10/04/2026: इस्लामाबाद पर नजरें | भारत का रोल | ट्रंप की छवि | होर्मुज पर भ्रम | जस्टिस वर्मा | बंगाल की 44 सीटें | बीजेपी के 14 खिलाड़ी | ईसी भी 'मोर्चा' | नर्मदा में दूध | गहराता जल संकट |
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
बदलता वैश्विक समीकरण: ईरान-अमेरिका वार्ता में पाकिस्तान बना ‘शांतिदूत’, भारत के लिए आत्ममंथन का समय
‘चुनाव आयोग की भूमिका पर तंज़; बीजेपी की टीम से 14 खिलाड़ी खेल रहे हैं’
जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा: घर में मिले जले हुए नोट और संसदीय जांच से खुद को किया अलग
"युवा और महिला मोर्चा की तरह चुनाव आयोग भी अब भाजपा का ‘चुनाव मोर्चा’ : परकला प्रभाकर"
लखनऊ में दूसरा अंबेडकर स्मारक: मायावती की ‘स्मारक राजनीति’ बनाम योगी सरकार का ‘सांस्कृतिक केंद्र’
बंगाल चुनाव विश्लेषण: 44 सीटों पर हटाए गए मतदाता, 2021 की जीत के अंतर से भी ज्यादा
चुनाव आयोग में तल्खी: ‘गेट लॉस्ट’ के आरोपों के बीच टीएमसी और मुख्य चुनाव आयुक्त में तीखी बहस
आईटी नियमों में बदलाव: सोशल मीडिया के ‘कम्युनिटी नोट्स’ पर अब सरकार की नजर, छिन सकता है ‘सेफ हार्बर’ का दर्जा
सूखते जलाशय और आधी खाली नदियां: भारत में गहराते जल संकट पर केंद्रीय जल आयोग की चेतावनी
सातवाहन विश्वविद्यालय विवाद: दलित प्रोफेसर और छात्र को ‘अर्बन नक्सल’ बताकर प्रताड़ित करने का आरोप
राना अय्यूब के ट्वीट पर विवाद: केंद्र की चेतावनी के बाद ‘एक्स’ के संरक्षण पर मंडराया खतरा
ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम: जंगल बचाने की आड़ में स्थानीय समुदायों और आदिवासियों के विस्थापन का आरोप
इस्लामाबाद में शांति वार्ता: ईरान-अमेरिका युद्धविराम के बीच ट्रंप की वैश्विक छवि पर उठते सवाल
नर्मदा में बहाया गया 11,000 लीटर दूध: ‘शुद्धि’ के नाम पर जलीय पारिस्थितिकी को खतरे की चेतावनी
शांति का मकसद मुश्किल, पाकिस्तान चाहता है बातचीत चलती रहे
इस्लामाबाद में शनिवार से शुरू होने वाली अमेरिका और ईरान के बीच उच्च स्तरीय वार्ता के लिए पाकिस्तान ने एक यथार्थवादी लेकिन मामूली लक्ष्य निर्धारित किया है. अल जज़ीरा के लिए आबिद हुसैन की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तानी अधिकारियों का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच बातचीत के सिलसिले को किसी भी तरह जीवित रखना है. शुक्रवार को अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस वाशिंगटन से इस्लामाबाद के लिए रवाना हुए, जहाँ वे अमेरिकी टीम का नेतृत्व करेंगे. इस टीम में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मुख्य वार्ताकार स्टीव विटकॉफ और उनके दामाद जारेड कुशनर भी शामिल हैं. हालांकि ईरान ने अभी तक अपने प्रतिनिधियों की औपचारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन उम्मीद है कि विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाक़र ग़ालिबफ़ तेहरान की टीम का नेतृत्व करेंगे. यह वार्ता 28 फरवरी को अमेरिकी और इज़राइली हमले में ईरानी सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के ठीक छह हफ्ते बाद हो रही है.
पाकिस्तान के पूर्व संयुक्त राष्ट्र राजदूत ज़मीर अकरम ने अल जज़ीरा को बताया कि पाकिस्तान दोनों पक्षों को मेज़ पर लाने में सफल रहा है, लेकिन अब यह उन पर निर्भर है कि वे समाधान के लिए ज़रूरी त्याग करने को तैयार हैं या नहीं. वार्ता ‘प्रॉक्सिमिटी फॉर्मेट’ (निकटता प्रारूप) में होगी, जिसका अर्थ है कि दोनों प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद के सेरेना होटल में अलग-अलग कमरों में बैठेंगे और पाकिस्तानी अधिकारी संदेशों का आदान-प्रदान करेंगे. पाकिस्तान को ऐसे कूटनीतिक प्रयासों का पुराना अनुभव है, जैसे 1988 में अफगानिस्तान से सोवियत वापसी के दौरान जिनेवा समझौतों में हुआ था. कूटनीतिक हलकों में इस पहल को काफी समर्थन मिल रहा है. प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने फ्रांस, तुर्की, कतर और इटली सहित कई वैश्विक नेताओं से बात की है, जिसे विश्लेषक पाकिस्तान की मध्यस्थता पर अंतरराष्ट्रीय विश्वास के रूप में देख रहे हैं.
हालांकि, लेबनान का मुद्दा इस वार्ता के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है. ईरान का कहना है कि लेबनान पर इज़राइली हमले युद्धविराम का उल्लंघन हैं, जबकि अमेरिका का मानना है कि लेबनान इस समझौते का हिस्सा नहीं है. ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशक्यान ने चेतावनी दी है कि यदि हमले जारी रहे तो बातचीत बेमानी हो जाएगी. इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट किया है कि लेबनान में कोई युद्धविराम नहीं है और वे हिजबुल्लाह पर हमले जारी रखेंगे. इसके अलावा, अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कड़े प्रतिबंध चाहता है, जबकि ईरान प्रतिबंधों से पूरी तरह राहत और यूरेनियम संवर्धन के अपने अधिकार की मान्यता की मांग कर रहा है. होर्मुज जलडमरूमध्य का बंद होना भी एक बड़ा विवादित बिंदु है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो रही है.
सीएनएन के वैश्विक मामलों के विश्लेषक ब्रेट एच. मैकगर्क, जो चार अमेरिकी राष्ट्रपतियों के साथ काम कर चुके हैं, ने इस स्थिति का गहरा विश्लेषण किया है. वे लिखते हैं कि छह सप्ताह के युद्ध के बाद, अमेरिका और ईरान 1979 के बाद की सबसे बड़ी बैठक करने जा रहे हैं, जिसमें अमेरिकी पक्ष का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस करेंगे.
मैकगर्क चेतावनी देते हैं कि बिना ठोस कूटनीतिक तैयारी के इतनी उच्च स्तरीय बैठक जोखिम भरी हो सकती है. इसके दो पहलू हैं. नकारात्मक पक्ष : ईरान यह दिखाने की कोशिश करेगा कि वह मज़बूत है. भले ही उसकी सेना को भारी नुकसान पहुँचा हो, लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य पर उसका नियंत्रण अभी भी बरकरार है. अगर जेडी वेंस इस स्थिति में उनसे मिलते हैं, तो अमेरिका अनजाने में ईरान की इस नई सामरिक स्थिति को मान्यता दे सकता है. सकारात्मक पक्ष : पहली बार ईरान ने आमने-सामने की बातचीत के लिए सहमति दी है, जो उसके पुराने “ग्रेट सैटन” (अमेरिका) के साथ न बैठने के पाखंड को तोड़ता है. मैकगर्क का मानना है कि जेडी वेंस को ‘रोनाल्ड रीगन’ मॉडल अपनाना चाहिए—यानी हाथ बढ़ाएं लेकिन परमाणु संवर्धन और होर्मुज के मुद्दे पर अपनी शर्तों पर अडिग रहें.
‘विश्वगुरु’ असीम मुनीर? शांतिदूत के रूप में पाकिस्तान की भूमिका ने भारत को पिछड़ा हुआ दिखाया
‘द टेलीग्राफ’ में परन बालाकृष्णन का विश्लेषण बताता है कि दशकों से आतंकवाद और अस्थिरता के केंद्र के रूप में पहचाने जाने वाले पाकिस्तान ने हाल ही में वैश्विक मंच पर एक ‘शांतिदूत’ के रूप में उभरकर दुनिया को चौंका दिया है. मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच, अमेरिका और ईरान जैसे धुर विरोधियों को वार्ता की मेज पर लाना इस्लामाबाद की एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि मानी जा रही है. जहाँ एक ओर पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर की भूमिका को लेकर ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ जैसे कयास लगाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारत की प्रतिक्रिया में एक प्रकार की कड़वाहट और कूटनीतिक अलगाव का आभास हो रहा है.
शांति वार्ता का केंद्र: एक किले में तब्दील इस्लामाबाद
इस ऐतिहासिक वार्ता के लिए इस्लामाबाद को पूरी तरह से सील कर दिया गया. 9 और 10 अप्रैल को सार्वजनिक अवकाश घोषित कर नागरिकों को घरों में रहने का निर्देश दिया गया. रेड ज़ोन की सुरक्षा के लिए 10,000 सैन्य कर्मियों की तैनाती और कंटेनरों से सड़कों को बंद करना यह दर्शाता है कि पाकिस्तान इस आयोजन की सफलता और सुरक्षा को लेकर कितना गंभीर है. ईरानी प्रतिनिधिमंडल की सुरक्षा के लिए लड़ाकू विमानों का एस्कॉर्ट भेजना न केवल इज़राइल को एक संकेत था, बल्कि यह भी प्रदर्शित करता था कि पाकिस्तान अपनी छवि सुधारने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है.
पाकिस्तान की कूटनीतिक सक्रियता के पीछे के कारक
पाकिस्तान की इस सफलता के पीछे उसकी सेना और नागरिक सरकार का समन्वित प्रयास रहा है:
सैन्य कूटनीति: फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने सीधे वाशिंगटन से संपर्क साधा। डोनाल्ड ट्रंप के साथ उनके अच्छे संबंधों ने इस वार्ता की नींव रखने में मदद की.
क्षेत्रीय तालमेल: विदेश मंत्री इशाक डार ने सऊदी अरब, मिस्र, तुर्की और यहाँ तक कि फ्रांस जैसे देशों के साथ निरंतर संवाद बनाए रखा.
ईरान के साथ विश्वास: प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ईरानी राष्ट्रपति से सीधे संवाद कर उन्हें वार्ता के लिए राजी किया.
भारत के लिए ‘अंगूर खट्टे’ की स्थिति?
इस विश्लेषण का एक बड़ा हिस्सा भारत की ‘निष्क्रियता’ या ‘गलत प्राथमिकताओं’ पर केंद्रित है. विश्लेषण के अनुसार, भारत इस समय कूटनीतिक केंद्र बिंदु बनने की स्थिति में नहीं था क्योंकि:
अमेरिका (ट्रंप) के साथ रिश्तों में ठिठक: ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित न करने और पिछले संघर्षों का श्रेय न देने के कारण भारत वाशिंगटन की ‘गुड बुक्स’ से बाहर नजर आ रहा है.
ईरान के साथ बढ़ती दूरी: ऐतिहासिक रूप से अच्छे संबंधों के बावजूद, अमेरिका के दबाव में ईरान पर प्रतिबंधों का समर्थन करना तेहरान को नागवार गुजरा है. साथ ही, संघर्ष से ठीक पहले प्रधानमंत्री मोदी की इज़राइल यात्रा ने ईरान के मन में भारत के प्रति संदेह पैदा किया.
कठोर बयानबाजी: विदेश मंत्री एस. जयशंकर की “दलाली” वाली टिप्पणी को वैश्विक राजनयिक हलकों में ‘अपरिपक्व’ माना गया. पाकिस्तान ने इसे भारत की कुंठा के रूप में पेश किया, जहाँ उनके प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि भारत पाकिस्तान को अलग-थलग करने के प्रयास में खुद ही अलग-थलग पड़ गया है.
ऐतिहासिक संदर्भ और बदलता परिदृश्य
पिछले दो दशकों से पश्चिमी देश भारत को चीन के खिलाफ एक मज़बूत ‘काउंटरवेट’ के रूप में देखते आए हैं. लेकिन वर्तमान स्थिति में वाशिंगटन का पाकिस्तान की ओर बढ़ता झुकाव भारत के लिए चिंता का विषय होना चाहिए. विश्लेषकों का मानना है कि पिछले साल पहलगाम की घटना के बाद भारत द्वारा त्वरित सैन्य कार्रवाई (चार दिवसीय युद्ध) ने शायद उसकी ‘संयमी शक्ति’ की छवि को नुकसान पहुँचाया है.
आर्थिक दलदल और कूटनीतिक चमक का विरोधाभास
यद्यपि पाकिस्तान ने वैश्विक स्तर पर सुर्खियाँ बटोरी हैं, लेकिन उसकी आंतरिक आर्थिक स्थिति अभी भी अत्यंत चिंताजनक है:
विदेशी मुद्रा संकट: 16 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार के बावजूद, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था प्रतिबंधों और कर्ज के बोझ तले दबी है.
मित्र देशों का दबाव: यूएई द्वारा 3.5 अरब डॉलर के ऋण की तत्काल वापसी की मांग ने पाकिस्तान की वित्तीय अस्थिरता को उजागर किया है.
विकास दर में बाधा: विदेशी मुद्रा की कमी के कारण औद्योगिक कच्चे माल के आयात में देरी हो रही है, जिससे विकास की गति धीमी बनी हुई है.
कुलमिलाकर, पाकिस्तान ने ‘शांतिदूत’ का चोला ओढ़कर अपनी अंतरराष्ट्रीय साख को बचाने का एक बड़ा जुआ खेला है. यदि वह अमेरिका और ईरान के बीच एक स्थायी समझौता कराने में सफल रहता है, तो यह आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीतों में से एक होगी. भारत के लिए यह क्षण आत्ममंथन का है—जहाँ एक ओर उसे अपनी विदेश नीति की धार को तीखा करना होगा, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय कूटनीति में अपनी खोई हुई पकड़ को दोबारा हासिल करने की दिशा में काम करना होगा. यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पाकिस्तान अपनी इस नई ‘शांतिदूत’ की छवि को लंबे समय तक बरकरार रख पाता है या यह केवल एक क्षणिक कूटनीतिक चमत्कार बनकर रह जाएगा.
इस्लामाबाद में शांति वार्ता, ज़मीन पर जंग: क्या ट्रंप की छवि वाकई कमजोर हुई है?
टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश के लाइव शो में आज ईरान-अमेरिका युद्ध और डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका पर विस्तृत चर्चा हुई. शो की शुरुआत में बात हुई कि इस समय इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम को लेकर औपचारिक बातचीत शुरू हो चुकी है, जिसमें पाकिस्तान की भूमिका अचानक काफी महत्वपूर्ण हो गई है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पाकिस्तान की सक्रियता बढ़ी है और कई देशों के नेताओं ने उसकी मध्यस्थता की सराहना की है.
हालांकि बातचीत चल रही है, लेकिन जमीन पर हालात अब भी तनावपूर्ण हैं. ईरान और अमेरिका के बीच बयानबाजी जारी है, वहीं इज़राइल का लेबनान पर हमला भी जारी है. ईरान का कहना है कि जब तक लेबनान पर हमले नहीं रुकते, तब तक युद्धविराम को सही मायने में लागू नहीं माना जा सकता. इसी वजह से तेल सप्लाई पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाई है.शो में यह भी बताया गया कि इस्लामाबाद में चल रही बातचीत में अमेरिका की तरफ से जे.डी. वेंस और जेरेड कुशनर, जबकि ईरान की ओर से विदेश मंत्री अब्बास अराघची शामिल हैं. ईरान ने बातचीत में अपने 10 प्रमुख प्रस्ताव रखे हैं, जिनमें होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण, प्रतिबंध हटाना, यूरेनियम संवर्धन की अनुमति और क्षेत्र से अमेरिकी सैन्य उपस्थिति कम करना शामिल है.
इस पूरे मामले में एक अहम बात यह भी सामने आई कि इज़राइल इस बातचीत का हिस्सा नहीं है, जबकि वह युद्ध में सक्रिय रूप से शामिल है. ईरान ने साफ कहा है कि अगर इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू कूटनीति में बाधा डालते हैं, तो यह शांति प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा सकता है. चर्चा में डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए. कई विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस युद्ध के कारण ट्रंप की छवि कमजोर हुई है और उन्हें “सबसे बड़ा नुकसान उठाने वाला” नेता माना जा रहा है. शो में यह भी कहा गया कि इस युद्ध ने अमेरिका की वैश्विक ताकत और “डिटरेंस” को कमजोर किया है. वहीं ईरान अपने रुख पर कायम है और उसने अब तक अपनी शर्तों में कोई नरमी नहीं दिखाई है.
अमेरिका-ईरान युद्धविराम संकट में; लेबनान और होर्मुज पर भ्रम बरक़रार
न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच घोषित दो सप्ताह का युद्धविराम शुरू होने के एक दिन के भीतर ही खतरे में पड़ गया है. मुख्य विवाद होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति और लेबनान पर इज़राइल के निरंतर हमलों को लेकर है. ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने धमकी दी है कि यदि लेबनान में हमले नहीं रुके, तो वे क्षेत्र में हमलावरों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करेंगे. बुधवार को इज़राइल ने लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर अब तक का सबसे बड़ा हमला किया, जिसमें 89 लोग मारे गए और लगभग 700 घायल हो गए. इज़राइल का तर्क है कि युद्धविराम लेबनान पर लागू नहीं होता, जबकि पाकिस्तान और ईरान का कहना है कि इसमें लेबनान भी शामिल है.
रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन और ईरान के बीच 10-सूत्रीय वार्ता ढांचे को लेकर भी मतभेद हैं. ईरान ने जो सूची जारी की है, उसे व्हाइट हाउस ने उन शर्तों से अलग बताया है जिनका ज़िक्र राष्ट्रपति ट्रंप ने किया था. इस बीच, खाड़ी देशों—कुवैत, कतर और संयुक्त अरब अमीरात—ने बुधवार को भी ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों की सूचना दी है. मानवीय सहायता संगठनों के अनुसार, इस युद्ध में अब तक ईरान में 1,665 नागरिक मारे जा चुके हैं, जिनमें 244 बच्चे शामिल हैं. लेबनान में मरने वालों की संख्या 1,500 से अधिक हो गई है. इज़राइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू को देश के भीतर भी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है, जहाँ उनके विरोधियों ने इस युद्धविराम को ‘राजनयिक आपदा’ करार दिया है.
ड्रॉप साइट न्यूज़ की एक विशेष रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि इज़राइल के पास बैलिस्टिक मिसाइल इंटरसेप्टर (मिसाइल को हवा में नष्ट करने वाली प्रणाली) का स्टॉक बहुत कम बचा है. ट्रंप प्रशासन के एक सूत्र के हवाले से मुर्तज़ा हुसैन और रयान ग्रिम ने बताया कि इज़राइल के पास अब केवल दो अंकों में इंटरसेप्टर बचे हैं, जिसके कारण सैन्य अधिकारियों को यह चुनना पड़ रहा है कि किस मिसाइल को मार गिराना है और किसे छोड़ना है. ऐरो-2 और ऐरो-3 जैसी प्रणालियों की एक इकाई की लागत 12 मिलियन डॉलर तक होती है और इन्हें फिर से बनाने में महीनों लगते हैं.
उधर, ईरान के दिवंगत नेता अली खामेनेई की मृत्यु के 40वें दिन उनके बेटे मोज्तबा खामेनेई ने ईरान की ‘जीत’ की घोषणा की है. उन्होंने कहा कि इस्लामी गणराज्य एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरा है और ‘वैश्विक अहंकार’ का पतन शुरू हो गया है. उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य में एक ‘नए युग’ का वादा किया, जहाँ ईरान अब जहाजों की आवाजाही को प्रतिदिन 15 से कम तक सीमित रखेगा और हर जहाज़ को आईआरजीसी से मंज़ूरी लेनी होगी. इसी बीच, लेबनान में हताहतों की संख्या बढ़कर 1,888 हो गई है. यूनिसेफ़ ने रिपोर्ट दी है कि इज़राइल के हालिया हमलों में 33 बच्चे मारे गए हैं. हिजबुल्लाह प्रमुख नईम क़ासिम ने संकल्प लिया है कि जब तक ‘अमेरिकी-इज़राइली आक्रामकता’ बंद नहीं होती, तब तक प्रतिरोध जारी रहेगा. दूसरी ओर, पूर्व इज़राइली सेना प्रमुख हर्जी हलेवी के फोन को ईरानी हैकरों द्वारा हैक किए जाने का दावा भी किया गया है, जिसमें कई संवेदनशील बैठकें और नक्शे लीक होने की बात कही गई है.
महंगाई का झटका: युद्ध के कारण अमेरिका में तेल की कीमतों में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है, जिससे मार्च में वार्षिक महंगाई दर बढ़कर 3.3% हो गई है. 1967 के बाद पहली बार पेट्रोल की कीमतों में एक महीने के भीतर 21.2% की भारी बढ़ोत्तरी देखी गई है.
ईरान युद्ध में डोनाल्ड ट्रंप के हाथ खाली; लक्ष्य हासिल हुए या नहीं?
द इकोनॉमिस्ट के विशेष विश्लेषण के अनुसार, यदि यह संघर्षविराम युद्ध का अंत है, तो इसमें सबसे बड़े पराजित डोनाल्ड ट्रंप ही नज़र आ रहे हैं. ट्रंप ने युद्ध के जो तीन मुख्य लक्ष्य रखे थे—ईरान को कमज़ोर कर क्षेत्र को सुरक्षित बनाना, वहां की सत्ता का तख्तापलट करना और परमाणु कार्यक्रम को जड़ से खत्म करना—उनमें से कोई भी पूरा होता नहीं दिख रहा है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान का शासन आज भी कायम है. ट्रंप की धमकियों के बावजूद, आयतुल्लाह अली खामेनेई की जगह उनके बेटे मोजतबा खामेनेई ने सत्ता संभाल ली है, जो और भी कट्टरपंथी माने जाते हैं. परमाणु ठिकाने नष्ट करने के दावों के बावजूद, ईरान के पास अभी भी लगभग 400 किलो समृद्ध यूरेनियम बचा है, जो 10 बम बनाने के लिए काफी है. ट्रंप के युद्ध ने खाड़ी देशों को और अधिक असुरक्षित कर दिया है क्योंकि अब ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए वैश्विक अर्थव्यवस्था को बंधक बनाने की अपनी क्षमता साबित कर दी है. लेख का निष्कर्ष है कि बिना किसी रणनीति के केवल भारी सैन्य बल का प्रयोग करने से जीत हासिल नहीं होती, बल्कि इससे अमेरिका की नैतिक और रणनीतिक ताकत ही कम हुई है.
ट्रंप की भूल की भारी कीमत—जीत का दावा महज़ एक छलावा?
द न्यूयॉर्कर के लिए सूसन बी. ग्लासर ने ट्रंप प्रशासन की कड़ी आलोचना की है. वे लिखती हैं कि रक्षा सचिव पीट हेगसेथ भले ही इसे “ऐतिहासिक सैन्य जीत” बता रहे हों, लेकिन ज़मीनी हकीकत इसके उलट है. ट्रंप ने शर्त रखी थी कि होर्मुज जलडमरूमध्य तुरंत और सुरक्षित रूप से खुलना चाहिए, लेकिन हकीकत यह है कि वहां यातायात लगभग ठप है और ईरान अब वहां से गुजरने वाले जहाजों से लाखों डॉलर का ‘टोल’ मांग रहा है.
ग्लासर के अनुसार, ट्रंप ने एक खामेनेई को हटाकर दूसरे को सत्ता में बिठा दिया. उन्होंने इसे “तानाशाह का भ्रम” करार दिया, जहाँ ट्रंप को लगा था कि वे एक कमज़ोर दुश्मन पर बिना किसी कीमत के तेज़ जीत हासिल कर लेंगे. उन्होंने ट्रंप की तुलना 2022 के पुतिन से की, जिन्होंने सोचा था कि यूक्रेन पर जीत कुछ ही दिनों में मिल जाएगी. लेख में कहा गया है कि यह 38 दिनों का युद्ध अमेरिका द्वारा खुद को पहुँचाया गया एक गंभीर ज़ख्म है, जिसने वैश्विक स्तर पर अमेरिका की छवि को एक गैर-ज़िम्मेदार और अस्थिर महाशक्ति के रूप में पेश किया है.
ट्रंप को हर बार कैसे हराया जाए—’जीयू-जित्सु’ रणनीति
पूर्व अमेरिकी श्रम सचिव रॉबर्ट रीच ने गार्डियन में लिखा है कि ईरान और अन्य देशों ने ट्रंप की कार्यशैली को समझ लिया है. वे ट्रंप की ही शक्ति का इस्तेमाल उनके खिलाफ करने की ‘जीयू-जित्सु’ रणनीति अपना रहे हैं.
रीच का तर्क है कि ईरान को पता था कि वह अमेरिका से सैन्य रूप से नहीं जीत सकता, इसलिए उसने सस्ते ड्रोन और मिसाइलों से होर्मुज को बंद कर दिया. इससे अमेरिका में तेल की कीमतें बढ़ गईं, जिससे ट्रंप पर राजनीतिक दबाव बना और उन्हें युद्ध रोकने पर मजबूर होना पड़ा. रीच लिखते हैं कि न केवल ईरान, बल्कि चीन, रूस और यहाँ तक कि लेखक ई. जीन कैरोल (जिन्होंने ट्रंप पर मुकदमा जीता) ने भी यही तरीका अपनाया—ट्रंप के सामने झुकने से इनकार करना और उनकी शक्ति को उन्हीं के खिलाफ मोड़ देना, जबकि अंत में उन्हें अपनी ‘जीत’ का दावा करने का मौका देकर उनका चेहरा बचाए रखना.
‘चुनाव आयोग की भूमिका पर तंज़; बीजेपी की टीम से 14 खिलाड़ी खेल रहे हैं’
‘हरकारा’ डीप डाइव पर इस चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी और विवेक मुखर्जी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की जटिलताओं, चुनाव आयोग की भूमिका और राजनीतिक समीकरणों पर विस्तार से बात की है. चर्चा का सार इस प्रकार है:
एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण): चर्चा का मुख्य केंद्र चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई ‘एसआईआर’ प्रक्रिया है. विवेक मुखर्जी का तर्क है कि लोकतंत्र में मतदाता सरकार चुनते हैं, लेकिन यहाँ ऐसा लग रहा है कि चुनाव आयोग ही तय कर रहा है कि मतदाता कौन होगा. इसे उन्होंने “वोटर सिलेक्शन” की प्रक्रिया कहा है.
मतदाताओं का विलोपन (हटाना): बंगाल में लगभग 91-92 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं. रिपोर्टों के अनुसार, सीमावर्ती जिलों में हटाए गए मतदाताओं में से 70% मुस्लिम हैं. इसे एक “पैरेलल लीगल सिस्टम” की तरह देखा जा रहा है जहाँ नागरिक को खुद को निर्दोष साबित करना पड़ रहा है.
ममता बनर्जी की रणनीति: ममता बनर्जी ने इस चुनाव को ‘बंगाली अस्मिता’ से जोड़ दिया है. बीजेपी के स्टार प्रचारकों में उत्तर भारतीयों की बहुलता को उन्होंने “बाहरी बनाम बंगाली” के मुद्दे के रूप में पेश किया है.
चुनावी समीकरण: विवेक मुखर्जी ने बताया कि 2016 और 2021 के बीच कांग्रेस और वामपंथ का वोट शेयर काफी हद तक बीजेपी की ओर शिफ्ट हुआ था. इस बार यदि वामपंथ अपना वोट शेयर (7% के करीब) वापस हासिल करता है, तो इसका सीधा नुकसान बीजेपी को होगा, न कि टीएमसी को.
चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल: चर्चा में चुनाव आयोग के हालिया ट्वीट्स और व्यवहार को लेकर कड़ी आलोचना की गई है. आयोग की भूमिका पर यह कहकर तंज़ किया गया कि क्रिकेट में जैसे एक टीम से 11 खिलाड़ी खेलते हैं, मगर इस मामले में लग रहा है कि “बीजेपी की तरफ से 14 खिलाड़ी (11 में चुनाव आयोग के 3 जोड़कर) खेल रहे हैं.”
न्यायपालिका की भूमिका: सुप्रीम कोर्ट द्वारा 20-27 लाख मतदाताओं को इस बार वोट न देने देने और “अगली बार (2029 में) वोट देने” की बात को लोकतंत्र के लिए निराशाजनक बताया गया है.
क्षेत्रीय प्रभाव: बीजेपी का मजबूत गढ़ उत्तर बंगाल (दार्जीलिंग, अलीपुरद्वार आदि) रहा है, लेकिन टीएमसी की विशेष योजनाओं (जैसे लक्ष्मी भंडार) और ज़मीनी काम की वजह से वहां बीजेपी की पकड़ कमजोर होती दिख रही है.
अल्पसंख्यक और प्रवासी मतदाता: दिल्ली-एनसीआर में काम करने वाले बंगाली भाषी लोग बड़ी संख्या में वोट डालने बंगाल जा रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि वोट न देने पर उनकी सरकारी सुविधाएं बंद हो सकती हैं. यह चर्चा संकेत देती है कि 2026 का बंगाल चुनाव केवल विकास या भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि अस्तित्व, नागरिकता और कूटनीतिक ‘मैजिक’ बनाम ‘लॉजिक’ की लड़ाई बन गया है.
युवा और महिला मोर्चा की तरह ईसी भी अब भाजपा का ‘चुनाव मोर्चा’: परकला प्रभाकर
राजनीतिक अर्थशास्त्री परकला प्रभाकर और ‘द वायर’ के एमके वेणु के बीच पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 और भारत की चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर चर्चा हुई है. यहां अंग्रेजी में हुई बातचीत का सारांश दिया जा रहा है:
चुनावी प्रक्रिया में बदलाव: परकला प्रभाकर का तर्क है कि भारतीय लोकतंत्र एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है. पहले जनता तय करती थी कि सरकार में कौन बैठेगा, लेकिन अब सरकार में बैठे लोग यह तय कर रहे हैं कि मतदाता सूची में कौन रहेगा.
पश्चिम बंगाल के 27 लाख मतदाता: वीडियो में बताया गया है कि लगभग 27 लाख मतदाताओं को ‘अधिनिर्णय’ (एडजुडिकेशन) के नाम पर मतदान से वंचित किया जा रहा है. इन लोगों को आधिकारिक रूप से ‘अपात्र’ घोषित नहीं किया गया है, लेकिन उनके दस्तावेजों की जांच के नाम पर उन्हें वोट देने से रोका जा रहा है.
अल्पसंख्यकों और दलितों का लक्ष्य: प्रभाकर का आरोप है कि हटाए गए या संदिग्ध सूची में डाले गए मतदाताओं में से 80-90% मुस्लिम समुदाय से हैं, और एक बड़ी संख्या अनुसूचित जाति/जनजाति (एससी/एसटी) की भी है.
‘रक्तहीन राजनीतिक: परकला प्रभाकर ने ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) को एक “रक्तहीन राजनीतिक नरसंहार” कहा है. उनका मानना है कि किसी नागरिक को मारे बिना उसकी नागरिकता (वोट देने का अधिकार) छीन लेना उसे राजनीतिक रूप से खत्म करने के समान है.
चुनाव आयोग की भूमिका: चर्चा में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं. प्रभाकर ने एक व्यंग्य का उल्लेख किया कि जैसे भाजपा के विभिन्न मोर्चे (युवा मोर्चा, महिला मोर्चा) हैं, वैसे ही चुनाव आयोग अब भाजपा का “चुनाव मोर्चा” बन गया है.
न्यायपालिका से निराशा: वीडियो में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर भी चिंता जताई गई है. प्रभाकर का कहना है कि कोर्ट का यह कहना कि “लोग इस बार नहीं तो अगली बार वोट दे देंगे” लोकतंत्र के लिए एक “घातक प्रहार” है.
जनादेश की चोरी: चर्चा के अनुसार, बंगाल में उन सीटों पर अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं जहाँ पिछले चुनाव में जीत का अंतर कम था. इसे जनता के जनादेश को ‘चुराने’ की कोशिश बताया गया है.
नागरिक समाज की जिम्मेदारी: प्रभाकर ने अंत में कहा कि अब लोकतंत्र की रक्षा का काम केवल राजनीतिक दलों पर नहीं छोड़ा जा सकता. नागरिक समाज को शांतिपूर्ण ‘सत्याग्रह’ और आंदोलनों के जरिए अपनी आवाज उठानी होगी.
बंगाल की 44 सीटों पर हटाए गए मतदाताओं की संख्या, 2021 की जीत के अंतर से अधिक
पश्चिम बंगाल के दो चरणों वाले विधानसभा चुनावों के लिए मतदाता सूची को अंतिम रूप दिए जाने के साथ ही, निर्वाचन आयोग (ईसी) के आंकड़े बताते हैं कि 293 निर्वाचन क्षेत्रों में से 15% सीटों पर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चली अधिनिर्णयन प्रक्रिया (एडजुडिकेशन) के दौरान, हटाए गए मतदाताओं की संख्या उन सीटों पर 2021 के चुनाव में रही जीत के अंतर से अधिक है.
हालाँकि राज्य में कुल 294 निर्वाचन क्षेत्र हैं, लेकिन इनमें से एक सीट, दिनहाटा में भाजपा ने पोस्टल बैलेट के माध्यम से जीत हासिल की थी, क्योंकि ईवीएम की गिनती में वह टीएमसी से पीछे थी. इस विश्लेषण के उद्देश्य से उस एक सीट को बाहर रखा गया है, क्योंकि ‘एसआईआर’ में उन मतदाताओं को शामिल किया गया है जो ईवीएम पर मतदान करते हैं, न कि उन सर्विस वोटर्स को जो पोस्टल बैलेट के जरिए मतदान करते हैं.
दामिनी नाथ और जतिन आनंद की रिपोर्ट के अनुसार, कुल 44 ऐसी सीटें हैं जहाँ हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा है. इनमें से 24 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने जीत दर्ज की थी और 20 सीटों पर भाजपा का कब्जा था.
सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हुई इस प्रक्रिया के बाद बंगाल में कुल 27.16 लाख मतदाताओं को “अपात्र” पाया गया है. ये लोग आने वाले चुनावों में मतदान नहीं कर पाएंगे.
इस बार विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया सामान्य वार्षिक संशोधन से अलग थी. इसमें मतदाताओं को सूची में बने रहने के लिए नए फॉर्म भरने थे और कुछ श्रेणियों के लोगों को अपनी नागरिकता और पात्रता साबित करने के लिए दस्तावेज देने थे. कोर्ट के आदेश पर 700 न्यायिक अधिकारियों को 60.06 लाख मतदाताओं की पात्रता तय करने के लिए नियुक्त किया गया था. सबसे अधिक प्रभाव पूर्व बर्धमान, पश्चिम बर्धमान और नदिया जिलों में देखा गया है.
नंदीग्राम सीट एक उदाहरण है, जहां 2021 में शुवेंदु अधिकारी 1,736 वोटों से जीते थे, लेकिन अब वहाँ 3,461 मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं. इसी तरह मुर्शिदाबाद की शमशेरगंज सीट पर जीत का अंतर 26,111 था, जबकि वहाँ 74,775 मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं. बलरामपुर गायघाटा और हबड़ा सीटें भी महत्वपूर्ण उदाहरण हैं.
“दफ़ा हो जाओ”: ये सीईसी ज्ञानेश कुमार भी किस तरह के व्यक्ति हैं…
पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी की ‘एक्स’ पोस्ट को फ़ेसबुक पर शेयर करते हुए पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता ने टिप्पणी की, “ये सीईसी ज्ञानेश कुमार भी किस तरह के व्यक्ति हैं?” स्वाति की पोस्ट में टीएमसी (तृण मूल कांग्रेस) और मुख्य चुनाव आयुक्त के बीच हुई बातचीत का शब्द-दर-शब्द विवरण दिया गया है, जिसमें चुनाव आयोग की ओर से घृणित अंदाज़ में “गेट लॉस्ट” (दफा हो जाओ) कहा गया.
तृणमूल कांग्रेस का चार सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल—जिसमें डेरेक ओ’ब्रायन, सागरिका घोष, मेनका गुरुस्वामी और साकेत गोखले शामिल थे—8 अप्रैल 2026 को सुबह 10:03 बजे अपनी सीटों पर बैठता है. कॉन्फ्रेंस रूम में चुनाव आयोग की पूरी बेंच मौजूद है. बैठक शुरू होती है.
1. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री द्वारा पिछले कुछ महीनों में लिखे गए वही नौ पत्र (जिन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त ने नजरअंदाज कर दिया था और कोई जवाब नहीं दिया था), सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त को सौंपे गए.
2. डेरेक ओ’ब्रायन ने एआईटीसी के ज्ञापन के कुछ अंश पढ़े, जिनमें बंगाल में चुनावी ड्यूटी पर अधिकारियों की नियुक्ति के पांच विशिष्ट उदाहरणों को रेखांकित किया गया था. ओ’ब्रायन ने फिर कहा: (यहाँ से शब्द-दर-शब्द विवरण)
डेरेक ओ’ब्रायन: “हम इस उम्मीद में जीते हैं कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे. हमारा ज्ञापन अब सीधे आपको सौंपा जाएगा. इस ज्ञापन में, हमने उन राजनीतिक रूप से समझौता किए हुए अधिकारियों और पर्यवेक्षकों के संबंध में गंभीर चिंता व्यक्त की है जो पश्चिम बंगाल में चुनावी तटस्थता को कमजोर कर रहे हैं...”
सीईसी: “मेरी तरफ से बस एक मिनट. चुनाव आयोग प्रतिबद्ध है...”
डेरेक ओ’ब्रायन: “देखिए मिस्टर कुमार, हम यहाँ पहले भी 8-9 बार आ चुके हैं और आपके साथी आयुक्तों ने एक शब्द भी नहीं बोला है. डॉ. जोशी, डॉ. संधू ने पिछली 8-9 बैठकों में एक शब्द नहीं कहा. लेकिन यह आपका फैसला है. हमने आपसे काफी (खोखले) शब्द सुने हैं, लेकिन हमें जमीन पर कोई कार्रवाई नहीं दिख रही है.”
सीईसी: “क्या आपकी बात पूरी हो गई? फिर मैं बोलूँगा.”
डेरेक ओ’ब्रायन (सामान्य स्वर में): “मैंने सोचा था कि हम आपको इतिहास का पहला ऐसा मुख्य चुनाव आयुक्त होने के लिए बधाई देंगे, जिनके खिलाफ (संसद के दोनों सदनों में) पद से हटाने का नोटिस दिया गया.”
सीईसी: “तेज आवाज में बात मत कीजिए.”
डेरेक ओ’ब्रायन (अब आवाज ऊंची करते हुए): “मुझे मत बताइए कि मुझे तेज बोलना है या नहीं.”
सीईसी: “आप इस कमरे में जोर से नहीं बोल सकते. धन्यवाद. गेट लॉस्ट (यहाँ से दफा हो जाइए)!”
डेरेक ओ’ब्रायन: “आपने कहा ‘गेट लॉस्ट’. आपने हमसे ‘दफा हो जाओ’ कहा. आपने वास्तव में हमें ‘गेट लॉस्ट’ कहा.”
सीईसी: “आप चिल्ला नहीं सकते.”
डेरेक ओ’ब्रायन: “आप हमसे ‘गेट लॉस्ट’ नहीं कह सकते.”
(प्रतिनिधिमंडल यह कहते हुए कमरे से बाहर चला गया: “चैन से सोइए. चैन से सोइए.”)
आईटी नियमों में बदलाव: सोशल मीडिया के ‘कम्युनिटी नोट्स’ पर सरकार की नजर
स्क्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, डिजिटल स्पेस में फैक्ट-चेकिंग की दिशा बदल सकती है. केंद्र सरकार के प्रस्तावित संशोधन सूचना एवं प्राद्यौगिकी आधीनियम - 2021 के तहत के “कम्युनिटी नोट्स” को सरकारी निगरानी के दायरे में लाने की तैयारी है.
कम्युनिटी नोट्स में आम यूज़र्स मिलकर किसी पोस्ट पर जानकारी जोड़ते हैं, ताकि गलत या अधूरी बात को ठीक किया जा सके. लेकिन नए नियम लागू हुए तो सरकार ऐसे नोट्स हटाने को कह सकती है, जो उसके दावों से अलग हों. सरकार का कहना है कि इससे गलत जानकारी पर रोक लगेगी. लेकिन आलोचकों को डर है कि इससे सही जानकारी देने वाले नोट्स भी हटाए जा सकते हैं.
नए नियमों में एक और बड़ा बदलाव है. अगर यूट्यूब, इंस्टाग्राम और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म सरकार की बात नहीं मानते, तो उनका “सेफ हार्बर” स्टेटस खत्म हो सकता है. इसका मतलब होगा कि यूज़र द्वारा डाली गई सामग्री के लिए प्लेटफॉर्म खुद जिम्मेदार होंगे.
पिछले महीनों में कई भाजपा नेताओं और यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों पर भी कम्युनिटी नोट्स जुड़े हैं. एक मामले में सामाजिक न्याय नीतियों पर सवाल उठाने वाला नोट हटाया भी गया.
नागरिक संगठनों, खासकर इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने इसे “एक्सीक्यूटिव कंट्रोल” की ओर झुकाव बताया है, जो डिजिटल अधिकारों और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर असर डाल सकता है.
जस्टिस यशवंत वर्मा ने दिया इस्तीफा, घर में मिले थे भारी मात्रा में जले हुए नोट
मकतूब मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को लिखे एक पत्र में तत्काल प्रभाव से अपना इस्तीफा सौंप दिया है. जबकि जस्टिस वर्मा का कार्यकाल 2031 में समाप्त होना था.
दिल्ली हाईकोर्ट के जज रहते हुए जस्टिस यशवंत के घर से मार्च 2025 को बड़ी संख्या में जले हुए नोटों के बंडल मिले थे, जिसके बाद वे विवादों में आ गए थे. लोकसभा स्पीकर ओम बिरला द्वारा गठित जांच कमेटी जस्टिस वर्मा के खिलाफ एक आंतरिक जांच भी कर रही है.
जस्टिस यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति मुर्मू को सौंपे पत्र में लिखा कि ‘मैं अत्यंत पीड़ा के साथ तत्काल प्रभाव से माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पद से अपना इस्तीफा सौंपता हूं. मैं आपके इस गरिमामय पद पर उन कारणों का बोझ नहीं डालना चाहता, जिन्होंने मुझे यह पत्र लिखने के लिए बाध्य किया. इस पद पर सेवा करना मेरे लिए सम्मान की बात रही है.’
जज पद से इस्तीफे के बाद, जस्टिस वर्मा ने संसदीय जांच से भी खुद को अलग किया
वहीं अरविंद गुणसेकर की रिपोर्ट है कि जस्टिस यशवंत वर्मा ने न केवल अपने पद से इस्तीफा दे दिया है, बल्कि उन्होंने अपने खिलाफ चल रही संसदीय जांच प्रक्रिया से भी खुद को अलग कर लिया है.
जस्टिस वर्मा ने संसदीय जांच समिति को 13 पन्नों का एक विस्तृत पत्र लिखकर प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि यह जांच प्रक्रिया “अनुचित” है और उनके साथ एक मौजूदा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में गरिमापूर्ण व्यवहार नहीं किया गया.
जस्टिस वर्मा शुरू से ही घर पर जली हुई नगदी मिलने के आरोपों को नकारते रहे हैं. उन्होंने पत्र में दोहराया कि बरामद पैसा उनका नहीं था और उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी. जस्टिस वर्मा ने दावा किया कि उनके द्वारा ‘ज्यूडिशियल ऑडिट’ (न्यायिक ऑडिट) की मांग को अनसुना कर दिया गया. उन्होंने यह भी कहा कि उनके 13 साल के करियर में भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं रहा, फिर भी जांच में उन्हें गवाहों से जिरह करने या साक्ष्यों को सही से देखने का मौका नहीं दिया गया.
अपने पत्र के अंत में उन्होंने लिखा कि वह “गहरी उदासी” के साथ इस प्रक्रिया से हट रहे हैं और उन्हें उम्मीद है कि इतिहास एक दिन यह दर्ज करेगा कि एक न्यायाधीश के साथ किस तरह का व्यवहार किया गया.
उल्लेखनीय है कि जुलाई 2025 में लोकसभा के 100 से अधिक सदस्यों ने उन्हें पद से हटाने के लिए राष्ट्रपति को पत्र दिया था, जिसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने एक तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया था. अब जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के बाद, महाभियोग की यह वैधानिक प्रक्रिया संभवतः निरर्थक हो जाएगी क्योंकि वह अब न्यायाधीश के पद पर नहीं हैं.
सातवाहन विश्वविद्यालय विवाद: दलित प्रोफेसर और छात्र को ‘अर्बन नक्सल’ बताकर प्रताड़ित करने का आरोप
‘द मूकनायक’ की रिपोर्ट के अनुसार, तेलंगाना के सातवाहन विश्वविद्यालय में एक गंभीर विवाद उत्पन्न हो गया है, जहाँ एक दलित महिला प्रोफेसर और एक छात्र को ‘अर्बन नक्सल’ बताकर उन्हें प्रताड़ित करने का मामला सामने आया है. इस घटना ने शिक्षाविदों और मानवाधिकार समूहों के बीच भारी आक्रोश पैदा कर दिया है.
इस सुनियोजित अभियान के निशाने पर समाजशास्त्र विभाग की प्रमुख और आर्ट्स कॉलेज की प्रिंसिपल सुरेपल्ली सुजाता और अर्थशास्त्र के छात्र कारिके महेश हैं. कुछ छात्र समूहों ने जिला कलेक्टर और स्थानीय सांसद को शिकायत सौंपकर इन दोनों का माओवादी समूहों से संबंध होने का निराधार दावा किया है.
तेलंगाना सेव एजुकेशन कमेटी के वरिष्ठ सदस्यों के. चक्रधर राव, जी. हरगोपाल और के. लक्ष्मीनारायण ने इस कार्रवाई की कड़ी निंदा की है. उनके अनुसार यह पूरी घटना प्रतिशोध की भावना से प्रेरित है. योग्य होने के बावजूद दलित महिला प्रोफेसर को उनके पद से हटाना दुर्भावनापूर्ण है. ऐसे कृत्य हाशिए के समुदायों (दलित और आदिवासी) के छात्रों के बीच असुरक्षा और डर का माहौल पैदा करते हैं.
समिति ने इस संवेदनशील मुद्दे पर कुलपति की चुप्पी की तीखी आलोचना की है. विशेषज्ञों का मानना है कि विश्वविद्यालय की स्वायत्तता और अकादमिक स्वतंत्रता की रक्षा करना कुलपति की प्राथमिक जिम्मेदारी है. उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि इस मानसिक उत्पीड़न और प्रतिशोधपूर्ण अभियान पर तत्काल रोक लगाई जाए ताकि विश्वविद्यालय का माहौल सुरक्षित बना रहे.
सियासत: जब मायावती ने दो दशक पहले अंबेडकर स्मारक बनवा दिया, तो योगी सरकार क्यों दे रही है ‘नए’ पर ज़ोर
मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सरकार द्वारा लखनऊ के गोमती नगर में एक विशाल अंबेडकर स्मारक बनवाए जाने के लगभग दो दशक बाद, शहर में बी.आर. अंबेडकर को समर्पित एक दूसरा स्मारक पूरा होने की कगार पर है. ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में मौलश्री सेठ की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तरप्रदेश की योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने इसे जुलाई 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा है—जो कि 2027 की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनावों से काफी पहले है.
ऐशबाग में ईदगाह के सामने 5,493.52 वर्ग मीटर क्षेत्र में बन रहे ‘भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर स्मारक एवं सांस्कृतिक केंद्र’ को केवल एक स्मारक संरचना के रूप में नहीं, बल्कि एक बहु-उपयोगिता वाले सांस्कृतिक और संस्थागत परिसर के रूप में परिकल्पित किया गया है.
सवाल इस बात का है कि जब “बहिन जी” दो दशक पहले एक स्मारक बनवा चुकीं तो दूसरे की जरूरत क्या थी? जानकार योगी सरकार के इस कदम को मायावती की ‘स्मारक राजनीति’ के जवाब के रूप में देख रहे हैं, जहाँ जोर केवल पत्थरों की भव्यता पर नहीं, बल्कि आधुनिक सुविधाओं और अकादमिक शोध के जरिए दलित समुदाय से जुड़ने पर है. यह केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि भाजपा की एक बड़ी राजनीतिक और सांस्कृतिक पहल है. मायावती द्वारा बनवाया गया स्मारक (अंबेडकर पार्क) मुख्य रूप से एक विशाल भव्य संरचना और पर्यटन स्थल है. इसके विपरीत, योगी सरकार का नया स्मारक एक “गतिविधि-आधारित परिसर” होगा.
दरअसल, 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को उत्तर प्रदेश में सीटों का नुकसान हुआ था, जिसका एक बड़ा कारण दलित मतदाताओं का झुकाव विपक्ष (सपा-कांग्रेस गठबंधन) की ओर होना माना गया. भाजपा अब इस स्मारक के जरिए अपनी छवि ‘अंबेडकर की विरासत को आगे बढ़ाने वाली पार्टी’ के रूप में मजबूत करना चाहती है. इस परियोजना की आधारशिला 2022 में तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने रखी थी. शुरुआत में इसका बजट लगभग 45 करोड़ रुपये था, जो अब विस्तार के बाद 100 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है.
सरकार इस केंद्र के शोध कार्यों को लखनऊ स्थित डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय से जोड़ने की योजना बना रही है, ताकि यह केवल एक देखने योग्य स्थान न रहकर शिक्षा और विमर्श का केंद्र बने.
राना अय्यूब के ट्वीट नहीं हटाए, ‘एक्स’ के खिलाफ हो सकता है ऐक्शन, केंद्र ने दिल्ली हाईकोर्ट से कहा
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक़, केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट को बताया है कि पत्रकार राना अय्यूब के कथित आपत्तिजनक ट्वीट न हटाने पर ‘एक्स’ कॉर्प के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो सकती है और उसका सेफ हार्बर संरक्षण छीना जा सकता है.
सरकार ने कहा है कि अदालत के आदेश और दिल्ली पुलिस के नोटिस मिलने के बाद भी ‘एक्स’ ने इन ट्वीट्स को अपने प्लेटफार्म से नहीं हटाया. यह मामला न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की अदालत में विचाराधीन है, जहाँ अमिता सचदेवा की याचिका पर सुनवाई हो रही है. याचिका में कहा गया है कि यह ट्वीट हिन्दू देवी देवताओं का अपमान करते हैं और सांप्रादायिक माहौल बिगाड़ सकते हैं.
वहीं एक्स कॉर्प ने अदालत में कहा है कि हाईकोर्ट को यह तय नहीं करना चाहिए कि पोस्ट गैरकानूनी हैं या नहीं, इसके लिए सिविल मुकदमा दायर किया जाना चाहिए था. अगर कंटेंट हटाना है, तो सरकार 2009 के आईटी ब्लॉकिंग नियमों के तहत आदेश जारी करे या फिर सीधे पोस्ट करने वाले (राना अय्यूब) के खिलाफ कार्रवाई की जाए.
ग्रीन क्रेडिट योजना : जंगल बचाने के नाम पर लोगों की ज़मीन छीनी जा रही?
इंडियास्पेंड के लिए सुकृति वत्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम (जीसीपी) के तहत पर्यावरण सुधार के नाम पर कई जगहों पर स्थानीय लोगों को उनकी ज़मीन से हटाया जा रहा है. असम के गोलपारा ज़िले के 43 वर्षीय शिक्षक सुभान मंडोल इसका उदाहरण हैं. 2004 में ब्रह्मपुत्र नदी में आई बाढ़ में उनका घर और खेती की ज़मीन बह गई थी. इसके बाद उन्होंने सरकारी ज़मीन पर परिवार के साथ नई बस्ती बसाई, जहाँ घर, खेत, मस्जिद और आँगनवाड़ी भी था. लेकिन 2025 की शुरुआत में वन विभाग ने तक़रीबन 1,040 लोगों के घर बुलडोज़र से हटा दिया. मंडोल का कहना है कि पहले हमारी ज़मीन पर मिट्टी डाली गई, फिर बांस लगाए गए और अब उसे घेरकर हमें वहां जाने से भी रोका जा रहा है.
24 मार्च 2025 को जिला विभाग ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर बताया था कि इस जगह पर ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम के तहत पौधारोपण कर हाथियों के आवास को फिर से विकसित किया जाएगा. यह योजना अक्टूबर 2023 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा शुरू की गई थी. इसके तहत कंपनियां ग्रीन क्रेडिट खरीद कर पेड़ लगवाती हैं. एक ग्रीन क्रेडिट एक पेड़ के बराबर होता है.
लेकिन सूचना के अधिकार के तहत मिले दस्तावेज़ बताते हैं कि कई जगहों पर ‘इको रिस्टोरेशन’ के नाम पर लोगों को हटाया गया है. कुछ मामलों में ऐसी ज़मीनो को भी घेर लिया गया है, जिन पर आदिवासी और वन समुदायों ने वन अधिकार क़ानून के तहत दवा किया हुआ है. इन दस्तावेजों में यह भी सामने आया कि योजना के लागू करने में कई गड़बड़ियां हैं, जैसे कई जगह तय योजना के बजाय कम पौधे लगाए गए, कुछ जगह एक ही तरह के पेड़ लगाए गए और कई जगहें की ज़मीन ऐसी हैं कि वह पौधारोपण के लिए उपयुक्त नहीं थी.
उदाहरण के तौर पर, असम के गोलपारा में तय योजना के मुताबिक प्रति हेक्टेयर 2,500 पौधे लगाने थे, लेकिन स्थानीय अधिकारियों ने सिर्फ 625 बांस के पौधे लगाए.बिहार के रोहतास और नवादा में 50-55 हेक्टेयर जमीन पर लोगों के घर और खेती पाई गई, जिसके बाद “अतिक्रमण हटाने” की बात कही गई. असम में 214 हेक्टेयर जमीन से घर, खेत, चाय बागान और यहां तक कि दो स्कूल भी हटाए गए.
इस योजना में अब तक 12 राज्यों के 225 स्थानों पर 48.53 वर्ग किलोमीटर जमीन पर काम शुरू हुआ है. करीब 17 सरकारी कंपनियों, जैसे इंडियन ऑयल, कोल इंडिया और एनटीसीपी ने इसमें निवेश किया है. विशेषज्ञों का कहना है कि इस योजना में स्थानीय समुदायों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट नियम नहीं हैं.
पूर्व आईएफएस अधिकारी प्रकृति श्रीवास्तव ने कहा कि जिन जमीनों को “डीग्रेडेड” बताया जा रहा है, उन्हें सरकारी फंड से भी सुधारा जा सकता था, लेकिन कंपनियों को आसान रास्ता दे दिया गया है. यह योजना जंगलों के नुकसान की भरपाई के बजाय बाजार आधारित व्यवस्था को बढ़ावा देती है, जिससे कानूनी सुरक्षा कमजोर हो सकती है. देशभर में करीब 7.5 लाख वन अधिकार दावे अभी भी लंबित हैं. कानून के मुताबिक, जब तक इन दावों का निपटारा नहीं हो जाता, तब तक लोगों को हटाया नहीं जा सकता. ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम का “टॉप-डाउन” तरीका स्थानीय लोगों को बाहर कर देता है, जबकि सही तरीका यह है कि इन्हीं समुदायों को जंगल सुधार के काम में शामिल किया जाए.
नर्मदा में 11 हज़ार लीटर दूध बहाया,शुद्धि के नाम पर पर्यावरण को नुक़सान!
द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश के सीहोर ज़िले में नर्मदा नदी में क़रीब 11 हज़ार लीटर दूध बहाए जाने का मामला सामने आया है, जिसके बाद पर्यावरणविदों ने इसके गंभीर असर को लेकर फ़िक्र ज़ाहिर की है. यह घटना 21 दिन तक चले एक धार्मिक कार्यक्रम के समापन पर हुई. बुधवार को भेरुंदा इलाक़े के सतदेव गाँव में महायज्ञ के साथ यह अनुष्ठान पूरा हुआ.
आयोजकों के अनुसार , नदी की शुद्धता, श्रद्धालुओं के कल्याण और समृद्धि की कामना के लिए यह दूध नर्मदा में अर्पित किया गया. दूध टैंकरों में लाकर नदी के किनारे पहुँचाया गया और बड़ी संख्या में मौजूद श्रद्धालुओं के सामने नदी में बहा दिया गया. जिसके बाद पर्यावरण विशेषज्ञों ने इस पर आपत्ति जताई है.
पर्यावरणविद और वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने कहा है कि इतनी बड़ी मात्रा में जैविक पदार्थ पानी में जाने से डिसॉल्वड ऑक्सीजन कम हो सकती है, जिससे नदी के जीव-जंतुओं और पूरे इकोलॉजी पर बुरा असर पड़ता है. इसके अलावा जो स्थानीय लोग पीने के पानी के लिए इस नदी पर निर्भर हैं, उन पर खतरा बढ़ सकता है.
एक अन्य पर्यावरणविद सुभाष पांडे ने कहा है कि 11 हज़ार लीटर दूध नदी के लिए बड़ा प्रदूषक है. उन्होंने बताया कि यह पानी में ऑक्सीजन की कमी पैदा करता है, जिससे जलीय जीवों की मौत, पानी की गुणवत्ता में गिरावट और सतह पर अत्यधिक वनस्पति जैसी समस्याएं हो सकती हैं.
सूखी नदियां, रीते जलाशय: भारत में गहराता जल संकट
केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) द्वारा 9 अप्रैल 2026 को जारी साप्ताहिक बुलेटिन देश के लिए एक गंभीर चेतावनी लेकर आया है. राजू सजवान (डाउन टू अर्थ) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के प्रमुख नदी बेसिनों और जलाशयों में पानी का स्तर चिंताजनक रूप से गिरकर 60 प्रतिशत से नीचे आ गया है. गर्मी की दस्तक के साथ ही देश के आधे जलाशय खाली हो चुके हैं, जो आने वाले समय में एक बड़े जल संकट का संकेत है.
जलाशयों की वर्तमान स्थिति
सीडब्ल्यूसी देश के 166 प्रमुख जलाशयों की निगरानी करता है. ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, इन जलाशयों में अब केवल 44.71 प्रतिशत पानी ही बचा है. हालांकि, यह आंकड़ा पिछले वर्ष (69.752 बीसीएम) और 10 वर्षों के औसत (64.618 बीसीएम) से बेहतर दिखाई देता है, लेकिन फरवरी 2026 से तुलना करने पर स्थिति भयावह नज़र आती है. फरवरी के पहले सप्ताह में जलाशय 66.63 प्रतिशत भरे हुए थे, जिनमें पिछले दो महीनों में भारी गिरावट दर्ज की गई है. बिहार का चंदन डैम पूरी तरह सूख चुका है (0 प्रतिशत भंडारण), जबकि तमिलनाडु और कर्नाटक के कई बांधों में पानी 13 से 20 प्रतिशत के बीच सिमट गया है.
बेसिनों और क्षेत्रों का हाल
नदी बेसिनों की स्थिति भी कम गंभीर नहीं है. राजू सजवान बताते हैं कि कृष्णा बेसिन में केवल 31.31 प्रतिशत और ब्रह्मपुत्र में 35.20 प्रतिशत पानी शेष है. गंगा और गोदावरी जैसे बड़े बेसिन भी अपनी क्षमता के आधे (लगभग 50 प्रतिशत) के करीब पहुंच गए हैं. क्षेत्रवार तुलना में दक्षिण भारत की स्थिति सबसे खराब है, जहां भंडारण फरवरी के 59.16 प्रतिशत से घटकर अब मात्र 33.63 प्रतिशत रह गया है.
संकट का कारण और भविष्य की चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि 2025 के अच्छे मानसून के कारण शुरुआती स्थिति बेहतर थी, लेकिन जनवरी और फरवरी 2026 में बारिश न होने और बढ़ती गर्मी के कारण वाष्पीकरण तेज़ हुआ है. यदि यही रुझान जारी रहा, तो कृषि, पेयजल और बिजली उत्पादन पर इसका सीधा असर पड़ेगा. यह बुलेटिन स्पष्ट करता है कि जल प्रबंधन की रणनीतियों पर अब युद्धस्तर पर विचार करने की आवश्यकता है.
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.











