08/04/2026: ईरान-यूएस युद्धविराम | होर्मुज फिर बंद, इजरायल विफल | पाकिस्तान की मध्यस्थता | ईरान की जीत | टीएमसी-ज्ञानेश कुमार | मोदी की मुस्कान के लिए | अडानी धोखाधड़ी केस
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
लेबनान में इजरायली हमलों में 254 लोगों की मौत के बाद ईरान ने फिर से होर्मुज बंद किया
महायुद्ध टला: ट्रंप की “विनाश” धमकी के बीच पाकिस्तान की बैकचैनल कूटनीति से 2 हफ्ते का युद्धविराम
लेबनान पर हमला जारी: युद्धविराम के बीच इजरायल की बमबारी, 100+ मौतें; हिजबुल्लाह ने दी जवाबी चेतावनी
तेल से दबाव: हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान की पकड़, युद्धविराम के बाद कच्चा तेल 15% गिरा
शांति वार्ता की घड़ी: इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान आमने-सामने; परमाणु कार्यक्रम पर टकराव तय
इजरायल बैकफुट पर?: युद्धविराम के बाद नेतन्याहू पर सवाल, विपक्ष ने बताया “सबसे बड़ी राजनीतिक विफलता”
बरेली गैंगरेप: 16 वर्षीय छात्रा से 7 लोगों ने किया दुष्कर्म, वीडियो से ब्लैकमेल का आरोप
चुनाव आयोग बनाम टीएमसी: बैठक में हंगामा, “निकल जाओ” विवाद से बढ़ा सियासी तनाव
बंगाल चुनाव रणनीति: अमित शाह का 15 दिन का डेरा, भाजपा ‘ममता बनाम मोदी’ नैरेटिव से दूरी पर
ओडिशा हिंसा: वेदांता खनन विरोध में झड़प, 70 घायल; इलाके में धारा 144 लागू
अडाणी केस: अमेरिकी रेगुलेटर के धोखाधड़ी आरोप खारिज करने की मांग, ‘जूरिस्डिक्शन’ पर सवाल
केरल चुनाव विवाद: भाजपा उम्मीदवारों पर मुस्लिम-विरोधी प्रचार के आरोप, केस दर्ज
ट्रंप की ‘विनाश’ की धमकी और पाकिस्तान की कूटनीति के बीच टला महायुद्ध
न्यूयॉर्क टाइम्स, अल जजीरा और एक्सियोस की विस्तृत रिपोर्टों के अनुसार, दुनिया मंगलवार की रात एक ऐसी तबाही के मुहाने पर खड़ी थी, जिससे उबरने में दशकों लग सकते थे. अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की “सभ्यता” को पूरी तरह मिटाने के लिए रात 8 बजे की समय सीमा (डेडलाइन) तय कर दी थी. लेकिन इस विनाशकारी घड़ी से मात्र 90 मिनट पहले, पाकिस्तान की ओर से की गई ‘बैकचैनल’ कूटनीति ने इतिहास का रुख मोड़ दिया. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ़ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने सीधे राष्ट्रपति ट्रंप से संवाद कर उन्हें इस भारी हमले को रोकने के लिए राजी किया. इसके परिणामस्वरूप, अमरीका और ईरान के बीच दो सप्ताह के अस्थायी युद्धविराम पर सहमति बनी है, जिसे फिलहाल एक बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है. पाकिस्तान के इस प्रयास की सराहना अमरीका और ईरान दोनों देशों के नेतृत्व ने की है.
इस युद्धविराम के पीछे की कहानी अत्यंत नाटकीय और कूटनीतिक बारीकियों से भरी है. एक्सियोस के पत्रकार बराक राविद के अनुसार, ईरान के नए सर्वोच्च नेता मुजतबा ख़ामेनेई ने, जो इज़रायली हमले के डर से भूमिगत हैं, पहली बार अपने वार्ताकारों को समझौते की दिशा में आगे बढ़ने की गुप्त मंज़ूरी दी. ख़ामेनेई अपने निर्देश विशेष संदेशवाहकों के ज़रिए हाथ से लिखे नोट्स में भेज रहे थे. वहीं, वाशिंगटन में तनाव का आलम यह था कि पेंटागन के अधिकारी ईरान के बुनियादी ढांचे पर भीषण बमबारी की पूरी तैयारी कर चुके थे और उन्हें अंतिम क्षण तक ट्रंप के फ़ैसले का इंतज़ार था. अंततः, ट्रंप ने पाकिस्तान के साथ हुई बातचीत और वैश्विक तेल संकट के दबाव में आकर युद्ध को रोकने का निर्णय लिया. हालांकि, इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट कर दिया है कि यह युद्धविराम लेबनान पर लागू नहीं होता, जहाँ इज़रायली सेना ने बुधवार को हिज़बुल्लाह के ठिकानों पर अब तक के सबसे बड़े हवाई हमले किए हैं.
लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, युद्धविराम के पहले ही दिन इज़रायली बमबारी में 112 से अधिक लोग मारे गए और लगभग 837 घायल हुए. हिज़बुल्लाह ने इन हमलों को अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताते हुए जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है. वहीं, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि यदि लेबनान में नरसंहार नहीं रुका, तो वे क्षेत्र में “आक्रमणकारियों” को ऐसा जवाब देंगे जो उन्हें पछतावा करने पर मजबूर कर देगा. इस बीच, खाड़ी के अन्य देशों जैसे कुवैत, कतर और संयुक्त अरब अमीरात ने भी ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों की सूचना दी है, जो इस युद्धविराम की नाजुकता को दर्शाता है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने दावा किया था कि इस समझौते में लेबनान भी शामिल है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इस दावे के विपरीत नज़र आ रही है.
आर्थिक मोर्चे पर, इस युद्धविराम ने दुनिया को बड़ी राहत दी है. सीएनएन बिज़नेस की हाना ज़ियादी की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को एक शक्तिशाली आर्थिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है. दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का 20 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है. ईरान की छह हफ्तों की नाकाबंदी के बाद, युद्धविराम की खबर आते ही कच्चे तेल की कीमतों में 15 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई और वैश्विक शेयर बाज़ारों में तेज़ी देखी गई. एक दिलचस्प तथ्य यह भी सामने आया है कि ईरान और ओमान अब इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों से “ट्रांजिट शुल्क” या टोल टैक्स वसूलने पर विचार कर रहे हैं, जिसका उपयोग ईरान युद्ध में नष्ट हुए अपने बुनियादी ढांचे को सुधारने में करेगा. विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही ट्रंप इसे अपनी जीत कह रहे हों, लेकिन ईरान ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की अपनी क्षमता को प्रभावी ढंग से सिद्ध कर दिया है.
आगामी शुक्रवार को इस्लामाबाद में होने वाली वार्ता इस युद्ध के भविष्य को तय करेगी. अमरीका की ओर से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय दल के शामिल होने की उम्मीद है. ट्रंप प्रशासन की प्रमुख शर्त यह है कि ईरान को अपना यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह बंद करना होगा और अपने परमाणु भंडार को सौंपना होगा. वहीं, ईरान ने अपनी 10-सूत्रीय मांग रखी है, जिसमें अमरीकी सेना की क्षेत्र से वापसी और प्रतिबंधों को पूरी तरह हटाना शामिल है. इस युद्ध ने अब तक ईरान में 244 बच्चों सहित कम से कम 1,665 नागरिकों की जान ले ली है, जबकि 13 अमरीकी सैनिक भी मारे गए हैं. पाकिस्तान द्वारा आयोजित यह आगामी बैठक न केवल इन दो राष्ट्रों के लिए, बल्कि पूरी दुनिया की स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है.
ईरान ने फिर से ‘होर्मुज’ बंद किया; लेबनान में इजरायली हमलों में 254 लोगों की मौत के बाद
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में ताज़ा खबरों के अनुसार, युद्धविराम पर सहमत होने के 24 घंटे से भी कम समय के भीतर, ईरान ने बुधवार को होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से बंद कर दिया. यह कदम लेबनान पर हुए इजरायली हमलों के बाद उठाया गया है, जिनमें 254 लोग मारे गए हैं. अमेरिका और इजरायल का दावा है कि लेबनान उस दो सप्ताह के “युद्धविराम” समझौते का हिस्सा नहीं था, जिस पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा निर्धारित समयसीमा से कुछ मिनट पहले सहमति बनी थी.
हालांकि, ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ द्वारा दिन की शुरुआत में किए गए एक पोस्ट को साझा किया, जिसमें उल्लेख किया गया था कि लेबनान इस समझौते का हिस्सा था.
ईरान ने लेबनान पर इजरायली हमलों के जवाब में होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया है और कहा है कि तेल अवीव (इजरायल) बेरूत पर हमले जारी रखकर युद्धविराम की शर्तों का उल्लंघन कर रहा है.
भारी नुकसान हुआ, पर जीत हर दृष्टि से ईरान की हुई...
आज के वैश्विक परिदृश्य में नाटो टूटने की कगार पर खड़ा है, जहाँ यूरोप धीरे-धीरे अमरीका से दूरी बना रहा है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आने वाले 2-3 हफ्तों में युद्ध को बिना किसी औपचारिक समझौते के खत्म करने का दावा कर रहे हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इसके उलट है क्योंकि जंग लगातार फैलती जा रही है. अमरीका के भीतर भी आंतरिक विद्रोह की स्थिति बनी हुई है, जिससे यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या इस बार अमरीका वैश्विक मंच पर अकेला पड़ गया है, विशेषकर तब जब फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अमरीकी सैन्य विमानों को अपने एयरस्पेस के इस्तेमाल की इजाज़त देने से साफ़ इनकार कर दिया है. एक तरफ जहाँ तेहरान और इस्फहान पर अमरीका-इज़राइल की ओर से लगातार भारी बमबारी की जा रही है और आईआरजीसी के ठिकानों को निशाना बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ ईरान ने हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर टोल टैक्स वसूलने का फैसला कर वैश्विक तेल सप्लाई और पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका दिया है. इसी बीच चीन सैटेलाइट तकनीक और अपनी कूटनीति के ज़रिए खुद को एक “पीसमेकर” के रूप में पेश कर रहा है, लेकिन असल में वह अपना रणनीतिक फायदा उठाने की चाल चल रहा है. इन्हीं बेहद गंभीर और महत्वपूर्ण पहलुओं के साथ-साथ नाटो छोड़ने पर ट्रंप के विचार जैसे मुद्दों पर गहराई से चर्चा करने के लिए ‘हरकारा डीप डाइव’ के इस विशेष अंक में निधीश त्यागी के साथ साओ पाउलो से वरिष्ठ पत्रकार शोभन सक्सेना जुड़ रहे हैं.
जीत की कगार पर पहुँचकर हार: ट्रंप के ईरान युद्धविराम पर इजरायल की प्रतिक्रिया, नेतन्याहू के सभी वादे विफल
मंगलवार रात अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ युद्ध में घोषित दो सप्ताह के युद्धविराम पर जब इजरायल विचार कर रहा है, तो वह अपने विरोधियों और आलोचकों की नजर में कमजोर दिखाई दे रहा है. उसका कट्टर दुश्मन ईरान अब भी खड़ा है; इजरायल का मिसाइलों का रक्षात्मक भंडार खत्म हो चुका है और उसके प्रधानमंत्री को राजनीतिक आक्रोश का सामना करना पड़ रहा है.
“अल जज़ीरा” में साइमन स्पीकमैन कॉर्डल की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की मध्यस्थता से हुए इस युद्धविराम की खबर के बाद, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने अंग्रेजी में एक बयान जारी किया. इसमें कहा गया कि प्रधानमंत्री अमेरिकी फैसले का समर्थन करते हैं और दावा किया गया कि “ईरान अब अमेरिका, इजरायल, ईरान के अरब पड़ोसियों और दुनिया के लिए परमाणु, मिसाइल और आतंकी खतरा नहीं रह गया है.”
लेकिन इसमें एक शर्त भी थी. जहाँ मध्यस्थ पाकिस्तान ने घोषणा की थी कि लेबनान में हिजबुल्लाह पर इजरायली हमले भी रुक जाएंगे, वहीं नेतन्याहू ने स्पष्ट किया कि वे इस युद्धविराम को लेबनान पर इजरायल के युद्ध तक विस्तारित नहीं मानते. फिलहाल अमेरिका, ईरान के साथ अपनी शांति वार्ता के अधीन, लेबनान में हमले जारी रखने की अनुमति देने के लिए तैयार नजर आ रहा है.
नेतन्याहू की इस घोषणा पर प्रतिक्रिया देते हुए इजरायल के विपक्षी नेता यायर लैपिड, जिन्होंने ईरान पर हमले का पुरजोर समर्थन किया था, ने इस युद्धविराम को “इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक आपदाओं” में से एक बताया. उन्होंने कहा कि इजरायल तो इन वार्ताओं में शामिल तक नहीं था. लैपिड ने आगे कहा कि सैन्य सफलताओं के बावजूद प्रधानमंत्री “राजनीतिक और रणनीतिक रूप से विफल रहे हैं और उन्होंने अपने द्वारा निर्धारित एक भी लक्ष्य को पूरा नहीं किया है.” उन्होंने चेतावनी दी कि प्रधानमंत्री के “अहंकार” के कारण देश को जो नुकसान हुआ है, उसे ठीक करने में वर्षों लग जाएंगे.
आलोचना में अन्य लोग भी तेज़ी से शामिल हो गए. वामपंथी हदाश पार्टी के ओफ़र कासिफ ने कहा, “मुझे इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि घोषणा अंग्रेजी में थी. नेतन्याहू की रुचि इजरायल के लोगों से बात करने में नहीं है. वे शायद ही कभी ऐसा करते हैं और लगभग कभी भी [टेलीविजन या रेडियो] स्टूडियो नहीं जाते.” उन्होंने प्रधानमंत्री के बारे में यह बात तब कही, जब नेतन्याहू ने ईरान पर युद्ध शुरू होने के दो सप्ताह बाद टीवी पर प्रसारित एक संबोधन में इजरायली जनता के सामने अपने युद्ध के लक्ष्यों को स्पष्ट किया था.
कासिफ ने कहा, “वे जानते हैं, और शायद सही भी है, कि जो उनका समर्थन करते हैं वे वैसे भी करते रहेंगे, और जो उनका विरोध करते हैं वे विरोध जारी रखेंगे. इसलिए जब वे बोलते हैं, तो वह अंतरराष्ट्रीय मीडिया के लिए होता है और अपने मुख्य समर्थकों (वोट बैंक) को आश्वस्त करने के लिए होता है.”
नेतन्याहू द्वारा बताए गए युद्ध के लक्ष्य—”ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना” और “ईरानी लोगों के लिए ऐसी परिस्थितियां बनाना जिससे वे अत्याचारी शासन को हटा सकें”—इजरायल के पुराने रणनीतिक लक्ष्यों का ही नया रूप थे. वास्तव में, नेतन्याहू 1990 के दशक से ही दावा कर रहे हैं कि ईरान द्वारा परमाणु हथियार विकसित करने की संभावना बिल्कुल करीब है.
लेकिन, ईरान पर पिछले 40 दिनों के हमलों के दौरान महत्वपूर्ण सैन्य सफलताओं के बावजूद, इनमें से एक भी लक्ष्य हासिल नहीं हुआ है.
किंग्स कॉलेज लंदन के ‘डिपार्टमेंट फॉर वॉर स्टडीज’ के सीनियर टीचिंग फेलो अहरोन ब्रेगमैन, जो हाल ही में इजरायल से लौटे हैं, ने कहा: “इजरायली इस युद्धविराम से बेहद निराश हैं क्योंकि युद्ध का एक भी मूल लक्ष्य पूरा नहीं हुआ है. ईरानी शासन अभी भी कायम है, उसका बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम बहुत जल्दी फिर से खड़ा किया जा सकता है, और उसके पास अभी भी 60 प्रतिशत शुद्धता वाला 440 किलोग्राम संवर्धित यूरेनियम है, जो 10 बम बनाने के लिए पर्याप्त है.”
वास्तव में, कई पर्यवेक्षकों और विश्लेषकों का कहना है कि महत्वपूर्ण सैन्य हारों के बावजूद—जिसमें हवाई क्षेत्र पर नियंत्रण खोना और अपने अधिकांश नेतृत्व की हत्या (युद्ध के पहले दिन मारे गए अयातुल्ला अली खामेनेई और ईरान की कई प्रमुख सैन्य हस्तियों सहित) शामिल है—ईरान विरोधाभासी रूप से और अधिक मजबूत होकर उभरा है.
ब्रेगमैन ने कहा, “इजरायल और अमेरिका को कई सामरिक लाभ मिले. वे सैन्य रूप से जीत गए, लेकिन रणनीतिक रूप से, ईरान स्पष्ट विजेता है.”
एक रणनीतिक चूक?
ईरान की जीत के पीछे सबसे प्रमुख कारणों में से एक न केवल इजरायल और अमेरिका के भीषण हमलों के बावजूद सरकार का बने रहना था, बल्कि होर्मुज जलडमरूमध्य (दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की मुख्य धमनी) को बंद करने का उसका निर्णय भी था. वर्तमान वार्ताओं के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए सुरक्षित मार्ग अब पूरी तरह से ईरान और उसके पड़ोसी ओमान के नियंत्रण में है.
ईरान 2018 में ट्रंप के परमाणु समझौते से हटने के बाद से कड़े अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहा था. हालाँकि, अब कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि ईरान जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर लगाए गए नए शुल्कों को जारी रखेगा. इसके अलावा, ट्रंप द्वारा बुधवार को ‘ट्रुथ सोशल’ पर युद्धविराम समझौते के तहत प्रतिबंधों और टैरिफ में राहत देने के वादों ने भी ईरानी अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है.
ब्रेगमैन ने कहा, “ईरान द्वारा होर्मुज को बंद करने के फैसले ने ट्रंप का संतुलन बिगाड़ दिया और वे कभी संभल नहीं पाए. भविष्य के इतिहासकार ईरान के इस फैसले को युद्ध के निर्णायक मोड़ के रूप में देखेंगे.”
कुछ पर्यवेक्षकों के अनुसार, युद्ध के दौरान इजरायल के व्यवहार ने भी ईरानी सरकार को मजबूत करने का काम किया. विपक्ष के कुछ केंद्र, जैसे कि तेहरान की शरीफ यूनिवर्सिटी, जो जनवरी में सरकार विरोधी प्रदर्शनों का केंद्र थी, इजरायली हमलों में नष्ट हो गए. इसके अलावा, ट्रंप की ‘ईरानी सभ्यता को मिटा देने’ की धमकी ने ईरानी सरकार को जनता के बीच राष्ट्रभक्ति जगाने का मौका दे दिया, जहाँ नागरिकों ने महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचों के चारों ओर मानव श्रृंखला बनाई.
कासिफ ने बुधवार को अल जजीरा से कहा, “कृपया समझें, मैं ईरानी शासन से घृणा करता हूँ; यह हत्यारा है. लेकिन हमने (हदाश पार्टी) शुरू से ही चेतावनी दी थी कि हमारे पास इसे बदलने का न तो अधिकार है और न ही क्षमता. इसके बजाय, हमने विपक्ष की कीमत पर उस शासन के लिए समर्थन मजबूत कर दिया है.”
उन्होंने कहा कि इजरायल और अमेरिका ने “होर्मुज जलडमरूमध्य का परिचालन नियंत्रण ईरान को सौंप दिया है, जो पहले कभी कोई मुद्दा नहीं था. साथ ही, वार्ता के दौरान हमले शुरू करके पूरी दुनिया को यह संकेत दिया है कि वे अमेरिका और इजरायल पर भरोसा नहीं कर सकते.”
‘इजरायल ने ठोस कुछ भी हासिल नहीं किया’
इसके बाद दक्षिण और पूर्वी लेबनान पर इजरायल के हमले हैं, जहाँ वह हिजबुल्लाह के ठिकानों को निशाना बनाने का दावा करता है। क्या ये हमले जारी रहेंगे, यह देखना बाकी है।
फिलहाल, इजरायल के शुक्रवार को पाकिस्तान में होने वाली शांति वार्ता में शामिल होने की उम्मीद नहीं है. लेकिन ब्रेगमैन के अनुसार, लेबनान पर हमले जारी रखने की उसकी स्वतंत्रता का फैसला अमेरिका और तेहरान में हिजबुल्लाह के सहयोगियों द्वारा किया जा सकता है.
न्यूयॉर्क में इजरायल के पूर्व राजदूत और महावाणिज्य दूत एलोन पिंकस ने अल जजीरा से कहा, “यह मानते हुए कि युद्धविराम दो सप्ताह से आगे भी बना रहेगा, इजरायल ने वास्तव में कुछ भी ठोस हासिल नहीं किया. ईरान ने खाड़ी देशों पर हमला करके और बिना किसी चीनी विरोध के होर्मुज को बंद करके रणनीतिक असंतुलन पैदा कर दिया. इजरायल को अब एक अस्थिर करने वाली शक्ति के रूप में देखा जा रहा है और अमेरिका के साथ उसके संबंध भी तनावपूर्ण हुए हैं, क्योंकि नेतन्याहू द्वारा ट्रंप से किए गए ‘त्वरित सत्ता परिवर्तन’ के सभी वादे विफल हो गए.”
होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान और चीन का लक्ष्य अमेरिकी डॉलर का वर्चस्व खत्म करना
ईरान पर अमेरिका-इजरायल युद्ध — जिसे नई राजनयिक वार्ताओं के बीच बुधवार को दो सप्ताह के लिए रोका गया है — पिछले एक महीने से अधिक समय से वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोर रहा है. इस बीच, ईरान और चीन ने वैश्विक वित्तीय प्रणाली के बारे में अपनी साझा शिकायत को दूर करने के इस अवसर को लपक लिया है.
“अलजज़ीरा” में जॉन पावर की रिपोर्ट कहती है कि चीन और ईरान का साझा उद्देश्य अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को समाप्त करना है. उनका कहना है कि वाशिंगटन ने वर्षों से अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर के दबदबे का इस्तेमाल ईरान और चीन सहित अपने दुश्मनों और प्रतिस्पर्धियों पर प्रभाव डालने और उन्हें नुकसान पहुँचाने के लिए किया है.
वैश्विक तेल बाजार में डॉलर की सर्वोच्चता विशेष रूप से स्पष्ट है, जहाँ जेपी मॉर्गन चेस के 2023 के अनुमान के अनुसार, लगभग 80 प्रतिशत लेनदेन इसी मुद्रा में तय होते हैं.
ईरान के नियंत्रण वाले होर्मुज जलडमरूमध्य में, जो वैश्विक तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की आपूर्ति के लगभग पांचवें हिस्से के लिए खाड़ी से निकलने वाला एकमात्र मार्ग है, तेहरान और बीजिंग को डॉलर के विकल्प के रूप में चीनी युआन को बढ़ावा देने का एक हथियार मिल गया है.
कई रिपोर्टों के अनुसार, ईरानी अधिकारियों के वास्तविक ‘टोल बूथ शासन’ के तहत, वाणिज्यिक जहाजों से युआन में पारगमन शुल्क वसूला जा रहा है. यह चीनी मुद्रा द्वारा सुगम चीनी-ईरानी आर्थिक सहयोग के गहराने का नवीनतम उदाहरण है.
हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि कितने जहाजों ने युआन में भुगतान किया है, ‘लॉयड्स लिस्ट’ के अनुसार 25 मार्च तक कम से कम दो जहाजों ने ऐसा किया था. चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने पिछले हफ्ते एक सोशल मीडिया पोस्ट में लॉयड्स लिस्ट की रिपोर्टिंग को स्वीकार किया, जिससे भुगतान के लिए युआन के उपयोग की पुष्टि होती दिखी.
शनिवार को, जिम्बाब्वे में ईरान के दूतावास ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि वैश्विक तेल बाजार में “पेट्रोयुआन” को जोड़ने का समय आ गया है. तेहरान, जिसने बुधवार को कहा था कि वह अमेरिका के साथ हुए युद्धविराम समझौते के तहत दो सप्ताह तक जलडमरूमध्य में सुरक्षित मार्ग की गारंटी देगा, और बीजिंग ने टिप्पणी के अनुरोधों का जवाब नहीं दिया.
हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री केनेथ रोगॉफ ने ‘अल जज़ीरा’ को बताया, “एक स्तर पर, ईरान का लक्ष्य अमेरिका की आंखों में धूल झोंकना और घाव पर नमक छिड़कना है.”
रोगॉफ ने कहा, “दूसरे स्तर पर, ईरान अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने और अपने सहयोगी चीन के साथ संबंध मजबूत करने के लिए युआन को प्राथमिकता देने को लेकर पूरी तरह गंभीर है. चीन लगातार अपने व्यापार और ब्रिक्स देशों के व्यापार को युआन में बदलने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है.”
बहरहाल, जॉन की रिपोर्ट का सार यह है कि यह कदम केवल आर्थिक नहीं बल्कि भू-राजनीतिक है. ईरान और चीन मिलकर एक ऐसी वैकल्पिक वित्तीय प्रणाली तैयार कर रहे हैं, जहाँ अमेरिकी प्रतिबंध बेअसर हो जाएं और वैश्विक व्यापार में चीन की मुद्रा का प्रभाव बढ़े. यह वर्तमान में चल रहे ईरान-इजरायल-अमेरिका तनाव के बीच डॉलर की वैश्विक शक्ति को कमजोर करने की एक बड़ी रणनीतिक चाल है.
यूपी के बरेली में स्कूली छात्रा से सात लोगों द्वारा सामूहिक बलात्कार, वीडियो लीक करने की धमकी
पुलिस ने बुधवार को बताया कि बरेली के भोजीपुरा इलाके में एक कैफे के भीतर 16 वर्षीय लड़की के साथ सात लोगों ने कथित तौर पर सामूहिक बलात्कार किया. इस मामले में भोजीपुरा थाने में प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज कर ली गई है.
प्राथमिकी के अनुसार, आरोपियों की पहचान असद हैदर उर्फ करण, चांद, रेस्टोरेंट मालिक सैफी, समीर अहमद, बंटी और दो अज्ञात व्यक्तियों के रूप में हुई है.
पुलिस क्षेत्राधिकारी (उत्तर) मुकेश चंद्र मिश्रा ने बताया कि इससे पहले 19 मार्च को असद लड़की को ‘सैफी कैफे’ के ऊपर स्थित एक कमरे में ले गया था और उसके साथ यौन शोषण किया था, जिसकी उसने वीडियो भी बना ली थी. उसने कथित तौर पर धमकी दी थी कि यदि उसने किसी को बताया तो वह यह क्लिप वायरल कर देगा.
‘पीटीआई और टीएनआईई’ की खबर है कि बाद में, 2 अप्रैल को जब लड़की स्कूल जा रही थी, तो आरोपियों में से एक उसे जबरन बाइक पर बैठाकर कैफे ले गया, जहाँ अन्य लोग पहले से मौजूद थे.
डीएसपी ने बताया कि लड़की अपनी मार्कशीट लेने के लिए स्कूल जा रही थी, तभी चांद ने उसे रोका और चेतावनी दी कि यदि वह असद से नहीं मिली, तो वह वीडियो ऑनलाइन डाल देगा. वह लड़की को कैफे ले गया जहाँ आरोपियों ने उसके साथ बलात्कार किया.
लड़की बदहवास स्थिति में एक राहगीर की मदद से घर पहुँची. मिश्रा ने बताया कि डर के कारण उसने दो दिनों तक अपने परिवार से घटना छिपाई और रिश्तेदारों द्वारा उसकी बिगड़ती हालत को भांपने के बाद ही उसने आपबीती सुनाई.
भोजीपुरा क्षेत्र के प्रभारी राजीव कुमार सिंह के अनुसार, 5 अप्रैल को सात आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया. फिलहाल फरार आरोपियों की तलाश जारी है.
चुनाव आयोग और टीएमसी की बैठक में हंगामा: ज्ञानेश कुमार ने डेलिगेशन से कहा ‘निकल जाओ’, डेरेक ओ’ब्रायन भी चिल्लाए
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के एक प्रतिनिधिमंडल और भारत निर्वाचन आयोग की पूर्ण पीठ के बीच बुधवार को हुई बैठक कड़वाहट के साथ समाप्त हुई. टीएमसी ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ने उनसे “निकल जाने” (गेट लॉस्ट) के लिए कहा, जबकि चुनाव आयोग ने प्रतिनिधिमंडल पर “चिल्लाने” का आरोप लगाया.
बैठक के बाद, टीएमसी के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने मीडियाकर्मियों को बताया कि प्रतिनिधिमंडल ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पत्र सौंपे और चुनाव अधिकारियों के भाजपा के साथ कथित संबंधों के विशिष्ट उदाहरण उठाए.
मुकेश रंजन की रिपोर्ट के मुताबिक, ओ’ब्रायन ने कहा, “तब उन्होंने (सीईसी) कहा, ‘निकल जाओ’. हमने चुनाव आयोग के साथ आठ से नौ बैठकें की हैं. मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा किसी अन्य चुनाव आयुक्त ने बात नहीं की.”
सांसद ओ’ब्रायन ने आगे कहा, “जब हम बाहर निकल रहे थे, तब मेरे एक सहयोगी ने ज्ञानेश कुमार को बधाई दी कि वे एकमात्र ऐसे सीईसी हैं जिनके खिलाफ लोकसभा और राज्यसभा में उन्हें हटाने के लिए नोटिस लाए गए हैं.”
हालांकि, आयोग के सूत्रों ने बताया कि जब टीएमसी सांसद ने अपनी आवाज उठाई, तो मुख्य चुनाव आयुक्त ने उनसे आयोग कक्ष में मर्यादा बनाए रखने को कहा और जोड़ा कि “चिल्लाना और अभद्र व्यवहार उचित नहीं है.”
इससे पहले ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में आयोग ने कहा था कि 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव “इस बार भय और हिंसा से मुक्त आयोजित किए जाएंगे.”
आयोग ने कहा, “तृणमूल कांग्रेस से चुनाव आयोग की दो टूक बात: इस बार पश्चिम बंगाल में चुनाव भय-मुक्त, हिंसा-मुक्त, डराने-धमकाने से मुक्त, प्रलोभन-मुक्त और बिना किसी छापेमारी, बूथ जैमिंग या सोर्स जैमिंग के होंगे.”
294 सदस्यीय विधानसभा के लिए मतदान दो चरणों में 23 और 29 अप्रैल को होना तय है, जबकि मतों की गिनती 4 मई को की जाएगी.
तनाव का मुख्य कारण राज्य में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर टीएमसी की आपत्तियां हैं. पार्टी ने चुनाव आयोग पर विपक्षी भाजपा के पक्ष में काम करने और मतदाता सूची से मतदाताओं के नाम हटाने का आरोप लगाया है.
टीएमसी के अनुसार, 60 लाख मतदाताओं को अधिनिर्णयन (एडजुडिकेशन) के दायरे में रखा गया था और 27 लाख नाम हटा दिए गए हैं. पश्चिम बंगाल में मतदाताओं की कुल संख्या अब 7,04,59,284 (7.04 करोड़) है (अधिनिर्णयन के अधीन नामों को छोड़कर), जो विशेष संशोधन प्रक्रिया से पहले 7,66,37,529 (7.66 करोड़) थी. यह मतदाता सूची से 61 लाख से अधिक नामों की कमी को दर्शाता है.
कार्टून साभार : राजेंद्र धोड़पकर लिंक
‘ममता बनाम मोदी’ नहीं चाहती भाजपा; अमित शाह बंगाल में 15 दिनों के लिए डेरा क्यों डाल रहे हैं?
पिछले सप्ताह शुभेंदु अधिकारी की नामांकन रैली में, भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की कि वे चुनाव वाले पश्चिम बंगाल में 15 दिनों तक डेरा डालेंगे. यह किसी राज्य में उनके अब तक के सबसे लंबे और निरंतर चुनावी प्रवासों में से एक होगा.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में लिज़ मैथ्यू के अनुसार, पार्टी के लिए बंगाल की “अजेय सीमा” को जीतने के महत्व पर जोर देते हुए, शाह ने कहा: “हम एक के बाद एक सीटें जीतेंगे और यह संख्या (कुल 294 में से) 175 तक ले जाएंगे. उसके बाद (राज्य में) परिवर्तन आएगा. मैं चुनावों के दौरान 15 दिनों तक पश्चिम बंगाल में ही रहूँगा.”
यह घोषणा भवानीपुर में की गई, जहां से शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ भाजपा के उम्मीदवार हैं. अपने 15 दिनों के प्रवास के दौरान शाह उत्तर बंगाल के प्रमुख निर्वाचन क्षेत्रों में रातें बिताएंगे. उत्तर बंगाल वह क्षेत्र है, जहाँ 2019 से भाजपा का चुनावी दबदबा रहा है. वहाँ वे पार्टी नेताओं से फीडबैक लेंगे, रणनीतिक सलाह देंगे, स्थानीय नेतृत्व के बीच किसी भी मतभेद को दूर करेंगे और टिकट न मिलने से नाराज नेताओं को मनाएंगे. उनका मुख्य ध्यान उन सीटों पर होगा जहाँ भाजपा 2021 में कम अंतर से हार गई थी. शाह हर रात प्रवास के दौरान लगभग 20-25 निर्वाचन क्षेत्रों को कवर करेंगे. वे स्थानीय नेताओं के साथ रात्रिभोज करेंगे और क्षेत्र की प्रतिष्ठित हस्तियों से मुलाकात करेंगे.
भाजपा नेताओं का कहना है कि पिछली बार ऐसी लगभग 40 सीटें थीं जहाँ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) 5% से भी कम अंतर से जीती थी. शाह का लक्ष्य इस बार उन सीटों को भाजपा के पक्ष में मोड़ना है. पश्चिम बंगाल में दो चरणों में मतदान होगा — 23 अप्रैल और 29 अप्रैल. अमित शाह ने पहले भी कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी कार्यकर्ताओं के चेहरे पर मुस्कान तभी आएगी जब पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनेगी.
हालांकि, राजनीतिक जानकारों का यह भी मानना है कि भाजपा और अमित शाह पश्चिम बंगाल के मामले में सेफ खेल रहे हैं. वे नहीं चाहते कि यदि चुनावी नतीजा उनके दावों के विपरीत जाए यानी एक बार फिर दीदी ने पटखनी दे दी तो हार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खाते में न जाए. ममता बनर्जी लगातार तीन चुनावों से जीत हासिल करती आई हैं, जिनमें से पिछले दो चुनावों में उन्होंने मोदी और भाजपा की ताकतवर मशीनरी को शिकस्त दी है. जाहिर है, इस बार भाजपा ममता बनाम मोदी का चुनाव बनाना नहीं चाहती. शायद, इसीलिए अमित शाह ने “मोदी की मुस्कान” के लिए खुद को आगे कर दिया है.
बस्तर: लाल आतंक के अंत से ‘आजादी की महुआ’ तक; सवाल है- सुरक्षा बल कब हटेंगे?
‘द टेलीग्राफ’ में संजय मद्रासी पांडे की रिपोर्ट कहती है कि छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग, जो दशकों तक माओवादी हिंसा और बारूद की गंध से घिरा रहा, आज एक ऐतिहासिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है. बस्तर में आए बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक पुवर्ती गाँव है, जो कभी खूंखार माओवादी नेता माडवी हिड़मा का गढ़ था. जहाँ कभी हिड़मा अपनी बटालियन को मौत का खेल सिखाता था, आज वहाँ सुरक्षा बलों का कैंप एक रक्षक की तरह खड़ा है. माओवाद के शीर्ष नेतृत्व, जैसे बसवाराजू, के सफाए और बरसे देवा जैसे नेताओं के आत्मसमर्पण ने विद्रोहियों की कमर तोड़ दी है. अब जंगलों में बारूद की जगह महुआ के फूलों की महक है और बंदूकों की गड़गड़ाहट की जगह आंगनवाड़ी केंद्रों में बच्चों की हंसी सुनाई देती है.
दशकों से जो क्षेत्र ‘नो-गो ज़ोन’ थे, वहाँ अब सड़कें, बिजली और मोबाइल टावर पहुँच रहे हैं. गोवा से भी बड़े 4,000 वर्ग किमी के इस दुर्गम इलाके में अब सड़कें बन रही हैं. 35 से अधिक सुरक्षा कैंपों की स्थापना ने यहाँ सरकारी तंत्र की पहुँच आसान बना दी है. 1990 के दशक से बंद ‘बारसूर मार्ग’ और ‘बीजापुर-जगरगुंडा हाईवे’ जैसे महत्वपूर्ण रास्ते फिर से खोल दिए गए हैं, जो बस्तर को मुख्यधारा और आर्थिक केंद्रों से जोड़ते हैं. जिला प्रशासन अब मोटरसाइकिल पर बैठकर सुदूर गाँवों तक पहुँच रहा है. ‘सुशासन शिविरों’ के माध्यम से ग्रामीणों को आधार कार्ड और राशन कार्ड जैसी बुनियादी सुविधाएँ उनके दरवाजे पर मिल रही हैं.
माओवादियों ने अपनी विचारधारा थोपने के लिए सैकड़ों स्कूलों को नष्ट कर दिया था, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है. पिछले कुछ वर्षों में 263 स्कूल फिर से खोले गए हैं, जहाँ 9,000 से अधिक बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं.
‘जनताना सरकार’ के डर से जो परिवार पलायन कर गए थे, वे अब अपने पैतृक गाँवों जैसे बेलेवेडा और खदेर में लौट रहे हैं. हालाँकि, स्थानीय आदिवासी अर्थव्यवस्था अभी भी नाजुक है. ₹49,000 करोड़ की प्रस्तावित बोधघाट परियोजना इस तस्वीर को बदल सकती है, जिससे लाखों हेक्टेयर जमीन को पानी मिलेगा और किसान बारिश पर निर्भर रहने के बजाय कई फसलें उगा सकेंगे.
अब सवाल यह है कि सुरक्षा बल इन क्षेत्रों से कब हटेंगे? छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा कहते हैं, “ऑपरेशन सफल रहा है. लेकिन एक बड़े ऑपरेशन (सर्जरी) के तुरंत बाद आप खुद को डिस्चार्ज नहीं करते. यह राज्य के घावों को भरने का समय है. नक्सल चले गए हैं, लेकिन वे पीछे बारूद से भरी सड़कें और जंगल छोड़ गए हैं. सुरक्षा बल उन्हें साफ कर रहे हैं, ताकि यह इलाका सभी के लिए सुरक्षित हो सके.”
‘आंटी’ बोलने पर पाउंड में जुर्माना देना पड़ा, ब्रिटिश ट्रिब्यूनल ने भारतीय मूल की हेल्थ वर्कर का पक्ष लिया
ब्रिटेन में भारतीय मूल की एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता ने उत्पीड़न का मामला जीत लिया है, जब उनके एक सहकर्मी ने उन्हें बार-बार “आंटी” कहकर संबोधित किया. ट्रिब्यूनल ने फैसला सुनाया कि भले ही इसके पीछे सांस्कृतिक संदर्भ रहा हो, लेकिन इन टिप्पणियों ने काम के माहौल को अपमानजनक बना दिया.
‘पीटीआई’ के अनुसार, ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस (एनएचएस) में कार्यरत भारतीय मूल की एक हेल्थकेयर असिस्टेंट ने घाना मूल के एक नर्स सहकर्मी द्वारा “आंटी” कहे जाने के खिलाफ उत्पीड़न का दावा जीत लिया है. वॉटफोर्ड एम्प्लॉयमेंट ट्रिब्यूनल के जज जॉर्ज एलियट ने माना कि इल्डा एस्टेवेस का उम्र और लिंग के आधार पर उत्पीड़न किया गया था. ट्रिब्यूनल ने वेस्ट लंदन एनएचएस ट्रस्ट को “भावनाओं को ठेस पहुँचाने” के मुआवजे के रूप में उन्हें कुल 1,425.15 पाउंड का भुगतान करने का निर्देश दिया.
तीन न्यायाधीशों के पैनल ने हालांकि कहा कि घाना की संस्कृति में “आंटी” शब्द बुजुर्गों के प्रति सम्मान व्यक्त करने वाला शब्द है (चूंकि उत्पीड़न करने वाला व्यक्ति घाना मूल का था), लेकिन यह शिकायतकर्ता की इच्छा के विरुद्ध था, इसलिए यह उनके लिए अपमानजनक रहा होगा.” लिहाजा, स्टाफ नर्स चार्ल्स ओपोंग वार्ड में टीमों का नेतृत्व करने के लिए जिम्मेदार थे और उन्हें ऐसी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी.
फैसले में उल्लेख किया गया है, “हमारा मानना है कि चार्ल्स ओपोंग का उद्देश्य संभवतः हास्य (मजाक) का एक अपमानजनक प्रयास था. शिकायतकर्ता ने इसे एक अपमानजनक वातावरण बनाने के रूप में महसूस किया. ऑफिस, कॉरिडोर और हैंडओवर (काम सौंपने) के समय की गई इन टिप्पणियों की परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि इनका प्रभाव एक अपमानजनक माहौल बनाने वाला था. हम मानते हैं कि इन टिप्पणियों का ऐसा प्रभाव पड़ना वाजिब था. फलस्वरूप, इस आधार पर शिकायतकर्ता का उत्पीड़न का दावा सफल होता है.”
61 वर्षीय भारतीय मूल की स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर एस्टेवेस ने ट्रिब्यूनल को सबूत दिए कि ओपोंग ने कई मौकों पर “आंटी” शब्द का इस्तेमाल किया, जबकि उन्होंने अपना नाम लेकर पुकारने का अनुरोध किया था. इसके अलावा, उन्होंने बताया कि एक उम्रदराज सहकर्मी (जिन्हें उन्होंने ‘जॉर्ज’ कहा) के साथ उनकी जोड़ी अच्छी लगने की टिप्पणी भी दो मौकों पर की गई थी.
अडानी ने अमेरिकी मार्केट रेगुलेटर द्वारा दायर धोखाधड़ी मामले को खारिज करने की मांग की
स्क्रोल की रिपोर्ट है कि कारोबारी गौतम अडानी ने संयुक्त राज्य अमेरिका की एक अदालत में याचिका दायर कर अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन द्वारा दायर धोखाधड़ी के मामले को खारिज करने की मांग की है. कमीशन ने गौतम अडाणी और उनके भतीजे पर प्रोजेक्ट हासिल करने के लिए रिश्वत देने के आरोप लगाए थे. धोखाधड़ी के आरोप 2021 में 750 मिलियन डॉलर के बॉन्ड ऑफरिंग से जुड़े दस्तावेजों में इस योजना का खुलासा न करने पर आधारित हैं.
कमीशन ने नवंबर 2024 में गौतम अडाणी और उनके भतीजे सागर अडाणी पर आरोप लगाया था कि उन्होंने भारत में सौर ऊर्जा अनुबंधों के लिए अधिकारियों को रिश्वत देने की योजना बनाई और फिर अमेरिका के निवेशकों के सामने कंपनी की एंटी-ब्राइबरी नीतियों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया.
अडानी ग्रुप की दलील: अमेरिका का अधिकार नहीं
अडाणी के वकीलों ने अदालत में साफ-साफ कहा कि यह मामला अमेरिकी कानूनों के दायरे में आता ही नहीं है. जिस बॉन्ड की बिक्री पर सवाल उठाए जा रहे हैं, वह अमेरिका से बाहर हुई थी .
वकीलों का दावा है कि गौतम अडाणी ने न तो किसी अमेरिकी निवेशक से मुलाकात की और न ही इस प्रक्रिया में उनकी कोई सीधी भूमिका थी. इसलिए अमेरिकी कोर्ट को इस पर सुनवाई का हक नहीं है.
असम के बेघर मुसलमानों के सवाल “अगर हम बांग्लादेशी हैं, तो हमारे वोट क्यों चाहिए?”
आर्टिकल 14 की रिपोर्ट है कि असम के गोलपाड़ा जिले में, जहाँ बेदखली अभियानों ने हजारों मुस्लिम परिवारों को उनकी जमीन से हटाकर अस्थायी शिविरों और रेत के टापुओं पर रहने को मजबूर कर दिया है, वहां चुनावी राजनीति एक गहरे सवाल से टकरा रही है.
39 वर्षीय अबुल कलाम कहते हैं “अगर हम बांग्लादेशी हैं, तो हमारे वोट क्यों चाहिए? और अगर वोट चाहिए, तो हमें रहने की जगह क्यों नहीं दी?” यह सवाल सिर्फ अबुल कलाम का नहीं, बल्कि उन हजारों मुस्लिम परिवारों का है जिन्हें बेदखली के बाद घर से ज्यादा अपनी पहचान साबित करनी पड़ रही है.
2021 से 2026 के बीच असम में 20,000 से ज्यादा परिवार बेघर हुए. कई लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं, जबकि लगभग 97,000 लोग ‘डी-वोटर’ (संदिग्ध नागरिक) के रूप में चिन्हित हैं, जिससे वे वोट नहीं डाल सकते हैं. इनमें से कई आज रेतीले टापुओं पर तिरपाल के नीचे रह रहे हैं. विडंबना यह है कि जिन लोगों के पास आधार, वोटर आईडी और दशकों पुराने दस्तावेज हैं, उन्हें ही “घुसपैठिया” कहा जा रहा है.
चुनाव से ठीक पहले “अवैध प्रवासी” का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में है. मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा लगातार बेदखली को “जमीन बचाने” की कार्रवाई बता रहे हैं और 5 लाख बीघा जमीन खाली कराने की बात कह चुके हैं. लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग है. लोग कहते हैं राजनीतिक दल वोट मांगने आते हैं, हाल पूछने नहीं.
कानूनी तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि बेदखली प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए और पुनर्वास जरूरी है. लेकिन कई परिवारों का आरोप है कि उन्हें सिर्फ एक दिन का नोटिस मिला.
ओडिशा: वेदांता खनन विरोध में झड़प, 50 से अधिक पुलिसकर्मी और ग्रामीण घायल
स्क्रॉल की रिपोर्ट के अनुसार, ओडिशा के रायगढ़ा में माइनिंग प्रोजेक्ट से जुड़ी एक सड़क के निर्माण को लेकर स्थानीय लोगों और पुलिस में झड़प के कारण 50 से ज़्यादा पुलिसकर्मी समेत 70 लोग घायल हो गए. मामला उस 3 किलोमीटर लंबी सड़क से जुड़ा है, जो पर्लोंग से सगाबारी घाट तक बनाई जा रही है. यह सड़क सीधे तौर पर वेदांता लिमिटेड की प्रस्तावित सिजिमाली बॉक्साइट खदान तक पहुंच खोलती है. एक ऐसा इलाका जिसे पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील माना जाता है.
पुलिस का कहना है कि टीम एक स्थानीय नेता सुदर्शन मांझी को गिरफ्तार करने पहुंची थी, जो 14 मामलों में वांछित हैं. लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि यह कार्रवाई दरअसल लंबे समय से चल रहे विरोध को दबाने की कोशिश थी. भीड़ ने पुलिस को घेर लिया, हालात बिगड़े और पुलिस ने आंसू गैस और लाठीचार्ज का सहारा लिया पुलिस के मुताबिक 58 जवान घायल हुए, जबकि कार्यकर्ताओं का दावा है कि कई ग्रामीण भी गंभीर रूप से जख्मी हुए हैं.
वेदांता लिमिटेड ने इस घटना पर टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा कि खनन कार्य अभी शुरू नहीं हुआ है और यह मामला प्रशासन व स्थानीय लोगों के बीच का है. कंपनी ने कहा कि वह सभी कानूनी और कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारियों का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध है.
फ़िलहाल प्रशासन ने क्षेत्र में एक महीने के लिए धारा 144 लागू कर दी है, जिसके तहत परियोजना स्थल के 100 मीटर के दायरे में चार से अधिक लोगों के जुटने पर रोक है.
कुंभ तैयारियों के बीच नासिक में पेड़ कटाई पर ट्रिब्यूनल की रोक
महाराष्ट्र के नासिक में सिंहस्थ कुंभ मेले की तैयारियों के बीच पेड़ों की कटाई का मुद्दा अब कानूनी मोड़ ले चुका है. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की पुणे बेंच ने 28 अप्रैल तक पेड़ काटने पर अंतरिम रोक लगा दी है. जस्टिस दिनेश कुमार सिंह और न्यायिक सदस्य सुजीत कुमार बाजपेयी ने अधिकारियों को अगली सुनवाई तक शहर में किसी भी पेड़ को काटने से परहेज करने का निर्देश दिया.
स्क्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, यह फैसला एक स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ता मनीष बाविस्कर की याचिका पर आया, जिन्होंने नासिक महल निगम की कार्रवाई को चुनौती दी थी. मामले की सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल को बताया गया कि विकास कार्यों के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जा रहे हैं. याचिकाकर्ता ने वीडियो कॉल के जरिए लाइव कटाई के दृश्य भी दिखाए, जिसके बाद अदालत ने तुरंत हस्तक्षेप किया.
नगर निगम का कहना है कि करीब 1,800 पेड़ों को काटने की अनुमति है, लेकिन याचिका में दावा किया गया है कि असल संख्या 5,000 से अधिक हो सकती है. आरोप यह भी है कि लगभग 1,500 पेड़ पहले ही बिना तय कानूनी प्रक्रिया और बॉम्बे हाई कोर्ट के निर्देशों का पालन किए बिना काटे जा चुके हैं.
याचिका में प्रतिपूरक वनीकरण (कंपेनसेटरी अफॉरेस्टेशन) के दावों पर भी सवाल उठाया गया, यह कहते हुए कि जमीन पर न तो कोई पेड़ लगाया गया और न ही संरक्षित किया गया.
केरल चुनाव में भाजपा उम्मीदवारों का मुस्लिम-विरोधी अभियान
मकतूब मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, केरल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार, जो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के तहत चुनाव लड़ रहे हैं, वे इस्लामोफोबिक (मुस्लिम-विरोधी) चुनाव प्रचार अभियान चला रहे हैं. इन अभियानों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मुस्लिम विधायकों के चुने जाने पर सवाल उठाए गए हैं और आगामी विधानसभा चुनावों में “हिंदू विधायक” चुनने की अपील की जा रही है.
विवाद गुरुवायूर और अलुवा विधानसभा क्षेत्रों से सामने आया है, जहां चुनावी भाषणों और होर्डिंग्स के जरिए मतदाताओं को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने की कोशिश के आरोप लगे हैं. इन अभियानों में पिछले निर्वाचित प्रतिनिधियों की धार्मिक पहचान को प्रमुखता से दिखाया गया है.
गुरुवायूर में एनडीए उम्मीदवार और वरिष्ठ भाजपा नेता बी. गोपालकृष्णन ने कहा कि पिछले 50 वर्षों में इस क्षेत्र ने किसी हिंदू विधायक को नहीं चुना है. उन्होंने सवाल उठाया कि गुरुवायूर जैसे राष्ट्रीय तीर्थ स्थल का प्रतिनिधित्व किसी हिंदू विधायक ने क्यों नहीं किया. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि न तो लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट और न ही यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट हिंदू समुदाय से उम्मीदवार उतारते हैं.
इन बयानों के बाद भारत निर्वाचन आयोग में शिकायत दर्ज की गई, जिसके बाद मामला गुरुवायूर मंदिर पुलिस को भेजा गया और जिला कलेक्टर को कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं. इसके बाद पुलिस ने गोपालकृष्णन के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 192 (दंगा भड़काने की मंशा से उकसावे) और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 125 (धार्मिक आधार पर वैमनस्य फैलाना) के तहत मामला दर्ज किया है.
इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के सांसद हारिस बीरन ने इस अभियान की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि चुनावों में मुसलमानों को “दूसरा” दिखाना एक चिंताजनक प्रवृत्ति बन गई है.
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.










