07/05/2026: मणिपुर में फिर आग | तीसरा मोर्चा |विजय को रोकने के लिए | प्रेम पणिक्कर | बंगाल विस भंग | तरबूज़ में ज़हर | शरजील के 6 साल | निवेश की हिचक | बिहार-बंगाल के बाद
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
ममता के इस्तीफे से इनकार के बाद राज्यपाल ने विधानसभा भंग की
मुंबई: तरबूज में मिला चूहे मारने का जहर, जिससे हुई थी एक ही परिवार के चार सदस्यों की मौत
मणिपुर के कामजोंग जिले में सशस्त्र उग्रवादियों ने सीमावर्ती गांवों को फूँका, ग्रामीण भागे
‘बहुमत के समर्थन’ के आग्रह के पीछे राष्ट्रपति शासन की छाया
राज्यपाल ने विजय को बताया, ‘सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत का समर्थन स्थापित नहीं’
तमिलनाडु: विजय को रोकने के लिए धुर विरोधी ‘डीएमके और एआईएडीएमके’ साथ आएंगे! एआईएडीएमके के प्रस्ताव पर स्टालिन लेंगे फैसला
मणिपुर: एक तीसरा मोर्चा, जो अधिक विनाशकारी हो सकता है
‘जुर्म कहाँ है?’: 6 साल की कैद और अपने चर्चित भाषणों पर शरजील इमाम
मुनाफ़ा बढ़ रहा है, फिर भी निवेश से क्यों बच रहीं भारत की बड़ी कंपनियाँ?
बिहार से बंगाल तक: कैसे गढ़े गए चुनावी नैरेटिव
प्रेम पणिकर: विजय ने द्रविड़ राजनीति की जड़ों को हिला डाला
मणिपुर के कामजोंग जिले में सशस्त्र उग्रवादियों ने सीमावर्ती गांवों को फूँका, ग्रामीण भागे
पूर्वोत्तर के राज्य मणिपुर में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है. भारत-म्यांमार सीमा के पास मणिपुर के कामजोंग जिले में गुरुवार सुबह भारी हथियारों से लैस उग्रवादियों ने गांवों पर हमला किया, घरों को आग लगा दी और निवासियों को भागने पर मजबूर कर दिया.
‘पीटीआई’ के अनुसार, उग्रवादियों ने सुबह करीब 4 बजे कसोम खुल्लेन थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले तंगखुल नागा गांवों—नामली, वांगली और चोरो पर हमला किया, जिसके बाद सीमावर्ती बस्तियों के निवासियों को पास के जंगलों में शरण लेनी पड़ी. ये गांव अंतरराष्ट्रीय सीमा से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित हैं.
हमले के दौरान भागने की कोशिश में कम से कम एक बुजुर्ग महिला घायल हो गई. ग्रामीणों के अनुसार, नामली में दो घर, वांगली में तीन-चार घर और चोरो में एक चर्च को छोड़कर बाकी कई घर जलकर राख हो गए. असम राइफल्स सहित सुरक्षा बल बाद में स्थिति का जायजा लेने के लिए इलाके में पहुंचे.
फूंगयार के विधायक एल. केशिंग ने आरोप लगाया कि यह हमला सीमा पार से म्यांमार स्थित उग्रवादी समूहों—कुकी नेशनल आर्मी (बर्मा) और पीपुल्स डिफेंस फोर्स द्वारा किया गया था.
केशिंग ने पत्रकारों से कहा, “अब तक राज्य आंतरिक संघर्ष देख रहा था, लेकिन आज बाहरी आक्रमण हुआ है. कुकी नेशनल आर्मी-बी और पीपुल्स डिफेंस फोर्स की संयुक्त टुकड़ी ने तड़के 3.30 बजे चार-पांच सीमावर्ती गांवों पर हमला किया.”
नागा पीपुल्स फ्रंट के विधायक ने दावा किया, “कई घर राख हो गए हैं, हालांकि कोई जनहानि नहीं हुई है. एक महिला सहित दो व्यक्तियों का अब तक पता नहीं चल पाया है. प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि उन्हें सशस्त्र उग्रवादी अपने साथ ले गए हैं.”
इसे “बाहरी आक्रमण” करार देते हुए विधायक ने कहा कि राज्य और केंद्र दोनों सरकारों को चुप नहीं रहना चाहिए. उन्होंने आरोप लगाया कि “इस क्षेत्र में मणिपुर पुलिस की कोई मौजूदगी नहीं है.” केशिंग ने गांवों की रक्षा करने में विफल रहने के लिए असम राइफल्स पर भी आरोप लगाया. उन्होंने कहा, “असम राइफल्स के जवान कल गांवों में आए थे और आज हमला हो गया. ग्रामीण इन घटनाक्रमों को लेकर निराश हैं.”
इस बीच, तंगखुल अज़े कटमनाओ लॉन्ग (टीएकेएल), जिसे ‘सदर्न तंगखुल स्टूडेंट्स यूनियन’ भी कहा जाता है, ने आरोप लगाया कि लगभग 100 सशस्त्र केएनए-बी उग्रवादियों ने भारत-म्यांमार सीमा पार कर कामजोंग जिले में प्रवेश किया और नामली, वांगली, अशांग खुल्लेन और चोरो सहित गांवों पर हमला किया.
संगठन ने मांग की कि राज्य सरकार प्रभावित गांवों में तुरंत मणिपुर पुलिस कमांडो तैनात करे. साथ ही, उन्होंने उस कथित सुरक्षा चूक पर तत्काल स्पष्टीकरण मांगा है जिसके कारण लगभग 100 सशस्त्र उग्रवादी बिना पता चले अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करने में सफल रहे.
मणिपुर: एक तीसरा मोर्चा, जो अधिक विनाशकारी हो सकता है
3 मई को मणिपुर के जातीय संघर्ष को तीन साल पूरे हो गए. 3 मई, 2023 को मुख्य रूप से हिंदू मैतेई समुदाय द्वारा ‘अनुसूचित जनजाति’ (एसटी) के दर्जे की मांग के खिलाफ पहाड़ी जनजातियों द्वारा निकाली गई एक रैली चुराचांदपुर जिले में हिंसक हो गई थी. हिंसा की तस्वीरों और वीडियो से इंटरनेट भर गया और शाम होते-होते यह हिंसा इंफाल के कुछ हिस्सों में फैल गई. 4 मई तक, इंफाल और घाटी व पहाड़ियों के कई अन्य शहरों में भारी तबाही मच गई.
काफी स्पष्ट रूप से, यह शत्रुता केवल मैतेई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच ही सीमित रही, जबकि नागाओं ने भी वही रैली आयोजित की थी. लेकिन बाहरी टिप्पणीकारों ने अक्सर इसे नजरअंदाज कर दिया, क्योंकि वे संघर्ष को केवल ‘हिंदू बनाम ईसाई’ या ‘गैर-जनजाति बनाम जनजाति’ जैसे बने-बनाए साँचों में देख रहे थे. ‘द टेलीग्राफ’ में प्रदीप फंजौबम ने लिखा है कि नागा और कुकी समुदायों के बीच हाल ही में विकसित होते हिंसक टकरावों ने यह उजागर कर दिया है कि ये पुराने साँचे कितने अधूरे थे. डर इस बात का है कि यह नया मोर्चा कहीं अधिक विनाशकारी हो सकता है, क्योंकि नागा और कुकी व्यावहारिक रूप से एक ही स्थान पर रहते हैं. नागाओं का दावा है कि वे जमीन के संरक्षक हैं और उन्होंने कुकी लोगों को वहां किराएदारों के रूप में रहने की अनुमति दी थी. कुकी इस दावे का खंडन करते हैं.
नशीले पदार्थों का आकर्षक व्यापार इस संघर्ष का एक बड़ा प्रेरक है, और तीसरे पक्ष के निहित स्वार्थ इस अराजकता को बढ़ावा देते हैं, ताकि यह व्यापार आसानी से चल सके. सैटेलाइट इमेजरी के आधिकारिक अनुमानों के अनुसार, राज्य में अफीम की अवैध खेती का दायरा 16,000 हेक्टेयर से अधिक है. कुख्यात ‘गोल्डन ट्रायंगल’ (स्वर्ण त्रिभुज) अब मणिपुर तक फैल गया है.
विभिन्न समुदायों, संघर्ष के हितधारकों और सरकारी सुरक्षा एजेंसियों के बीच गहरे अविश्वास का माहौल इसका एक दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम है. मैतेई और नागा समुदायों को संदेह है कि केंद्रीय बल, विशेष रूप से असम राइफल्स, कुकी लोगों का उपयोग उन्हें कमजोर करने के लिए ‘प्रॉक्सी फाइटर्स’ (छद्म लड़ाकों) के रूप में कर रहे हैं. वहीं, कुकी समुदाय राज्य पुलिस को अपने प्रति पक्षपाती मानता है.
हिंसा की एक चिंगारी आज भी बड़ी आग लगा सकती है. 7 अप्रैल की सुबह चुराचांदपुर की सीमा से सटे बिष्णुपुर जिले के त्रोंगलाओबी गांव में दागे गए एक मोर्टार शेल की घटना इसका उदाहरण है, जिसमें सो रहे बीएसएफ जवान के दो बच्चों की मौत हो गई और उनकी मां घायल हो गईं.
यह मैतेई गाँव पश्चिम में थंगजिंग पहाड़ियों से घिरा है और इसके चारों ओर कई सुरक्षा चौकियाँ हैं. यह क्षेत्र सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम (एएफएसपीए) के दायरे में आता है, जिसे इंफाल शहर के पास के घाटी क्षेत्रों से हटा दिया गया है. मोर्टार वाली घटना की अगली सुबह, केंद्रीय बलों द्वारा अपने कथित ‘प्रॉक्सी’ (छद्म लड़ाकों) का इस्तेमाल किए जाने के संदेह में भड़की एक भीड़ ने पास के सीआरपीएफ कैंप पर हमला कर दिया और जवाबी फायरिंग में तीन लोग मारे गए.
14 अप्रैल को, सीआईएसएफ और पुलिस ने त्रोंगलाओबी से कुछ ही दूरी पर स्थित क्वाक्टा गाँव के एक यात्री से इंफाल हवाई अड्डे पर 6.74 किलोग्राम ब्राउन शुगर बरामद की. उसी दिन बाद में, दो नागरिक वाहनों में क्वाक्टा की ओर जा रहे कुछ पुरुषों का सामना थिनुंगई गाँव में सड़क जाम कर रही एक मैतेई भीड़ से हो गया. इन वाहनों में सवार एक व्यक्ति को छोड़कर बाकी सभी बाहरी (गैर-स्थानीय) थे. वे सादे कपड़ों में थे, उनके पास हथियार थे और उन्होंने खुद को असम राइफल्स का कर्मी बताया, लेकिन अपना पहचान पत्र दिखाने से इनकार कर दिया. जब भीड़ आक्रामक हो गई, तो पीछे वाले वाहन ने यू-टर्न लिया और कुछ पुलिसकर्मियों को लेकर वापस लौटा. तब तक भीड़ बेकाबू हो चुकी थी. उन्होंने उन पुरुषों पर हमला किया (सौभाग्य से जानलेवा नहीं) और वाहनों को आग लगा दी. स्थानीय लोगों के अनुसार, यात्रियों के ज़ब्त किए गए हथियार अगले दिन लौटा दिए गए. पुलिस ने बाद में स्पष्ट किया कि यह घटना गलतफहमी के कारण हुई और वे लोग एक ड्रग-रोधी छापे के मिशन पर थे.
टकराव के दौरान, भीड़ में मौजूद एक महिला ने अकेले स्थानीय व्यक्ति को देखा और शोर मचाया कि वह कुकी है और ये लोग संभवतः हथियारों के तस्कर हैं. बाद में पता चला कि वह व्यक्ति ‘कोम’ समुदाय से था. एक भ्रमणकारी स्तंभकार ने इस बात को पकड़ लिया और इस टकराव को सांप्रदायिक कट्टरता के परिणाम के रूप में चित्रित किया, जिससे अन्य परेशान करने वाले सवालों से ध्यान भटक गया. ये सशस्त्र सुरक्षाकर्मी नागरिक वाहनों और सादे कपड़ों में क्वाक्टा क्यों जा रहे थे? क्या असम राइफल्स को अब नशीले पदार्थों के नियंत्रण का काम सौंपा गया है, या कहानी में कुछ और भी है?
मणिपुर की विनाशकारी घटनाओं की आपाधापी में, ध्यान जल्द ही एक और आक्रोश की ओर बढ़ गया. 18 अप्रैल को, इंफाल-उखरुल राजमार्ग पर तंगखुल नागा यात्री वाहनों के काफिले पर कथित तौर पर कुकी उग्रवादियों ने हमला किया, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई और कई घायल हो गए. इस घटना ने पहले से ही खतरनाक नागा-कुकी तनाव को विस्फोट के और करीब धकेल दिया. इसके बाद साजिश के सिद्धांतों का एक नया दौर भी शुरू हो गया.
प्रदीप फंजौबम ‘इम्फाल रिव्यू ऑफ आर्ट्स एंड पॉलिटिक्स’ के संपादक हैं.
तमिलनाडु: विजय को रोकने के लिए धुर विरोधी ‘डीएमके और एआईएडीएमके’ साथ आएंगे!
तमिलनाडु में चूंकि किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं हुआ है, लिहाजा वहाँ अजीबोगरीब स्थिति निर्मित हो रही है. इससे ज्यादा आश्चर्यजनक क्या होगा कि विजय को सत्ता में आने से रोकने के लिए परस्पर धुर विरोधी डीएमके और एआईएडीएमके सरकार के गठन पर विचार कर रहे हैं. इसकी प्रमुख वजह यह धारणा है कि विजय यदि एक बार सरकार में आ गए तो फिर दोनों राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के लिए 10-15 वर्षों की फुर्सत हो जाएगी.
इस बीच गुरुवार शाम (7 मई, 2026) को डीएमके विधायक दल की एक महत्वपूर्ण बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर एम.के. स्टालिन को तमिलनाडु में एक “स्थिर” सरकार का गठन सुनिश्चित करने के पार्टी के प्राथमिक उद्देश्य के अनुरूप “त्वरित निर्णय” लेने के अधिकार सौंपे गए हैं. जाहिर है, अब डीएमके प्रमुख होने के नाते स्टालिन को सरकार बनाने के लिए अन्नाद्रमुक (एआईएडीएमके) द्वारा मांगे गए समर्थन के अनुरोध पर निर्णय लेना है.
ये घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर ने टीवीके के नेता विजय को स्पष्ट कर दिया है कि राज्य विधानसभा में सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत का समर्थन अभी तक स्थापित नहीं हो पाया है.
बी. कोलप्पन के मुताबिक, इसके पहले निवर्तमान मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने गुरुवार (7 मई, 2026) को पार्टी के सहयोगियों की एक आपात बैठक बुलाई. यह बैठक उन अटकलों के बीच हुई कि डीएमके, एडप्पादी के. पलानीस्वामी के नेतृत्व वाली अखिल भारतीय एआईएडीएमके सरकार को समर्थन दे सकती है. हालांकि, कहा जा रहा है कि स्टालिन इस बात पर अडिग हैं कि अन्नाद्रमुक सरकार का समर्थन करना राजनीतिक रूप से अस्थिर होगा, लेकिन कथित तौर पर कुछ निवर्तमान वरिष्ठ मंत्रियों सहित वरिष्ठ डीएमके नेता उन पर इस तरह के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए दबाव डाल रहे हैं. डीएमके के भीतर यह तर्क दिया जा रहा है कि चूंकि स्टालिन विधानसभा में नहीं होंगे, इसलिए डीएमके और एआईएडीएमके एक ‘न्यूनतम साझा कार्यक्रम’ विकसित कर सकते हैं और संयुक्त रूप से सरकार चला सकते हैं.
इसी पृष्ठभूमि में स्टालिन ने वामपंथी नेताओं और श्री तिरुमावलवन को परामर्श के लिए आमंत्रित किया. गठबंधन सहयोगियों द्वारा व्यक्त किए गए विचारों के आधार पर, आज शाम होने वाली डीएमके विधायकों की बैठक में अंतिम निर्णय लिए जाने की उम्मीद है. हालांकि, डीएमके सांसद कलानिधि वीरास्वामी ने एक सोशल मीडिया संदेश में आरोप लगाया कि एआईएडीएमके, टीवीके को सरकार बनाने से रोकने के लिए भाजपा पर दबाव डाल रही है. उन्होंने कहा, “यह जनमत का अनादर है. उम्मीद है कि लोकतंत्र की जीत होगी.
राज्यपाल ने विजय को बताया, ‘सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत का समर्थन स्थापित नहीं’
डेनिस एस. येसुदासन के अनुसार, लोक भवन ने गुरुवार (7 मई, 2026) को बताया कि तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने सी. जोसेफ विजय को स्पष्ट कर दिया है कि राज्य विधानसभा में सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत का समर्थन स्थापित नहीं हो पाया है.
एक आधिकारिक बयान के अनुसार, राज्यपाल के निमंत्रण पर विजय ने लगातार दूसरे दिन लोक भवन में उनसे मुलाकात की. इससे पहले बुधवार को भी विजय ने लोक भवन में राज्यपाल से भेंट की थी. गुरुवार को राज्यपाल के साथ विजय की यह बैठक लगभग 30 मिनट तक चली. बुधवार की बैठक के विपरीत, जहाँ विजय के साथ केवल छह नवनिर्वाचित विधायक-नामित मौजूद थे, गुरुवार को टीवीके संस्थापक को राजनीतिक और कानूनी मामलों पर सलाह देने वाले कुछ व्यक्ति भी उनके साथ लोक भवन पहुंचे थे. बैठक के दौरान किसी भी पत्र का आदान-प्रदान नहीं हुआ. राज्यपाल ने अपने रुख को दोहराया है कि टीवीके को 234 सदस्यीय नवनिर्मित विधानसभा में 118 विधायकों के समर्थन का प्रमाण देना होगा.
प्रेम पणिक्कर: विजय ने द्रविड़ राजनीति की जड़ों को हिला डाला
संपादक, पत्रकार प्रेम पणिक्कर ने सबस्टैक पर अपने पेज “स्मोक सिग्नल्स” पर तमिलनाडु के चुनाव नतीजों पर अंग्रेजी में लंबा लेख लिखा है. हम यहां हिंदी में लेख के संपादित अंश प्रस्तुत कर रहे हैं:
अगस्त 2025 में, जब मैंने अभिनेता विजय के राजनीतिक उभार पर एक लेख लिखा था, तब बहुत से लोगों को लगा था कि यह केवल फिल्मी चकाचौंध से प्रेरित एक अस्थायी लहर है. लेकिन हाल ही में संपन्न हुए तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजों ने उस लेख को न केवल प्रासंगिक बना दिया, बल्कि उसे सोशल मीडिया पर एक नया जीवन दे दिया है.
मैंने उस लेख की शुरुआत प्रसिद्ध शोमैन पी.टी. बरनम के एक किस्से से की थी. जब उनके पास एक ऐसा ‘एक्ट’ लाया गया जहाँ एक व्यक्ति भीड़ के सामने जान देने वाला था, तो बरनम ने पूछा था—”शानदार, लेकिन इसके बाद आप ‘एन्कोर’ (अगले प्रदर्शन) में क्या करेंगे?” मदुरै रैली के बाद विजय के सामने भी यही यक्ष प्रश्न था. क्या वह अपनी शुरुआती सफलता और उम्मीदों के भारी बोझ को वोटों में बदल पाएंगे? राजनीति सिनेमा नहीं है, यहाँ गति (मोमेंटम) का जीवनकाल बहुत छोटा होता है.
विजय ने 234 सीटों वाली विधानसभा में 108 सीटें जीतकर न केवल ‘एन्कोर’ पेश किया (पुनरावृत्ति), बल्कि द्रविड़ राजनीति की आधी सदी पुरानी जड़ों को हिलाकर रख दिया.
भले ही टीवीके बहुमत के जादुई आंकड़े (118) से कुछ कदम दूर है, लेकिन 108 सीटों का आंकड़ा ऐतिहासिक है. यह द्रमुक (59) की सीटों से लगभग दोगुना और अन्नाद्रमुक (47) से कहीं अधिक है. यह जीत एक ऐसी पार्टी की है जिसका दो साल पहले कोई वजूद नहीं था. विजय ने उन दो दिग्गजों को पछाड़ दिया है जिन्होंने दशकों तक बारी-बारी से राज्य पर राज किया था.
एक विश्लेषक के रूप में जवाबदेही जरूरी है. अगस्त 2025 में जब मैंने टीवीके के लिए 7-9% वोट शेयर का अनुमान लगाया था, तो वह एक ‘किंगमेकर’ की भूमिका की तैयारी जैसा था.
1. कोंगू बेल्ट (पश्चिम): यहाँ मेरा अनुमान सटीक रहा. अन्नाद्रमुक का यह गढ़ एक त्रिकोणीय मुकाबले में तब्दील हो गया. टीवीके ने 68 में से 27 सीटें जीतकर ‘प्रतिस्पर्धी विखंडन’ का लाभ उठाया.
2. दक्षिणी तमिलनाडु: यहाँ विजय ने बढ़त तो बनाई (25 सीटें), लेकिन उस स्तर का दबदबा नहीं दिखा पाए जिसकी उम्मीद उनकी मदुरै रैली ने जगाई थी. यहाँ मुकाबला बराबरी का रहा.
3. उत्तरी तमिलनाडु (सबसे बड़ी चूक): यहाँ मेरा आकलन पूरी तरह गलत साबित हुआ। मैंने चेन्नई और आसपास के क्षेत्रों को “द्रमुक की मुट्ठी में” माना था. इसके विपरीत, टीवीके ने यहाँ 69 में से 44 सीटें जीतकर ‘होस्टाइल टेकओवर’ कर लिया. शहरी युवाओं और आकांक्षी मतदाताओं ने पुराने समीकरणों को ध्वस्त कर दिया.
उत्तरी तमिलनाडु के नतीजों ने ही विजय की सत्ता की राह प्रशस्त की. इसका सबसे चौंकाने वाला उदाहरण कोलाथुर सीट है. एम.के. स्टालिन ने इस क्षेत्र को एक मॉडल के रूप में विकसित किया था, लेकिन वे अपनी ही सीट द्रमुक के एक पूर्व कार्यकर्ता से हार गए. यह हार शासन की विफलता नहीं, बल्कि एक नए विकल्प के प्रति जनता के आकर्षण का परिणाम थी.
चेन्नई की गलियों में घूमने पर एक अजीब सी ‘असमंजस’ वाली भावना दिखाई देती है. युवा और पहली बार के मतदाता तो उत्साहित हैं, लेकिन पुरानी पीढ़ी के लोग और मध्यम वर्ग “यह हमने क्या कर दिया?” वाली मुद्रा में हैं. ऐसा लगता है कि मतदाता केवल सुधार चाहते थे, लेकिन उन्होंने व्यवस्था में एक संपूर्ण विस्थापन कर दिया.
विजय ने रणनीति के तहत पुराने द्रविड़ गढ़ों में सेंध लगाई. उन्होंने तिरुचिरापल्ली पूर्व और पेरम्बूर जैसी कठिन सीटों से चुनाव लड़कर यह संदेश दिया कि उनकी राजनीति केवल व्यक्तिगत नाटक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक क्षेत्रीय विस्तारवादी महत्वाकांक्षा है.
अन्नाद्रमुक का अवसान: 47 सीटें मिलना अन्नाद्रमुक के लिए केवल हार नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व का संकट है. 1991 में द्रमुक 7 सीटों पर सिमटी थी, लेकिन वह अपने कैडर और करुणानिधि के बौद्धिक नेतृत्व के कारण बच गई. अन्नाद्रमुक हमेशा ‘व्यक्तित्व-आधारित’ पार्टी रही है. एमजीआर और जयललिता के बाद, एडप्पादी पलानीस्वामी (ईपीएस) के पास वह करिश्मा नहीं था जो पार्टी को एकजुट रख सके. आज अन्नाद्रमुक एक ढांचागत रूप से घायल जानवर की तरह है.
द्रमुक की स्थिति: 59 सीटों के साथ द्रमुक अभी भी मैदान में है. एक कैडर-आधारित संगठन होने के नाते वह इस हार को झेल सकती है. हालांकि, स्टालिन के नेतृत्व और उत्तराधिकार के सवालों पर अब पार्टी के भीतर और बाहर चर्चाएं तेज होंगी.
सत्ता का गुरुत्वाकर्षण केंद्र अब विजय की ओर खिसक गया है. नतीजों के 24 घंटे के भीतर कांग्रेस का द्रमुक की बैठक से दूरी बनाना इस बात का प्रमाण है कि राजनीतिक अवसरवाद अब विजय के पक्ष में झुक रहा है. यदि कांग्रेस और पीएमके जैसे दल विजय का समर्थन करते हैं, तो यह न केवल सरकार को स्थिरता देगा, बल्कि टीवीके को भविष्य की धुरी के रूप में स्थापित कर देगा.
वहीँ दूसरी ओर, कमल हासन की राजनीति अब एक फुटनोट बनकर रह गई है. जहाँ हासन की विचारधारा ‘बुफे’ की तरह थी, वहीं विजय ने स्पष्टता और कैडर अनुशासन के साथ खुद को साबित किया.
भाजपा का प्रभाव और द्रविड़ गौरव
प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के लिए तमिलनाडु के नतीजे निराशाजनक रहे. 2.9% वोट शेयर और केवल एक सीट (उधगमंडलम) यह बताती है कि भाजपा की ‘हिंदी’ और ‘मंदिर’ आधारित राजनीति द्रविड़ गौरव (मुत्तमिल) के सामने नहीं टिक सकी. अमित शाह के हिंदी थोपने के प्रयासों ने तमिल मानस को भाजपा से और दूर कर दिया. अब भाजपा के लिए विजय के साथ एक ‘लेन-देन’ वाला रिश्ता बनाना ही एकमात्र विकल्प बचा है.
शासन की चुनौतियां: क्या विजय सफल होंगे?
विजय के लिए असली परीक्षा अब शुरू होती है. एक विद्रोही आंदोलन से सरकार चलाने तक का सफर कठिन होता है. उनके सामने तीन मुख्य चुनौतियां हैं:
1. प्रशासनिक अनुभव की कमी: उनके पास पहली बार के विधायकों की बड़ी फौज है, जिन्हें नौकरशाही को संभालने का अनुभव नहीं है.
2. गठबंधन प्रबंधन: यदि वे बैसाखियों पर सरकार चलाते हैं, तो उन्हें अपने सहयोगियों की मांगों और जन-आकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाना होगा.
3. उम्मीदों का भारी बोझ: जनता उन्हें द्रमुक और अन्नाद्रमुक के विकल्प के रूप में देख रही है. उन्हें जल्द ही परिणाम देने होंगे, वरना जनता का मोहभंग होने में देर नहीं लगेगी.
निचोड़ यह है कि तमिलनाडु अब एक ‘द्वि-ध्रुवीय’ से ‘त्रि-ध्रुवीय’ या उससे भी अधिक जटिल प्रणाली की ओर बढ़ गया है. विजय ने खेल के मैदान को खोल दिया है, लेकिन वह मैदान अभी उनका नहीं हुआ है.
पुनश्च: वर्तमान में तमिलनाडु की राजनीति अस्थिर है. अफवाहें हैं कि अन्नाद्रमुक के 30 विधायक टीवीके में शामिल हो सकते हैं. यदि ऐसा होता है, तो यह विजय के लिए आत्मघाती हो सकता है. खरीद-फरोख्त की राजनीति उनकी ‘साफ-सुथरी’ छवि को धूमिल कर देगी. लेकिन यदि अन्नाद्रमुक टूटती है, तो तमिलनाडु की राजनीति फिर से दो घोड़ों की दौड़ में बदल जाएगी, जहाँ विजय की टीवीके, अन्नाद्रमुक की जगह लेकर द्रमुक की मुख्य प्रतिद्वंद्वी बन जाएगी.
विजय ने तमिलनाडु की राजनीति को अस्त-व्यस्त कर दिया है. अब देखना यह है कि वे इसे नया रूप दे पाते हैं या व्यवस्था उन्हें अपने वजन तले दबा देती है.
‘बहुमत के समर्थन’ के आग्रह के पीछे राष्ट्रपति शासन की छाया
तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) के अध्यक्ष सी. जोसेफ विजय को विधानसभा में बहुमत का समर्थन साबित करना चाहिए, यह आग्रह एक समय की कसौटी पर परखे गए कानूनी सिद्धांत पर आधारित है. यह सिद्धांत कहता है कि राज्यपाल की पहली प्राथमिकता एक स्थिर सरकार का गठन करना है, ताकि राज्य संवैधानिक तंत्र के पूरी तरह विफल होने की स्थिति में न फिसल जाए, जिससे राष्ट्रपति शासन लागू होने की नौबत आए.
‘द हिंदू’ में एक विश्लेषण के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय के उदाहरणों में कहा गया है कि बहुमत स्थापित हो जाने के बाद राज्यपाल सरकार बनाने की अनुमति देने से इनकार नहीं कर सकते. इसका एकमात्र अपवाद वह स्थिति हो सकती है, जहाँ राज्यपाल की राय हो कि दावेदारों द्वारा एक स्थिर सरकार नहीं बनाई जा सकती. दूसरी ओर, अदालत ने यह भी कहा है कि राज्यपाल से अनिश्चित काल तक प्रतीक्षा करने की अपेक्षा नहीं की जाती है, क्योंकि इस प्रक्रिया में दलबदल या अन्य आपत्तिजनक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है.
सर्वोच्च न्यायालय और सरकारिया आयोग ने एक स्थिर सरकार बनाने के लिए राज्यपालों द्वारा “राजनीतिक दलों, समूहों और स्वतंत्र विधायकों के साथ विकल्पों को तलाशने” के लिए उचित समय दिए जाने के महत्व पर प्रकाश डाला है. हालांकि, ‘उचित समय’ वाक्यांश को संविधान में परिभाषित नहीं किया गया है.
त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में राज्यपाल के सामने ‘विकल्प’ यह होंगे कि वे सबसे पहले उन दलों के चुनाव-पूर्व गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करें जिनके पास सीटों की संख्या सबसे अधिक है. दूसरा विकल्प वह सबसे बड़ा अकेला दल होगा जो बहुमत का समर्थन दिखा सके. चुनाव के बाद का गठबंधन राज्यपाल के सामने अंतिम विकल्प होता है.
1994 के एस.आर. बोम्मई मामले में नौ न्यायाधीशों की पीठ ने वरीयता के इस क्रम का समर्थन करते हुए स्पष्ट रूप से जोड़ा है कि राज्यपाल या तो सबसे बड़े अकेले दल या “समूह” के पास जा सकते हैं. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह ‘समूह’ चुनाव से पहले बना था या बाद में. यदि ये विकल्प विफल हो जाते हैं और कोई भी दल या समूह लोकप्रिय सरकार बनाने के लिए बहुमत हासिल करने में सक्षम नहीं होता है, तो यह संवैधानिक तंत्र की विफलता का मामला माना जाएगा.
बोम्मई फैसले में अदालत ने टिप्पणी की थी: “मान लीजिए कि आम चुनाव के बाद, कोई भी राजनीतिक दल या दलों का गठबंधन या समूह विधानसभा में पूर्ण बहुमत सुरक्षित करने में सक्षम नहीं है, और राज्यपाल द्वारा विकल्पों की तलाश करने के बावजूद ऐसी स्थिति पैदा हो गई है जिसमें कोई भी दल स्थिर सरकार बनाने में सक्षम नहीं है, तो यह किसी भी राजनीतिक दल की स्थिर सरकार बनाने में पूरी तरह से प्रमाणित असमर्थता का मामला होगा जिसे विधायिका के बहुसंख्यक सदस्यों का विश्वास प्राप्त हो. यह संवैधानिक तंत्र की विफलता का मामला होगा.”
हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ मामले में अपनी सात न्यायाधीशों की पीठ के फैसले में राज्यपालों द्वारा पक्षपातपूर्ण राजनीति के लिए अपने पद का दुरुपयोग करने के खिलाफ चेतावनी भी दी है. अदालत ने कहा, “चाहे वह मौजूदा सरकार द्वारा बहुमत खोने का मामला हो या नए चुनाव के बाद नई सरकार की स्थापना का, विधानसभा भंग करने की सिफारिश करने में राज्यपाल का कार्य केवल संविधान के संरक्षण के उद्देश्य से होना चाहिए, न कि किसी एक या दूसरे दल के राजनीतिक हितों को बढ़ावा देने के लिए.”
रामेश्वर प्रसाद मामले में सरकारिया आयोग में दर्ज उस आलोचना को भी रेखांकित किया गया कि राज्यपालों ने अक्सर अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करने की अपनी शक्तियों का उपयोग “केंद्र में सत्ताधारी दल के राजनीतिक हितों को बढ़ावा देने” के लिए किया है.
अदालत ने एक “कूलिंग-ऑफ पीरियड” (राजनीति से दूरी बनाए रखने की अवधि) की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा था: “यह देखा गया है कि एक दिन कोई व्यक्ति सक्रिय राजनीति में होता है, यहाँ तक कि वह मुख्यमंत्री, मंत्री या किसी दलीय पद पर आसीन होता है, और लगभग अगले ही दिन या उसके तुरंत बाद, उसी व्यक्ति को बिना किसी ‘कूलिंग पीरियड’ के दूसरे राज्य का राज्यपाल नियुक्त कर दिया जाता है. साधारणतया, ऐसे व्यक्ति से राज्यपाल के रूप में संवैधानिक कार्यों का निर्वहन करते समय दलीय राजनीति से विरक्ति या तटस्थता की उम्मीद करना कठिन होता है.”
सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों ने यह स्वीकार किया है कि हाल के वर्षों में गठबंधन सरकारें एक दुर्लभता के बजाय एक सामान्य नियम बन गई हैं. अदालत ने टिप्पणी की है: “कई राज्यों में और वास्तव में केंद्र में भी गठबंधन सरकारें कार्यरत हैं. चुनाव के बाद के तालमेल में कुछ भी गलत नहीं है, और जब वैचारिक समानता किसी राजनीतिक दल को दूसरे दल का समर्थन करने के लिए प्रेरित करती है, भले ही उनके बीच चुनाव-पूर्व कोई गठबंधन न रहा हो... तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है.”
ममता के इस्तीफे से इनकार के बाद राज्यपाल ने विधानसभा भंग की
‘पीटीआई’ के मुताबिक, ममता बनर्जी द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर यह कहे जाने के दो दिन बाद कि वह मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देंगी, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल आर.एन. रवि ने 7 मई से राज्य विधानसभा को भंग कर दिया है. मौजूदा विधानसभा का गठन मई 2021 में हुआ था, जब ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस राज्य में लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटी थी.
इस बीच उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने आज गुरुवार (7 मई) को कोलकाता में ममता बनर्जी से मुलाकात की. यादव की पार्टी को अगले साल फरवरी 2027 में राज्य विधानसभा चुनावों का सामना करना है. पिछले दो चुनावों से भाजपा ने उनको यूपी में शिकस्त दी है. चूंकि पिछले लोकसभा चुनावों में सपा ने उत्तर प्रदेश में काफी अच्छा प्रदर्शन किया था, लिहाजा इस बार अखिलेश राज्य में वापसी के लिए पूरी ताकत लागाएंगे. लेकिन, बंगाल के नतीजों ने उन्हें अपनी रणनीति की समीक्षा करने के लिए मजबूर किया है. लगातार दस वर्षों से उप्र में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार है. अखिलेश ने कहा, ‘भाजपा ने जो कुछ बंगाल में किया है, उसका ट्रायल उत्तर प्रदेश में किया था. बंगाल में पूरा चुनाव उन्होंने लूट लिया. सारी एजेंसियों का इस्तेमाल किया.”
मुंबई: तरबूज में मिला चूहे मारने का जहर, जिससे हुई थी एक ही परिवार के चार सदस्यों की मौत
एक फॉरेंसिक विश्लेषण में खुलासा हुआ है कि पिछले महीने मुंबई के एक परिवार के जिन चार सदस्यों की मौत हुई थी, उनके द्वारा खाए गए तरबूज में चूहे मारने का जहर था.
मुंबई पुलिस को गुरुवार को फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (एफएसएल) द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट के अनुसार, तरबूज और चारों मृतकों के विसरा नमूनों में ‘जिंक फास्फाइड’ पाया गया है. यह रसायन आमतौर पर चूहे मारने के जहर में इस्तेमाल होता है. यह परिवार मुंबई के पायधुनी स्थित अपने आवास पर मृत पाया गया था.
एफएसएल अधिकारियों ने बताया कि जिंक फास्फाइड अत्यधिक जहरीला होता है और यही परिवार की मौत का मुख्य कारण है. इसका उपयोग चूहों जैसे कृंतकों को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है और कृषि क्षेत्रों या अनाज के भंडारण में एक एकल-खुराक जहर के रूप में भी इस्तेमाल होता है.
एक अधिकारी ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया, “हमने आज रिपोर्ट सौंप दी है. दो नमूनों में जिंक फास्फाइड पाया गया है - तरबूज में और चारों मृतकों के विसरा में.” मृतकों की पहचान 40 वर्षीय अब्दुल्ला डोकड़िया, उनकी 35 वर्षीय पत्नी नसीम, और उनकी दो बेटियों आयशा (16) और ज़ैनब (13) के रूप में हुई थी. ये चारों 26 अप्रैल को दक्षिण मुंबई स्थित अपने घर में मृत पाए गए थे. यह घटना उनके घर पर रिश्तेदारों के लिए आयोजित एक डिनर पार्टी के कुछ घंटों बाद हुई थी. पार्टी में सभी ने साथ में रात का खाना खाया था, लेकिन इस परिवार ने आधी रात के बाद तरबूज खाया था.
अधिकारी ने आगे कहा, “आमतौर पर यह (जिंक फास्फाइड) पाउडर के रूप में होता है, जिसका मतलब यह है कि किसी ने तरबूज काटकर उस पर पाउडर छिड़का होगा और फिर उसे खाया गया होगा. हालांकि, वास्तव में क्या हुआ था, यह पता लगाने के लिए पुलिस बेहतर स्थिति में है.”
मुंबई पुलिस के एक अधिकारी ने कहा कि उन्हें रिपोर्ट मिल गई है और अब वे इस बात की जांच करेंगे कि तरबूज में जहर किसने डाला था. अधिकारी ने बताया, “हम इस मामले की हर कोण से जांच करेंगे - चाहे यह आत्महत्या-हत्या का मामला हो या फिर यह खेती के दौरान दूषित हुआ हो जहाँ पाउडर तरबूज के भीतर रिस गया हो.” पुलिस जांच में अब तक परिवार द्वारा ऐसा आत्मघाती कदम उठाने का कोई ठोस कारण सामने नहीं आया है.
‘जुर्म कहाँ है?’: 6 साल की कैद और अपने चर्चित भाषणों पर शरजील इमाम
आईआईटी स्नातक और पीएचडी छात्र शरजील इमाम छह साल से अधिक समय से बिना मुकदमे के जेल में हैं. दिल्ली पुलिस ने उन्हें 2020 के दिल्ली दंगों की “बड़ी साजिश” का मुख्य चेहरा बताया है, जबकि उनकी गिरफ्तारी दंगों से पहले उनके द्वारा दिए गए भाषणों के आधार पर हुई थी. बेतवा शर्मा की रिपोर्ट के अनुसार, इमाम ने जेल से अपनी बातचीत में उन शब्दों और परिस्थितियों पर विचार किया है जिन्होंने उनके जीवन के पिछले छह साल तय किए हैं.
इमाम की गिरफ्तारी का मुख्य आधार उनके द्वारा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में दिया गया भाषण बना. इस भाषण की कुछ पंक्तियों, जैसे “...असम को काटना हमारी जिम्मेदारी है, अगर हम असम और भारत को काट दें, तो वे हमारी बात सुनेंगे...”, को अभियोजन पक्ष ने देशद्रोह और आतंकवाद के प्रमाण के रूप में पेश किया. सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में उनकी जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि ये शब्द प्रथम दृष्टया यूएपीए के तहत “आतंकवादी कृत्य” की श्रेणी में आ सकते हैं क्योंकि ये आवश्यक आपूर्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा को बाधित करने की बात करते हैं.
हालांकि, इमाम के वकीलों का तर्क रहा है कि उनके भाषण में हिंसा का कोई आह्वान नहीं था. वे 1962 के ‘केदार नाथ बनाम बिहार राज्य’ मामले का हवाला देते हैं, जिसमें कहा गया था कि सरकार की कड़ी आलोचना तब तक अपराध नहीं है जब तक वह सार्वजनिक अव्यवस्था या हिंसा न फैलाए.
‘चक्का जाम’ बनाम ‘हिंसा’
रिपोर्ट के अनुसार, इमाम ने स्वीकार किया कि वे शब्दों का बेहतर चुनाव कर सकते थे. उन्होंने कहा, “इसलिए मैं ‘काटने’ (कट) शब्द के बजाय ‘अवरुद्ध’ (ब्लॉक) शब्द का इस्तेमाल कर सकता था क्योंकि संदर्भ में यह स्पष्ट है कि मैं एक अस्थायी रुकावट की बात कर रहा हूँ न कि अलगाव (सेसेशन) या किसी और चीज़ की.” इमाम का तर्क है कि उनका पूरा काम ‘चक्का जाम’ के इर्द-गिर्द था, जो विरोध का एक लोकतांत्रिक तरीका है. वे मानते हैं कि उनके 10 सेकंड के क्लिप को पूरे संदर्भ से काटकर पेश किया गया, जिससे उनके बाकी सभी शब्द अप्रासंगिक हो गए.
उनका कहना है कि उनकी गिरफ्तारी ने उन्हें एक तरह से “बचा” भी लिया. उन्होंने बताया कि यदि वे दंगों से पहले गिरफ्तार नहीं हुए होते, तो पुलिस उन पर दंगों की प्रत्यक्ष साजिश का और भी मजबूत मामला बनाती.
विचारधारा और दृष्टिकोण
इमाम का दृष्टिकोण उनके सह-आरोपी उमर खालिद से भिन्न रहा है. जहाँ खालिद ने अपने विरोध को संविधान की रक्षा के रूप में पेश किया, वहीं इमाम भारत के संस्थानों और वर्तमान संवैधानिक ढांचे के प्रति गहरे संशयवाद (स्केप्टिसिज़्म) से भरे हुए हैं. उनका मानना है कि मौजूदा ढांचा भारतीय मुसलमानों के लिए बुनियादी तौर पर काम नहीं करता.
इमाम खुद को एक सामाजिक वैज्ञानिक के रूप में देखते हैं. वे कहते हैं, “मेरा कार्य अद्वितीय है. मैं ‘निश’ हूँ क्योंकि मैं निश होना चाहता हूँ. मैं निश हूँ क्योंकि मैं कुछ ऐसा कर रहा हूँ, क्योंकि हम शून्य से कुछ शुरू कर रहे हैं.” वे एक ऐसा ‘वेंगार्ड’ (अग्रणी समूह) बनाना चाहते हैं जो विभाजन के इतिहास और मुसलमानों की स्थिति पर एक नया विमर्श तैयार करे.
अपनी कैद के दौरान, इमाम ने महसूस किया कि शिक्षित और उदारवादी बुद्धिजीवी वर्ग ने उन्हें “मजधार में छोड़ दिया” और उन्हें आंदोलन के लिए हानिकारक बताया. हालांकि, उन्हें अपने गैर-मुस्लिम दोस्तों और साधारण जनता से समर्थन मिलता रहा. उनके कानूनी खर्चों में उनके आईआईटी के सहपाठियों ने मदद की, जिससे उन्हें यह विश्वास हुआ कि वे अकेले नहीं हैं.
उनका मानना है कि धर्मनिरपेक्षता की पुरानी बातें अब बेअसर हो चुकी हैं. वे कहते हैं, “हमें धर्मनिरपेक्षता के बारे में उस पूरी बकवास को दोहराने की ज़रूरत नहीं है जो हमारे लिए पुरानी और खत्म हो चुकी है. हमें एक नए दृष्टिकोण से शुरुआत करनी होगी.”
भविष्य की राह
छह साल जेल में बिताने के बावजूद, इमाम के इरादे कमजोर नहीं पड़े हैं. वे आने वाला समय जेल में पढ़ने और लिखने में बिताना चाहते हैं. जब उनसे पूछा गया कि यदि वे कभी बरी नहीं हुए तो क्या होगा, तो उनका उत्तर शांत था: “यदि मुझे जेल में कितना भी समय बिताने की सजा सुनाई जाती है, तो मैं वह समय जेल में बिताऊंगा. मैं यही कर सकता हूँ. मैं उसके लिए तैयार हूँ.”
बेतवा शर्मा की यह रिपोर्ट शरजील इमाम को न केवल एक अभियुक्त के रूप में, बल्कि एक ऐसे विचारक के रूप में भी प्रस्तुत करती है जो अपनी वैचारिक स्पष्टता के लिए भारी कीमत चुकाने को तैयार है. मामला अभी भी “बड़ी साजिश” के मुकदमे के अधीन है, लेकिन इमाम का यह सवाल कि “जुर्म कहाँ है?” भारतीय न्याय व्यवस्था और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं पर एक बड़ा प्रश्न चिह्न लगाता है.
बेतवा शर्मा ‘आर्टिकल 14’ की मैनेजिंग एडिटर हैं. पूरी रिपोर्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है.
मुनाफ़ा बढ़ रहा है, फिर भी निवेश से क्यों बच रहीं भारत की बड़ी कंपनियाँ?
मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंथा नागेश्वरन ने हाल ही में कहा कि महामारी के बाद बीएसई 500 और एनएसई 500 कंपनियों के मुनाफ़े में हर साल 30% से अधिक की वृद्धि हुई है. इसके बावजूद निजी क्षेत्र का निवेश उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ा. बड़ी कंपनियाँ नई फैक्ट्रियों और वास्तविक परिसंपत्तियों में निवेश करने के बजाय नकद मुनाफ़ा जमा कर रही हैं.
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत को लंबे समय से दुनिया के सबसे बड़े “उपभोक्ता बाज़ार” के रूप में पेश किया जाता रहा है. निवेशकों और कॉरपोरेट जगत का दावा रहा है कि भारत में बड़ी आबादी भविष्य में भारी उपभोग करेगी. लेकिन ज़मीनी आर्थिक संकेतक इस कहानी को पूरी तरह सही साबित नहीं करते.
दोपहिया वाहनों की बिक्री कई वर्षों तक सुस्त रही और 2018-19 के स्तर को केवल 2025-26 में पार कर सकी. छोटी कारों की बिक्री भी लंबे समय तक कमजोर रही. भारतीय रेलवे का गैर-उपनगरीय यात्री यातायात 2012-13 के बाद अपने पुराने स्तर तक नहीं पहुंच पाया. मोबाइल टेली-डेंसिटी भी वर्षों से स्थिर बनी हुई है. ये संकेत बताते हैं कि आम लोगों की उपभोग क्षमता उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ रही जितना दावा किया जाता है.
सरकार द्वारा जारी नई जीडीपी श्रृंखला ने भी इस धारणा को कमजोर किया है. नई श्रृंखला के अनुसार निजी उपभोग व्यय के आंकड़े पहले की तुलना में लगभग 10-11% कम निकले हैं. भारत की अर्थव्यवस्था में निजी उपभोग की हिस्सेदारी भी घटकर लगभग 56-57% रह गई है, जबकि पहले इसे 60% से अधिक माना जाता था. इसका अर्थ यह है कि भारत का वास्तविक उपभोक्ता बाज़ार अनुमान से छोटा हो सकता है.
जब कंपनियों को भविष्य में मांग बढ़ने का भरोसा नहीं होता, तो वे बड़े निवेश से बचती हैं. भारत की विनिर्माण कंपनियों की क्षमता उपयोग दर कई वर्षों से 74-75% के आसपास बनी हुई है. यानी मौजूदा क्षमता का ही पूरा उपयोग नहीं हो रहा, इसलिए नई क्षमता बनाने की जल्दी नहीं दिखती.
एक दूसरी बड़ी समस्या चीन पर बढ़ती निर्भरता है. 2025-26 में भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 112 अरब डॉलर से अधिक था. इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और रसायन जैसे क्षेत्रों में भारत बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है. इससे संकेत मिलता है कि कई भारतीय कंपनियों को देश में विनिर्माण क्षमता विकसित करने की तुलना में चीन से आयात करना अधिक सुविधाजनक लगता है.
आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय कॉरपोरेट निवेश कम आर एंड डी, कम जोखिम और तेज़ रिटर्न वाले क्षेत्रों पर केंद्रित है. रियल एस्टेट, विनियमित क्षेत्रों और अर्ध-एकाधिकार वाले कारोबारों में निवेश अधिक आकर्षक माना जाता है. विनिर्माण क्षेत्र लंबी अवधि का धैर्य मांगता है, जबकि पूंजी तेज़ मुनाफ़ा चाहती है.
यही कारण है कि मुनाफ़ा बढ़ने के बावजूद भारत की बड़ी कंपनियाँ देश की आर्थिक विकास कहानी पर बड़ा दांव लगाने से अभी भी हिचक रही हैं.
‘बेसिस पॉइंट’ में विवेक कौल की रिपोर्ट है. वे लेखक और आर्थिक टिप्पणीकार हैं. पूरी विस्तृत लेख यहाँ पढ़ी जा सकती है.
बिहार से बंगाल तक: कैसे गढ़े गए चुनावी आख्यान
बिहार और पश्चिम बंगाल के हालिया चुनाव परिणामों ने भारतीय राजनीति में कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं. बिहार में 2025 के चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगियों ने 243 में से 202 सीटें जीत लीं, जबकि पश्चिम बंगाल में 2026 के चुनाव में भाजपा 77 से बढ़कर 207 सीटों तक पहुंच गई. दूसरी तरफ राजद और तृणमूल कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियां बुरी तरह सिमट गईं. इन नतीजों ने विपक्षी दलों के साथ-साथ राजनीतिक पर्यवेक्षकों को भी चौंका दिया.
भाजपा समर्थक इन जीतों को सत्ता विरोधी माहौल, खराब प्रशासन और विपक्ष की कमजोरी का परिणाम बता रहे हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या बिहार में लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली एनडीए सरकार के खिलाफ कोई नाराजगी नहीं थी. क्या सिर्फ पांच साल में ऐसा बड़ा बदलाव हुआ कि भाजपा-जदयू गठबंधन 122 से सीधे 202 सीटों तक पहुंच गया.
दो राज्य और दो तरीके
भाजपा अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग रणनीतियों के जरिए समान राजनीतिक परिणाम हासिल करती है. बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर कई अनियमितताओं की चर्चा हुई. सीमांचल क्षेत्र में “घुसपैठियों” का मुद्दा उठाकर हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण को हवा दी गई. हालांकि एसआईआर के आंकड़ों में ऐसे घुसपैठियों का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला, लेकिन यह नैरेटिव चुनावी माहौल बनाने में सफल रहा.
इसके अलावा चुनाव से पहले करोड़ों महिलाओं के खातों में नकद राशि ट्रांसफर की गई. प्रवासी मजदूरों को त्योहारों के दौरान घर लाने और आर्थिक सहायता देने जैसी योजनाओं ने भी चुनावी असर डाला. विपक्ष ने इसे मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश बताया, लेकिन चुनाव आयोग ने इसमें कोई गड़बड़ी नहीं मानी.
पश्चिम बंगाल में भाजपा के पास बिहार जैसी सरकारी मशीनरी का सीधा नियंत्रण नहीं था. इसलिए वहां मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे. आरोप लगे कि लाखों मतदाताओं के नाम हटाए गए और नए नाम जोड़े गए. विपक्ष का दावा था कि यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रही और इससे चुनाव परिणाम प्रभावित हुए.
लेख यह भी बताता है कि भाजपा केवल चुनाव नहीं जीतती, बल्कि जीत के बाद नैरेटिव भी बदल देती है. बिहार में “जंगल राज” और “वंशवाद” के खिलाफ अभियान चलाया गया, लेकिन बाद में उन्हीं नेताओं को “कानून व्यवस्था सुधारने वाला” चेहरा बनाकर पेश किया गया जिन पर पहले गंभीर आरोप लग चुके थे. बंगाल में भी भाजपा ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार और कुप्रशासन का नैरेटिव मजबूत करने में लगी हुई है.
विपक्ष की रणनीति में दरारें
लेखक के अनुसार विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी वैचाकरण और रिक अस्पष्टता और कमजोर प्रतिरोध है. बंगाल में भाजपा नेताओं ने खुले तौर पर सांप्रदायिक बयान दिए, लेकिन विपक्ष उस नैरेटिव का प्रभावी जवाब नहीं दे पाया. इससे हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीमजबूत हुआ.
इसी तरह बिहार में जदयू ने सीएए जैसे मुद्दों पर भाजपा का साथ दिया. इससे हिंदुत्व राजनीति को और वैधता मिली. लेखक का मानना है कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों की चुप्पी और कई मुद्दों पर उनका रणनीतिक समझौता भाजपा को अपने नैरेटिव को सामान्य बनाने में मदद करता रहा है.
भारतीय लोकतंत्र में अब चुनाव केवल वोटों का खेल नहीं रह गया है. नैरेटिव, संस्थाओं पर नियंत्रण, मीडिया की भूमिका और प्रशासनिक प्रभाव चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं. अगर विपक्ष इन चुनौतियों का वैचारिक और संगठनात्मक जवाब नहीं देता, तो आने वाले समय में उसके सामने और बड़ी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं.
‘द वायर’ में नलिन वर्मा की रिपोर्ट है. वे पत्रकार, लेखक और शिक्षाविद हैं. विस्तृत रिपोर्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है.
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