11/04/2026: शांति के लिए वार्ता| ट्रंप पर पोप भी| आशा भोसले| बंगाल की खातिर| मुजतबा का एक पैर| 10 सैन्य सबक| हसीना प्रत्यर्पण| पहला डिटेंशन सेंटर| 16 साल बाद विक्टर| स्टिल अलाइव
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आशा भोसले को दिल का दौरा: मुंबई के अस्पताल में भर्ती, हालत पर नज़र
बंगाल में चुनाव है: योगी ने यूपी के मियांपुर गाँव का नाम बदलकर ‘रवींद्रनगर’ किया
पाकिस्तान में अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक शांति वार्ता: दशकों की दुश्मनी खत्म करने की कोशिश
ईरान युद्ध पर पोप और ट्रंप के बीच तीखा टकराव: वेटिकन ने अमेरिकी नीतियों को ‘अस्वीकार्य’ बताया
न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममानी के 100 दिन: समाजवाद और शासन की चुनौतियों के बीच एक सफर
ईरान युद्ध में चीन की गुप्त भूमिका: अमेरिका ने मिसाइलों की आपूर्ति और तकनीकी मदद का दावा किया
ईरानी सूत्र का दावा: अमेरिका ईरानी फंड को ‘मुक्त’ करने पर सहमत हुआ, वाशिंगटन ने किया इनकार
रिपोर्ट: ईरान के सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई को आईं गंभीर और चेहरा बिगाड़ देने वाली चोटें
अरुण श्रीवास्तव : नाम मिटाना, पहचान मिटाना: मतदाता विलोपन की राजनीति और मुस्लिम हाशिए पर धकेला जाना
सुशांत सिंह: ईरान की जंग से भारत के लिए दस सैन्य सबक
सीजेआई पर काम का बहुत बोझ? चयन पैनल से क्यों हटाया? एसआईआर विवाद से चुनाव आयोग पर पुनः पुराने सवाल
अजित पवार की मौत के बाद, अब मंत्री छगन भुजबल के हेलीकॉप्टर की गलत लैंडिंग; फडणवीस ने कहा ‘जांच करेंगे’
2011 मुंबई ट्रिपल ब्लास्ट केस: 15 साल से जेल में बंद दो आरोपियों को अदालत ने दी जमानत
कई हाथियों को तो जानबूझकर अंधा कर दिया जाता है; ‘गुलाबी हथिनी’ की मौत के बाद, हाथी सवारी बंद करने की मांग उठी
भारत दौरे के बाद बांग्लादेश ने फिर दोहराई शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग
मुंबई में “अवैध” प्रवासियों के लिए पहला डिटेंशन सेंटर शुरू, अधिकारों और प्रक्रिया पर उठे रहे सवाल
ओडिशा में कथित गोरक्षकों ने दलित व्यक्ति को सरेआम किया जलील, पहनाई जूतों की माला
नए कानून के बीच केरल हाई कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को हार्मोन थेरेपी जारी रखने की दी अनुमति
सुप्रीम कोर्ट: मतदान का अधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं
पहले बेघर, अब वोटर लिस्ट से बाहर: बेदखली के बाद हजारों लोगों का मताधिकार खत्म
पाकिस्तान में अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक शांति वार्ता: दशकों की दुश्मनी खत्म करने की कोशिश
इस्लामाबाद में शनिवार की दोपहर एक ऐसी मुलाकात हुई जिसे इतिहास की किताबों में दर्ज किया जाएगा. अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने वरिष्ठ ईरानी वार्ताकारों के साथ बैठक की. ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ के रिपोर्टर ऐशली अह्न और लिंसी चुटेल की रिपोर्ट के अनुसार, व्हाइट हाउस और ईरान के अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की है कि यह 1979 की ईरानी क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच अब तक की सबसे उच्च स्तरीय आमने-सामने की मुलाकात है. पाकिस्तान इस पूरी वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है. पिछले मंगलवार को दोनों देशों के बीच दो सप्ताह के अस्थायी युद्धविराम पर सहमति बनी थी, जिसे अब स्थायी शांति में बदलने की कोशिश की जा रही है. हालांकि, यह शांति अब भी बहुत नाजुक है, क्योंकि इज़रायल ने लेबनान में हिज़बुल्लाह के खिलाफ हमले जारी रखे हैं, जिससे तेहरान बेहद गुस्से में है.
वार्ता में शामिल अमेरिकी टीम में राष्ट्रपति ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और उनके दामाद जारेड कुशनर भी शामिल हैं. दूसरी तरफ, ईरानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ़ और विदेश मंत्री अब्बास अरागची कर रहे हैं. ‘एक्सियोस’ के रिपोर्टर बराक राविद के मुताबिक, शनिवार को ही कई अमेरिकी युद्धपोतों ने ‘हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य’ को पार किया. यह युद्ध शुरू होने के बाद पहली बार है जब अमेरिकी नौसेना ने इस रास्ते का इस्तेमाल किया है. राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर कहा कि अमेरिका अब इस महत्वपूर्ण जलमार्ग से ईरानी समुद्री बारूदी सुरंगों को साफ करने का काम शुरू कर रहा है. इस बीच, युद्ध के भयानक आंकड़े भी सामने आए हैं. ‘ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज एजेंसी’ के अनुसार, ईरान में अब तक 254 बच्चों सहित 1,701 नागरिक मारे गए हैं. वहीं, लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि इज़रायली हमलों में अब तक 1,953 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं.
ईरान युद्ध में चीन की गुप्त भूमिका: अमेरिका ने मिसाइलों की आपूर्ति और तकनीकी मदद का दावा किया
‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ के मार्क माज़ेट्टी, एरिक श्मिट और जूलियन ई. बार्न्स की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने ऐसे संकेत पाए हैं कि चीन ने हाल के हफ्तों में ईरान को कंधे से मार करने वाली मिसाइलों की एक बड़ी खेप भेजी है. हालांकि अभी इसके निर्णायक सबूत नहीं मिले हैं, लेकिन यह जानकारी बीजिंग के बढ़ते दखल को उजागर करती है. अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि चीन गुप्त रूप से ईरान को ऐसे केमिकल, ईंधन और पुर्जे मुहैया करा रहा है जिनका इस्तेमाल मिसाइल और ड्रोन बनाने में किया जा रहा है. यह स्थिति अमेरिका-चीन संबंधों के लिए बेहद संवेदनशील है, क्योंकि राष्ट्रपति ट्रंप अगले महीने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिलने बीजिंग जाने वाले हैं.
अमेरिकी खुफिया तंत्र का मानना है कि रूस भी इस युद्ध में ईरान की सक्रिय मदद कर रहा है और उसने अमेरिकी जहाजों को निशाना बनाने के लिए ईरान को सैटेलाइट डेटा उपलब्ध कराया है. चीन खुद को एक तटस्थ मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि वह खाड़ी देशों से आने वाले तेल पर निर्भर है. लेकिन दूसरी तरफ, कुछ चीनी अधिकारी चाहते हैं कि ईरान इस युद्ध में अमेरिका को उलझाए रखे ताकि वैश्विक स्तर पर अमेरिकी शक्ति कमजोर हो. चीन के दूतावास ने इन आरोपों का खंडन किया है और इसे “भ्रामक और सनसनीखेज” बताया है. विशेषज्ञों के अनुसार, चीन का ईरान के साथ व्यापारिक रिश्ता बहुत गहरा है, वह ईरान के कुल तेल निर्यात का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा खरीदता है, जिससे ईरान की सैन्य गतिविधियों को आर्थिक सहारा मिलता है.
ईरान युद्ध पर पोप और ट्रंप के बीच तीखा टकराव: वेटिकन ने अमेरिकी नीतियों को ‘अस्वीकार्य’ बताया
‘एक्सियोस’ के रसेल कॉन्ट्रेरास की रिपोर्ट के अनुसार, पोप लियो 14वें और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच ईरान युद्ध और आप्रवासन को लेकर तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है. वेटिकन की नैतिक सत्ता और वाशिंगटन की राजनीतिक ताकत के बीच यह टकराव पिछले कई दशकों में सबसे गंभीर माना जा रहा है. पोप ने ट्रंप की उस धमकी की कड़ी निंदा की है, जिसमें उन्होंने एक पूरी सभ्यता को मिटाने की बात कही थी. पोप ने पत्रकारों से कहा कि “नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमले करना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है और यह इंसानी नफरत का एक भयावह संकेत है.” पोप बार-बार कूटनीति और शांति की अपील कर रहे हैं, जबकि अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने इस युद्ध को “मैक्सिमम लेथालिटी” (अधिकतम घातकता) के दृष्टिकोण से आगे बढ़ाया है.
अमेरिका के भीतर भी कैथोलिक नेतृत्व बंटा हुआ है. शिकागो के कार्डिनल ब्लेज़ क्यूपिच ने इस युद्ध की तुलना वीडियो गेम से करने की निंदा की है और इसे “घिनौना” बताया है. वेटिकन और पेंटागन के बीच जनवरी में हुई एक बैठक की रिपोर्ट भी सामने आई है, जिसमें पेंटागन ने वेटिकन पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों का समर्थन करने के लिए दबाव डाला था, लेकिन वेटिकन ने इससे इनकार कर दिया. सर्वे बताते हैं कि कैथोलिक मतदाताओं के बीच ट्रंप का समर्थन घट रहा है. जनवरी के एक सर्वे के अनुसार, केवल 46% श्वेत कैथोलिक ही अब ट्रंप के एजेंडे का समर्थन करते हैं, जबकि 2025 में यह संख्या 51% थी. दूसरी ओर, पोप की लोकप्रियता रेटिंग ट्रंप की तुलना में कहीं अधिक (+34) बनी हुई है.
ईरानी सूत्र का दावा: अमेरिका ईरानी फंड से नियंत्रण हटाने पर सहमत, वाशिंगटन ने किया इनकार
एक वरिष्ठ ईरानी सूत्र ने शनिवार को कहा कि अमेरिका कतर और अन्य विदेशी बैंकों में जमा ईरान की रुकी हुई संपत्ति को मुक्त करने पर सहमत हो गया है, लेकिन एक अमेरिकी अधिकारी ने तुरंत इस दावे का खंडन कर दिया.
वरिष्ठ ईरानी सूत्र ने अमेरिका के इस कथित कदम का स्वागत करते हुए इसे इस्लामाबाद वार्ता में वाशिंगटन के साथ समझौता करने की “गंभीरता” का संकेत बताया. सूत्र ने कहा कि यह “अमेरिकी पक्ष को भेजे गए संदेशों” में ईरान की मांगों में से एक थी और तेहरान को इन संपत्तियों को मुक्त करने के लिए अमेरिकी सहमति प्राप्त हुई है.
मामले की संवेदनशीलता के कारण नाम न छापने की शर्त पर सूत्र ने ‘रॉयटर्स’ को बताया कि संपत्तियों को अनफ्रीज करना “होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने” से सीधे तौर पर जुड़ा है, जिसके वार्ता में एक प्रमुख मुद्दा होने की उम्मीद है. इस सूत्र ने उन संपत्तियों का मूल्य नहीं बताया, जिन्हें वाशिंगटन ने मुक्त (अनफ्रीज) करने की सहमति दी थी. हालांकि, एक दूसरे ईरानी सूत्र ने कहा कि अमेरिका कतर में रखे गए 6 अरब डॉलर के ईरानी फंड को मुक्त करने पर सहमत हो गया है. कतर के विदेश मंत्रालय ने इस पर टिप्पणी के अनुरोध का तुरंत कोई जवाब नहीं दिया.
यह 6 अरब डॉलर का फंड, जिसे मूल रूप से 2018 में फ्रीज किया गया था, 2023 में अमेरिका-ईरान कैदी अदला-बदली के हिस्से के रूप में जारी किया जाना था. लेकिन ईरान के सहयोगी फिलीस्तीनी चरमपंथी समूह हमास द्वारा 7 अक्टूबर 2023 को इजराइल पर किए गए हमलों के बाद, राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन ने इन फंड्स को फिर से फ्रीज कर दिया था. उस समय अमेरिकी अधिकारियों ने कहा था कि ईरान निकट भविष्य में इस पैसे का उपयोग नहीं कर पाएगा और वाशिंगटन के पास इस खाते को पूरी तरह से फ्रीज रखने का अधिकार सुरक्षित है.
यह पैसा दक्षिण कोरिया को की गई ईरानी तेल की बिक्री से प्राप्त हुआ था. 2018 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ईरान पर फिर से प्रतिबंध लगाने और परमाणु कार्यक्रम पर हुए वैश्विक समझौते को रद्द करने के बाद, यह राशि दक्षिण कोरियाई बैंकों में ब्लॉक कर दी गई थी.
सितंबर 2023 में दोहा की मध्यस्थता में हुए कैदी विनिमय समझौते के तहत, इस पैसे को कतर के बैंक खातों में स्थानांतरित कर दिया गया था. उस समझौते में ईरान में हिरासत में लिए गए पांच अमेरिकी नागरिकों की रिहाई के बदले में फंड जारी करने और अमेरिका में बंद पांच ईरानियों की रिहाई शामिल थी.
उस समय अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट किया था कि यह पैसा केवल मानवीय कार्यों के लिए प्रतिबंधित था, जिसे अमेरिकी ट्रेजरी की निगरानी में ईरान भेजे जाने वाले भोजन, दवा, चिकित्सा उपकरण और कृषि सामानों के लिए अनुमोदित विक्रेताओं को ही भुगतान किया जाना था.
रिपोर्ट: ईरान के सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई को आईं गंभीर और चेहरा बिगाड़ देने वाली चोटें
ईरान के नए सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई अभी भी उन गंभीर चेहरे और पैर की चोटों से उबर रहे हैं, जो उन्हें युद्ध की शुरुआत में 28 फरवरी को हुए उस हवाई हमले में लगी थीं जिसमें उनके पिता मारे गए थे. उनके करीबी हलकों से जुड़े तीन लोगों ने ‘रॉयटर्स’ को यह जानकारी दी है.
मध्य तेहरान में सर्वोच्च नेता के परिसर (कंपाउंड) पर हुए हमले में खामेनेई का चेहरा बिगड़ गया था और उनके एक या दोनों पैरों में गंभीर चोट आई थी. नाम न छापने की शर्त पर इन लोगों ने बताया कि 56 वर्षीय खामेनेई अपनी चोटों से उबर रहे हैं और मानसिक रूप से पूरी तरह सक्रिय हैं. वे ऑडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठकों में भाग ले रहे हैं और युद्ध तथा वाशिंगटन के साथ बातचीत सहित प्रमुख मुद्दों पर निर्णय लेने में शामिल हैं.
खामेनेई का स्वास्थ्य उन्हें राजकीय मामलों को चलाने की अनुमति देता है या नहीं, यह सवाल ईरान के लिए दशकों के सबसे गंभीर संकट के समय उठा है. हवाई हमले और 8 मार्च को अपने पिता के स्थान पर उनकी नियुक्ति के बाद से खामेनेई की कोई फोटो, वीडियो या ऑडियो रिकॉर्डिंग प्रकाशित नहीं हुई है, जिसके कारण उनका ठिकाना, स्थिति और शासन करने की क्षमता जनता के लिए अभी भी काफी हद तक एक रहस्य बनी हुई है.
खामेनेई की चोटों की सीमा पर कोई आधिकारिक ईरानी बयान नहीं आया है. हालांकि, सरकारी टेलीविजन पर एक समाचार वाचक ने उन्हें सर्वोच्च नेता नामित किए जाने के बाद “जांबाज कहा था, यह शब्द युद्ध में बुरी तरह घायल होने वालों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. खामेनेई की चोटों के विवरण 13 मार्च को अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ के उस बयान से मेल खाते हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि खामेनेई “घायल हैं और संभवतः उनका चेहरा बिगड़ गया है.” अमेरिकी खुफिया आकलन से परिचित एक सूत्र ने रॉयटर्स को बताया कि माना जा रहा है कि खामेनेई ने अपना एक पैर भी खो दिया है.
मिडल ईस्ट इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो एलेक्स वतनका ने कहा कि चोटों की गंभीरता चाहे जो भी हो, इस बात की संभावना कम है कि यह नया और अनुभवहीन नेता अपने पिता जैसी सर्वव्यापी शक्ति का प्रयोग कर पाएगा. वतनका ने कहा कि भले ही उन्हें निरंतरता के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन उसी स्तर का ‘स्वतः अधिकार’ बनाने में उन्हें वर्षों लग सकते हैं. उन्होंने कहा, “मुजतबा एक आवाज होंगे लेकिन वह निर्णायक आवाज नहीं होगी. उन्हें खुद को एक विश्वसनीय और शक्तिशाली आवाज के रूप में साबित करना होगा.”
खामेनेई के करीबी लोगों में से एक ने कहा कि सर्वोच्च नेता की तस्वीरें एक या दो महीने के भीतर जारी होने की उम्मीद है और वह तब सार्वजनिक रूप से भी दिखाई दे सकते हैं, हालांकि सूत्रों ने जोर दिया कि वह तभी सामने आएंगे जब उनका स्वास्थ्य और सुरक्षा स्थिति अनुमति देगी.
वतनका ने कहा कि यद्यपि मुजतबा को रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के साथ संबंधों के कारण अपने पिता के कट्टरपंथी दृष्टिकोण को जारी रखने वाले के रूप में देखा जाता है, लेकिन हमें उनके वास्तविक वैश्विक दृष्टिकोण के बारे में ज्यादा पता नहीं है. सर्वोच्च नेता के रूप में ईरानियों के साथ उनका पहला संवाद 12 मार्च को आया था, जिसमें एक लिखित बयान के माध्यम से कहा गया था कि होर्मुज जलडमरूमध्य बंद रहना चाहिए और क्षेत्रीय देशों को अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बंद करने की चेतावनी दी गई थी.
खामेनेई की अनुपस्थिति की ईरानी सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा हो रही है. उनकी स्थिति और देश कौन चला रहा है, इसे लेकर कई तरह की ‘कॉन्सपिरेसी थ्योरी’ (साजिश के सिद्धांत) चल रहे हैं. ऑनलाइन प्रसारित हो रहा एक लोकप्रिय मीम एक खाली कुर्सी की तस्वीर है जिस पर स्लोगन लिखा है— “मुजतबा कहाँ हैं?”
हालांकि, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स द्वारा संचालित ‘बासिज’ मिलिशिया के एक वरिष्ठ सदस्य सहित कुछ सरकारी समर्थकों का कहना है कि अमेरिकी और इजराइली हवाई हमलों के खतरे को देखते हुए खामेनेई का अभी लो-प्रोफाइल (छिपे हुए) रहना महत्वपूर्ण है. कोम शहर के एक बासिज सदस्य मोहम्मद हुसैनी ने कहा, “उन्हें सार्वजनिक रूप से क्यों दिखना चाहिए? क्या इन अपराधियों का निशाना बनने के लिए?”
| विश्लेषण
सुशांत सिंह: ईरान की जंग से भारत के लिए दस सैन्य सबक
हालिया अमेरिका-इजरायल-ईरान संघर्ष आधुनिक युद्ध के लिए एक “जीवंत प्रयोगशाला” के रूप में कार्य करता है. भारत के लिए, यह संघर्ष एक तीव्र, बहु-आयामी और परमाणु साये के बीच लड़े जाने वाले युद्ध का पूर्वावलोकन है, जिसका सामना उसे चीन या पाकिस्तान जैसे प्रतिद्वंद्वियों के साथ करना पड़ सकता है. सुशांत सिंह ने “द मॉर्निंग कॉन्टेक्स्ट” में प्रकाशित लेख में दस बिंदुओं में भारत की जरूरत को रेखांकित किया है.
1. घरेलू औद्योगिक आधार ही नई ‘रणनीतिक गहराई’ है : आधुनिक युद्ध में शक्ति का पैमाना तकनीक को तेजी से बनाने और बदलने की क्षमता है (जैसे ड्रोन के पुर्जों की 3D-प्रिंटिंग). भारत का वर्तमान औद्योगिक आधार बहुत धीमा है; इसे एक ऐसे मॉडल की आवश्यकता है जहाँ संकट के समय उत्पादन तुरंत बढ़ाया जा सके.
2. हथियारों का बड़ा भंडार युद्ध की क्षमता तय करता है : तीव्र युद्ध में गोला-बारूद की खपत अनुमान से कहीं अधिक होती है. भारत की “10 दिन के युद्ध” की योजना अब पुरानी हो चुकी है. साथ ही, ब्रह्मोस जैसी महंगी मिसाइलों को बड़े पैमाने पर तैनात करना मुश्किल है. भारत को सस्ते और बड़े पैमाने पर उत्पादित होने वाले हथियारों की जरूरत है.
3. प्रतीकों पर नहीं, पूरे ‘सिस्टम’ पर हमला करें : केवल प्रतीकात्मक जवाबी कार्रवाई से राजनीतिक लक्ष्य हासिल नहीं होते. भारत को दुश्मन के वायु रक्षा नेटवर्क, रसद केंद्रों और मरम्मत क्षमता को पूरी तरह से नष्ट करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि दुश्मन लड़ने के लायक ही न रहे.
4. समुद्री सुरक्षा: रणनीतिक केंद्र बिंदु : पाकिस्तान जैसे छोटे नौसैनिक बल वाले देश भी ड्रोन और सुरंगों (माइन्स) के जरिए व्यापारिक रास्तों और समुद्र के नीचे बिछी केबलों को नुकसान पहुँचाकर आर्थिक दबाव बना सकते हैं. भारत को अपनी समुद्री सीमाओं और व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी.
5. अंतरिक्ष, साइबर और वायु रक्षा का एकीकरण : अब ये क्षेत्र अलग-अलग नहीं रहे. अंतरिक्ष-आधारित निगरानी, साइबर सुरक्षा और वायु रक्षा अब एक ही प्रणाली का हिस्सा हैं. भारत को एक ऐसी एकीकृत तकनीक की आवश्यकता है जहाँ थल सेना, वायु सेना और नौसेना रीयल-टाइम में डेटा साझा कर सकें.
6. ड्रोन्स को ‘गोला-बारूद’ की तरह मानें : ड्रोन अब केवल एक सहायक उपकरण नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले हथियार हैं. इनका उपयोग हवाई अड्डों, ईंधन डिपो और मुख्यालयों को निशाना बनाने के लिए किया जाएगा. भारत को हर स्तर पर ‘एंटी-ड्रोन’ क्षमता विकसित करनी होगी.
7. ‘किल-चेन’ की दौड़ जीतना : जीत उसी की होगी जो दुश्मन को तेजी से खोज सके और हमला कर सके. भारत को केवल महंगे विमानों या टैंकों पर निवेश करने के बजाय युद्ध के “कनेक्टिव टिश्यू” (संचार नेटवर्क, उपग्रह और रीयल-टाइम डेटा) पर अधिक निवेश करना चाहिए.
8. ‘साल्वो’ (एक साथ कई हमलों) से बचाव : दुश्मन अब एक साथ कई ड्रोन, क्रूज मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइलें दागता है ताकि डिफेंस सिस्टम ठप हो जाए. भारत को अपनी रक्षा प्रणाली को इस तरह डिजाइन करना होगा कि वह एक साथ होने वाले सैकड़ों हमलों को झेल सके और तेजी से रीलोड हो सके.
9. तनाव प्रबंधन सैन्य अनुशासन है : हाइपरसोनिक खतरों के युग में, धीमी राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया विफल हो जाती है. भारत को ऐसी “क्राइसिस प्लेबुक” की आवश्यकता है जो सैन्य विकल्पों को राजनयिक संकेतों के साथ पहले से ही जोड़ कर रखे, ताकि संकट के समय तुरंत निर्णय लिया जा सके.
10. पारंपरिक लचीलापन ही परमाणु निवारण है : यदि भारत का पारंपरिक रक्षा तंत्र (वायु रक्षा, रसद और संचार नेटवर्क) मजबूत है, तो परमाणु युद्ध का खतरा कम हो जाता है. अगर देश पहले हमले को झेलकर मुकाबला जारी रख सकता है, तो राजनीतिक नेतृत्व को परमाणु हथियारों जैसे चरम कदम उठाने की जरूरत नहीं पड़ेगी.
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल “अधिक हथियार खरीदना” नहीं है, बल्कि “सिस्टम का सिस्टम” बनाना है. नई दिल्ली को अपने औद्योगिक उत्पादन की गति, डेटा एकीकरण और हथियारों के भंडार की कमियों को दूर करना होगा ताकि वह परमाणु संकट में फंसे बिना अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा कर सके.
आशा भोसले को दिल का दौरा: मुंबई के अस्पताल में भर्ती, हालत पर नज़र
‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘पीटीआई’ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की महान पार्श्व गायिका आशा भोसले को शनिवार शाम मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया. 92 वर्षीय गायिका को कार्डियक अरेस्ट (दिल का दौरा) और फेफड़ों की गंभीर समस्या के बाद अस्पताल लाया गया है. सात दशकों से अधिक लंबे करियर वाली आशा भोसले ने भारतीय संगीत में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है. उन्होंने शास्त्रीय संगीत से लेकर चुलबुले और रोमांटिक गानों तक, हर शैली में अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा है. ओ.पी. नैयर और आर.डी. बर्मन के साथ उनकी जोड़ी ने “आओ हुज़ूर तुमको” और “चुरा लिया है तुमने” जैसे सदाबहार गाने दिए हैं. उन्हें दादा साहब फाल्के और पद्म विभूषण जैसे सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है. उनके करोड़ों प्रशंसक उनके स्वास्थ्य में सुधार की प्रार्थना कर रहे हैं.
बंगाल में चुनाव है: योगी ने यूपी के मियांपुर गाँव का नाम बदलकर ‘रवींद्रनगर’ किया
योगी आदित्यनाथ का उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर लगातार दूसरा कार्यकाल है (आगामी फरवरी में उन्हें 10 साल हो जाएंगे), मगर वह शनिवार को लखीमपुर खीरी जिले के एक ऐसे गांव पहुंचे, जिसका नाम “मियांपुर” है. उन्होंने घोषणा की कि मोहम्मदी विधानसभा क्षेत्र के इस गाँव का नाम बदलकर अब ‘रवींद्रनगर’ किया जाएगा, क्योंकि गाँव में एक भी मुसलमान नहीं रहता है. इसके साथ ही उन्होंने 331 बांग्लादेशी हिंदू परिवारों को भूमि स्वामित्व प्रमाण पत्र वितरित किए, जिससे उन्हें उनकी जमीन पर कानूनी अधिकार मिल गया है.
नमिता बाजपेयी के अनुसार, लखीमपुर खीरी में एक जनसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कांग्रेस पर निशाना साधा और आरोप लगाया कि पहचान छिपाने के लिए गाँव का नाम मियांपुर रखा गया था. उन्होंने कहा, “यहाँ एक भी ‘मियां’ नहीं है, फिर भी इसका नाम मियांपुर रखा गया. अब यह बदल जाएगा.” योगी ने आगे कहा कि गाँव का नाम रवींद्रनाथ टैगोर के नाम पर रखा जाएगा, “जिन्होंने भारत को राष्ट्रगान दिया”, ताकि एक नई पहचान झलके.
बांग्लादेशी हिंदू परिवारों को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, “देखिए कैसे अन्याय खुद बोलता है. इन लोगों को बांग्लादेश ने ठुकरा दिया और पाकिस्तान की हरकतों के कारण इन्हें प्रताड़ित किया गया. वे विस्थापितों के रूप में यहाँ आए, और उनकी पैतृक संपत्तियाँ जब्त कर ली गईं.”
गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में दस दिन बाद राज्य विधानसभा के चुनाव हैं. 23 अप्रैल को प्रथम चरण की सीटों के लिए वोट डाले जाएंगे. लिहाजा ““मियांपुर” का नाम रवींद्रनाथ टैगोर के नाम पर रखने का ऐलान कर योगी ने परोक्ष तौर पर अपनी पार्टी के सियासी ध्रुवीकरण के एजेंडे को ही आगे बढ़ाया है.
| विश्लेषण
अरुण श्रीवास्तव : नाम मिटाना, पहचान मिटाना: मतदाता विलोपन की राजनीति और मुस्लिम हाशिए पर धकेला जाना
नामों को हटाना महज़ एक प्रशासनिक कवायद नहीं है—यह मुसलमानों की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान पर एक सुनियोजित हमला है.
यह केवल यह सवाल नहीं है कि क्या ममता बनर्जी का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के खिलाफ़ कड़ा रुख़ उन्हें मुस्लिम वोट बनाए रखने में मदद करेगा, ख़ासकर जब कई लोगों को अपनी नागरिकता खोने का डर है. मुसलमानों को सताने वाली गहरी चिंता उनकी सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के संभावित नुकसान की है. बंगालियों—मुसलमानों और हिंदुओं दोनों—ने पारंपरिक रूप से चुनावों का जश्न मनाया है. हालाँकि, इस बार माहौल नाटकीय रूप से बदल गया है. अपनी ही ज़मीन पर बेदखली और अलगाव के डर ने मुसलमानों को गहरे असमंजस में डाल दिया है. लाखों लोग जो कभी गर्व से ख़ुद को भारतीय बताते थे, अब “राष्ट्र-विरोधी” कहलाने और देश से बाहर निकाले जाने के डर में हैं.
ज्ञानेश कुमार का उपेक्षापूर्ण रवैया और मतदाता सूची में शामिल करने की अपीलों पर विचार करने से उनका इनकार इन आशंकाओं को और तेज़ कर देता है. मतदान के अधिकार से वंचित करना वास्तव में एक मुस्लिम को ‘पर्सोना नॉन ग्राटा’ (अवांछित व्यक्ति) बना देता है, जिससे एक ऐसी श्रृंखला शुरू होती है जो अंततः उनसे नागरिकता छीन सकती है. यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से जुड़ी एक व्यापक वैचारिक परियोजना के अनुरूप प्रतीत होता है, जिसका उद्देश्य मुसलमानों को व्यवस्थित रूप से हाशिए पर धकेलना है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह जानते हैं कि मुसलमानों के सीधे निष्कासन से वैश्विक स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया होगी, फिर भी सूक्ष्म तंत्र काम कर रहे हैं.
धार्मिक नेताओं सहित कई मुसलमानों का मानना है कि आरएसएस-बीजेपी पारिस्थितिकी तंत्र उन्हें हिंदुत्व के ढांचे के अनुरूप होने के लिए मजबूर करना चाहता है. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयानों—कि सभी भारतीयों का डीएनए एक ही है और सांस्कृतिक अर्थ में “हर भारतीय हिंदू है”—को अक्सर उद्धृत किया जाता है. हालाँकि इसे एकता के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन कई मुसलमान ऐसे दावों को अपनी विशिष्ट पहचान को एक समरूप राष्ट्रीय पहचान में समाहित करने के प्रयास के रूप में देखते हैं.
मुसलमानों के बीच SIR को व्यापक रूप से इसी वैचारिक ढांचे के उत्पाद के रूप में देखा जाता है. बिहार और बंगाल के चुनावों ने एक परीक्षण स्थल प्रदान किया है. उन्हें डर है कि मताधिकार से वंचित होने से उनकी स्वतंत्र पहचान ख़त्म हो जाएगी. पिछले पाँच वर्षों में, मुसलमानों ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व में लगातार गिरावट देखी है, जिसमें उम्मीदवारों की संख्या कम हुई है और पार्टी संरचनाओं में भागीदारी घटी है.
चिंताएं केवल मतदान के अधिकार तक ही सीमित नहीं हैं. कई लोगों का मानना है कि उनकी सांस्कृतिक और सामाजिक प्रथाएं जाँच के दायरे में आने वाली अगली चीज़ें हैं. तत्काल तीन तलाक़ के अपराधीकरण जैसी नीतियों को सुधारवादी बताया गया है, लेकिन कुछ लोग इन्हें सामुदायिक गतिशीलता को नया रूप देने के रणनीतिक हस्तक्षेप के रूप में भी देखते हैं. इस बीच, आरएसएस द्वारा स्थापित मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (एमआरएम) जैसे संगठनों को मुसलमानों को व्यापक राष्ट्रवादी एजेंडे के साथ जोड़ने के प्रयास के रूप में देखा जाता है.
इतिहास गवाह है कि किसी समुदाय की संस्कृति और धर्म पर हमलों का उद्देश्य अक्सर असुरक्षा पैदा करना, विभाजन को गहरा करना और सामूहिक स्मृति को मिटाना होता है. ऐसी रणनीतियाँ समुदायों को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेल सकती हैं, साथ ही सांप्रदायिक तनाव भी बढ़ा सकती हैं.
हालिया आँकड़ों ने इन चिंताओं को और बढ़ा दिया है. लगभग 92 लाख हटाए गए मतदाताओं में से करीब 74 लाख मुसलमान बताए जा रहे हैं. यह असंतुलित निष्कासन चुनावी परिणामों को बीजेपी के पक्ष में काफ़ी हद तक बदल सकता है. मालदा के कालियाचक जैसे विरोध प्रदर्शन उस प्रतिरोध को उजागर करते हैं जिसे कई लोग मनमानी कटौती के रूप में देखते हैं.
बंगाल की राजनीति में मुसलमान लंबे समय से एक महत्वपूर्ण शक्ति रहे हैं. ऐतिहासिक वृत्तांत उन दावों का खंडन करते हैं कि वे केवल एक “वोट बैंक” के रूप में कार्य करते हैं. वास्तव में, स्वतंत्रता-पूर्व भारत में राजनीतिक गठबंधनों में हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग के बीच सहयोग शामिल था, जो एक अधिक जटिल राजनीतिक इतिहास को दर्शाता है.
हालिया चुनावी रुझान बताते हैं कि मुस्लिम मतदाताओं ने ममता बनर्जी का एकसमान समर्थन नहीं किया है. फिर भी, उन पर “मुसलमानों के तुष्टीकरण” के आरोप बने हुए हैं, जो एक अलग राजनीतिक उद्देश्य का सुझाव देते हैं: मुसलमानों को राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक बनाना या उन्हें दोयम दर्जे की नागरिकता तक सीमित करना. मुर्शिदाबाद, मालदा और 24 परगना जैसे ज़िलों के आँकड़े मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में विलोपन की अत्यधिक ऊँची दर दर्शाते हैं.
बनर्जी ने इन विलोपनों को एक “सोची-समझी राजनीतिक चाल” करार दिया है और मतदाताओं से लोकतांत्रिक तरीके से जवाब देने का आग्रह किया है. नाम हटाने के लिए ‘फॉर्म 7’ के दुरुपयोग की ख़बरें इस प्रक्रिया की निष्पक्षता पर संदेह को और गहरा करती हैं.
साथ ही, मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्ग विरोध के अहिंसक, गांधीवादी तरीकों पर विचार कर रहे हैं. महिलाओं पर पड़ने वाले व्यापक प्रभाव, विशेष रूप से उन महिलाओं के बारे में भी चिंताएं जताई जा रही हैं जिन्होंने शादी के बाद उपनाम बदल लिए और उन्हें मतदाता सूची से बाहर किए जाने का सामना करना पड़ सकता है.
व्यापक सवाल बना हुआ है: क्या ये रणनीतियाँ बंगाल में मुसलमानों को हाशिए पर धकेलने में सफल होंगी? राज्य को एक प्रमुख राजनीतिक युद्धक्षेत्र के रूप में देखे जाने के कारण, इसके परिणाम के राष्ट्रीय निहितार्थ हो सकते हैं. बंगाल का लंबे समय से चला आ रहा धर्मनिरपेक्ष लोकाचार दबाव में है, और कोई भी बदलाव देश के राजनीतिक पथ को नया रूप दे सकता है.
अंततः, मुस्लिम मतदाताओं के व्यवस्थित विलोपन को कई लोगों द्वारा सांस्कृतिक और राजनीतिक पुनर्गठन की एक बड़ी परियोजना के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है—जो अल्पसंख्यक समुदायों को कमज़ोर करते हुए राष्ट्रीय पहचान को फिर से परिभाषित करने का प्रयास करती है. उन लोगों के लिए जिन्होंने विभाजन के बाद भारत में रहना चुना, यह क्षण न केवल एक राजनीतिक संकट है, बल्कि विश्वासघात की एक गहरी भावना भी है.
अरुण श्रीवास्तव एक वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लेख कांउटर करंट्स से लिया गया है.
सीजेआई पर काम का बहुत बोझ? चयन पैनल से क्यों हटाया? एसआईआर विवाद से चुनाव आयोग पर पुनः पुराने सवाल
राहुल गांधी, ममता बनर्जी, सिद्धारमैया, अखिलेश यादव और एम.के. स्टालिन सहित राष्ट्रीय विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग पर सत्ताधारी भाजपा के पक्ष में काम करने का बार-बार आरोप लगाया है, लेकिन चुनाव पैनल के खिलाफ पक्षपात के आरोप नए नहीं हैं.
विवाद का ताज़ा कारण 8 अप्रैल को बना, जब तृणमूल कांग्रेस के एक प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से मुलाकात की. यह बैठक केवल सात मिनट चली, जिसके बाद बंगाल की सत्ताधारी पार्टी ने आरोप लगाया कि ज्ञानेश कुमार ने उन्हें “चले जाने” (गेट लॉस्ट) के लिए कहा. मुख्य चुनाव आयुक्त ने सीधे तौर पर इस टिप्पणी का जवाब नहीं दिया, लेकिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट के माध्यम से “अल्टीमेटम” दिया.
पिछले महीने, संसद के दोनों सदनों में 190 से अधिक सांसदों ने ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग करते हुए नोटिस पर हस्ताक्षर किए थे. हालांकि, दोनों नोटिस खारिज कर दिए गए.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला के साथ भी ऐसा ही हुआ था. 2005 में चावला को आयुक्त नियुक्त किया गया तो भाजपा ने 2006 में राष्ट्रपति को याचिका देकर उन्हें हटाने की मांग की थी. पार्टी ने आरोप लगाया था कि चावला ने पक्षपातपूर्ण तरीके से काम किया और कांग्रेस के साथ करीबी संबंध बनाए रखे. भारत में आपातकाल के दौरान उनके आचरण, जब उन्हें संजय गांधी के करीब देखा जाता था, और भ्रष्टाचार के आरोपों का भी हवाला दिया गया था. 2009 में तत्कालीन सीईसी एन. गोपालस्वामी ने भी नवीन चावला को हटाने की सिफारिश की थी, जिसे सरकार ने खारिज कर दिया था. बाद में चावला सीईसी बने.
सौर्ज्य भौमिक की रिपोर्ट में 2023 के उस नए कानून की आलोचना की गई है, जिसके तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को हटा दिया गया.
पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने सवाल उठाया कि सीजेआई को चयन पैनल से क्यों हटाया गया. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे जनता और राजनीतिक दल किस तरह देखते हैं, और फिलहाल इसमें निष्पक्षता की कमी महसूस हो रही है.
कांग्रेस के पूर्व सांसद ने कहा, “चुनाव आयोग यह समझने में असमर्थ है कि उनके निर्णयों को सभी को साथ लेकर चलने की आवश्यकता है. यह एक अच्छे न्यायाधीश होने जैसा है. एक अच्छे न्यायाधीश को सभी की बात सुननी पड़ती है और उसे पक्षपाती नहीं दिखना चाहिए. (वर्तमान में) उस प्रभाव की कमी है.”
खुर्शीद ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर), विशेष रूप से नामों को हटाए जाने और पलायन का हिसाब रखने के लिए एक एकीकृत मतदाता डेटाबेस की कमी पर चिंता जताई. उन्होंने कहा: “मैं दिल्ली में काम करता हूँ. मैं पूरे दिन सुप्रीम कोर्ट में रहता हूँ. मेरा नाम फर्रुखाबाद निर्वाचन क्षेत्र में है. क्या आप मेरा नाम निकाल सकते हैं? गांवों से बहुत से लोग जिला मुख्यालयों में जाकर काम करते हैं. यदि वह घर पर नहीं पाया जाता है, तो क्या उसका नाम हटा दिया जाएगा? चुनाव आयोग इन चिंताओं का जवाब नहीं दे रहा है. उन पर बेईमानी के आरोप लग रहे हैं. उन्हें सुनना होगा. वे उस भाषा का उपयोग कर रहे हैं जो राजनीतिक समूह करते हैं.”
उन्होंने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में हुए बदलावों पर भी सवाल उठाए, विशेष रूप से 2023 के कानून के तहत चयन पैनल से भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को हटाए जाने पर. खुर्शीद ने कहा, “उन्हें क्यों हटाया गया? किसी ने कारण नहीं बताया. सीबीआई प्रमुख, पुलिस प्रमुख और महालेखा परीक्षक (एजी) की नियुक्ति में उनकी भूमिका होती है. किसी को स्पष्ट करना चाहिए. क्या मुख्य न्यायाधीश पर काम का बहुत अधिक बोझ है?”
नवीन चावला के खिलाफ भाजपा के आरोपों पर खुर्शीद ने कहा, “मेरी याददाश्त इतनी अच्छी नहीं है. आरोप कोई भी लगा सकता है. सब कुछ आरोपों की प्रकृति पर निर्भर करता है. अगर कांग्रेस ने कुछ अस्वीकार्य किया था, तो अब चीजें बदल गई हैं. पहले मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और फिर टी.एन. शेषन की क्या भूमिका थी? सीईसी को धीरे-धीरे शक्तियां दी गईं... आप यह नहीं कह सकते कि 30 साल पहले ऐसा होता था, इसलिए अब भी वैसा ही होगा.”
हालांकि पूर्व सीईसी एन. गोपालस्वामी ने चुनाव आयोग में न्यायिक हस्तक्षेप (सीजेआई को शामिल करने) का विरोध किया. उनका मानना है कि न्यायपालिका को अंतिम निर्णयकर्ता होना चाहिए, न कि नियुक्ति प्रक्रिया का हिस्सा. उन्होंने मतदाता सूची की समस्याओं को “प्रणालीगत खामी” बताया और कहा कि हर 10 साल में घर-घर जाकर सत्यापन होना चाहिए, जो पिछले कुछ समय से नहीं हुआ है. बंगाल में एसआईआर के तहत लगभग 90 लाख नाम हटाए गए हैं, जिनमें से आधे से अधिक अल्पसंख्यक क्षेत्रों से बताए जा रहे हैं. गोपालस्वामी का तर्क है कि पलायन और मृत्यु के कारण भी नाम हटते हैं, लेकिन इसे एक बेहतर एकीकृत प्रणाली (जैसे आधार या मृत्यु प्रमाण पत्र डेटाबेस) के साथ जोड़ने की जरूरत है.
अजित पवार की मौत के बाद, अब मंत्री छगन भुजबल के हेलीकॉप्टर की गलत लैंडिंग; फडणवीस ने कहा ‘जांच करेंगे’
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने शनिवार को कहा कि उस घटना की जांच की जाएगी, जिसमें खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री छगन भुजबल को ले जा रहा हेलीकॉप्टर अपने निर्धारित लैंडिंग स्थल से चूक गया और उसके बजाय पुणे जिले के पुरंदर तालुका में एक पार्किंग क्षेत्र में उतर गया.
‘एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस’ के मुताबिक, पुणे में पत्रकारों से बात करते हुए फडणवीस ने कहा, “हम इस घटना की जांच करेंगे.”
यह घटना शनिवार को उस समय हुई जब भुजबल पुरंदर तालुका के खानवाड़ी गांव में समाज सुधारक ज्योतिबा फुले की 200वीं जयंती के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे थे. अपनी सुरक्षा की पुष्टि करते हुए भुजबल ने संवाददाताओं से कहा, “मेरा हेलीकॉप्टर एक पार्किंग लॉट में उतरा... हम सभी सुरक्षित हैं.”
इस बीच ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ में सुधीर सूर्यवंशी ने बताया है कि पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि यह कोई तकनीकी खराबी थी या विमान के पायलट के निर्णय में हुई गलती (जजमेंट एरर).
यह घटना अजित पवार विमान दुर्घटना के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जहाँ पायलट ने गलत निर्णय लिया था और कम दृश्यता का हवाला देते हुए विमान को दूसरी जगह क्रैश कर दिया था. राकांपा (एसपी) विधायक रोहित पवार ने इस घटना पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि एक पायलट वाहनों की पार्किंग में विमान कैसे उतार सकता है. उन्होंने जोर देकर कहा कि छगन भुजबल एक वरिष्ठ मंत्री हैं और उनकी सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है; यह पायलट की ओर से एक बड़ी चूक है.
रोहित पवार ने आगे कहा: “पायलट के गलत निर्णय के कारण अजित पवार की जान चली गई. यह घटना हाई-प्रोफाइल लोगों की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाती है.” फिलहाल, इस संबंध में छगन भुजबल की ओर से कोई आधिकारिक बयान आना अभी बाकी है.
2011 मुंबई ट्रिपल ब्लास्ट केस: 15 साल से जेल में बंद दो आरोपियों को अदालत ने दी जमानत
मुंबई की एक विशेष अदालत ने शुक्रवार को 2011 के मुंबई ट्रिपल ब्लास्ट मामले में दो आरोपियों— नकी अहमद शेख और हारून नायक को जमानत दे दी. अदालत ने इस बात पर गौर किया कि वे पिछले लगभग 15 वर्षों से जेल में बंद थे.
सदफ़ मोदक के अनुसार, विशेष न्यायाधीश एस. आर. नवंदर ने कहा कि आवेदक लगभग 15 वर्षों से न्यायिक हिरासत में हैं. हालांकि 203 गवाहों की जांच की जा चुकी है, लेकिन अभी भी 100 से अधिक गवाहों की जांच बाकी है. यदि मुकदमे की सुनवाई तेजी से भी की जाए, तो भी इसे पूरा होने में काफी समय लगने की संभावना है.
अदालत ने उन्हें 1 लाख रुपये के मुचलके और उतनी ही राशि की जमानत राशि जमा करने पर रिहा करने का निर्देश दिया.
बता दें कि 13 जुलाई, 2011 को ओपेरा हाउस, जावेरी बाजार और दादर में तीन बम धमाके हुए थे. इन धमाकों में 27 लोगों की मौत हुई थी और 127 लोग घायल हुए थे. गिरफ्तारियां महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दस्ते (एटीएस) द्वारा की गई थीं, जिसने प्रतिबंधित आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन की संलिप्तता का दावा किया था. इस मामले में आरोप 2019 में तय किए गए थे और मुकदमे की सुनवाई अंततः 2023 में शुरू हुई.
भारत दौरे के बाद बांग्लादेश ने फिर दोहराई शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग
बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर्रहमान ने शुक्रवार को अपनी हालिया भारत यात्रा के बाद ढाका की उस मांग को दोहराया कि भारत बांग्लादेश के पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का प्रत्यर्पण करे.
‘स्क्रोल’ की रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी में बांग्लादेश में हुए आम चुनावों के बाद यह बांग्लादेश के किसी भी शीर्ष स्तर के नेता का पहला आधिकारिक भारत दौरा था.
मॉरीशस में आयोजित 9वें हिंद महासागर सम्मेलन के दौरान मीडिया से बात करते हुए खलीलुर्रहमान ने कहा कि बांग्लादेश ने भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि के तहत शेख हसीना की वापसी के लिए औपचारिक अनुरोध पहले ही कर दिया है. उन्होंने दिल्ली में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ हुई बैठकों में इसी मांग को प्रमुखता से उठाया.
हसीना अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन के हिंसक रूप लेने के बाद देश छोड़कर भारत आ गई थीं. बांग्लादेश के ‘इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल’ ने उन्हें मानवता के खिलाफ अपराधों और प्रदर्शनकारियों पर जानलेवा कार्रवाई का आदेश देने का दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई है.
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया है कि भारत ढाका की नई सरकार के साथ “रचनात्मक रूप से” काम करने और संबंधों को मजबूत करने के लिए तैयार है. हालांकि, हसीना के प्रत्यर्पण के संवेदनशील मुद्दे पर उन्होंने पहले कहा था कि यह खुद शेख हसीना को तय करना है कि वे बांग्लादेश लौटना चाहती हैं या नहीं.
मुंबई में “अवैध” प्रवासियों के लिए पहला डिटेंशन सेंटर शुरू, अधिकारों और प्रक्रिया पर उठ रहे सवाल
मकतूब मीडिया के अनुसार, मुंबई में “अवैध” प्रवासियों के लिए पहला डिटेंशन सेंटर अब शुरू हो चुका है. सेंट्रल मुंबई के भोईवाड़ा में बने इस केंद्र में फिलहाल करीब 40 बांग्लादेशी नागरिक रखे गए हैं, जिन्हें डिपोर्ट किया जाना है. यह केंद्र करीब दो साल पहले प्रस्तावित हुआ था, लेकिन विभागों के बीच जिम्मेदारी को लेकर विवाद के कारण अब तक शुरू नहीं हो पाया था.
अब तक पुलिस के सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि जिन लोगों पर कोई आपराधिक केस नहीं है, उन्हें जेल में नहीं रखा जा सकता. ऐसे में उन्हें थानों में ही रखा जाता था. 2025 में ही 1,000 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लेकर डिपोर्ट किया गया.
यह दो मंज़िला इमारत है, जिसमें 80 लोगों की क्षमता है. पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग हिस्से बनाए गए हैं. खाने, बिस्तर और बाथरूम जैसी बुनियादी सुविधाएँ देने का दावा किया गया है. लेकिन शुरुआत में ही एक समस्या सामने आ गयी है, महिलाओं की संख्या उम्मीद से ज्यादा होने के कारण उनके सेक्शन में भीड़ बढ़ गई है. 2025 के पहलगाम हमले के बाद देशभर में “अवैध” प्रवासियों के खिलाफ अभियान तेज हुआ. गुजरात, दिल्ली, असम, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया.
आलोचकों का कहना है कि कार्रवाई में कई बार धर्म और भाषा के आधार पर लोगों को निशाना बनाया गया. बंगाली बोलने वाले मुसलमानों और रोहिंग्या समुदाय को खास तौर पर प्रभावित होने की बात सामने आई है. कुछ मामलों में भारतीय नागरिकों को भी गलती से हिरासत में लेने के आरोप लगे हैं.
ओडिशा में कथित गोरक्षकों ने दलित व्यक्ति को सरेआम किया जलील, पहनाई जूतों की माला
‘द मूकनायक’ में रंजन चौधरी की रिपोर्ट है कि ओडिशा के कालाहांडी जिले में गोमांस पकाने के आरोप में कुछ तथाकथित गोरक्षकों ने एक दलित व्यक्ति को जूतों की माला पहनाई और उस पर गोबर का घोल डालकर उसे अपमानित किया.
भवानीपटना शहर की इस घटना का विडियो गुरुवार, 9 अप्रैल को सामने आया, जिसमें गोरक्षक सरेआम उस व्यक्ति को जलील करते हुए नजर आ रहे हैं. वायरल वीडियो में अज्ञात पीड़ित जमीन पर बैठा दिखाई दे रहा है. गले में जूतों की माला पड़ी है और उसके ठीक सामने भारी मात्रा में मांस रखा हुआ है, जिसे कथित तौर पर उसने तैयार किया था.
कुछ ग्रामीण इस पूरी घटना का वीडियो अपने मोबाइल में कैद कर रहे थे, तभी भीड़ में से एक शख्स आगे आया और उसने पीड़ित के सिर पर एक स्टील का कटोरा रख दिया, जिसे देखकर वहां मौजूद लोग ठहाके लगाकर हंसने लगे. वहां मौजूद लोगों ने पीड़ित के चेहरे पर कुछ सफेद पाउडर छिड़क दिया और बाद में बाल्टी से गोबर का घोल उस दलित व्यक्ति के ऊपर उड़ेल दिया.
ओडिशा में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता अमिय पांडव ने इस घटना का वीडियो अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर साझा किया है. उन्होंने इस दलित व्यक्ति पर हुए हमले और दुर्व्यवहार के लिए सीधे तौर पर हिंदुत्ववादी संगठन बजरंग दल पर आरोप लगाया है.
केरल हाई कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को हार्मोन थेरेपी जारी रखने की दी अनुमति
स्क्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक, केरल हाई कोर्ट ने शुक्रवार को दो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी जारी रखने की अनुमति दी है, जिसे अस्पतालों ने नए ‘ट्रांजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन विधेयक 2026’ के पारित होने के बाद अचानक रोक दिया था.
जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस की पीठ ने मामले की गंभीरता को समझते हुए कहा कि “यदि किसी व्यक्ति का चल रहा मेडिकल उपचार अचानक रोक दिया जाता है, तो इसके “बहुत अजीब और गंभीर परिणाम” हो सकते हैं. अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि कानून बनाते समय मानवीय और चिकित्सीय पहलुओं का ध्यान रखा जाना अनिवार्य है. याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि निजी अस्पतालों ने नए कानून के डर से उनका इलाज बंद कर दिया है, जिससे उनके स्वास्थ्य पर खतरा मंडरा रहा है.
याचिकाकर्ताओं की वकील अरुंधति काटजू ने तर्क दिया कि यह संशोधन 2014 के प्रसिद्ध नालसा बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए सिद्धांतों का उल्लंघन करता है. नालसा फैसले ने ‘स्व-पहचान’ को एक मौलिक अधिकार माना था, जिसे यह नया कानून प्रभावी रूप से छीन रहा है.
25 मार्च को पार्लियामेंट में पारित नए कानून के तहत जेंडर पहचान के लिए मेडिकल मूल्यांकन और प्रमाणन को अनिवार्य किया गया है. इसमें यह रेखांकित किया गया है कि ऐसे ट्रांजिशन की अनुमति देने का अधिकार मेडिकल बोर्ड के तहत काम करने वाले चिकित्सा पेशेवरों के पास होगा.
सुप्रीम कोर्ट: मतदान या चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं
स्क्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राजस्थान के ‘जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ’ के चुनाव नियमों से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि भारत में वोट देने का अधिकार या चुनाव लड़ने का अधिकार कोई मौलिक अधिकार नहीं है.
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि ये अधिकार केवल ‘वैधानिक अधिकार’ हैं, जिसका अर्थ है कि ये कानून द्वारा बनाई गई शर्तों और सीमाओं के भीतर ही लागू होते हैं.
कोर्ट ने उन उप-नियमों को बरकरार रखा जो चुनाव लड़ने के लिए विशिष्ट योग्यताएं निर्धारित करते हैं. कोर्ट ने जोर देकर कहा कि जहाँ वोट देना एक नागरिक की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी है, वहीं चुनाव लड़ना एक “अतिरिक्त अधिकार” है. इसी कारण, चुनाव लड़ने के अधिकार पर सरकार या संस्थाएं अधिक कड़े नियम और योग्यताएं लागू कर सकती हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए यह साफ किया कि यदि कोई व्यक्ति चुनाव लड़ना चाहता है, तो उसे उस विशेष कानून द्वारा निर्धारित शैक्षणिक योग्यता, आयु सीमा या अन्य अयोग्यता संबंधी शर्तों को पूरा करना ही होगा. पीठ ने कहा कि वोट देने और चुनाव लड़ने के अधिकार एक-दूसरे से पूरी तरह अलग हैं. वोट देना चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा है, जबकि चुनाव लड़ना एक विशेष पद प्राप्त करने की आकांक्षा है, जो स्वाभाविक रूप से सख्त नियमों के अधीन होती है.
असम में पहले बेघर, अब वोटर लिस्ट से बाहर: बेदखली के बाद हजारों लोगों का मताधिकार खत्म
राहुल करमाकर की रिपोर्ट के मुताबिक, असम में चुनावी सूची (इलेक्टोरल रोल) के संशोधन के बाद बड़ी संख्या में लोगों खासकर बंगाली-भाषी मुस्लिम समुदाय का नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है. इनमें से कई लोग पहले सरकारी जमीन से बेदखल किए जा चुके थे और अब उनके वोटर कार्ड भी अमान्य हो गए हैं. गुवाहाटी से करीब 30 किलोमीटर दूर काचुटाली गांव में स्थिति सबसे गंभीर है, जहां 2,000 से ज्यादा लोग मतदान प्रक्रिया से बाहर हो गए.
9 अप्रैल को बाबूर अली और उनके बेटे मुकद्दस अली सहित करीब 350 लोग काचुटाली के दो मतदान केंद्रों सोनापुर पाथर लोअर प्राइमरी स्कूल और एक सरकारी भवन के बाहर जमा हुए. उन्हें मतदान केंद्र से 300 मीटर दूर बाहर रोक दिया गया था वे उम्मीद कर रहे थे कि उनका वोट देने का अधिकार बहाल हो जाएगा.
ये 350 लोग उन 2,000 से ज्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, जिनका नाम नवंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच हुई विशेष संशोधन (एसआर) प्रक्रिया के बाद वोटर लिस्ट से हटा दिया गया था. बाबूर अली के परिवार के सभी सदस्य मतदान केंद्र के बाहर थे, सिवाय उनके सबसे छोटे बेटे शमसुल के. 20 वर्षीय शमसुल ने पश्चिमी असम के बरपेटा जिले में अपने मामा के पते का इस्तेमाल कर वोट डाला.
मुकद्दस अली ने सवाल उठाया कि उनके पिता 1985 से वोट डाल रहे थे, फिर भी उनका नाम हटा दिया गया, जबकि बेटे का नाम स्वीकार कर लिया गया. मुकद्दस पहले बीजेपी से जुड़े थे और 2018 में पंचायत चुनाव भी लड़े थे. उन्हें लगा था कि पार्टी से जुड़ाव उन्हें कार्रवाई से बचा लेगा, लेकिन सितंबर 2024 में प्रशासन ने काचुटाली में करीब 100 बीघा (33 एकड़) जनजातीय जमीन खाली कराने के लिए उनके घर सहित 150 घरों को तोड़ दिया.
एक साल बाद, उनका नाम वोटर लिस्ट से भी हटा दिया गया. वे उन 2.43 लाख मतदाताओं में शामिल हैं, जिनके नाम फरवरी 2026 में जारी संशोधित सूची से हटाए गए थे.काचुटाली के कई लोग बताते हैं कि वे मूल रूप से ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बसे गांवों से आए थे. 91 वर्षीय अब्दुल अजीज ने बताया कि उन्होंने 1980 के दशक में करबी जनजाति के लोगों से जमीन खरीदी थी और टैक्स भी दिया था, लेकिन सरकार अब इन दस्तावेजों को अवैध बता रही है. करीब 80 परिवार अब मस्जिद के आसपास छोटे-छोटे अस्थायी घरों में रह रहे हैं.
इन लोगों का कहना है कि वे नदी कटाव के कारण विस्थापित हुए और मजबूरी में यहां बस गए. लेकिन अब उन्हें जमीन और वोट, दोनों से वंचित कर दिया गया है. सितंबर 2024 में बेदखली के दौरान पुलिस कार्रवाई में हैदर अली और जुबाहिर अली की मौत हो गई थी और 33 लोग घायल हुए थे. 48 लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसके बाद 30 सितंबर 2024 को रोक का आदेश मिला. लेकिन लोगों का आरोप है कि अप्रैल 2025 में फिर से कार्रवाई कर बाकी घर भी तोड़ दिए गए. 650 से ज्यादा परिवारों को अस्थायी कैंपों में बसाया गया.
इसके बाद नवंबर 2024 में चुनाव अधिकारी की ओर से नोटिस मिला, जिसमें कहा गया कि वे अब काचुटाली के “सामान्य निवासी” नहीं हैं, इसलिए उनका नाम वोटर लिस्ट से हटाया जा सकता है. लोगों ने दोबारा आवेदन किया, लेकिन वह खारिज हो गया. जिला कार्यालय में उन्हें गांव प्रमुख (गांवबुड़ा) से प्रमाण पत्र लाने को कहा गया, लेकिन गांव प्रमुख ने वैध वोटर आईडी मांगी. इस तरह आधार, राशन कार्ड जैसे अन्य दस्तावेज भी मान्य नहीं किए गए.
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने 2021 में सत्ता संभालने के बाद सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने का अभियान शुरू किया था. उन्होंने कहा था कि अतिक्रमण हटाए गए लोगों के नाम वोटर लिस्ट से भी हटाए जाएंगे और “मिया” समुदाय की राजनीतिक ताकत को खत्म किया जाएगा. कानूनी विशेषज्ञ फजलुज्जमान मजूमदार के अनुसार, सरकार जमीन से अतिक्रमण हटा सकती है, लेकिन किसी व्यक्ति का वोट देने का अधिकार छीनना गलत है क्योंकि यह नागरिकता से जुड़ा अधिकार है.
उन्होंने कहा कि वोटर लिस्ट से नाम हटाने के नियम केवल तीन स्थितियों में लागू होते हैं, मृत्यु, स्थायी रूप से स्थानांतरण या कानूनी शिकायत के आधार पर, किसी अन्य कारण से नाम हटाना अनुचित है. हालांकि प्रभावित लोग गरीब और अनपढ़ हैं, इसलिए वे अदालत तक नहीं पहुंच पा रहे हैं.
न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी के 100 दिन: समाजवाद और शासन की चुनौतियों के बीच एक सफर
‘अल जजीरा’ के एंडी हिर्शफेल्ड और ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ के डैव सैंडर्स की रिपोर्ट के अनुसार, न्यूयॉर्क सिटी के पहले मुस्लिम मेयर ज़ोहरान ममदानी ने अपने कार्यकाल के 100 दिन पूरे कर लिए हैं. एक लोकतांत्रिक समाजवादी के रूप में ममानी की जीत ऐतिहासिक थी, और अब वे अपनी ‘अफोर्डेबिलिटी’ (किफायत) की नीतियों को लागू करने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी सबसे बड़ी जीत ‘यूनिवर्सल चाइल्डकेयर’ (सबके लिए मुफ्त बाल देखभाल) योजना रही है, जिसके लिए उन्होंने गवर्नर कैथी होचुल के साथ मिलकर 1.2 अरब डॉलर का फंड सुरक्षित किया है. इसके अलावा, उन्होंने शहर के 1,00,000 गड्ढों को भरने का लक्ष्य भी समय से पहले पूरा कर लिया है. ममानी का कहना है कि अगर वे छोटे काम ठीक से करेंगे, तभी जनता बड़े बदलावों के लिए उन पर भरोसा करेगी.
हालांकि, मेयर को कई मोर्चों पर चुनौतियों और विरोध का भी सामना करना पड़ रहा है. उन्होंने चुनाव के दौरान कई कट्टर वादे किए थे, जैसे संपत्ति कर बढ़ाना और पुलिस के ‘गैंग डेटाबेस’ को खत्म करना, लेकिन अब वे इन वादों से पीछे हटते दिख रहे हैं. न्यूयॉर्क की व्यापारिक कम्युनिटी को डर है कि “अमीरों पर टैक्स” लगाने की उनकी नीति से अरबपति शहर छोड़कर चले जाएंगे. ममदानी को व्यक्तिगत हमलों और भेदभाव का भी सामना करना पड़ा है. हाल ही में एक रेडियो होस्ट ने उन्हें “कट्टरपंथी इस्लामी कॉकरोच” तक कह दिया था. साथ ही, उनके निवास ‘ग्रेसी मेंशन’ के बाहर एक दक्षिणपंथी विरोध प्रदर्शन के दौरान विस्फोटक फेंकने की कोशिश भी की गई, जिसे पुलिस ने विफल कर दिया. ममानी अब अपनी छवि एक आंदोलनकारी के बजाय एक कुशल प्रशासक के रूप में गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं.
हंगेरी चुनाव: क्या 16 साल के शासन के बाद सत्ता गँवा देंगे विक्टर ओरबान?
अल ज़जीरा और द गार्डियन (अशिफ़ा कसम और फ्लोरा गरमवोल्गी) की रिपोर्ट के अनुसार, हंगेरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान इस समय अपने राजनीतिक अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहे हैं. रविवार, 12 अप्रैल 2026 को होने वाले मतदान को 1990 में लोकतंत्र की बहाली के बाद से सबसे महत्वपूर्ण चुनाव माना जा रहा है. ओरबान, जो पिछले 16 वर्षों से सत्ता में हैं, एक मजबूत विपक्षी आंदोलन का सामना कर रहे हैं जिसने उनकी पकड़ को हिलाकर रख दिया है. अधिकांश सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि ओरबान और उनकी फ़िडेज़ पार्टी सत्ता खो सकती है. अगर ऐसा होता है, तो यह न केवल हंगेरी के लिए बल्कि वैश्विक दक्षिणपंथी आंदोलनों के लिए भी एक बड़ा झटका होगा और यूरोपीय संघ के साथ हंगेरी के तनावपूर्ण संबंधों को एक नया मोड़ देगा. विपक्षी तिस्ज़ा पार्टी की अनीता ओरबान का कहना है कि यह चुनाव केवल पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि हंगेरी की दिशा, पहचान और भविष्य के बीच का चुनाव है.
द गार्जियन के लिए बुडापेस्ट से अशिफ़ा कसम और फ्लोरा गरमवोल्गी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि उत्तरी हंगेरी में प्रधानमंत्री ओरबान के पिता की एक आलीशान संपत्ति के ऊपर उड़ते ड्रोन ने देश की राजनीति में हलचल मचा दी है. इस संपत्ति में शानदार बगीचे, स्विमिंग पूल और ज़ेब्रा जैसे विदेशी जानवर देखे गए हैं. ये ज़ेब्रा ओरबान के करीबी दोस्त और हंगेरी के सबसे अमीर व्यक्ति लोर्न्स मेज़ारोस की संपत्ति से आए थे. स्वतंत्र सांसद अकोस हदहाज़ी ने इसे “पूरे सिस्टम के असीमित भ्रष्टाचार का प्रतीक” करार दिया है. पूर्व फ़िडेज़ सदस्य ज़ोल्टन केस ने ओरबान के शासन को “धीमी गति वाला तख्तापलट” कहा है, जहाँ वकीलों और भाई-भतीजावाद के ज़रिए लोकतांत्रिक संस्थाओं, मीडिया और न्यायपालिका पर कब्ज़ा कर लिया गया है. इस बीच, पीटर मग्यार, जो कभी ओरबान के करीबी थे, अब भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़े चेहरे के रूप में उभरे हैं. ओरबान के समर्थन में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेता भी आए हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर विपक्षी लहर ओरबान की सत्ता के लिए गंभीर खतरा बनी हुई है.
रॉयटर्स के रिपोर्टर क्रिश्चियन लोव की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के अनुसार, हंगेरी चुनाव की पूर्व संध्या पर टेलीग्राम जैसे मैसेजिंग ऐप पर समन्वित रूप से प्रोपेगेंडा फैलाया जा रहा है. डेटा एनालिटिक्स फर्म ‘वॉक्स हार्बर’ के शोध से पता चला है कि रूसी या रूस से जुड़े कंटेंट क्रिएटर ओरबान के पक्ष में माहौल बनाने के लिए बड़े पैमाने पर सामग्री पोस्ट कर रहे हैं. इस अभियान का मकसद मतदाताओं में यह डर पैदा करना है कि यदि ओरबान चुनाव हार गए तो हंगेरी का क्या होगा. शोधकर्ताओं ने पाया कि कई टेलीग्राम चैनलों पर एक ही समय में समान वाक्यों का उपयोग किया जा रहा है, जो एक सुनियोजित मैसेजिंग कैंपेन का हिस्सा है. पीटर क्रेको , जो एक थिंक टैंक के निदेशक हैं, ने बताया कि टिकटॉक और फेसबुक पर भी इसी तरह का व्यवहार देखा गया है, जहाँ रूसी सामग्री का अनुवाद करके प्रचारित किया जा रहा है. इन पोस्टों में अक्सर यह दावा किया जाता है कि यूरोपीय संघ हंगेरी की संप्रभुता को खत्म करना चाहता है या यूक्रेन युद्ध में हंगेरी को घसीटने की साजिश रची जा रही है.
कई हाथियों को तो जानबूझकर अंधा कर दिया जाता है; ‘गुलाबी हथिनी’ की मौत के बाद, हाथी सवारी बंद करने की मांग
जयपुर में गुलाबी रंग से रंगी गई हथिनी ‘चंचल’ की मौत ने व्यावसायिक पर्यटन गतिविधियों के लिए हाथियों के उपयोग पर फिर से बहस छेड़ दी है. प्रमुख गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) वाइल्डलाइफ एसओएस और पेटा ने इंसानों द्वारा हाथियों की सवारी करने की प्रथा को समाप्त करने का आव्हान किया है.
वाइल्डलाइफ एसओएस ने चंचल की मौत को बंधक हाथियों द्वारा झेली जाने वाली “निरंतर उपेक्षा की याद दिलाने वाली घटना“ करार दिया है. संगठन ने जयपुर में एक “सुव्यवस्थित सांठगांठ” की भूमिका की ओर इशारा किया, जो घरेलू और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को “दुर्व्यवहार के चक्र” में शामिल होने के लिए गुमराह करती है.
वाइल्डलाइफ एसओएस के सह-संस्थापक और सीईओ कार्तिक सत्यनारायण ने कहा: “आमेर किला भारत के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है, लेकिन वहां श्रम करने के लिए मजबूर किए गए हाथियों की एक काली सच्चाई भी है. जयपुर में एक सुव्यवस्थित सांठगांठ (कार्टेल) बहुत ही प्रभावी ढंग से निर्दोष विदेशी और भारतीय पर्यटकों को मूर्ख बनाकर उन्हें शोषण के इस चक्र का हिस्सा बना देती है.”
अर्नब चटर्जी की रिपोर्ट के अनुसार, हाथी गाँव समिति के अध्यक्ष बल्लू खान ने कहा कि हथिनी की मृत्यु आर्ट फोटोग्राफर जूलिया बुरुलेवा के “पिंक” फोटोशूट के लिए यात्रा करने के तीन महीने बाद हुई. उन्होंने मौत के कारण के रूप में पेंट के उपयोग से इनकार किया और कहा कि मॉडल यशस्वी के साथ किए गए इस गुलाबी फोटोशूट के लिए जैविक रंगों या ‘गुलाल’ का उपयोग किया गया था, जिसका उपयोग होली के दौरान किया जाता है.
हालाँकि, वाइल्डलाइफ एसओएस ने एक अत्यंत भयावह तस्वीर पेश की है. सत्यनारायण ने कहा: “इनमें से कई बंधक हाथी अंधे और अपाहिज हैं, उनके शरीर पर अनगिनत फोड़े और मवाद से भरे घाव हैं, जिन्हें रंगीन सजावट, मखमल के कपड़ों और पेंट के नीचे बड़ी चतुराई से छिपा दिया जाता है. पर्यटकों को अक्सर यह पता ही नहीं होता कि उनका ‘सांस्कृतिक अनुभव’ जानवरों की पीड़ा, दुर्व्यवहार और रीढ़ की हड्डी की अपूरणीय क्षति पर बना है. कई हाथियों को तो जानबूझकर अंधा कर दिया जाता है.”
भारत के सबसे पूजनीय जानवरों में से एक का शोषण यहीं नहीं रुकता. संगठन ने कहा कि जयपुर में कई ऐसे “टूरिस्ट ट्रैप” (पर्यटकों को लुभाने के जाल) हैं, जो हाथियों के लिए सुरक्षित अभयारण्य होने का ढोंग करते हैं. इनका एकमात्र उद्देश्य पर्यटकों को हाथियों को नहलाने, सवारी करने, खिलाने और पेंट करने के विकल्पों से आकर्षित करना है, जिससे हाथियों में लेड पॉइजनिंग (सीसा विषाक्तता) का गंभीर खतरा बना रहता है.
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, हाथी को सवारी के योग्य बनाने की शुरुआत ‘फाजन’ नामक एक लंबी और क्रूर प्रक्रिया से होती है, जिसमें हाथी के बच्चे को उसकी माँ से अलग कर दिया जाता है. इसके बाद उन्हें एक पिंजरेनुमा ढांचे में बांध दिया जाता है, जहाँ उनके पैरों को बांधकर उन्हें खड़े रहने के लिए मजबूर किया जाता है, जहाँ वे अपने ही मल-मूत्र के बीच पड़े रहते हैं. “आज्ञाकारिता” सिखाने के लिए इन बच्चों को महीनों तक चाबुक, इलेक्ट्रिक रॉड या अंकुश से प्रताड़ित किया जाता है, साथ ही उन्हें नींद से वंचित और भूखा रखा जाता है.
पशु अधिकार संगठन पेटा द्वारा रूसी कलाकार जूलिया बुरुलेवा को लिखे गए एक हालिया पत्र में आमेर किले में सवारी के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले चंचल जैसे हाथियों की दयनीय स्थिति पर जोर दिया गया है. पेटा इंडिया की वेटरनरी अफेयर्स की सीनियर डायरेक्टर डॉ. मिनी अरिवंदन ने कलाकार से आग्रह किया कि वे या तो अपनी वेबसाइट से व्यावसायिक प्रिंट हटा दें या पूरी कमाई भारत में हाथी संरक्षण और सुरक्षा प्रयासों के लिए दान कर दें. उनकी वेबसाइट के अनुसार, यह प्रिंट 3 लाख रुपये से अधिक प्रति पीस बेचा जा रहा है.
पत्र के अनुसार, इन जानवरों को जंजीरों में जकड़ा जाता है, उन्हें गैरेज में खड़ी कारों की तरह कंक्रीट पर खड़ा होना पड़ता है, और उन्हें वेशभूषा और सजावट के नीचे छिपाए गए हथियारों से नियंत्रित किया जाता है.
शोध से यह भी संकेत मिला है कि कंक्रीट, फुटपाथ और अन्य कठोर, अप्राकृतिक सतहों पर चलने से हाथी के पैरों को गंभीर नुकसान पहुँच सकता है. हाथी के पैर मिट्टी और घास जैसी नरम सतहों के लिए बने होते हैं, लेकिन कठोर सतहों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से पुरानी, दर्दनाक और कभी-कभी घातक बीमारियां हो सकती हैं.
एक कॉमेडियन... ‘स्टिल अलाइव’
‘बीबीसी’ की जोया मतीन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के मशहूर स्टैंड-अप कॉमेडियन समय रैना ने महीनों के अंतराल के बाद मंच पर वापसी की है. पिछले साल उनके शो ‘इंडियाज़ गॉट लेटेंट’ में एक गेस्ट द्वारा की गई विवादास्पद टिप्पणी के बाद उन पर एफआईआर दर्ज हुई थी और उनके संपादक को गिरफ्तार कर लिया गया था. इस घटना ने समय के करियर को लगभग खत्म कर दिया था और वे लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन से दूर रहे. अब उन्होंने ‘स्टिल अलाइव’ नाम से अपना स्टैंड-अप स्पेशल रिलीज किया है, जिसे उनके करियर का सबसे व्यक्तिगत और साहसी काम माना जा रहा है. इसमें उन्होंने अपने अवसाद, एंग्जायटी और अपनी मां के फोन कॉल का जवाब न दे पाने की लाचारी को बड़ी ही ईमानदारी से बयां किया है. समय रैना की कॉमेडी शैली अपनी कच्ची और बेबाक भाषा के लिए जानी जाती है, जिसने उन्हें इंटरनेट का सुपरस्टार बना दिया था. अपने नए शो में उन्होंने जॉर्ज ऑरवेल के प्रसिद्ध कथन को तोड़-मरोड़ कर पेश किया कि “हर क्रांति एक छोटा मज़ाक है.” समय का यह स्पेशल न केवल उनकी वापसी का जश्न है, बल्कि यह भारत में फलते-फूलते स्टैंड-अप सर्किट में कॉमेडियंस पर बढ़ते दबाव और कानूनी जोखिमों को भी रेखांकित करता है. समय ने शो के अंत में एक दृढ़ संकल्प के साथ कहा, “मैं अभी भी यहीं हूं और मैं वही करूंगा जो मैं करना चाहता हूं.” प्रशंसकों के लिए यह उनकी आवाज़ की जीत जैसा है.
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.








