कर रहे हैं. वे सामाजिक न्याय और जातिगत बराबरी को पार्टी की राजनीति के केंद्र में लाना चाहते हैं. एक तरह से वे कांग्रेस की पुरानी राजनीतिक विरासत में बदलाव कर रहे हैं.
अखिलेश यादव के सामने भी ऐसा ही अवसर है. वे चाहें तो समाजवादी पार्टी को अलग क्षेत्रीय दल बनाए रखने के बजाय समाजवादी विचारधारा को एक बदली हुई कांग्रेस के भीतर नई ताकत के रूप में स्थापित कर सकते हैं. इस बार समाजवादी धारा कांग्रेस के हाशिए पर नहीं, बल्कि उसकी सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक ताकतों में से एक हो सकती है.
अगर ऐसा होता है, तो भारतीय राजनीति में एक बिल्कुल नई संगठनात्मक व्यवस्था सामने आएगी. व्यावहारिक रूप से इसका मतलब होगा कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का नेतृत्व प्रभावी तौर पर अखिलेश यादव के हाथों में होगा.
भारतीय राजनीति में अब तक कई बड़े क्षेत्रीय नेता कांग्रेस छोड़कर अपनी अलग पार्टी बना चुके हैं. शरद पवार और ममता बनर्जी इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं. लेकिन अगर पहली बार कोई मजबूत क्षेत्रीय नेता अपनी अलग पार्टी को कांग्रेस में मिलाकर राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बनने का फैसला करे, तो यह भारतीय राजनीति में बिल्कुल नया प्रयोग होगा.
चुनावी दृष्टि से भी इसके बड़े नतीजे हो सकते हैं. बहुजन समाज पार्टी के कमजोर पड़ने और उसके समर्थकों में बढ़ती निराशा के कारण बड़ी संख्या में दलित मतदाता नए राजनीतिक विकल्प की तलाश में हैं. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का संयुक्त मंच उनके लिए एक मजबूत विकल्प बन सकता है. यह नहीं कहा जा सकता कि बसपा के सभी वोट अपने-आप इस नए दल को मिल जाएंगे, लेकिन दोनों पार्टियों के अलग-अलग लड़ने की तुलना में एकीकृत पार्टी के लिए उन मतदाताओं का भरोसा जीतना ज्यादा आसान होगा.
एक और महत्वपूर्ण पहलू भी है. आज की राजनीति पहले की तुलना में कहीं अधिक राष्ट्रीय और वैश्विक होती जा रही है. ऐसे दौर में केवल क्षेत्रीय और जाति-आधारित दलों के लिए लंबे समय तक अपनी राजनीतिक ताकत बनाए रखना मुश्किल हो सकता है.
समाजवादी पार्टी भी भविष्य में उन्हीं चुनौतियों का सामना कर सकती है, जिनसे बिहार में राष्ट्रीय जनता दल या तमिलनाडु में द्रविड़ पार्टियां जूझ रही हैं. इसलिए अखिलेश यादव के लिए कांग्रेस में विलय केवल अगले चुनाव की रणनीति नहीं होगा, बल्कि भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखकर लिया गया एक दूरदर्शी फैसला भी हो सकता है. इससे उनकी राजनीतिक भूमिका भी बदल सकती है. वे एक क्षेत्र की सीमा से उपर उठकर राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय सीमाओं से परे जाकर, देश की उभरती राजनीति को नई दिशा देने वाले मुख्य चेहरा बन सकते हैं.
अगर कांग्रेस को सचमुच नई शुरुआत करनी है, तो उसे पी. वी. नरसिंह राव और सीताराम केसरी के दौर से सीख लेते हुए मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व को और मजबूत करना होगा. नेहरू–गांधी परिवार पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहे, लेकिन हर समय वही सबसे आगे दिखाई दे, यह ज़रूरी नहीं है. ये सोचना चाहिए कि क्या कारण है कि शरद पवार, ममता बनर्जी और वाई. एस. जगन मोहन रेड्डी जैसे नेता कांग्रेस से अगल हुए?
अखिलेश यादव के सामने भी ऐसी ही चुनौती है. उन्हें भी अपनी पार्टी और नेतृत्व को अधिक उदार बनाना होगा, ताकि अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि से आने वाले प्रतिभाशाली लोगों को आगे बढ़ने का मौका मिले. इन जोखिमों के बावजूद राहुल गांधी और अखिलेश यादव का रिश्ता केवल चुनावी मजबूरी या अवसरवादी समझौता नहीं है. दोनों के बीच वैचारिक समानता भी है. अगर वे अलग-अलग रहते हैं तो एक ही सामाजिक आधार के लिए प्रतिस्पर्धा करते रह सकते हैं. दोनों अपनी-अपनी पार्टियों को लगभग एक जैसी सामाजिक सोच के आधार पर नए सिरे से गढ़ना चाहते हैं. दोनों का लक्ष्य ऐसी राजनीतिक ताकत तैयार करना है, जिसमें अलग-अलग धर्मों और जातियों के लोग सामाजिक न्याय के साझा एजेंडे पर एकजुट हों.
डेटा | क्या भारत में क्षेत्रीय दल अपनी प्रासंगिकता खो रहे हैं?
हाल के दिनों के दो राजनीतिक घटनाक्रम भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों के भविष्य पर विचार करने के लिए मजबूर करते हैं: 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की हार और कई क्षेत्रीय दलों में देखी गई दलबदल की लहर. यहां तक कि इस बात पर भी सवाल उठे हैं कि क्या क्षेत्रीय दल प्रासंगिक स्थिति में बने रह सकते हैं, खासकर प्रस्तावित “एक राष्ट्र, एक चुनाव” ढांचे के संदर्भ में.
‘द हिंदू’ में विभा अत्री और संजय कुमार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि क्षेत्रीय दलों की चुनावी हार को समग्र रूप से उनके पतन के प्रमाण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. वोट शेयर शायद किसी पार्टी के आधारभूत समर्थन का सबसे अच्छा संकेतक होता है. पिछले चार लोकसभा चुनावों के साथ-साथ राज्य विधानसभा चुनावों में भी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के वोट शेयर में बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है. मतदाता लोकसभा चुनावों की तुलना में विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय दलों के लिए बहुत अधिक प्राथमिकता दिखाना जारी रखते हैं, जो राज्य-स्तरीय राजनीतिक पहचान के स्थायी महत्व को रेखांकित करता है.
इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि हाल के वर्षों में कई क्षेत्रीय दलों को दलबदल का सामना करना पड़ा है. तृणमूल में हार के बाद कई दलबदल देखे गए. इसी तरह, आम आदमी पार्टी के भी कई राज्यसभा सांसदों ने दलबदल किया, जबकि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) ने भी महाराष्ट्र में दलबदल देखा. हालांकि ये घटनाक्रम संगठनात्मक कमजोरियों की ओर इशारा करते हैं, लेकिन दलबदल अपने आप में सिकुड़ते चुनावी समर्थन आधार का संकेत नहीं देता है.
बदलता राजनीतिक परिदृश्य
जहां तक वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य का सवाल है, भारतीय जनता पार्टी 11 राज्यों में अपने दम पर सत्तारूढ़ पार्टी है, जबकि कांग्रेस की तीन राज्यों में सरकारें हैं. क्षेत्रीय दल स्वतंत्र रूप से चार राज्यों में शासन कर रहे हैं. 10 अन्य राज्य ऐसे हैं जहां गठबंधन सरकारें सत्ता में हैं. इनमें से चार राज्यों में क्षेत्रीय दल प्रमुख भागीदार हैं, जबकि भाजपा सहयोगी भूमिका निभाती है (आंध्र प्रदेश, मेघालय, नागालैंड और पुडुचेरी). शेष छह राज्यों में, भाजपा क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन में सरकारों का नेतृत्व करती है (बिहार, उत्तर प्रदेश, असम, गोवा, महाराष्ट्र और त्रिपुरा). तीन राज्य ऐसे भी हैं जहां कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन सरकारों का हिस्सा है. झारखंड तथा जम्मू और कश्मीर में कांग्रेस छोटी गठबंधन साझेदार है. केरल में, कांग्रेस अन्य दलों के साथ गठबंधन सरकार का नेतृत्व करती है.
लगभग ढाई दशकों में क्षेत्रीय दलों द्वारा स्वतंत्र रूप से शासित राज्यों की यह सबसे कम संख्या है. 2015 और 2020 के बीच, क्षेत्रीय दलों ने किसी अन्य पार्टी के समर्थन की आवश्यकता के बिना स्वतंत्र रूप से नौ राज्यों पर शासन किया. ये आंकड़े निश्चित रूप से इस धारणा को समर्थन देते हैं कि क्षेत्रीय दल चुनावी और संगठनात्मक तनाव के दौर का सामना कर रहे हैं. हालांकि, भारत की ‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ (सबसे आगे रहने वाले की जीत) चुनावी प्रणाली अक्सर चुनावी जीत और हार को बड़ा करके दिखाती है. परिणामस्वरूप, क्षेत्रीय दलों के नेतृत्व वाली सरकारों की संख्या में गिरावट का मतलब यह नहीं है कि उनके चुनावी समर्थन में भी वैसी ही गिरावट आई है.
पिछले चार लोकसभा चुनावों के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों को मिले वोटों का विश्लेषण अधिक सूक्ष्म तस्वीर प्रस्तुत करता है. पिछले चार लोकसभा चुनावों के दौरान राष्ट्रीय दलों का संयुक्त वोट शेयर 60.04% और 68.15% के बीच रहा है, जो दर्शाता है कि राजनीतिक परिणामों में बड़े बदलावों के बावजूद उनका समग्र चुनावी समर्थन अपेक्षाकृत स्थिर रहा है.
राष्ट्रीय दलों का सबसे कम संयुक्त वोट शेयर 2014 के लोकसभा चुनाव में दर्ज किया गया था, जब उन्हें कुल वोटों का 60.04% मिला था, जबकि सबसे अधिक 2019 के लोकसभा चुनाव में दर्ज किया गया था, जब बालाकोट हवाई हमलों की पृष्ठभूमि में हुए चुनाव में उन्होंने 68.15% वोट हासिल किए थे. महत्वपूर्ण बात यह है कि 2014 का चुनाव दर्शाता है कि भारत की चुनावी प्रणाली के तहत वोट शेयर और चुनावी परिणाम हमेशा एक साथ नहीं चलते. इन चार चुनावों में राष्ट्रीय दलों का सबसे कम संयुक्त वोट शेयर दर्ज करने के बावजूद, भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने निर्णायक बहुमत हासिल किया. सभी राष्ट्रीय दलों ने मिलकर 2009 और 2024 के लोकसभा चुनावों में क्रमशः 63.59% और 62.72% वोट हासिल किए, जो बताता है कि उनकी समग्र चुनावी उपस्थिति व्यापक रूप से स्थिर रही है.
क्षेत्रीय दलों ने लोकसभा चुनावों में डाले गए कुल वोटों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा लगातार हासिल किया है, हालांकि विभिन्न चुनावों में इसमें थोड़ा उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. 2009 और 2014 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने मिलकर क्रमशः 31.22% और 35.86% वोट हासिल किए. सबसे हालिया लोकसभा चुनाव में, क्षेत्रीय दलों को मिलाकर 33.52% वोट मिले; इसमें केवल 2019 का चुनाव अपवाद रहा, जब उन्हें 28.1% वोट मिले थे. ये आंकड़े बताते हैं कि भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों के अंत की बात करना अभी बहुत जल्दबाज़ी होगी. कुछ राज्यों में चुनावी झटकों के बावजूद, क्षेत्रीय दलों का एक बड़ा समर्थन आधार बना हुआ है. वोट शेयर का राज्यवार वितरण यह भी दिखाता है कि चुनावी प्रदर्शन में उतार-चढ़ाव के बावजूद कई राज्यों में क्षेत्रीय दल महत्वपूर्ण चुनावी समर्थन बनाए हुए हैं.
यह भी नहीं भूलना चाहिए कि तमिलनाडु में जहां द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) को चुनावी झटका लगा, वहीं उसकी जगह एक अन्य क्षेत्रीय दल ने ले ली. भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय दलों का एक स्थिर स्थान है और यही बात क्षेत्रीय दलों के लिए भी सच प्रतीत होती है. क्षेत्रीय दलों के सामने चुनौती मतदाताओं के घटते समर्थन की नहीं, बल्कि सांगठनिक नवीनीकरण की है.
परिसीमन: तमिलनाडु विधानसभा ने लोकसभा की 543 सीटें बरकरार रखने का प्रस्ताव पारित किया
‘द हिंदू’ के मुताबिक, तमिलनाडु विधानसभा ने बुधवार, 12 अगस्त 2026 को केंद्र सरकार से लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या को स्थिर रखने और राज्यों के बीच सीटों के वर्तमान अनुपात को बनाए रखने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया. प्रस्ताव में लोकसभा और राज्यसभा के मौजूदा 2.2:1 अनुपात को बनाए रखने के साथ 2029 के लोकसभा चुनाव में मौजूदा 543 सीटों के आधार पर महिलाओं को 33% आरक्षण देने और इसके बाद होने वाले विधानसभा चुनावों में भी इसे बिना देरी लागू करने की मांग की गई है.
मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने प्रस्ताव पेश करते हुए कहा कि महिलाओं को राजनीति में आगे बढ़ने के लिए अवसर देना जरूरी है. उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण कोई रियायत नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकार का विषय है. उन्होंने बताया कि तमिलनाडु में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक है, लेकिन पिछली विधानसभा में 234 विधायकों में केवल 12 महिलाएं थीं. मौजूदा विधानसभा में यह संख्या बढ़कर 23 हुई है.
विजय ने कहा कि 2023 में संसद ने 106वां संविधान संशोधन पारित कर लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीट आरक्षित करने का प्रावधान किया था. हालांकि, केंद्र ने इसे जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन से जोड़ दिया. उनके मुताबिक, इससे महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों को लागू करने में वर्षों की देरी हो सकती है.
उन्होंने 2026 के 131वें संविधान संशोधन विधेयक और परिसीमन विधेयक का भी उल्लेख किया. 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में परिसीमन विधेयक को दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन नहीं मिल सका था.
दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व पर चिंता
मुख्यमंत्री ने कहा कि 8 अगस्त को तमिलनाडु के सांसदों की बैठक में परिसीमन के संभावित प्रभावों पर चर्चा हुई थी. उनके मुताबिक, यदि लोकसभा की सीटों की संख्या 50% तक बढ़ाई भी जाती है, तो 2026 की जनगणना के बाद राज्यों की आबादी के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन किया जा सकता है. ऐसी स्थिति में दक्षिणी राज्यों के लोकसभा प्रतिनिधित्व में बड़ी कमी आ सकती है.
विजय ने कहा कि तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के उपायों को सफलतापूर्वक लागू किया है. आबादी के आधार पर परिसीमन होने पर इन राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी उनके लिए बड़ा प्रतिनिधित्वात्मक अन्याय होगा.
उदयनिधि ने डीएमके की भूमिका बताई
विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन ने कहा कि परिसीमन से पैदा होने वाले खतरे को सबसे पहले डीएमके ने राष्ट्रीय स्तर पर उठाया था. उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन द्वारा पिछले दो वर्षों में की गई पहलों का उल्लेख किया, जिसमें सर्वदलीय बैठक बुलाना, विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों और राजनीतिक दलों के नेताओं को पत्र लिखना तथा दक्षिण के पांचों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ निष्पक्ष परिसीमन के लिए संयुक्त कार्य समूह बनाना शामिल था.
उदयनिधि ने कहा कि 16 अप्रैल 2026 को एम.के. स्टालिन ने परिसीमन विधेयक की प्रति जलाई थी. उन्होंने दावा किया कि संसद में विधेयक को रोकने में डीएमके ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी मौजूदा स्थिति को 25 साल से अधिक समय तक बनाए रखने और महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करने के पक्ष में है.
अन्नाद्रमुक ने प्रस्ताव का विरोध किया
अन्नाद्रमुक महासचिव एडप्पाडी के. पलानीस्वामी ने प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में आश्वासन दिया था कि लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ने की स्थिति में भी तमिलनाडु का मौजूदा 7.18% प्रतिनिधित्व कम नहीं किया जाएगा.
पलानीस्वामी ने कहा कि परिसीमन में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन तमिलनाडु का प्रतिनिधित्व 7.18% से कम नहीं होना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी ने संसद में महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग पहले भी उठाई थी.
उन्होंने आरोप लगाया कि परिसीमन विधेयक को लेकर कोई स्पष्ट संकेत नहीं होने के बावजूद तमिलनाडु की सरकार ने राजनीतिक माहौल बनाने के लिए विधानसभा में यह प्रस्ताव लाया.
अन्नाद्रमुक के साथ पीएमके, डीएमडीके और भाजपा ने भी प्रस्ताव का विरोध किया, जबकि डीएमके समेत अन्य दलों ने इसका समर्थन किया. हालांकि, प्रस्ताव का विरोध करने वाले दलों के प्रतिनिधियों ने भी विधानसभा में अपने भाषण के दौरान महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करने का समर्थन किया.
प्रस्ताव के जरिए तमिलनाडु ने एक साथ दो मांगें सामने रखी हैं. पहली, परिसीमन के बाद राज्य के लोकसभा प्रतिनिधित्व में मौजूदा हिस्सेदारी कम न हो और 543 सीटों का वर्तमान ढांचा बरकरार रहे. दूसरी, महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से अलग कर 2029 के लोकसभा चुनाव से ही लागू किया जाए.
सुशांत सिंह | पाकिस्तान की वैश्विक प्रतिष्ठा उसके घरेलू पतन को नहीं छिपा सकती
‘द कारवां’ सुशांत सिंह ने लिखा है कि तुर्किये और सऊदी अरब के साथ मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के बाद पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई रणनीतिक अहमियत मिली है, लेकिन यह कूटनीतिक उपलब्धि देश के भीतर बढ़ते राजनीतिक दमन, आर्थिक संकट और संस्थागत अस्थिरता की वास्तविकता को नहीं ढक सकती. यह समझौता पाकिस्तान को पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका देता है. तुर्किये सैन्य क्षमता और रक्षा विशेषज्ञता, सऊदी अरब आर्थिक ताकत और पाकिस्तान परमाणु हथियारों से लैस बड़ी पेशेवर सेना तथा सुरक्षा सहयोग का अनुभव लेकर इस साझेदारी में शामिल हैं.
लेख के मुताबिक, समझौते की पूरी शर्तें सार्वजनिक नहीं हुई हैं, लेकिन इसका महत्व पाकिस्तान की सेना के लिए खास है. सेना प्रमुख असीम मुनीर इसे पाकिस्तान की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता के तौर पर पेश कर सकते हैं. इससे सेना को घरेलू राजनीतिक और आर्थिक संकट के बीच अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर मिलता है. लेखक का तर्क है कि ऐसे हर कूटनीतिक लाभ से सैन्य प्रतिष्ठान को अस्थायी राहत मिलती है, जबकि देश के भीतर राजनीतिक दमन और आर्थिक बदहाली गहराती जा रही है.
इसी पृष्ठभूमि में पाकिस्तान में मौजूदा चार प्रांतों को खत्म कर कई छोटे प्रशासनिक इकाइयां बनाने की चर्चा भी तेज हुई है. संघीय आंतरिक सुरक्षा मंत्री मोहसिन नकवी ने चार प्रांतों की मौजूदा व्यवस्था को बदलने का प्रस्ताव रखा है. उन्हें सेना के करीब माना जाता है और सैन्य प्रवक्ता ने भी इस विचार का समर्थन किया है. अलग-अलग प्रस्तावों में पंजाब को पांच, सिंध को तीन, खैबर पख्तूनख्वा को तीन और बलूचिस्तान को दो इकाइयों में बांटने जैसे विकल्प सामने आए हैं.
छोटे प्रांत बनाने के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क प्रशासनिक है. पाकिस्तान की मौजूदा संघीय व्यवस्था में पंजाब का प्रभाव उसकी बड़ी आबादी, कारोबार, नौकरशाही, राजनीतिक नेटवर्क और सैन्य भर्ती में हिस्सेदारी के कारण बहुत अधिक है. सिंध में कराची और ग्रामीण सिंध के बीच प्रतिनिधित्व तथा संसाधनों को लेकर लंबे समय से तनाव है. खैबर पख्तूनख्वा में सामान्य जिलों और पूर्व कबायली क्षेत्रों की अलग प्रशासनिक पृष्ठभूमि तथा सुरक्षा संबंधी समस्याएं हैं. वहीं बलूचिस्तान विशाल क्षेत्रफल, कम आबादी और कमजोर राजनीतिक-आर्थिक एकीकरण से जूझता रहा है.
इस लिहाज से छोटे प्रांत बेहतर प्रतिनिधित्व और सार्वजनिक सेवाओं की उपलब्धता में सुधार ला सकते हैं. लेकिन लेखक के अनुसार, समस्या केवल प्रशासनिक नहीं है. प्रांतों की सीमाओं में बदलाव की मौजूदा कवायद के पीछे राजनीतिक इंजीनियरिंग का उद्देश्य भी देखा जाना चाहिए.
पाकिस्तान में सत्ता और संस्थानों के बीच शक्ति संतुलन लंबे समय से अस्थिर रहा है. सेना का राजनीतिक प्रभाव, कमजोर लोकतांत्रिक संस्थाएं, क्षेत्रीय असमानताएं और आर्थिक संकट एक-दूसरे को मजबूत करते हैं. ऐसे में प्रशासनिक पुनर्गठन अगर व्यापक राजनीतिक सहमति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बजाय सत्ता प्रतिष्ठान की जरूरतों के हिसाब से किया जाता है, तो इससे संकट खत्म होने के बजाय नए क्षेत्रीय और राजनीतिक संघर्ष पैदा हो सकते हैं.
मक्का समझौता पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर कुछ समय के लिए प्रभावशाली दिखा सकता है, लेकिन विदेश नीति की उपलब्धि घरेलू शासन की कमजोरियों का विकल्प नहीं बन सकती. वैश्विक प्रतिष्ठा और सैन्य साझेदारियां तभी स्थायी ताकत में बदल सकती हैं, जब उनके पीछे राजनीतिक स्थिरता, मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं, बेहतर शासन और आर्थिक सुधार मौजूद हों. अन्यथा बाहरी सफलता केवल उस घरेलू संकट को कुछ समय के लिए ढकती रहेगी, जो पाकिस्तान के राजनीतिक और सामाजिक ढांचे को भीतर से कमजोर कर रहा है.
सुशांत सिंह पत्रकार और शोधकर्ता हैं. वे सुरक्षा, विदेश नीति और दक्षिण एशिया से जुड़े मुद्दों पर लिखते हैं. यह उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनुदित अंश है.
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.













