12/06/2026: बकौल ट्रंप | महामानव से प्रश्न | सुप्रीम कोर्ट की भी 'ना' | जांच करने वाले सब बेईमान | आरएसएस पर दबाव | फुटकर महंगाई बढ़ी | एक साल बाद भी पता नहीं | आधी खाली डीएडब्ल्यू | गिल्स वर्नियर्स
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| निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
ट्रंप ने होर्मुज के पास भारतीय जहाजों पर हमले के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया: कहा- ‘पूरी तरह से अस्वीकार्य’
यदि “महामानव” इतने ‘देशभक्त’ हैं तो क्या वह बता सकते हैं कि अमेरिकी नौसैनिक किस जेल में बंद हैं?”
‘एक बार नामांकन खारिज होने पर, उपाय केवल ईसी के पास है’: मीनाक्षी नटराजन मामले में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप से इनकार
राम मंदिर में ‘चढ़ावा घोटाला’: महंत कमल नयन दास बोले, “जांच करने वाले सब बेईमान हैं, जांच कौन करेगा”; हाईकोर्ट में पीआईएल
‘मुझे वह कानून दिखाएं जो उन्हें छूट देता है...’: प्रियांक खड़गे ने आरएसएस पर दबाव बढ़ाया
खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतों के कारण खुदरा मुद्रास्फीति बढ़कर 3.93% हुई
एक साल बाद भी अहमदाबाद ड्रीमलाइनर आपदा का कोई जवाब नहीं; “टेकऑफ के 32 सेकंड बाद क्यों गिर गया था?”
इतने बड़े हादसे के साल भर बाद भी विमानों को उड़ान-योग्य रखने वाली डीजीसीए की इकाई आधी खाली
गिल्स वर्नियर्स | पार्टी का खेल बिगाड़ने वाले मतदाताओं की पसंद को खारिज कर रहे हैं
ट्रंप ने होर्मुज के पास भारतीय जहाजों पर हमले के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया: कहा- ‘पूरी तरह से अस्वीकार्य’
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को ईरान पर वाशिंगटन और तेहरान के बीच बन रहे एक समझौते की शर्तों को गलत तरीके से पेश करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि ईरानी अधिकारियों ने जिन विवरणों को लीक किया है, उनका “सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है”. इसके साथ ही उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास भारत से जुड़े वाणिज्यिक जहाजों पर एक विफल ड्रोन हमले की निंदा की.
अनिरुद्ध धर के अनुसार, यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत इस संघर्ष के परिणामों से जूझ रहा है. भारत ने एक अमेरिकी हमले में अपने तीन नाविकों को खो दिया है, जबकि भारतीय चालक दल वाले एक अन्य जहाज पर हुए हमले में बड़ी मुश्किल से अन्य नाविकों की जान बची.
ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, “ईरान ने ‘फेक न्यूज’ को जो शर्तें लीक की हैं, उनका उन शर्तों से कोई लेना-देना नहीं है जिन पर लिखित रूप में सहमति बनी थी.”
उन्होंने आगे कहा, “डील होने को लेकर दिए गए उनके कमजोर और दयनीय बयान सहित उन्होंने जो कुछ भी कहा है, उसका सच्चाई से कोई संबंध नहीं है. ये लेन-देन के मामले में बहुत ही बेईमान लोग हैं. इनके साथ नेक नियती से काम करने जैसा कुछ नहीं होता. कमाल है!”
ट्रंप ने खाड़ी में भारतीय जहाजों पर होने वाले हमलों को लेकर भी कड़ा रुख अपनाया. उन्होंने कहा, “बीती रात होर्मुज जलडमरूमध्य से निकल रहे भारतीय जहाजों के खिलाफ उनके पूरी तरह से विफल रहे ड्रोन हमले ‘पूरी तरह से अस्वीकार्य’ हैं. बेहतर होगा कि वे अपनी हरकतें सुधार लें, और वो भी तेजी से!”
ट्रंप की टिप्पणी भारतीय जीवन और वाणिज्यिक हितों को अमेरिका-ईरान के बढ़ते विवाद के केंद्र में लाती है. फिलीपींस के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा नाविक आपूर्तिकर्ता देश भारत, ओमान के पास एक वाणिज्यिक टैंकर पर हुए अमेरिकी हमले में पहले ही अपने तीन नाविक खो चुका है, जबकि इसके एक दिन बाद 20 भारतीय चालक दल के सदस्यों वाले एक अन्य जहाज पर हमला हुआ.
दुनिया की लगभग एक-तिहाई तेल आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरती है और लाखों भारतीय खाड़ी क्षेत्र में रहते और काम करते हैं. ऐसे में इस क्षेत्र में जारी अस्थिरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा और उसके नागरिकों की सुरक्षा, दोनों के लिए खतरा पैदा करती है.
समझौते की शर्तों पर विवाद
ट्रंप की नवीनतम टिप्पणी उनके एक दिन पहले के आशावादी रुख से बिल्कुल उलट थी, जब उन्होंने कहा था कि उन्होंने ईरान पर नियोजित हमलों को टाल दिया है क्योंकि व्यावहारिक रूप से एक समझौता हो चुका था.
हालांकि, ईरानी अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से जिन शर्तों को रेखांकित किया है, वे वाशिंगटन के घोषित उद्देश्यों से काफी अलग दिखती हैं.
एक वरिष्ठ ईरानी स्रोत ने रॉयटर्स को बताया कि समझौते के मसौदे में ईरानी तेल निर्यात पर से प्रतिबंध हटाना, ईरानी संपत्तियों में जमे (फ्रीज) अरबों डॉलर को जारी करना और लेबनान सहित कई मोर्चों पर शत्रुता समाप्त करना शामिल होगा. सूत्र ने कहा कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों को भविष्य की वार्ताओं के लिए टाल दिया जाएगा.
वाशिंगटन का हमेशा से यह रुख रहा है कि किसी भी समझौते में यह सुनिश्चित होना चाहिए कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार विकसित न करे, जबकि तेहरान का दावा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण है.
क्रॉसफायर में फंसे भारतीय जहाज
ट्रंप द्वारा भारतीय जहाजों का उल्लेख ऐसे समय में किया गया है जब इस संघर्ष में भारतीय नाविकों को हुए नुकसान को लेकर भारत में गुस्सा बढ़ रहा है.
24 भारतीय नाविकों को ले जा रहे पलाऊ के ध्वज वाले तेल टैंकर ‘मैरिवेक्स’ को 8 जून को अमेरिकी बलों ने निष्क्रिय (डिसेबल) कर दिया था. चालक दल के सभी सदस्यों को सुरक्षित बचा लिया गया. 10 जून को, अमेरिका ने पलाऊ के ध्वज वाले एक अन्य टैंकर ‘सेटेबेलो’ पर हमला किया, जिसमें सवार 24 भारतीय नाविकों में से तीन की मौत हो गई. गुरुवार को एक और जहाज ‘जलवीर’ पर हमला हुआ, जो गिनी-बिसाऊ के ध्वज वाला टैंकर है और जिसमें 20 भारतीय सवार थे.
इन मौतों के कारण नई दिल्ली को नागरिक जहाजों के खिलाफ बल प्रयोग का विरोध करने के लिए तीन दिनों में दूसरी बार अमेरिकी कार्यवाहक (चार्ज डी’अफेयर्स) जेसन मीक्स को तलब करना पड़ा.
भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि उसने “नागरिक जहाजों के खिलाफ घातक और जानलेवा बल के उपयोग पर अपनी गहरी चिंता” व्यक्त की है, और ऐसी कार्रवाइयों को अस्वीकार्य तथा समुद्री स्थिरता के लिए हानिकारक बताया है.
इन घटनाओं के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से यह मांग भी की जाने लगी है कि वे अगले सप्ताह होने वाले जी7 शिखर सम्मेलन के इतर ट्रंप से संभावित मुलाकात के दौरान इस मुद्दे को सीधे उनके सामने उठाएं.
गतिरोध के बिंदु
ट्रंप के इस आग्रह के बावजूद कि ईरान को “अपनी हरकतें सुधारनी चाहिए”, बड़े गतिरोध वाले मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं.
ईरान लगातार प्रतिबंधों से राहत, फ्रीज की गई संपत्तियों तक पहुंच और व्यापक क्षेत्रीय रियायतों की मांग कर रहा है, जबकि अमेरिका तेहरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर मजबूत आश्वासन के लिए दबाव बना रहा है.
प्रस्तावित समझौते की शर्तों पर स्पष्ट असहमति कूटनीतिक प्रक्रिया की नाजुकता को रेखांकित करती है, भले ही दोनों पक्ष बड़े युद्ध से बचने की इच्छा का संकेत दे रहे हों.
भारत के लिए, इसके दांव भू-राजनीति से कहीं आगे हैं. होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी लंबे व्यवधान से तेल की कीमतें बढ़ने, व्यापार मार्ग प्रभावित होने और दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री गलियारों में से एक में काम करने वाले हजारों भारतीय नाविकों के लिए खतरा और बढ़ने का जोखिम है.
यदि “महामानव” इतने ‘देशभक्त’ हैं तो क्या वह बता सकते हैं कि अमेरिकी नौसैनिक किस जेल में बंद हैं?”
गुरुवार को पोर्ट्स, शिपिंग और जलमार्ग मंत्री सरबानंद सोनोवाल ने जब यह जानकारी दी कि अमेरिकी हमले के बाद ओमान के तट पर पलाऊ ध्वज वाले टैंकर एमटी सेट्टेबेलो पर लापता बताए गए तीनों भारतीय नाविकों की मौत हो गई है, तो सोशल मीडिया पर लोग मोदी सरकार के खिलाफ खुलकर सामने आ गए. 2014 के आम चुनाव के पहले मोदी के भाषणों को आर्काइव से निकाल लिया गया और सवाल होने लगे कि अब मोदी क्यों चुप हैं. तब तो मोदी सोनिया गांधी और तत्कालीन मनमोहन सरकार से तीखे प्रश्न कर रहे थे.
दरअसल, 24 भारतीय क्रू सदस्यों को ले जा रहे भारतीय टैंकर पर इस सप्ताह की शुरुआत में अमेरिकी सैन्य हमले हुआ था, जिसके बाद भारतीय और ओमानी अधिकारियों ने संयुक्त रूप से खोज और बचाव अभियान चलाया. इस घटना ने भारत में चिंता पैदा कर दी थी क्योंकि 21 भारतीय नागरिकों को बचा लिया गया था जबकि तीन अन्य हमले के बाद लापता थे. एक दिन पहले भारत ने इस वाणिज्यिक जहाज़ पर हुए हमले की कड़ी निंदा की थी और अमेरिका के खिलाफ औपचारिक विरोध दर्ज कराया था.
मोदी ने असल में 2014 के पहले इतनी बड़ी-बड़ी बातें की थीं और दावे किये थे कि जो अब उनके लिए मुसीबत बन रहे हैं. चाहे फिर नोटबंदी हो, चीन को लाल आंख दिखाना हो, आतंकवाद का मामला हो या फिर रुपये के लगातार गिरने से लेकर पेट्रोल, डीज़ल और रसोई गैस के दाम हों, एक लंबी लिस्ट है, जिसको लेकर उनसे सवाल किये जाते हैं.
मसलन, मार्च 2014 में मोदी ने तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को इतालवी मरीन मामले पर निशाना बनाते हुए कहा था कि केरल तट पर दो भारतीय मछुआरों की हत्या के आरोप में मुकदमे का सामना कर रहे दो अभियुक्तों को पिछले वर्ष भारत से “सुरक्षित मार्ग” किसने दिया. 31 मार्च 2014 को मोदी ने ट्वीट किया था, “इतालवी मरीन ने निर्दयता से हमारे मछुआरों की हत्या कर दी. यदि “मैडम” (सोनिया गांधी) इतनी ‘देशभक्त’ हैं तो क्या वह बता सकती हैं कि मरीन किस जेल में बंद हैं?”
बस, सोशल मीडिया यूज़र्स ने 2014 के मोदी के इन्हीं तेवरों और सवालों को मुद्दा बनाकर उनकी आलोचना शुरू कर दी और सवाल भी करने लगे. राजेश नाम के एक यूज़र ने लिखा, “अमेरिकी नेवी ने बड़ी निर्दयता के साथ हमारे तीन नाविक मार डाले. यदि “सर” (नरेंद्र मोदी) इतने ‘देशभक्त’ हैं तो क्या वह बता सकते हैं कि अमेरिकी नौसैनिक किस जेल में बंद हैं?” प्रकूल नामक उपयोगकर्ता ने भी ‘एक्स’ पर लिखा, “अमेरिकी मरीन ने बेरहमी से हमारे नाविकों की हत्या कर दी. यदि महामानव इतने ‘देशभक्त’ हैं तो क्या वह बता सकते हैं कि मरीन किस जेल में बंद हैं?”
कृष्णा नामक यूज़र ने टिप्पणी की, “”जून 2021 में आपकी सरकार ने मामला वापस लेकर इतालवी मरीन को रिहा कर सुरक्षित रूप से इटली भेज दिया था.” इसके साथ उन्होंने ‘द गार्डियन’ अखबार की कटिंग भी लगाई है.
‘एक बार नामांकन खारिज होने पर, उपाय केवल ईसी के पास है’: मीनाक्षी नटराजन मामले में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि यदि चुनाव अधिकारी (रिटर्निंग ऑफिसर) द्वारा किसी उम्मीदवार का नामांकन खारिज कर दिया जाता है, तो एकमात्र उपाय चुनाव आयोग (ईसी) का रुख करना है. अदालत कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने राज्यसभा चुनाव के लिए अपने नामांकन पत्र खारिज किए जाने को चुनौती दी थी.
‘पीटीआई’ के अनुसार, अदालत ने नटराजन से ऐसा कोई भी पुराना फैसला दिखाने को कहा, जिसमें कोर्ट ने ऐसे मामलों में हस्तक्षेप किया हो. जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने कहा, “फैसला चाहे कितना भी त्रुटिपूर्ण (गलत) क्यों न हो, एक बार नामांकन खारिज होने के बाद, इसका उपाय आमतौर पर कहीं और होता है. क्या इस अदालत का ऐसा कोई फैसला है जहाँ हमने इस स्तर पर हस्तक्षेप किया हो?”
नटराजन की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि किसी उम्मीदवार को केवल उसी आपराधिक मामले का खुलासा करना होता है, जिसमें न्यूनतम दो साल की सजा का प्रावधान हो, जबकि वर्तमान मामले में केवल समन जारी किए गए थे.
उन्होंने कहा कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (आरपी एक्ट) के तहत एक कथित आपराधिक मामले का खुलासा न करने का हवाला देते हुए चुनाव अधिकारी द्वारा मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन पत्र गलत तरीके से खारिज कर दिया गया.
कांग्रेस ने शुक्रवार को आरोप लगाया कि भाजपा और चुनाव आयोग कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का राज्यसभा चुनाव नामांकन खारिज करके “सीट चोरी” के इस ताजा मामले में “अपराध के भागीदार” हैं. कांग्रेस ने दावा किया कि नामांकन खारिज करना “त्रुटिपूर्ण और तर्कहीन” था.
उधर नई दिल्ली में मध्यप्रदेश कांग्रेस के 61 विधायकों की एक बैठक में कहा गया कि देश चुनावी तानाशाही की ओर बढ़ रहा है. कांग्रेस ने भाजपा पर राजनीतिक लाभ के लिए चुनावी संस्था (चुनाव आयोग) के साथ मिलकर लोकतांत्रिक संस्थाओं को नष्ट करने का आरोप लगाया है और कहा है कि यह लड़ाई ‘संवैधानिक मॉडल’ और ‘मोदी मॉडल’ के बीच है.
राम मंदिर में ‘चढ़ावा घोटाला’: महंत कमल नयन दास बोले, “जांच करने वाले सब बेईमान हैं, जांच कौन करेगा”; हाईकोर्ट में पीआईएल
अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे के कथित ‘गबन’ (घोटाले) की सीबीआई जांच की मांग को लेकर शुक्रवार (12 जून) को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई.
संजय पांडे के अनुसार, इस मामले पर अगले सप्ताह सुनवाई होने की संभावना है. स्थानीय वकील मोहित अशोक द्वारा दायर इस जनहित याचिका में मामला दर्ज करने और सीबीआई द्वारा आरोपों की जांच कराने की मांग की गई है. इसमें सीएजी (भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक) द्वारा श्रद्धालुओं के नकद और आभूषणों सहित पूरे चढ़ावे का ऑडिट कराने की भी मांग की गई है.
याचिकाकर्ता ने कहा कि राम मंदिर में चढ़ावे के कथित गबन की खबर से करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाएं ‘आहत’ हुई हैं, इसलिए इस मामले की निष्पक्ष जांच होना बेहद जरूरी है. जनहित याचिका में केंद्र सरकार, सीबीआई, सीएजी और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को पक्षकार (इम्पलीड) बनाने की मांग की गई है. इस बीच, सूत्रों के अनुसार, पीएमओ के बाद आरएसएस ने भी इस मामले पर राम मंदिर प्रबंधन से रिपोर्ट मांगी है.
सूत्रों ने बताया कि कथित तौर पर गबन की गई राशि का एक हिस्सा, जिसका खुलासा नहीं किया गया है, बरामद कर लिया गया है. इससे पहले भाजपा के वरिष्ठ नेताओं और संतों ने भी इस मामले की जांच की मांग की थी.
भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद बृजभूषण ने अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे में गबन के आरोपों का समर्थन करते हुए कहा कि वह परिणाम के डर से सच नहीं बोल पा रहे हैं. भाजपा के एक अन्य वरिष्ठ नेता और अयोध्या के पूर्व सांसद विनय कटियार ने भी मामले की स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए कहा कि यह मुद्दा करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा है. अयोध्या के कुछ संतों ने भी इस मुद्दे पर अपनी बात रखी और मामले की जांच की मांग की.
इस बीच महंत कमल नयन दास ने कहा, “अगर कोई गड़बड़ी हुई है, तो उसकी जांच अवश्य होनी चाहिए. लेकिन जांच करने वाले खुद बेईमान हैं. कौन दूध का धुला है? सबके सब बेईमान हैं. जो हल्ला मचा रहे हैं, वो क्या दूध के धोए हैं? जांच करने वाले सब बेईमान हैं. तो जांच कौन करेगा? भगवान ही जांच करेंगे. जो रिक्शे और साइकिल पर चलते थे, वो आज बड़ी-बड़ी गाड़ियों में चल रहे हैं. उनके बड़े-बड़े मकान बन गए. अब किसका-किसका नाम मैं गिनाऊँ. जो जैसा करेगा, उसका फल उसे मिलेगा. निश्चित मिलेगा. भगवान दंड देंगे.”
‘मुझे वह कानून दिखाएं जो उन्हें छूट देता है...’: प्रियांक खड़गे ने आरएसएस पर दबाव बढ़ाया
कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने बेंगलुरु शहर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मुख्यालय का दौरा करने की पेशकश की, ताकि यह समझा जा सके कि इस हिंदू राष्ट्रवादी संगठन को सरकार के साथ पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) करने से किस कानून के तहत छूट दी गई थी.
भरत जोशी के अनुसार, इसके विकल्प के रूप में, प्रियांक ने आरएसएस नेताओं को संगठन की कानूनी स्थिति की समीक्षा करने के लिए अपने कार्यालय में आमंत्रित किया.
प्रियांक ने कहा, “आरएसएस मुझे अपने केशव कृपा मुख्यालय में बुलाए. वे मुझे वह कानून दिखाएं, जिसके तहत उन्हें सरकार के प्रति जवाबदेह होने से छूट मिली है. या फिर, वे दस्तावेजों के साथ मेरे कार्यालय आएं. वे दिखाएं कि कैसे उन्हें संवैधानिक प्रावधानों से छूट मिली है. मैं इसका मूल्यांकन करूँगा. अगर मैं गलत हूँ, तो मैं माफी माँगूँगा. अन्यथा, उन्हें सुधार करना होगा. “
प्रियांक आरएसएस के पंजीकरण की मांग पर अड़े हुए हैं, जिसे इसके सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने ‘व्यक्तियों का एक निकाय’ बताया है.
पिछले साल नवंबर में भागवत ने कहा था: “हमें (क) व्यक्तियों के एक निकाय के रूप में वर्गीकृत किया गया है. और हम एक मान्यता प्राप्त संगठन हैं. आयकर विभाग ने हमसे आयकर का भुगतान करने के लिए कहा था, और इस पर मुकदमा चला था. अदालत ने कहा, ‘यह व्यक्तियों का एक निकाय है और हमारी गुरु दक्षिणा (दान) को आयकर से छूट दी गई थी’.”
प्रियांक इस बात से असहमत हैं. उन्होंने कहा, “जिस देश में एक रेहड़ी-पटरी वाले (सड़क विक्रेता) को भी पंजीकरण कराना पड़ता है, मंदिरों और भगवानों को मिलने वाले हर दान का हिसाब देना पड़ता है और नागरिकों को टैक्स रिटर्न दाखिल करना पड़ता है, वहां आरएसएस को कैसे छूट मिली हुई है? क्या वे जो चाहें कर सकते हैं?”
उन्होंने कहा, “वे खुद को व्यक्तियों का एक निकाय बताते रहते हैं. यहाँ तक कि बैंगलोर क्लब भी व्यक्तियों का एक निकाय है.”
गृह मंत्री का पदभार संभालने के बाद एक ट्वीट में, प्रियांक ने आरएसएस से पंजीकरण के लिए “अपने दस्तावेज तैयार रखने” को कहा था. अतीत में, प्रियांक ने दावा किया है कि कांग्रेस सरकार आरएसएस का पंजीकरण कराने के लिए एक कानून लाएगी.
मंत्री के ट्वीट पर वरिष्ठ भाजपा नेता सी टी रवि ने पलटवार किया, जिन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की थी और वे विफल रहे थे.
प्रियांक ने आरएसएस को “कायर” बताते हुए कहा, “मुझे नहीं लगता कि सी टी रवि अपना इतिहास जानते हैं. संगठन पर प्रतिबंध लगने के बाद आरएसएस नेता नेहरू और सरदार पटेल के चरणों में गिर गए थे. जब इंदिरा गांधी ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया, तो इसके सरसंघचालक ने आपातकाल (इमरजेंसी) का समर्थन करते हुए एक लंबा, प्रशंसात्मक पत्र लिखा था.”
खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतों के कारण खुदरा मुद्रास्फीति बढ़कर 3.93% हुई
शुक्रवार को जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में खुदरा मुद्रास्फीति (रिटेल इन्फ्लेशन) मई महीने में मामूली रूप से बढ़कर 3.93 प्रतिशत हो गई, जो अप्रैल में 3.48 प्रतिशत थी. इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण खाद्य पदार्थों की कीमतों में आई तेजी है.
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक (सीएफपीआई) द्वारा मापी जाने वाली खाद्य टोकरी (फूड बास्केट) की मुद्रास्फीति मई में बढ़कर 4.78 प्रतिशत हो गई, जो इससे पिछले महीने (अप्रैल) में 4.2 प्रतिशत थी.
‘टीएनआईई’ के अनुसार, सबसे तेज मूल्य वृद्धि दर्ज करने वाली वस्तुओं में कीमती धातुओं के आभूषण, टमाटर, अदरक, किशमिश और मुनक्का शामिल थे. दूसरी ओर, मई में अखिल भारतीय स्तर पर सबसे कम मुद्रास्फीति दर (कम कीमतों) वाली वस्तुओं में आलू, मटर, मोटर कार और जीप, जीरा, तथा मोटरसाइकिल और स्कूटर शामिल रहे.
पिछले सप्ताह, आरबीआई ने चालू वित्त वर्ष के लिए अपने मुद्रास्फीति अनुमान को 4.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत कर दिया था. इसका मुख्य कारण बढ़ती इनपुट लागत है, जो वैश्विक ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी के कारण घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में हुई वृद्धि से प्रेरित है.
मई से अब तक, खुदरा ईंधन कीमतों में कुल मिलाकर पेट्रोल के लिए 7.4 प्रतिशत और डीजल के लिए 8.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जा चुकी है.
इस महीने की शुरुआत में जारी अपने मौद्रिक नीति बयान में आरबीआई ने कहा था कि इस वृद्धि का मुख्य (हेडलाइन) मुद्रास्फीति पर लगभग 36 आधार अंकों (बेसिस पॉइंट्स) का सीधा प्रभाव पड़ेगा, जो अन्य द्वितीयक (सेकंड-ऑर्डर) प्रभावों के साथ आने वाले महीनों में उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति में दिखाई देगा.
एक साल बाद भी अहमदाबाद ड्रीमलाइनर आपदा का कोई जवाब नहीं; “टेकऑफ के 32 सेकंड बाद क्यों गिर गया था?”
पिछले वर्ष 12 जून को एयर इंडिया की उड़ान AI171 ने अहमदाबाद से लंदन के लिए उड़ान भरी थी. टेकऑफ के महज 32 सेकंड बाद विमान का थ्रस्ट (प्रणोदक बल) खत्म हो गया और वह हवाई अड्डे के बाहर घनी आबादी वाले इलाके में दुर्घटनाग्रस्त हो गया. इस भीषण हादसे में कुल 260 लोगों (विमान में सवार 241 यात्री व चालक दल और जमीन पर मौजूद 19 लोग) की दर्दनाक मौत हो गई थी, जबकि केवल एक ब्रिटिश यात्री जीवित बचा था. लेकिन, एक साल बाद भी यह पता नहीं चला है कि “टेकऑफ के 32 सेकंड बाद यह बोइंग विमान आसमान से नीचे क्यों गिर गया था?”
अंतर्राष्ट्रीय विमानन नियमों के अनुसार, हादसे के एक साल के भीतर अंतिम रिपोर्ट सौंपना अनिवार्य होता है. लेकिन, भारत का विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (एएआईबी) इस महत्वपूर्ण समय-सीमा से चूक गया है, जैसा कि परन बालकृष्णन अपनी रिपोर्ट में लिखते हैं. उनका कहना है कि अंतिम जांच रपट के बजाय, अब एक स्टेटस अपडेट (स्थिति विवरण) जारी किया जा रहा है. जांच में हो रही इस देरी का मुख्य कारण अमेरिका में विमान के जीई एयरोस्पेस इंजनों की जटिल तकनीकी जांच का अधूरा होना है. विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक जेट इंजनों को पूरी तरह खोलकर विश्लेषण करने में समय लग रहा है और अंतिम रिपोर्ट आने में अभी कम से कम तीन महीने का समय और लग सकता है.
जांचकर्ताओं (जिसमें भारत, अमेरिका, बोइंग और अमेरिकी एनटीएसबी शामिल हैं) ने शुरुआती फोरेंसिक विश्लेषण में किसी भी तरह की यांत्रिक विफलता (मैकेनिकल फेलियर) या तोड़फोड़ (सबोटॉज) की संभावना को पूरी तरह खारिज कर दिया है. इसके बाद, जांच का मुख्य केंद्र बिंदु पायलटों की गतिविधियां बन गया है.
जुलाई 2025 में जारी एएआईबी की प्रारंभिक रिपोर्ट में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ था कि उड़ान भरने के तुरंत बाद कॉकपिट में मौजूद दो “फ्यूल-कंट्रोल स्विच” अचानक ‘रन’ से ‘कट-ऑफ’ स्थिति में आ गए थे. चूंकि इन स्विचों को उड़ान के दौरान कभी नहीं छुआ जाता, इसलिए इनके बंद होते ही इंजनों को ईंधन मिलना बंद हो गया और विमान क्रैश हो गया. कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर के अनुसार, एक पायलट ने दूसरे से पूछा भी था कि उसने स्विच क्यों बंद किए, जिस पर दूसरे ने मना कर दिया था. हालांकि, ‘रॉयटर्स’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि कैप्टन ने ही ईंधन की आपूर्ति बंद की होगी.
इस निष्कर्ष पर तीखा विवाद छिड़ गया. ‘फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स’ ने जांचकर्ताओं की “पायलट आत्महत्या (सुसाइड) थ्योरी” का कड़ा विरोध किया. यूनियन के अध्यक्ष सी.एस. रंधावा ने सरकार से अंतरिम रिपोर्ट जारी न करने की मांग की है, क्योंकि इससे अफवाहें और गलतफहमियां बढ़ेंगी. उनका कहना है कि अधिकारियों को केवल पायलटों को दोषी ठहराने के बजाय एयर इंडिया के विमानों में बार-बार होने वाली तकनीकी गड़बड़ियों और मेंटेनेंस (रखरखाव) रिकॉर्ड की भी गहन जांच करनी चाहिए. मृत कैप्टन के परिवार ने भी इस थ्योरी को सिरे से नकारा है और पायलट के पिता ने स्वतंत्र जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है.
इसके विपरीत, एयर इंडिया ने रखरखाव में लापरवाही के आरोपों को खारिज किया है और कहा है कि घटना के बाद उन्होंने डीजीसीए की देखरेख में अपने पूरे बोइंग 787 बेड़े की सुरक्षा जांच के लिए उड़ानों को कुछ समय के लिए कम कर दिया था.
यह आपदा केवल एयर इंडिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक व्यावसायिक और वैश्विक निहितार्थ हैं: बोइंग पर संकट: बोइंग कंपनी के लिए यह उसकी साख का सवाल है, जो पहले से ही गुणवत्ता नियंत्रण और सुरक्षा संबंधी विवादों से जूझ रही है. अहमदाबाद हादसे से पहले तक बोइंग 787 ड्रीमलाइनर का सुरक्षा रिकॉर्ड बेदाग था और कभी कोई घातक दुर्घटना नहीं हुई थी. हालांकि, 2013 में बैटरी खराबी के कारण इस बेड़े को ग्राउंडेड किया गया था. इसके अलावा, कंपनी के पूर्व गुणवत्ता प्रबंधक जॉन बार्नेट और जोशुआ डीन जैसे व्हिसलब्लोअर्स की रहस्यमयी मौतों (जिसका जांच में व्हिसलब्लोइंग से कोई सीधा संबंध नहीं मिला) ने पहले ही बोइंग पर जनता के भरोसे को कमजोर किया था.
एयर इंडिया और टाटा समूह: निजीकरण के बाद टाटा समूह के स्वामित्व में वापसी (टर्नअराउंड) का प्रयास कर रही एयर इंडिया के लिए यह आपदा एक बेहद संवेदनशील समय पर आई है. कंपनी पहले से ही वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की समस्याओं और अंतरराष्ट्रीय हवाई मार्गों को प्रभावित करने वाले ईरान संघर्ष जैसी चुनौतियों से जूझ रही है.
पीड़ितों के परिवारों की मांग और मुआवजा
दुर्घटना की पहली बरसी पर पीड़ितों के परिवार न्याय और स्पष्टता की मांग कर रहे हैं. हादसे में अपने भाई को खोने वाले एकमात्र जीवित बचे यात्री, विश्वास कुमार रमेश ने जांच में पूर्ण ईमानदारी और पारदर्शिता की मांग की है. यूके की एक लॉ फर्म के अनुसार, कई परिवार इस हादसे के लिए जिम्मेदार संभावित पक्षों के खिलाफ दीवानी दावों (सिविल क्लेम्स) पर कानूनी विचार कर रहे हैं.
दूसरी ओर, टाटा समूह और एयर इंडिया ने बताया कि उन्होंने चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन द्वारा घोषित 1 करोड़ रुपये की अनुग्रह राशि (एक्स-ग्रेशिया पेमेंट) को करीब 96 प्रतिशत प्रभावित परिवारों में वितरित कर दिया है, हालांकि इसे अंतिम कानूनी समझौता नहीं माना गया है.
इतने बड़े हादसे के साल भर बाद भी विमानों को उड़ान-योग्य रखने वाली डीजीसीए की इकाई आधी खाली
एयर इंडिया उड़ान 171 की भयावह आपदा के बाद देश की विमानन सुरक्षा को सुदृढ़ करने के सरकारी दावों के विपरीत, वास्तविक स्थिति चिंताजनक बनी हुई है. कुणाल पुरोहित के अनुसार, ‘द वायर’ द्वारा सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त नवीनतम आंकड़ों से खुलासा हुआ है कि विमानों की सुरक्षा प्रमाणित करने वाली सबसे महत्वपूर्ण इकाई—उड़ान योग्यता निदेशालय (डीएडब्ल्यू)—हादसे के पहले की तुलना में अब और भी अधिक कर्मचारियों की कमी से जूझ रही है.
आंकड़ों के अनुसार, निदेशालय (डीएडब्ल्यू) में स्वीकृत कुल 310 पदों में से 136 पद (यानी लगभग 44 प्रतिशत) वर्तमान में खाली पड़े हैं. पिछले साल जुलाई में यह संख्या 133 थी, जो कम होने के बजाय अब और बढ़ गई है. चौंकाने वाली बात यह है कि आपदा के बाद के 11 महीनों में सरकार द्वारा इस विभाग में एक भी नई नियुक्ति नहीं की गई और न ही सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कोई नया पद सृजित किया गया. यह स्थिति सरकार और नागरिक उड्डयन मंत्री के उन आश्वासनों पर गंभीर सवाल खड़े करती है, जिनमें विमानन सुरक्षा में दीर्घकालिक सुधार करने और कोई कसर न छोड़ने की बात कही गई थी.
उड़ान योग्यता निदेशालय (डीएडब्ल्यू) नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) की एक फ्रंट-लाइन (अग्रिम पंक्ति) सुरक्षा और ऑडिट इकाई है. इसके मुख्य कार्यों में निम्नलिखित शामिल हैं: विमानों को उड़ान भरने के लिए पूरी तरह उपयुक्त होने का प्रमाणपत्र देना, उड़ानों और उनके चालक दल (क्रू) की औचक व आकस्मिक जांच करना और विमानों के रख-रखाव, मरम्मत और ओवरहालिंग (एमआरओ) करने वाले केंद्रों का विस्तृत ऑडिट करना.
विमानन सुरक्षा में इसकी महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि डीजीसीए की वर्ष 2026-27 की वार्षिक निगरानी योजना के तहत तय किए गए कुल 5,435 ऑडिटों में से अकेले 1,802 ऑडिट (यानी हर तीन में से एक जांच) इसी निदेशालय द्वारा किए जाने निर्धारित हैं. इन जांचों में रात का निरीक्षण, रनवे, हैंगर और रैंप पर विमानों की तकनीकी जांच शामिल हैं, जो यात्री सुरक्षा की रीढ़ मानी जाती हैं.
निदेशालय इस समय नाममात्र के स्टाफ के सहारे इतने बड़े कार्यभार को संभाल रहा है: अग्रिम पंक्ति के अधिकारी : ग्राउंड लेवल पर ऑडिट करने वाले एयरवर्दीनेस ऑफिसर्स के स्वीकृत 121 पदों में से केवल 52 पद ही भरे हुए हैं. इसका सीधा मतलब यह है कि लगभग 57% पद खाली पड़े हैं. सबसे गंभीर स्थिति शीर्ष स्तर पर है. पूरे देश में संचालन की देखरेख के लिए स्वीकृत उड़ान योग्यता निदेशकों के सभी 18 पद (100 फीसदी) पूरी तरह खाली पड़े हैं.
डीएडब्ल्यू के पूर्व निदेशक राजेंद्र प्रसाद के अनुसार, विमान के रख-रखाव से लेकर उसके कल-पुर्जों को बदलने और यहाँ तक कि विमान पर कोई विज्ञापन चिपकाने तक के लिए इस निदेशालय की तकनीकी मंजूरी अनिवार्य होती है. कर्मचारियों की इतनी भारी कमी के कारण आवश्यक निगरानी और सर्विलांस का काम बुरी तरह प्रभावित होता है. ऐसी स्थिति में, अधिकारी तय लक्ष्यों को जल्दबाजी में पूरा करने के लिए केवल सतही और ऊपर से दिखने वाली छोटी-मोटी कमियों की जांच करते हैं और गहरे तकनीकी पहलुओं को छोड़ देते हैं. एयरलाइन ऑपरेटर भी इस शॉर्टकट संस्कृति का स्वागत करते हैं, क्योंकि वे खुद गहन निरीक्षण से बचना चाहते हैं.
निगरानी और ऑडिट तंत्र के कमजोर होने के गंभीर परिणाम पहले ही सामने आने लगे हैं: इस वर्ष फरवरी में एयर इंडिया को डीएडब्ल्यू से आवश्यक सुरक्षा मंजूरी (क्लियरेंस) प्राप्त किए बिना ही कम से कम आठ बार बड़े शहरों (दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु) के लिए विमान संचालित करते पाया गया. पिछले साल जुलाई में यह उजागर हुआ कि एयर इंडिया ने यूरोपीय संघ सुरक्षा एजेंसी (ईएएसए) द्वारा विमान के इंजन के पुर्जे बदलने के निर्देश को न केवल नजरअंदाज किया, बल्कि उसका पालन दिखाने के लिए फर्जी दस्तावेज भी तैयार किए.
एयर इंडिया के एक अन्य वार्षिक ऑडिट में पर्याप्त पायलट ट्रेनिंग न होने और गैर-मंजूरशुदा सिमुलेटरों के उपयोग जैसी 51 से अधिक सुरक्षात्मक कमियां पाई गईं. संसद में पेश सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में देश के हवाई क्षेत्र में सुरक्षा उल्लंघनों और तकनीकी गड़बड़ियों में भारी उछाल आया है. वर्ष 2025 में प्रतिदिन औसतन लगभग एक तकनीकी खराबी दर्ज की गई (कुल 353 मामले) और इस दौरान अनुसूचित एयरलाइनों से जुड़ी 11 गंभीर घटनाएं भी सामने आईं.
कुलमिलाकर, विशेषज्ञों और पूर्व अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि पदों के खाली रहने से विमानन इकोसिस्टम के भीतर लापरवाही की एक खतरनाक संस्कृति जन्म ले रही है. पांच सतही जांचों की तुलना में एक गहन जांच सुरक्षा के लिहाज से कहीं अधिक प्रभावी होती है. यदि समय रहते इन खाली पदों को भरकर निगरानी तंत्र को दुरुस्त नहीं किया गया, तो विमानों के पुराने होने के साथ-साथ यह लापरवाही भविष्य में किसी और बड़ी विमानन आपदा का कारण बन सकती है.
गिल्स वर्नियर्स | पार्टी का खेल बिगाड़ने वाले मतदाताओं की पसंद को खारिज कर रहे हैं
अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (एआईटीएमसी) में संभावित लंबवत विभाजन (वर्टिकल स्प्लिट) और उसके सांसदों द्वारा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन देने की अटकलें इस समय भारतीय राजनीति के केंद्र में हैं. राजनीतिक गलियारों में इस विभाजन की संख्या और चेहरों को लेकर खरीद-फरोख्त (हॉर्स-ट्रेडिंग) और अफवाहों का बाजार गर्म है. गिल्स वर्नियर्स का मानना है कि यह स्थिति भारतीय राजनीति के लिए नई नहीं है, बल्कि चुनाव के बाद दलबदल, इस्तीफे और पार्टियों का टूटना अब एक आम परिपाटी बन चुका है. अतीत में भी महाराष्ट्र (2022), मध्य प्रदेश (2020), कर्नाटक (2018), और अरुणाचल प्रदेश (2016) में चुनाव के बाद बहुमत का इसी तरह उलटफेर देखा गया था. त्रिशंकु जनादेश के बाद मणिपुर (2017) और पुडुचेरी (2021) में भी दलबदल के सहारे सरकारें बनाई गईं, जबकि गोवा (2017-2022) में विधायकों का क्रमिक रूप से क्षरण हुआ. वर्तमान में टीएमसी की स्थिति कुछ वर्ष पहले महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी में हुए विभाजन जैसी ही दिखाई दे रही है.
अक्सर राजनेताओं के पाला बदलने को व्यक्तिगत लालच और अवसरवाद का नाम देकर खारिज कर दिया जाता है, लेकिन वर्नियर्स के अनुसार, ये विभाजन कभी भी केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं होते.इनके पीछे अन्य राजनीतिक दलों द्वारा की जाने वाली सुनियोजित ‘इंजीनियरिंग’ होती है. इस मामले में, विपक्षी दलों को कमजोर करने और संसद में अपना प्रभुत्व बढ़ाने में सत्ताधारी दल (भाजपा) का निहित स्वार्थ साफ झलकता है. सामूहिक इस्तीफे और विभाजन वास्तव में छिपे हुए दलबदल ही हैं, जो कभी स्वतःस्फूर्त नहीं होते. भारत में राजनीतिक वफादारी के इतने कमजोर होने के पीछे निम्नलिखित प्रणालीगत कारण जिम्मेदार हैं:
क्षेत्रीय कारक: पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में राजनीतिक बदलाव अत्यंत क्रूर और पूर्ण होते हैं. 2011 में जब टीएमसी सत्ता में आई, तो उसने वामपंथ (सीपीएम) के जमीनी ढांचे को पूरी तरह नष्ट कर दिया. इसके बाद 2021 में जब भाजपा चुनाव हारी, तो कुछ ही समय पहले पाला बदलकर आए पूर्व टीएमसी कार्यकर्ताओं ने बड़े पैमाने पर भाजपा से दोबारा पलायन शुरू कर दिया. हारने वाले दल के कार्यकर्ताओं के लिए भविष्य का राजनीतिक सफर बेहद कठिन हो जाता है.
संसाधनों और संरक्षण का नुकसान: चुनाव में हारने के बाद क्षेत्रीय स्तर पर संगठनात्मक ढांचा ढह जाता है, जिससे नेताओं को स्थानीय संसाधनों और पार्टी के संरक्षण (पेट्रोनेज) से हाथ धोना पड़ता है. यही नुकसान उन्हें नए और अधिक फायदेमंद अवसरों (”हरे चरागाहों”) की तलाश करने के लिए मजबूर करता है.
कमजोर वैचारिक आधार: भारतीय राजनीति में विचारधारा अब दलों को एकजुट रखने के लिए एक मजबूत कड़ी साबित नहीं हो रही है. नेताओं का वैचारिक रूप से खोखलापन इस बात से सिद्ध होता है कि वामपंथी पृष्ठभूमि के नेता भी आसानी से दक्षिणपंथी दलों का दामन थाम लेते हैं.
व्यावसायिक राजनीति (करियर बनाना): वर्तमान समय में अधिकांश राजनीतिक दल एक ही तरह के उम्मीदवारों पर निर्भर हैं. अमीर राजनीतिक उद्यमी अपने छोटे राजनीतिक करियर और पदों को सुरक्षित रखने के लिए भारी भरकम निवेश करने और जोखिम उठाने को तैयार रहते हैं, जिससे नेताओं का एक दल से दूसरे दल में जाना बेहद आसान हो जाता है.
केंद्रीकृत और तानाशाह नेतृत्व: भारत में राजनीतिक दल अत्यधिक केंद्रीकृत (हाइपर-सेंट्रलाइज्ड) हैं, जहां कमान किसी एक सत्तावादी नेता के हाथ में होती है. हालांकि जीत के समय यह बात छिप जाती है, लेकिन हार के समय यह बड़ी समस्या बनती है. टीएमसी के मामले में भी ममता बनर्जी की कार्यशैली को लेकर सांसदों की नाराजगी कोई नया या वास्तविक कारण नहीं, बल्कि पाला बदलने का एक बहाना मात्र है.
दलबदल विरोधी कानून की विफलता और कानूनी खामियां
यह दलबदल कोई आधुनिक संकट नहीं है; इतिहासकार सुभाष कश्यप के अनुसार, 1967 से 1969 के बीच ही भारत में 1,400 से अधिक दलबदल के मामले दर्ज किए गए थे. 1980 में इंदिरा गांधी ने भी विपक्ष के 22 दलबदलुओं को अपनी पार्टी में शामिल किया था. इसी तमाशे को रोकने के लिए 1985 में ‘दलबदल विरोधी कानून’ लाया गया था, जिसे आज के राजनेताओं ने पूरी तरह बेअसर कर दिया है.
इस कानून की सबसे बड़ी खामी यह है कि यह सांसदों या विधायकों को स्वेच्छा से इस्तीफा देने या पार्टी में विभाजन करने से नहीं रोक सकता. सामूहिक इस्तीफे को अब कानूनी मुखौटे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. बागी गुट सदन में दो-तिहाई बहुमत का दावा करके खुद को एक वैध गुट के रूप में मान्यता दिलाने का प्रयास करते हैं. जिस कानून को मतदाताओं के जनादेश की रक्षा के लिए बनाया गया था, आज वही कानून दलबदलुओं को एक वैध और तकनीकी रास्ता (रोडमैप) प्रदान कर रहा है.
राजनीतिक निहितार्थ और दूरगामी परिणाम
यदि टीएमसी के 20 सांसद पाला बदलकर एनडीए में शामिल होते हैं, तो इसके तात्कालिक परिणाम स्पष्ट हैं. इससे लोकसभा में सत्तारूढ़ गठबंधन की संख्या 300 के पार चली जाएगी, जो भले ही दो-तिहाई बहुमत न हो, लेकिन एक मजबूत मनोवैज्ञानिक बढ़त देगी. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह राज्यसभा में एनडीए की ताकत को तेजी से बढ़ाएगा, जिसे सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया से हासिल करने में सालों लग जाते.
संसदीय गणित से परे, यह पूरी प्रक्रिया लोकतंत्र के सिद्धांतों पर एक गहरा आघात है. इस प्रकार के अवसरवादी विभाजन मतदाताओं के सामूहिक विवेक और उनकी पसंद का खुलेआम मजाक उड़ाते हैं. जनता द्वारा दिया गया फैसला मतदान केंद्रों के बजाय मंत्रियों के बंद कमरों और आलीशान आवासों में बदला जा रहा है.
अंत में वर्नियर्स चेतावनी देते हैं कि अपनी मूल पार्टियों को धोखा देने वाले इन राजनेताओं का राजनीतिक भविष्य अंततः बेहद अंधकारमय होता है. तात्कालिक रूप से उन्हें कुछ समय के लिए मंत्री पद या अन्य पुरस्कार मिल सकते हैं, लेकिन प्रसिद्धि के वे कुछ पल बीत जाने के बाद, अंततः वे मुख्यधारा की राजनीति से गायब होकर एक अंधकारमय राजनीतिक कालकोठरी में सिमट कर रह जाते हैं.
(लेखक गिल्स वर्नियर्स सीईआरआई, साइंसेज पो पेरिस में एक प्रमुख राजनीतिक वैज्ञानिक और शोधकर्ता हैं.)
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