08/05/2026: सुवेंदु का चिट्ठा | मिड-डे मील में सांप | वंतारा पर सवाल | नितीश का बेटा | हेट क्राइम ट्रैकर | भरण-पोषण पर हाई कोर्ट | बंगाल हिंसा | लोकतंत्र ‘हाईजैक’ | सिंधु संधि विवाद
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
सुवेंदु अधिकारी: अवसरवाद, आरोप और सत्ता की भूख से बना ‘नेता’
अब बहुत हुआ: मंत्री कुंवर शाह के कर्नल सोफिया कुरैशी पर बयान के मामले में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को फटकारा
ब्राजील पुलिस ने तस्करी की जांच में पक्षी विशेषज्ञ के उपकरण जब्त किए; ‘वंतारा’ से जुड़ा मामला
भ्रष्टाचार की तरह वंशवाद का भी पाखंड; बिहार मंत्रिमंडल में निशांत सहित तीन ‘लाल’ शामिल
एपीसीआर ने लॉन्च किया ‘हेट क्राइम ट्रैकर’; 2014 से अब तक धर्म आधारित हिंसा की 3,576 घटनाएं दर्ज
पति की आर्थिक स्थिति के आधार पर भरण-पोषण का निर्धारण होना चाहिए, न कि पत्नी की एमबीए डिग्री या पिछली कमाई पर: इलाहाबाद हाई कोर्ट
‘बदलाव के लिए वोट दिया, लेकिन यह तो वैसा ही लग रहा है’: भाजपा की जीत के बाद राजनीतिक हिंसा की चपेट में कोलकाता
बिहार मिड-डे मील में सांप मिलने के बाद सैंकड़ो बच्चे अस्पताल में भर्ती
श्रवण गर्ग | पूरा देश एक हाईजैक हुए विमान की तरह है, और बंदूक कुछ लोगों के हाथ में है
पाकिस्तान ने ‘सिंधु जल संधि विवाद’ को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उठाया
सुवेंदु अधिकारी
अवसरवाद, आरोप और सत्ता की भूख से बना ‘नेता’
9 मई 2026 को पश्चिम बंगाल के 9वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले सुवेंदु अधिकारी की कहानी किसी आदर्शवादी नेता की नहीं, बल्कि एक ऐसे राजनीतिक खिलाड़ी की है जिसने हर पार्टी, हर विचारधारा और हर गठबंधन का इस्तेमाल केवल अपनी महत्वाकांक्षा की सीढ़ी के रूप में किया. कांग्रेस से तृणमूल, तृणमूल से भाजपा. यह महज़ एक राजनीतिक यात्रा नहीं है, यह अवसरवाद की पाठ्यपुस्तक है.
पूर्व मेदिनीपुर के एक प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से आने वाले अधिकारी ने 1995 में कांग्रेस से राजनीति शुरू की, फिर 2000 में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस में चले गए, और 2020 में अमित शाह की गोद में जा बैठे. हर बार बदलाव का कारण सिद्धांत नहीं, सत्ता थी.
नंदीग्राम: नायक या मौक़ापरस्त?
अधिकारी अपने राजनीतिक करियर की नींव नंदीग्राम आंदोलन (2006-2007) पर रखते हैं. भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति (बीयूपीसी) के ज़रिए उन्होंने वाम मोर्चे की भूमि अधिग्रहण नीति के ख़िलाफ़ आंदोलन की अगुवाई की और ख़ुद को जनता का चैंपियन घोषित किया.
लेकिन इस तस्वीर का एक और पहलू भी है. राज्य सीआईडी ने आरोप लगाया कि उस आंदोलन के दौरान माओवादियों को हथियार सप्लाई से उनके संबंध थे. हालाँकि अधिकारी ने इसे नकारा. यह वही नंदीग्राम था जहाँ हिंसा में दर्जनों लोग मारे गए थे. तो क्या वे सच में जनता के नायक थे, या केवल अशांति के सबसे चालाक लाभार्थी?
शारदा, नारद और नोटों की गड्डी
अधिकारी का राजनीतिक रिकॉर्ड केवल उनकी वक्तृत्व कला और संगठन कौशल का नहीं, बल्कि गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपों का भी है.
शारदा चिट फंड घोटाला: सीबीआई ने 2014 में उन्हें इस पोंज़ी स्कीम से कथित संबंधों के मामले में पूछताछ के लिए बुलाया. शारदा समूह के सुदीप्त सेन ने 2020 में उन पर सीधे तौर पर जबरन वसूली का आरोप लगाया. कोई दोषसिद्धि नहीं हुई. लेकिन भाजपा में शामिल होने के बाद जाँच की रफ़्तार भी जादुई ढंग से धीमी पड़ गई.
नारद स्टिंग ऑपरेशन (2014): यह मामला और भी सीधा है. स्टिंग ऑपरेटर मैथ्यू सैमुअल के कैमरे पर कथित रूप से नक़द रिश्वत लेते हुए उनकी वीडियो रिकॉर्डिंग सामने आई. कई अन्य टीएमसी नेताओं को सीबीआई ने गिरफ़्तार किया. लेकिन भाजपा में जाने के बाद अधिकारी पर हाथ नहीं पड़ा. सैमुअल ने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया कि उन्हें गिरफ़्तार क्यों नहीं किया गया. और भाजपा ने अपने यूट्यूब चैनल से उनसे संबंधित वीडियो हटा दिए.
2026 के चुनावी हलफ़नामे में उनके ख़िलाफ़ 25 मामले दर्ज हैं. हत्या के प्रयास से लेकर मनी लॉन्ड्रिंग तक. वे इन सभी को राजनीति से प्रेरित बताते हैं. जो हर भ्रष्ट नेता की प्रिय दलील है.
‘तोलाबाज़ भाइपो हटाओ’ और ख़ुद सीएम बन जाओ
2020 में टीएमसी छोड़ने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है. आधिकारिक बयान यह था कि वे भ्रष्टाचार से तंग आ गए थे. असली कहानी यह है कि ममता बनर्जी ने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाना शुरू किया, और अधिकारी जो ख़ुद को नंबर दो समझते थे, को यह रास नहीं आया.
उन्होंने नारा लगाया: “तोलाबाज़ भाइपो हटाओ” (जबरन वसूली करने वाले भतीजे को हटाओ). और ममता ने जवाब दिया कि उन्हें उनका “असली चेहरा” पहचानने में देर हो गई. यह पारस्परिक निंदा किसी राजनीतिक आदर्श की नहीं, एक टूटे हुए सत्ता-गठबंधन की भाषा है.
19 दिसंबर 2020 को अमित शाह के साथ एक रैली में उन्होंने भाजपा की सदस्यता ली. कोई वैचारिक रूपांतरण नहीं, कोई आत्मचिंतन नहीं बस एक नई पार्टी, एक नई सीढ़ी.
सांप्रदायिक बयानबाज़ी: राष्ट्रवाद या ध्रुवीकरण?
अधिकारी की राजनीतिक शैली का एक और स्थायी तत्व है — सांप्रदायिक और विभाजनकारी भाषा. टीएमसी ने उनके कई वीडियो संकलित किए हैं जिनमें वे ममता बनर्जी को “बेगम” कहते हैं, बंगाल के कुछ इलाक़ों को “मिनी पाकिस्तान” बताते हैं, रोहिंग्या और “घुसपैठियों” पर आक्रामक टिप्पणियाँ करते हैं, और बांग्लादेश हिंसा पर उकसावे वाले बयान देते हैं.
उनके समर्थक इसे राष्ट्रवाद और सुरक्षा की भाषा कहते हैं. लेकिन आलोचकों का कहना है कि “बांग्लादेशी घुसपैठिए” और “भारतीय मुसलमान” के बीच की लकीर उनके भाषणों में अक्सर जानबूझकर धुंधली कर दी जाती है. ताकि चुनावी ध्रुवीकरण अधिकतम हो सके. टेलीग्राफ इंडिया सहित कई प्रकाशनों ने ऐसे भाषणों को दस्तावेज़ीकृत किया है.
ममता को दो बार हराया या दो बार भाग्य मिला?
2021 में नंदीग्राम में ममता बनर्जी को ~1,956 वोटों के अंतर से हराना और फिर 2026 में भवानीपुर में उन्हें परास्त . यह अधिकारी की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि मानी जाती है. लेकिन इस “जीत” की पृष्ठभूमि क्या है?
2026 में भवानीपुर से 47,000 नाम मतदाता सूचियों से काट दिए गए थे. जैसा कि द वायर में अपूर्वानंद लिखते हैं, ममता 15,000 वोटों से हारीं . जबकि 47,000 संभावित मतदाता चुनाव से बाहर थे. तो यह नैतिक जीत थी, या एक ऐसी व्यवस्था का फल जिसमें विरोधी मतदाताओं को पहले ही हटा दिया गया था?
सीएम की कुर्सी, लेकिन किस क़ीमत पर?
मुख्यमंत्री बनते ही उनके सामने चुनौतियों का अंबार है. उनके निजी सहायक चंद्रनाथ राठ की चुनाव के तुरंत बाद हत्या हो गई. राज्य की वित्तीय स्थिति पहले से जर्जर है. केंद्र और राज्य के बीच दशकों का टकराव विरासत में मिला है.
उन्होंने महिलाओं को 3,000 रुपये मासिक, बेरोज़गार युवाओं को 3,000 रुपये, 1 करोड़ नई नौकरियाँ, UCC लागू करने और 45 दिनों में 7वाँ वेतन आयोग लागू करने का वादा किया है. जिसके लिए राज्य के ख़ज़ाने पर अतिरिक्त 42,000 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा. यह या तो जनता से किया गया वादा है, या जनता के साथ छल.
सुवेंदु अधिकारी की कहानी आज के भारतीय राजनीतिक परिदृश्य का आईना है. जहाँ सिद्धांत नहीं, सत्ता की भूख राजनीति की धुरी है. एक ऐसा नेता जो माओवाद से जुड़े आरोपों से शुरू होकर, पोंज़ी स्कैम की जाँच से गुज़रकर, नारद के नोटों के कथित वीडियो से बचकर, और सांप्रदायिक भाषणों की आँधी में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचा.
उनके समर्थक उन्हें “बंगाल का किंगमेकर” कहते हैं. लेकिन इतिहास यह तय करेगा कि वे वाक़ई जनता के नेता थे. या महज़ एक ऐसे खिलाड़ी, जिन्होंने हर दाँव पर ख़ुद को बचाया और हर बार किसी और की पीठ पर चढ़कर ऊपर पहुँचे.
‘बदलाव के लिए वोट दिया, लेकिन यह तो वैसा ही लग रहा है’: भाजपा की जीत के बाद राजनीतिक हिंसा की चपेट में कोलकाता
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘परिवर्तन’ एक ऐसा शब्द है जो दशकों से गूँज रहा है. पहले वामपंथ के 34 साल के शासन को हटाने के लिए और अब वर्तमान सत्ता के खिलाफ. लेकिन हालिया विधानसभा चुनावों के बाद कोलकाता और उसके आसपास के इलाकों से जो तस्वीरें और कहानियाँ सामने आ रही हैं, वे किसी बड़े बदलाव की ओर नहीं बल्कि एक पुराने और डरावने ढर्रे की ओर इशारा करती हैं. चुनावी नतीजों के बाद राज्य में भड़की हिंसा ने न केवल राजनीतिक स्थिरता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि आम आदमी के मन में ‘परिवर्तन’ की परिभाषा को भी धुंधला कर दिया है.
स्क्रोल के मुताबिक, चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद से पश्चिम बंगाल पुलिस ने हिंसा के आरोप में 433 लोगों को गिरफ्तार किया है और लगभग 200 एफआईआर दर्ज की गई हैं. राज्य भर में अब तक 4 लोगों की जान जा चुकी है और 1,100 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है. ये आंकड़े केवल पुलिसिया कार्रवाई को नहीं दर्शाते, बल्कि उस डर और असुरक्षा को भी बयां करते हैं जो बंगाल की गलियों में घर कर गई है. हिंसा की यह लहर केवल ग्रामीण इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने कोलकाता के शहरी हृदय को भी अपनी चपेट में ले लिया है.
हिंसा का सबसे भयावह चेहरा कोलकाता हवाई अड्डे के पास देखने को मिला, जहाँ भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के करीबी सहायक चंद्रनाथ रथ की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई. यह घटना उस समय हुई जब लोग जीत के जश्न और हार के गम के बीच संतुलन बिठाने की कोशिश कर रहे थे. एक गरीब दिहाड़ी मजदूर चंपा चक्रवर्ती, जिसके घर के पास यह हत्या हुई, का कहना है कि “हम गरीबों का इन सब से कोई लेना-देना नहीं है. कोई भी पार्टी हमारे लिए कुछ नहीं करती.” चंपा की यह बात उस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है जहाँ सत्ता की लड़ाई में मोहरे हमेशा आम नागरिक ही बनते हैं.
कोलकाता के मुस्लिम बहुल इलाके जैसे तोपसिया और व्यापारिक केंद्र न्यू मार्केट भी इस तनाव से अछूते नहीं हैं. तोपसिया में तृणमूल और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच हुई झड़पें सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर रही हैं. वहीं, न्यू मार्केट में 150 साल पुराने व्यापारिक प्रतिष्ठान आज सन्नाटे में डूबे हैं. व्यापारियों का कहना है कि चुनाव के समय व्यापार प्रभावित होना आम बात है, लेकिन नतीजों के 3 दिन बाद भी बाजार का ‘सुनसान’ रहना चिंताजनक है. हिंसा की खबरों ने न केवल स्थानीय लोगों को डराया है, बल्कि दूसरे राज्यों में बैठे उनके परिजनों को भी व्याकुल कर दिया है.
सबसे दुखद पहलू यह है कि सत्ता के हस्तांतरण या सुदृढ़ीकरण के साथ हिंसा का तरीका नहीं बदला है. न्यू मार्केट के पास एक तृणमूल कार्यालय को बुलडोजर से ढहा दिया गया और उस पर भाजपा का झंडा लगा दिया गया. स्थानीय निवासियों का मानना है कि यह वही ‘वसूली’ और ‘दबंगई’ की राजनीति है जो पहले वामपंथियों और फिर तृणमूल के समय देखी गई थी. अब भाजपा के सत्ता में आने या मजबूत होने पर भी वही तरीके अपनाए जा रहे हैं.
आज कोलकाता की सड़कों पर चलने वाले रिक्शा और बसों पर लगे झंडे अक्सर स्वेच्छा से नहीं, बल्कि सुरक्षा के डर से लगाए जाते हैं. एक ई-रिक्शा चालक का यह कहना कि “सब कुछ वैसा ही लग रहा है,” इस बात का प्रमाण है कि केवल चेहरे और झंडे बदले हैं, व्यवस्था की क्रूरता वहीं की वहीं है. बंगाल का आम नागरिक आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है. उसने बदलाव के लिए वोट दिया था ताकि हिंसा और डर का माहौल खत्म हो सके, लेकिन हकीकत में उसे केवल हिंसा का एक नया संस्करण मिला है. यदि राजनीतिक दल अपनी जीत को प्रतिशोध का जरिया बनाना बंद नहीं करते, तो बंगाल में ‘परिवर्तन’ केवल एक चुनावी नारा बनकर रह जाएगा और लोकतंत्र की आत्मा लहूलुहान होती रहेगी.
अपूर्वानंद | एसआईआर के विरोधी दलों को बंगाल चुनाव से दूर रहना चाहिए था. अब उन्होंने मतदाताओं के नाम काटे जाने को सामान्य बना दिया है
चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के 2026 विधानसभा चुनाव परिणामों से उभरने वाला सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है: सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का विचार अब पूरी तरह दफ़न हो चुका है. पराकाल प्रभाकर स्पष्ट पीड़ा के साथ लिखते हैं कि यदि पश्चिम बंगाल में 27 लाख वैध मतदाताओं का मताधिकार छीन लिया जाना हमारी सबसे गहरी चिंता नहीं बनती, तो हमें स्वयं को लोकतंत्र कहना बंद कर देना चाहिए.
सवाल यह नहीं है कि यदि ये 27 लाख नागरिक मतदान कर पाते तो बंगाल का चुनावी नतीजा क्या होता. हमें यह सोचकर बेचैन होना चाहिए कि भारत के लोगों को अब दो वर्गों में बाँटा जा सकता है: वे जिन्हें मतदान का अधिकार दिया जाता है, और वे जिन्हें समय-समय पर इससे वंचित किया जा सकता है. क्या मताधिकार अब एक अधिकार नहीं रहा और एक विशेषाधिकार बन गया है — एक सरकारी चुनाव आयोग द्वारा बनाई गई ‘तार्किक’ प्रक्रियाओं के ज़रिए प्रदान किया जाने वाला एहसान?
विधानसभा चुनावों से ठीक पहले, चुनाव आयोग ने राज्य में अस्वाभाविक जल्दबाज़ी में एसआईआर किया और क़रीब 91 लाख नाम मतदाता सूचियों से बाहर कर दिए. आँकड़े बताते हैं कि इनमें से एक बड़े हिस्से का सूचियों में बना रहना भारतीय जनता पार्टी के लिए नुक़सानदेह था. जब मतदाता सर्वोच्च न्यायालय में मतदाता सूचियों में पुनः शामिल किए जाने की माँग लेकर पहुँचे, तो उन्हें बेशर्मी से बता दिया गया कि इस चुनाव में उनकी भागीदारी ज़रूरी नहीं है. कि वे अगले चुनाव में मतदान कर सकते हैं.
इसका निहितार्थ बिल्कुल स्पष्ट है: भारत में अब हर वयस्क मतदान के अधिकार का दावा नहीं कर सकता. लगभग सभी राजनीतिक दलों ने — यहाँ तक कि उन दलों ने भी जो इस प्रक्रिया से असहमत थे और जिन्होंने इसका विरोध किया था — इन 27 लाख नागरिकों के बिना ही चुनाव में आगे बढ़ना चुना. ऐसा करके उन्होंने इस विचार को वैधता दे दी कि भारत में वयस्क मताधिकार अब सार्वभौमिक नहीं, बल्कि एक विशेषाधिकार है, जो सभी को गारंटी के साथ नहीं मिलता.
जिन लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार इस तरह छीने गए, उन्होंने देखा कि कोई भी राजनीतिक दल उन्हें इतना महत्वपूर्ण नहीं समझता कि उनके साथ खड़ा हो. ऐसे में यह विलाप करना व्यर्थ है कि ममता बनर्जी भवानीपुर में 15,000 वोटों से हारीं, जबकि वहाँ 47,000 नाम सूचियों से काट दिए गए थे. यदि उन्होंने ऐसी परिस्थितियों में चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया होता — उस चुनाव में भाग लेने से मना कर दिया होता जिसने इन 47,000 को बाहर रखा — तो उन्हें एक नैतिक जीत मिली होती. अब नहीं.
कुछ लोग बताते हैं कि भाजपा और ममता बनर्जी की अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के बीच का अंतर महज़ 13 लाख वोटों का है, जबकि क़रीब 27 लाख लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित किया गया. यदि वे भाग लेते तो क्या नतीजा अलग होता? यह सवाल भी अब अप्रासंगिक हो चुका है, क्योंकि विपक्ष और ममता दोनों ने इन ‘हटाए गए’ मतदाताओं के बिना ही चुनाव लड़ना चुना, जो पूरी तरह जीवित और वैध थे.
इन मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा में कोई नहीं उठा, जिनके अधिकारों का चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय दोनों ने हनन किया. यह लोकतंत्र के भीतर किया जा सकने वाला सबसे गंभीर अन्याय था, फिर भी यह ग़ैर-भाजपा दलों के लिए इतना गंभीर नहीं लगा कि वे तब तक भागीदारी से इनकार करते जब तक इन नागरिकों के अधिकार बहाल नहीं हो जाते. हाँ, ममता बनर्जी सर्वोच्च न्यायालय ज़रूर गईं और उनकी पुनः वापसी की माँग की, लेकिन न उनके लिए और न अन्य दलों के लिए यह इतना अहम मुद्दा था कि वे यह घोषित कर सकें कि एक ऐसे चुनाव में भाग लेने का कोई अर्थ नहीं जिसमें असली लोगों को एक मनमानी और ग़ैरक़ानूनी प्रक्रिया के ज़रिए भाग लेने से रोक दिया गया हो.
यदि राजनीतिक दल मतदाताओं से अपने साथ खड़े रहने की उम्मीद रखते हैं, तो उन्हें पहले यह दिखाना होगा कि वे मतदाताओं के साथ खड़े हैं. दुर्भाग्य से, दल ऐसा करने में विफल रहे हैं.
कुछ ऐसी ही और अधिक चिंताजनक घटना असम में हुई, जहाँ निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन को इस तरह अंजाम दिया गया है कि मुस्लिम मतदाताओं का चुनावी भार उनकी आबादी के अनुपात में कम कर दिया गया है. वे निर्वाचन क्षेत्र जहाँ वे कभी निर्णायक प्रभाव डाल सकते थे, उनकी संख्या घटा दी गई है.
सीमाओं को इस तरह खींचा गया है कि भाजपा विरोधी मतदाता मुट्ठी भर निर्वाचन क्षेत्रों में सिमट गए हैं, जबकि भाजपा और उसके सहयोगियों के समर्थकों को सुनियोजित सटीकता के साथ एक व्यापक भूभाग में फैला दिया गया है. परिणाम संरचनात्मक है: यहाँ तक कि यदि ग़ैर-भाजपा दल संकेंद्रित समर्थन वाले इलाक़ों में भारी बहुमत — 70 या 80 प्रतिशत — भी हासिल कर लें, तो भी उनके कुल सीट-अंश पर बंधन बना रहेगा.
यह मुसलमानों का चुनावी घेटोआईजेशन है.
इस प्रकार, भारत के लोगों को दो अलग तरीक़ों से और दो अलग वर्गों में बाँटा जा रहा है: वे जो मतदान अधिकार से संपन्न हैं और वे जो उससे वंचित हैं. इन दोनों के बीच कोई जैविक एकजुटता नहीं बचेगी. व्यक्ति इसके बजाय, जैसे भी हो सके, पहले वर्ग में अपनी जगह सुरक्षित करने की कोशिश करेंगे. और यदि यह व्यापक रूप से स्वीकार कर लिया गया कि केवल मुसलमानों को ही मताधिकार से वंचित किया जाना है, तो कोई व्यापक प्रतिरोध नहीं होगा.
जहाँ मुसलमानों को पूरी तरह मतदान अधिकार से नहीं वंचित किया जा सकता, वहाँ निर्वाचन क्षेत्रों को इस तरह फिर से खींचा जाएगा कि वे किसी राज्य के समग्र चुनावी नतीजे को प्रभावित करने में अक्षम हो जाएँ. उन्हें सीमित इलाक़ों में क़ैद कर दिया जाएगा, सरकारें बनाने में उनकी राजनीतिक अहमियत को क़रीब-क़रीब नगण्य बना दिया जाएगा.
2026 विधानसभा चुनावों में बंगाल और असम में जो किया गया है, वह उस परियोजना की दिशा में एक निर्णायक क़दम है जिसे विनायक दामोदर सावरकर और माधव सदाशिव गोलवलकर ने बहुत पहले स्पष्ट किया था: एक ऐसे भारत का निर्माण जिसमें हिंदू हितों को मुसलमानों के हितों से अलग कर दिया जाए. मुसलमान शारीरिक रूप से अस्तित्व में रह सकते हैं, लेकिन राजनीतिक रूप से वे मृत कर दिए जाएँगे: उपस्थित, दृश्यमान, फिर भी लोकतांत्रिक जीवन से रहित.
अपूर्वानंद दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाते हैं. यह लेख द वायर से लिया और अनूदित किया गया है.
हरकारा डीपडाइव
श्रवण गर्ग | पूरा देश एक हाईजैक हुए विमान की तरह है, और बंदूक कुछ लोगों के हाथ में है
हरकारा डीप डाइव के इस लाइव इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ लोकतंत्र, चुनावी वैधता और विपक्ष की रणनीति पर चर्चा हुई. बातचीत की शुरुआत पराकला प्रभाकर के उस लेख से हुई, जिसमें उन्होंने सवाल उठाया था कि अगर विपक्ष चुनावी प्रक्रिया को “अवैध” और “लूटा हुआ” मानता है, तो फिर उसी प्रक्रिया में लगातार हिस्सा लेने का औचित्य क्या है.
क्या चुनावी राजनीति के भीतर रहकर लोकतंत्र को बचाया जा सकता है, या फिर विपक्ष को किसी बड़े असहयोग आंदोलन जैसी रणनीति अपनानी चाहिए. सवाल उठा कि अगर ममता बनर्जी खुद कह रही हैं कि चुनाव एसआईआर और संस्थागत हस्तक्षेपों के कारण प्रभावित हुए, तो फिर वे अपने विधायकों को शपथ लेने क्यों दे रही हैं. इसी से बहस लोकतांत्रिक वैधता बनाम राजनीतिक व्यवहारिकता की ओर बढ़ती है.
श्रवण गर्ग ने जवाब में मुद्दे को कहीं व्यापक बताया. उनके मुताबिक, यह केवल बंगाल या किसी एक चुनाव का प्रश्न नहीं, बल्कि उस पूरे ढांचे का संकट है जिसमें चुनाव आयोग, न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं. उन्होंने दावा किया कि बिहार, हरियाणा और कर्नाटक जैसे राज्यों में चुनाव “लूटे गए”, और वोटर डिलीशन से लेकर प्रशासनिक हस्तक्षेप तक कई उदाहरण दिए. उनका तर्क था कि जब संस्थाएं सत्ता के पक्ष में खड़ी दिखें और न्यायिक हस्तक्षेप भी सीमित हो जाए, तब विपक्ष के सामने लड़ाई का मैदान बराबरी का नहीं रह जाता.
विपक्ष चुनावों का बहिष्कार करे या लड़ाई जारी रखे. पराकला प्रभाकर के विचारों का हवाला देते हुए कहा गया कि अगर लोकतांत्रिक प्रक्रिया ही अपहृत हो चुकी है, तो उसमें भागीदारी कहीं न कहीं उस व्यवस्था को वैधता देना भी है. लेकिन श्रवण गर्ग ने इस दृष्टिकोण से आंशिक असहमति जताई. उनके अनुसार, चुनाव छोड़ देना अंततः सत्ता पक्ष को “वॉकओवर” देने जैसा होगा. उन्होंने कहा कि जनता अपने नेताओं को संघर्ष करते हुए देखना चाहती है; यदि विपक्ष मैदान छोड़ देता है, तो उसे पलायनवादी माना जाएगा.
चर्चा में ममता बनर्जी के इस्तीफे का सवाल भी विस्तार से उठा. श्रवण गर्ग ने दोहराया कि नैतिक रूप से इस्तीफा एक बड़ा राजनीतिक संदेश हो सकता था, लेकिन व्यावहारिक राजनीति में उसकी सीमाएं हैं. उनके मुताबिक, अगर विपक्षी विधायक इस्तीफा देते हैं, तो उपचुनावों के जरिए सत्ता पक्ष और मजबूत होकर लौट सकता है. उन्होंने यहां तक कहा कि विपक्ष के भीतर टूट-फूट और दलबदल की आशंका भी ऐसी परिस्थितियों में बढ़ जाती है.
पूरी बातचीत में लोकतंत्र के “हाईजैक” होने की उपमा बार-बार सामने आई. श्रवण गर्ग ने इसे “कंधार प्रयोग” जैसा बताते हुए कहा कि पूरा देश एक हाईजैक हुए विमान की तरह है, और बंदूक कुछ लोगों के हाथ में है. संवैधानिक संस्थाएं भी अब स्वतंत्र मध्यस्थ की भूमिका में नहीं दिख रहीं. उन्होंने चुनाव आयोग, अदालतों और मीडिया की भूमिका पर भी तीखी टिप्पणी की और कहा कि यह संकट केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संस्थागत और नैतिक भी है.
अंत में निष्कर्ष यही उभरा कि लोकतंत्र का संकट केवल चुनावी तकनीक का संकट नहीं है, बल्कि यह संस्थाओं, राजनीतिक नैरेटिव और जनता की भागीदारी तीनों का संयुक्त संकट है. पराकला प्रभाकर “नए रास्ते” की बात कर रहे हैं, जबकि श्रवण गर्ग का जोर इस बात पर रहा कि लड़ाई छोड़े बिना, लगातार प्रतिरोध और सार्वजनिक बहस के जरिए ही किसी लोकतांत्रिक पुनर्संतुलन की संभावना बन सकती है.
अब बहुत हुआ: मंत्री कुंवर शाह के कर्नल सोफिया कुरैशी पर बयान के मामले में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को फटकारा
‘बार एंड बेंच’ के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मध्य प्रदेश सरकार द्वारा अपने मंत्री कुंवर विजय शाह के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति देने में देरी पर कड़ी आपत्ति जताई. यह मामला कर्नल सोफिया कुरैशी के बारे में शाह की आपत्तिजनक टिप्पणियों से जुड़ा है, जिन्होंने पिछले साल ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान मीडिया को जानकारी दी थी.
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि मंत्री के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) के अनुरोध पर निर्णय दो सप्ताह पहले ही आ जाना चाहिए था. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ही एसआईटी ने इस मामले की जांच की थी और सरकार से मुकदमा चलाने की मंजूरी मांगी थी.
सीजेआई कांत ने टिप्पणी की, “बस अब हमारे आदेश का पालन करें. अब बहुत हुआ. पहली चीज तो माफी होनी चाहिए थी. यह हमारे द्वारा संज्ञान लेने के बाद ही हुआ. इसे चार सप्ताह बाद सूचीबद्ध करें.” कोर्ट ने ये टिप्पणियां तब कीं जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मंत्री पर मुकदमा चलाने की मंजूरी पर फैसला अभी लंबित है.
मेहता ने यह भी कहा कि शाह की टिप्पणियों को गलत समझा गया होगा. मेहता ने कहा, “उन्होंने जो कहा वह दुर्भाग्यपूर्ण था. संभवतः वे महिला अधिकारी की प्रशंसा करना चाहते थे.” हालाँकि, सीजेआई कांत ने कहा, “यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं था. यह ‘अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण’ था.”
मेहता ने दोहराया, “वे महिला की प्रशंसा करना चाहते थे, लेकिन वे अपनी बात सही ढंग से व्यक्त नहीं कर पाए.” सीजेआई कांत इस तर्क से सहमत नहीं हुए और कहा, “एक राजनीतिज्ञ के रूप में, वे जानते हैं कि महिला अधिकारी की प्रशंसा स्पष्ट रूप से कैसे की जाती है.”
न्यायूर्ति बागची ने रेखांकित किया कि एसआईटी की स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार, शाह को इस तरह की टिप्पणियां करने की आदत है. कोर्ट ने आगे कहा, “राज्य को परिस्थितियों की समग्रता पर विचार करने दें और निर्णय लेने दें.”
पृष्ठभूमि: क्या था मामला?
कर्नल कुरैशी उन सेना अधिकारियों में से एक थीं, जिन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ भारत की सीमा पार सैन्य प्रतिक्रिया, ‘ऑपरेशन सिंदूर’, के बारे में मीडिया को जानकारी दी थी. यह ऑपरेशन 22 अप्रैल के पहलगाम आतंकी हमले के मद्देनजर चलाया गया था, जिसमें 26 भारतीय नागरिक मारे गए थे.
शाह ने तब विवाद खड़ा कर दिया था जब उन्होंने कथित तौर पर कहा था, “जिन्होंने हमारी बेटियों को विधवा किया, हमने उन्हें सबक सिखाने के लिए उनकी अपनी ही एक बहन को भेजा.” इस टिप्पणी को व्यापक रूप से कर्नल कुरैशी और उनके धर्म के संदर्भ में देखा गया.
यह विवादास्पद टिप्पणी शाह ने अंबेडकर नगर (महू) के रायकुंडा गांव में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में की थी, जिसकी व्यापक आलोचना हुई और उन्हें पद से हटाने की मांग उठी. इसके बाद, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मामला शुरू किया और शाह की टिप्पणियों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए पुलिस को उनके खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज करने का आदेश दिया.
हाईकोर्ट ने कहा था, “उनकी टिप्पणियाँ न केवल संबंधित अधिकारी के लिए बल्कि सशस्त्र बलों के लिए भी अपमानजनक और खतरनाक हैं.” हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने पुलिस को चेतावनी देते हुए कहा था, “इस न्यायालय के आदेश को लागू करने के लिए, यदि आवश्यकता पड़ी, तो मैं जमीन-आसमान एक कर दूंगा.”
14 मई की देर रात शाह के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई. पुलिस ने शाह पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 152, 196(1)(b) और 197(1)(c) के तहत मामला दर्ज किया, जो राष्ट्रीय संप्रभुता को खतरे में डालने और विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने वाले कार्यों से संबंधित हैं.
शाह ने तब हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. 16 मई, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने शाह की टिप्पणियों पर कड़ी आपत्ति जताई और उनकी माफी स्वीकार करने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने एफआईआर पर रोक लगाने से भी इनकार कर दिया और उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए उनके खिलाफ एसआईटी का गठन कर दिया था.
ब्राजील पुलिस ने तस्करी की जांच में पक्षी विशेषज्ञ के उपकरण जब्त किए; ‘वंतारा’ से जुड़ा मामला
ब्राजील की संघीय पुलिस ने अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव तस्करी के एक बड़े नेटवर्क का भंडाफोड़ करने के लिए अपनी जांच तेज कर दी है. इस मामले में 1 मई को साओ पाउलो के ग्वारूलहोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक अमेरिकी नागरिक को हिरासत में लेकर उसके इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त किए गए. यह कार्रवाई ब्राजील की दुर्लभ प्रजातियों, विशेष रूप से ‘गोल्डन लायन टैमरिन’ की तस्करी की जांच का हिस्सा है.
यद्यपि पुलिस ने आधिकारिक तौर पर नाम का खुलासा नहीं किया है, लेकिन विश्वसनीय सूत्रों ने संदिग्ध की पहचान टोनी सिल्वा के रूप में की है. सिल्वा एक प्रसिद्ध पक्षी विशेषज्ञ हैं, लेकिन उनका अतीत विवादों से भरा रहा है. वेब पोर्टल ‘मोंगाबे’ में फर्नांडा वेनज़ेल अपनी लंबी रिपोर्ट में बताती हैं कि इस जांच का सबसे चौंकाने वाला पहलू ‘वंतारा’ चिड़ियाघर से इसका संभावित संबंध है. वंतारा, रिलायंस इंडस्ट्रीज के अनंत अंबानी का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है. दावा है कि सिल्वा वंतारा के लिए अवैध रूप से लुप्तप्राय जानवरों, जैसे ‘ब्लैक बियर्ड साकी मंकी’, की खरीद का समन्वय कर रहे थे.
रिपोर्ट के अनुसार, 1996 में अमेरिकी एजेंसी ‘मत्स्य और वन्यजीव सेवा’ के ‘ऑपरेशन रेनेगेड’ के तहत उन्हें तस्करी का दोषी पाया गया था. 1985 से 1994 के बीच 185 से अधिक ‘हाइसिंथ मकाऊ’ और अन्य दुर्लभ पक्षियों की अवैध आवाजाही की बात स्वीकार की थी, जिसके लिए सिल्वा को सात साल की जेल और भारी जुर्माना भुगतना पड़ा था.
हाल ही में, सिल्वा ब्राजील में पक्षी पालकों के सम्मेलन ‘एविकॉन’ में भाग लेने आए थे. गिरफ्तारी से पहले उन्हें उन इलाकों में देखा गया था जहाँ लुप्तप्राय ‘लियर्स मकाऊ’ पाए जाते हैं.
सबसे महत्वपूर्ण इस जांच का भारत के गुजरात में स्थित ‘वंतारा’ चिड़ियाघर से जुड़ना है. वंतारा, रिलायंस इंडस्ट्रीज के अनंत अंबानी का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है.
दावा है कि 2025 की एक अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में सिल्वा को वंतारा में “संरक्षण प्रमुख” के रूप में पेश किया गया था. सोशल मीडिया पोस्ट्स भी सिल्वा और वंतारा के बीच घनिष्ठ संबंधों की पुष्टि करती हैं.
इन आरोपों के जवाब में वंतारा के प्रवक्ता ने एक विस्तृत स्पष्टीकरण जारी किया है. संगठन का कहना है: सिल्वा वंतारा के कर्मचारी नहीं हैं. उन्हें केवल एक स्वतंत्र ठेकेदार के माध्यम से सीमित परामर्श (बाड़े के निर्माण और पोषण) के लिए नियुक्त किया गया था. सिल्वा की ब्राजील यात्रा उनके निजी मामले थे और वंतारा को इसकी कोई जानकारी नहीं थी. वंतारा ने स्पष्ट किया कि उन पर लगे अवैध खरीद के आरोप निराधार हैं और भारतीय अधिकारी पहले ही उनके अधिग्रहण की प्रक्रियाओं को क्लीन चिट दे चुके हैं.
वंतारा अपनी भव्यता के कारण दुनिया भर में चर्चा में रहा है, लेकिन यहाँ लाए गए जानवरों की उत्पत्ति पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं. सितंबर 2025 में, CITES सचिवालय ने डेटा विसंगतियों के कारण भारत को वंतारा के लिए और आयात परमिट जारी न करने की सिफारिश की थी. हालांकि, बाद में ब्राजील और अमेरिका जैसे देशों के समर्थन से इस रोक को हटा लिया गया. जर्मनी की एक संस्था एसीटीपी द्वारा 23 ‘ब्लू स्पिक्स मकाऊ’ को ब्राजील की अनुमति के बिना वंतारा भेजने का मामला भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय रहा है.
ब्राजील पुलिस का मानना है कि जब्त किए गए फोन और कंप्यूटर से एक “अंतरराष्ट्रीय आपराधिक नेटवर्क” का खुलासा हो सकता है. यह मामला न केवल वन्यजीवों के संरक्षण पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे अंतरराष्ट्रीय संरक्षण नियमों (सीआईटीईएस) की आड़ में दुर्लभ जीवों का व्यापार संभव हो पा रहा है.
वंतारा ने खुद को एक “बचाव और पुनर्वास केंद्र” के रूप में स्थापित किया है, लेकिन टोनी सिल्वा जैसे विवादित विशेषज्ञों के साथ उनकी संलिप्तता ने उनके संरक्षण दावों पर संदेह के बादल गहरे कर दिए हैं. वर्तमान में, ब्राजील की फोरेंसिक टीम डेटा विश्लेषण में जुटी है, जिससे भविष्य में बड़े खुलासे होने की संभावना है. कुलमिलाकर, यह रिपोर्ट सवाल पैदा करती है कि क्या वन्यजीवों का आदान-प्रदान संरक्षण के नाम पर हो रहा है या यह तस्करी का एक नया रूप है?
भ्रष्टाचार की तरह वंशवाद का भी पाखंड; बिहार मंत्रिमंडल में निशांत सहित तीन ‘लाल’ शामिल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार वंशवादी राजनीति (परिवारवाद) की भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़े खतरे के रूप में आलोचना की है, और इसे राजनीतिक भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का स्रोत बताया है. वे योग्यता-आधारित राजनीति की वकालत करते हैं और अक्सर युवाओं से राजनीति में शामिल होने का आग्रह करते हैं, ताकि वंशवादी प्रभाव को “कम” किया जा सके. खासकर, कांग्रेस और डीएमके जैसे विपक्षी दलों पर तो वे चाहे जब परिवार-केंद्रित होने का निशाना साधते रहते हैं. लेकिन व्यावहारिक धरातल पर मोदी की चाल-चरित्र-चेहरा की बातें करने वाली पार्टी और उनके ‘एनडीए’ गठबंधन की एकदम उलट तस्वीर दिखाई पड़ती है. बल्कि कहना होगा कि मोदी और भाजपा का जैसा दोहरा रवैया भ्रष्टाचार को लेकर है, वही परिवारवाद के मामले में है. यानी, जब तक आप विपक्ष में हैं, तो आपके खिलाफ हजारों करोड़ के घोटालों के आरोप हैं, आप भ्रष्ट हैं- लेकिन जैसे ही आप भाजपा की शरण में आए, आपसे ज्यादा कोई पवित्र नहीं!
भाजपा और एनडीए के पाखंड की एक और तस्वीर कल गुरुवार (7 मई 2026) को बिहार की राजधानी पटना के गांधी मैदान पर दिखाई दी, जब सम्राट चौधरी मंत्रिमंडल का विस्तार किया गया. ‘द टेलीग्राफ’ में जेपी यादव की रिपोर्ट के अनुसार, परिवारवाद की राजनीति की कड़ी आलोचना करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की विरासत को आगे बढ़ाते हुए उनके पुत्र निशांत कुमार सम्राट चौधरी सरकार में स्वास्थ्य मंत्री के रूप में शामिल हो गए. इसके साथ ही बिहार की राजनीति में वंशवाद की वह लंबी परंपरा जारी रही, जिसका उनके पिता ने हमेशा कड़ा विरोध किया था.
50 वर्षीय निशांत ने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा है और वे पिछले महीने ही औपचारिक रूप से अपने पिता की पार्टी, जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) में शामिल हुए थे. पार्टी में किसी संगठनात्मक पद पर न होने के बावजूद, उन्हें लगातार नीतीश कुमार के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में पेश किया जा रहा है.
वर्तमान में राज्यसभा सदस्य नीतीश कुमार उस समय मंच पर मौजूद थे, जब निशांत ने अपने पिता के पैर छूकर और उनका आशीर्वाद लेकर पद की शपथ ली. आरएलएम प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को भी मंत्रिमंडल में शामिल किया गया, जबकि उन्होंने भी कभी चुनाव नहीं लड़ा है. उन्होंने पिछली नीतीश सरकार में भी काम किया था. इनके अलावा, नीतीश मिश्रा (भाजपा) और संतोष मांझी (हम) — जो क्रमशः पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय जगन्नाथ मिश्रा और ‘हम’ प्रमुख जीतन राम मांझी के पुत्र हैं — ने भी मंत्री पद की शपथ ली. और तो और खुद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भी उसी वंशवादी राजनीति से आते हैं, जिसकी मोदी और नीतीश ने सदैव आलोचना की है और देश के लोकतंत्र के लिए घातक बताया है.
बहरहाल, बिहार में आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद के बेटे तेजस्वी यादव से शुरू हुआ यह सिलसिला, अब इन नए ‘वंशजों’ के उदय के साथ बिहार की परिवार-आधारित पार्टियों की गहरी परंपरा में एक नया अध्याय जोड़ता है. दिवंगत दलित नेता राम विलास पासवान के पुत्र और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान राज्य के एक और प्रमुख राजनीतिक उत्तराधिकारी हैं. चिराग अपनी पार्टी के दो मंत्रियों को शपथ लेते देखने के लिए मंच पर मौजूद थे.
दिलचस्प यह है कि ‘परिवारवाद के इस राजतिलक’ के प्रधानमंत्री मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और गठबंधन के कई अन्य वरिष्ठ नेता साक्षी बने. नीतीश कुमार ने अपने पूरे राजनीतिक करियर में भ्रष्टाचार की तरह ही वंशवादी राजनीति का भी कड़ा विरोध किया है. उन्होंने लालू प्रसाद द्वारा अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाने और बाद में अपने बेटों के राजनीतिक करियर को आगे बढ़ाने की हमेशा आलोचना की है.
एपीसीआर ने लॉन्च किया ‘हेट क्राइम ट्रैकर’
मोदी राज में 2014 से अब तक धर्म आधारित हिंसा की 3,576 घटनाएं दर्ज
मकतूब मीडिया के मुताबिक, भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा और नफरत भरे भाषणों (हेट स्पीच) पर लगाम लगाने और उनका सटीक डेटा रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है. एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (एपीसीआर) ने बुधवार को नई दिल्ली के ‘कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया’ में एक ऑनलाइन ‘हेट क्राइम ट्रैकर’ लॉन्च किया है. यह प्लेटफॉर्म 2014 से अब तक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर की गई हिंसा और नफरत की घटनाओं का एक सार्वजनिक और सत्यापित डेटाबेस है.
डेटा के मुख्य आंकड़े: 2014 से अब तक का सफर
एपीसीआर द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, 2014 से अब तक भारत में धर्म आधारित नफरत की 3,576 घटनाएं दर्ज की गई हैं. संगठन द्वारा किए गए प्रारंभिक विश्लेषण में कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं.कुल घटनाओं में से 747 मामले सीधे शारीरिक हमले हैं जबकिलगभग 376 घटनाओं में अल्पसंख्यकों की संपत्तियों को निशाना बनाया गया. रिपोर्ट के मुताबिक, 908 मामलों में ‘धार्मिक पहचान’ (जैसे पहनावा या हुलिया) हमले का मुख्य कारण बनी. इसके अलावा, मांसाहार की बिक्री या सेवन से जुड़े 547 मामले और धार्मिक त्योहारों के दौरान हुई हिंसा के 166 मामले दर्ज किए गए हैं.
सरकारी डेटा की कमी को पूरा करने की कोशिश
एपीसीआर के एडवोकेट फवाद शाहीन ने बताया कि इस पहल की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि ‘नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो’ जैसी सरकारी एजेंसियां नफरती अपराधों का व्यवस्थित डेटा जारी नहीं करती हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि यह ट्रैकर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी और जमीनी सत्यापन पर आधारित है. हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि रिपोर्टिंग की कमी के कारण वास्तविक आंकड़े इससे कहीं अधिक हो सकते हैं.
वर्तमान में, इस ट्रैकर पर 2024 से 2026 के बीच की विस्तृत जानकारी उपलब्ध है, जिसमें 1,153 नफरती अपराध और 761 हेट स्पीच की घटनाएं दर्ज हैं. पुराने डेटा को चरणों में अपलोड किया जा रहा है.
नागरिक समाज और बुद्धिजीवियों का समर्थन
इस लॉन्च कार्यक्रम में हर्ष मंदर, प्रशांत भूषण, पामेला फिलिपोज और अपूर्वानंद जैसे प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी शामिल हुए. वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि नफरत भरे भाषण और शारीरिक हिंसा के बीच गहरा संबंध है. उन्होंने कहा कि स्वतंत्र दस्तावेजीकरण उन समुदायों के लिए न्याय की उम्मीद जगाता है जो संस्थागत निष्क्रियता का सामना कर रहे हैं.
यह ट्रैकर शोधकर्ताओं, पत्रकारों और नागरिक समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन साबित होगा, जो भारत में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और कानूनी हस्तक्षेप की दिशा में काम कर रहे हैं.एपीसीआर ने प्रतिबद्धता जताई है कि नई घटनाओं के सत्यापन के साथ इस डेटाबेस को नियमित रूप से अपडेट किया जाता रहेगा.
पति की आर्थिक स्थिति के आधार पर भरण-पोषण का निर्धारण होना चाहिए, न कि पत्नी की एमबीए डिग्री या पिछली कमाई पर: इलाहाबाद हाई कोर्ट
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पत्नी को मिलने वाले भरण-पोषण का निर्धारण पति की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल पत्नी की शैक्षणिक योग्यता या उसकी पिछली आय को देखकर. अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी महिला का शिक्षित होना या पहले नौकरी करना उसे भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं करता.
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद ने एक वैवाहिक विवाद मामले की सुनवाई के दौरान की. मामला उस याचिका से जुड़ा था जिसमें पत्नी ने परिवार न्यायालय द्वारा तय किए गए 15,000 रुपये मासिक भरण-पोषण को बढ़ाने की मांग की थी. उच्च न्यायालय ने परिवार न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि भरण-पोषण की राशि तय करते समय पति की वास्तविक आर्थिक स्थिति और जीवन स्तर को ध्यान में रखना आवश्यक है.
मामले के अनुसार, दंपति की शादी अगस्त 2014 में अहमदाबाद में हुई थी. पत्नी का आरोप था कि विवाह के एक महीने के भीतर ही दहेज की मांग को लेकर उसे ससुराल से निकाल दिया गया. तब से वह अपने मायके में रह रही है और उसे पति की ओर से कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली. पत्नी ने अदालत में दावा किया कि उसका पति विदेश शिक्षा परामर्श का व्यवसाय चलाता है और सालाना लगभग 5 करोड़ रुपये कमाता है. उसने यह भी कहा कि वह फिलहाल बेरोजगार है और अपने पिता पर निर्भर है, इसलिए उसे 25,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण दिया जाए.
वहीं पति की ओर से कहा गया कि पत्नी उच्च शिक्षित है और उसके पास MBA की डिग्री है. पति ने दावा किया कि पत्नी पहले कई कंपनियों में काम कर चुकी है और 50,000 रुपये प्रतिमाह तक कमा सकती है. उसने यह भी कहा कि उसकी खुद की आय केवल 15 से 20 हजार रुपये मासिक है और उस पर पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ है.
सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने पाया कि पति ने किसी भी स्तर पर पत्नी को अपने साथ रखने की इच्छा नहीं जताई. अदालत ने कहा कि जिरह के दौरान भी पति की ओर से ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं दिया गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पत्नी का अलग रहना उचित था.
अदालत ने यह भी माना कि पत्नी ने पहले नौकरी की थी और लगभग 37,000 रुपये प्रतिमाह कमाती थी, लेकिन भरण-पोषण आवेदन दाखिल करते समय वह बेरोजगार थी. न्यायालय ने कहा कि केवल इस आधार पर कि महिला शिक्षित है या पहले कमाती थी, उसे भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता. उसकी वर्तमान स्थिति और उस जीवन स्तर को भी देखा जाना चाहिए, जिसमें वह ससुराल में रहती थी.
इसके अलावा अदालत ने पति द्वारा दिए गए वित्तीय विवरणों में भी कई विसंगतियां पाईं. आयकर रिटर्न और व्यवसाय में हिस्सेदारी को लेकर पति के दावों में अंतर पाया गया. अदालत ने कहा कि पूर्ण वित्तीय रिकॉर्ड प्रस्तुत न करना और आय संबंधी अस्पष्टता उसके सीमित आय के दावों पर गंभीर संदेह पैदा करती है.
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि 15,000 रुपये मासिक भरण-पोषण पर्याप्त और न्यायसंगत नहीं है. अदालत ने मामले को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की राशि के नए निर्धारण के लिए परिवार न्यायालय को वापस भेज दिया.
पाकिस्तान ने ‘सिंधु जल संधि विवाद’ को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उठाया
स्क्रोल के मुताबिक, भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को लेकर नया विवाद अब अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच गया है. पाकिस्तान ने इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उठाकर इसे केवल द्विपक्षीय विवाद नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून, संधियों की विश्वसनीयता और वैश्विक संस्थाओं की भूमिका से जोड़ दिया है. भारत द्वारा सिंधु जल संधि को “स्थगित” रखने के फैसले पर अब वैश्विक स्तर पर सवाल उठ रहे हैं.
1960 में हुई सिंधु जल संधि को दुनिया की सबसे सफल जल-साझेदारी संधियों में गिना जाता है. भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध, सीमा तनाव और राजनीतिक टकराव के बावजूद यह संधि कायम रही. इसकी सबसे बड़ी ताकत यह थी कि पानी के मुद्दे को राजनीतिक संघर्ष से अलग रखा गया था. लेकिन भारत के हालिया कदम ने इसी मूल भावना को चुनौती दी है.
पाकिस्तान का कहना है कि भारत का फैसला अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है और इससे करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा, खेती और ऊर्जा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है. पाकिस्तान अब इस विवाद को वैश्विक समर्थन दिलाने की कोशिश कर रहा है. विश्व बैंक, जिसने इस संधि में मध्यस्थ और सह-हस्ताक्षरकर्ता की भूमिका निभाई थी, पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि संधि में एकतरफा निलंबन का कोई प्रावधान नहीं है.
भारत की स्थिति इसलिए भी कठिन दिख रही है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय माहौल पहले जैसा नहीं रहा. हाल के महीनों में पाकिस्तान ने खुद को एक उपयोगी कूटनीतिक खिलाड़ी के रूप में पेश किया है. अमेरिका-ईरान वार्ता में उसकी भूमिका और पश्चिमी देशों के साथ बढ़ते संपर्क ने उसकी स्थिति को मजबूत किया है. चीन पहले से पाकिस्तान के साथ खड़ा है, लेकिन अमेरिका का अपेक्षाकृत नरम रुख भारत के लिए चिंता का विषय बन सकता है.
हालांकि भारत ने सुरक्षा चिंताओं और आतंकवाद के मुद्दे को आधार बनाकर यह फैसला लिया, लेकिन व्यावहारिक रूप से उसके पास अभी इतनी बुनियादी संरचना नहीं है कि वह तुरंत पाकिस्तान की ओर जाने वाले पानी के प्रवाह को बड़े स्तर पर रोक सके. ऐसे में भारत फिलहाल केवल अनिश्चितता और दबाव का माहौल बना सकता है, कोई बड़ा रणनीतिक लाभ हासिल नहीं कर सकता.
इस विवाद का असर केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं है. बांग्लादेश भी इस पूरे घटनाक्रम को ध्यान से देख रहा है. भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल संधि इस साल के अंत में समाप्त होने वाली है. अगर भारत एक प्रमुख जल संधि को राजनीतिक कारणों से स्थगित कर सकता है, तो ढाका के भीतर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि भविष्य में उसकी अपनी जल सुरक्षा कितनी भरोसेमंद रहेगी.
कश्मीर का पहलू भी इस बहस को और जटिल बनाता है. केंद्र सरकार लंबे समय से यह तर्क देती रही है कि सिंधु नदी प्रणाली पर अधिक नियंत्रण से जम्मू-कश्मीर में विकास होगा. लेकिन बड़े जल परियोजनाओं के लिए समय, निवेश और स्थिरता चाहिए. केवल संधि को स्थगित कर देने से तुरंत विकास संभव नहीं है.
जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है. हिमालयी ग्लेशियरों का पिघलना, अनियमित मानसून और बढ़ती गर्मी सिंधु बेसिन की जल व्यवस्था को पहले ही अस्थिर बना रहे हैं. ऐसे समय में सहयोग और संवाद की जरूरत पहले से ज्यादा है. विशेषज्ञ मानते हैं कि संधि को कमजोर करना दक्षिण एशिया में जल संघर्ष और अविश्वास को बढ़ा सकता है.
अब भारत के सामने दो रास्ते हैं. पहला, वह अपनी वर्तमान नीति पर कायम रहे और बढ़ते कूटनीतिक दबाव का सामना करे. दूसरा, वह संधि के मौजूदा ढांचे के भीतर रहकर अपनी चिंताओं का समाधान तलाशे. दीर्घकालिक रणनीति के लिहाज से दूसरा रास्ता अधिक व्यावहारिक और स्थिर माना जा रहा है.
अशोक स्वेन स्वीडन के उप्साला विश्वविद्यालय में शांति और संघर्ष अनुसंधान के प्रोफेसर तथा यूनेस्को के इंटरनेशनल वॉटर कोऑपरेशन में कार्यररत हैं. पूरी विस्तृत रिपोर्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है.
बिहार मिड-डे मील में सांप मिलने के बाद सैंकड़ो बच्चे अस्पताल में भर्ती
एनडीटीवी के मुताबिक, बिहार के सहरसा जिले के एक सरकारी स्कूल में गुरुवार को मिड-डे मील में सांप का बच्चा मिलने के बाद अफरा-तफरी मच गई. घटना महिषी प्रखंड के मध्य विद्यालय बलुआहा की है, जहां बच्चों को परोसे गए भोजन के दौरान एक छात्र की थाली में सांप का बच्चा दिखाई दिया. इसके कुछ ही देर बाद बड़ी संख्या में बच्चों ने पेट दर्द और बेचैनी की शिकायत शुरू कर दी.
स्कूल प्रशासन ने तुरंत पुलिस और स्वास्थ्य विभाग को सूचना दी. कई बच्चों को पुलिस वाहनों से स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया गया, जबकि बाद में एंबुलेंस की मदद से अन्य बच्चों को अस्पताल ले जाया गया. कुछ बच्चों की हालत गंभीर बताई गई, जिसके बाद उन्हें सदर अस्पताल रेफर किया गया.
मिड-डे मील एक एनजीओ द्वारा सप्लाई किया जा रहा था. घटना के बाद जिला प्रशासन ने जांच के आदेश दिए हैं. जिला अधिकारी ने उस किचन क्लस्टर की जांच के लिए टीम भेजी है, जहां से कई स्कूलों के लिए भोजन तैयार किया जाता है.
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.











