11/06/2026 :मणिपुर में फिर हिंसा | सीट चोरी | जजों का बैडमिंटन | बेरोजगारों का सच | सरकार का गुप्त रोग | 5 ट्रिलियन लक्ष्य फेल | कॉकरोच राजनीति | जो सैको की किताब | 370 की बिरयानी | एपस्टीन
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
भारत में रोज़गार संकट: “विकसित भारत” का सपना और 121 करोड़ बेरोज़गार युवाओं की हक़ीक़त
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 8 दिनों तक अवैध हिरासत में रखे गए मुस्लिम व्यक्ति को ₹2 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया
मप्र में भाजपा के तीनों राज्यसभा उम्मीदवार निर्विरोध चुने जाने पर कांग्रेस ने लगाया ‘सीट चोरी’ का आरोप
वीवीपी शर्मा | ₹370 की बिरयानी: असली कहानी तालियाँ क्यों थीं
मणिपुर: 6 नागा लोगों के शव बरामद होने के बाद सशस्त्र हमलावरों द्वारा दो कुकी लोगों की गोली मारकर हत्या, घर फूंके
सिचुएशन रूम में निपल्स की चर्चा
पल या आंदोलन? कॉकरोच जनता पार्टी के लिए बढ़ता युवा समर्थन भारत के लिए क्या संकेत देता है
पहले 2022, फिर 2025, अब 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य भी पूरा नहीं कर पाई मोदी सरकार
दशकों तक राज्य के साथ खड़े रहे जम्मू-कश्मीर के आदिवासी अब बेदखली, तोड़फोड़ और अपने ही घर में असुरक्षा का सामना कर रहे हैं
राकेश कायस्थ | मोदी सरकार का ‘गुप्त’ रोग
श्रवण गर्ग | आज अगर विपक्ष कमजोर है और मीडिया अपनी भूमिका में नहीं है, तो जुडिशरी की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है
भारतीय प्रकाशक ने जो सैको की किताब क्यों छोड़ी?
मणिपुर: 6 नागा लोगों के शव बरामद होने के बाद सशस्त्र हमलावरों द्वारा दो कुकी लोगों की गोली मारकर हत्या, घर फूंके
पुलिस ने बताया कि संदिग्ध सशस्त्र हमलावरों ने गुरुवार (11 जून, 2026) को मणिपुर के कामजोंग जिले के एक गाँव पर हमला कर दिया, जिसमें दो लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई और कई घरों को आग लगा दी गई. दोनों मृतक कुकी समुदाय के बताए जाते हैं.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, यह घटना कांगपोकपी जिले में छह नागा नागरिकों के शव बरामद होने के एक दिन बाद हुई है. आशंका जताई जा रही है कि ये शव उन लोगों के थे जिन्हें सशस्त्र समूहों ने बंधक बना रखा था. इस हत्या पर कांग्रेस नेता डॉ. लमथिनथांग हाओकिप ने दावा किया कि “कुलतुह चर्च के हेड डीकन और युवा विभाग के अध्यक्ष की बेरहमी से हत्या कर दी गई.”
उन्होंने आरोप लगाया कि स्थिति को नियंत्रित करने में सरकार की नाकामी “सहनशीलता से परे” है.
पुलिस ने बताया कि कुलतुह कुकी नामक एक छोटे से गाँव पर हमलावरों ने सुबह करीब 4.55 बजे हमला किया, जिसके दौरान दो लोगों की मौत हो गई.
अधिकारी ने बताया कि म्यांमार के साथ सीमावर्ती क्षेत्र के पास स्थित लगभग 30 घरों को भी जला दिया गया. सुरक्षा बल सुदूर गाँव में पहुँच चुके हैं, लेकिन अपराधियों की पहचान अभी तक नहीं हो पाई है.
कुकी बैपटिस्ट कन्वेंशन ने इन हत्याओं की निंदा की है और अधिकारियों से नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए “निर्णायक और व्यापक कदम” उठाने का आग्रह किया है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 8 दिनों तक अवैध हिरासत में रखे गए मुस्लिम व्यक्ति को ₹2 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में एक मुस्लिम व्यक्ति, मंसूर अहमद, को आठ दिनों तक अवैध हिरासत में रखने के मामले में राज्य सरकार को ₹2 लाख का मुआवजा देने का ऐतिहासिक आदेश दिया है. न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने इस हिरासत को गैरकानूनी माना और निर्देश दिया कि मुआवजे की यह राशि तीन महीने के भीतर अनुशासनात्मक जांच पूरी कर जिम्मेदार सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) से वसूल की जाए.
याचिका के अनुसार, मार्च में खीरी थाना पुलिस ने मंसूर अहमद को बिना किसी वैध कारण के उनके घर से उठाया था और थाने में उनके साथ बेरहमी से मारपीट की गई थी. पुलिस ने तर्क दिया कि उन्होंने निजी मुचलका (बॉन्ड) भरने से इनकार किया था, लेकिन अदालत को रिकॉर्ड पर इसका कोई सबूत नहीं मिला.
‘मकतूब’ के मुताबिक, हाईकोर्ट ने प्रयागराज पुलिस कमिश्नरेट द्वारा शक्तियों के घोर दुरुपयोग पर सख्त नाराजगी जताते हुए इसे “चौंकाने वाली स्थिति” कहा. भविष्य के लिए सुरक्षा उपाय तय करते हुए कोर्ट ने फैसला सुनाया कि बिना कानूनी औचित्य के 24 घंटे से अधिक हिरासत में रखने पर पीड़ित को प्रति दिन ₹25,000 का मुआवजा मिलेगा, जो दोषी अधिकारी की जेब से जाएगा. अदालत का यह रुख निवारक हिरासत और गैंगस्टर एक्ट के बढ़ते दुरुपयोग के खिलाफ एक महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप है.
मप्र में भाजपा के तीनों राज्यसभा उम्मीदवार निर्विरोध चुने जाने पर कांग्रेस ने लगाया ‘सीट चोरी’ का आरोप
कांग्रेस ने गुरुवार (11 जून) को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर “सीट चोरी” का आरोप लगाया और कहा कि भगवा पार्टी के लिए चुनाव जीतने से ज्यादा आसान उन्हें फिक्स (तय) करना है. विपक्षी दल ने यह भी घोषणा की कि वह मध्य प्रदेश से अपनी राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के खिलाफ राजनीतिक और कानूनी रूप से लड़ाई लड़ेगा.
‘द वायर’ के अनुसार, कांग्रेस का यह बयान नई दिल्ली में पार्टी के शीर्ष नेताओं की एक संगठनात्मक बैठक के बाद आया, ठीक उसी समय जब मध्य प्रदेश में भाजपा के तीनों राज्यसभा उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो गए. चुने गए तीन भाजपा उम्मीदवारों में राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ, प्रदेश सचिव रजनीश अग्रवाल और राज्य मछुआ कल्याण बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष महेश केवट शामिल हैं.
‘एक्स’ पर एक पोस्ट में, भाजपा मध्य प्रदेश ने कहा कि तीनों उम्मीदवारों को उनके प्रमाण पत्र मिल गए हैं. नटराजन का नामांकन 8 जून को कथित तौर पर अपने हलफनामे में अपने खिलाफ लंबित एक आपराधिक मामले का विवरण न देने के कारण रद्द कर दिया गया था.
एक बयान में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा कि “वोट चोरी और सरकार चोरी के बाद - भाजपा-चुनाव आयोग की जुगलबंदी ने सीट चोरी के साथ मुकाबला शुरू होने से पहले ही खत्म कर दिया है.”
हरकारा डीप डाइव
श्रवण गर्ग | आज यदि विपक्ष कमजोर है और मीडिया अपनी भूमिका में नहीं, तो जुडिशरी की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग से न्यायपालिका की मौजूदा स्थिति और उसकी विश्वसनीयता को लेकर बातचीत की. बातचीत की शुरुआत इस सवाल से हुई कि पिछले 12 वर्षों में जब देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर लगातार बहस चल रही है, तब न्यायपालिका ने सरकार, संविधान और आम नागरिकों के साथ कितना न्याय किया है और उसकी विश्वसनीयता किस स्थिति में पहुंची है.
श्रवण गर्ग ने कहा कि न्यायपालिका पर बात करना एक संवेदनशील विषय है. अदालतों और जजों को लेकर चर्चा कम होती है क्योंकि इसमें अवमानना और अन्य सीमाओं का सवाल जुड़ा रहता है. लेकिन उन्होंने कहा कि जिन मुद्दों पर आज चर्चा हो रही है, उन पर कुछ मंचों और अखबारों में सवाल उठाए गए हैं.
उन्होंने सबसे पहले लंदन में हुए उस कार्यक्रम का जिक्र किया जिसमें भारत के जज, वकील और केंद्रीय मंत्री शामिल थे. श्रवण गर्ग ने कहा कि वहां बैडमिंटन खेलने को लेकर जो तस्वीरें सामने आईं, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि न्यायपालिका और सरकार के बीच दिखने वाली नजदीकियों को किस तरह देखा जाए. उन्होंने कहा कि जजों के लिए एक आचार संहिता की बात पहले भी होती रही है, जिसमें यह तय करने की कोशिश की गई थी कि न्यायाधीशों को सरकार और वकीलों के साथ कितनी दूरी बनाए रखनी चाहिए.
श्रवण गर्ग ने कहा कि यहां तीन बातें महत्वपूर्ण हैं. पहली न्यायपालिका, वकीलों और सरकार के बीच बढ़ती नजदीकियां. दूसरी जजों के आचरण को लेकर बनी मर्यादाएं. और तीसरी न्यायपालिका की सार्वजनिक छवि.
इसके बाद उन्होंने लोकतंत्र के चार स्तंभों की चर्चा की. उन्होंने कहा कि आमतौर पर विधायिका, कार्यपालिका, मीडिया और न्यायपालिका को लोकतंत्र के प्रमुख आधार माना जाता है. लेकिन उनके अनुसार आज विधायिका की स्थिति कमजोर दिखाई दे रही है. उन्होंने दल-बदल और राजनीतिक घटनाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि विधायिका पर कार्यपालिका के प्रभाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
श्रवण गर्ग ने कहा कि कार्यपालिका के प्रभाव को लेकर यह आरोप लगाए जाते हैं कि वह पूरे सिस्टम पर हावी हो गई है. वहीं उन्होंने मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि आज मीडिया की स्थिति पहले जैसी नहीं रह गई है.
उन्होंने अपने आपातकाल के समय के अनुभवों का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि उस दौर में भी मीडिया पर दबाव था और सेंसरशिप लागू थी, लेकिन इसके बावजूद कई पत्रकार और अखबार सत्ता के सामने सवाल खड़े कर रहे थे. उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस में अपने समय का उल्लेख करते हुए कहा कि उस दौर में न्यायपालिका भी दबाव में थी, लेकिन इसके बावजूद उसमें इतनी ताकत थी कि इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को चुनौती दे सका.
श्रवण गर्ग ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने वाले अध्यादेश का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि एक वरिष्ठ वकील के लेख में सवाल उठाया गया कि जब संसद का सत्र आने वाला था तो अध्यादेश लाने की जरूरत क्यों पड़ी. उन्होंने कहा कि अदालतों में लंबे समय से पद खाली हैं और मुकदमों की संख्या बढ़ रही है, इसलिए नियुक्तियों की प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
भारत में रोज़गार संकट: “विकसित भारत” का सपना और 12.1 करोड़ बेरोज़गार युवाओं की हक़ीक़त
प्रोफ़ेसर संतोष मेहरोत्रा से बातचीत | पूरा इंटरव्यू यहाँ देखें
भारत सरकार कहती है कि अर्थव्यवस्था 8.2% की दर से बढ़ रही है. बेरोज़गारी दर महज़ 3.2% है, यानी कई सालों में सबसे कम. “मेक इन इंडिया” चल रहा है, स्टार्टअप्स फल-फूल रहे हैं, और “विकसित भारत 2047” का नारा हर मंच से गूँजता है.
लेकिन देश के सबसे सम्मानित अर्थशास्त्रियों में से एक, प्रोफ़ेसर संतोष मेहरोत्रा, इस सरकारी कथा को सिरे से चुनौती देते हैं. उनकी नई किताब “इंडिया आउट ऑफ वर्क” में वे तथ्यों, सरकारी आँकड़ों और अंतरराष्ट्रीय शोध के हवाले से बताते हैं कि भारत एक गहरे रोज़गार संकट में है, जिसकी जड़ें नीतिगत विफलताओं में हैं, और जिसके नतीजे आने वाली पीढ़ियों को भुगतने पड़ सकते हैं.
जीडीपी का दावा झूठा है और इसके सबूत हैं
प्रोफ़ेसर मेहरोत्रा की सबसे बड़ी और सबसे असहज करने वाली दलील यह है कि 2016 के बाद से जो जीडीपी विकास दर सरकार पेश कर रही है, वह वास्तविकता से मेल नहीं खाती.
वे कहते हैं कि नवंबर 2016 में नोटबंदी एक ऐसा नीति-प्रेरित झटका था जो इतिहास में पहले कभी नहीं देखा गया. किसी सरकार ने महज़ चार घंटे के नोटिस पर अपनी 86% मुद्रा को अवैध घोषित नहीं किया था. एक ऐसी अर्थव्यवस्था में जहाँ कृषि और एमएसएमई क्षेत्र नक़दी पर निर्भर हैं, इस फ़ैसले ने पूरे असंगठित क्षेत्र को झकझोर दिया.
इसके छह महीने बाद ही बिना पर्याप्त तैयारी के लागू किया गया जीएसटी दूसरा बड़ा झटका था. पाँच अलग-अलग कर दरें, बिना परीक्षण के लागू किए गए कंप्यूटर सिस्टम, इन सबने एमएसएमई क्षेत्र की कमर तोड़ दी.
इन झटकों के बाद असंगठित क्षेत्र की उत्पादकता गिरती रही, लेकिन जीडीपी आकलन में जो पुराने प्रॉक्सी अनुमान इस्तेमाल होते थे, वे नहीं बदले. संगठित क्षेत्र जल्दी उबर गया, असंगठित क्षेत्र नहीं, मगर सरकारी गणना में यह अंतर दिखा ही नहीं.
यह सिर्फ़ मेहरोत्रा का आकलन नहीं है. जेएनयू के प्रोफ़ेसर अरुण कुमार, पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. अरविंद सुब्रमण्यन के फरवरी 2026 के हालिया शोध-पत्र और ख़ुद आईएमएफ ने भी इस पर सवाल उठाए हैं. आईएमएफ ने भारत की जीडीपी अनुमान पद्धति को बी-ग्रेड से सी-ग्रेड पर उतार दिया है, यानी चार में से तीसरी श्रेणी.
मेहरोत्रा सीधे कहते हैं, “सरकार को उठकर हक़ीक़त देखनी होगी. जब तक वह ऐसा नहीं करती, वह यह भी नहीं समझ पाएगी कि रोज़गार क्यों नहीं बढ़ रहा.”
12 करोड़ 10 लाख युवा, न काम, न पढ़ाई, न प्रशिक्षण
सरकार जब 3.2% बेरोज़गारी का आँकड़ा पेश करती है, तो मेहरोत्रा एक दूसरा आँकड़ा सामने रखते हैं. 121 मिलियन यानी 12 करोड़ 10 लाख युवा भारतीय ऐसे हैं जो न रोज़गार में हैं, न किसी शैक्षणिक संस्थान में, और न किसी प्रशिक्षण कार्यक्रम में. इन्हें अंग्रेज़ी में नीट कहा जाता है.
3.2% का आँकड़ा इसलिए भ्रामक है क्योंकि भारत जैसी ग़रीब और असंगठित अर्थव्यवस्था में जिसके पास कोई चारा नहीं होता, वह कोई भी काम कर लेता है, और तब वह “बेरोज़गार” नहीं गिना जाता. असली सवाल यह है कि काम की गुणवत्ता क्या है, वह टिकाऊ है या नहीं, और क्या वह युवाओं की तैयारी और आकांक्षाओं से मेल खाता है.
पढ़े-लिखे ज़्यादा बेरोज़गार, अनपढ़ कम, यह कैसी विडंबना है?
पढ़े-लिखे नौजवानों में बेरोजगारी की दर बढ़ रही है. इंजीनियरिंग स्नातकों में यह 18% से बढ़कर 26% हो गई. परास्नातक डिग्रीधारकों में यह 20% से बढ़कर 30% हो गई.
इसका मतलब यह हुआ कि जितना ज़्यादा पढ़े हो, उतनी ज़्यादा बेरोज़गार रहने की संभावना है.
इसकी व्याख्या करते हुए मेहरोत्रा कहते हैं कि कम पढ़े-लिखे लोग अक्सर निम्न आय वर्ग से आते हैं. उनके पास इंतज़ार करने की सुविधा नहीं होती, इसलिए वे जो भी काम मिले कर लेते हैं. उच्च शिक्षित युवा बेहतर नौकरी का इंतज़ार कर सकते हैं और करते हैं. लेकिन जब नौकरियाँ हैं ही नहीं, तो यह प्रतीक्षा बेरोज़गारी के आँकड़े में दिखती है.
2012 से 2018 के बीच युवा बेरोज़गारी दर तीन गुना हो गई और तब से वह उसी ऊँचाई पर बनी हुई है.
खेती में वापसी, विकास की उलटी गिनती
2004 से 2019 के बीच भारत में एक ऐतिहासिक बदलाव हो रहा था. हर साल 50 लाख से ज़्यादा मज़दूर कृषि छोड़कर उद्योग और सेवा क्षेत्र में जा रहे थे. कृषि में लगे मज़दूरों की कुल संख्या पहली बार घट रही थी. ग्रामीण मज़दूरी बढ़ रही थी. ग़रीबी कम हो रही थी.
यह वही “संरचनात्मक बदलाव” था जो किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था की परिपक्वता की निशानी होती है.
लेकिन 2020 से 2024 के बीच 8 करोड़ मज़दूर वापस खेती में लौट आए. 2019 में कृषि में 20 करोड़ मज़दूर थे, वह संख्या अब 28 करोड़ हो गई है.
मेहरोत्रा इसे “दुनिया के इतिहास में इतने कम समय में इतने बड़े पैमाने पर इस तरह की उलटी विस्थापन प्रक्रिया कभी नहीं हुई” बताते हैं. ये मज़दूर खेती में नहीं आए क्योंकि वहाँ अवसर था. वे लौटे क्योंकि कहीं और जाने की जगह नहीं थी.
कृषि क्षेत्र में उत्पादकता बेहद कम है. जीडीपी में कृषि का योगदान महज़ 15 से 16% है, लेकिन कार्यबल का 42% हिस्सा अभी भी खेती में फँसा है. इतने लोगों को इतनी कम उत्पादकता वाले काम में खपाना किसी भी देश के विकास के लिए घातक है.
जनसांख्यिकीय लाभांश, सुनहरा मौक़ा हाथ से जा रहा है
“भारत एक युवा देश है”, यह नारा हर भाषण में सुनाई देता है. मेहरोत्रा कहते हैं कि यह सच था, लेकिन अब यह तेज़ी से बदल रहा है.
देश की औसत आयु 29 वर्ष पहुँच चुकी है. आज के कार्यबल का आधे से ज़्यादा हिस्सा 45 वर्ष या उससे अधिक उम्र का है. 2040 तक श्रम बाज़ार में प्रवेश करने वाले युवाओं की संख्या घटने लगेगी. उसके बाद भारत भी एक बुजुर्ग होती हुई अर्थव्यवस्था बन जाएगा.
इसका मतलब यह है कि रोज़गार पैदा करने की खिड़की बंद हो रही है और इसे खुला रखने के लिए हर साल 1 करोड़ से 1 करोड़ 20 लाख नए गैर-कृषि रोज़गार चाहिए.
ये रोज़गार तीन बड़े समूहों के लिए चाहिए. पहला, हर साल श्रम बाज़ार में आने वाले 60 लाख नए युवा. दूसरा, कृषि में फँसे 28 करोड़ मज़दूर, जिन्हें बाहर निकालना है. तीसरा, वे लोग जो पहले से बेरोज़गार हैं और जिनकी संख्या पिछले एक दशक में दोगुनी-तिगुनी हो गई है.
महिला श्रम भागीदारी, यमन और सऊदी अरब से भी बदतर
मेहरोत्रा एक और विस्फोटक तथ्य रखते हैं. भारत में महिला श्रम भागीदारी दर दुनिया में सबसे कम में से एक है, यमन और सऊदी अरब के समकक्ष.
सरकार कहती है कि हाल के वर्षों में यह दर बढ़ी है. लेकिन मेहरोत्रा बताते हैं कि यह वृद्धि इसलिए हुई क्योंकि महिलाएँ कृषि में वापस लौटीं और वहाँ वे अवैतनिक पारिवारिक श्रमिक के रूप में काम कर रही हैं.
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की सिफ़ारिश है कि अवैतनिक पारिवारिक श्रम को रोज़गार न माना जाए. अगर इसे हटा दें तो भारत की महिला श्रम भागीदारी दर यमन और सऊदी अरब से भी नीचे चली जाती है.
बिहार में यह दर 13% है. उत्तर प्रदेश में 20%.
इसकी वजह सिर्फ़ सामाजिक नहीं है. नौकरियाँ घरों के पास नहीं हैं. एमएसएमई क्लस्टर कमज़ोर पड़ रहे हैं. कार्यस्थल पर सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं का अभाव है.
मेहरोत्रा कहते हैं कि अगर नीति सही हो, घरों के पास उद्योग, सुरक्षित माहौल और मातृत्व लाभ हों, तो परिवार अपनी बेटियों को काम पर भेजने में संकोच नहीं करेंगे.
सरकारी दावों का जवाब एक-एक करके
मेहरोत्रा सरकार के प्रमुख दावों को एक-एक करके खारिज करते हैं.
पहला दावा — 8 करोड़ औपचारिक नौकरियाँ बनीं: ये 8 करोड़ नौकरियाँ कृषि में थीं, न कि औपचारिक क्षेत्र में. आईटी क्षेत्र, जो सबसे ज़्यादा औपचारिक रोज़गार देता था, अब एआई की वजह से नई भर्तियाँ रोक चुका है.आईआईटी में 100% प्लेसमेंट नहीं हो रहा.
दूसरा दावा — पीएलआई से मैन्युफैक्चरिंग आ रही है: पीएलआई की 14 में से 12 सेक्टर पूँजी-प्रधान हैं, श्रम-प्रधान नहीं. 2 लाख करोड़ रुपये में से केवल 12% ख़र्च हुआ और उसमें से 75% अकेले एप्पल को मिला. सैमसंग पीएलआई से पहले भी भारत में था. सरकार ख़ुद 2026 में पीएलआईकी समीक्षा की बात कर रही है.
तीसरा दावा — 1.5 लाख स्टार्टअप्स, रोज़गार का नया इंजन: स्टार्टअप्स अच्छे हैं, लेकिन ये एडटेक, फिनटेक, ई-कॉमर्स में हैं. ये पूँजी-प्रधान हैं और बड़े पैमाने पर रोज़गार नहीं देते. 1 करोड़ 20 लाख नई नौकरियाँ हर साल बनाना इनके बूते की बात नहीं है.
चौथा दावा — जेएएम से औपचारिकीकरण हो रहा है: यूपीआई से भुगतान करने का मतलब औपचारिकीकरण नहीं है. चाय की दुकान पर यूपीआई से पैसे देने का मतलब यह नहीं कि वह दुकानदार कहीं पंजीकृत है. देश के 7 करोड़ 20 लाख उद्यमों में से 90% अभी भी अपंजीकृत हैं. श्रमिक के नज़रिए से औपचारिकीकरण का मतलब है सामाजिक बीमा, पेंशन, मातृत्व लाभ, मृत्यु-अपंगता बीमा. भारत के 61 करोड़ के कार्यबल में से 90% इनसे वंचित हैं जैसे 10 साल पहले थे, वैसे ही आज भी हैं.
चीन से तुलना — हम कहाँ चूके?
मेहरोत्रा चीन की सफलता की दो बुनियादी वजहें बताते हैं.
पहली — जब 1980 में चीन ने आर्थिक सुधारों की शुरुआत की, तब उसके पास बेहतर मानव पूँजी थी. उसने स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण में भारत से काफ़ी पहले निवेश कर दिया था. जब विकास हुआ तो लोग उसका लाभ उठाने के लिए तैयार थे.
दूसरी — चीन की वृद्धि निर्यात-उन्मुख, श्रम-प्रधान विनिर्माण पर आधारित थी. इसने करोड़ों लोगों को सीधे रोज़गार दिया. भारत ने श्रम-प्रधान विनिर्माण की उपेक्षा की और पूँजी-प्रधान क्षेत्रों पर दाँव लगाया — नतीजा सबके सामने है.
समाधान — बड़ा लक्ष्य, बड़ी ज़िम्मेदारी
मेहरोत्रा कहते हैं कि “विकसित भारत 2047” का लक्ष्य तभी हासिल हो सकता है जब देश की औसत जीडीपी विकास दर 8 प्रतिशत सालाना के आसपास बनी रहे और यह गति लंबे समय तक कायम रहे. उनके अनुसार इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए अगले दशक में लगभग 9 प्रतिशत, उसके बाद 8 प्रतिशत और फिर 7 प्रतिशत की न्यूनतम वृद्धि ज़रूरी होगी.
लेकिन वर्तमान स्थिति में रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (भारतीय रिज़र्व बैंक) इस साल लगभग 6.6 प्रतिशत विकास दर का अनुमान लगा रहा है. वहीं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड), विश्व बैंक (वर्ल्ड बैंक) और आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) जैसे संस्थान भी 2030 तक भारत की विकास दर को 6.5 प्रतिशत से ऊपर जाते नहीं देख रहे.
इसका सीधा अर्थ यह है कि अगर मौजूदा रफ्तार जारी रही तो रोजगार सृजन की गति धीमी रहेगी, कृषि में फंसा श्रम बल वहीं अटका रहेगा, युवाओं की उम्मीदें पूरी नहीं होंगी और अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे एक के आकार की (K-shaped) संरचना में बंटती जाएगी — जहाँ ऊपर का छोटा वर्ग तेज़ी से आगे बढ़ेगा और नीचे का बड़ा हिस्सा ठहराव में रहेगा.
आख़िरी बात
प्रोफ़ेसर मेहरोत्रा की किताब और यह विश्लेषण एक असहज लेकिन महत्वपूर्ण सवाल उठाता है — आंकड़े अपने आप में गलत नहीं होते, लेकिन उन्हें कैसे पेश किया जाता है, यह पूरी कहानी बदल सकता है.
जब तक सरकार जीडीपी की गणना और रोजगार के वास्तविक स्वरूप को अधिक पारदर्शी नहीं बनाती, जब तक एमएसएमई और श्रम-प्रधान विनिर्माण को नीतिगत प्राथमिकता नहीं मिलती, और जब तक महिलाओं की श्रम भागीदारी को वास्तविक और सुरक्षित रोजगार से नहीं जोड़ा जाता, तब तक “विकसित भारत” एक लक्ष्य से ज़्यादा एक नारा ही बना रहेगा.
यह रिपोर्ट वैल्यू फॉर मनी के यूट्यूब चैनल पर प्रसारित इंटरव्यू पर आधारित है. प्रोफ़ेसर संतोष मेहरोत्रा भारत सरकार के योजना आयोग के तहत रोजगार शोध संस्थान के प्रमुख रह चुके हैं और यूनिसेफ में वरिष्ठ सलाहकार रहे हैं. उनकी किताब इंडिया आउट ऑफ वर्क अभी उपलब्ध है.
राकेश कायस्थ | मोदी सरकार का ‘गुप्त’ रोग
हिंदी के लोकप्रिय उपन्यास राग दरबारी में वैद्यजी हुआ करते थे. वैद्यजी के पास दो तरह के रोगी थे. प्रकट रोगी और गुप्त रोगी. वैद्यजी प्रकट रोग का इलाज प्रकट तरीके से करते थे और गुप्त रोग का इलाज गुप्त तरीके से.
केंद्र सरकार का भी यही हाल है. प्रकट रोग इस्लामोफोबिया है, जिसका इलाज मुल्ला टाइट परियोजना के ज़रिये चल रहा है. प्रकट रोग चुनाव में बीजेपी को हराने की ‘साजिश’ करने वाले विपक्षी नेता हैं, जिनका इलाज ईडी और सीबीआई और अदालतें कर रही हैं.
देश की आर्थिक बदहाली गुप्त रोग है. ये मर्ज गंभीर है और इलाज गुप-चुप तरीके से चल रहा है लेकिन हालत में कोई सुधार नहीं है. ये एक दिलचस्प तथ्य है कि अपने छोटे से छोटे काम का ढिंढोरा पीटने वाली केंद्र सरकार ने पिछले डेढ़ साल में देश की अर्थव्यस्था को पटरी पर लाने के कई गंभीर प्रयास किये हैं लेकिन उनका ढोल नहीं पीटा, जानते हैं क्यों? दरअसल सरकार को खुद भी इस बात का भरोसा नहीं था कि उसकी कोशिशें दम तोड़ती अर्थव्यस्था को पुनर्जीवित कर पाएंगी.
नये वित्त वर्ष की पहली तिमाही में देश की प्रमुख कंपनियों के वित्तीय नतीजे आपकी स्क्रीन पर हैं. इस तिमाही में कुछ सुधार के बावजूद अब भी ज्यादातर प्रमुख कंपनियां बिक्री और लाभ में संतोषजनक सुधार नहीं दिखा पा रही हैं. नतीजों में गिरावट का सिलसिला करीब दो साल पहले यानी सितंबर 2024 की तिमाही से शुरू हुआ था.
फाइव ट्रिलियन इकॉनमी का शिगूफा छोड़ने और विकसित भारत का ढोल पीटने वाली सरकार ये अच्छी तरह जानती थी कि इकॉनमी की असली हालत क्या है. आम आदमी की जेब से पैसे निकालने में माहिर सरकार ने कलेजे पर पत्थर रखकर पिछले साल इनकम टैक्स में बड़ी कटौती का एलान किया लेकिन इसका देश की आर्थिक सेहत पर कोई खास असर नहीं हुआ.
उसके बाद सरकार ने जीएसटी की दरों में कटौती की ताकि बाज़ार में मांग लौटाई जा सके लेकिन जहां बेरोजगारी अपने उच्चतम स्तर पर हो वहां डिमांड किस तरह वापस लौटे? जीएसटी कटौती का आइडिया भी फुस्स हो गया. इनकम टैक्स और जीएसटी कटौती से सरकारी खजाने का जो नुकसान हुआ उसमें अगर चुनाव जीतने के लिए तरह-तरह की स्कीमों के ज़रिये बांटी जाने वाली खरबों की सब्सिडी को जोड़ लिया जाये तो देश की अर्थव्यस्था इस समय बारूद के ढेर पर बैठी है.
कोविड के समय शुरू की गई मुफ्त अनाज योजना अब तक जारी है और इस पर हर साल लगभग 2 लाख करोड़ रुपये खर्च होते हैं. हर राज्य के चुनाव से पहले बांटी जाने वाली कैश सब्सिडी अलग है. दूसरी तरफ आंकड़े बता रहे हैं कि साक्षरों या उच्च शिक्षित लोगों में बेरोजगारी की दर सबसे ज्यादा है. इसका सीधा मतलब ये है कि उच्च गुणवत्ता वाली ऐसी नौकरियां देश में नहीं के बराबर हैं, जो किसी परिवार की माली हालत बदल दें.
डॉलर आसमान पर है और रुपया जमीन सूंघ रहा है. इंपोर्ट बिल खजाना लगातार खाली कर रहा है. पेट्रोल, डीजल और गैस की आसमान छूती कीमतों की वजह से करोड़ों घरों में दो वक्त चूल्हा जल पाना मुश्किल होता जा रहा है. विदेशी निवेशक शेयर बेचकर भारत से भाग रहे हैं और घरेलू कंपनियां कोई नया निवेश नहीं कर रही हैं.
इन सबके बीच गोदी मीडिया नेहरू को परास्त कर देने पर अपनी जंघा पीट रहा है और गुप्त रोग के इलाज में विफल वैद्यजी देश का ध्यान भटकाने के लिए नये तमाशों के आविष्कार पर मौलिक चिंतन कर रहे हैं.
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पहले 2022, फिर 2025, अब 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य भी पूरा नहीं कर पाई मोदी सरकार
‘द वायर’ के मुताबिक, भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का केंद्र सरकार का लक्ष्य एक बार फिर तय समयसीमा से चूक गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार 2018 में इस लक्ष्य का ऐलान किया था और इसके लिए 2022 की समयसीमा तय की गई थी.
20 सितंबर 2018 को नई दिल्ली में इंडिया इंटरनेशनल कन्वेंशन एंड एक्सपो सेंटर की आधारशिला रखने के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को जल्द ही 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा था. लेकिन 2022 तक यह लक्ष्य हासिल नहीं हो सका.
इसके बाद सरकार ने नई समयसीमा वित्त वर्ष 2024-25 तय की. लेकिन वित्त वर्ष 2025-26 के लिए जारी सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के आंकड़े बताते हैं कि यह लक्ष्य भी पूरा नहीं हुआ है.
मौजूदा आंकड़ों के अनुसार भारत की जीडीपी करीब 346.4 लाख करोड़ रुपये है, जो लगभग 3.6 ट्रिलियन डॉलर के बराबर है. लक्ष्य से काफी पीछे रहने के बाद प्रधानमंत्री मोदी और उनके मंत्रियों ने सार्वजनिक मंचों और सरकारी बयानों में 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य का जिक्र करना लगभग बंद कर दिया है.
प्रधानमंत्री मोदी लंबे समय तक यह कहते रहे हैं कि भारत जल्द ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा. सरकार के कुछ अधिकारियों ने तो यह दावा भी किया था कि भारत यह उपलब्धि हासिल कर चुका है.
लेकिन आधिकारिक आर्थिक आंकड़ों के अनुसार भारत अभी दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. इसी तरह भारतीय शेयर बाजार का आकार भी हाल के हफ्तों में गिरकर दुनिया में छठे स्थान पर पहुंच गया है. इससे संकेत मिलता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की तेजी से ऊपर जाने की उम्मीदों को झटका लगा है.
भारत की आर्थिक स्थिति की तुलना जब पिछली यूपीए सरकार के कार्यकाल से की जाती है तो तस्वीर और स्पष्ट होती है. आंकड़ों के अनुसार 2004 से 2014 के बीच यूपीए सरकार के दौरान डॉलर के लिहाज से भारत की जीडीपी में सालाना औसत वृद्धि दर यानी सीएजीआर11 प्रतिशत से अधिक रही थी.
वहीं प्रधानमंत्री मोदी के 12 साल के कार्यकाल में डॉलर के लिहाज से जीडीपी वृद्धि दर करीब 6 प्रतिशत के आसपास रही है. इससे पता चलता है कि वैश्विक मुद्रा में मापने पर भारत की आर्थिक रफ्तार धीमी हुई है.
इस धीमी वृद्धि का एक बड़ा कारण भारतीय रुपये की लगातार कमजोर होती स्थिति भी है. पिछले एक दशक में रुपये के मूल्य में गिरावट ने डॉलर के मुकाबले भारत की अर्थव्यवस्था के आकार को प्रभावित किया है.
आलोचकों का कहना है कि मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां विनिर्माण क्षेत्र के निर्यात को पर्याप्त गति नहीं दे पाईं, आधुनिक तकनीकों जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में पर्याप्त निवेश नहीं हो पाया, ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम नहीं हुई और स्थायी विदेशी निवेश आकर्षित करने में भी अपेक्षित सफलता नहीं मिली.
रुपये के कमजोर होने के कारण डॉलर में मापी जाने वाली भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार सीमित रहा, जिससे 5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचना मुश्किल हुआ.
किसी अर्थव्यवस्था की वृद्धि को केवल घरेलू मुद्रा में मापना कई बार वास्तविक स्थिति को छिपा सकता है. रुपये में जीडीपी बढ़ने का कारण महंगाई और घरेलू खर्च भी हो सकता है, लेकिन वैश्विक स्तर पर किसी अर्थव्यवस्था की ताकत उसकी डॉलर में कीमत और अंतरराष्ट्रीय खरीद क्षमता से तय होती है.
5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य को लेकर सरकार की भाषा में आया बदलाव भी इस बदलाव को दिखाता है. कई वर्षों तक यह लक्ष्य आर्थिक नीति और राजनीतिक संदेश का प्रमुख हिस्सा रहा था. लेकिन अब सरकार के बयान अधिकतर 2047 तक विकसित भारत जैसे लंबे समय के लक्ष्यों पर केंद्रित हैं.
इस तरह 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य, जो कभी मोदी सरकार की आर्थिक महत्वाकांक्षा का प्रमुख प्रतीक था, अब सार्वजनिक चर्चा से लगभग गायब हो चुका है.
कॉकरोच जनता पार्टी के लिए बढ़ता युवा समर्थन भारत के लिए क्या संकेत देता है
“कायापलट” शब्द का एक अर्थ है किसी चीज की शक्ल, चरित्र या परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आ जाना. यही बदलाव उस पार्टी के साथ हुआ है, जिसकी चर्चा आज भारत में सबसे ज्यादा हो रही है — “कॉकरोच जनता पार्टी”.
‘डाउन टू अर्थ’ में रिचर्ड महापात्र लिखते हैं कि एक समय तक केवल व्यंग्य और सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया के रूप में मौजूद यह नाम अचानक जेनरेशन ज़ी यानी युवा पीढ़ी के लिए एक नारे में बदल गया. यह नारा किसी राजनीतिक दल के समर्थन से ज्यादा उस बेचैनी और निराशा को व्यक्त करने लगा, जो भारत के युवाओं के एक बड़े वर्ग में दिखाई दे रही है.
इसने अपनी पहचान, भूमिका और प्रभाव तीनों बदल लिए हैं. देशभर में युवा अब विभिन्न प्रवेश और भर्ती परीक्षाओं में बार-बार हो रही पेपर लीक की घटनाओं के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं. हाल के वर्षों में भारत ने युवाओं के ऐसे बड़े विरोध प्रदर्शन कम ही देखे हैं.
कॉकरोच जनता पार्टी अब केवल ऑनलाइन दुनिया तक सीमित नहीं रही. इसके संस्थापक 30 वर्षीय अभिजीत दिपके, जो बोस्टन यूनिवर्सिटी से पढ़े हैं, ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान किया. जंतर-मंतर देश में असहमति और विरोध दर्ज कराने के लिए तय प्रमुख स्थानों में से एक है.
दिपके ने एक अखबार से बातचीत में कहा था, “भारत के युवाओं में यह भावना है कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था उनकी परवाह नहीं करती, चाहे वह सरकार में बैठी पार्टी हो या विपक्ष.”
6 जून 2026 को हुए इस प्रदर्शन को लेकर सोशल मीडिया पर जिस तरह की चर्चा हुई, उसने इसे किसी बड़े राजनीतिक कार्यक्रम जैसी लोकप्रियता दी. इसमें दुनिया के कई हिस्सों में हाल के वर्षों में हुए जेनरेशन ज़ी के विरोध प्रदर्शनों जैसी ऊर्जा दिखाई दी. लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा सवाल भी खड़ा हुआ. क्या यह केवल एक पल है या एक आंदोलन?
जेनरेशन ज़ी की पहचान कई बातों से जुड़ी है, लेकिन इनमें से एक सबसे प्रमुख विशेषता है मौजूदा व्यवस्था के प्रति असंतोष और सवाल उठाने की प्रवृत्ति.
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में किसी न किसी समय युवा सड़कों पर दिखाई देते हैं. कभी शासन व्यवस्था में बदलाव की मांग को लेकर, कभी महंगाई और जीवन-यापन की बढ़ती लागत के खिलाफ, तो कभी जलवायु संकट को लेकर.
जेनरेशन ज़ी में करीब 2.8 अरब लोग शामिल हैं, जो दुनिया की लगभग एक तिहाई आबादी है. यह पीढ़ी शासन व्यवस्थाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती पेश करने वाली और अपनी मांगों को सबसे मुखर तरीके से रखने वाली पीढ़ियों में से एक बन गई है.
पिछले कुछ दशकों में युवाओं के आंदोलनों ने कई बार सरकारों, कानूनों और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में बदलाव किए हैं. इतिहास बताता है कि जिन आंदोलनों में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी होती है, वे अक्सर बदलाव का कारण बनते हैं. वहीं छोटे और सीमित अभियान केवल कुछ समय की हलचल बनकर रह जाते हैं.
दुनिया के कई देशों में युवा आंदोलनों ने राजनीतिक व्यवस्थाओं को बदलने में भूमिका निभाई है. कई जगहों पर सत्तावादी सरकारों को लोकतांत्रिक बदलावों के लिए मजबूर होना पड़ा.
यही कारण है कि सत्ता में मौजूद व्यवस्थाएं अक्सर युवाओं के बड़े आंदोलनों को लेकर चिंतित रहती हैं. कई बार शांतिपूर्ण युवा आंदोलनों पर भी सरकारों की ओर से कठोर प्रतिक्रिया देखने को मिलती है.
हाल के वर्षों में जेनरेशन ज़ी के आंदोलनों में लोकतंत्र को लेकर बढ़ती निराशा दिखाई देती है. युवाओं का आरोप रहता है कि लोकतांत्रिक संस्थाएं उनकी जरूरतों और समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रही हैं.
अधिकतर आंदोलन किसी एक तात्कालिक संकट से शुरू होते हैं, लेकिन धीरे-धीरे वे बड़े बदलाव की मांग में बदल जाते हैं. इन आंदोलनों का मूल संदेश यही होता है कि सरकारों और संस्थाओं को युवाओं की आवाज सुननी होगी और उनके सवालों पर कार्रवाई करनी होगी.
कुछ दुर्लभ मामलों में ऐसे युवा आंदोलन संगठित राजनीतिक संस्थाओं या पार्टियों में भी बदल गए हैं.
कॉकरोच जनता पार्टी का मामला भी इसी संदर्भ में देखने की जरूरत है, हालांकि यह आंदोलन आज के डिजिटल दौर में एक अलग सामाजिक और तकनीकी माहौल में उभर रहा है.
कई अध्ययनों से पता चलता है कि आज के युवा आंदोलन पारंपरिक राजनीतिक दलों से अलग तरीके से काम करते हैं. वे सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल तेजी से समर्थन जुटाने और संदेश फैलाने के लिए करते हैं.
2000 से 2017 के बीच 128 देशों के करीब 10 लाख लोगों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि 40 साल से कम उम्र के लोग अक्सर पारंपरिक राजनीतिक गतिविधियों के बजाय अनौपचारिक राजनीतिक भागीदारी को प्राथमिकता देते हैं.
भारत में भी यही तस्वीर दिखाई दे रही है. कई युवा आंदोलन किसी स्थापित राजनीतिक दल के नेतृत्व में नहीं चल रहे हैं, बल्कि सोशल मीडिया और नागरिक भागीदारी के जरिए आकार ले रहे हैं.
भारत लंबे समय बाद ऐसे युवा आंदोलनों को देख रहा है, जिनमें जेनरेशन ज़ी की बड़ी भूमिका है. कॉकरोच जनता पार्टी का भविष्य क्या होगा, यह अभी तय नहीं है. यह केवल एक क्षणिक प्रतिक्रिया साबित होगी या एक बड़े सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन में बदलेगी, इसका जवाब समय ही देगा.
दशकों तक राज्य के साथ खड़े रहे जम्मू-कश्मीर के आदिवासी अब बेदखली, तोड़फोड़ और असुरक्षा का सामना कर रहे हैं
जम्मू-कश्मीर के गुज्जर-बकरवाल समुदाय के लिए जम्मू के सिदरा बांधी इलाके में 28 घरों का गिराया जाना केवल जमीन विवाद नहीं है. समुदाय के नेताओं का कहना है कि यह घटना उनकी जमीन, चरागाहों और सदियों पुरानी खानाबदोश जीवन शैली पर बढ़ते संकट का हिस्सा है.
‘आर्टिकल 14’ की रिपोर्ट के मुताबिक, 19 मई 2026 को सिदरा में पुलिस और वन विभाग की कार्रवाई के बाद 28 घरों को तोड़ दिया गया. स्थानीय लोगों का दावा है कि इनमें से कई मकान 35 साल से अधिक पुराने थे और वे निजी जमीन या सामुदायिक चरागाहों पर बने थे. वहीं वन विभाग का कहना है कि ये निर्माण वन भूमि पर अवैध कब्जे थे.
67 वर्षीय अशरफ अली कथाना ने बताया कि जब अधिकारी उनके घर पहुंचे, तब वह सुबह की नमाज पढ़ रहे थे. उनके अनुसार, उन्हें और उनकी पत्नी को धार्मिक प्रक्रिया पूरी करने का भी समय नहीं दिया गया.
“पुलिस और वन विभाग के अधिकारियों ने मुझे घर से बाहर निकाल दिया. मेरी पत्नी भी नमाज पढ़ रही थीं और कुरान पढ़ रही थीं, लेकिन उन्हें भी उसे बंद करने का मौका नहीं दिया गया.” कथाना ने कहा.
स्थानीय निवासियों के अनुसार, कुछ ही घंटों में 28 घर मलबे में बदल गए और करीब 1500 लोग अस्थायी तंबुओं में रहने को मजबूर हो गए.
एक डरावना नकारात्मक संदेश
सिदरा की कार्रवाई के बाद गुज्जर-बकरवाल समुदाय में यह सवाल उठ रहा है कि वन अधिकार कानून, 2006 के तहत उनके अधिकारों को क्यों नहीं माना जा रहा.
समुदाय का कहना है कि वे लंबे समय से जंगलों और चरागाहों पर निर्भर रहे हैं और वन अधिकार कानून उन्हें ऐसे इलाकों में रहने और आजीविका का अधिकार देता है.
गुज्जर-बकरवाल जम्मू-कश्मीर की बड़ी अनुसूचित जनजाति आबादी में शामिल हैं. करीब 20 लाख की आबादी वाला यह समुदाय क्षेत्र की तीसरी सबसे बड़ी सामाजिक इकाइयों में गिना जाता है.
पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी कार्रवाई पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि भारत के साथ लंबे समय तक खड़े रहे गुज्जर-बकरवाल समुदाय के नेताओं के खिलाफ कार्रवाई एक गलत संदेश भेजती है.
तोड़फोड़ और भाजपा की भूमिका
सिदरा के निवासियों का कहना है कि वे अवैध कब्जाधारी नहीं हैं. उनका दावा है कि वे 1990 के बाद कश्मीर से विस्थापित होकर यहां बसे और उनके पास बिजली बिल, राशन कार्ड तथा जमीन से जुड़े दस्तावेज मौजूद हैं.
स्थानीय लोगों ने भारतीय जनता पार्टी के विधायक विक्रम रंधावा पर कार्रवाई का माहौल बनाने का आरोप लगाया है. उनका कहना है कि मंदिर जाने के रास्ते को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद यह कार्रवाई हुई.
रंधावा ने आरोपों से इनकार किया है. उनका कहना है कि कार्रवाई केवल वन भूमि पर बने अवैध निर्माणों के खिलाफ हुई और इसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की जा रही है.
लगातार सीमित होता जा रहा जीवन
गुज्जर-बकरवाल समुदाय पीढ़ियों से पशुपालन और मौसमी प्रवास पर निर्भर रहा है. गर्मियों में वे जम्मू के मैदानी इलाकों से कश्मीर के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों की ओर जाते हैं और सर्दियों में वापस लौटते हैं.
लेकिन समुदाय के लोगों का कहना है कि अब उनके पारंपरिक रास्ते सिकुड़ रहे हैं. वन विभाग की बाड़, चरागाहों पर कब्जे और नए निर्माणों के कारण उनकी आवाजाही मुश्किल हो रही है.
सांबा के फैसल रजा बोडका ने कहा कि बकरवाल समुदाय जंगलों के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
“हमारे पशुओं से मिलने वाली खाद जंगलों की उर्वरता बढ़ाती है. इसके बावजूद हमें बिना पर्याप्त प्रक्रिया के बेदखल किया जा रहा है.”
उन्होंने सामाजिक भेदभाव का भी आरोप लगाया और कहा कि समुदाय को शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.
घटते प्रवास मार्ग
गुज्जर-बकरवाल परिवार हर साल करीब 600 किलोमीटर की यात्रा करते हैं. लेकिन अब पुराने प्रवास मार्गों के बंद होने से उनकी मुश्किलें बढ़ गई हैं.
समुदाय के अनुसार, जंगलों में बढ़ते प्रतिबंध, चरागाहों का निजीकरण और सुरक्षा कारणों से रास्ते प्रभावित हुए हैं. कई परिवार अब पशुओं को ट्रकों में ले जाने या खतरनाक राजमार्गों से गुजरने को मजबूर हैं.
तालिब हुसैन ने कहा कि प्रवास के दौरान मौसम, सड़क दुर्घटनाओं और वन विभाग की पाबंदियों के कारण नुकसान बढ़ रहा है.
बेदखली और जमीन की असुरक्षा
गुज्जर-बकरवाल नेताओं का कहना है कि सिदरा की घटना पहली नहीं है.
2020 में पहलगाम के पास लिदरू इलाके में वन विभाग ने जमीन खाली कराई थी. 2021 में शोपियां जिले में बेदखली कार्रवाई के दौरान विरोध हुआ था. 2025 में गांदरबल में भी वन विभाग की कार्रवाई के खिलाफ आदिवासी समुदाय ने प्रदर्शन किया था.
समुदाय के नेताओं के अनुसार, सबसे बड़ी समस्या सुरक्षित जमीन की कमी है.
गुज्जर-बकरवाल स्टूडेंट्स अलायंस के प्रवक्ता अमीर चौधरी ने कहा, “जहां भी हम बसते हैं, वहां हमें बेदखली का खतरा बना रहता है.”
वन अधिकार का अधूरा वादा
समुदाय के कई नेता इन विवादों की वजह वन अधिकार कानून, 2006 के अधूरे क्रियान्वयन को मानते हैं.
आदिवासी शोधकर्ता जावेद राही का कहना है कि गुज्जर-बकरवाल परिवारों को केवल अतिक्रमणकारी मानना सही नहीं है, क्योंकि वे जंगलों पर निर्भर आदिवासी समुदाय हैं.
उनके अनुसार, किसी भी बेदखली से पहले समुदाय के अधिकारों का निर्धारण जरूरी है.
कम गिनती, ज्यादा नुकसान
गुज्जर-बकरवाल समुदाय को यह चिंता भी है कि उनकी वास्तविक आबादी जनगणना में दर्ज नहीं हो पाएगी, क्योंकि कई परिवार उस समय ऊंचे इलाकों में पशुओं के साथ प्रवास पर होते हैं.
समुदाय के नेताओं का कहना है कि गलत आंकड़े सरकारी योजनाओं और संसाधनों के वितरण को प्रभावित कर सकते हैं.
शिक्षा भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. समुदाय का कहना है कि खानाबदोश जीवन शैली के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और मोबाइल स्कूल जैसी योजनाएं जमीन पर प्रभावी नहीं हैं.
2024 में पहाड़ी समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने के बाद गुज्जर-बकरवाल संगठनों ने आरक्षण और सरकारी योजनाओं में हिस्सेदारी को लेकर चिंता जताई है.
जम्मू-कश्मीर के गुज्जर-बकरवाल समुदाय का संघर्ष अब केवल कुछ घरों के टूटने तक सीमित नहीं है. यह उनके पारंपरिक जीवन, जमीन के अधिकार और भविष्य की सुरक्षा से जुड़ा बड़ा सवाल बन गया है.
भारतीय प्रकाशक ने जो सैको की किताब क्यों छोड़ी?
जो सैको की किताब द वंस एंड फ्यूचर रायट मुज़फ़्फ़रनगर (उत्तर प्रदेश) में 2013 की गर्मियों के अंत में भड़के हिंदू-मुस्लिम दंगों का विस्तृत ग्राफ़िक वृत्तांत है. किताब में सैको न सिर्फ़ घटनाक्रम को दर्ज करते हैं, बल्कि यह भी पूछते हैं कि ऐसे दंगे होते क्यों हैं. उनका निष्कर्ष है कि बीजेपी जैसी हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा वाली पार्टियों को चुनाव से पहले इस हिंसा से राजनीतिक फ़ायदा था. इक्वेटर ने इस पर लेख लिखा हैै और ग्राफिक नॉवेल के कई चित्र भी छापे हैं.
भारत में किताब का वितरण पेंगुइन रैंडम हाउस करने वाला था, लेकिन सैको को कंपनी की क़ानूनी टीम का पाँच पन्नों का आपत्ति-पत्र मिला. कुछ आपत्तियाँ तथ्य-जाँच से जुड़ी थीं, लेकिन अधिकांश इस चिंता से प्रेरित थीं कि नेताओं और हिंसा के बीच के संबंध को मानहानिकारक माना जा सकता है, या पाठ को “भड़काऊ” या “धार्मिक भावनाएँ आहत करने वाला” समझा जा सकता है.
एक जगह जहाँ एक दक्षिणपंथी हिंदू नेता सैको से कहता है कि मुसलमानों की आबादी “सुअरों की तरह” बढ़ रही है — वहाँ क़ानूनी दस्तावेज़ की सलाह थी कि “सुअर” शब्द हटाकर बस इतना लिखें कि “मुसलमान तेज़ी से बढ़ रहे हैं.”
पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के एक अधिकारी का कहना है कि इन “रेड फ़्लैग्स” पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई, इसलिए किताब के वितरण से हाथ खींच लिया गया. लेख के साथ किताब का एक अंश भी छपा है, जिसमें नागला मंडौर गाँव की घटना है — जहाँ जाट नेताओं ने एक पंचायत बुलाई जिसमें हज़ारों लोग इकट्ठा हुए और अपने हाथों न्याय करने की माँग की. यह वह दौर था जब एक मुस्लिम युवक की हत्या के बाद बदले में दो जाट युवक भी मार दिए गए थे.
वीवीपी शर्मा | ₹370 की बिरयानी: असली कहानी तालियाँ क्यों थीं
₹370 की बिरयानी के विवाद ने वह सब कुछ पैदा किया है जिसे आधुनिक भारत औद्योगिक पैमाने पर बनाने में माहिर है: आक्रोश (आउटरेज), हैशटैग, माफी, नौकरी का जाना, इन्फ्लुएंसर्स की टिप्पणियाँ और सोशल मीडिया का अंतहीन शोर. फिर भी, इस सारे चिल्लाने-चिल्लाने के नीचे एक कहीं अधिक असहज करने वाला सवाल छिपा है. आखिरकार इतने सारे लोगों को वह बात पहली बार में इतनी मजेदार क्यों लगी?
यह विवाद कॉमेडियन प्रणीत मोरे के शो के दौरान ‘क्राउडवर्क’ (दर्शकों से बातचीत) के एक हिस्से से शुरू हुआ. एक युवक ने अपनी एक ‘डेट’ का जिक्र किया. उसने एक चिकन बिरयानी के पैसे चुकाए थे. बिल करीब ₹370 आया था. बाद में, जब महिला ने उसे घर छोड़ने के लिए कहा, तो उसने टिप्पणी की कि ₹370 खर्च करने के बाद, वह स्वाभाविक रूप से उस रकम की वसूली करेगा. इसका निहितार्थ बिल्कुल साफ था. दर्शक हँसे. कॉमेडियन भी हँसा और आगे बढ़ गया. इस क्लिप को ऑनलाइन अपलोड कर दिया गया. जल्द ही, यह सोशल मीडिया पर फैल गई.
इसके बाद तीखी प्रतिक्रिया हुई. उस दर्शक ने, जिसकी पहचान बाद में हिमांशु जांगड़ा के रूप में हुई, माफी मांगी. उसके नियोक्ता (कंपनी) ने उसकी नौकरी खत्म कर दी. प्रणीत मोरे ने उस टिप्पणी पर आपत्ति न जताने के लिए माफी मांगी और स्वीकार किया कि उन्हें स्थिति को अलग तरह से संभालना चाहिए था. चालाकी दिखाते हुए उन्होंने कुछ समय के लिए अपनी सोशल मीडिया की दुकान बंद कर दी. उस दिन एक घटिया संस्कृति ने कॉमेडियन, उस दर्शक और वहां मौजूद अन्य दर्शकों को एक साथ बांध दिया था. इन्फ्लुएंसर्स ने इस क्लिप की निंदा की. आखिरकार, वह मूल वीडियो (इंटरनेट से) गायब हो गया.
लेकिन यह घटना खत्म होने का नाम नहीं ले रही है क्योंकि यह कभी बिरयानी के बारे में थी ही नहीं.
यह रकम अपने आप में बेहद मामूली है. कोई भी किसी आलीशान छुट्टी, महंगे तोहफे या किसी बड़े वित्तीय त्याग की बात नहीं कर रहा है. बिरयानी की एक प्लेट राष्ट्रीय बहस का आधार बन गई क्योंकि मुद्दा कभी पैसा था ही नहीं. मुद्दा तो मानसिकता थी.
वह युवक यह मानता हुआ लग रहा था कि किसी महिला पर पैसा खर्च करने से बदले में कुछ पाने का अधिकार (एंटाइटलमेंट) मिल जाता है. यह सोच न तो नई है और न ही दुर्लभ. यह उस संस्कृति में गहराई से समाई हुई है जो महिलाओं को स्वतंत्र व्यक्तियों के रूप में नहीं, बल्कि पुरुषों द्वारा नियंत्रित लेन-देन के भागीदारों के रूप में देखती आ रही है. इसके बाद वह ‘डेट’ दो इंसानों के बीच की बातचीत नहीं रह जाती. वह एक निवेश (इन्वेस्टमेंट) बन जाती है. महिला एक संपत्ति (एसेट) बन जाती है. सवाल अब यह नहीं रह जाता कि क्या दोनों के बीच आपसी आकर्षण या सहमति थी. सवाल यह बन जाता है कि क्या किए गए खर्च ने पर्याप्त रिटर्न (मुनाफा) दिया.
यह रोमांस नहीं है. यह प्रेमालाप के भेष में किया जा रहा अकाउंटिंग (बहीखाता) है.
मनोवैज्ञानिक ऐसी सोच को ‘लेन-देन संबंधी संज्ञान’ (ट्रांजैक्शनल कॉग्निशन) कहते हैं. कोई व्यक्ति एक काम करता है और मान लेता है कि उसे इनाम मिलना ही चाहिए. इस मामले में, एक वित्तीय खर्च को एक काल्पनिक अनुबंध (कॉन्टैक्ट) में बदल दिया गया. महिला का अपनी प्राथमिकताओं, सीमाओं और प्राथमिकताओं वाले एक व्यक्ति के रूप में अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है. वह एक ऐसी वस्तु बन जाती है जिसके इर्द-गिर्द हिसाब-किताब लगाया जाता है. मानवीय रिश्ते रसीदों और रीइंबर्समेंट (रकम की वापसी) तक सिमट कर रह जाते हैं.
हालाँकि, इस पूरे घटनाक्रम का सबसे परेशान करने वाला पहलू वह टिप्पणी खुद नहीं थी.
वह थी तालियाँ.
एक अपरिपक्व युवक द्वारा मूर्खतापूर्ण बयान देना कोई सामाजिक घटना नहीं है. लेकिन उस पर हंसते हुए लोगों से भरा एक कमरा जरूर एक सामाजिक घटना है. दर्शकों की प्रतिक्रिया भी उतनी ही जांच के दायरे में आनी चाहिए जितनी कि वह टिप्पणी जिसने इसे जन्म दिया. लोग आखिर किस बात पर हंस रहे थे? वहाँ कोई चतुराई भरी बात नहीं थी. कोई परिष्कृत व्यंग्य नहीं था. मानव व्यवहार को लेकर कोई अनोखी अंतर्दृष्टि नहीं थी. वह हास्य पूरी तरह से एक जाने-पहचाने पूर्वाग्रह पर निर्भर था: कि किसी महिला पर पैसा खर्च करने से उस पर हक बन जाता है.
लोग इसलिए हंसे क्योंकि वे इस विचार से परिचित थे.
यह बात हमें उस एक व्यक्ति के शब्दों से कहीं अधिक चिंतित करनी चाहिए.
समकालीन संस्कृति में हंसी को नैतिक रूप से तटस्थ (न्यूट्रल) मानने की प्रवृत्ति है. ऐसा नहीं है. हंसी अक्सर यह उजागर करती है कि एक समाज किसे स्वीकार करता है, किसे सहन करता है या चुपचाप किस पर विश्वास करता है. अगर कोई कमरा किसी महिला-विरोधी टिप्पणी पर हंसी से गूंज उठता है, तो सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बोलने वाले ने ऐसा क्यों कहा. सवाल यह है कि इतने सारे सुनने वालों को यह अपनी जैसी बात क्यों लगी.
कॉमेडियन की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. स्टैंड-अप कलाकार अक्सर क्राउडवर्क का बचाव यह कहकर करते हैं कि यह सहज (स्पॉन्टेनियस) होता है. एक हद तक यह सच भी है. दर्शक कुछ भी अनपेक्षित कह सकते हैं. लेकिन सहजता उसी पल खत्म हो गई जब उस क्लिप को अपलोड किया गया. उस स्तर पर, वह टिप्पणी अब कोई दुर्घटना नहीं रह गई थी. वह एक सचेत संपादकीय विकल्प (एडिटोरियल चॉइस) बन गई थी. किसी ने फुटेज देखी. किसी ने उस हिस्से को चुना. किसी ने तय किया कि यह शो का प्रतिनिधित्व करता है. किसी ने माना कि यह हजारों, शायद लाखों लोगों के साथ साझा करने लायक मनोरंजक है.
वह फैसला अपनी खुद की कहानी बयां करता है.
यह घटना भारतीय कॉमेडी की स्थिति पर असहज करने वाले सवाल खड़े करती है. आज कॉमेडी के नाम पर जो कुछ भी परोसा जा रहा है, उसमें से अधिकांश सोशल मीडिया कंटेंट प्रोडक्शन से ज्यादा कुछ नहीं है. हास्य, व्यंग्य, अश्लीलता, फूहड़पन और स्वांग में अंतर होता है. कॉमेडियनों की पिछली पीढ़ियाँ इन अंतरों को समझती थीं. समकालीन कलाकार अक्सर इन्हें मिलाकर एक ऐसा उत्पाद बना देते हैं जिसका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ ‘एंगेजमेंट’ (व्यूज और लाइक्स) बढ़ाना होता है.
व्यंग्य के लिए बुद्धि की आवश्यकता होती है. इसके लिए बारीकी से देखने की क्षमता चाहिए. इसके लिए समाज के भीतर के अंतर्विरोधों को उजागर करने की क्षमता की आवश्यकता होती है. यह हंसी के नीचे एक तरह की गंभीरता की मांग करता है. आज कॉमेडी सर्किट पर जिसका दबदबा बढ़ रहा है, वह कुछ और ही है. अश्लीलता को साहस समझ लिया जाता है. फूहड़पन को ईमानदारी मान लिया जाता है. सदमा (शॉक) देने को बुद्धिमानी मान लिया जाता है. चुटकुले का समझदारी भरा होना जरूरी नहीं है. उसका बस वायरल होना जरूरी है.
एल्गोरिदम आक्रोश को बढ़ावा देता है. कलाकार उसी के अनुसार खुद को ढाल लेते हैं.
कभी-कभी आश्चर्य होता है कि विचारशील हास्य की परंपरा का क्या हुआ. राजू श्रीवास्तव और जसपाल भट्टी एक अलग दौर के थे. उनकी कॉमेडी सूक्ष्म निरीक्षण से निकलती थी. आज का इकोसिस्टम ऐसे कलाकारों से भरा पड़ा है जिनकी मुख्य प्रतिभा विवाद को क्लिक्स (व्यूज) में बदलना लगती है. वे इसे कॉमेडी कहते हैं. लेकिन अक्सर, यह केवल ‘कंटेंट’ होता है.
₹370 वाली यह क्लिप एक व्यापक सामाजिक वास्तविकता से भी अलग नहीं है. भारत में महिलाओं ने उल्लेखनीय प्रगति की है. वे उन पेशों में प्रवेश कर रही हैं जिन पर कभी पुरुषों का एकाधिकार था. वे व्यवसायों, संस्थानों और सरकारों का नेतृत्व कर रही हैं. वे स्वतंत्र रूप से कमा रही हैं और अपने जीवन के बारे में खुद फैसले ले रही हैं. फिर भी आगे बढ़ने वाले हर कदम पर उन लोगों की ओर से प्रतिक्रिया देखने को मिलती है जो इस बदलाव से खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं.
यह प्रतिक्रिया हर जगह दिखाई देती है. सोशल मीडिया ऐसे वीडियो से पटा पड़ा है जो महिलाओं का मज़ाक उड़ाते हैं, उन्हें एक वस्तु की तरह पेश करते हैं या उन्हें खलनायक के रूप में दिखाते हैं. वर्चस्व, अपमान और नियंत्रण का जश्न मनाने वाली अनगिनत रील्स हैं. इन्फ्लुएंसर्स महिलाओं के प्रति अपनी कुंठा को ‘पुरुषत्व’ का नाम देकर परोसते हैं. पूरे के पूरे डिजिटल समुदाय इस विचार के इर्द-गिर्द बने हैं कि महिलाएँ चालाक जीव हैं जिन्हें अनुशासित, नियंत्रित या पराजित किया जाना चाहिए.
इसके साथ ही उत्पीड़न, हमले और हिंसा की कहानियाँ लगातार सुर्खियों में बनी रहती हैं. कोई भी पेशा इससे अछूता नहीं लगता. डॉक्टर, शिक्षक, नौकरशाह, राजनेता और पुलिस अधिकारी—सभी इस बढ़ते हुए शर्मनाक सिलसिले का हिस्सा बनते जा रहे हैं. समाज प्रगति की भाषा बोलता है, लेकिन अपने साथ उन पुरानी रूढ़िवादी सोच का बोझ ढो रहा है जिसे वह छोड़ना नहीं चाहता.
यह अंतर्विरोध बिल्कुल साफ है.
एक तरफ महिलाओं से कहा जाता है कि वे सशक्त हैं. दूसरी तरफ, उन पर लगातार नजर रखी जाती है, उन्हें नियंत्रित किया जाता है और आंका जाता है. महिलाओं के जीवन को विनियमित (रेगुलेट) करने की इच्छा सामाजिक कल्पना में कितनी गहराई से समाई हुई है, इसे देखने के लिए किसी को केवल खाप जैसी सोच के बने रहने को देखने की जरूरत है. महिलाएँ क्या पहनती हैं, कहाँ जाती हैं, किससे मिलती हैं और कैसे रहती हैं—ये सब उन लोगों के लिए सार्वजनिक चिंता का विषय बने हुए हैं जो अपने जीवन में इस तरह के हस्तक्षेप को कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे.
₹370 की बिरयानी वाली टिप्पणी कहीं शून्य से पैदा नहीं हुई थी. यह इसी माहौल से पैदा हुई थी.
कुछ लोगों ने तर्क दिया है कि उस युवक ने माफी मांग ली है और इसलिए उसे माफ कर दिया जाना चाहिए. शायद. इंसान गलतियाँ करते हैं. लोग सीख सकते हैं. लोग बदल सकते हैं. इस ढोंग में कोई भलाई नहीं है कि एक मूर्खतापूर्ण टिप्पणी पूरे जीवन को परिभाषित करे.
फिर भी जवाबदेही के लिए ईमानदारी की आवश्यकता होती है.
समस्या गुरुग्राम के एक युवक की नहीं है. समस्या उस संस्कृति की है जिसने उसे पैदा किया, उसके साथ हंसी और कुछ देर के लिए उसका जश्न मनाया. समस्या उस इकोसिस्टम की है जो महिला-द्वेष (मिसोजिनी) को मनोरंजन के रूप में देखता है और फिर आलोचना होने पर हैरान होने का नाटक करता है. समस्या उस समाज की है जो अधिकार की भावना (एंटाइटलमेंट) को पुरुषत्व और वस्तुकरण (ऑब्जेक्टिफिकेशन) को हास्य समझने की भूल करता आ रहा है.
₹370 की बिरयानी की एक प्लेट को पूरी तरह से भुला दिया जाना चाहिए था. इसके बजाय, इसने खुद भोजन से कहीं अधिक कीमती चीज़ को उजागर कर दिया. इसने एक मानसिकता को बेनकाब कर दिया.
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल का जवाब अभी भी नहीं मिला है.
यह हमारे बारे में क्या कहता है कि इतने सारे लोग इससे पहले कि वे यह समझ पाते कि उन्हें इस बात पर आहत होना चाहिए था, खुलकर हंस पड़े?
(लेखक वीवीपी शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं)
सिचुएशन रूम में निपल्स की चर्चा
जब अमेरिका के सबसे ताकतवर कमरे में बैठे थे ट्रंप के सबसे ताकतवर लोग, और बात हो रही थी एपस्टीन की
न्यूयॉर्क टाइम्स, मैगी हैबर्मन और जोनाथन स्वान, 10 जून 2026. यह रिपोर्ट उनकी आगामी किताब “रेजीम चेंज: इनसाइड द इम्पीरियल प्रेसिडेंसी ऑफ़ डोनाल्ड ट्रंप” की रिपोर्टिंग पर आधारित है.
दुनिया में एक कमरा है जहाँ अमेरिका के राष्ट्रपति ओसामा बिन लादेन को मारने का फ़ैसला करते हैं. जहाँ परमाणु बटन की बात होती है. जहाँ जंग शुरू होती है और जंग ख़त्म होती है. उसे कहते हैं — व्हाइट हाउस सिचुएशन रूम.
17 जुलाई, 2025 की शाम छह बजे, उसी कमरे में अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस बैठे थे. उनके साथ थे, चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ सूज़ी वाइल्स, व्हाइट हाउस काउंसेल डेविड वॉरिंगटन, प्रेस सेक्रेटरी कैरोलीन लेविट, डेप्युटी अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लैंच, और कई दूसरे बड़े नाम. स्पीकरफ़ोन पर अटॉर्नी जनरल पैम बोंडी और एफ़बीआई डायरेक्टर काश पटेल.
और जो मुद्दा था?
वो था जेफ़री एपस्टीन.
वही एपस्टीन जो पीडोफ़ाइल था, यौन तस्कर था, और जो 2019 में जेल में “ख़ुदकुशी” कर मरा. जिसके बारे में पूरी दुनिया को शक है कि उसे मारा गया. जिसके बारे में कहा जाता है कि उसके पास एक “क्लाइंट लिस्ट” थी. दुनिया के सबसे ताक़तवर लोगों के नाम, जिन्होंने नाबालिग़ लड़कियों का यौन शोषण किया.
पहले ज़रा पृष्ठभूमि समझिए
जब डोनाल्ड ट्रंप 2025 में दोबारा व्हाइट हाउस पहुँचे, तो उनके सबसे क़रीबी लोगों ने, ख़ुद जेडी वेंस ने, डोनाल्ड ट्रंप जूनियर ने, काश पटेल ने, टकर कार्लसन ने, वादा किया था कि “एपस्टीन फ़ाइलें” सार्वजनिक की जाएंगी. यह वादा माग़ा बेस को बहुत पसंद आया था. लोगों को लगा था कि अब “डीप स्टेट” का पर्दाफ़ाश होगा और उन “ताक़तवर लोगों” के नाम आएंगे जो बच्चों के साथ अपराध करते थे.
लेकिन जब ट्रंप के अपने लोग उन फ़ाइलों में झाँके, तो जो दिखा, उसने उनके पसीने छुड़ा दिए.
फ़ाइलों में ख़ुद ट्रंप का नाम था. बार-बार.
वो बर्थडे कार्ड
उसी दिन, 17 जुलाई की उस सिचुएशन रूम बैठक के बीच, वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक धमाकेदार रिपोर्ट छपी.
सिचुएशन रूम में मोबाइल फ़ोन ले जाना मना है. तो स्टाफ़ उस रिपोर्ट की प्रिंटेड कॉपियाँ लेकर आया. अमेरिका के सबसे ताक़तवर लोग उस प्रिंटआउट को पढ़ने लगे, चुपचाप.
रिपोर्ट क्या थी?
2003 में एपस्टीन के जन्मदिन के लिए गिलेन मैक्सवेल, एपस्टीन की गर्लफ्रेंड और सह-अपराधी, जो अभी जेल में है, ने एक ख़ास बर्थडे बुक बनाई थी. उसमें ट्रंप का भी एक हाथ से बना कार्ड था. उस कार्ड में एक नग्न महिला की तस्वीर थी, हाथ से खींची हुई. और उसमें एक काल्पनिक संवाद लिखा था, जिसमें ट्रंप और एपस्टीन के बीच किसी “वंडरफ़ुल सीक्रेट” की बात थी. कार्ड पर दस्तख़त, ट्रंप का मशहूर कच्चा-पक्का शार्पी सिग्नेचर, महिला के प्यूबिक हेयर की जगह था.
ट्रंप ने रिपोर्ट रोकने के लिए वॉल स्ट्रीट जर्नल के मालिक रुपर्ट मर्डोक को फ़ोन किया था. सीईओ रॉबर्ट थॉमसन को फ़ोन किया था. एडिटर इन चीफ़ एम्मा टकर को फ़ोन करके चिल्लाए थे, “तुम अमेरिका से नफ़रत करती हो.” मुकदमे की धमकी दी.
कुछ नहीं हुआ. रिपोर्ट छपी.
जेडी वेंस, घबराए हुए उपराष्ट्रपति
सिचुएशन रूम में वेंस घबराए हुए थे. उनके क़रीबी लोगों ने बाद में बताया कि वे एपस्टीन की “डार्क थ्योरीज़” को सच मानते थे कि देश के शासन में एक गुप्त दुराचारी नेटवर्क है. सूज़ी वाइल्स ने बाद में सहयोगियों से कहा “वेंस तो बहुत बड़े षड्यंत्र के भक्त निकले.”
वेंस ने एक और अजीब सुझाव दिया था कि टकर कार्लसन से गिलेन मैक्सवेल का जेल में इंटरव्यू करवाया जाए. मक़सद? ताकि मैक्सवेल यह कह सके कि ट्रंप ने कुछ ग़लत नहीं किया.
वेंस का तर्क था सब कुछ सार्वजनिक कर दो. अगर ट्रंप के बारे में भी कुछ है, वो भी बाहर आए. इससे “पारदर्शिता” का श्रेय मिलेगा और षड्यंत्र की हवा निकलेगी.
ब्लैंच का “ऑप्शन 1 और 2”
ट्रंप के पुराने बचाव वकील और अब डेप्युटी अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लैंच ने दो विकल्प रखे.
पहला विकल्प: फ़्लोरिडा और न्यूयॉर्क की अदालतों से ग्रैंड जूरी ट्रांसक्रिप्ट सार्वजनिक करने की माँग करो. यह रणनीति इस उम्मीद पर थी कि जज मना कर देंगे — क्योंकि ग्रैंड जूरी की गोपनीयता अमेरिकी क़ानून में लगभग पवित्र मानी जाती है. तब जिम्मेदारी ट्रंप प्रशासन की नहीं, “डेमोक्रेट जजों” की होगी.
मतलब ऐसा दिखो कि चाहते हो रिलीज़, जबकि जानते हो कि होगी नहीं.
दूसरा विकल्प: मैक्सवेल का इंटरव्यू.
वेंस ने कहा “कांग्रेस से बात कराएं उसे.”
ब्लैंच बोले “मैक्सवेल की वकील कुछ माँग सकती है बदले में.”
व्हाइट हाउस काउंसेल वॉरिंगटन ने विकल्प रखा “माफ़ी या सज़ा में कमी.”
और तब सब एक साथ बोले नहीं.
कम्युनिकेशन डायरेक्टर स्टीवन च्युंग ने कहा - “बच्चों की तस्कर को माफ़ी दी, तो एपस्टीन की पीड़िताएं टीवी पर आ जाएंगी. यह हमें बर्बाद कर देगा.”
डेप्युटी चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ जेम्स ब्लेयर ने कहा “मैक्सवेल को कुछ भी नहीं दे सकते. और अगर दिया और उसने ट्रंप के हक़ में बोला, तो लोगों को लगेगा देखो, सौदा हुआ. षड्यंत्र की थ्योरी और मज़बूत हो जाएगी.”
पैम बोंडी और वो “एपिक” बाँटा जाने वाला बस्ता
इससे पहले, 27 फ़रवरी 2025 को एक और नाटक हुआ था.
व्हाइट हाउस के रूज़वेल्ट रूम में माग़ा के बड़े इंफ़्लुएंसर बुलाए गए थे, माइक सर्नोविच, लिज़ व्हीलर, कॉलिन रग, डीसी ड्राइनो और कुछ और. ट्रंप ने ख़ुद उन्हें ओवल ऑफ़िस में बुलाकर “चैलेंज कॉइन्स” दिए. एक इंफ़्लुएंसर ने कहा, “यह मेरी ज़िंदगी का सबसे अच्छा दिन था.”
तब आईं अटॉर्नी जनरल पैम बोंडी, बक्से लेकर. बाइंडर्स थे उन बक्सों में. बोंडी के स्टाफ़ ने कहा, “देखो यह. यह तो कमाल है. यह तो एपिक होगा.”
बाइंडर बाँटे गए.
एक अधिकारी ने बाइंडर खोला और पन्ने पलटे ट्रंप का नाम कुछ ही पन्नों में था.
उस दिन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कियर स्टार्मर व्हाइट हाउस में थे. अगर ख़बर फूटती तो प्रेस कॉन्फ़्रेंस में सारे सवाल एपस्टीन के होते.
किसी ने इंफ़्लुएंसर्स को जल्दी से बाहर धकेला “अभी एम्बार्गो है, बाद में बात होगी.”
वे बाहर गए व्हाइट हाउस के सामने बाइंडर लेकर सेल्फ़ी खींची और सोशल मीडिया पर डाल दी.
नतीजा? माग़ा बेस में भारी उत्सुकता.
और जो बाइंडर था? उसमें पहले से उपलब्ध जानकारी थी, कुछ नया नहीं. बोंडी ने एक साथ दो काम किए फ़ाइलों को “बड़ा” बताया और उन्हें “तुच्छ” साबित किया.
बोंगीनो का विस्फ़ोट
जब 7 जुलाई 2025 को जस्टिस डिपार्टमेंट और एफ़बीआई का वो मेमो आया, जिसमें लिखा था कि कोई “क्लाइंट लिस्ट” नहीं है और एपस्टीन ने ख़ुदकुशी की, तो माग़ा बेस आग-बबूला हो गई.
डेन बोंगीनो, पूर्व सीक्रेट सर्विस एजेंट, एफ़बीआई के डेप्युटी डायरेक्टर और माग़ा पॉडकास्टर, जो ख़ुद इस मेमो के ख़िलाफ़ थे, उन पर भी ग़ुस्सा टूट पड़ा.
उसी दिन जस्टिस डिपार्टमेंट की एक बैठक में बोंगीनो पहुँचे. और सीधे पैम बोंडी पर चिल्लाए.
“तुमने यह पूरी चीज़ शुरू से बर्बाद की. वो ‘मेरे डेस्क पर रखा है’ वाली बकवास. उन इंफ़्लुएंसर्स के साथ वो ड्रामा. वो सब वादे.”
बोंगीनो और काश पटेल, दोनों ने वाइल्स से कहा कि बोंडी को इस्तीफ़ा देना चाहिए.
9 जुलाई को वाइल्स के दफ़्तर में बैठक हुई. वाइल्स ने बोंगीनो पर आरोप लगाया कि उन्होंने एबीसी न्यूज़ को लीक किया.
बोंगीनो ने कहा, “एक लाख डॉलर नक़द दो अभी. बाहर चलो, उस रिपोर्टर को स्पीकर पर लगाओ, वो कहे कि मैंने लीक किया, तो ले जाओ पैसे.”
वाइल्स बोलीं, “हम सब इसमें हैं.”
बोंगीनो ने काटा, “नहीं. मैं नहीं. मैंने तुम्हें चेताया था. तुमने नहीं सुना. और अब तुम मुझ पर थोप रही हो.”
वाइल्स ने कहा, “आगे साथ चलना है या नहीं?”
बोंगीनो बोले, “नहीं.”
और वे उठकर चले गए, सिचुएशन रूम से बाहर, वेस्ट एग्ज़िक्युटिव एवेन्यू पर, काश पटेल की बुलेटप्रूफ़ गाड़ी में.
सिचुएशन रूम में “निपल” चर्चा
13 अगस्त 2025 की शाम को एक और बैठक. इस बार एपस्टीन की फ़ाइलें एक सर्चेबल वेबसाइट पर डालने की योजना थी.
किसी ने उस वेबसाइट का टेस्ट वर्ज़न खोला और ट्रंप का नाम सर्च किया.
जो पहली चीज़ निकली वो थी सारा रैनसम का एक ईमेल.
रैनसम एपस्टीन की एक पीड़िता ने एक पत्रकार को ईमेल में लिखा था कि उसकी एक सहपीड़िता “जेन” ने बताया कि ट्रंप ने उसके साथ यौन संबंध बनाए. और यह भी लिखा कि ट्रंप को निपल्स में असामान्य रुचि थी इतनी कि जेन के निपल्स लाल और सूजे हुए थे.
यह रैनसम का बयान था जो ख़ुद उसने बाद में वापस लिया. जो अप्रमाणित था. जो 2023 में एक अदालती दस्तावेज़ के अनसीलिंग में सामने आया था. और जो चुनावी हलचल में दब गया था.
लेकिन अगर जस्टिस डिपार्टमेंट की ब्रांडेड वेबसाइट पर यह “सरकारी दस्तावेज़“ की तरह दिखता तो?
एक अधिकारी बोले “यह बाहर है. इससे बड़ा हंगामा होगा. भले ही यह झूठ हो और सब जानते हों.”
वेंस ने कहा “डालो. ट्रंप पर इससे बड़े आरोप लगे हैं.”
वाइल्स ने कहा “राष्ट्रपति यह नहीं चाहेंगे.”
बहस ख़त्म.
एक अधिकारी ने बाद में कहा “व्हाइट हाउस के सबसे सुरक्षित कमरे में बैठकर निपल्स पर बात करना — यह सुरियल था.”
अंत में क्या हुआ
नवंबर 2025 में कांग्रेस में एपस्टीन फ़ाइल्स ट्रांसपेरेंसी एक्ट पास हुआ — दोनों पार्टियों की सहमति से. ट्रंप ने दस्तख़त किए. उनके पास विकल्प नहीं था.
क़ानून साफ़ था कोई दस्तावेज़ इसलिए नहीं रोका जाएगा कि उससे किसी को शर्मिंदगी हो.
35 लाख से ज़्यादा पन्ने जारी हुए. उनमें ट्रंप का नाम 38,000 से ज़्यादा जगह था. 1993 से 1996 के बीच एपस्टीन के प्राइवेट जेट में कम से कम 8 उड़ानें जो ट्रंप ने जनवरी 2024 में “कभी नहीं” बताई थीं.
और ट्रंप?
फ़रवरी 2026 में व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बोले
“इन सबके बारे में बहुत सवाल हैं. लेकिन मेरे बारे में? कुछ नहीं.”
यह वही देश है जिसने ख़ुद को “दुनिया का सबसे पारदर्शी लोकतंत्र” बताया है. यहाँ सबसे सुरक्षित कमरे में, दुनिया के सबसे ताक़तवर देश के सबसे ताक़तवर लोग बैठकर यह सोच रहे थे कि सच कैसे छुपाया जाए. और जब नहीं छुपा पाए, तो यह कैसे समझाया जाए कि जो दिख रहा है, वो असल नहीं है. जेफ़री एपस्टीन मर चुका है. लेकिन उसकी फ़ाइलें और उनमें जो नाम हैं ज़िंदा हैं.
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.











