10/06/2026 : नागा बंधकों के शव बरामद | नटराजन का खारिज | एनडीए के परिमल का मंजूर | हमारे वोट कहाँ गए | कॉकरोच राजनीति | टीएमसी में बगावत | | दल-बदल बहस | ममता अकेली | भारत की साख
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
‘पूरी तरह से निंदनीय और खुल्लम-खुल्ला’: नटराजन का नामांकन खारिज होने पर कांग्रेस पहुंची चुनाव आयोग
दिलचस्प: कांग्रेस के विरोध के बावजूद, झारखंड में एनडीए उम्मीदवार का नामांकन मंजूर
भारत के शेयर बाजार अब वैश्विक रैंकिंग में ऊपर क्यों नहीं चढ़ रहे हैं
मणिपुर: छह लापता नागा बंधकों के शव बरामद; एक दिन पहले ही 14 कुकी नागरिकों को किया गया था रिहा
‘हमारे वोट कहाँ गए?’: बंगाल के न्यू टाउन के मतदाताओं का सवाल, जहाँ मुस्लिम बहुल बूथ पर भाजपा को मिले 97% वोट
विद्या कृष्णन | मोदी कॉकरोच को मारने के लिए तोप का इस्तेमाल कर रहे हैं
ताश के पत्तों की तरह क्यों बिखर रही है तृणमूल कांग्रेस?
आकार पटेल | सिर्फ लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहना महानता का प्रमाण नहीं
राजेश चतुर्वेदी | जो जिस चुनाव चिन्ह पर जीतकर आया है, उसे दल बदलने से पहले इस्तीफा देकर जनता से नया जनादेश लेना चाहिए
हरकारा एक्सप्लेनर : 41 प्रतिशत वोट और अकेली पड़ गईं ममता
मणिपुर: छह लापता नागा बंधकों के शव बरामद; बंद का ऐलान, एक दिन पहले ही 14 कुकी नागरिकों को किया गया था रिहा
मणिपुर पुलिस ने बुधवार को कहा कि उन्हें कांगपोकपी जिले में सशस्त्र समूहों द्वारा बंधक बनाए गए छह लोगों के शव मिले हैं, जिनके लापता नागा पुरुष होने का संदेह है.
‘पीटीआई’ के अनुसार, यह बरामदगी मणिपुर के सेनापति जिले में लगभग एक महीने पहले सशस्त्र समूहों द्वारा अगवा किए गए 14 कुकी नागरिकों की रिहाई के ठीक एक दिन बाद हुई है. इस रिहाई का स्वागत करते हुए नगालैंड और मेघालय के मुख्यमंत्रियों ने छह नागा बंधकों की भी सुरक्षित रिहाई की मांग की थी.
मणिपुर पुलिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, “स्निफर डॉग्स (खोजी कुत्तों) और फोरेंसिक विशेषज्ञ टीमों की मदद से मणिपुर पुलिस, सीआरपीएफ और असम राइफल्स के लगभग 450 जवानों द्वारा लगभग 24 घंटे तक चलाए गए लगातार तलाशी अभियान के बाद आज दोपहर छह लोगों के शव बरामद किए गए. माना जा रहा है कि ये मृतक उन्हीं लोगों में से हैं जिन्हें 13 मई 2026 को लीलोन वैफेई से बंधक बनाया गया था.”
ये 14 कुकी नागरिक और छह नागा उन लोगों में शामिल थे जिन्हें 13 मई को कांगपोकपी जिले में तीन चर्च नेताओं की हत्या के बाद अगवा कर लिया गया था.
पुलिस ने अपनी पोस्ट में आगे कहा, “पुलिस द्वारा आवश्यक कानूनी औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं और मामले की जांच जारी है.”
अधिकारियों ने बताया कि शवों को पोस्टमार्टम और डीएनए जांच के लिए इम्फाल के रिम्स अस्पताल लाया जाएगा.
इस बीच शवों की बरामदगी से दुखी होकर यूएनसी यूनाइटेड नागा काउंसिल) ने बुधवार शाम को सभी नागा-बहुल क्षेत्रों में गुरुवार सुबह 6 बजे से 24 घंटे के बंद की घोषणा की है. यूएनसी ने कहा, “यह अत्यंत अस्वीकार्य है और मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन तथा मानव गरिमा का अनादर है. हम इसे नागा लोगों की सामूहिक पहचान और सुरक्षा के लिए एक सीधी चुनौती मानते हैं.”
सुमिर करमाकर की रिपोर्ट के मुताबिक, इस समूह ने एक सशस्त्र समूह, ‘कुकी नेशनल फ्रंट-पी’ की संलिप्तता का आरोप लगाया और सरकार से इसे आतंकवादी समूह घोषित करने की मांग की. यूएनसी ने कुकी सशस्त्र समूहों के साथ ‘सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस’ (कदमों पर रोक/सीजफायर) समझौते को रद्द करने और कुकी समुदाय से आने वालीं उपमुख्यमंत्री नेमचा किपगेन को पद से हटाने तक शवों को स्वीकार करने से भी इनकार कर दिया.
‘पूरी तरह से निंदनीय और खुल्लम-खुल्ला’: नटराजन का नामांकन खारिज होने पर कांग्रेस पहुंची चुनाव आयोग
मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन खारिज होने पर विवाद बुधवार को और तेज हो गया. कांग्रेस के एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य आयुक्तों से मुलाकात की.
कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने दलील दी कि किसी भी अदालत ने अभी तक नटराजन के खिलाफ दर्ज एक निजी शिकायत (प्राइवेट कंप्लेंट) पर संज्ञान नहीं लिया है, इसलिए भारत निर्वाचन आयोग को रिटर्निंग ऑफिसर के उस आदेश को वापस लेना चाहिए, जिसके तहत उन्हें अयोग्य घोषित किया गया है. कांग्रेस नेताओं ने कहा कि यदि चुनाव आयोग बुधवार शाम तक रिटर्निंग ऑफिसर की इस गलती को सुधारने का आदेश जारी नहीं करता है, तो पार्टी अदालत का दरवाजा खटखटाएगी और तत्काल सुनवाई की मांग करेगी.
भाजपा द्वारा आपत्ति दर्ज कराने के बाद नटराजन का नामांकन खारिज कर दिया गया था. आरोप था कि नटराजन अपने नामांकन पत्रों के साथ जमा किए गए हलफनामे में एक मामले का पूरा विवरण देने में विफल रहीं.
असद रहमान की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग को “विस्तृत प्रतिवेदन” (डिटेल रिप्रेजेंटेशन) सौंपने के बाद कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा: “(रिटर्निंग ऑफिसर का) यह आदेश ऐसा है जैसे कोई दो और दो को पांच नहीं, बल्कि सात लिख दे. मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ? खुद चुनाव आयोग के कानून, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33ए के तहत आपको विवरण देना होता है... यह केवल जानकारी साझा करने की एक आवश्यकता है. आपको केवल उन्हीं मामलों का खुलासा करना होता है जिनमें दो साल से अधिक की सजा का प्रावधान हो, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि केवल उन्हीं मामलों का जिनमें आरोप (चार्ज) तय हो चुके हों. आरोप तय करने की प्रक्रिया एक न्यायिक प्रक्रिया है, जिसे एक जज तय करता है.”
सिंघवी ने कहा कि वह “निजी शिकायत निराधार हो सकती है और उसका कोई कानूनी आधार नहीं हो सकता है.” उन्होंने आगे जोड़ा, “अगर मैं किसी के खिलाफ कुछ आरोप लगाता हूँ, तो जब तक अदालत उस पर संज्ञान न ले ले, तब तक वह केवल आरोप लगाने से कोई आपराधिक मामला नहीं बन जाता.”
उन्होंने कहा कि नटराजन का नामांकन “उस मामले पर खारिज किया गया है जिसका संज्ञान तक नहीं लिया गया था, जिसका सीधा मतलब है कि ऐसा कोई आपराधिक मामला था ही नहीं जिसका वह खुलासा करतीं.” उन्होंने कहा, “लेकिन आपने इसे शुरुआती चरण में ही कर दिया, जबकि धारा 33ए (जिसका मैंने अभी आपके सामने जिक्र किया) कहती है कि यदि संज्ञान लिया जाता है, तो जांच होगी. जांच के बाद चार्जशीट दाखिल होगी, लेकिन सिर्फ चार्जशीट ही काफी नहीं है. धारा कहती है कि चार्जशीट के बाद जज को आरोप तय करने चाहिए; यदि जज आरोप तय करने के चरण तक पहुंच जाते, तो वह (मीनाक्षी नटराजन) इसका खुलासा करने के लिए बाध्य होतीं.”
उन्होंने बताया कि प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग का ध्यान इस ओर खींचा कि “संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत उनके पास शक्तियों का एक बहुत बड़ा भंडार है.” उन्होंने कहा, “यह एक संवैधानिक शक्ति है; यह एक असीमित (बिना किसी दायरे की) शक्ति है। यह एक अंतर्निहित शक्ति है; यह न्याय करने और गलत को सही करने की शक्ति है. यदि कोई रिटर्निंग ऑफिसर गलत तरीके से नामांकन पत्र को खारिज करता है... तो किसी को अदालत जाने का इंतजार करने की जरूरत नहीं है, न ही किसी को चुनाव याचिका (इलेक्शन पेटीशन) दायर कर 3, 4, 5 या 6 साल बर्बाद करने की जरूरत है.” कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने कहा कि चुनाव आयोग के पास रिटर्निंग ऑफिसर के आदेश पर कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त समय है. उन्होंने बात खत्म करते हुए कहा, “यह पूरी तरह से निंदनीय, खुल्लम-खुल्ला, प्रत्यक्ष रूप से गैर-कानूनी और बिना किसी कानूनी आधार के पारित किया गया आदेश है, और हमारा अनुरोध है कि इसे तुरंत रद्द किया जाना चाहिए.”
झारखंड में कांग्रेस के विरोध के बावजूद, एनडीए उम्मीदवार का नामांकन मंजूर
दिलचस्प यह है कि झारखंड में राज्यसभा चुनाव के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नथवाणी का नामांकन रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा मंजूर कर लिया गया है. इससे पहले कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने उनके नामांकन पत्रों पर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई थीं, जिसके कारण उनका नामांकन अस्थाई रूप से लंबित (पेंडिंग) रख दिया गया था.
शुभम टिग्गा के अनुसार, कांग्रेस विधायक नमन बिक्सल कोंगारी ने आरोप लगाया था कि गुजरात के व्यवसायी और वर्तमान वाईएसआरसीपी सांसद नथवाणी ने अपने दस्तावेजों में निदेशक (डायरेक्टर) के रूप में जुड़ी कंपनियों की जानकारी छिपाई है और उनके नाम के उल्लेख में भी विसंगति है. इसके विपरीत, भाजपा ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया. नथवाणी द्वारा तय समय में दिए गए स्पष्टीकरण और वैध दस्तावेजों के आधार पर अंततः चुनाव अधिकारी ने उनका नामांकन स्वीकार कर लिया.
इस खींचतान के चलते विधानसभा परिसर के बाहर भाजपा और कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने एक-दूसरे के खिलाफ जमकर नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन किया, जिसके कारण माहौल कुछ समय के लिए तनावपूर्ण हो गया था. झामुमो संस्थापक शिबू सोरेन के निधन और भाजपा सांसद दीपक प्रकाश का कार्यकाल पूरा होने से खाली हुई दो सीटों के लिए अब मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है. मैदान में झामुमो के बैद्यनाथ राम, कांग्रेस के प्रणव झा और राजग समर्थित परिमल नथवाणी शामिल हैं. नथवाणी इससे पहले भी 2008 से 2020 तक झारखंड से दो बार राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं.
हरकारा डीप डाइव
जो जिस चुनाव चिन्ह पर जीतकर आया है, उसे दल बदलने से पहले इस्तीफा देकर जनता से नया जनादेश लेना चाहिए
हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में निधिश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार राजेश चतुर्वेदी के साथ मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द किए जाने के विवाद पर चर्चा की. बातचीत में चुनाव आयोग की भूमिका, भाजपा की राजनीतिक रणनीति, कांग्रेस की कमजोरियों और लोकतंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों को केंद्र में रखा गया.
राजेश चतुर्वेदी ने बताया कि मध्य प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों पर चुनाव होना था, जिनमें संख्या बल के आधार पर दो सीटें भाजपा और एक सीट कांग्रेस को मिलनी तय मानी जा रही थी. लेकिन मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद कांग्रेस की एकमात्र संभावित सीट भी खतरे में पड़ गई. कांग्रेस का आरोप है कि उन्हें स्पष्टीकरण देने का अवसर दिए बिना नामांकन खारिज कर दिया गया, जबकि झारखंड में इसी तरह के मामले में उम्मीदवार को जवाब देने का समय दिया गया.
विवाद की जड़ एक ऐसे न्यायिक समन को बताया गया है जिसका उल्लेख नामांकन पत्र में नहीं किया गया था. कांग्रेस का कहना है कि यह कोई आपराधिक मामला या एफआईआर नहीं थी, जबकि भाजपा इसे महत्वपूर्ण जानकारी छिपाने का मामला बता रही है. इसी मुद्दे पर कांग्रेस चुनाव आयोग और अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रही है.
चर्चा में यह भी कहा गया कि 2014 के बाद भारतीय राजनीति में सत्ता हासिल करने और उसे हर हाल में बनाए रखने की प्रवृत्ति मजबूत हुई है. बंगाल, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे उदाहरणों का हवाला देते हुए दल-बदल, क्रॉस वोटिंग और विपक्षी दलों के विधायकों को अपने पक्ष में करने की राजनीति पर सवाल उठाए गए.
राजेश चतुर्वेदी ने कांग्रेस की रणनीति पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि यदि पार्टी को अपने विधायकों पर पूरा भरोसा था तो उन्हें विशेष विमान से दूसरे राज्यों में भेजने की जरूरत क्यों पड़ी. इससे यह संकेत मिलता है कि कांग्रेस को भी टूट-फूट और क्रॉस वोटिंग का डर था.
बातचीत में तेलंगाना का भी जिक्र आया, जहां मीनाक्षी नटराजन कांग्रेस की प्रभारी हैं. इस पर चर्चा हुई कि उनके खिलाफ इस्तेमाल की गई जानकारी भाजपा तक कैसे पहुंची और क्या इसके पीछे कांग्रेस की आंतरिक राजनीति की भी कोई भूमिका हो सकती है.
एपिसोड का निष्कर्ष यह रहा कि मीनाक्षी नटराजन का मामला केवल एक राज्यसभा सीट का विवाद नहीं है. यह चुनाव आयोग की निष्पक्षता, दल-बदल की राजनीति, जनादेश के सम्मान और भारतीय लोकतंत्र की संस्थाओं पर बढ़ते सवालों से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है. राजेश चतुर्वेदी और निधिश त्यागी ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए केवल चुनाव कराना ही नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया का निष्पक्ष और भरोसेमंद होना भी उतना ही जरूरी है.
अयोध्या राम मंदिर फंड में ‘गबन’ के आरोपों पर भाजपा नेता ने केंद्रीय जांच की मांग की
अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए दान के करोड़ों रुपये कथित रूप से गायब होने और गबन (हेराफेरी) के आरोपों को लेकर एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है. ‘पीटीआई’ के अनुसार, इस मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) द्वारा रिपोर्ट मांगे जाने की खबरों के बीच, भाजपा के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता डॉ. रजनीश सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इसकी स्वतंत्र केंद्रीय जांच (सीबीआई या ईडी द्वारा) कराने की मांग की है. उनका कहना है कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था से जुड़े इस मामले में यदि आरोप सच हैं, तो यह गंभीर अपराध है और इसके निष्कर्षों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए.
इससे पहले, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने दान के पैसे गायब होने का आरोप लगाते हुए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की थी और सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए थे. इन आरोपों के जवाब में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में आंतरिक ऑडिट (खातों की जांच) चल रहा है और अब तक हेराफेरी का कोई सबूत नहीं मिला है. उन्होंने बताया कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और ट्रस्ट मिलकर समय-समय पर यह रूटीन जांच करते हैं. हालांकि, अखिलेश यादव ने इस स्पष्टीकरण को अस्पष्ट बताते हुए सीसीटीवी फुटेज की जांच की मांग की है.
विवाद बढ़ता देख राम मंदिर भवन निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा अपने तय कार्यक्रम से पहले ही अचानक अयोध्या पहुंचे और ट्रस्ट के सदस्यों के साथ चार घंटे तक बंद कमरे में समीक्षा बैठक की. फिलहाल ट्रस्ट ने कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है और इसके सदस्य मीडिया से दूरी बनाए हुए हैं. मंदिर परिसर और दर्शन मार्ग पर रखी करीब चार दर्जन दान पेटियों से रोज नकदी जमा की जाती है, जिसकी गिनती के लिए एसबीआई ने एक निजी एजेंसी को अधिकृत किया है.
सुभाष चंद्र गर्ग | भारत के शेयर बाजार अब वैश्विक रैंकिंग में ऊपर क्यों नहीं चढ़ रहे हैं
कहावत है कि जब मुसीबत आती है, तो चारों तरफ से आती है. रुपये के अवमूल्यन (कमजोरी) और महंगाई की बुरी खबरों के बाद, अब एक और झटका लगा है कि भारत वैश्विक मार्केट-कैपिटलाइजेशन (बाजार पूंजीकरण) रैंकिंग में नीचे खिसक गया है.
पिछले महीने, 26 मई को ताइवान ने भारत को पछाड़कर पांचवां स्थान हासिल कर लिया था; ताइवान के शेयरों का मूल्य जहाँ $4.95 ट्रिलियन (लाख करोड़ डॉलर) था, वहीं भारत का पूंजीकरण $4.92 ट्रिलियन था. इसके बाद 1 जून को, दक्षिण कोरिया भी भारत से आगे निकल गया. भारतीय पूंजीकरण गिरकर $4.84 ट्रिलियन पर आ गया, जबकि दक्षिण कोरिया का मार्केट कैप $5.04 ट्रिलियन को पार कर गया. इस तरह भारत सातवें स्थान पर आ गया है.
‘द क्विन्ट’ में सुभाष चंद्र गर्ग लिखते हैं कि ये दोनों घटनाक्रम विशेष रूप से परेशान करने वाले हैं, क्योंकि महज़ 18 महीने पहले भारत का मार्केट कैप दक्षिण कोरिया से लगभग 3.5 गुना और ताइवान से दोगुना था.
पिछले लगभग दो वर्षों से भारत दोनों तरफ से मार खा रहा है. जहाँ एक ओर इसके शेयर बाजार गिर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ताइवान और दक्षिण कोरिया के बाजार नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं.
भारतीय शेयर बाजार पूर्ण और तुलनात्मक—दोनों रूपों में इतना खराब प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं? क्या भारत और नीचे खिसकेगा? क्या यह वापस नौवें स्थान पर चला जाएगा, जहाँ यह 2013 में मोदी सरकार के सत्ता संभालने से पहले था?
गर्ग ने ‘द क्विन्ट’ में प्रकाशित अपने लेख की सूचना देते हुए ‘लिंक्डइन’ पर लिखा, “भारतीय शेयर बाज़ार का बाज़ार पूंजीकरण, जो वैश्विक स्तर पर चौथे स्थान तक पहुँच गया था, इस महीने गिरकर सातवें स्थान पर आ गया है. छोटे हांगकांग और ताइवान तथा तेज़ी से बढ़ते दक्षिण कोरिया ने भारत को पीछे छोड़ दिया है.
भारत चिंताजनक रूप से वैश्विक प्रभाव और रुचि खो रहा है. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) ऐसे बेच रहे हैं मानो भारत में अब कोई अच्छा भविष्य नहीं बचा हो. ग्लोबल इमर्जिंग मार्केट इंडेक्स में ताइवान की एक कंपनी टीसीएमसी का वज़न सभी भारतीय कंपनियों के संयुक्त वज़न से अधिक है. इसके कई कारण हैं. मुख्यतः, दुनिया भारत की विकास गाथा पर विश्वास नहीं करती. भविष्य के विकास चालकों की अनुपस्थिति निराशावाद को बढ़ावा देती है. रुपये की गलत संभाल और गिरावट हमारी परेशानियों को और बढ़ाती है. कुछ लोगों के लिए रुपया 100 तक गिरना कोई मायने नहीं रखता—यह सिर्फ़ एक संख्या है, किसी ने सिस्टम में कहा. लेकिन विदेशी निवेशकों के लिए इसका बहुत महत्व है.
तीसरा कार्यकाल भारतीय अर्थव्यवस्था को नीचे की ओर ले जा रहा है, जिससे यह दुनिया की सबसे असुरक्षित बड़ी अर्थव्यवस्था बन रही है.
(सुभाष चंद्र गर्ग भारत सरकार के वित्त एवं आर्थिक मामलों के पूर्व सचिव हैं)
‘हमारे वोट कहाँ गए?’: बंगाल के न्यू टाउन के मतदाताओं का सवाल, जहाँ मुस्लिम बहुल बूथ पर भाजपा को मिले 97% वोट
पश्चिम बंगाल के राजारहाट न्यू टाउन निर्वाचन क्षेत्र के विधानसभा चुनाव परिणाम एक बड़े राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गए हैं. इस विवाद की मुख्य वजह बूथ संख्या 164 के असामान्य चुनावी आंकड़े और मतगणना प्रक्रिया के दौरान बरती गई कथित गोपनीयता है. ‘ऑल्ट न्यूज़’ को जनसांख्यिकी और चुनावी आंकड़ों में विसंगति मिली है. अंकिता, शिंजिनी और अंकित की लंबी रिपोर्ट का सारांश कहता है कि यह पूरा विवाद मुख्य रूप से ‘मुसलमान पाड़ा’ इलाके के दो पड़ोसी पोलिंग बूथों (164 और 165) के परिणामों के इर्द-गिर्द घूमता है:
बूथ 164 पर कुल 88% मतदाता मुस्लिम हैं. यहाँ पड़े कुल 656 वोटों में से भाजपा उम्मीदवार पीयूष कनोडिया को 637 (97%) वोट मिले, जबकि टीएमसी उम्मीदवार तापस चटर्जी को सिर्फ 5 और माकपा-आईएसएफ गठबंधन के सप्तरर्षि देब को केवल 1 वोट मिला. बूथ 165 की स्थिति: इसी मुस्लिम बहुल इलाके और एक ही परिवारों के मतदाताओं वाले इस पड़ोसी बूथ पर समीकरण बिल्कुल अलग था. यहाँ भाजपा को सिर्फ 32 वोट मिले, जबकि माकपा-आईएसएफ को 299 और टीएमसी को 290 वोट प्राप्त हुए.
17वें दौर की मतगणना तक टीएमसी उम्मीदवार 316 वोटों से आगे चल रहे थे. लेकिन आखिरी 18वें दौर में, जिसमें केवल बूथ 164 की गिनती हुई, पूरा परिणाम पलट गया और भाजपा उम्मीदवार ठीक 316 वोटों से चुनाव जीत गए.
‘ऑल्ट न्यूज़’ की जमीनी पड़ताल में स्थानीय लोगों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने इन नतीजों को पूरी तरह से असंभव और बेतुका बताया. क्षेत्र के माकपा पंचायत सदस्य अहमद अली मोंडल और आईएसएफ नेता अख्तर अली मुल्ला ने कहा कि उनके अपने बड़े परिवारों (8-9 सदस्यों) और पोलिंग एजेंटों ने खुद बूथ 164 पर गठबंधन को वोट दिया था, फिर भी आधिकारिक आंकड़ों में केवल 1 वोट दिखना समझ से परे है.
टीएमसी के बूथ अध्यक्ष मोक्शेद मोंडल ने भी नतीजों को “चौंकाने वाला” बताया. स्थानीय लोगों का कहना है कि इस इलाके में भाजपा का कोई खास चुनाव प्रचार या प्रभाव नहीं था.
माकपा-आईएसएफ गठबंधन के उम्मीदवार सप्तरर्षि देब ने भी मतगणना के दौरान हुई कई संदेहास्पद घटनाओं को उजागर किया. मसलन, शुरुआत में केवल 17 राउंड की मतगणना तय थी, लेकिन बूथ 164 की ईवीएम में मतदान के दिन दर्ज हुए 52 अतिरिक्त वोटों के विवाद के कारण 18वां राउंड जोड़ा गया.
देब का आरोप है कि 4 मई की रात 11 बजे तक टीएमसी आगे थी. अगले दिन सुबह उन्हें फोन पर दोबारा मतगणना की सूचना मिली, लेकिन केंद्र पर उम्मीदवारों या उनके एजेंटों को जाने नहीं दिया गया. कथित तौर पर केवल भाजपा उम्मीदवार को अंदर रहने की अनुमति मिली.
चुनावी नतीजों का आधिकारिक विवरण यानी ‘फॉर्म 20’ उम्मीदवारों को नियमानुसार दो दिनों के भीतर मिल जाना चाहिए था, लेकिन इस मामले में रिटर्निंग ऑफिसर ने इसे लगभग दो सप्ताह बाद जारी किया.
लगाए जा रहे आरोपों पर भाजपा विधायक पीयूष कनोडिया और उनके कार्यकर्ताओं ने साफ किया है कि जनता ने उन्हें वोट दिया है और नतीजे खुद सच्चाई बयां करते हैं. कनोडिया ने विपक्षी दलों के हेरफेर के आरोपों को खारिज करते हुए उन्हें “मूर्खों की दुनिया में जीने वाला” बताया और रिकाउंटिंग के दौरान अकेले अंदर मौजूद होने के दावे को पूरी तरह से गलत करार दिया.
कुलमिलाकर, ‘ऑल्ट न्यूज़’ की यह पड़ताल रेखांकित करती है कि न्यू टाउन का चुनावी नतीजा एक मुस्लिम बहुल बूथ पर भाजपा को मिले अप्रत्याशित एकतरफा वोट और मतगणना प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी के कारण कानूनी और नैतिक विवादों के घेरे में है. विपक्षी दल अब इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का प्रयास कर रहे हैं.
विद्या कृष्णन | मोदी कॉकरोच को मारने के लिए तोप का इस्तेमाल कर रहे हैं
हाल के हफ्तों में भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की गहरी असुरक्षा एक ऐसे घटनाक्रम में दिखाई दी है, जिसमें कुछ कॉलेज छात्रों द्वारा बनाए गए एक व्यंग्यात्मक मंच “कॉकरोच जनता पार्टी” को निशाना बनाया गया. यह मंच कोई राजनीतिक दल नहीं था, बल्कि सोशल मीडिया पर शुरू हुआ एक मज़ाक था, जिसने देखते ही देखते लाखों युवाओं का ध्यान अपनी ओर खींच लिया.
कॉकरोच जनता पार्टी की शुरुआत उस समय हुई जब भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बेरोजगार युवाओं के पत्रकारिता और एक्टिविज्म की ओर जाने की प्रवृत्ति की तुलना कॉकरोच और परजीवियों से की. इस टिप्पणी के जवाब में युवाओं ने व्यंग्य के माध्यम से एक काल्पनिक राजनीतिक मंच खड़ा कर दिया. इंस्टाग्राम और एक्स पर इस पहल को लाखों लोगों का समर्थन मिला. इसके बाद बीबीसी, सीएनएन, द गार्जियन और फ्रांस 24 जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने भी इसकी चर्चा की, जिससे सरकार का ध्यान इस ओर गया.
लेकिन युवाओं के असंतोष को समझने या उससे संवाद करने के बजाय सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और भारत की संप्रभुता के लिए खतरे के रूप में पेश करना शुरू कर दिया. इस समूह के सोशल मीडिया पेज भारत में उपलब्ध नहीं रहे. इसकी वेबसाइट भी बंद कर दी गई. सरकार के मंत्रियों ने इसके संस्थापक अभिजीत दिपके पर विदेशी प्रभाव में काम करने के आरोप लगाए और उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कार्रवाई की मांग तक पहुंच गई.
सोशल मीडिया पर बने एक व्यंग्यात्मक मंच के खिलाफ इस तरह की प्रतिक्रिया किसी कॉकरोच को मारने के लिए तोप चलाने जैसी लगती है.
यह व्यंग्यात्मक पहल भारत के युवाओं की उस बेचैनी का संकेत है जो बेरोजगारी, अनिश्चित भविष्य और लगातार बढ़ती चुनौतियों के बीच जी रहे हैं. वे ऐसे रोजगार बाजार में प्रवेश कर रहे हैं जहां अवसर सीमित हैं. वे भीषण गर्मी, प्रदूषण और आर्थिक दबावों का सामना कर रहे हैं. साथ ही उन्हें लगातार त्याग और धैर्य का पाठ पढ़ाया जाता है.
पिछले महीने ही मेडिकल प्रवेश परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने का मामला सामने आया. दूसरी ओर स्कूली छात्रों को मूल्यांकन से जुड़े विवादों का सामना करना पड़ा. इन घटनाओं पर निराशा जताने वाले छात्रों को सरकारी प्रसारक दूरदर्शन के एक कार्यक्रम में “पाकिस्तानी” तक कहा गया. यह स्थिति बताती है कि अब हम ऐसे दौर में पहुंच चुके हैं जहां अपनी चिंता व्यक्त करने वाले युवाओं पर भी देशभक्ति के पैमाने लागू किए जा रहे हैं.
इन परीक्षा घोटालों से जुड़े तनाव के कारण कई छात्रों ने आत्महत्या तक कर ली, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से उनके लिए कोई सार्वजनिक संवेदना नहीं दिखाई दी.
यह उदासीनता केवल शिक्षा के क्षेत्र तक सीमित नहीं है. मोदी की राजनीति का एक पैटर्न यह भी रहा है कि उनकी संवेदनाएं अक्सर भारतीय सीमाओं से दूर होने वाली त्रासदियों के लिए अधिक दिखाई देती हैं. तेलंगाना में एक ही दिन में 67 लोगों की मौत का कारण बनी भीषण गर्मी पर उन्होंने सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन चीन के शांक्सी प्रांत में खनन दुर्घटना में हुई मौतों पर शोक व्यक्त किया.
मोदी का शासन एक ऐसे कठोर प्रबंधक की तरह दिखाई देता है जहां हर आदेश के साथ निष्ठा की परीक्षा भी जुड़ी होती है. कभी लोगों से ईंधन बचाने को कहा जाता है, कभी विदेशी यात्राएं कम करने की सलाह दी जाती है, कभी उपभोग घटाने और अधिक काम करने का संदेश दिया जाता है. लेकिन यही संदेश तब विरोधाभासी लगते हैं जब प्रधानमंत्री स्वयं विदेश यात्राओं पर जाते दिखाई देते हैं.
हाल ही में यूरोप यात्रा के दौरान मोदी ने वहां की स्वतंत्र प्रेस के सवालों का सामना करने से भी परहेज किया. नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग स्वेंडसन ने उनसे पूछा कि वे दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवालों का जवाब क्यों नहीं देते. मोदी बिना प्रतिक्रिया दिए आगे बढ़ गए. भारत से यह दृश्य देखना असामान्य था, क्योंकि यहां वर्षों से प्रधानमंत्री की खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस देखने को नहीं मिली है.
नॉर्वे दुनिया के प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में पहले स्थान पर है जबकि भारत काफी पीछे है. इस घटना के बाद भारतीय दूतावास ने प्रेस वार्ता आयोजित की, लेकिन आलोचकों का मानना है कि इससे मूल प्रश्न का उत्तर नहीं मिला.
स्वेंडसन को बाद में वही अनुभव झेलना पड़ा जिससे भारतीय पत्रकार अक्सर गुजरते हैं. उन्हें विदेशी एजेंट कहा गया, उनका निजी विवरण सार्वजनिक किया गया और सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ अभियान चलाया गया.
लेखिका का तर्क है कि चाहे मामला कॉकरोच जनता पार्टी का हो या नॉर्वे की पत्रकार का, स्वतंत्र सवाल और स्वतंत्र सोच मोदी सरकार तथा उसके समर्थक तंत्र को असहज कर देते हैं. यह प्रतिक्रिया सवाल पूछने वालों के बारे में कम और सत्ता की मानसिकता के बारे में अधिक बताती है.
पिछले कुछ वर्षों में नोटबंदी, अनुच्छेद 370, कोविड-19 प्रबंधन, पुलों के गिरने की घटनाएं, जल संकट और परीक्षा घोटालों जैसी घटनाओं ने लोगों के भीतर भरोसे को कमजोर किया है. आर्थिक विकास और प्रचार अभियानों के बावजूद आम लोगों के जीवन में मौजूद समस्याओं को छिपाना कठिन होता जा रहा है.
हर समाज को उम्मीद, अवसर और बेहतर भविष्य पर विश्वास की जरूरत होती है. लेकिन जब युवाओं को लगता है कि उनकी समस्याएं सुनी नहीं जा रहीं, तब व्यंग्य और विरोध नए रूपों में सामने आते हैं. कॉकरोच जनता पार्टी उसी प्रक्रिया का हिस्सा है.
लोकतंत्र में व्यंग्य हमेशा से एक सुरक्षा वाल्व की तरह काम करता रहा है. युवाओं की शिकायतों को दबाने से असहमति खत्म नहीं होगी, बल्कि वह और तीखी हो सकती है. दक्षिण एशिया के कई देशों में युवा आंदोलनों ने राजनीतिक परिवर्तन की शुरुआत की है और अक्सर उनकी शुरुआत भी छोटे और साधारण दिखने वाले अभियानों से ही हुई थी.
विडंबना यह है कि जिस कॉकरोच जनता पार्टी को महत्वहीन साबित करने की कोशिश की जा रही है, वही आज भी चर्चा में है. दूसरी तरफ सरकार की बेचैनी लगातार दिखाई दे रही है. शायद यही कारण है कि यह बहस अब किसी सोशल मीडिया मजाक से कहीं बड़ी हो चुकी है. यह भारत के युवाओं, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े बड़े सवालों की बहस बन गई है.
विद्या कृष्णन एक खोजी पत्रकार हैं जो सामाजिक न्याय, सार्वजनिक स्वास्थ्य और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर लिखती हैं.
ताश के पत्तों की तरह क्यों बिखर रही है तृणमूल कांग्रेस?
‘स्क्रोल’ के मुताबिक, पश्चिम बंगाल की राजनीति में कभी अजेय मानी जाने वाली तृणमूल कांग्रेस आज अपने सबसे बड़े संकट से गुजरती दिखाई दे रही है. विधानसभा चुनाव में हार के कुछ ही सप्ताह बाद पार्टी के भीतर बगावत, सांसदों और विधायकों की नाराजगी तथा संगठनात्मक कमजोरी खुलकर सामने आने लगी है. जिस पार्टी ने पिछले डेढ़ दशक तक बंगाल की राजनीति पर प्रभुत्व बनाए रखा, वही अब अपने अस्तित्व को बचाने की चुनौती का सामना कर रही है.
हार के बाद बढ़ती गई मुश्किलें
24 मई को ममता बनर्जी ने भाजपा को चेतावनी देते हुए कहा था कि बंगाल में तृणमूल कार्यकर्ताओं पर जितना दबाव बनाया जाएगा, दिल्ली में भाजपा को उतनी ही राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी. लेकिन इसके बाद घटनाक्रम कुछ ऐसा बदला कि संकट भाजपा की बजाय तृणमूल कांग्रेस के सामने खड़ा हो गया.
सबसे पहले पार्टी के अधिकांश विधायकों ने नेतृत्व की इच्छा के खिलाफ जाकर अपना नेता प्रतिपक्ष चुन लिया. इसके बाद लोकसभा में भी पार्टी के सांसद दो खेमों में बंट गए. रिपोर्टों के मुताबिक तृणमूल के 28 सांसदों में से लगभग 20 सांसद भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ सहयोग करने के पक्ष में दिखाई दिए. यह स्थिति इसलिए भी चौंकाने वाली है क्योंकि तृणमूल लंबे समय से भाजपा की सबसे आक्रामक आलोचक रही है.
क्या अभिषेक बनर्जी बने संकट की वजह?
तृणमूल में उभरती बगावत का केंद्र ममता बनर्जी के भतीजे और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को माना जा रहा है. असंतुष्ट नेताओं का आरोप है कि उनके नेतृत्व में पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं कमजोर हुईं और पुराने नेताओं को हाशिए पर धकेला गया.
चुनाव परिणाम आने के तुरंत बाद कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से अभिषेक की भूमिका पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे. उनका कहना था कि पार्टी में समर्पित कार्यकर्ताओं और अनुभवी नेताओं की जगह चुनावी रणनीतिकारों और सलाहकारों को अधिक महत्व दिया जाने लगा. यही कारण है कि पार्टी का जमीनी संपर्क कमजोर होता गया.
दिलचस्प बात यह है कि बागी नेता ममता बनर्जी को अब भी अपना नेता मानते हैं. उनका विरोध सीधे तौर पर अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली से जुड़ा हुआ है. इस वजह से कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने इसकी तुलना महाराष्ट्र में शिवसेना के विभाजन से की है, जहां नेतृत्व के उत्तराधिकार का प्रश्न राजनीतिक संकट का कारण बना था.
नेता प्रतिपक्ष का विवाद और खुली बगावत
तृणमूल कांग्रेस के भीतर संकट तब और स्पष्ट हो गया जब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के चयन को लेकर विवाद खड़ा हो गया. पार्टी ने वरिष्ठ नेता शोभनदेब चट्टोपाध्याय को इस पद के लिए चुना था, लेकिन कुछ विधायकों ने दावा किया कि उनके हस्ताक्षर फर्जी तरीके से इस्तेमाल किए गए.
इसके बाद पुलिस जांच शुरू हुई और मामला राजनीतिक विवाद में बदल गया. कुछ ही दिनों बाद असंतुष्ट विधायकों ने अलग बैठक कर रितब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष घोषित कर दिया. विधानसभा अध्यक्ष ने उनके नाम को तुरंत मंजूरी भी दे दी. तृणमूल कांग्रेस ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी है, लेकिन तब तक यह स्पष्ट हो चुका था कि पार्टी के भीतर एक बड़ा समूह नेतृत्व से असंतुष्ट है.
भाजपा की भूमिका पर आरोप
तृणमूल कांग्रेस का वफादार गुट इस पूरे घटनाक्रम के पीछे भाजपा को जिम्मेदार ठहराता है. पार्टी नेताओं का आरोप है कि भाजपा सत्ता, राजनीतिक संरक्षण और जांच एजेंसियों के दबाव का इस्तेमाल कर तृणमूल नेताओं को अपने पक्ष में ला रही है.
उनका तर्क है कि जो नेता कल तक अभिषेक बनर्जी की प्रशंसा करते थे, वे अचानक उनके विरोधी कैसे बन गए? उनके अनुसार इसका कारण वैचारिक मतभेद नहीं, बल्कि बदलती राजनीतिक परिस्थितियां हैं. सत्ता से बाहर होने के बाद कई नेताओं को अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता सताने लगी है और वे नए विकल्प तलाश रहे हैं.
संगठन की कमजोरी सबसे बड़ा कारण?
हालांकि तृणमूल कांग्रेस के संकट को केवल वंशवाद या भाजपा की रणनीति से नहीं समझा जा सकता. पार्टी की संगठनात्मक कमजोरी भी एक महत्वपूर्ण कारण मानी जा रही है.
पिछले कुछ वर्षों में तृणमूल पर यह आरोप लगता रहा है कि वह अपने जमीनी संगठन की तुलना में चुनावी प्रबंधन और राजनीतिक सलाहकारों पर अधिक निर्भर हो गई है. चुनावी रणनीति बनाने वाली संस्था आई-पैक की भूमिका को लेकर भी पार्टी के भीतर असंतोष रहा है.
कई नेताओं का मानना है कि पार्टी ने धीरे-धीरे अपने पारंपरिक संगठनात्मक ढांचे को कमजोर होने दिया. जब तक सत्ता थी, यह कमजोरी दिखाई नहीं दी. लेकिन सत्ता हाथ से निकलते ही संगठन के भीतर दरारें सामने आने लगीं.
यूसुफ पठान और ‘पैराशूट राजनीति’ का सवाल
पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान का मामला भी इसी बहस को मजबूत करता है. बहारामपुर से सांसद चुने जाने के बावजूद उन पर अपने क्षेत्र से दूरी बनाए रखने के आरोप लगे. तृणमूल लंबे समय से ऐसे चेहरों को आगे बढ़ाने के लिए आलोचना झेलती रही है जिनकी पहचान चुनावी प्रचार से बनी लेकिन जिनकी जमीनी राजनीतिक पकड़ सीमित रही.
यह प्रवृत्ति पार्टी की संगठनात्मक कमजोरी को और बढ़ाती है, क्योंकि ऐसे नेता संकट के समय संगठन को संभालने में सक्षम नहीं होते.
ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती
तृणमूल कांग्रेस का मौजूदा संकट केवल कुछ नेताओं की बगावत नहीं है. यह उस व्यापक समस्या का संकेत है जो लंबे समय से पार्टी के भीतर विकसित हो रही थी. अभिषेक बनर्जी को लेकर असंतोष, भाजपा की कथित राजनीतिक रणनीति और संगठनात्मक ढांचे का कमजोर होना—इन तीनों ने मिलकर पार्टी को गहरे संकट में धकेल दिया है.
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ममता बनर्जी पार्टी को फिर से एकजुट कर पाएंगी? या फिर पश्चिम बंगाल की राजनीति में वही होने जा रहा है जो कभी महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ हुआ था? आने वाले महीनों में इसका जवाब साफ हो जाएगा, लेकिन फिलहाल तृणमूल कांग्रेस ताश के पत्तों की तरह बिखरती हुई दिखाई दे रही है.
हरकारा डीप डाइव
आकार पटेल | सिर्फ लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहना महानता का प्रमाण नहीं
हरकारा डीप डाइव के इस लाइव एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता आकार पटेल और निधीश त्यागी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 वर्षों के कार्यकाल, उनकी राजनीतिक विरासत, जवाहरलाल नेहरू के योगदान और भारत की वर्तमान दिशा पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत की शुरुआत राम माधव के उस लेख से हुई जिसमें मोदी के लंबे सार्वजनिक जीवन और प्रधानमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल को उनकी ऐतिहासिक सफलता का प्रमाण बताया गया था. इसी दावे के आधार पर दोनों वक्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि किसी नेता की विरासत को आखिर किस पैमाने पर मापा जाना चाहिए.
आकार पटेल ने कहा कि किसी भी राजनीतिक नेता की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह कितने वर्षों तक सत्ता में रहा. उनके अनुसार असली प्रश्न यह है कि उसने अपने पीछे कैसी संस्थाएं, कौन से मूल्य और किस तरह की सामाजिक विरासत छोड़ी. उन्होंने तर्क दिया कि दुनिया भर में बड़े नेताओं को इसलिए याद किया जाता है क्योंकि उन्होंने ऐसे ढांचे तैयार किए जो उनके जाने के बाद भी समाज और देश को दिशा देते रहे.
चर्चा के दौरान जवाहरलाल नेहरू की विरासत का विशेष उल्लेख हुआ. आकार पटेल ने कहा कि आजादी के बाद भारत जिन संस्थाओं पर खड़ा हुआ, उनमें से बड़ी संख्या नेहरू काल में स्थापित हुई. उच्च शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान, सार्वजनिक स्वास्थ्य, औद्योगिक विकास और सांस्कृतिक संस्थानों के निर्माण का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इन संस्थाओं का प्रभाव आज भी दिखाई देता है. उनके अनुसार नेहरू की आलोचना करने वाले भी इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकते कि उन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण की बुनियाद रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
इसके बरअक्स मोदी सरकार की उपलब्धियों पर चर्चा करते हुए सवाल उठाया गया कि क्या पिछले 12 वर्षों में ऐसी संस्थागत विरासत तैयार हुई है जिसे आने वाली पीढ़ियां उसी तरह याद रखेंगी. आकार पटेल ने कहा कि सरकार समर्थक अक्सर आर्थिक विकास, सड़क निर्माण, डिजिटल सेवाओं और वैश्विक मंचों पर भारत की मौजूदगी का उल्लेख करते हैं, लेकिन संस्थागत निर्माण के स्तर पर तस्वीर उतनी स्पष्ट दिखाई नहीं देती.
आर्थिक विकास के दावों पर भी विस्तार से चर्चा हुई. आकार पटेल ने कहा कि भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था में आर्थिक वृद्धि एक स्वाभाविक प्रक्रिया भी होती है और केवल सकल घरेलू उत्पाद के आकार में वृद्धि को असाधारण उपलब्धि नहीं माना जा सकता. उन्होंने कहा कि विकास का वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि आम नागरिक के जीवन में कितना सुधार आया, रोजगार के अवसर कितने बढ़े और सामाजिक असमानता कितनी कम हुई.
विदेश नीति पर बातचीत के दौरान भारत की वैश्विक भूमिका पर भी सवाल उठाए गए. आकार पटेल ने कहा कि यदि भारत वास्तव में विश्व राजनीति में निर्णायक शक्ति बन रहा है तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय संकटों और वैश्विक निर्णयों में दिखाई देना चाहिए. उन्होंने यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा जैसे उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन मुद्दों पर भारत की भूमिका को लेकर गंभीर मूल्यांकन की आवश्यकता है.
चर्चा में प्रेस की स्वतंत्रता और सार्वजनिक जवाबदेही, युवाओं के भविष्य और शिक्षा व्यवस्था पर बात करते हुए दोनों वक्ताओं ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी मानी जाती रही है. लेकिन यदि शिक्षा, रोजगार और अवसरों से जुड़े सवालों का समाधान नहीं हुआ तो यही ताकत भविष्य में चुनौती भी बन सकती है. परीक्षा प्रणाली को लेकर पैदा हुए विवादों और युवाओं में बढ़ती असुरक्षा की भावना को भी इसी संदर्भ में देखा गया.
आकार पटेल ने कहा कि आधुनिक भारत की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसकी विविधता रही है. उन्होंने तर्क दिया कि भारत की लोकतांत्रिक सफलता का आधार यह रहा कि अलग-अलग भाषाओं, धर्मों और संस्कृतियों के लोग एक साझा राष्ट्रीय ढांचे के भीतर साथ रह सके. उनके अनुसार भारत के भविष्य पर विचार करते समय इस मूल भावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
हरकारा एक्सप्लेनर
41 प्रतिशत वोट और अकेली पड़ गईं ममता
‘हरकारा एक्सप्लेनर’ के लाइव इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी और युवा पत्रकार विश्वजीत कुमार ने पश्चिम बंगाल में टीएमसी के भीतर बढ़ती बगावत, ममता बनर्जी की राजनीतिक स्थिति और बंगाल की बदलती सियासत का विस्तृत विश्लेषण किया है.
क्यों महत्वपूर्ण है:
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस का आंतरिक संकट अब विधानसभा से निकलकर संसद तक पहुंच गया है. यदि पार्टी के 28 में से 20 सांसद वास्तव में अलग गुट बनाते हैं, तो यह ममता बनर्जी के नेतृत्व के लिए बड़ा झटका होगा और संसद में विपक्षी राजनीति का समीकरण बदल सकता है.
3 जून को तृणमूल से निष्कासित विधायक रिताब्रता बनर्जी को विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस ने विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी. उन्हें तृणमूल के 80 में से 58 विधायकों का समर्थन प्राप्त था, जो अलग विधायी पहचान के लिए आवश्यक दो-तिहाई संख्या से अधिक है. इससे विधानसभा के भीतर एक अलग गुट औपचारिक रूप से अस्तित्व में आ गया. और अब विधानसभा से आग की लपट लोकसभा तक पहुंच चुकी है.
ताज़ा स्थिति:
टीएमसी के 20 सांसदों ने कथित तौर पर लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए का समर्थन करने और अलग संसदीय समूह के रूप में मान्यता देने की मांग की है. इस समूह का नेतृत्व काकोली घोष दस्तीदार कर रही हैं.
संक्षेप में:
दिल्ली में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर बागी सांसदों की बैठक हुई. बैठक में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी भी मौजूद थे. बागी सांसदों का दावा है कि बंगाल के विकास के लिए एनडीए के साथ जाना जरूरी है.
पर्दे के पीछे:
विधानसभा चुनाव में टीएमसी की हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष लगातार बढ़ रहा था. पहले कई विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के फैसलों का विरोध किया, अब यह असंतोष लोकसभा सांसदों तक पहुंच गया है. इसी बीच राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय भी पार्टी छोड़ चुके हैं. टीएमसी संसद कीर्ति आज़ाद ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है.
मौजूदा स्थिति:
टीएमसी नेतृत्व ने अभी तक बागी सांसदों के दावों को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया है. लोकसभा अध्यक्ष के सामने भेजे गए पत्र और संभावित संसदीय मान्यता पर सबकी नजर है.
दूसरी ओर:
बागी सांसदों का कहना है कि वे जनता के जनादेश का सम्मान कर रहे हैं और बंगाल के विकास के लिए एनडीए का समर्थन करना चाहते हैं. वहीं टीएमसी खेमे का मानना है कि पार्टी को अस्थिर करने की कोशिश की जा रही है.
काकोली घोष दस्तीदार ने कहा, ‘‘हमने जनादेश को स्वीकार किया है और मानते हैं कि हमारा भविष्य का राजनीतिक रास्ता राजग के साथ होना चाहिए.’’
आगे क्या :
अगर लोकसभा अध्यक्ष बागी सांसदों के दावे को मान्यता देते हैं, तो यह सिर्फ टीएमसी में टूट नहीं होगी, बल्कि संसद के शक्ति-संतुलन में बड़ा बदलाव भी होगा. 20 सांसदों का साथ बागियों को दल-बदल कानून से सुरक्षा दे सकता है, जबकि एनडीए को अतिरिक्त मजबूती मिलेगी.
2024 में हुए लोकसभा चुनावों में बीजेपी को 240 सीटों पर जीत मिली थी. ऐसा पहली बार हुआ कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रही केंद्र सरकार में बीजेपी के पास अपना बहुमत नहीं है.
फ़िलहाल लोकसभा में एनडीए के पास लगभग 293 सांसद हैं, जबकि विपक्षी इंडिया ब्लॉक के पास 234 सांसद हैं. अगर टीएमसी के 20 सांसद भी एनडीए में जुड़ जाएँ तो संख्या 313 हो जाएगी. ममता बनर्जी की पार्टी अलग थलग पड़ जाएगी.
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.












