12/05/2026: नीट पर मोदी ने कहा था | 11 लाख डूबे | सबकुछ लोग करें | मोदी निर्मित | अमेरिका के कारण | फिर तरबूज़ से | सांठगांठ | छवि की खातिर आरएसएस | आखिरी साँसें | शह-मात
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
अल्पसंख्यकों के मामले में अपनी ‘छवि’ सुधारने के लिए आरएसएस विदेशों में सक्रिय
ईरान युद्धविराम ‘आखिरी साँसें’ ले रहा है, यूएई को इज़रायल से मिलीं आयरन डोम बैटरियाँ
चीन की नज़र में ट्रम्प का अमेरिका — “ढलते साम्राज्य की शाम की घंटी”
“मोदी-निर्मित संकट” — विपक्ष ने प्रधानमंत्री की मितव्ययिता की अपील को बताया जनता पर बोझ थोपना
ईरान में अमेरिका की ‘शह और मात’?
शेयर बाजार 1.8% से अधिक टूटा, निवेशकों के 11 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा डूबे, रुपया 95.6 पर
मोदी की बड़ी-बड़ी बातों के बावजूद नीट-यूजी 2026 परीक्षा रद्द; कहा था- हम मजबूत व्यवस्था बना रहे हैं
भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण रूसी एलएनजी लेने से इनकार किया
तरबूज से दूसरी त्रासदी: मुंबई में हुई मौतों के बाद अब छत्तीसगढ़ में 15 वर्षीय किशोर की मौत, 3 अन्य बीमार
बंगाल की नई सरकार में दो चुनाव अधिकारियों को मिले ऊंचे पद; भाजपा पर ‘खुलेआम सांठगांठ’ का आरोप
बंगाल: मतदाता सूची से बाहर हुए लोगों को नहीं मिलेगा सरकारी योजनाओं का लाभ
जाति, उत्तर-दक्षिण और कुपोषण: भारत के बच्चों की सेहत में छिपी सामाजिक खाई
मोदी की बड़ी-बड़ी बातों के बावजूद नीट-यूजी 2026 परीक्षा रद्द; कहा था- हम मजबूत व्यवस्था बना रहे हैं
सत्ता में आने से पहले ‘सुशासन’ देने को लेकर अक्सर बातें तो बड़ी-बड़ी की जाती हैं, लेकिन देश में जब नीट जैसी परीक्षा रद्द की जाती है, तो पता चलता है कि हकीकत क्या है? आज मंगलवार (12 मई, 2026) को जब खबर आई कि पेपर लीक के कारण नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) ने 3 मई को आयोजित की गई ‘नीट-यूजी 2026’ परीक्षा को रद्द कर दिया है, तो दो वर्ष पूर्व जुलाई 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गईं “बड़ी-बड़ी 56 इंची बातें” भी याद आ गईं. मोदी ने तीसरी बार सरकार बनने के बाद संसद में कहा था, “मैं देश के हर छात्र और हर युवा से कहना चाहता हूँ कि सरकार ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए बहुत गंभीर है और हम युद्ध स्तर पर अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए एक के बाद एक कदम उठा रहे हैं. युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों को बिल्कुल भी बख्शा नहीं जाएगा. केंद्र सरकार ने पहले ही कड़ा कानून बना दिया है. परीक्षा आयोजित करने की पूरी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं.” दरअसल, तब भी नीट और नेट जैसी परीक्षाएं पेपर लीक के कारण रद्द करना पड़ी थीं, और देश भर में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई थी.
दो साल बाद फिर ऐसी नौबत आई है तो सवाल है कि मोदी सरकार ने क्या व्यवस्था बनाई? पेपर लीक माफिया कैसे काम कर रहा है? इस बार महाराष्ट्र का नासिक इसका केंद्र बताया जा रहा है, जहां भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार है. केंद्र में मोदी जी हैं ही. डबल इंजन का मामला है, बावजूद इसके पेपर लीक की वजह से परीक्षा रद्द करना पड़ रही है. तभी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान सवालों का जवाब नहीं दे सके. उन्होंने परीक्षा के मुद्दे पर मीडिया के किसी भी सवाल का जवाब देने से इनकार ही कर दिया. जाहिर है, जवाब देते भी तो किस मुंह से?
बता दें कि इस परीक्षा में लगभग 22 लाख बच्चों ने भाग लिया था. बड़ी मेहनत करके तैयारी की थी. लेकिन, सरकार की बदइंतजामी ने सब पर पानी फेर दिया. अब उन्हें दोबारा मानस बनाना होगा, तैयारी करना होगी. जैसे तैसे परीक्षा के तनाव से वे बाहर आए थे और नतीजों के इंतज़ार में थे, तभी खबर आ गई कि नीट रद्द हो गई है. सबसे बड़ी बात यह फैसला पेपर लीक के आरोपों के कारण लिया गया है, जबकि मोदी ने दो साल पहले पूरी व्यवस्था को मजबूत करने का आश्वासन देश को दिया था. बहरहाल, इसकी जांच सीबीआई को सौंप दी गई है.
इस बीच समूचे विपक्ष ने परीक्षा रद्द होने को लेकर मोदी सरकार पर कड़ा प्रहार किया है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तथाकथित ‘अमृत काल’ देश के लिए ‘विष काल’ बन गया है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर हिंदी में एक पोस्ट करते हुए गांधी ने लिखा: “नीट 2026 की परीक्षा रद्द कर दी गई है. 22 लाख से ज्यादा छात्रों की मेहनत, कुर्बानी और सपनों को इस भ्रष्ट भाजपा सरकार ने कुचल दिया है. किसी पिता ने कर्ज लिया, किसी मां ने अपने गहने बेचे, लाखों बच्चों ने रात-रात भर जागकर पढ़ाई की और बदले में उन्हें क्या मिला? पेपर लीक, सरकारी लापरवाही और शिक्षा में संगठित भ्रष्टाचार.” लोकसभा में विपक्ष के नेता ने आगे कहा, “यह केवल एक विफलता नहीं है—यह युवाओं के भविष्य के खिलाफ किया गया एक अपराध है.” मेडिकल कॉलेजों में स्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश पाने के इच्छुक छात्रों के लिए यह परीक्षा अब उन तारीखों पर फिर से आयोजित की जाएगी जिन्हें बाद में अधिसूचित किया जाएगा.
शेयर बाजार 1.8% से अधिक टूटा, निवेशकों के 11 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा डूबे, रुपया 95.6 पर
अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की उम्मीदें कम होने और युद्ध के आर्थिक प्रभाव की बढ़ती चिंताओं के कारण मंगलवार को शेयर बाजार में भारी गिरावट की वजह से एक ही दिन में निवेशकों के 11 लाख करोड़ रुपये से अधिक डूब गए.
‘स्क्रॉल’ के मुताबिक, सत्र के अंत में बेंचमार्क सेंसेक्स 1,450 अंक (1.9%) से अधिक टूट गया था, जबकि निफ्टी में 430 अंक (1.8%) से अधिक की गिरावट दर्ज की गई. बेंचमार्क सूचकांकों में लगातार चौथे कारोबारी सत्र में गिरावट देखी गई. मार्च की भारी गिरावट के बाद अप्रैल में बाजार में मामूली सुधार हुआ था.
रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष से उत्पन्न आर्थिक चुनौतियों के बीच, भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.6 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक कमजोर हो गया. इससे पहले 5 मई को भारतीय मुद्रा 95.4 के अपने सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुँची थी.
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल
मंगलवार को बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमत 3.7% बढ़कर 108 डॉलर प्रति बैरल हो गई. गौरतलब है कि संघर्ष शुरू होने से एक दिन पहले, 27 फरवरी को ब्रेंट की कीमत 78 डॉलर प्रति बैरल थी. इसके साथ ही बाजार में अस्थिरता मापने वाला सूचकांक ‘इंडिया विक्स’ भी मंगलवार को 3.9% चढ़ गया.
इस बीच ‘पीटीआई’ की खबर है कि शेयर बाजार के बेंचमार्क इंडेक्स मंगलवार को लगातार चौथे सत्र में गिरावट के साथ बंद हुए. कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और पश्चिम एशिया (मध्य-पूर्व) संघर्ष को लेकर अनिश्चितता के कारण निवेशकों का भरोसा डगमगा गया, जिससे सेंसेक्स और निफ्टी लगभग 2 प्रतिशत तक टूट गए.
विदेशी फंडों की निरंतर निकासी और रुपये के सर्वकालिक निचले स्तर (लाइफटाइम लो) पर पहुँचने का भी निवेशकों की धारणा पर बुरा असर पड़ा. चौतरफा बिकवाली के बीच, 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 1,456.04 अंक यानी 1.92 प्रतिशत गिरकर 74,559.24 पर बंद हुआ. दिन के कारोबार के दौरान, यह एक समय 1,565.78 अंक या 2 प्रतिशत गोता लगाकर 74,449.50 तक पहुँच गया था.
श्रवण गर्ग | सरकार जो कदम खुद उठा सकती है, वह नहीं उठा रही, लेकिन नागरिकों से बलिदान मांग रही है
हरकारा डीप डाइव के इस लाइव इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार नितीश त्यागी और वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया सार्वजनिक आह्वानों, आर्थिक संकट, खाड़ी युद्ध, कोविड मॉडल, चुनावी राजनीति और भारतीय लोकतंत्र की दिशा पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत की शुरुआत प्रधानमंत्री द्वारा नागरिकों से “सोना कम खरीदने”, “वर्क फ्रॉम होम करने”, “पेट्रोल-डीजल की खपत घटाने” और “खर्च कम करने” की अपील से होती है. इसके तुरंत बाद प्रधानमंत्री की भव्य यात्राओं, बड़े काफिलों और सार्वजनिक आयोजनों का जिक्र करते हुए इस विरोधाभास पर सवाल उठाया गया कि जनता से सादगी और त्याग की अपेक्षा करने वाली सत्ता स्वयं उसी जीवनशैली का पालन करती दिखाई नहीं देती.
श्रवण गर्ग ने कहा कि यह पूरा परिदृश्य “कोविड मॉडल” की पुनरावृत्ति जैसा लगता है. उनके अनुसार कोविड काल के दौरान नागरिक नियंत्रण, भय, अनुशासन और केंद्रीकृत सत्ता संचालन का जो “टेम्पलेट” तैयार हुआ था, वही अब नए आर्थिक और वैश्विक संकटों के बीच दोबारा लागू होता दिखाई दे रहा है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री लगातार लोगों को यह बता रहे हैं कि “क्या मत करो”, लेकिन यह नहीं बता रहे कि “क्या करना चाहिए” और सरकार की ठोस योजना क्या है.
चर्चा में यह सवाल भी उठा कि क्या जनता ने वास्तव में प्रधानमंत्री की अपील को गंभीरता से लिया है. श्रवण गर्ग ने कहा कि अगर लोग सरकार की बात पर पूरी तरह भरोसा कर रहे होते, तो पेट्रोल पंपों पर भीड़ कम दिखाई देती, सोने की खरीद में व्यापक गिरावट आती या कंपनियां बड़े पैमाने पर वर्क फ्रॉम होम लागू करतीं. लेकिन ऐसा कोई व्यापक सामाजिक बदलाव दिखाई नहीं देता. उन्होंने इसे प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता के संकट से जोड़ते हुए कहा कि चुनाव जीतना और जनता का विश्वास जीतना दो अलग बातें हैं.
बातचीत में शेयर बाजार की गिरावट, रुपये की कमजोरी, विदेशी निवेशकों की पूंजी निकासी और विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की गई. श्रवण गर्ग ने 1990-91 के आर्थिक संकट का उदाहरण देते हुए बताया कि उस समय भारत का विदेशी मुद्रा भंडार केवल दो सप्ताह के आयात के बराबर रह गया था और सरकार को 67 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था. उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दौर का उल्लेख करते हुए कहा कि आर्थिक सुधारों ने उस संकट से देश को बाहर निकाला था, जबकि आज की सरकार जनता से त्याग मांग रही है लेकिन अपनी राजनीतिक और प्रचार संबंधी प्राथमिकताओं पर खर्च कम करती नहीं दिखती.
इंटरव्यू में सरकार की आर्थिक नीतियों और प्राथमिकताओं पर तीखा सवाल उठाया गया। बातचीत में कहा गया कि जब वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें कम थीं तब उसका लाभ जनता तक नहीं पहुंचाया गया, लेकिन संकट आते ही बोझ नागरिकों पर डालने की कोशिश की जा रही है. सरकार पर यह आरोप भी लगाया गया कि एक ओर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की राजनीति की जाती है, जबकि दूसरी ओर विदेशी निवेश और बड़े कॉरपोरेट हितों के लिए लगातार दरवाजे खोले जाते हैं.
कोविड काल की यादों का जिक्र करते हुए लॉकडाउन, मजदूर संकट, ऑक्सीजन की कमी, वैक्सीन अव्यवस्था और मौतों के आंकड़ों पर भी सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए गए. श्रवण गर्ग ने कहा कि कोविड के दौरान नागरिक अधिकारों को सीमित करने और भय का वातावरण बनाने से सत्ता को जो अनुभव मिला, वही मॉडल अब आर्थिक संकट और वैश्विक तनाव के संदर्भ में दोहराया जा सकता है.
बातचीत में खाड़ी क्षेत्र में जारी तनाव, इजराइल-ईरान संघर्ष और उसके भारत पर संभावित असर पर भी चर्चा हुई. तेल, गैस, उर्वरक और आयात आधारित अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की गई. साथ ही मानसून की संभावित कमजोरी, कृषि संकट और प्राकृतिक खेती को लेकर श्रीलंका के उदाहरण का उल्लेख करते हुए आशंका जताई गई कि गलत नीतिगत फैसले कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर डाल सकते हैं.
श्रवण गर्ग ने यह भी कहा कि अगर देश वास्तव में संकट में है तो नागरिक सरकार के साथ खड़े हो सकते हैं, लेकिन इसके लिए सत्ता को पारदर्शिता, जवाबदेही और विश्वसनीयता दिखानी होगी. उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का उदाहरण देते हुए कहा कि उस दौर में लोगों ने सरकार पर भरोसा करके त्याग किया था, क्योंकि नेतृत्व स्वयं भी विश्वसनीय दिखाई देता था. इसके विपरीत आज जनता को यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार की वास्तविक योजना क्या है और संकट से बाहर निकलने के लिए सत्ता स्वयं क्या त्याग करने को तैयार है.
बातचीत के अंत में नितीश त्यागी ने कहा कि आने वाले समय में सरकार की ओर से कठोर आर्थिक कदम उठाए जा सकते हैं, जिनमें सोने के आयात पर नियंत्रण, तेल खपत को सीमित करने जैसे फैसले शामिल हो सकते हैं. उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार इस संकट का उपयोग जनता के हित में समाधान निकालने के लिए करेगी या फिर इसे राजनीतिक नियंत्रण और केंद्रीकरण के नए अवसर में बदल देगी.
“मोदी-निर्मित संकट”; विपक्ष ने प्रधानमंत्री की मितव्ययिता की अपील को बताया जनता पर बोझ थोपना
“द वायर” की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया संघर्ष के चलते आर्थिक दबाव बढ़ने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से पेट्रोल-डीज़ल का उपयोग कम करने, जहाँ संभव हो घर से काम करने, एक साल के लिए विदेश यात्रा और सोने की ख़रीदारी टालने और विदेशी मुद्रा बचाने के लिए घरेलू उत्पादों पर निर्भर रहने की अपील की. लेकिन विपक्ष ने इस अपील की तीखी आलोचना की, ख़ासकर इस बात पर कि यह अपील चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव ख़त्म होने के बाद आई.
कांग्रेस ने बयान जारी कर कहा कि यह “मोदी-निर्मित आपदा है, ठीक वैसे ही जैसे वे कोविड के दौरान सुस्त रहे थे.” पार्टी ने कहा, “सारा बोझ जनता पर डालो, जबकि वे बस ‘जनसंपर्क मंत्री’ की भूमिका निभाते हुए इधर-उधर घूमते रहें.” नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मोदी पर “समझौताकारी प्रधानमंत्री” होने का आरोप लगाते हुए कहा, “12 सालों में देश को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है कि जनता को बताना पड़ रहा है — क्या ख़रीदो, क्या नहीं ख़रीदो, कहाँ जाओ, कहाँ मत जाओ. हर बार ज़िम्मेदारी लोगों पर डाल दो.”
समाजवादी पार्टी के प्रमुख और सांसद अखिलेश यादव ने सवाल उठाया कि चुनाव ख़त्म होने के बाद ही ये उपाय क्यों सूझे. उन्होंने एक्स पर लिखा, “भाजपा नेताओं ने चुनाव प्रचार के दौरान हज़ारों चार्टर उड़ानें लीं, उन पर यह प्रतिबंध क्यों नहीं लागू हुआ?” उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि इस तरह की अपील से व्यापार, कारोबार और बाज़ारों में भय और अफ़रातफ़री फैल सकती है.
आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि देशभक्ति के नाम पर जनता को पेट्रोल, डीज़ल, गैस और सोना सब कुछ छोड़ने को कहा जा रहा है, जबकि “मोदी जी रैलियों में लाखों लोग लाएँगे, विदेश दौरे करेंगे.” राजद सांसद मनोज कुमार झा ने कहा कि कोविड के दौरान भी और अब भी सरकारी ख़र्च में कोई कटौती नहीं दिखी. उन्होंने बताया कि पिछले हफ़्ते देशभर के अख़बारों में कई पन्नों के पूरे-पेज के सरकारी विज्ञापन छपे, जिनका ख़र्च आख़िरकार आम जनता ही उठाती है. उन्होंने कहा, “सवाल अपील का नहीं, बल्कि उस नैतिक संगति — या असंगति — का है जो किसी भी लोकतांत्रिक नेतृत्व की विश्वसनीयता की बुनियाद बनती है.”
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सांसद जॉन ब्रिट्टास ने माँग की कि प्रधानमंत्री अपनी सात अपीलों पर खुद सबसे पहले अमल करें, ख़ासकर विदेश यात्रा पर. द वायर के विश्लेषण के अनुसार मोदी ने रविवार को यह अपील करने से कुछ घंटे पहले हैदराबाद में और बाद में गुजरात के सोमनाथ में रोडशो किए — जो उनके द्वारा प्रचारित ईंधन बचत और कम आवाजाही के संदेश के बिल्कुल विपरीत था.
भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण रूसी एलएनजी लेने से इनकार किया
मध्य पूर्व में तनाव के कारण आपूर्ति में कमी के बावजूद भारत ने रूस की उस तरल प्राकृतिक गैस (एलएनजी) को खरीदने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है, जिस पर अमेरिकी प्रतिबंध लगे हुए हैं. भारत के इस रुख के कारण एक टैंकर अधर में लटक गया है, जबकि अन्य ‘अनुमत’ (गैर-प्रतिबंधित) खेपों को लेकर बातचीत जारी है.
‘रॉयटर्स’ के अनुसार, यह कदम दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक और उपभोक्ता देश (भारत) द्वारा ऊर्जा सुरक्षा और प्रतिबंधों के जोखिम के बीच बनाए जा रहे बारीक संतुलन को दर्शाता है. अमेरिका द्वारा प्रतिबंधित एलएनजी खेपों को छिपाना मुश्किल होता है और इनमें अनुपालन का जोखिम अधिक होता है. यह स्थिति रूस की अपने एलएनजी निर्यात को नए बाजारों की ओर मोड़ने की सीमाओं को भी उजागर करती है.
‘रूस बेचने को उत्सुक, भारतीय कंपनियां सतर्क’
इस बीच, रूसी कच्चे तेल की भारत द्वारा खरीद निर्बाध रूप से जारी है. इसे अमेरिकी प्रतिबंधों में मिली उस अस्थायी छूट से मदद मिली है, जो 28 फरवरी से शुरू हुए ईरान पर अमेरिका-इजरायल युद्ध के कारण उत्पन्न ऊर्जा संकट से निपटने के लिए देशों को दी गई थी.
‘आर्कटिक एलएनजी 2’ रूस का दूसरा निर्यात संयंत्र है जो अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में है. वाशिंगटन ने यूक्रेन पर रूस के युद्ध के कारण 2025 की शुरुआत में इन एलएनजी संयंत्रों पर प्रतिबंध और कड़े कर दिए थे.
एक सूत्र ने बताया कि जहाँ कच्चे तेल की खेपों को समुद्र में एक जहाज से दूसरे जहाज में स्थानांतरित करके छिपाया जा सकता है, वहीं एलएनजी शिपमेंट को सैटेलाइट ट्रैकिंग से छिपाना कहीं अधिक कठिन है.
लंबी अवधि के समझौतों की तलाश
सूत्र के अनुसार, भारत अधिकृत (गैर-प्रतिबंधित) रूसी एलएनजी खरीदने के लिए तैयार है, लेकिन उसका अधिकांश हिस्सा यूरोप को आवंटित है. सूत्र ने यह भी कहा कि चीन अभी भी प्रतिबंधित और गैर-प्रतिबंधित, दोनों तरह की रूसी एलएनजी का प्रमुख खरीदार बना हुआ है. इसके अलावा, मास्को भारत को एलएनजी और पोटाश, फास्फोरस व यूरिया जैसे उर्वरकों की आपूर्ति के लिए लंबी अवधि के सौदों की तलाश में है.
ईरान संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से शिपिंग बाधित होने से पहले, भारत अपनी गैस खपत का आधा हिस्सा आयात के जरिए पूरा कर रहा था, जिसमें से लगभग 60% इसी जलमार्ग से आता था. भारत की कच्चे तेल की आधे से अधिक आपूर्ति भी इसी रास्ते से होती थी.
तरबूज से दूसरी त्रासदी: मुंबई में हुई मौतों के बाद अब छत्तीसगढ़ में 15 वर्षीय किशोर की मौत, 3 अन्य बीमार
मुंबई में एक ही परिवार के सदस्यों की मौत के कुछ हफ़्तों बाद, सोमवार को छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के एक गाँव में तरबूज खाने से 15 वर्षीय एक लड़के की मृत्यु हो गई, जबकि तीन अन्य बच्चे बीमार हो गए. अधिकारियों ने सोमवार को यह जानकारी दी.
‘एनडीटीवी’ के अनुसार, यह घटना घुरकोट गांव की है, जहाँ बच्चे अपने रिश्तेदारों के साथ अपने मामा के घर आए हुए थे. मृतक का नाम अखिलेश धीवर (15 वर्ष), निवासी पोड़ी दल्हा है, जबकि बीमार बच्चों के नाम हैं-श्री धीवर (4 वर्ष), पिंटू धीवर (12 वर्ष) और हितेश धीवर (13 वर्ष).
जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. एस. कुजूर ने बताया, “प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, बच्चों ने रविवार शाम को घर में रखा हुआ कटा हुआ तरबूज खाया था. कुछ घंटों बाद, अखिलेश को उल्टी, दस्त और सांस लेने में तकलीफ होने लगी. बाद में अन्य तीनों बच्चों में भी इसी तरह के लक्षण देखे गए.”
जैसे-जैसे उनकी हालत बिगड़ी, परिवार के सदस्य सोमवार को अलग-अलग समय पर एम्बुलेंस के जरिए उन्हें जिला अस्पताल ले गए. हालांकि, अस्पताल पहुँचने पर डॉक्टरों ने अखिलेश को मृत घोषित कर दिया. अन्य तीन बच्चों को आपातकालीन वार्ड (इमरजेंसी) में भर्ती किया गया है.
डॉ. कुजूर ने बताया कि रिपोर्ट के अनुसार, तरबूज को सुबह काटा गया था और कई घंटों बाद उसका सेवन किया गया, जिससे उसके दूषित होने की संभावना बढ़ गई.
उन्होंने आगे कहा: “प्रथम दृष्टया, ऐसा लगता है कि बच्चे दूषित तरबूज खाने के कारण फूड पॉइजनिंग का शिकार हुए हैं. किशोर के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है और विसरा के नमूने फॉरेंसिक जांच के लिए सुरक्षित रखे गए हैं. घर में रखे एक अन्य तरबूज को भी खाद्य सुरक्षा विभाग के पास लैब टेस्टिंग के लिए भेजा गया है.” अधिकारियों का कहना है कि मौत और बीमारी के सटीक कारणों का पता फॉरेंसिक और खाद्य सुरक्षा रिपोर्ट आने के बाद ही चल पाएगा.
बंगाल की नई सरकार में दो चुनाव अधिकारियों को मिले ऊंचे पद; भाजपा पर ‘खुलेआम सांठगांठ’ का आरोप
बंगाल में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी की नई भाजपा सरकार में उन दो नौकरशाहों की नियुक्ति को लेकर मंगलवार को राष्ट्रीय विपक्षी नेताओं ने तीखा हमला बोला, जिन्होंने राज्य के विधानसभा चुनावों की निगरानी की थी. विपक्ष ने इसे भाजपा और चुनाव आयोग के बीच “खुलेआम सांठगांठ” करार दिया है.
‘द टेलीग्राफ’ ब्यूरो के अनुसार, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने उन नियुक्तियों से जुड़ी एक हेडलाइन को रीपोस्ट किया, जिसमें बंगाल के पूर्व मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) मनोज अग्रवाल को नया मुख्य सचिव और विशेष पर्यवेक्षक सुब्रत गुप्ता को मुख्यमंत्री का सलाहकार नियुक्त किए जाने की जानकारी दी गई थी. राहुल ने हिन्दी में कैप्शन लिखा, “भाजपा-चुनाव आयोग के ‘चोर बाजार’ में, जितनी बड़ी चोरी, उतना बड़ा इनाम.”
विपक्ष के गंभीर आरोप
अग्रवाल विधानसभा चुनावों की देखरेख के लिए जिम्मेदार थे, जबकि सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी सुब्रत गुप्ता सीईओ कार्यालय में विशेष पर्यवेक्षक थे. कांग्रेस के महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने सोमवार को कहा था: “ये नियुक्तियाँ चुनाव आयोग और भाजपा के बीच बेशर्म मिलीभगत और सांठगांठ को दर्शाती हैं. अब इस मिलीभगत को छिपाने या अलग रखने की कोशिश तक नहीं की जा रही है.”
रमेश ने दावा किया कि ये नियुक्तियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं था और उसने विशेष रूप से भाजपा को लाभ पहुँचाने के लिए काम किया. उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने चालाकी से 27 लाख लोगों को मतदान से वंचित कर दिया ताकि भाजपा को चुनावी बढ़त मिल सके.
सुब्रत गुप्ता को तो सुवेंदु अधिकारी के शपथ लेने के कुछ ही घंटों बाद उन्हें मुख्यमंत्री का सलाहकार नियुक्त किया गया. तृणमूल कांग्रेस के सांसद कीर्ति आजाद ने मंगलवार को ‘पीटीआई वीडियो’ से कहा: “यह स्पष्ट है कि बंगाल में ‘कलियुगी रामराज्य’ चल रहा है. मनोज अग्रवाल जैसे व्यक्ति को, जिन्हें तटस्थ अंपायर होना था, राज्य का सर्वोच्च पद दे दिया गया है. भाजपा और चुनाव आयोग ने मिलकर गंदी चालें चलीं और वे बहुमत से नहीं, बल्कि अपनी साजिशों से जीते हैं.”
वहीं, टीएमसी सांसद सागरिका घोष ने भी निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए ‘एक्स’ पर लिखा कि क्या यह ‘क्विड प्रो क्यो’ (कुछ के बदले कुछ देना) का मामला है? उन्होंने सवाल किया कि क्या अब कोई वास्तव में यह मान सकता है कि 2026 के बंगाल चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष थे?
भाजपा ने विपक्ष के इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कहा: “वे (अग्रवाल) केवल पूर्व सीईओ ही नहीं हैं, बल्कि राज्य के सबसे वरिष्ठ सिविल सेवक भी हैं. हम भाजपा की सरकार कानून के अनुसार काम कर रहे हैं.” भाजपा नेता शाहनवाज हुसैन ने चुटकी लेते हुए कहा, “क्या हमें उन्हें नियुक्त करने से पहले टीएमसी से सलाह लेनी चाहिए? मनोज अग्रवाल एक सक्षम अधिकारी हैं. क्या यह पद किसी तृणमूल कार्यकर्ता को दे देना चाहिए?”
क्या कहता है इतिहास?
एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी ने बताया कि उन्हें ऐसा कोई उदाहरण याद नहीं आता जहाँ किसी राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को नई सरकार बनते ही मुख्य सचिव बना दिया गया हो. हालांकि, हाल के वर्षों में चुनाव अधिकारियों को अन्य राज्यों की नौकरशाही में पद देने का चलन बढ़ा है. अतीत में भी चुनाव अधिकारी राजनीति में कदम रखते रहे हैं. मनोहर सिंह गिल 11वें मुख्य चुनाव आयुक्त रहने के बाद कांग्रेस में शामिल हुए, राज्यसभा सदस्य बने और केंद्रीय खेल मंत्री भी रहे. टी.एन. शेषन, जिन्हें चुनाव आयोग को सशक्त बनाने का श्रेय दिया जाता है, उन्होंने भी राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा था.
बंगाल: मतदाता सूची से बाहर हुए लोगों को नहीं मिलेगा सरकारी योजनाओं का लाभ
स्क्रोल के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में नवगठित भजपा सरकार ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान जिन महिलाओं के नाम हटा दिए गए हैं, उन्हें राज्य सरकार की अन्नपूर्णा भंडार योजना का लाभ नहीं देने की बात कही है.यह जानकारी सोमवार को मंत्री अग्निमित्रा पॉल के हवाले से दी गयी है.
इस योजना के तहत महिलाओं को 3,000 रुपये की मासिक नकद सहायता मिलेगी. यह योजना 1 जून से तृणमूल कांग्रेस सरकार की ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना की जगह लेगी, जिसमें लाभार्थियों को 1,500 रुपये प्रति माह मिलते थे.
अग्निमित्रा पॉल ने कहा, “जिन महिलाओं के नाम सूची में हैं, उन्हें यह लाभ मिलेगा. उससे पहले एक विश्लेषण किया जाएगा. जिन लोगों के नाम एसआईआर के दौरान हटा दिए गए हैं और वे लक्ष्मी भंडार का लाभ लेते थे, उनमें से कई को अब यह लाभ नहीं मिलेगा.”
उन्होंने सवाल किया: “जो लोग मर चुके हैं, उन्हें लक्ष्मी भंडार कैसे मिल सकता है? जो भारतीय नागरिक नहीं हैं, उन्हें लक्ष्मी भंडार कैसे मिल सकता है? जिनके नाम हटाए गए हैं, उनका विश्लेषण किया जाएगा.”
चुनाव आयोग द्वारा किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद, 6 अप्रैल तक लगभग 91 लाख मतदाताओं (कुल मतदाताओं का 11.9%) के नाम हटा दिए गए थे.
मतदान से पहले, ट्रिब्यूनल के पास लगभग 34 लाख अपीलें लंबित थीं. इनमें से 27 लाख अपीलें उन लोगों द्वारा की गई थीं जिन्हें सूची से बाहर कर दिया गया था. अपीलीय न्यायाधिकरणों ने अब तक केवल 1,607 नामों को वापस जोड़ने की अनुमति दी है.
शनिवार को कार्यभार संभालने वाली भाजपा सरकार में महिला एवं बाल विकास और समाज कल्याण मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने स्पष्ट किया कि जिनकी अपील लंबित है, उन्हें फिलहाल योजना से ‘अलग’ रखा जाएगा.
वहीं मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने पहली कैबिनेट बैठक के बाद कहा कि किसी भी मौजूदा कल्याणकारी योजना को बंद नहीं किया जाएगा. हालांकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि “अस्तित्वहीन लाभार्थियों, फर्जी लाभार्थियों और जो भारतीय नहीं हैं” उन्हें लाभ नहीं दिया जाएगा.
कैबिनेट ने पश्चिम बंगाल में आयुष्मान भारत स्वास्थ्य योजना सहित कई केंद्र सरकार की योजनाओं को लागू करने को भी मंजूरी दी है.
अल्पसंख्यकों के मामले में अपनी ‘छवि’ सुधारने के लिए आरएसएस विदेशों में सक्रिय
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी की जननी माने जाने वाले शक्तिशाली हिंदू संगठन आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) ने मंगलवार को कहा कि उसने अपनी छवि सुधारने के लिए अमेरिका सहित अन्य देशों के विदेशी दौरों का आयोजन किया है. संगठन का उद्देश्य उन धारणाओं का खंडन करना है, जिनमें उसे एक अर्धसैनिक संगठन और अल्पसंख्यक समुदायों पर हमलों में शामिल बताया जाता है.
आरएसएस की यह सक्रियता ‘अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग’ (यूएससीआईआरएफ) की नवंबर में आई एक रिपोर्ट के बाद देखने को मिली है. उस रिपोर्ट में कहा गया था कि यह संगठन “दशकों से अल्पसंख्यक समूहों के सदस्यों के खिलाफ अत्यधिक हिंसा और असहिष्णुता के कृत्यों में शामिल रहा है.”
यह आयोग अमेरिकी संघीय सरकार का एक द्विदलीय निकाय है, जो दुनिया भर में धार्मिक स्वतंत्रता की निगरानी करता है और राष्ट्रपति, विदेश मंत्री व अमेरिकी कांग्रेस को नीतिगत सिफारिशें देता है.
‘रॉयटर्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, आधिकारिक तौर पर धर्मनिरपेक्ष देश होने के बावजूद, जहाँ हिंदू बहुसंख्यक हैं, भाजपा के राष्ट्रीय वर्चस्व का श्रेय व्यापक रूप से आरएसएस के स्वयंसेवकों के विशाल नेटवर्क को दिया जाता है. यह दौर हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक विभाजन के गहराने के रूप में भी देखा गया है.
आरएसएस का कहना है कि वह एक “हिंदू-केंद्रित सभ्यतागत और सांस्कृतिक आंदोलन” है, जिसका लक्ष्य हिंदुओं को एकजुट करना और धर्म की रक्षा करते हुए “राष्ट्र को वैभव के शिखर पर ले जाना” है.
1925 में अपनी स्थापना के बाद से इस पर कई बार प्रतिबंध लगाया गया है, जिसमें 1948 में एक पूर्व सदस्य द्वारा स्वतंत्रता के नायक महात्मा गांधी की हत्या के बाद लगा प्रतिबंध भी शामिल है.
भारतीय विपक्षी नेताओं, विशेष रूप से मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के राहुल गांधी ने बार-बार आरएसएस पर विभाजनकारी और बहुसंख्यकवादी विचारधारा को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है. उनका कहना है कि यह विचारधारा भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे के लिए खतरा है और अल्पसंख्यकों के प्रति असहिष्णुता को बढ़ावा देती है.
आरएसएस के सरकार्यवाह (महासचिव) दत्तात्रेय होसबोले ने कहा कि वे आरएसएस के बारे में “कुछ आशंकाओं और गलतफहमियों को दूर करने” के लिए अमेरिका, जर्मनी और ब्रिटेन में सभाओं को संबोधित कर रहे हैं और आगे भी ऐसी कई योजनाएं हैं.
उन्होंने कहा कि आरएसएस के खिलाफ मुख्य आरोपों में यह शामिल है कि वह “समाज को पीछे धकेल रहा है”, यह एक “अर्धसैनिक संगठन” है, यह “हिंदू वर्चस्ववादी चीजों” को बढ़ावा देता है और इसके कारण “अन्य लोग दूसरे दर्जे के नागरिक बन गए हैं.” दिल्ली में संगठन की नई बनी 12 मंजिला इमारत में विदेशी मीडिया के लिए आयोजित एक दुर्लभ ब्रीफिंग में होसबोले ने कहा, “हकीकत इससे बिल्कुल अलग है.”
नीति निर्माताओं और व्यापारिक नेताओं से मुलाकात
होसबोले ने अपनी यात्राओं के दौरान शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं और व्यापारिक नेताओं से मुलाकात की. उन्होंने कहा कि आरएसएस नेता संगठन के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए यूरोप, दक्षिण पूर्व एशिया और अन्य क्षेत्रों के अधिक देशों का दौरा करेंगे.
प्रधानमंत्री मोदी आरएसएस के दो प्रमुख एजेंडा पहले ही पूरे कर चुके हैं. 1992 में गिराई गई मस्जिद के स्थान पर हिंदू देवता भगवान राम का मंदिर बनाना, और जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा (अनुच्छेद 370) रद्द करना, जो पहले भारत का एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य था.
होसबोले ने कहा कि संगठन का एक अन्य प्रमुख लक्ष्य हिंदू जाति व्यवस्था पर आधारित भेदभाव को समाप्त करना है. उल्लेखनीय है कि 2024 के राष्ट्रीय चुनावों में भारत के विपक्ष ने पिछड़ी जातियों की चिंताओं को सफलतापूर्वक उठाकर मोदी को एक दुर्लभ झटका दिया था, जब उनकी पार्टी बहुमत से पीछे रह गई थी और उन्हें सहयोगियों पर निर्भर होना पड़ा था.
‘पीटीआई’ वीडियो को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, पाकिस्तान के साथ गतिरोध को तोड़ने का सबसे अच्छा तरीका ‘जनता से जनता का संपर्क’ है. अब इसका अधिक से अधिक प्रयास किया जाना चाहिए. मुझे लगता है कि यही एक उम्मीद है, क्योंकि मेरा दृढ़ विश्वास है कि अंततः नागरिक समाज के संबंध ही काम आएंगे. क्योंकि हमारे बीच सांस्कृतिक संबंध हैं और हम एक राष्ट्र रहे हैं.
उन्होंने आगे कहा, “देश की सुरक्षा और स्वाभिमान की रक्षा होनी चाहिए और मौजूदा सरकार को इसका ध्यान रखना चाहिए. लेकिन साथ ही, हमें दरवाजे बंद करने की जरूरत नहीं है. हमें उनके साथ बातचीत के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए.” उन्होंने कहा कि व्यापार, वाणिज्य और वीजा जारी करने की प्रक्रिया नहीं रुकनी चाहिए, क्योंकि “बातचीत के लिए हमेशा एक खिड़की खुली होनी चाहिए.”
ईरान युद्धविराम ‘आखिरी साँसें’ ले रहा है, यूएई को इज़रायल से मिलीं आयरन डोम बैटरियाँ
“ड्रॉप साइट न्यूज़” की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोमवार को पत्रकारों से कहा कि ईरान के साथ हुआ युद्धविराम अब “लाइफ़ सपोर्ट पर” है. उन्होंने ईरान के ताज़े प्रस्ताव को “पूरी तरह अस्वीकार्य” और “कूड़े का टुकड़ा” बताया. ट्रम्प ने माना कि ईरान ने परमाणु मामले में कुछ रियायतें दी हैं, लेकिन “वे काफ़ी नहीं थीं.” अर्थव्यवस्था पर ट्रम्प ने दावा किया कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद होने से अमेरिकी तेल उत्पादकों को फ़ायदा हुआ है, क्योंकि अब जहाज़ टेक्सास, लुइज़ियाना और अलास्का से तेल ले रहे हैं. ट्रम्प ने युद्ध के दौरान संघीय गैस कर निलंबित करने का भी सुझाव दिया. रिपब्लिकन सीनेटर जॉश हॉली ने इसे 90 दिनों के लिए निलंबित करने का विधेयक पेश करने की घोषणा की, जिससे सरकारी ख़ज़ाने को अरबों डॉलर का नुक़सान होगा. फ़िलहाल गैस पर 18.4 सेंट और डीज़ल पर 24 सेंट प्रति गैलन कर लगता है. युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिका में गैस की औसत क़ीमत 4.50 डॉलर प्रति गैलन से ऊपर जा चुकी है.
ईरान की चेतावनी: ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाग़ेर ग़ालीबाफ़ ने सोमवार को एक्स पर लिखा, “हमारी सशस्त्र सेनाएँ किसी भी आक्रामकता का मुँहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार हैं. हम सभी विकल्पों के लिए तैयार हैं; वे चौंक जाएँगे.” उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका के पास ईरान की शर्तें मानने के अलावा कोई रास्ता नहीं है. ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा एवं विदेश नीति समिति के प्रवक्ता इब्राहीम रज़ाई ने चेतावनी दी कि यदि संघर्ष फिर शुरू हुआ तो ईरान 90 प्रतिशत तक यूरेनियम समृद्ध करने पर विचार करेगा.
ऊर्जा संकट और वैश्विक असर: सऊदी अरामको के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमीन नासिर ने निवेशकों को बताया कि होर्मुज़ बंद होना “दुनिया का अब तक का सबसे बड़ा ऊर्जा आपूर्ति संकट” है. अब तक क़रीब 88 करोड़ बैरल तेल की आपूर्ति प्रभावित हो चुकी है — यानी हर हफ़्ते 10 करोड़ बैरल का नुक़सान. शिपिंग डेटा फ़र्म ज़ेनेटा के मुख्य विश्लेषक पीटर सैंड के मुताबिक़ उत्तरी यूरोप से अमेरिका के पूर्वी तट तक के मार्ग पर — जिसका मध्य-पूर्व से कोई सीधा संपर्क नहीं है — माल-ढुलाई दरें फ़रवरी के अंत से 56 प्रतिशत बढ़ चुकी हैं. उन्होंने कहा, “संकट अभी भी जारी है — बस क्षेत्रीय से वैश्विक हो गया है.” ब्राउन विश्वविद्यालय के वॉटसन स्कूल के ट्रैकर के अनुसार 28 फ़रवरी से शुरू हुए युद्ध के बाद से अमेरिकी उपभोक्ताओं को गैस और डीज़ल पर 37 अरब डॉलर से ज़्यादा अतिरिक्त ख़र्च करने पड़े हैं.
जेपीमॉर्गन और गोल्डमैन सैक्स दोनों का अनुमान है कि जून तक होर्मुज़ फिर खुल सकता है. गोल्डमैन का अनुमान है कि इससे ब्रेंट क्रूड साल के अंत तक 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास स्थिर हो जाएगा. अमेरिका ने पिछले हफ़्ते अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार से 86 लाख बैरल तेल जारी किया — इतिहास में एक सप्ताह में सबसे बड़ी निकासी.
यूएई और इज़रायल की गुप्त साझेदारी: वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार संयुक्त अरब अमीरात ने ईरान पर गुप्त सैन्य हमले किए, जिनमें अप्रैल की शुरुआत में — युद्धविराम के बाद — ईरान के लवान द्वीप पर एक रिफ़ाइनरी पर हमला शामिल था, जिससे वहाँ भीषण आग लग गई और वह सुविधा महीनों के लिए बंद हो गई. ईरान ने इसके जवाब में यूएई और कुवैत पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए. पूरे युद्ध में ईरान ने यूएई पर 2,800 से ज़्यादा मिसाइलें और ड्रोन दागे — इज़रायल के बाद सबसे ज़्यादा. इज़रायल में अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी ने तेल अवीव में एक कार्यक्रम में खुलासा किया कि इज़रायल ने यूएई को आयरन डोम मिसाइल-रोधी बैटरियाँ और उन्हें चलाने वाले जवान भी भेजे हैं. संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत माइक वॉल्ट्ज़ ने भी इसकी पुष्टि की.
लेबनान और ग़ज़ा में जारी हिंसा: लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार 2 मार्च से अब तक इज़रायली हमलों में लेबनान में 2,882 लोग मारे जा चुके हैं और 8,768 घायल हुए हैं — जिनमें 200 से अधिक बच्चे शामिल हैं. 17 अप्रैल को “युद्धविराम” की घोषणा के बाद से अब तक कम से कम 380 लोग मारे जा चुके हैं. सोमवार को इज़रायली हमलों में दक्षिण लेबनान में कम से कम 13 लोग मारे गए और 38 घायल हुए. इज़रायली सेना ने मंगलवार को कहा कि उसने लेबनान में 100 से ज़्यादा ठिकानों पर हमले किए. संयुक्त राष्ट्र के आपातकालीन राहत समन्वयक टॉम फ्लेचर ने एक्स पर लिखा, “24 घंटों में लेबनान पर 100 से अधिक हमले. नागरिक मारे गए. परिवार विस्थापित हुए... लोगों को जिसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है वह है एक सच्चा युद्धविराम.” यह सब 17 मई तक बढ़ाए गए युद्धविराम समझौते के बावजूद हो रहा है. ग़ज़ा में सोमवार को इज़रायली बलों ने चार फ़िलिस्तीनियों को मार डाला. 7 अक्टूबर 2023 से अब तक कुल 72,742 फ़िलिस्तीनी मारे जा चुके हैं और 1,72,565 घायल हुए हैं.
फ़िलिस्तीनी क़ैदियों पर अत्याचार: न्यूयॉर्क टाइम्स के स्तंभकार निकोलस क्रिस्टोफ़ की रिपोर्ट के अनुसार इज़रायली हिरासत में फ़िलिस्तीनी क़ैदियों ने व्यवस्थित यौन हिंसा और दुर्व्यवहार का वर्णन किया है. 46 वर्षीय पत्रकार सामी अल-साई ने बताया कि उन्हें नग्न करके मारा गया और एक महिला गार्ड ने उनके साथ अभद्रता की. एक फ़िलिस्तीनी किसान ने कहा कि बिना किसी आरोप के महीनों हिरासत में रखकर उसके साथ बर्बर दुराचार किया गया. जब उसने शिकायत के लिए काग़ज़-क़लम माँगा तो गार्ड वापस आए और फिर से दुराचार किया. 23 वर्षीय एक फ़िलिस्तीनी महिला ने बताया कि गिरफ़्तारी के दौरान उसे, उसकी माँ और भांजी को बलात्कार की धमकियाँ दी गईं. फ़िलिस्तीनी क़ैदी अधिकार संगठनों ने बताया कि नक़ब और रामला जेलों में 1,283 ग़ज़ावासियों को बिना किसी आरोप के “ग़ैरक़ानूनी लड़ाकू” की श्रेणी में रखा गया है.
यूरोपीय संघ के प्रतिबंध और अन्य घटनाएँ: हारेत्ज़ की रिपोर्ट के अनुसार यूरोपीय संघ के विदेश मंत्रियों की परिषद ने सोमवार को इज़रायली दक्षिणपंथी कार्यकर्ता डेनिएला वाइस और कई बसने वाले संगठनों पर प्रतिबंध लगाए. यह प्रस्ताव 2024 की गर्मियों से तैयार था, लेकिन हंगरी के पूर्व प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान ने 18 महीने तक इसे रोके रखा. इज़रायली नेसेट ने 93-0 के मत से एक विशेष न्यायाधिकरण स्थापित करने का प्रस्ताव पास किया जो 7 अक्टूबर 2023 के हमलों में शामिल फ़िलिस्तीनियों को मृत्युदंड दे सकेगा. अदालह संगठन की मुना हद्दाद ने चेतावनी दी कि यह विधेयक साक्ष्य के मानक कम करके सामूहिक दोष-सिद्धि को आसान बनाएगा और इसे “दिखावटी मुक़दमों” में बदल देगा.
चीन की नज़र में ट्रम्प का अमेरिका — “ढलते साम्राज्य की शाम की घंटी”
“न्यूयॉर्क टाइम्स” की स्तंभकार ली युआन की रिपोर्ट के अनुसार, जब राष्ट्रपति ट्रम्प 2017 में चीन गए थे तो राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उनका भव्य स्वागत किया था — फ़ॉरबिडन सिटी का चार घंटे का दौरा और बीजिंग ओपेरा की प्रस्तुति. आठ साल, एक महामारी और दो व्यापार युद्धों के बाद ट्रम्प दोबारा बीजिंग जा रहे हैं, लेकिन इस बार चीन की सुर्खियाँ नृत्य करते रोबोट, ड्रोन झुंडों और विद्युत वाहनों से भरी हैं.
चीन अब खुद को पश्चिम से पीछड़ी सभ्यता के रूप में नहीं, बल्कि अमेरिका को पछाड़ने वाली महाशक्ति के रूप में पेश कर रहा है. रेनमिन विश्वविद्यालय से जुड़े एक राष्ट्रवादी थिंक टैंक ने जनवरी में एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसका शीर्षक था — “ट्रम्प का शुक्रिया.” रिपोर्ट में तर्क दिया गया कि ट्रम्प के टैरिफ, सहयोगियों पर हमले, आव्रजन विरोधी नीतियों और अमेरिकी राजनीतिक ढाँचे पर हमलों ने अनजाने में चीन को मज़बूत और अमेरिका को कमज़ोर किया है. रिपोर्ट ने ट्रम्प को “अमेरिकी राजनीतिक पतन का त्वरक” बताया और लिखा, “इतिहास के इस मोड़ पर, हमें एक साम्राज्य की शाम की भारी और विचलित करने वाली घंटी सुनाई देती है.” ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के दो शोधकर्ताओं के एक अध्ययन के अनुसार 2025 में आधिकारिक चीनी स्रोतों में “अमेरिकी गिरावट” से जुड़े शब्दों का इस्तेमाल लगभग दोगुना हो गया.
उत्तरी चीन में एक शिक्षा सलाहकार वांग ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि एक दशक पहले उनके 80 प्रतिशत छात्र अमेरिका में पढ़ने का सपना देखते थे. अब यह आँकड़ा घटकर 45 प्रतिशत रह गया है. उन्होंने 6 जनवरी 2021 के कैपिटल हिल हमले को देखकर माओ के सांस्कृतिक क्रांति के दौरान भेजे गए रेड गार्डों की याद आने की बात कही.
शंघाई इंटरनेशनल स्टडीज़ विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर हुआंग जिंग ने कहा, “सिर्फ़ चीन ही ट्रम्प को बचा सकता है.” उनका तर्क था कि अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले ट्रम्प को चीनी ख़रीदारी जैसी दिखने वाली जीत की ज़रूरत है. फ़ुदान विश्वविद्यालय के अमेरिकी अध्ययन के विद्वान वू शिनबो का मानना है कि यदि रिपब्लिकन इस पतझड़ में प्रतिनिधि सभा का नियंत्रण गँवाते हैं, तो ट्रम्प विदेश नीति में विरासत बनाने की ओर मुड़ेंगे, जिससे बीजिंग के साथ बड़े समझौते की गुंजाइश बनेगी. वू ने कहा, “चीन को इस अवसर का भरपूर उपयोग करना चाहिए.”
ईरान युद्ध ने इस नज़रिए को और पुख़्ता किया है. वू ने अप्रैल में एक सम्मेलन में कहा कि ईरान युद्ध ने मध्य-पूर्व में अमेरिकी सैन्य और कूटनीतिक ध्यान खपाकर चीन के पक्ष में शक्ति-संतुलन को झुका दिया है. ट्रैकिंग पीपल्स डेली परियोजना के विश्लेषण के अनुसार चीन ने बाइडेन को एक ज़्यादा गंभीर और व्यवस्थागत ख़तरे के रूप में देखा, जबकि “ट्रम्प का लेन-देन वाला स्वभाव कुछ ऐसा है जिसे बीजिंग समझता है और जिसके साथ काम कर सकता है.”
हालाँकि अमेरिकी पतन का यह विश्वास फिलहाल चीन की आक्रामक विदेश नीति में नहीं बदला है. विदेश संबंध परिषद की अर्थशास्त्री ज़ोंग्युआन ज़ोई लियू ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि शी जिनपिंग को “वह अमेरिका मिल रहा है जो वे हमेशा चाहते थे” — और साथ ही “वह अमेरिका भी जिससे वे सबसे ज़्यादा डरते थे” — यानी एक अनिश्चित और अप्रत्याशित महाशक्ति, जो वैश्विक स्थिरता के लिए ख़तरा भी बन सकती है.
ईरान में अमेरिका की ‘शह और मात’?
रॉबर्ट केगन का “द एटलांटिक” में 10 मई 2026 का लेख “चेक मेट इन ईरान” (ईरान में शह-मात) अमेरिका-इजराइल के ईरान अभियान को अमेरिका की बड़ी रणनीतिक हार बताता है. केगन, एक प्रमुख नव-संरक्षणवादी विचारक, लिखते हैं कि 37 दिनों की हमलों के बावजूद ईरानी शासन नहीं गिरा. ईरान अब हार्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण रखता है, जो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर उसकी ताकत बढ़ाता है. इससे चीन-रूस मजबूत हुए हैं, अमेरिका की विश्वसनीयता घटी है और विश्व व्यवस्था में अमेरिका का वर्चस्व कम हो रहा है. विशेषज्ञ इस लेख को काफी गंभीरता से ले रहे हैं क्योंकि केगन खुद हस्तक्षेपवादी नीतियों के समर्थक रहे हैं. सोशल मीडिया पर यह तेजी से वायरल हुआ है. ईरानी मीडिया इसे अपनी जीत का प्रमाण मान रहा है. वाली नासर जैसे विशेषज्ञ इसे “सुलगता आकलन” बता चुके हैं. पॉडकास्ट, समाचार चैनल और थिंक-टैंक में इसकी चर्चा हो रही है. कुछ इसे अतिरंजित मानते हैं, पर लेखक की प्रतिष्ठा के कारण इसे आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता. उनका स्कैच न्यूयॉर्क टाइम्स से साभार.
इतिहास में कुछ ऐसे मोड़ आते हैं जब कोई महाशक्ति एक ऐसी हार झेलती है जिसे न पलटा जा सके, न भुलाया जा सके. द अटलांटिक में प्रकाशित लेख में अमेरिकी विश्लेषक रॉबर्ट केगन का मानना है कि ईरान के साथ मौजूदा टकराव में अमेरिका ऐसे ही एक मोड़ पर खड़ा है.
पर्ल हार्बर की तबाही के बाद अमेरिका ने वापसी की. वियतनाम और अफ़गानिस्तान की हार कड़वी थी, लेकिन वे मुख्य भू-रणनीतिक क्षेत्रों से दूर थे, इसलिए अमेरिका की समग्र वैश्विक स्थिति पर कोई स्थायी दाग़ नहीं लगा. इराक़ में शुरुआती असफलता को रणनीति बदलकर काफ़ी हद तक सँभाल लिया गया. लेकिन होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान का नियंत्रण एक बिल्कुल अलग किस्म की हार है — ऐसी हार जिसका कोई इलाज नहीं है.
37 दिन की बमबारी, फिर भी ईरान झुका नहीं
अमेरिका और इज़रायल ने मिलकर 37 दिनों तक ईरान पर भीषण हमले किए. ईरानी नेतृत्व का बड़ा हिस्सा मारा गया और उसकी अधिकांश सैन्य क्षमता तबाह कर दी गई. फिर भी ईरान की सरकार टस से मस नहीं हुई — एक भी रियायत नहीं, एक भी समझौता नहीं.
असली मोड़ 18 मार्च को आया, जब इज़रायल ने ईरान के दक्षिण पार्स गैस क्षेत्र पर हमला किया. ईरान ने जवाब में क़तर के रास लफन औद्योगिक शहर — दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस निर्यात संयंत्र — पर हमला कर दिया. इस हमले से हुआ नुक़सान इतना गहरा था कि उसकी भरपाई में कई साल लग जाएँगे. इसके बाद ट्रम्प ने ईरान की ऊर्जा सुविधाओं पर हमलों को रोकने की घोषणा की और फिर युद्धविराम का ऐलान कर दिया — बिना ईरान से एक भी शर्त मनवाए.
आगे के रास्ते बंद क्यों हैं?
ट्रम्प प्रशासन अब ईरान के बंदरगाहों की नाकेबंदी पर दाँव लगा रहा है. लेकिन सवाल यह है कि जो सरकार पाँच हफ़्ते की लगातार बमबारी से नहीं झुकी, वह आर्थिक दबाव से कैसे झुकेगी? ईरान की विद्वान सुज़ेन मेलोनी ने सटीक टिप्पणी की है कि जिस सरकार ने जनवरी में अपने ही नागरिकों के विरोध-प्रदर्शन को कुचलने के लिए उनकी जान ली, वह अब आर्थिक तकलीफ़ से डरने वाली नहीं है.
दोबारा सैन्य हमले की माँग करने वाले भी यह नहीं बता पाते कि एक और दौर की बमबारी वह काम कैसे करेगी जो 37 दिनों में नहीं हो सका. और अगर हमले फिर शुरू हुए, तो ईरान के पास अभी भी पर्याप्त मिसाइलें और ड्रोन हैं जो खाड़ी देशों के तेल और गैस के ढाँचे को तबाह कर सकते हैं — जिससे दुनिया एक लंबे आर्थिक संकट में धँस जाएगी. यही जोखिम ट्रम्प को पहले भी रोकता रहा है और आगे भी रोकेगा.
ऐसे में ट्रम्प के पास फिलहाल एकमात्र विकल्प बचा है — “जीत की घोषणा करके चले जाना.” ख़बरें हैं कि उन्होंने अमेरिकी खुफिया एजेंसियों से यह आकलन करने को कहा है कि बस विजय का दावा ठोककर पीछे हट जाने के क्या परिणाम होंगे.
होर्मुज़ — एक नया हथियार
होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के तेल और गैस व्यापार की जीवनरेखा है. ईरान अब इसे पहले जैसा खुला नहीं छोड़ेगा. यह जलमार्ग अब उसके हाथ में एक ऐसा हथियार बन गया है जिसकी धार किसी परमाणु बम से कम नहीं — बल्कि ज़्यादा तात्कालिक और असरदार है.
ईरान जिन देशों से अच्छे संबंध रखेगा, उनके जहाज़ गुज़रेंगे. जो उसकी नाराज़गी मोल लेंगे, उन्हें रोका जाएगा या धीमा किया जाएगा. इस नए समीकरण में ईरान के पास यह ताक़त होगी कि वह दुनिया के किसी भी देश पर — यहाँ तक कि बड़ी ताक़तों पर भी — ऊर्जा आपूर्ति का दबाव बनाकर अपनी शर्तें मनवा सके. इसके साथ-साथ ईरान ने अपनी संभावित परमाणु क्षमता भी बरकरार रखी है.
क्षेत्रीय और वैश्विक उथल-पुथल
खाड़ी के अरब देश — जिनकी अर्थव्यवस्थाएँ दशकों से अमेरिकी सैन्य छत्रछाया में फली-फूली हैं — अब ईरान की ओर देखने पर मजबूर होंगे. विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिकी वर्चस्व और समुद्री व्यापार की स्वतंत्रता खत्म होते ही, खाड़ी के देश अनिवार्य रूप से तेहरान के दरवाज़े खटखटाएँगे.
इज़रायल भी पहले से कहीं ज़्यादा अकेला पड़ जाएगा. जब ईरान के हाथ में इतने देशों की ऊर्जा आपूर्ति की चाबी हो, तो कोई भी देश ईरान को नाराज़ करने का जोखिम नहीं उठाना चाहेगा — और इज़रायल पर लेबनान, गाज़ा या कहीं और ईरानी प्रॉक्सी के ख़िलाफ़ कार्रवाई न करने का भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव बनेगा.
वैश्विक स्तर पर, पूरी दुनिया ने देखा है कि एक ‘दूसरी श्रेणी की ताक़त’ के साथ कुछ हफ़्तों के युद्ध में ही अमेरिका के हथियार भंडार ख़तरनाक हद तक कम हो गए. यह देखकर यूरोप और पूर्वी एशिया के सहयोगी सोचने पर मजबूर हैं — अगर भविष्य में चीन ताइवान पर हमला करे या रूस यूरोप में आक्रामकता बढ़ाए, तो क्या अमेरिका टिका रह सकेगा? इस संदेह का सीधा फ़ायदा बीजिंग और मॉस्को को मिलेगा.
यह सब भारत के लिए क्यों मायने रखता है?
भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए बड़े पैमाने पर खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर है. होर्मुज़ पर ईरानी नियंत्रण का मतलब है तेल की कीमतों में भारी उछाल — $150 से $200 प्रति बैरल तक — जिसका असर महँगाई, परिवहन, खेती और आम जनजीवन पर सीधे पड़ेगा. इसके अलावा खाड़ी देशों में काम करने वाला भारतीय प्रवासी समुदाय भी इस अस्थिरता से प्रभावित होगा. और एक बड़े स्तर पर, इस पूरे घटनाक्रम से एक नई बहुध्रुवीय दुनिया आकार ले रही है जिसमें भारत को अपनी विदेश नीति और ऊर्जा सुरक्षा की नए सिरे से समीक्षा करनी होगी.
केगन का यह लेख एक कड़वी सच्चाई सामने रखता है — कि ताक़त और रणनीति दो अलग चीज़ें हैं, और बिना सुविचारित रणनीति के ताक़त का इस्तेमाल भी हार का रास्ता बन सकता है. अमेरिका ने ईरान पर भारी सैन्य बल झोंका, लेकिन जब होर्मुज़ की असली क़ीमत सामने आई — यानी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का जोखिम — तब वह पीछे हटने पर मजबूर हो गया. और यही पीछे हटना उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी साबित हो रही है.
दुनिया के देश इस बदलाव को देख रहे हैं और अपने हिसाब से क़दम उठा रहे हैं. जो दुनिया अमेरिकी नेतृत्व में चलती थी, वह धीरे-धीरे अतीत बनती जा रही है.
जाति, उत्तर-दक्षिण और कुपोषण: भारत के बच्चों की सेहत में छिपी सामाजिक खाई
स्क्रोल के मुताबिक, भारत में बाल कुपोषण सिर्फ गरीबी या भोजन की कमी का संकट नहीं है, बल्कि यह देश की गहरी सामाजिक संरचनाओं का भी आईना है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, देश में पाँच साल से कम उम्र के लगभग एक-तिहाई बच्चे ठिगनेपन यानी अवरुद्ध शारीरिक विकास का शिकार हैं. यह स्थिति केवल बच्चों की लंबाई तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उनके मानसिक विकास, शिक्षा और भविष्य की आर्थिक संभावनाओं को भी प्रभावित करती है.
लेकिन यह समस्या सभी समुदायों में समान नहीं है. अनुसूचित जाति के बच्चों में कुपोषण और ठिगनेपन की दर लंबे समय से अधिक पाई जाती रही है. अब एक नए शोध ने इस असमानता को भारत के ऐतिहासिक उत्तर-दक्षिण विभाजन और जातिगत भेदभाव से जोड़ते हुए एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है. क्या सामाजिक भेदभाव बच्चों की सेहत तय कर रहा है?
जर्नल ऑफ इकनॉमिक बिहेवियर एंड ऑर्गेनाइजेशन में प्रकाशित इस शोध ने विंध्य पर्वतमाला को अध्ययन का आधार बनाया. इतिहास में विंध्य को उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक तथा सामाजिक सीमा माना जाता रहा है. शोधकर्ताओं का तर्क है कि विंध्य के उत्तर में जाति व्यवस्था और छुआछूत की परंपराएँ सामाजिक जीवन में अधिक गहराई से मौजूद रही हैं, जबकि दक्षिण भारत में इनकी तीव्रता अपेक्षाकृत कम रही.
इसी आधार पर शोधकर्ताओं ने विंध्य के दोनों ओर रहने वाले बच्चों के स्वास्थ्य आँकड़ों की तुलना की. परिणाम बेहद चौंकाने वाले थे.
उच्च जाति के हिंदू बच्चों में उत्तर और दक्षिण के बीच कोई खास अंतर नहीं मिला. लेकिन अनुसूचित जाति के बच्चों के मामले में तस्वीर पूरी तरह बदल गई. विंध्य के दक्षिण में रहने वाले अनुसूचित जाति के बच्चों में ठिगनेपन की दर काफी कम थी और उनकी औसत लंबाई भी उत्तर भारत के बच्चों से बेहतर पाई गई.
शोध के अनुसार, दक्षिण भारत में रहने वाले अनुसूचित जाति के बच्चे औसतन अधिक लंबे पाए गए और उनमें ठिगनेपन की संभावना लगभग 7 से 8 प्रतिशत कम थी. यह अंतर मामूली नहीं है, क्योंकि भारत में कुल ठिगनेपन की दर पहले से ही बहुत अधिक है.
महत्वपूर्ण बात यह है कि शोधकर्ताओं ने इस अंतर को केवल आर्थिक कारणों से जोड़ने से इनकार किया है. उन्होंने गरीबी, शिक्षा, स्वच्छता, पानी, मातृ स्वास्थ्य और पारिवारिक परिस्थितियों जैसे कई कारकों की जाँच की. इन सभी का प्रभाव तो दिखा, लेकिन वे उत्तर-दक्षिण अंतर को पूरी तरह नहीं समझा सके.
यानी केवल पैसा या सरकारी योजनाएँ ही इस समस्या का पूरा उत्तर नहीं हैं.
शोध का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि जिन समुदायों का इतिहास जातिगत भेदभाव से जुड़ा रहा है, उन्हीं में यह उत्तर-दक्षिण अंतर स्पष्ट दिखाई देता है. उदाहरण के तौर पर, दलित मुसलमानों में भी इसी तरह का पैटर्न मिला, जबकि अन्य आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन जातिगत रूप से अलग समूहों में ऐसा अंतर नहीं दिखा.
यह निष्कर्ष भारत के सामाजिक ढाँचे पर गंभीर सवाल खड़ा करता है. क्या आज भी जातिगत अपमान, सामाजिक दूरी और भेदभाव बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य तक को प्रभावित कर रहे हैं? क्या सामाजिक सम्मान और बराबरी की कमी का असर बच्चों की थाली तक पहुँच रहा है?
दरअसल, कुपोषण केवल कैलोरी का प्रश्न नहीं है. यह इस बात से भी जुड़ा है कि समाज किन समुदायों को कितना सम्मान, अवसर और सार्वजनिक संसाधनों तक पहुँच देता है. अगर किसी समुदाय को लगातार हाशिए पर रखा जाएगा, तो उसका असर आने वाली पीढ़ियों के शरीर और दिमाग दोनों पर पड़ेगा.
इसीलिए यह शोध केवल स्वास्थ्य का अध्ययन नहीं, बल्कि भारतीय समाज का आईना है. यह बताता है कि बाल कुपोषण से लड़ाई केवल राशन, आंगनवाड़ी और अस्पतालों से नहीं जीती जा सकती. इसके लिए सामाजिक भेदभाव, जातिगत असमानता और छुआछूत जैसी गहरी संरचनाओं को भी चुनौती देनी होगी.
भारत अगर वास्तव में “पोषित भारत” बनना चाहता है, तो उसे बच्चों के शरीर के साथ-साथ समाज की सोच को भी स्वस्थ करना होगा.
यह लेख अश्विनी देशपांडे और राजेश रामचंद्रन द्वारा लिखा गया है. अश्विनी देशपांडे अशोका विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग की प्रमुख और सेंटर फॉर इकनॉमिक डेटा एंड एनालिसिस की शैक्षणिक निदेशक हैं, जबकि राजेश रामचंद्रन मोनाश विश्वविद्यालय मलेशिया से जुड़े हुए हैं. पूरा लेख यहाँ पढ़ा जा सकता है.
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