11/05/2026: वित्तीय कुप्रबंधन भी जनता के जिम्मे | कोविड की याद | नकली नोट | मनरेगा में रोजगार गिरा | अफसरों को ईनाम | ओडिशा के ईसाई | अग्निवीर 'शहीद' नहीं | वीपीएन बैन | बंगाल हेरफेर
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
आकार पटेल | ओडिशा में ईसाइयों के ख़िलाफ़ बढ़ते अत्याचार और राज्य की चुप्पी
अरुण श्रीवास्तव | “बंगाल पुनर्जागरण” के नाम पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति
मागा का मोहभंग: ट्रम्प के ख़िलाफ़ खुलकर बोले टकर कार्लसन
मोदी की मितव्ययिता अपील: आर्थिक संकट या राजनीतिक कुप्रबंधन?
नमक के मैदानों में जलती ज़िंदगी: 48 डिग्री में काम करते मज़दूर
ओडिशा में अवैध खनन का विरोध करने पर युवक की कुल्हाड़ी से हत्या
एसआईआर विवाद: ममता बनर्जी नई याचिकाओं के लिए स्वतंत्र, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
बंगाल चुनाव के अफसरों को इनाम? सीईओ मनोज अग्रवाल बने मुख्य सचिव
अग्निवीर नियमित सैनिक नहीं, समान पेंशन लाभ नहीं: केंद्र का अदालत में पक्ष
नया कानून लागू होते ही मनरेगा रोजगार में भारी गिरावट
नोटबंदी के दशक बाद भी देश में नकली नोटों का जाल कायम
कश्मीर में वीपीएन बैन: सुरक्षा के नाम पर डिजिटल रोज़गार पर चोट
हर 36 मिनट में एक मौत: भारत का गहराता मानसिक स्वास्थ्य संकट
हरकारा डीप डाइव | श्रवण गर्ग: “चोर से कह रहे हैं चोरी कर और साहूकार से कह रहे हैं जागता रह”
मोदी की मितव्ययिता की अपील सिर्फ पश्चिम एशिया संकट के बजाय आर्थिक कुप्रबंधन को दर्शाती है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से “एक साल के लिए” ईंधन की खपत कम करने, कारपूल करने, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने, घर से काम (वर्क फ्रॉम होम) करने, “खाना पकाने के तेल का कम उपयोग करने” और गैर-जरूरी विदेशी यात्राओं को सीमित करने का आग्रह किया है. सरकारी सूत्रों ने उनकी इस अपील को पश्चिम एशिया में जारी तनाव से जोड़ा है, जिससे तेल की आपूर्ति बाधित हो सकती है और आयात लागत बढ़ सकती है.
‘द वायर’ के विश्लेषण के अनुसार, राष्ट्रीय बलिदान के इस आव्हान का समय एक बार फिर उस गहरे राजनीतिक स्वार्थ को उजागर करता है, जो मोदी के राजनीतिक नेतृत्व की विशेषता रही है. उन्होंने इन मितव्ययिता उपायों की घोषणा करने के लिए पाँच राज्यों (खासकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु) में 2026 के विधानसभा चुनावों के संपन्न होने तक का इंतजार किया. हाई-वोल्टेज चुनाव अभियान के दौरान, मोदी सरकार ने आसन्न आर्थिक संकट या ईंधन संरक्षण की आवश्यकता का कोई उल्लेख नहीं किया. उनकी पार्टी की राजनीतिक मशीनरी ने रैलियों के लिए भारी संसाधनों और ईंधन का उपयोग किया, जबकि तेजी से घटते विदेशी मुद्रा भंडार की अनदेखी की गई.
अब जब चुनाव हो चुके हैं, तो क्या मोदी सरकार जनता से यह अपेक्षा करती है कि वह अपनी वित्तीय विफलताओं और आगे की योजना बनाने में अक्षमता की भरपाई के लिए ‘वर्क-फॉर्म-होम’ मॉडल अपनाए और यात्रा को सीमित करे? आलोचकों का कहना है कि यह शासन के प्रति एक कुटिल दृष्टिकोण को दर्शाता है, जहां आर्थिक कुप्रबंधन का बोझ जनता के साथ तभी साझा किया जाता है जब सरकारी संसाधनों के फिजूलखर्च उपयोग के माध्यम से राजनीतिक सत्ता हासिल कर ली जाती है.
सरकार महंगे केंद्रीय प्रोजेक्ट और राजनीतिक तमाशे जारी रखे हुए है. मोदी के भाषण के तुरंत बाद रोड शो किए गए, जिनमें पार्टी के राजनीतिक संदेश देने के लिए काफिले में कई एसयूवी शामिल थीं, जबकि आम नागरिक से उनकी बुनियादी खपत कम करने की मांग की जा रही है. मंत्री और अधिकारी विदेश यात्रा जारी रखेंगे, और सार्वजनिक या निजी क्षेत्रों में ‘वर्क-फ्रॉम-होम’ लागू करने के लिए कोई बाध्यकारी उपाय नहीं किए गए हैं. खुद मोदी ने भी हाई-प्रोफाइल अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों या सरकारी फिजूलखर्ची में कोई कटौती नहीं की है.
यह दृष्टिकोण, विशेष रूप से पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को चुनाव के समय के साथ तय करने में देखा गया है, जिसने इस आलोचना को पुष्ट किया है कि सरकार सुसंगत नीति के बजाय चुनावी चक्रों को प्राथमिकता देती है. यह उन समस्याओं की जिम्मेदारी नागरिकों पर डाल देता है जिनकी जड़ें दीर्घकालिक राजकोषीय और व्यापार असंतुलन में हैं, बजाय इसके कि संरचनात्मक सुधारों के माध्यम से मूल कारणों को संबोधित किया जाए.
कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने ‘एक्स’ पर यही बात दोहराते हुए कहा कि “ये उपदेश नहीं हैं” बल्कि मोदी सरकार की “विफलताओं के प्रमाण” हैं. उन्होंने कहा, “12 वर्षों में, उन्होंने देश को ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है कि जनता को यह बताना पड़ रहा है कि क्या खरीदना है, क्या नहीं खरीदना है, कहाँ जाना है और कहाँ नहीं जाना है. हर बार, वे जिम्मेदारी लोगों पर डाल देते हैं ताकि वे खुद जवाबदेही से बच सकें.”
आर्थिक संकट की गंभीरता को स्वीकार करने में चुनाव परिणामों की घोषणा तक की गई यह देरी यह सिद्ध करती है कि मोदी के लिए आर्थिक समझदारी से ऊपर राजनीतिक अस्तित्व सर्वोपरि है.
सिर्फ ‘बाहरी’ कारण नहीं
ईरान पर अमेरिका-इजरायल हमले से काफी पहले के भारत के आर्थिक संकेतकों के आंकड़े गहरी संरचनात्मक कमजोरियों को दर्शाते हैं, जिन्होंने देश को इस स्थिति में धकेला है. आयातित कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता 2014 के लगभग 77.6% से बढ़कर 2026 तक 88.6% से अधिक हो गई है. घरेलू कच्चे तेल और गैस उत्पादन में लगातार कई वर्षों से गिरावट आई है, भले ही ईंधन और परिष्कृत उत्पादों की मांग बढ़ी है.
मोदी सरकार ने भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को केवल आंशिक रूप से भरा था. उन्होंने 5.33 मिलियन टन की क्षमता में से लगभग 3.37 मिलियन टन, यानी लगभग 64% ही भंडार रखा था, जो व्यवधान के दौरान केवल 10 दिनों का कवर प्रदान करता था. यह ऊर्जा सुरक्षा के लिए 90-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क से काफी नीचे है.
चीन के विपरीत, जो आयात पर भी निर्भर है, मोदी सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पश्चिम एशिया की उथल-पुथल से उत्पन्न मूल्य झटकों के प्रति असुरक्षित छोड़ दिया. मोदी अब नागरिकों से ईंधन की खपत कम करने के लिए कह रहे हैं, जबकि इस तथ्य की अनदेखी कर रहे हैं कि उनकी सरकार ने पेट्रोल-डीजल की कीमतें तब कभी कम नहीं कीं जब कच्चे तेल के दाम वर्षों तक बहुत कम स्तर पर थे. उन वर्षों के मुनाफे का उपयोग अब भारतीय उपभोक्ताओं को सब्सिडी देने के लिए किया जाना चाहिए, और एथेनॉल सहित ईंधन के मूल्य निर्धारण का पारदर्शी विवरण देश को दिया जाना चाहिए. थिंकटैंक जीटीआरआई ने मांग की है कि भविष्य में पेट्रोल या डीजल की किसी भी बढ़ोतरी को वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल की भुगतान की गई कीमत से पारदर्शी और स्पष्ट रूप से जोड़ा जाए—यानी “एक फॉर्मूले पर आधारित सार्वजनिक मूल्य निर्धारण मॉडल.”
मोदी अब एक दशक से अधिक समय (12 वर्ष) से प्रधानमंत्री के पद पर हैं और उन्हें अपनी नीतियों और कार्यों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए, न कि सब कुछ पश्चिम एशिया के संकट पर मढ़ना चाहिए. रुपया पिछले एक साल से “एशिया में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा” रहा है और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले इसमें भारी गिरावट आई है. यह 2024 के अंत में 85-86 के आसपास कारोबार कर रहा था और 2025 के अंत में 90 के पास या ऊपर पहुंच गया, और मई 2026 में 94-95 के आसपास मँडरा रहा है. यह हाल की अवधि में 10% से अधिक की गिरावट और 2014 के 60 के स्तर से दीर्घकालिक गिरावट को दर्शाता है.
2010 के दशक की शुरुआत के बाद से रुपये का यह सबसे खराब वार्षिक प्रदर्शन है. यह केवल पश्चिम एशिया से जुड़े किसी अस्थायी झटके के बजाय निरंतर विदेशी-पूंजी के बहिर्वाह (आउटफ़्लो), कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और मजबूत डॉलर के संयोजन को दर्शाता है. मुद्रा की गिरावट तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और पूंजीगत वस्तुओं सहित लगभग सभी आयातों की लागत बढ़ा देती है, और सीधे तौर पर उच्च मुद्रास्फीति (महंगाई) और परिवारों पर आयातित कीमतों के दबाव को बढ़ाती है. लेकिन रुपये की यह कमजोरी, जैसा कि शेयर बाजार से एफपीआई के बड़े पैमाने पर बहिर्वाह और भारत से खराब शुद्ध एफडीआई रिकॉर्ड द्वारा प्रदर्शित होता है, ईरान पर हमलों से पहले से ही जारी है.
व्यापक व्यापार घाटा भी काफी बढ़ गया है. भारत ने 2024-25 में लगभग $282.8 बिलियन का वस्तु व्यापार घाटा दर्ज किया, जो 2023-24 के $241.1 बिलियन से अधिक है. वस्तुओं और सेवाओं को मिलाकर कुल व्यापार अंतर 2025-26 में और अधिक चौड़ा हो गया है, क्योंकि आयात, निर्यात की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है. चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा काफी बढ़ गया है. यह 2025-26 में $116 बिलियन तक पहुँच गया, जिसमें आयात निर्यात से कहीं अधिक रहा. यह विनिर्माण और उपभोग इनपुट के लिए चीनी वस्तुओं पर निरंतर भारी निर्भरता को दर्शाता है.
कूटनीति कहीं नज़र नहीं आ रही
मोदी की विदेश नीति के विकल्पों ने भारत को क्षेत्रीय जोखिमों से सुरक्षित नहीं रखा है. इज़राइल और यूएई जैसे सहयोगियों के साथ अधिक झुकाव ने पश्चिम एशिया में भारत के प्रभाव को कम कर दिया है, जहाँ ऊर्जा सुरक्षा सबसे अधिक मायने रखती है. मोदी सरकार की विदेश नीति स्थिर कीमतों पर दीर्घकालिक ऊर्जा अनुबंध सुरक्षित करने या बदलते वैश्विक परिवेश में गहरी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने में विफल रही है. प्रमुख मार्गों से होने वाले आयात में व्यवधान पड़ रहा है, लेकिन घरेलू कमजोरियाँ इसके प्रभाव को और बढ़ा देती हैं. उदाहरण के लिए, तेहरान द्वारा शुरुआती कुछ जहाजों को जाने देने के बाद भी भारतीय जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे हुए हैं.
ये संकेतक मोदी के शासन में संचित आर्थिक कुप्रबंधन की ओर इशारा करते हैं. कमजोर मुद्रा, बढ़ता घाटा, आंशिक भंडार और नौकरियों की असमान वृद्धि ने नीतिगत दायरे को कम कर दिया है, जहाँ राजनीतिक जवाबदेही से बचा जा रहा है और इसका बोझ पहले से ही पीड़ित गरीब भारतीयों पर डाला जा रहा है.
मोदी द्वारा इस अपील की टाइमिंग (समय) की ऑनलाइन जगत में व्यापक आलोचना हो रही है और इसे राजनीतिक छल बताया जा रहा है. मितव्ययिता को एक साझा राष्ट्रीय बलिदान के रूप में पेश करके, वह रुपये की गिरावट और बढ़ते बाहरी-क्षेत्र के अंतर का दोष ईंधन-कर संरचना, आयात निर्भरता और विकास रणनीति जैसे नीतिगत विकल्पों के बजाय परिवारों और व्यवसायों पर मढ़ सकते हैं.
एक जिम्मेदार नेता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने, रणनीतिक भंडार बनाने और विकास की तेल-निर्भरता को कम करने के लिए एक रोडमैप तैयार करने जैसे उपायों को पहले ही लागू करे, न कि चुनावी वर्ष के संकट का इंतजार करे और फिर नागरिकों से ईंधन के उपयोग और यात्रा में कटौती करने का आग्रह करे.
हरकारा डीप डाइव
श्रवण गर्ग | चोर से कह रहे हैं चोरी कर और साहूकार से कह रहे हैं जागता रह
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव इंटरव्यू में निधीश त्यागी और वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया सार्वजनिक आह्वानों, आर्थिक संकट, खाड़ी युद्ध, कोविड मॉडल, चुनावी राजनीति और भारतीय लोकतंत्र की दिशा पर गहराई से चर्चा की. बातचीत की शुरुआत प्रधानमंत्री द्वारा नागरिकों से “सोना कम खरीदने”, “वर्क फ्रॉम होम करने”, “पेट्रोल-डीजल की खपत घटाने” और “खर्च कम करने” की अपील से होती है. इसके तुरंत बाद प्रधानमंत्री की भव्य यात्राओं, बड़े काफिलों और सार्वजनिक आयोजनों का जिक्र करते हुए इस विरोधाभास पर सवाल उठाया गया कि जनता के लिए सादगी और त्याग की अपील करने वाली सत्ता खुद उसी जीवनशैली का पालन करती दिखाई नहीं देती.
श्रवण गर्ग ने इस पूरे परिदृश्य को “कोविड मॉडल” का पुनरावर्तन बताया. उनका कहना था कि सरकार को कोविड काल के दौरान नागरिक नियंत्रण, भय, अनुशासन और केंद्रीकृत सत्ता संचालन का एक “टेम्पलेट” मिल गया था, जिसे अब नए आर्थिक और वैश्विक संकटों के बीच फिर से लागू करने की कोशिश दिखाई दे रही है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री लगातार “क्या मत करो” बता रहे हैं, लेकिन “क्या करना चाहिए” इसका कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं दे रहे.
बातचीत में भारत की गिरती आर्थिक स्थिति, शेयर बाजार में गिरावट, रुपये की कमजोरी, विदेशी निवेशकों द्वारा पूंजी निकासी, विदेशी मुद्रा भंडार में कमी और डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरती कीमत को सरकार की आर्थिक नीतियों से जोड़कर देखा गया. यह सवाल उठाया गया कि जब वैश्विक स्तर पर तेल सस्ता था तब उसका लाभ आम जनता तक क्यों नहीं पहुंचाया गया, जबकि संकट बढ़ते ही महंगाई और बोझ सीधे नागरिकों पर डाला जा रहा है.
इंटरव्यू में यह भी कहा गया कि सरकार एक तरफ विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की बात करती है, जबकि दूसरी तरफ विदेशी निवेश और बड़े कॉरपोरेट हितों के लिए दरवाजे लगातार खोले जा रहे हैं. चीन, रक्षा, बीमा और रिटेल सेक्टर में निवेश नीतियों का उल्लेख करते हुए इसे दोहरे मानदंड की राजनीति बताया गया. उन्होंने कहा कि चोर से कह रहे हैं चोरी कर और साहूकार से कह रहे हैं जागता रह.
चर्चा का बड़ा हिस्सा कोविड काल की यादों और उसके राजनीतिक इस्तेमाल पर केंद्रित रहा. लॉकडाउन, मजदूर संकट, ऑक्सीजन की कमी, वैक्सीन अव्यवस्था और मौतों के वास्तविक आंकड़ों को लेकर सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए गए. श्रवण गर्ग ने कहा कि कोविड के दौरान नागरिक अधिकारों को सीमित करने और भय के वातावरण का जो अनुभव सत्ता को मिला, वही मॉडल अब नए संकटों के संदर्भ में दोहराया जा सकता है.
इसके साथ ही खाड़ी क्षेत्र में जारी तनाव, इजराइल-ईरान संघर्ष और उसके भारत पर संभावित असर पर भी चर्चा हुई. बातचीत में आरोप लगाया गया कि सरकार ने समय रहते कोई तैयारी नहीं की और चुनाव खत्म होने तक संकट को सार्वजनिक रूप से स्वीकारने से बचती रही. तेल, गैस, उर्वरक और आयात आधारित अर्थव्यवस्था पर इसके असर को लेकर गहरी चिंता जताई गई.
मोदी की नोटबंदी के बावजूद नकली नोटों का प्रचलन अभी भी एक हकीकत
8 नवंबर, 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ₹1,000 और ₹500 के नोटों को तत्काल प्रभाव से बंद करने (विमुद्रीकरण) की घोषणा की थी. उन्होंने कहा था कि यह कदम काले धन, जाली मुद्रा और भ्रष्टाचार पर एक बड़ा प्रहार होगा. इस घोषणा के बाद के दिनों में जनता के बीच अफरा-तफरी देखी गई, एटीएम पर लंबी कतारें लगीं, कई मौतें हो गईं और व्यापक आर्थिक व्यवधान पैदा हुआ, विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों में.
हालाँकि, काले धन और भ्रष्टाचार को खत्म करने पर इस कवायद के प्रभाव को लेकर अभी भी बहस जारी है, लेकिन राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2024 की नवीनतम ‘क्राइम इन इंडिया’ रिपोर्ट बताती है कि लगभग एक दशक बाद भी नकली नोटों (मुद्रा) की समस्या बनी हुई है. आंकड़ों के अनुसार, भारत के विभिन्न राज्यों से ₹54.61 करोड़ से अधिक मूल्य की जाली मुद्रा जब्त की गई. जब्त की गई मुद्राओं में लगभग छह लाख ₹500 के नोट और एक लाख से अधिक ₹2,000 के नोट शामिल थे—जिन्हें भारतीय रिजर्व बैंक ने मई 2023 में चलन से वापस लेने का फैसला किया था, हालांकि वे अभी भी वैध मुद्रा बने हुए हैं.
नोटबंदी के बाद अब तक कुल ₹638 करोड़ मूल्य के नकली नोट जब्त
‘द हिंदू’ में सांभवी पार्थसारथी की रिपोर्ट के अनुसार, नोटबंदी (विमुद्रीकरण) के एक साल बाद, यानी 2017 से अब तक कुल ₹638 करोड़ मूल्य की नकली मुद्रा जब्त की गई है. साल 2024 में जब्त किए गए जाली नोटों का मूल्य 2016 के बाद से तीसरा सबसे अधिक रहा. वर्ष 2020 में, जब कोविड-19 फैला था, ₹92 करोड़ की जब्ती देखी गई थी. वहीं 2022 में, कोविड-19 महामारी शुरू होने के दो साल बाद, ₹382.6 करोड़ की भारी-भरकम राशि के बराबर जाली मुद्रा जब्त की गई थी.
आंकड़े ₹500 और ₹2,000 के नोटों की जाली मुद्रा में वृद्धि की ओर भी इशारा करते हैं. 2024 में अधिकारियों द्वारा जब्त किए गए ₹500 के नोटों की संख्या 2016 में जब्त किए गए नोटों की तुलना में लगभग चार गुना थी. विमुद्रीकरण के बाद शुरू किए गए ₹2,000 के जाली नोटों की संख्या, 2017 की तुलना में लगभग दोगुनी हो गई.
कानून प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा की गई जब्ती पर एनसीआरबी द्वारा दर्ज आंकड़ों के अलावा, संसद के आंकड़ों से पता चला है कि 2020-21 और 2024-25 के बीच पांच वर्षों की अवधि में, बैंकिंग प्रणाली में प्रवेश करने के बाद विभिन्न मूल्यवर्ग के 11 लाख से अधिक जाली नोट पकड़े गए और रिपोर्ट किए गए, जिनका कुल मूल्य ₹40.26 करोड़ था. यानी, बैंकों द्वारा हर साल औसतन लगभग दो लाख जाली नोटों का पता लगाया गया है.
इन नोटों का मूल्यवर्ग-वार विवरण यह दर्शाता है कि ₹200 और ₹500 जैसी नई मुद्राएँ, जिन्हें फिर से जारी किया गया था, उनकी भी जालसाजी की जा रही है. नोटबंदी (विमुद्रीकरण) के बाद छपी नई श्रृंखला के चार लाख से अधिक ₹500 के नोट, इन (बैंकों में पकड़े गए) नोटों का लगभग 37% हिस्सा थे. वहीं, लगभग तीन लाख ₹100 के नोट, बैंकों में रिपोर्ट किए गए जाली नोटों का 26% हिस्सा थे.
जब्त किए गए जाली नोटों का राज्य-वार विवरण दिखाता है कि 2017 और 2024 के बीच जब्त किए गए नकली धन के मूल्य के मामले में गुजरात सबसे आगे रहा. राज्य में जब्त की गई जाली मुद्रा का मूल्य ₹355.72 करोड़ था, जो इस अवधि के दौरान देश में हुई कुल जब्ती के मूल्य के आधे से भी अधिक था. गुजरात के बाद महाराष्ट्र और कर्नाटक का स्थान रहा, जहाँ क्रमशः ₹100 करोड़ और ₹50 करोड़ मूल्य की जाली मुद्रा जब्त की गई.
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के आंकड़ों से यह भी पता चला है कि इस साल मई तक, ₹42.12 लाख करोड़ से अधिक के कुल मूल्य वाले 174 बिलियन (17,400 करोड़) से अधिक नोट चलन में थे. यह नवंबर 2016 की तुलना में लगभग 137% की वृद्धि है, जब चलन में मौजूद मुद्रा का मूल्य ₹17.74 लाख करोड़ था.
यह इंगित करता है कि विमुद्रीकरण अभ्यास का दूसरा उद्देश्य, यानी नकदी के लेन-देन को कम करना, उसका भी वांछित प्रभाव नहीं पड़ा है.
केंद्र द्वारा नया कानून लागू करने के बाद मनरेगा रोजगार में भारी गिरावट
मनरेगा के तहत रोजगार सृजन में वर्ष 2025-26 में भारी गिरावट आई है. यह वही वर्ष है जब केंद्र ने मनरेगा को निरस्त कर उसके स्थान पर ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ (वीबी-जी राम जी) अधिनियम लागू किया. लिबटेक इंडिया के शोधकर्ता मुक्केरा राहुल ने कहा कि 2025-26 को मनरेगा के तहत रोजगार सृजन के लिए सबसे कठिन वर्षों में से एक के रूप में देखा जा सकता है.
राहुल ने कहा, “हमने हाल के वर्षों में देखा है कि मनरेगा के तहत आवंटन स्थिर बना हुआ है, जबकि सरकार ने सुधारों और भ्रष्टाचार को खत्म करने के नाम पर कई हस्तक्षेप पेश किए हैं. ऑनलाइन उपस्थिति प्रणाली, ई-केवाईसी पंजीकरण और आधार आधारित भुगतान प्रणाली (एबीपीएस) ने श्रमिकों के लिए चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. फंड की कमी और तकनीकी हस्तक्षेप, दोनों कारकों ने रोजगार योजना के तहत रोजगार सृजन में आई भारी गिरावट में योगदान दिया होगा.”
‘द टेलीग्राफ’ में बसंत कुमार मोहंती की रिपोर्ट के अनुसार, नरेगा मोबाइल मॉनिटरिंग सिस्टम (एनएमएमएस) के तहत, पंचायत स्तर के अधिकारियों को श्रमिकों की तस्वीरें लेनी होती हैं और उन्हें ऐप पर अपलोड करना होता है. पहले, ग्राम पंचायतें कागज पर उपस्थिति दर्ज करती थीं, जिसे जनवरी 2023 से बंद कर दिया गया था.
फरवरी 2023 से, ग्रामीण विकास मंत्रालय ने राज्यों के लिए मजदूरी भुगतान के लिए एबीपीएस का उपयोग करना अनिवार्य कर दिया था. एबीपीएस के लिए, एक श्रमिक के आधार को उसके जॉब कार्ड, बैंक खाते और भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) द्वारा बनाए गए डेटाबेस में बैंक के संस्थागत पहचान संख्या के साथ जोड़ना (सीडिंग) आवश्यक है.
नवंबर 2025 से, सरकार ने मनरेगा श्रमिकों के लिए काम पाने हेतु ई-केवाईसी अनिवार्य कर दिया. ई-केवाईसी चेहरे और आईरिस (पुतली) की पहचान के माध्यम से की जाती है और यह सुविधा एनएमएमएस ऐप का हिस्सा है.
रिपोर्ट में पाया गया कि मई 2026 में 25 करोड़ श्रमिकों में से 45.4 प्रतिशत और लगभग 10 करोड़ सक्रिय श्रमिकों में से 9.5 प्रतिशत ने ई-केवाईसी पूरा नहीं किया था. राहुल ने कहा कि श्रमिकों को इन तकनीकी हस्तक्षेपों का पालन करना कठिन लगा.
मनरेगा एक वर्ष में प्रत्येक ग्रामीण परिवार को 100 दिनों तक के अकुशल कार्य का प्रावधान करता है. निजी शोध संगठन लिबटेक इंडिया द्वारा जारी “वित्तीय वर्ष 2025-26 में मनरेगा के तहत घटते रोजगार और कमाई” शीर्षक वाली एक राष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार, मनरेगा के तहत सृजित कुल कार्यदिवस 2023-24 में 312 करोड़ से घटकर 2024-25 में 268 करोड़ और 2026-27 में 211 करोड़ रह गए. प्रति परिवार औसत कार्यदिवस 2024-25 में 50.18 से काफी गिरकर 2025-26 में 42.92 रह गया. जहाँ 2024-25 में 0.37 करोड़ परिवारों ने 100 दिनों का काम पूरा किया था, वहीं 2025-26 में ऐसे परिवारों की संख्या घटकर 0.22 करोड़ रह गई.
मनरेगा के तहत पंजीकृत परिवारों की संख्या 2024-25 में 14.98 करोड़ से बढ़कर 2025-26 में 15.46 करोड़ हो गई. योजना में अधिक परिवारों द्वारा रुचि दिखाने के बावजूद, रोजगार तक पहुंच कम हो गई. 2024-25 की तुलना में, 2025-26 में लगभग 44 लाख कम परिवारों और 67 लाख कम श्रमिकों को मनरेगा के तहत रोजगार मिला.
बंगाल में चुनाव से जुड़े अफसर एक के बाद एक पुरस्कृत: अब मुख्य निर्वाचन अधिकारी अग्रवाल, मुख्य सचिव होंगे
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और चुनाव से जुड़े कार्यों से संबंधित नौकरशाहों को एक-एक कर पुरस्कृत किया जा रहा है. उन्हें सर्वश्रेष्ठ पदस्थापना दी जा रही है. सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी सुब्रत गुप्ता, जो एसआईआर प्रक्रिया के लिए चुनाव आयोग के ‘विशेष रोल ऑब्जर्वर’ थे, को शनिवार (9 मई, 2026) को मुख्यमंत्री का सलाहकार नियुक्त करने के बाद अब सोमवार को पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) मनोज अग्रवाल को राज्य में सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार का मुख्य सचिव नियुक्त किया गया है.
‘पीटीआई’ के अनुसार, पश्चिम बंगाल कैडर के 1990 बैच के आईएएस अधिकारी अग्रवाल ने विधानसभा चुनावों से पहले राज्य में चुनाव आयोग द्वारा निर्देशित ‘एसआईआर’ अभ्यास का नेतृत्व किया था, जिसमें मतदाता सूची से लगभग 91 लाख मतदाताओं को हटाया गया था. आदेश में कहा गया है कि वर्तमान मुख्य सचिव दुष्यंत नारियाला को नई दिल्ली में प्रधान स्थानीय आयुक्त नामित किया गया है.
1993 बैच के आईएएस नारियाला को चुनाव आयोग ने नंदिनी चक्रवर्ती को राज्य के शीर्ष नौकरशाह के पद से हटाकर पश्चिम बंगाल का मुख्य सचिव नियुक्त किया था. माना जा रहा है कि चुनाव आयोग के भरोसे ने नौकरशाही के भीतर उनका कद बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाई है.
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को करारी शिकस्त देने के बाद राज्य में भाजपा पहली बार सत्ता में आई है. भगवा पार्टी ने 294 सदस्यीय विधानसभा में 207 सीटें हासिल कीं, जिससे टीएमसी घटकर 80 सीटों पर रह गई.
ममता बनर्जी और अन्य ‘एसआईआर’ के कारण कम जीत के अंतर पर नई याचिकाएं दायर कर सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और अन्य लोग अपने इस आरोप पर नए आवेदन दायर करने के लिए स्वतंत्र हैं कि कई विधानसभा क्षेत्रों में जीत का अंतर, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान हटाए गए वोटों की संख्या से कम था.
‘पीटीआई’ के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता और टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी की दलीलों पर संज्ञान लिया, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि 31 निर्वाचन क्षेत्रों में जीत का अंतर मतदाता सूची से हटाए गए वोटों की संख्या से कम था. इन दलीलों का विरोध करते हुए, चुनाव आयोग ने तर्क दिया कि इसके लिए उचित कानूनी उपाय ‘चुनाव याचिका’ है. आयोग ने कहा कि चुनाव पैनल को एसआईआर प्रक्रिया और उसके बाद वोटों को जोड़ने या हटाने से संबंधित अपीलों से उत्पन्न होने वाले मुद्दों के लिए जवाबदेह ठहराया जा सकता है.
हाल ही में संपन्न पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में, 294 सदस्यीय सदन में भाजपा ने 207 सीटें जीतीं, जबकि टीएमसी को 80 सीटें मिलीं. राज्य में इन चुनावों के दौरान 90 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज किया गया था.
शीर्ष अदालत राज्य में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से संबंधित याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें ममता बनर्जी द्वारा दायर एक याचिका भी शामिल थी.
बीजेपी और तृणमूल के बीच 32 लाख वोटों का अंतर और लंबित अपीलें 35 लाख हैं
‘लाइव लॉ’ के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंद्योपाध्याय ने दलील दी कि एक निर्वाचन क्षेत्र में एक उम्मीदवार 862 मतों से हार गया, जबकि वहाँ निर्णय प्रक्रिया (एडजुडिकेशन) के तहत मतदाता सूची से 5432 से अधिक व्यक्तियों के नाम हटा दिए गए थे. उन्होंने दावा किया कि टीएमसी और भाजपा के बीच वोटों का अंतर लगभग 32 लाख था, और लगभग 35 लाख अपीलें अपीलीय न्यायाधिकरणों के समक्ष लंबित हैं. उन्होंने न्यायमूर्ति बागची की पिछली एक टिप्पणी का संदर्भ दिया कि यदि जीत का अंतर हटाए गए मतदाताओं की संख्या से कम है, तो मामले की न्यायिक जांच की आवश्यकता हो सकती है.
पीठ ने बंद्योपाध्याय से कहा कि आवश्यक विवरणों के साथ एक ‘मध्यवर्ती आवेदन’ (आईए) दायर किया जाना चाहिए. न्यायमूर्ति बागची ने कहा, “आप परिणामों के बारे में जो कुछ भी कहना चाहते हैं... जो उन विलोपनों के कारण भौतिक रूप से प्रभावित हुए हों जिन पर अभी निर्णय होना बाकी है... उसके लिए एक स्वतंत्र आईए की आवश्यकता है.” बंद्योपाध्याय ने पीठ को यह भी सूचित किया कि उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश टी.एस. शिवगणनम ने अपीलीय न्यायाधिकरण के सदस्य के रूप में इस्तीफा दे दे दिया है. इस पर मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) ने उत्तर दिया, “हम क्या कर सकते हैं? हम किसी को मजबूर नहीं कर सकते...”
सीजेआई ने कहा कि प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना होगी कि अपीलों का निपटारा त्वरित तरीके से किया जाए. वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने पीठ को बताया कि वर्तमान गति से अपीलीय न्यायाधिकरणों को इन अपीलों के निपटारे में कम से कम 4 साल लगेंगे.
अरुण श्रीवास्तव | “बंगाल के पुनर्जागरण” की कहानी के ज़रिए चुनावी हेरफेर को सही ठहराने की भाजपा की कोशिश
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक राष्ट्रीय अंग्रेज़ी दैनिक में छपे एक लेख में, बंगाल की ‘सभ्यतागत नींद’ के रूप में बताई गई स्थिति पर चिंता ज़ाहिर की. उन्होंने कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर का ज़िक्र किया. “हे नूतन, देखा दिक आरबार, जन्मेर प्रोथोमो शुभोक्खोन”. और सच्ची बंगाली विरासत की महानता को वापस लाने के भाजपा के मिशन को दोहराया. यह लेख उस दिन छपा था जब भाजपा ने भारत के राजनीतिक इतिहास में पहली बार बंगाल की सत्ता पर क़ब्ज़ा किया था. यह दिन कविगुरु के जन्मदिन के साथ मेल खाता था, जिसे ‘पचीशे बोइशाख’ के रूप में मनाया जाता है. इसने बंगाल के राजनीतिक माहौल में एक बड़े प्रतीकात्मक बदलाव को दिखाया, जिसमें राजनीतिक बदलाव और बंगाली संस्कृति के मेल पर ज़ोर दिया गया था.
सिंह ने यह भी बताया कि रवींद्रनाथ ठाकुर ने इन शब्दों को एक पुकार के रूप में लिखा था. बंगाल की लगातार ताज़ा होती भावना के लिए एक प्रार्थना. जिसे पारंपरिक रूप से उनकी जयंती पर गाया जाता है. यह उन्हें और उस नई शुरुआत और जागृति की ख़ुशी को सम्मान देता है जिसका एक जन्मदिन प्रतीक होता है. ज़ाहिर है, वे यह संदेश देना चाहते थे कि भाजपा का सत्ता पर आना बंगाल को एक अधिक सुसंस्कृत और मुखर युग में ले जाएगा. सिंह का लेख लोकलुभावनवाद के तत्वों और साथ ही बंगाल के भविष्य के बारे में अत्यधिक भ्रम को दिखाता है, जो काफ़ी स्वाभाविक है, क्योंकि वे केवल नरेंद्र मोदी के विचारों और राजनीति का बखान कर रहे थे.
“बंगाली विरासत की महानता को वापस लाने का भाजपा का मिशन” भ्रामक और अस्पष्ट है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को विकास के साथ मिलाकर राज्य को “सभ्यतागत नींद” से जगाने पर इसका ध्यान. जिसे अक्सर स्वामी विवेकानंद, सुभाष चंद्र बोस और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे प्रतीकों की विरासत को बहाल करने के रूप में बताया जाता है. भी अस्पष्ट है. क्या उनके कहने का मतलब यह है कि ख़ुद बंगालियों ने ही इन महापुरुषों की विरासत को नष्ट कर दिया है?
भाजपा के वैचारिक गुरु, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ या ‘हिंदुत्व’ का ही दूसरा नाम है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत को मूल रूप से एक हिंदू राष्ट्र के रूप में परिभाषित करता है, जहाँ राष्ट्रीय पहचान गहराई से हिंदू संस्कृति, मूल्यों और परंपराओं से जुड़ी है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ख़ुद को एक राजनीतिक दल के बजाय एक सांस्कृतिक स्वयंसेवक संगठन के रूप में पेश करता है, जिसका ध्यान “हिंदू मानसिकता” और राष्ट्रीय चेतना को आकार देने पर है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नज़रिया अक्सर यह मानता है कि ग़ैर-हिंदू भारतीय भी व्यापक हिंदू सभ्यता का ही हिस्सा हैं.
यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर, जो लाखों बंगालियों के दिलों और दिमाग़ में बसते हैं, चाहे वे हिंदू हों या मुस्लिम, हिंदू राष्ट्रवाद का समर्थन नहीं करते थे, और उनके आदर्श इसके बिल्कुल उलट थे. फिर भी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा रवींद्रनाथ ठाकुर को हिंदू राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में अपनाने की कोशिश कर रहे हैं. वे राष्ट्र को एक ‘मातृ देवी’ के रूप में पहचानने की दक्षिणपंथी कोशिशों से भी असहमत थे.
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और फ़ासीवाद का ख़तरा
सिंह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करते हैं. यह एक जाना-माना सच है कि इस तत्व का अक्सर फ़ासीवादी विचारधाराओं द्वारा फ़ायदा उठाया जाता है. तानाशाही, सैन्यवाद और अल्पसंख्यकों के हिंसक बहिष्कार के साथ जुड़ने पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद फ़ासीवाद का एक प्रमुख हिस्सा बन जाता है. फ़ासीवाद राष्ट्रवाद के एक चरम रूप का इस्तेमाल करता है, जिसे अक्सर “अतिराष्ट्रवाद” कहा जाता है. जो राष्ट्रीय पुनर्जन्म का एक मिथक है. यह पूरी वफ़ादारी की माँग करता है, विपक्ष को ख़त्म करता है, और अक्सर एक करिश्माई तानाशाह नेता पर निर्भर करता है. कुछ ऐसा जो नरेंद्र मोदी के ‘न्यू इंडिया’ में तेज़ी से दिखाई दे रहा है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद तब फ़ासीवादी हो जाता है जब यह “हम बनाम वे” की मानसिकता जैसी ख़ूबियों को अपनाता है, “आंतरिक विदेशियों” की पहचान करता है, एक ख़राब हो चुकी संस्कृति की सफ़ाई के नाम पर कथित रूप से “शुद्ध” अतीत को वापस लाने पर ध्यान लगाता है, या बहुलवाद-विरोधी हो जाता है. इस तरह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एक “समान” राष्ट्रीय पहचान बनाने का एक हथियार बन जाता है.
बंगाल की अर्थव्यवस्था और ठहराव के आरोप
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बंगाल को सबसे ज़्यादा नुक़सान उठाना पड़ा. ममता बनर्जी के प्रति उनकी दुश्मनी. दूसरे शब्दों में, बंगाली राजनीतिक संस्कृति के प्रति दुश्मनी. ने उन्हें अपने 12 साल के शासन के दौरान बंगाल को एक सांस्कृतिक और बौद्धिक केंद्र के रूप में बढ़ावा देने के लिए प्रेरित नहीं किया. सिंह “भ्रष्टाचार की संस्कृति” और ठहराव से पीड़ित होने के लिए बंगाल को दोष देते हैं. “भ्रष्टाचार की संस्कृति” महज़ एक राजनीतिक जुमला है. बेशक, भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा रहा है, लेकिन यह पिछले शासन काल से, ख़ासकर वाम मोर्चे से विरासत में मिला था. ठहराव का आरोप भी ग़लत है. 2024-25 के अनुमानों के मुताबिक़, सकल राज्य घरेलू उत्पाद के मामले में पश्चिम बंगाल पाँचवें या छठे स्थान पर है, जो किसी अर्थव्यवस्था के आकार, सेहत और विकास को मापने का मुख्य पैमाना है. बेशक, प्रति व्यक्ति आय तुलनात्मक रूप से कम रही है, लेकिन मोदी सरकार इसके लिए अपनी ज़िम्मेदारी से भाग नहीं सकती.
बंगाल को “जगाने” या उसे नींद से बाहर लाने का भाजपा का नज़रिया अस्पष्ट और आकारहीन बना हुआ है. इसका मूल कारण यह है कि जिस राजनीतिक दल का प्राथमिक मिशन सामाजिक और सांप्रदायिक नफ़रत फैलाना रहा हो, वह सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए कोई ढाँचा विकसित नहीं कर सका, जो कि किसी भी समाज या समुदाय के ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी है. पिछले 12 सालों के दौरान, भाजपा नेतृत्व, ख़ासकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने मुख्य रूप से ममता बनर्जी सरकार को अस्थिर करने और बंगालियों को बदनाम करने पर ध्यान लगाया. उनका बड़ा मिशन बंगाल का इस्तेमाल पूरे भारत, विशेष रूप से पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में विस्तार के लिए एक लॉन्चपैड के रूप में करना था.
स्वाभाविक रूप से एक सवाल उठता है. क्या भाजपा सरकार ने कभी बंगाली सभ्यता को “नींद” में धकेलने के लिए ज़िम्मेदार कारणों की पहचान करने की गंभीरता से कोशिश की? क्या उसने इस बात की कोई सार्थक जाँच की कि क्या बंगाली सभ्यता वाक़ई पतन की ओर जा रही थी? इसके बजाय उनका मुख्य मक़सद सरकार को अस्थिर करना और उसे ठप करना लगता है. किसी सभ्यता की “नींद”. जिसे अक्सर सामाजिक पतन या “अंधकार युग” कहा जाता है. शायद ही कभी किसी एक घटना के कारण होती है. यह आमतौर पर पर्यावरण, सामाजिक और आर्थिक विफलताओं की एक लंबी कड़ी का नतीजा होता है. इसे केवल भ्रष्टाचार और अक्षमता तक सीमित करना सरकार को बदनाम करने के मक़सद से बनाई गई एक लोकलुभावन राजनीतिक रणनीति है.
राजनीतिक-आर्थिक नींद. ठहराव की एक ऐसी स्थिति जहाँ राजनीतिक जड़ता और आर्थिक सुस्ती एक-दूसरे को मज़बूत करते हैं. संरचनात्मक, संस्थागत और व्यावहारिक कारकों के मेल से उभरती है जो विकास, नए विचारों और सुधार को रोकते हैं. यह अक्सर कठिन सुधारों को लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी से पैदा होता है, जिससे “शून्य-विकास” की स्थिति पैदा होती है. आम सहमति और राजनीतिक कमिटमेंट की कमी के नतीजे में बँटी हुई और सुस्त आर्थिक नीतियाँ बनती हैं.
पलायन और फ़ंड रोकने की राजनीति
राज्य सरकार पर अक्सर पलायन का आरोप लगाया जाता है. हालाँकि, पलायन मुख्य रूप से दो तरह का होता है. मज़दूरों का पलायन और उच्च कुशल तथा शिक्षित लोगों का पलायन. शिक्षित और कुशल लोगों के पलायन के मनोवैज्ञानिक और नवउदारवादी पहलू हैं. वहीं, मज़दूरों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि भाजपा सरकार ने कथित तौर पर फ़ंड का इस्तेमाल न करने के कमज़ोर बहाने पर पैसों की रोक लगा दी थी. बताया जाता है कि मनरेगा के तहत लगभग ₹1 लाख करोड़ रुपये रोक दिए गए हैं. ज़ाहिर है, मज़दूरों को दूसरे राज्यों में काम की तलाश करने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि बंगाल न तो रोज़गार पैदा कर सका और न ही मज़दूरी दे सका. ये फ़ंड दिसंबर 2021 से प्रभावी रूप से ब्लॉक हैं. रिपोर्टें यह भी बताती हैं कि पिछले सालों में बजट का अनुमान असल ख़र्च की तुलना में काफ़ी कम रहा है, जिसमें 2025-26 तक के पाँच सालों में असल रूप से 23% की कथित कमी शामिल है. यदि मोदी का इरादा वाक़ई बंगाल को मज़बूत करने का था, तो उन्हें इसके मज़दूर वर्ग को संगठित करने और समर्थन देने पर ध्यान देना चाहिए था.
जहाँ एक ओर नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय फ़ंड रोक दिया, वहीं दूसरी ओर भगवा इकोसिस्टम ने साथ ही साथ हिंसा को बढ़ावा दिया. राज्य ने चुनाव के बाद बड़े पैमाने पर हिंसा देखी, जिसमें अलग-अलग ज़िलों में हत्या, आगज़नी, तोड़फोड़ और झड़पों की ख़बरें आईं. पश्चिम बंगाल ने पिछले एक दशक में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच कड़े राजनीतिक टकराव का अनुभव किया है. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की 2026 की एक रिपोर्ट ने बताया कि 2026 के विधानसभा चुनावों में 65% नवनिर्वाचित विधायकों ने अपने ऊपर आपराधिक मामले घोषित किए थे, जिनमें से कई पर गंभीर आरोप थे. पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा एक स्थायी बीमारी बन गई है, जो ख़ासकर 2014 और 2026 के बीच चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस और भाजपा समर्थकों के बीच तेज़ और अक्सर जानलेवा झड़पों के रूप में देखी गई. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक समिति ने 1,934 घटनाओं को दर्ज किया, जिनमें 29 हत्याएँ और यौन उत्पीड़न के 12 मामले शामिल हैं, और बताया कि हिंसा बहुत बड़े स्तर पर थी और राजनीतिक रूप से लक्षित थी. 2014 के लोकसभा और 2018 के पंचायत चुनावों सहित पहले के चुनावों के दौरान भी इसी तरह के रुझान दिखाई दिए थे.
संस्कृति का दिखावा और छवि निर्माण
पश्चिम बंगाल में सांस्कृतिक और बौद्धिक प्रोत्साहन के प्रति नरेंद्र मोदी का नज़रिया 2014 और 2026 के बीच बंगाली प्रतीकों का सम्मान करने, विरासत की इमारतों को सहेजने, बंगाली भाषा को ऊँचा उठाने और दौरों व प्रतीकात्मक पहलों के ज़रिए सांस्कृतिक विरासत को पर्यटन से जोड़ने पर केंद्रित रहा है. मोदी ने अक्सर बंगाल की विरासत को अपने “विकसित भारत” के विज़न से जोड़ने के लिए रवींद्रनाथ ठाकुर, ईश्वर चंद्र विद्यासागर और स्वामी विवेकानंद जैसी हस्तियों का नाम लिया. हालाँकि, ये कोशिशें ज़रूरी नहीं कि बंगाल के सामाजिक, सांस्कृतिक या आर्थिक विकास की दिशा में की गई थीं. सांस्कृतिक संस्थानों के उनके दौरों पर क़रीब से नज़र डालने से पता चलता है कि उनका मक़सद अक्सर संस्थागत विकास से ज़्यादा अपनी छवि चमकाना था. भगवा इकोसिस्टम का दावा है कि मोदी ने बेलूर मठ जैसे स्थानों के दौरों और सांस्कृतिक समारोहों में हिस्सा लेकर बंगाल की सांस्कृतिक पहचान के साथ गहरा जुड़ाव बनाया. फिर भी उन्होंने केवल दौरा किया, प्रार्थना की और चले गए. उन्हें यह साफ़ करना चाहिए कि उन्होंने इन संस्थानों में वाक़ई में क्या ठोस योगदान दिया.
अक्टूबर 2024 में, मोदी ने बंगाली भाषा को इसकी प्राचीन विरासत और साहित्यिक समृद्धि की मान्यता के रूप में ‘शास्त्रीय भाषा’ का दर्ज़ा दिया. लेकिन बंगाली को 1913 में ही दुनिया भर में मान्यता मिल गई थी जब रवींद्रनाथ ठाकुर ने साहित्य में नोबेल पुरस्कार जीता था. वे यह सम्मान पाने वाले पहले ग़ैर-यूरोपीय, पहले एशियाई और एकमात्र भारतीय बने, जिन्होंने बंगाली साहित्य और भारतीय लेखन को मज़बूती से वैश्विक मंच पर स्थापित किया. मोदी जो कुछ भी करते हैं उसे अक्सर आत्म-प्रशंसा और इमेज मैनेजमेंट के रूप में पेश किया जाता है. इसमें अक्सर ईमानदारी और सच्चाई की कमी होती है. सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों को तेज़ी से मोदी की “सुपरहीरो” छवि बनाने के लिए तैयार किया जाता है, जो अक्सर तमाशे के शोर में नीति की असलियत को छिपा देता है.
चुनाव प्रचार और सुवेंदु अधिकारी का उभार
2026 की शुरुआत में पश्चिम बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य बंगाली संस्कृति और पहचान पर तेज़ नैरेटिव की लड़ाइयों से भरा था. भाजपा ने ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस को भारी निशाना बनाया, यह आरोप लगाते हुए कि बंगाल ने अपनी सांस्कृतिक पहचान खो दी है और ठहराव के दौर में प्रवेश कर गया है. नरेंद्र मोदी ने बंगाल की विरासत को “बचाने” के नाम पर चुनाव प्रचार किया. इस अभियान में पिछले प्रशासन से मतदाताओं को दूर करने की कोशिश में “सांस्कृतिक पुनरुत्थान” पर केंद्रित एक नई राजनीतिक पहचान बनाने में करोड़ों रुपये फूँके गए. विडंबना यह है कि भाजपा ने रवींद्रनाथ ठाकुर और स्वामी विवेकानंद जैसी हस्तियों का नाम लेकर अपने अभियान को “सच्ची” बंगाली परंपराओं के पुनरुद्धार के रूप में पेश किया. इस जीत में भाजपा के दल-बदलू सुवेंदु अधिकारी का उभार भी देखा गया, जो पश्चिम बंगाल में पहली भाजपा सरकार का नेतृत्व करने गए.
भाजपा अब दावा करती है कि बंगाल सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में अपनी नींद से बाहर निकलेगा. फिर भी यह समझना मुश्किल है कि सुवेंदु जैसा नेता, जिसने खुले तौर पर दावा किया था कि भवानीपुर और नंदीग्राम में उनकी जीत एकजुट हिंदू समर्थन की वजह से हुई थी और इसलिए वे हिंदू हितों को प्राथमिकता देंगे, वह वाक़ई में सभी बंगालियों की नुमाइंदगी करने का दावा कैसे कर सकता है. उन्होंने आरोप लगाया कि मुस्लिम मतदाताओं ने पूरी तरह से तृणमूल कांग्रेस का समर्थन किया था और उन्हें ‘कठोर’ बताया, जिसका सीधा मतलब यह था कि वे उनके लिए काम नहीं करेंगे. हालाँकि बाद में शपथ लेने के बाद उन्होंने अपना बयान पलट दिया और सभी समुदायों की सेवा करने का वादा किया, लेकिन यह अभी भी साफ़ नहीं है कि कौन सा रूप उनकी असली राजनीतिक मंशा को दिखाता है. उनके बयानों ने बंगाल में बढ़ते सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर तेज़ बहस और आरोपों को जन्म दिया.
रवींद्रनाथ ठाकुर ने, ख़ासकर अपने आख़िरी सालों के दौरान सभ्यता की विफलताओं पर अपने चिंतन में, अपनी रचना ‘क्राइसिस इन सिविलाइज़ेशन’ में गहरी पीड़ा ज़ाहिर की थी. अपने जीवन के अंत में, उनका पश्चिमी सभ्यता से गहरा मोहभंग हो गया था. अपने अंतिम संबोधन, ‘सभ्यतार संकट’ में, जिसे 1941 में लिखा गया था, ठाकुर ने गहरी निराशा व्यक्त की. यह कहते हुए कि पश्चिमी सभ्यता की “मानवता” में उनका विश्वास पूरी तरह ढह गया है, और इसे एक नैतिक नींद में फँसा हुआ बताया.
यह लेख वरिष्ठ पत्रकार अरुण श्रीवास्तव का है. वह काउंटर करेंट्स के लिए लिखते हैं. मूल लेख यहाँ पढ़ा जा सकता है.
ओडिशा में अवैध उत्खनन का विरोध करने वाले युवक की खनन माफिया ने बेरहमी से हत्या की
ओडिशा के नयागढ़ जिले में अवैध पत्थर उत्खनन गतिविधियों को रोकने की कोशिश करने पर खनन माफिया के गुर्गों द्वारा एक युवक की कुल्हाड़ी से काटकर हत्या कर दी गई. इस घटना के बाद सोमवार को इलाके में व्यापक आक्रोश और विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया. यह नृशंस हत्या नयागढ़ जिले के ओड़गाँव पुलिस सीमा के अंतर्गत कदलीबांध गांव में रविवार रात करीब 2 बजे हुई. मृतक की पहचान अजीत कुमार साहू के रूप में हुई है.
‘डेक्कन क्रॉनिकल’ के अनुसार, अजीत काफी समय से क्षेत्र में मानकड़ा पत्थरों (लेटराइट पत्थरों) के अवैध उत्खनन और परिवहन का सक्रिय रूप से विरोध कर रहा था. निवासियों ने आरोप लगाया कि स्थानीय लोगों की बार-बार की आपत्तियों के बावजूद क्षेत्र में अनधिकृत उत्खनन कार्य खुलेआम चल रहा था. अजीत ने हमले से कुछ समय पहले अवैध रूप से उत्खनन किए गए पत्थरों को ले जा रहे एक वाहन को रोका था और इस मामले में पुलिस कंट्रोल रूम को सूचित किया था. लेकिन पुलिस को सूचना दिए जाने के बावजूद कोई तत्काल कार्रवाई नहीं की गई.
स्थानीय लोगों ने आगे दावा किया कि उत्खनन गतिविधियों के प्रति बार-बार विरोध जताने के कारण, अवैध खनन नेटवर्क से जुड़े लोगों के साथ अजीत की दुश्मनी हो गई थी. ग्रामीणों का आरोप है कि उसका बायां हाथ काट दिया गया था, जो हत्या की अत्यधिक क्रूरता को दर्शाता है. अत्यधिक रक्तस्राव और गंभीर चोटों के कारण अजीत की मौके पर ही मौत हो गई. इस हत्या से पूरे इलाके में दहशत और गुस्सा फैल गया. सोमवार सुबह सैकड़ों ग्रामीण सड़कों पर उतर आए और तत्काल गिरफ्तारी तथा क्षेत्र में सक्रिय कथित खनन माफिया पर कार्रवाई की मांग करने लगे. प्रदर्शनकारियों ने व्यस्त नयागढ़-ओड़गाँव सड़क पर चक्काजाम कर दिया, जिससे कई घंटों तक वाहनों की आवाजाही बाधित रही और सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं. प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन पर बार-बार शिकायतों के बावजूद अवैध उत्खनन पर लगाम लगाने में विफल रहने का आरोप लगाया और चेतावनी दी कि जब तक संगठित खनन सिंडिकेट के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं की जाती, तब तक ऐसी घटनाएं जारी रहेंगी.
आकार पटेल | ओडिशा में ईसाइयों के ख़िलाफ़ अत्याचार
इस महीने मैं ओडिशा में था. एक जन-न्यायाधिकरण (पीपल्स ट्रिब्युनल) के हिस्से के तौर पर, जो ईसाइयों के ख़िलाफ़ अत्याचारों की जाँच कर रहा था — ख़ासकर आदिवासियों के ख़िलाफ़. मैं और न्यायाधिकरण के दूसरे सदस्य, करवान-ए-मोहब्बत संगठन के साथ नबरंगपुर, जयपुर, बालासोर और बारीपदा गए. वहाँ हमने क़रीब 300 महिलाओं और पुरुषों की गवाहियाँ सुनीं, जिनमें से 90 प्रतिशत से ज़्यादा आदिवासी थे.
जो हमने सुना और देखा, उससे यह साफ़ है कि पिछले दो वर्षों में ओडिशा की सरकार एक तरफ़ हट गई है — और इसने व्यक्तियों के संवैधानिक और मौलिक अधिकारों को रौंदे जाने दिया है. ईसाइयों के ख़िलाफ़ संगठित हिंसा को अनुमति दी जा रही है. और जब सरकारी तंत्र हरकत में आता है, तो ज़्यादातर पीड़ितों को न्याय मिलने से रोकने की कोशिश में.
हिंसा एक तय साँचे में ढल गई है — जैसा इस देश में हिन्दुत्ववादी कार्रवाइयों के साथ होता आया है. कोई एक घटना होती है — अक्सर किसी क़ानून के पास होने से शुरू होती है — और फिर एक जैसी घटनाओं की बाढ़ आ जाती है. गोमांस के नाम पर लिंचिंग, लव जिहाद, बुलडोज़र — और इसी तरह. एक और बात जो साफ़ दिखी वो यह थी कि अत्याचारों की रफ़्तार तेज़ होती जा रही है — जैसे-जैसे यह साँचा पूरे राज्य में समझा जा रहा है और दोहराया जा रहा है.
ओडिशा में हमने चार तरह के अत्याचार देखे.
पहला — आदिवासी ईसाइयों को ज़बरदस्ती दफ़नाने से रोकना. उन्हें अब गाँव के उस साझा क़ब्रिस्तान में अपने मृतकों को दफ़नाने की इजाज़त नहीं दी जा रही जहाँ दूसरे आदिवासी दफ़नाए जाते हैं. यहाँ तक कि उन्हें अपनी ख़ुद की ज़मीन पर भी दफ़नाने से रोका जा रहा है. भीड़ जमा होकर जनाज़े की नमाज़ और दफ़नाने को शारीरिक रूप से रोकती है. शव इंतज़ार में पड़े रहते हैं — कभी बर्फ़ पर, कभी सड़ते हुए — जब तक “बातचीत” चलती रहती है. पुलिस की दिलचस्पी क़ानून से ज़्यादा “शांति” में है — यानी वो कोई झंझट नहीं चाहती, इसलिए भीड़ का साथ देती है.
दूसरा — ईसाइयों का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार. जो लोग उनसे मेल-जोल रखें या उन्हें सामान बेचें उन पर जुर्माना लगाया जाता है. यहाँ तक कि परिवारों को अपने बेटे-बेटियों को घर से निकालने पर मजबूर किया गया. इनमें से कई लोगों के पास न काम है न गुज़ारे का कोई ज़रिया. कई जंगल में रह रहे हैं. और इन मामलों में से लगभग सभी इसी साल के हैं — बहुत से तो पिछले दो महीनों के.
तीसरा — ईसाई आराधना स्थलों पर हमले. चैपलों, घरेलू गिरजाघरों, पादरियों और पुरोहितों पर. प्रार्थना सभाओं और सामूहिक आराधना को ज़बरदस्ती बाधित करने और बंद कराने की कई घटनाएँ हुईं. जब पुलिस आती है, तो पीड़ितों पर ही ग़ैर-क़ानूनी धार्मिक धर्मांतरण के झूठे आरोप लगा दिए जाते हैं. पीड़ितों को जेल में डाल दिया जाता है, जबकि भीड़ आज़ाद घूमती रहती है — यह आम बात हो गई है.
चौथा — और अनुमानित — तरीक़ा था सीधी हिंसा. ईसाई महिलाओं और पुरुषों पर शारीरिक हमले — उन्हें बाँधा गया, पीटा गया, कपड़े उतारे गए, अपमानित किया गया और अपना धर्म मानने के लिए घायल किया गया. (यह पढ़कर शुरुआती ईसाई शहीदों की वो कहानियाँ याद आ गईं जो कभी पढ़ी थीं.)
लोगों को पेड़ से बाँधा गया, बोरों में भरकर पीटा गया. कुछ के साथ यौन हिंसा हुई. कुछ को ज़िंदा जलाने की कोशिश हुई — जो आख़िरी वक़्त पर ही रोकी जा सकी.
इन सबके दौरान सरकार क्या कर रही थी? हिंसा के ज़्यादातर मामलों में पुलिस ने आपराधिक मुक़दमे उन्हीं लोगों के ख़िलाफ़ दर्ज किए जिन पर हमला हुआ — और फिर उन्हें थानों और जेलों में बंद कर दिया. ऐसे मामले भी सामने आए जहाँ पुलिस ने ख़ुद ईसाइयों को डराने-धमकाने और उनके ख़िलाफ़ हिंसा में सीधी भूमिका निभाई.
यह कहना ग़लत नहीं होगा कि हमने जो देखा वो जानबूझकर कर्तव्य से मुँह मोड़ना था — और संवैधानिक तंत्र का पूरी तरह ध्वस्त होना था. यह नतीजा अपरिहार्य है. क्योंकि बार-बार लोगों ने हमें बताया कि पुलिस ने हिन्दुत्ववादी संगठनों के साथ मिलकर उन पर दबाव डाला कि वो “समझौता” पत्रों पर दस्तख़त करें — जिनमें वो अपना ईसाई धर्म और सामूहिक आराधना छोड़ने का वादा करते हैं.
राज्य ने साम्प्रदायिक रंग ले लिया है — यह हैरानी की बात नहीं, क्योंकि अब इसे भारतीय जनता पार्टी चला रही है. और उसकी अल्पसंख्यक-विरोधी विचारधारा से जुड़े तत्वों को खुली छूट दी जा रही है.
न्यायाधिकरण ने राज्य के मुख्य सचिव को पत्र लिखा है — यह उम्मीद करते हुए कि सरकार यह समझे कि यह मामला कितना गंभीर है और उस पर कार्रवाई करना उसकी ज़िम्मेदारी है. शायद सबूत उन्हें हिला दे. हम साँस रोककर इंतज़ार नहीं करेंगे.
आख़िर में एक बात और कहनी है. जिस गरिमा के साथ आदिवासियों ने अपनी आपबीती सुनाई, वो बेमिसाल थी. अपने ख़िलाफ़ हुए अपराधों का ब्यौरा देते हुए वो स्थिर और शांत थे. इनमें महिलाएँ भी थीं. उनमें से एक महिला जब अपने साथ हुई यौन हिंसा का वर्णन कर रही थी, तो एक पल के लिए रुकी, आँखें पोंछीं और फिर बोलती रही.
बहुत से चेहरे मेरे ज़ेहन में बस गए हैं — जैसे वो नोट्स में बसे हैं जो मैंने लिए थे.
एक नौजवान, जब अपनी बात ख़त्म कर रहा था, तो अचानक प्रार्थना करने लगा. हमारे दुभाषिए ने बताया कि यह भजन बाइबल की साम 23 था. मैंने बाद में देखा — यह कुछ ऐसा था जो मुझे स्कूल से याद था:
“प्रभु मेरा चरवाहा है, मुझे किसी बात की कमी न होगी. वो मुझे हरे-भरे मैदानों में लिटाता है. वो मुझे शांत जल के किनारे ले जाता है. वो मेरी आत्मा को ताज़ा करता है. वो अपने नाम के लिए मुझे धर्म के मार्ग पर ले चलता है. हाँ, चाहे मैं मृत्यु की छाया की घाटी में चलूँ, मुझे किसी बुराई का डर न होगा, क्योंकि तू मेरे साथ है.”
अग्निवीर नियमित सैनिकों के समान नहीं, मृत्यु पर समान लाभ का दावा नहीं कर सकते: केंद्र ने अदालत से कहा
केंद्र सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट में पिछले सप्ताह दायर एक हलफनामे में सूचित किया है कि युद्ध या ड्यूटी के दौरान मृत्यु होने की स्थिति में, अग्निवीर अपने परिजनों के लिए पेंशन लाभ के मामले में नियमित सैनिकों के साथ समानता का दावा नहीं कर सकते. यह हलफनामा एक मृतक अग्निवीर की माँ द्वारा दायर याचिका के जवाब में दिया गया है.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, मुरली नायक पिछले साल 9 मई को जम्मू-कश्मीर के पुंछ में तब शहीद हो गए थे, जब पाकिस्तान सेना ने भारी सीमा पार गोलाबारी और मोर्टार हमले किए थे. यह हमला भारत द्वारा अप्रैल में हुए पहलगाम आतंकवादी हमले (जिसमें 26 लोग मारे गए थे) के जवाब में शुरू किए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान हुआ था. उनकी माँ, ज्योतिबाई नायक की याचिका में तर्क दिया गया था कि अग्निवीर नियमित सैनिकों के समान ही कर्तव्यों का पालन करते हैं और समान जोखिमों का सामना करते हैं, फिर भी इस अल्पकालिक भर्ती योजना के तहत भर्ती किए गए लोगों के परिवारों को दीर्घकालिक पेंशन और अन्य कल्याणकारी लाभों से वंचित रखा जाता है.
अधिवक्ता संदेश मोरे, हेमंत घाडीगांवकर और हितेंद्र गांधी के माध्यम से पिछले साल दायर इस याचिका में कहा गया था कि केंद्र की ‘अग्निपथ योजना’ अग्निवीरों और नियमित सैनिकों के बीच एक “मनमाना” अंतर पैदा करती है. याचिका में परिवार को पूर्ण मृत्यु लाभ देने से इनकार करने को “भेदभावपूर्ण” बताते हुए सवाल उठाए गए थे. सरकार ने अपने हलफनामे में स्पष्ट किया कि अग्निवीर नियमित सैनिकों की तरह “समान स्थिति” में नहीं हैं. सरकार ने कहा कि जहाँ अग्निवीरों को चार साल की निश्चित अवधि के लिए नियुक्त किया जाता है, वहीं सशस्त्र बलों में पेंशन लाभ और अन्य उपलब्धियाँ दीर्घकालिक सेवा से जुड़ी होती हैं.
सरकार ने अपने हलफनामे में कहा, “अलग-अलग श्रेणियों के व्यक्तियों के बीच कोई समानता नहीं हो सकती. यह वर्गीकरण और भेदभाव अग्निपथ योजना के उद्देश्यों के साथ एक तर्कसंगत संबंध रखता है और इसलिए, भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत संवैधानिक रूप से वैध है.”
इसमें आगे कहा गया कि जहाँ ‘सेना अधिनियम’ सैन्य बलों के लिए ऐतिहासिक और कानूनी आधार प्रदान करता है, वहीं अग्निपथ नीति वर्तमान समय की राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यकताओं के लिए तैयार किया गया एक आधुनिक विधायी और कार्यकारी विकास है.
हलफनामे में कहा गया कि योजना के सेवा नियमों और शर्तों को स्वीकार करने के बाद, मृतक अग्निवीर की माँ अब अग्निवीर श्रेणी पर नियमित सैनिकों के सेवा लाभों को भूतलक्षी रूप से लागू करने की मांग नहीं कर सकती हैं.
इसमें रेखांकित किया गया कि अग्निवीरों और नियमित सैनिकों के बीच का वर्गीकरण ‘सुस्पष्ट अंतर’ पर आधारित है, जिसमें सेवा का कार्यकाल, नियुक्ति की प्रकृति और भर्ती की शर्तें शामिल हैं. सशस्त्र बलों के लिए नई अग्निपथ योजना के माध्यम से व्यक्तियों की भर्ती करने का केंद्र का निर्णय, राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों से लिया गया एक नीतिगत निर्णय है.
सरकार ने याचिका को खारिज करने की मांग करते हुए कहा कि राष्ट्र की अखंडता और सुरक्षा से संबंधित ऐसे नीतिगत निर्णयों की न्यायिक समीक्षा सीमित होती है. सरकार ने कहा कि याचिकाकर्ता इस “गलत धारणा” में थीं कि अग्निवीर नियमित सैनिकों के समान पेंशन लाभ के हकदार हैं.
हलफनामे में कहा गया कि अग्निपथ योजना में मृतक अग्निवीर के परिजनों को पारिवारिक पेंशन देने का कोई प्रावधान नहीं है. सरकार ने तर्क दिया कि अग्निपथ योजना का उद्देश्य एक “युवा, फुर्तीली और तकनीकी रूप से उन्नत” सशस्त्र बल बनाए रखना है, और इस योजना की संवैधानिक वैधता को दिल्ली उच्च न्यायालय और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पहले ही बरकरार रखा जा चुका है.
हलफनामे में कहा गया कि सीमा की विशिष्ट स्थिति, निरंतर खतरों और शत्रुतापूर्ण पड़ोसी देशों द्वारा सीमाओं में घुसपैठ की कोशिशों को देखते हुए, भारत को एक ऐसी विशिष्ट सेना की आवश्यकता है जो सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए ऐसी शत्रुता, घुसपैठ, छद्म युद्ध और आक्रमणों से निपट सके.
इसमें आगे जोड़ा गया कि मुरली नायक को ‘बैटल कैजुअल्टी’ (युद्ध हताहत) और ‘किल्ड इन एक्शन’ (कार्रवाई में शहीद) घोषित किया गया था और सशस्त्र बलों में “शहीद” शब्द का उपयोग नहीं किया जाता है.
हलफनामे में कहा गया कि याचिकाकर्ता के बेटे का अंतिम संस्कार पूरे सैन्य सम्मान के साथ किया गया था, और उन्हें रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर से एक “हार्दिक” शोक पत्र मिला था, जैसा कि नियमित सैनिकों के लिए किया जाता है.
इसमें कहा गया, “अग्निपथ योजना के तहत सभी स्वीकार्य वित्तीय और सेवा-समाप्ति लाभ विधिवत रूप से याचिकाकर्ता को वितरित कर दिए गए हैं. कुल मुआवजे की राशि लगभग ₹2.3 करोड़ है, जिसमें बीमा कवर और मुआवजा शामिल है.”
अंत में कहा गया कि इसलिए याचिकाकर्ता के मौलिक अधिकारों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है. इस याचिका पर 18 जून को सुनवाई होगी.
कश्मीर में वीपीएन बैन: सुरक्षा के नाम पर डिजिटल रोज़गार पर चोट
जम्मू-कश्मीर में वीपीएनपर लगाया गया प्रतिबंध अब केवल “सुरक्षा उपाय” भर नहीं रह गया है. इसका असर सीधे उन युवाओं की ज़िंदगी पर पड़ रहा है, जिनकी रोज़ी-रोटी इंटरनेट और रिमोट काम पर टिकी हुई है. श्रीनगर, शोपियां, कुलगाम, पुलवामा समेत नौ जिलों में दिसंबर 2025 के अंत में लागू किए गए इस प्रतिबंध ने पत्रकारों, आईटी कर्मचारियों और फ्रीलांसरों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है.
प्रशासन का दावा है किवीपीएन का इस्तेमाल “अफवाह फैलाने” और “अशांति भड़काने” के लिए किया जा रहा था. लेकिन ज़मीनी तस्वीर कहीं अधिक जटिल दिखाई देती है. जिन लोगों के लिए वीपीएन पेशेवर आवश्यकता था, वे अचानक संदेह के घेरे में आ गए हैं.
श्रीनगर की 28 वर्षीय एक स्वतंत्र पत्रकार बताती हैं कि वीपीएन उनके लिए केवल तकनीकी सुविधा नहीं बल्कि सुरक्षा कवच था. अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग करते हुए वह एन्क्रिप्टेड संचार और सुरक्षित डेटा ट्रांसफर के लिए वीपीएन का इस्तेमाल करती थीं. प्रतिबंध के बाद उनके दो असाइनमेंट रुक गए और लगभग 10 हजार रुपये का नुकसान हुआ.
उनके शब्दों में, “वीपीएन के बिना संवेदनशील रिपोर्टिंग करना जोखिम भरा हो गया है.”
इसी तरह शोपियां के एक आईटी कर्मचारी, जो बेंगलुरु स्थित कंपनी के लिए घर से काम करते हैं, अब अपने दफ्तर के सर्वर तक सुरक्षित तरीके से पहुंच ही नहीं पा रहे. उनका कहना है कि वीपीएन के बिना कंपनी के सुरक्षा प्रोटोकॉल पूरे नहीं हो सकते. उन्हें डर है कि अगर स्थिति लंबी चली तो नौकरी बचाना मुश्किल हो जाएगा.
कश्मीर में यह संकट इसलिए और गंभीर है क्योंकि यहां बेरोज़गारी पहले से ही राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में शहरी युवाओं के बीच बेरोज़गारी दर 30 प्रतिशत से अधिक रही है. निजी उद्योगों की कमी और सरकारी भर्तियों में देरी के कारण बड़ी संख्या में युवा ऑनलाइन फ्रीलांसिंग और रिमोट नौकरियों पर निर्भर हो चुके हैं. ऐसे में वीपीएन प्रतिबंध सीधे उनकी आय और भविष्य को प्रभावित कर रहा है.
इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू सिर्फ इंटरनेट प्रतिबंध नहीं बल्कि उसके बाद शुरू हुई निगरानी प्रक्रिया है. कई जिलों में पुलिस द्वारा सड़कों और बाज़ारों में लोगों के मोबाइल फोन चेक करने की खबरें सामने आई हैं. स्थानीय लोगों का आरोप है कि उनसे फोन अनलॉक करवाकर न केवल वीपीएन ऐप्स देखे गए बल्कि निजी फोटो और इंटरनेट गतिविधियां भी खंगाली गईं.
यहीं से यह मामला सुरक्षा बनाम निजता की बहस में बदल जाता है.
सुप्रीम कोर्ट पहले ही 2017 के पुट्टस्वामी फैसले में निजता को मौलिक अधिकार घोषित कर चुका है. वहीं 2020 के अनुराधा भसीन मामले में अदालत ने इंटरनेट तक पहुंच को अभिव्यक्ति और पेशे की स्वतंत्रता से जोड़ा था. कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी प्रकार का प्रतिबंध “अस्थायी, तार्किक और समीक्षा योग्य” होना चाहिए.
ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या व्यापक स्तर पर वीपीएन प्रतिबंध और मोबाइल फोन की जांच संवैधानिक सीमाओं के भीतर है? या फिर सुरक्षा के नाम पर नागरिक स्वतंत्रताओं का दायरा लगातार सिकुड़ता जा रहा है?
कश्मीर के युवाओं के लिए यह बहस केवल सिद्धांत की नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी की है. किसी के लिए यह नौकरी का सवाल है, किसी के लिए पत्रकारिता का, और किसी के लिए अपने निजी जीवन की सुरक्षा का.
सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा होती है. लेकिन जब नागरिक खुद को हर समय संदेह और निगरानी के दायरे में महसूस करने लगें, तब यह सवाल और भी जरूरी हो जाता है कि आखिर लोकतंत्र में “सुरक्षा” की सीमा कहां खत्म होती है और “अधिकार” कहां से शुरू होते हैं।
आर्टिकल 14 की इस रिपोर्ट में लेखक का नाम उजागर नहीं किया गया है. पूरी रिपोर्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है.
मागा का मोहभंग: ट्रम्प से टकराने वाले टकर कार्लसन
ट्रम्प से बग़ावत, इज़राइल पर हमला, और ईरान युद्ध के सवाल
‘दि न्यू यॉर्क टाइम्स’ के मुताबिक,अमेरिकी मीडिया के सबसे विवादास्पद और प्रभावशाली चेहरों में से एक, टकर कार्लसन, आजकल उस मोड़ पर खड़े हैं जहाँ उनकी ज़िंदगी के सबसे बड़े राजनीतिक फ़ैसलों का हिसाब हो रहा है. एक वक़्त था जब वे डोनाल्ड ट्रम्प के सबसे मुखर समर्थकों में गिने जाते थे. आज वही कार्लसन ट्रम्प को अमेरिकी इतिहास की सबसे बड़ी भूलों में से एक मानते हैं.
फ़ॉक्स न्यूज़ के सबसे ज़्यादा देखे जाने वाले एंकर के रूप में उनका करियर एक दशक से ज़्यादा समय तक अमेरिकी राइट-विंग मीडिया की रीढ़ रहा. 2023 में फ़ॉक्स से निकाले जाने के बाद, उन्होंने अपना स्वतंत्र पॉडकास्ट और टकर कार्लसन नेटवर्क शुरू किया, जो आज लाखों लोगों तक पहुँचता है. लेकिन 2026 की शुरुआत में, जब अमेरिका और इज़्राइल ने मिलकर ईरान पर हमले किए, तो कार्लसन के सुर पूरी तरह बदल गए.
ट्रम्प से टूटन
फ़रवरी 2026 में ट्रम्प प्रशासन ने इज़्राइल के साथ मिलकर ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले किए. यही वह पल था जब कार्लसन और ट्रम्प के बीच की दरार स्थायी खाई में बदल गई. कार्लसन ने अपने न्यूज़लेटर में लिखा कि अमेरिका को इज़्राइल को “छोड़ देना चाहिए” और उन्हें अपनी लड़ाई ख़ुद लड़ने देनी चाहिए. उन्होंने कहा: “अगर इज़्राइल यह युद्ध लड़ना चाहता है तो उसे हक़ है, लेकिन अमेरिका के समर्थन से नहीं.”
ट्रम्प ने जवाब में कार्लसन को “कूकी” यानी “सनकी” और “लो आई.क्यू.” यानी “कम बुद्धि वाला” कहा. लेकिन कार्लसन नहीं रुके. अप्रैल 2026 में अपने पॉडकास्ट पर भाई बकले के साथ बातचीत में उन्होंने जो कुछ कहा, वह अमेरिकी राजनीति में एक दुर्लभ सार्वजनिक आत्म-स्वीकृति था. उन्होंने कहा कि वे ट्रम्प को चुनाव जिताने में मदद करने के लिए “टॉर्मेंटेड” यानी मानसिक रूप से पीड़ित हैं, और उन्होंने माफ़ी माँगी: “मुझे खेद है कि मैंने लोगों को गुमराह किया.”
कार्लसन ने यहाँ तक कह दिया: “हम सब दिखावा कर रहे हैं कि हमें बहुत कुछ मिला, क्योंकि यह स्वीकार करना कि यह एक आपदा रही है, बहुत कठिन है. लेकिन सच यही है. ट्रम्प का कोई सकारात्मक पहलू नहीं बचा.”
इज़्राइल, नेतन्याहू और एआईपीएसी पर निशाना
कार्लसन की आलोचना सिर्फ़ ट्रम्प तक सीमित नहीं है. उनके निशाने पर इज़्राइल, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और अमेरिकी राजनीति में इज़्राइली लॉबी आईपैक का ज़बरदस्त प्रभाव भी है. न्यू यॉर्क टाइम्स को दिए एक विस्तृत साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि ट्रम्प को इज़्राइल ने “बंधक” बना रखा था. उनके शब्द थे: “नेतन्याहू एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिनसे ट्रम्प यह नहीं कह सके. ‘शांत हो जाओ वरना हम तुम्हारी फ़ंडिंग बंद कर देंगे.’”
उन्होंने युद्ध के लिए दबाव बनाने वालों में रूपर्ट मर्डोक, मिरियम एडेलसन, सीन हैनिटी और मार्क लेविन जैसे इज़्राइल-समर्थक हस्तियों का नाम लिया. उनके अनुसार: “वे सब ट्रम्प को बता रहे थे कि तुम इज़्राइल को बचाओगे और उसे छुटकारा दिलाओगे.”
आईपैक के बारे में उनकी टिप्पणी और भी तीखी थी. कार्लसन ने कहा: “अमेरिकी कांग्रेस के लगभग 500 सदस्य आईपैक से पैसे लेते हैं.” यह बयान अमेरिकी राजनीति में एक वर्जित सच्चाई को खुलेआम कहने जैसा था. कार्लसन ने यह भी स्पष्ट किया कि वे यहूदी-विरोधी नहीं हैं, बल्कि वे अमेरिकी संप्रभुता और “अमेरिका फ़र्स्ट” नीति के पक्षधर हैं.
उन्होंने कहा कि ट्रम्प उस हर चीज़ के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं जिसका वादा उन्होंने चुनाव में किया था: “उन्होंने उन चीज़ों के ख़िलाफ़ प्रचार किया था जो वे अब कर रहे हैं.”
ईरान युद्ध के सवाल
कार्लसन का सबसे बड़ा सरोकार ईरान युद्ध की नैतिकता और रणनीतिक औचित्य को लेकर है. उनके अनुसार ईरान को परमाणु हथियार मिलने का ख़तरा निराधार था और यह युद्ध अमेरिकी करदाताओं और सैनिकों के लिए एक गहरा विश्वासघात है. न्यू यॉर्क टाइम्स साक्षात्कार में उन्होंने यह भी कहा कि ट्रम्प इस युद्ध में एक “स्वतंत्र निर्णय-निर्माता” नहीं, बल्कि एक “बंधक” की तरह थे. यह सामान्य निर्णय-प्रक्रिया नहीं थी.
कार्लसन ने चेतावनी दी थी कि ईरान युद्ध में अमेरिका की सीधी भागीदारी से हज़ारों अमेरिकी सैनिकों की जान जा सकती है और यह ट्रम्प की राजनीतिक विरासत को नष्ट कर देगा. सी.एन.एन. के एक विश्लेषण के अनुसार, उनकी आलोचना ने ट्रम्प समर्थकों में से उन लोगों को युद्ध-विरोध की दिशा में खुलकर बोलने की हिम्मत दी जो पहले चुप थे. एक सी.एन.एन. सर्वेक्षण में 28% ट्रम्प मतदाताओं ने ईरान नीति पर असहमति जताई.
मागा में दरार और भविष्य की राजनीति
अमेरिकी राइट इस वक़्त इज़्राइल के मुद्दे पर एक गृहयुद्ध जैसी स्थिति में है. कार्लसन के साथ-साथ कैंडेस ओवेन्स और मार्जोरी टेलर ग्रीन जैसी हस्तियाँ भी ट्रम्प की इज़्राइल-समर्थक नीति से नाराज़ हैं. सवाल यह है कि क्या मागा एक व्यक्ति यानी ट्रम्प की पार्टी है, या एक विचारधारा की?
कार्लसन स्पष्ट रूप से ख़ुद को उस विचारधारा का रखवाला मानते हैं जो अमेरिका को विदेशी युद्धों और लॉबी के प्रभाव से मुक्त देखना चाहती है. 2028 के राष्ट्रपति चुनाव में उनकी भूमिका को लेकर भी अटकलें तेज़ हैं.
टकर कार्लसन आज अमेरिकी राजनीति में एक ऐसे मुकाम पर हैं जहाँ से वापसी मुश्किल है. उन्होंने जो सवाल उठाए हैं — ईरान युद्ध की ज़रूरत क्या थी? आईपैक का प्रभाव कितना गहरा है? क्या अमेरिका किसी और देश की जंग लड़ रहा है? — ये सवाल आसानी से दबाए नहीं जा सकते. चाहे उनके समर्थक हों या आलोचक, यह मानना होगा कि एक बार की मुख्यधारा की आवाज़ आज सत्ता के सबसे असुविधाजनक प्रश्न पूछ रही है.
हर 36 मिनट में एक मौत. भारत का मानसिक स्वास्थ्य संकट कितना गहरा है?
‘साउथ फर्स्ट’ के मुताबिक, भारत में मानसिक बीमारी अब सिर्फ एक स्वास्थ्य समस्या नहीं रही. यह एक ऐसा सामाजिक संकट बन चुकी है जो हर 36 मिनट में एक जान ले रहा है. राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो की 2024 की रिपोर्ट बताती है कि बीते साल मानसिक बीमारी से जुड़ी आत्महत्याओं के 14,305 मामले दर्ज किए गए. यानी साल भर में हर दिन लगभग 39 लोग और हर 36 मिनट में एक व्यक्ति ने मानसिक पीड़ा के कारण अपनी जान गंवाई.
यह आँकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं है. इसके पीछे टूटते परिवार, अकेलेपन से जूझते युवा, आर्थिक दबाव में दबे कामकाजी लोग और मदद न मिलने की त्रासदी छिपी हुई है. रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा यह है कि कर्नाटक इस सूची में सबसे ऊपर है और बेंगलुरु देश का वह शहर बन गया है जहाँ मानसिक बीमारी से जुड़ी आत्महत्याएँ सबसे अधिक दर्ज हुईं.
कर्नाटक में 2024 के दौरान ऐसे 2,465 मामले सामने आए. यह पूरे देश के कुल मामलों का लगभग 17 प्रतिशत है. इनमें 1,644 पुरुष और 821 महिलाएँ थीं. अकेले बेंगलुरु में 455 लोगों ने मानसिक बीमारी के कारण आत्महत्या की. तुलना करें तो दिल्ली में यह संख्या 78, मुंबई में 85 और चेन्नई में 52 रही. यानी बेंगलुरु बाकी महानगरों से बहुत आगे दिखाई देता है.
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर देश की तकनीकी राजधानी और “भारत के सबसे आधुनिक शहर” की छवि रखने वाला बेंगलुरु इस संकट का केंद्र क्यों बन रहा है. तेज़ रफ्तार दफ्तर संस्कृति, अकेलापन, महँगा जीवन, नौकरी का दबाव और सामाजिक टूटन इसके पीछे के कारण हो सकते हैं. लेकिन सरकारी आँकड़े कारणों की व्याख्या नहीं करते. वे सिर्फ यह दिखाते हैं कि संकट कितना गहरा है.
रिपोर्ट बताती है कि 18 से 45 वर्ष की उम्र के लोग सबसे अधिक प्रभावित हुए. 18 से 30 वर्ष आयु वर्ग में 4,258 मौतें दर्ज हुईं जबकि 30 से 45 वर्ष आयु वर्ग में यह संख्या 4,375 रही. यानी कुल मौतों का लगभग 60 प्रतिशत उन लोगों का है जिन्हें समाज सबसे उत्पादक उम्र मानता है. नौकरी, परिवार, भविष्य, रिश्ते और आर्थिक जिम्मेदारियों का दबाव मानसिक स्वास्थ्य को किस हद तक प्रभावित कर रहा है, यह आँकड़े साफ दिखाते हैं.
लेकिन संकट सिर्फ युवाओं तक सीमित नहीं है. 45 से 60 वर्ष आयु वर्ग में 3,008 और 60 वर्ष से ऊपर के लोगों में 1,820 मौतें दर्ज हुईं. सबसे भयावह तथ्य यह है कि 18 वर्ष से कम उम्र के 844 बच्चों ने भी मानसिक बीमारी के कारण आत्महत्या की. यानी लगभग हर 10 घंटे में एक बच्चा मानसिक पीड़ा के कारण अपनी जान गंवा रहा था.
यह स्थिति भारत की मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता को भी उजागर करती है. देश में प्रति एक लाख आबादी पर मनोचिकित्सकों की संख्या बेहद कम है. छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ लगभग न के बराबर हैं. दूसरी ओर मानसिक बीमारी को लेकर सामाजिक कलंक इतना गहरा है कि लोग मदद लेने से डरते हैं. परिवार अक्सर अवसाद, चिंता या मानसिक तनाव को कमजोरी या नाटक समझते हैं.
दक्षिण भारत के आँकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं. राष्ट्रीय आत्महत्या दर जहाँ 12.2 प्रति लाख आबादी है, वहीं केरल में यह दर 30.2, तेलंगाना में 28.6, तमिलनाडु में 25.9 और कर्नाटक में 19.3 रही. यानी दक्षिण भारत लगातार राष्ट्रीय औसत से कहीं ऊपर बना हुआ है.
लिंग आधारित आँकड़े भी गंभीर संकेत देते हैं. राष्ट्रीय स्तर पर पुरुषों की संख्या महिलाओं से लगभग दोगुनी रही. लेकिन बेंगलुरु में 162 महिलाओं की आत्महत्या दर्ज हुई, जो देश के किसी भी शहर में सबसे अधिक है. यह बताता है कि मानसिक स्वास्थ्य संकट महिलाओं के बीच भी तेजी से गहराता जा रहा है.
सरकारें अक्सर जागरूकता अभियान चलाने और सहायता क्रमांक शुरू करने की बात करती हैं. लेकिन 14,305 मौतें बताती हैं कि केवल घोषणाएँ काफी नहीं हैं. मानसिक स्वास्थ्य को सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के केंद्र में लाने की जरूरत है. स्कूलों, महाविद्यालयों और कार्यस्थलों में पेशेवर परामर्श को अनिवार्य बनाना होगा. मानसिक बीमारी को शर्म नहीं बल्कि इलाज की जरूरत समझना होगा.
क्योंकि हर 36 मिनट में रुकती एक जिंदगी सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं होती. वह इस बात का प्रमाण होती है कि समाज किसी को समय रहते सुन नहीं पाया.
पेड़ न पंखे: भारत के नमक के मैदानों की भीषण गर्मी में ज़िंदा रहने की जद्दोजहद
भारत को हर साल चुनौतीपूर्ण लू (हीटवेव) का सामना करना पड़ता है, लेकिन देश के पश्चिमी रेगिस्तानी नमक के मैदानों जैसी झुलसाने वाली परिस्थितियों का सामना बहुत कम जगहों पर करना पड़ता है. यहाँ श्रमिक लगभग असहनीय तापमान में जीवित रहने के लिए सरल तकनीकों पर निर्भर रहते हैं. गुजरात में लगभग 50,000 श्रमिक आठ महीने इन सुदूर नमक के मैदानों में बिना बिजली या स्वास्थ्य सेवा के बिताते हैं, जहाँ वे पीने और नहाने के पानी के लिए हर 25 दिनों में आने वाले एक टैंकर पर निर्भर रहते हैं.
‘फ़्रांस 24’ की रिपोर्ट के मुताबिक, जीवित रहने के लिए वे छायादार जगहों पर विश्राम, कपड़े से ठंडी की गई पानी की बोतलों और काम के घंटों में बदलाव (रुक-रुक कर काम करना) जैसी युक्तियों का उपयोग करते हैं. गुजरात के लिटिल रन ऑफ कच्छ में गर्मियों का तापमान आमतौर पर 45 डिग्री को पार कर जाता है और कभी-कभी 47–48 डिग्री तक पहुंच सकता है.
वही शुष्क गर्मी जो जीवन को कष्टकारी बनाती है, रेगिस्तान को नमक उत्पादन के लिए आदर्श भी बनाती है—भारत के कुल नमक उत्पादन का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अकेले गुजरात से आता है.
“हम काम के घंटों में बदलाव करके काम करते हैं... अपना काम सुबह जल्दी और सूर्यास्त के बाद करते हैं,” 42 वर्षीय बाबूलाल नारायण ने कहा, जो उथले कुंडों में खारे पानी के सूखने पर नमक को इकट्ठा करते हैं. सबसे गर्म घंटों के दौरान, कई लोग अस्थायी झोपड़ियों में शरण लेते हैं—जो डंडों के ढांचे पर मोटे हाथ से बुने हुए कपड़े को लपेटकर और जंगली गधे के गोबर से लेप कर बनाई जाती हैं.
17 वर्षीय नमक श्रमिक भावना राठौर ने कहा, “हम हर दो से तीन घंटे में यहाँ बैठते हैं, ताकि हमें कमजोरी या चक्कर न महसूस हो.” उन्होंने समझाया कि गोबर सूरज की किरणों को रोकता है और गर्मी को बाहर निकलने देता है, जबकि मोटा कपड़ा हवा को आर-पार होने देता है. ये झोपड़ियाँ उस परिदृश्य में आश्रय प्रदान करती हैं जहाँ न तो पेड़ हैं और न ही प्राकृतिक छाया, और जहाँ सफेद नमक की परत से सूरज की रोशनी बहुत तेजी से परावर्तित होती है.
44 वर्षीय कंचन नारायण एक गीले कपड़े में लिपटी बोतल का उपयोग करती हैं जिसे एक रस्सी से लटकाया गया है, जो वाष्पीकरण के माध्यम से भीतर के पीने के पानी को ठंडा करती है. उन्होंने कहा, “हवा पानी को ठंडा करने में मदद करती है.” पूर्णिमा नाम की एक श्रमिक दिन के दौरान काली चाय पीती हैं—उनका कहना है कि यह गर्म पेय शुष्क मौसम में पसीना पैदा करता है जिससे शरीर ठंडा रहता है.
बोरवेल से खारे पानी को उथले कुंडों में पंप करके नमक बनाया जाता है, जहाँ धूप और हवा के प्रभाव से पानी वाष्पित हो जाता है. क्रिस्टलीकरण (नमक के दाने बनने की प्रक्रिया) समान रूप से हो, इसके लिए श्रमिक प्रतिदिन सतह को खुरचते हैं. कई हफ़्तों में नमक की एक मोटी परत बन जाती है, जिसे श्रमिक तोड़कर ढेरों में जमा कर लेते हैं.
इस काम में हमेशा से ही कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता रहा है, लेकिन इस साल भारत मौसम विज्ञान विभाग ने गुजरात सहित कई क्षेत्रों में “लू के दिनों की सामान्य से अधिक संख्या” का पूर्वानुमान जताया है. श्रमिक पहले की तुलना में अधिक समय तक गर्मी के संपर्क में रहते हैं. पहले वे खारे पानी को सतह पर लाने के लिए महंगे डीजल पंपों पर निर्भर थे, लेकिन सौर ऊर्जा के उपयोग से लागत कम हो गई है और परिवारों को लंबे समय तक काम करने की सुविधा मिली है. इसका मतलब है कि जो काम पहले मार्च में खत्म हो जाता था, वह अब सबसे गर्म महीनों तक जारी रहता है.
श्रमिकों के लिए इसके परिणाम घातक हो सकते हैं. थकान, चक्कर आना और मतली की नियमित खबरें आती हैं—जो ‘हीट स्ट्रेस’ (गर्मी का तनाव) के लक्षण हैं, जब शरीर की प्राकृतिक शीतलन प्रणाली काम करना बंद कर देती है. इससे अंगों की विफलता (ऑर्गन फेलियर) और यहाँ तक कि मृत्यु भी हो सकती है. कई अध्ययनों में इन समुदायों के बीच निर्जलीकरण, हीट स्ट्रेस और यहाँ तक कि किडनी की खराबी के लक्षण भी पाए गए हैं.
“जब भी बुखार तेज होता है, मैं पैरासिटामोल ले लेती हूँ,” कंचन ने कहा. वह उन विरल श्रमिकों में से एक हैं जो रबर के जूते पहनते हैं—ताकि खारे पानी के लंबे समय तक संपर्क से बचा जा सके, जो त्वचा को इतना गहरा फाड़ सकता है कि खून निकलने लगे.
भारत में ऐसा कोई निश्चित कानूनी तापमान नहीं है जिस पर काम रोकना अनिवार्य हो. इसके बजाय, यह मौसम विभाग के लू के मानकों पर निर्भर करता है—अलर्ट के लिए लगभग 40 डिग्री और “गंभीर” स्थितियों के लिए 47 डिग्री—जिसके बाद स्थानीय अधिकारी प्रतिबंध लगाते हैं. रेगिस्तानी स्थितियाँ अत्यधिक गर्मी में जीवित रहना थोड़ा संभव बनाती हैं—कम आर्द्रता में, पसीना त्वचा से जल्दी वाष्पित हो जाता है, जिससे शरीर ठंडा रहता है.
लेकिन परिस्थितियाँ और कठिन होती जा रही हैं. लू तेज हो रही है और बेमौसम तूफान भी आजीविका के लिए खतरा बन रहे हैं. अचानक आने वाली बारिश रातों-रात बने हुए नमक को घोल सकती है, जिससे श्रमिकों को वाष्पीकरण चक्र फिर से शुरू करने के लिए मजबूर होना पड़ता है. नारायण ने कहा, “पिछले महीने एक बड़ा धूल भरा तूफान आया था, जिससे 200,000 रुपये का नमक नष्ट हो गया.” उन्होंने और उनके पांच रिश्तेदारों ने आठ महीने की कड़ी मेहनत के बाद 250,000 रुपये का लाभ कमाया—यानी प्रत्येक के लिए लगभग 40 हजार रुपये.
लेकिन परिवारों का कहना है कि उनके पास बहुत कम विकल्प हैं. 65 वर्षीय श्रमिक रसोदा राठौर ने कहा, “हम और क्या करेंगे? हमारे पास खेती के लिए जमीन नहीं है, आजीविका कमाने के लिए पशुधन नहीं है... हम बस यही काम जानते हैं.”
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.
















