06/05/2026: टीवीके-कांग्रेस से भाजपा असहज | मुस्लिम प्रतिनिधित्व | बंगाल ‘पुश-इन’ | बंगाल में बुलडोजर | हिंसा की आग | भाजपा मिशन पंजाब | चुनावी साख | ‘कॉरपोरेट जिहाद’
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
करुणानिधि के पीछे खड़े युवा विजय की पुरानी फोटो: ‘कलैग्नार ने सपने में भी नहीं सोचा होगा’
संसद द्वारा कानून बनाने तक ही सीईसी-ईसी नियुक्तियों में सीजेआई की भूमिका तय थी: सुप्रीम कोर्ट
डेटा से पता चलता है कि ‘एसआईआर’ ने बंगाल जीतने में भाजपा की मदद की
टीवीके को कांग्रेस के समर्थन से भाजपा असहज, एआईडीएमके पर विभाजन का खतरा
यूपी की ‘एक जिला, एक व्यंजन’ सूची में 208 व्यंजनों की पहचान, एक भी मांसाहार नहीं; ‘गलौटी कबाब’ और ‘मुरादाबादी बिरयानी’ नदारद
राज्यों में भाजपा के विस्तार के साथ, देशभर में मुस्लिम विधायकों की संख्या में भारी गिरावट
बंगाल में भाजपा की जीत के बाद बांग्लादेशी विदेश मंत्री ने बंगाली भाषी मुसलमानों के ‘पुश-इन’ के खिलाफ चेताया
कोलकाता में बुलडोजर कार्रवाई से तनाव बढ़ा; उपद्रवियों के हाथ में भाजपा का झंडा और ‘जय श्री राम’ के नारे
बंगाल में चुनाव के बाद हिंसा में 4 की मौत; भीड़ ने कोलकाता में टीएमसी के दफ़्तर को बुलडोज़र से गिराया
तमिलनाडु: कांग्रेस ने ‘सांप्रदायिक ताकतों को गठबंधन से बाहर रखने’ की शर्त पर टीवीके को समर्थन दिया
पंजाब को लेकर भी भाजपा के अरमान जागे
क्या खतरे में है भारत की चुनावी निष्पक्षता?
“कॉरपोरेट जिहाद” का नैरेटिव: नासिक टीसीएस मामले की सच्चाई और और पुलिसिया कार्रवाई पर सवाल
बंगाल में सुवेन्दु अधिकारी के पीए की हत्या, चुनाव के बाद हिंसा में 4 की मौत; भीड़ ने कोलकाता में टीएमसी के दफ़्तर को बुलडोज़र से गिराया
टीएमसी के आसनसोल दफ़्तर में मंगलवार को आगजनी के बाद की फ़ोटो
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में खबर है कि बुधवार (6 मई 2026) रात भाजपा नेता सुवेन्दु अधिकारी के पीए (निजी सहायक) चंद्रनाथ रथ की गोली मारकर हत्या कर दी गई. रथ जब बारासात स्थित अपने घर लौट रहे थे, तब दोहरिया मध्यमग्राम में उन्हें गोली मारी गई. उन्हें तुरंत एक निजी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ पहुँचने पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. एक प्रत्यक्षदर्शी सुकुमार दास ने मीडिया को बताया, “हम खड़े थे कि अचानक एक कार पर गोलियाँ चलने की आवाज़ सुनी. जब हम मौके पर पहुँचे, तो हमने दो लोगों को बाइक पर तेजी से भागते हुए देखा.”
‘द टेलीग्राफ’ में अभिजीत चटर्जी और शुभाशीष चौधुरी की रिपोर्ट है कि सोमवार को विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के कुछ ही घंटों के भीतर पूरे बंगाल में भड़की चुनावी हिंसा में कम से कम तीन राजनीतिक कार्यकर्ताओं की कथित तौर पर हत्या कर दी गई और कई अन्य घायल हो गए. यह हिंसा भाजपा नेतृत्व द्वारा तनावपूर्ण माहौल में शांति बनाए रखने की बार-बार की गई अपीलों के बावजूद हुई. कोलकाता के न्यू मार्केट में मंगलवार रात भीड़ ने टीएमसी के पार्टी ऑफिस को बुलडोजर से गिरा दिया. उपद्रवियों ने आसपास की दुकानों को भी नुकसान पहुंचाया. टीएमसी ने घटना का वीडियो शेयर करते हुए ‘एक्स’ पर लिखा- भाजपा द्वारा वादा किया गया “पोरिबोर्तन” (परिवर्तन) बुलडोजर पर सवार होकर आया है. भाजपा की प्रचंड जीत ने जमीनी स्तर पर एक ‘चेन रिएक्शन’ शुरू कर दिया है. उत्साहित भाजपा समर्थकों की तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के साथ झड़प हुई, प्रतिद्वंद्वियों पर हमले किए गए, तृणमूल कार्यालयों में तोड़फोड़ की गई, नगर निकायों के परिसरों में ताले लगा दिए गए और कई मामलों में क्षेत्रीय वर्चस्व दिखाने के लिए भाजपा के झंडे फहराए गए.
हावड़ा के उदयनारायणपुर के पास देबीपुर में, सोमवार रात भाजपा कार्यकर्ता जादव बार (45) की कथित तौर पर पीट-पीटकर हत्या कर दी गई. स्थानीय भाजपा नेताओं का दावा है कि बार को विधानसभा चुनाव के दौरान उनकी सक्रिय भूमिका के लिए निशाना बनाया गया. उत्तर 24-परगना के न्यू टाउन में, भाजपा कार्यकर्ता मधु मोंडल की उनके प्रतिद्वंद्वी द्वारा कथित रूप से हत्या कर दी गई. बीरभूम के नानूर में मंगलवार को कथित भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा एक तृणमूल समर्थक आबीर शेख की हत्या कर दी गई. भांगड़ में भी हिंसा भड़क उठी, जहाँ नौशाद सिद्दीकी की जीत के बाद इंडियन सेकुलर फ्रंट (आईएसएफ) के कार्यकर्ताओं द्वारा तृणमूल समर्थकों के घरों में कथित तौर पर तोड़फोड़ की गई. बहरामपुर के चुआनपुर-कदमतला बततला इलाके में, जब भाजपा की विजय रैली वहां से गुजरी, तो तृणमूल नेता बिप्लव कुंडू के आवास पर कथित तौर पर तोड़फोड़ की गई और उनकी मोटरसाइकिल को भी क्षतिग्रस्त कर दिया गया.
पश्चिम बर्द्धमान, पुरुलिया और बांकुरा से भाजपा समर्थकों द्वारा तृणमूल कार्यालयों पर कब्जा करने की खबरें मिलीं. दुर्गापुर पूर्व से नवनिर्वाचित विधायक चंद्रशेखर बनर्जी और दुर्गापुर पश्चिम से लखन घोरुई के नेतृत्व में भाजपा कार्यकर्ताओं ने प्रशासकों के बोर्ड द्वारा संचालित दुर्गापुर नगर निगम पर वस्तुतः नियंत्रण कर लिया. तृणमूल कार्यकर्ताओं ने शिकायत की कि कई जगहों पर भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनकी पिटाई की. पुरुलिया के एक तृणमूल कांग्रेस नेता ने कहा, “हम अपने घरों से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं क्योंकि भाजपा कार्यकर्ता ‘चोर-चोर’ के नारे लगाकर हमें परेशान कर रहे हैं. हम डर के साये में जी रहे हैं.”
कोलकाता में बुलडोजर कार्रवाई से तनाव बढ़ा; उपद्रवियों के हाथ में भाजपा का झंडा और ‘जय श्री राम’ के नारे
मंगलवार (5 मई, 2026) की शाम कोलकाता के प्रतिष्ठित न्यू मार्केट में बुलडोजरों द्वारा कई ढांचों को ढहाए जाने के बाद तनाव बढ़ गया.
‘द हिंदू’ में श्रबना चटर्जी की रिपोर्ट है कि मंगलवार (5 मई, 2026) की शाम कोलकाता के प्रतिष्ठित न्यू मार्केट इलाके में बुलडोजर द्वारा कई ढांचों को ढहाए जाने के बाद तनाव बढ़ गया. इसी तरह के दृश्य मुर्शिदाबाद के जियागंज में भी देखे गए, जहाँ एक भीड़ ने लेनिन की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर दिया. तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं पर लक्षित हमले का आरोप लगाया है.
टीएमसी के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा करते हुए लिखा, “मध्य कोलकाता में न्यू मार्केट के पास. पुलिस की अनुमति के साथ. जीत के जश्न के हिस्से के रूप में, मीट की दुकानों को गिराने के लिए बुलडोजर लाया गया. चारों ओर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल तैनात है. यही आपके लिए भाजपा है.” इस घटना के बाद से बुलडोजर कार्रवाई के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए हैं और नेटिज़न्स इसकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं. प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, बुलडोजर कार्रवाई का मुख्य लक्ष्य टीएमसी के न्यू मार्केट यूनियन कार्यालय को गिराना था, जिसे इस घटना में ध्वस्त कर दिया गया.
कई वीडियो में भाजपा का झंडा लिए लोग बुलडोजर के ऊपर सवार होकर “जय श्री राम” के नारे लगाते और ढांचों को ढहाने का आव्हान करते देखे जा सकते हैं. वीडियो में पुलिस और केंद्रीय बलों के कई जवान भी निगरानी रखते हुए दिखाई दे रहे हैं.
ब्रिटिश काल के न्यू मार्केट क्षेत्र में घबराए हुए व्यापारियों ने अपनी दुकानें बंद कर दीं. यह शहर के सबसे बड़े बाजारों में से एक है, जहाँ विभिन्न संस्कृतियों और धार्मिक पहचान वाले व्यापारियों की पीढ़ियों से दुकानें हैं.
टीएमसी ने सोशल मीडिया पर इस कृत्य की तीखी आलोचना की और कहा, “चुनाव से पहले: भय बाहर, भरोसा अंदर. चुनाव के बाद: भरोसा बाहर, बुलडोजर अंदर. भाजपा का ‘पोरिबोर्तन’ आ गया है, और यह बुलडोजर के साथ आया है.”
हालांकि, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने 4 मई से अपने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ कई संदेश साझा किए हैं, जिसमें उन्होंने किसी भी भाजपा कार्यकर्ता या समर्थक को तोड़फोड़ या सत्ता के दुरुपयोग में शामिल न होने के लिए कहा है. उन्होंने कहा कि पार्टी चुनाव के बाद की किसी भी हिंसा को स्वीकार नहीं करेगी. भट्टाचार्य ने कहा, “अगर भाजपा के झंडों के साथ कोई राजनीतिक हिंसा होती है और किसी भी टीएमसी कार्यालय पर हमला किया जाता है, तो हम उन्हें पार्टी से निकाल देंगे.”
मुर्शिदाबाद के जियागंज इलाके से एक और वीडियो सामने आया है, जिसमें भाजपा समर्थकों के एक समूह को कथित तौर पर लेनिन की प्रतिमा को खंडित करते देखा गया. टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने इस घटना की आलोचना करते हुए कहा, “कल जियागंज में भाजपा कार्यकर्ताओं ने लेनिन की दशकों पुरानी प्रतिमा को यह दावा करते हुए तोड़कर जमीन पर गिरा दिया कि वे इसे शिवाजी की प्रतिमा से बदल देंगे. परिवर्तन का आनंद लीजिए.”
तोड़फोड़ के ये वीडियो भाजपा द्वारा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत से जीत हासिल करने और राज्य में 15 साल पुराने टीएमसी शासन को उखाड़ फेंकने के ठीक एक दिन बाद आए हैं.
डेटा से पता चलता है कि ‘एसआईआर’ ने बंगाल जीतने में भाजपा की मदद की
‘द वायर’ में अपर्णा भट्टाचार्य की विस्तृत रिपोर्ट बताती है कि पश्चिम बंगाल की 294 सीटों में से 150 सीटों पर, एसआईआर के दौरान कुल हटाए गए नाम जीत के अंतर से अधिक थे, और भाजपा ने इनमें से 99 सीटें जीतीं. 2021 में, उसने इनमें से केवल 19 सीटें जीती थीं.
कड़े मुकाबले वाले क्षेत्रों में चुनावी नतीजे अक्सर बहुत मामूली अंतर से तय होते हैं, जहाँ हर एक वोट कीमती होता है. तमिलनाडु में, इस बार एक सीट का फैसला महज एक वोट से हुआ और राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में संसदीय चुनावों में भी सांसद मात्र एक वोट के अंतर से निर्वाचित हुए हैं. हर वोट मायने रखता है.
पश्चिम बंगाल में ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ या एसआईआर का पैमाना चौंकाने वाला था. मतदाता सूची से भारी-भरकम 91 लाख नाम हटा दिए गए. इसमें ड्राफ्ट रिवीजन के दौरान एएसडीडी (अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत, डुप्लीकेट) श्रेणियों के तहत 58 लाख नियमित विलोपन शामिल थे, साथ ही ‘विचाराधीन’ (अंडर एडजुडिकेशन) मामलों की न्यायिक समीक्षा के बाद अन्य 27 लाख मतदाताओं को अयोग्य घोषित कर दिया गया. जब इसे 28 फरवरी, 2026 को प्रकाशित अंतिम सूची में जोड़े गए 1.88 लाख नए मतदाताओं के साथ जोड़ा जाता है, तो आंकड़े इस संशोधन प्रक्रिया द्वारा निभाई गई गणितीय रूप से निर्णायक भूमिका की ओर इशारा करते हैं.
यह प्रक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि शीर्ष अदालत के समक्ष एसआईआर की सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा था, “यदि 10% मतदाता वोट नहीं देते हैं और जीत का अंतर 10% से अधिक है... तो क्या होगा? मान लीजिए कि अंतर 2% है और मैप किए गए 15% मतदाता वोट नहीं दे सके, तो शायद... हम कोई राय व्यक्त नहीं कर रहे हैं, लेकिन हमें निश्चित रूप से इस पर विचार करना होगा.”
निर्वाचन क्षेत्र स्तर के आंकड़े बताते हैं कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर केवल एक नियमित मतदाता सूची की सफाई की प्रक्रिया नहीं थी. इसका राजनीतिक महत्व इस तथ्य से आता है कि बड़ी संख्या में सीटों पर, हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से अधिक थी.
यह साबित नहीं करता कि हर ऐसा परिणाम एसआईआर के कारण बदल गया, लेकिन यह दर्शाता है कि मतदाता सूची संशोधन सीधे चुनावी प्रतिस्पर्धा के दायरे में शामिल हो गया.
150 सीटों पर विलोपन जीत के अंतर से बड़े थे
राजनीतिक परिणाम को निर्धारित करने में एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) के निर्णायक होने का सबसे मजबूत संकेतक उन सीटों में मिलता है, जहाँ जीत का अंतर कुल विलोपन (यानी एएसडीडी और अंडर एडजुडिकेशन को मिलाकर हटाए गए नाम) से कम था. जब नियमित एएसडीडी विलोपन और अंडर एडजुडिकेशन (विचाराधीन) मतदाताओं की संख्या को जोड़ा, तो हटाए गए मतदाताओं की कुल संख्या 150 निर्वाचन क्षेत्रों में अंतिम जीत के अंतर से अधिक निकली. पश्चिम बंगाल में कुल 294 सीटें हैं, जिसका अर्थ है कि ऐसी सीटों की संख्या विधानसभा में आधे से भी अधिक है. इन सीटों के बीच, भारतीय जनता पार्टी को स्पष्ट लाभ मिलता हुआ देखा जा सकता है, जिसने 100 सीटों पर बढ़त बनाई, जबकि तृणमूल कांग्रेस 48 और कांग्रेस दो सीटों पर आगे रही.
2021 में, टीएमसी ने इनमें से 131 सीटें जीती थीं, और भाजपा ने केवल 19.
कोलकाता की सीमा से लगे दो जिलों पर मतदाता सूची में हुई इस कटौती की सबसे भारी मार पड़ी, जो अत्यधिक प्रभावित सीटों का लगभग 30% हिस्सा थे. उत्तर 24 परगना में, टीएमसी ने 2021 में प्रभावित 26 सीटों में से 23 जीतकर दबदबा बनाया था, लेकिन 2026 में परिदृश्य पूरी तरह से पलट गया क्योंकि भाजपा ने उनमें से 21 सीटों पर कब्जा कर लिया. इसी तरह, दक्षिण 24 परगना में, टीएमसी ने पहले इन सभी 19 सीटों पर क्लीन स्वीप किया था, लेकिन एसआईआर के बाद भाजपा ने गहरी पैठ बनाई और उनमें से 10 सीटें पलट दीं.
इन मुख्य केंद्रों (एपीसेंटर्स) के परे, मतदाता सूची में हुई शुद्ध कटौती ने मुस्लिम बहुल और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी जिलों को भारी रूप से प्रभावित किया. मुर्शिदाबाद में, प्रभावित 15 सीटों में से टीएमसी की 2021 की 13 सीटों की संख्या घटकर मात्र 6 रह गई, जिसमें भाजपा ने 7 और कांग्रेस ने 2 सीटें हासिल कीं. पूर्व बर्द्धमान में, टीएमसी ने अपनी पहले की 13 सीटों में से 11 भाजपा के हाथों गँवा दीं. यही रुझान हावड़ा और हुगली में भी जारी रहा; इन दोनों जिलों की कुल 22 प्रभावित सीटों पर, जो सभी 2021 में टीएमसी ने जीती थीं, भाजपा हालिया चुनावों में 14 सीटों पर कब्जा करने में सफल रही.
शहरी केंद्र भी इस व्यापक बदलाव के पैटर्न से अछूते नहीं रहे.
पश्चिम बर्द्धमान में, भाजपा ने उन सभी 8 सीटों पर जीत हासिल की जहाँ मतदाता सूची में भारी कटौती हुई थी, जिनमें से 5 सीटें पहले टीएमसी के पास थीं. यहाँ तक कि राजधानी के जिलों कोलकाता उत्तर और दक्षिण में भी, भाजपा प्रभावित 11 सीटों में से 6 को टीएमसी से छीनने में सफल रही (जबकि 2021 में यहाँ टीएमसी ने क्लीन स्वीप किया था), जिसमें भवानीपुर भी शामिल है, जहाँ निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सुवेन्दु अधिकारी के हाथों हार का सामना करना पड़ा. अंततः, भौगोलिक वितरण स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि मतदाता सूची में कटौती बेतरतीब ढंग से नहीं फैली थी. इसने पिछले चुनाव के टीएमसी के सबसे मजबूत किलों पर जबरदस्त प्रहार किया, जिससे भाजपा इन 150 अत्यधिक प्रभावित चुनावी मैदानों में से 100 को सफलतापूर्वक पलटने में सक्षम रही.
सतगाछिया में, भाजपा उम्मीदवार की जीत का अंतर मात्र 401 वोट था. हालाँकि, यहाँ विलोपन बहुत बड़े पैमाने पर हुए थे, जिसमें 17,669 एएसडीडी विलोपन और 8,785 अंडर एडजुडिकेशन (विचाराधीन) मतदाता अयोग्य पाए गए थे – यानी कुल मिलाकर 26,000 से अधिक विलोपन. इसी तरह, राजराहाट न्यू टाउन में, 316 वोटों की जीत का अंतर कुल 63,000 से अधिक विलोपन के सामने बहुत छोटा (नगण्य) था. रैना में, भाजपा 834 वोटों से आगे रही, जबकि कुल विलोपन की संख्या 23,000 को पार कर गई थी. अंग्रेजी में विस्तृत रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है.
पराकला प्रभाकर : ममता को चुनाव अस्वीकार्य है, तो नतीज़ों का बहिष्कार करना चाहिए
इन विधानसभा चुनावों के बाद ही लोग यह सोचने लगे हैं कि चुनाव और अदालतें कोई उपाय नहीं हैं. भारत का विचार ख़तरे में है. यह सब चुनावी अंकगणित और हिसाब-किताब बनकर रह गया है.
मैं काफ़ी समय से यह तर्क देता रहा हूँ कि समस्त विपक्ष को चुनावों का बहिष्कार करना चाहिए और सभी विधायिकाओं — लोकसभा और राज्य विधानसभाओं — से अपनी सीटें छोड़ देनी चाहिए. भाजपा को एक ग़ैर-क़ानूनी क़ब्ज़ाधारी की तरह दिखाएँ. उसे हमारी जनता और दुनिया की नज़रों में वैधता से वंचित करें.
एक तरफ़ ये विपक्षी दल वोट चोरी का शोर मचाते हैं, लेकिन किसी तरह जीत जाने की अस्पष्ट उम्मीद लेकर चुनाव लड़ते हैं. वे यह समझ नहीं पाते कि पूरा खेल पहले से तय है. वे इसे मानने से इनकार करते हैं. या तो वे भोले हैं, या जब वोट चोरी का नारा लगाते हैं तो वे ईमानदार नहीं होते.
अगर वे वाक़ई मानते हैं कि वोट चोरी और बड़े पैमाने पर लक्षित नाम-कटाई हो रही है, तो फिर वे इन नक़ली चुनावों में भाग क्यों ले रहे हैं और वोट चोरी व नाम-कटाई के आधार पर चुनी गई विधायिकाओं में क्यों बैठे हैं? इससे तो एक चोरी हुए जनादेश को वैधता ही मिलती है, है न?
ममता बनर्जी के रुख़ के बारे में यह कहना ज़रूरी है. अगर वे सच में घोषित जनादेश को अस्वीकार करने को लेकर गंभीर हैं और इस्तीफ़ा देने से मना करती हैं, तो इसका मतलब है कि वे गठित होने वाली विधानसभा को मान्यता नहीं देतीं. यानी वे विदा हो रही विधायिका को अभी भी वैध मान रही हैं. ऐसे में उन्हें यह कहना चाहिए कि उनकी पार्टी के जो लोग इस ग़ैर-क़ानूनी चुनाव में जीते हैं, वे सदन छोड़ दें - और उनसे इस्तीफ़ा दिलवाना चाहिए.
तब उनका रुख़ विश्वसनीय लगेगा.
अगर आप कहें कि ‘मेरी पार्टी के विजेता तो ठीक हैं, लेकिन आपकी पार्टी के विजेता ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से चुने गए हैं’ — तो इससे उनकी प्रतिबद्धता के बारे में क्या कहा जाएगा? अगर उन्होंने यह कहा होता — ‘देखिए, 93 लाख मतदाताओं के नाम कटने और 28 लाख लोगों को वोट देने से वंचित किए जाने के बाद, अगर मैं पूरा चुनाव भी जीत जाती, तो भी चुनाव-प्रक्रिया दूषित थी और मैं इसे वैध नहीं मानती’, तो उसे वास्तविक माना जाता और उनका रुख़ दृढ़ विश्वास से उपजा लगता. अफ़सोस, अब वे इस आरोप के प्रति सुभेद्य हैं कि वे महज़ एक हारी हुई खिलाड़ी की तरह व्यवहार कर रही हैं. यह आरोप निराधार नहीं है.
लेकिन क्या वे हैं? बड़े पैमाने पर नाम-कटाई और ‘अंडर एडज्यूडिकेशन’ श्रेणी के भारी संख्या में मतदाताओं को वोट न डालने देने के बाद, मुझे लगता है कि यह वक़्त है जब सभी विपक्षी दल एक साथ बैठें और गंभीरता से सोचें. बिहार देखिए: दो लड़कों (राहुल गांधी और तेजस्वी यादव) ने वोट अधिकार यात्रा निकाली. उन्होंने आरोप लगाया कि बड़े पैमाने पर मतदाता नाम-कटाई हुई है. तो फिर उन्होंने चुनाव लड़ा ही क्यों? उमड़ती भीड़ देखकर उन्हें लगा कि वे किसी तरह जीत जाएँगे? तो क्या वास्तव में उन्हें मताधिकार से वंचित लोगों की परवाह नहीं थी? अगर वे जीत जाते तो नाम-कटाई और मताधिकार हनन कोई मायने नहीं रखता?
क्या सिर्फ़ उनकी जीत या हार ही मायने रखती है? मताधिकार हनन का मुद्दा तभी उठता है जब विपक्षी दल हारते हैं? वरना कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता? कोई भी सुपात्र जिसका नाम मतदाता सूची से काटा गया हो, उसे हर उस व्यक्ति की चिंता का विषय होना चाहिए जो मतदाता सूची में है. है न? ज़रा याद करें कि सुप्रीम कोर्ट के जज बागची ने क्या कहा था. अगर नाम-कटाई की संख्या जीत के अंतर से अधिक है, तो सुप्रीम कोर्ट को इसकी गंभीरता से जाँच करनी चाहिए. इसका मतलब यह है: मेरा नाम काटा जाना तभी मुद्दा बनता है जब जो लोग काटे नहीं गए, उनकी पसंद से चुने जाने वाले दल/उम्मीदवार की जीत का अंतर मेरे उन कटे हुए भाई-बहनों की संख्या से कम हो!
क्या कोई अदालत इससे ज़्यादा बेतुकी हो सकती है? नतीजों के बाद कोई भी बिहार में मतदाता सूची से काटे गए उन 63 लाख लोगों की बात नहीं करता. चुनाव ख़त्म हो गए और अब वे हम में से किसी के लिए मायने नहीं रखते. कोई पार्टी उनकी परवाह नहीं करती. यही हाल तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी का है. जिन राज्यों में चुनाव नहीं हुए लेकिन विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) हुआ, जैसे उत्तर प्रदेश - जहाँ 2.83 करोड़ नाम काटे गए, उनका क्या? हम परवाह नहीं करते?
वैसे ही हम मणिपुर की परवाह नहीं करते, चाहे पिछले दो साल या उससे अधिक समय से वह जल रहा हो. इन कटे हुए मतदाताओं में और उनमें क्या फ़र्क़ है? क्योंकि वहाँ अभी चुनाव नहीं हैं, इसलिए उनकी कोई बात नहीं करता. कोई राजनीतिक दल नहीं, कोई मीडिया नहीं, यहाँ तक कि तथाकथित स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म भी नहीं. 2.83 करोड़ लोग हमारे लिए तब मायने नहीं रखते जब कोई चुनाव न हो? चुनावों का बहिष्कार करना और विधायिकाओं से इस्तीफ़ा देना, जब तक यह संस्थागत क़ब्ज़ा न टूटे — यह आदर्श लेकिन अव्यावहारिक समाधान लग सकता है.
लेकिन मैं आपको बताता हूँ, वास्तविक जीवन में बहुत कम बार आदर्श और व्यावहारिक अवसर एक साथ आते हैं. यह हमारे राष्ट्र-जीवन में वह क्षण है जो ठीक इसी कन्वर्जेंस (अभिसरण) की माँग करता है. जो आदर्श है वही अब आगे बढ़ने का एकमात्र व्यावहारिक रास्ता है. और जो व्यावहारिक है वही आदर्श है, और कुछ नहीं.
दूसरे शब्दों में, हमारे गणतंत्र के इस मोड़ पर व्यावहारिक ही आदर्श है और आदर्श ही व्यावहारिक है. हमारा गणतंत्र गहरे संकट में है. जानलेवा ख़तरे में है.
अगर आप चाहते हैं कि मैं मानूँ कि ममता बनर्जी एक सच्ची सेनानी हैं, तो वे यह तय करें कि उनके नवनिर्वाचित विधायक उस नई विधायिका में इस्तीफ़ा दे दें या शपथ न लें, जिसकी वैधता पर वे सवाल उठाती हैं. तब मेरे हिसाब से वे विश्वसनीय लगेंगी. वरना वे इस आरोप के प्रति असुरक्षित रहेंगी कि वे महज़ एक हारी हुई खिलाड़ी हैं. अगर कोई यह आरोप लगाए तो मैं भी उनका बचाव नहीं कर सकता.
लेकिन क्या वे हैं? क्या वे यह कर सकती हैं: अपने विधायकों से इस्तीफ़ा दिलाएँ और उस नई विधायिका की वैधता अस्वीकार करें जो इस दिखावटी चुनाव से निकली है?
क्या विपक्ष यह कड़वा घूँट पी सकता है? यह अब सामान्य स्थिति नहीं रही. असाधारण समय असाधारण क़दमों की माँग करता है. अगर राजनीतिक दल यह नहीं कर सकते, यह करने में अक्षम हैं, तो कम से कम वे नागरिक समाज के पीछे खड़े हों जब वह यह क़दम उठाए. यह अब राजनीतिक दलों के बीच का खेल नहीं रहा. दाँव पर गणतंत्र है.
हमारा गणतंत्र. हमने ख़ुद अपने लिए संविधान दिया था. केवल एक शांतिपूर्ण, गाँधीवादी, ज़मीन पर टिका हुआ जन-आंदोलन ही हमारे 1950 के संकल्प को बचा सकता है. उस 1950 के संकल्प में समाहित मूल्य — स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, न्याय, धर्मनिरपेक्षता — केवल उसी से बचाए जा सकते हैं.
वरना नहीं. क्या हम इस चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं?
हम में से हर एक को तय करना होगा. और सामूहिक कार्रवाई के लिए तैयार होना होगा. समन्वित कार्रवाई. हर दूसरे एजेंडे को एक तरफ़ रखकर गणतंत्र और भारत के विचार को बचाने के लिए काम करना होगा. यह ध्यान रखें कि इस भूमि पर रहने वाला हर इंसान इस देश का मालिक है. यह किसी एक समुदाय, धर्म, जाति, पंथ, क्षेत्र, रंग, खान-पान की आदतों और परंपराओं की संपत्ति नहीं है. यह सबकी है. जो ताक़तें भारत के इस विचार से असहमत हैं, उन्होंने इस पर हमला किया और इसे कमज़ोर करने के लिए सौ साल काम किया. अब हम इसे बचाने के लिए कुछ महीने काम करें.
भारत के मूलभूत चरित्र की रक्षा करने का कोई विकल्प नहीं है — एक ऐसा देश, एक ऐसी भूमि, एक ऐसा स्थान जो सबके लिए है.
पराकला प्रभाकर भारतीय अर्थशास्त्री, लेखक और राजनीतिक टीकाकार हैं. वे तेलुगु साहित्य और राजनीतिक विमर्श में भी सक्रिय भागीदारी रखते हैं. आंध्र प्रदेश में 2014 से 2018 तक चंद्रबाबू नायडू सरकार के दौरान वे संचार सलाहकार के पद पर कार्यरत रहे और उन्हें केबिनेट मंत्री का दर्जा हासिल था. वे केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति हैं, किंतु वैचारिक रूप से वे सत्तारूढ़ भाजपा सरकार के मुखर आलोचक हैं और भारतीय लोकतंत्र, संविधान तथा चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर बेबाक़ी से लिखते और बोलते हैं.
तमिलनाडु: कांग्रेस ने ‘सांप्रदायिक ताकतों को गठबंधन से बाहर रखने’ की शर्त पर टीवीके को समर्थन दिया
कांग्रेस पार्टी ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि उसके निर्वाचित प्रतिनिधि तमिलनाडु में अगली सरकार बनाने के लिए सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेट्री कझगम (टीवीके) का समर्थन करेंगे. पार्टी ने कहा कि इस गठबंधन की नींव आपसी सम्मान और राज्य सरकार में उचित “भागीदारी” पर रखी गई है.
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के तमिलनाडु प्रभारी, गिरीश चोडनकर द्वारा जारी एक बयान में कहा गया कि यह निर्णय विजय द्वारा तमिलनाडु में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से औपचारिक रूप से समर्थन मांगे जाने के बाद लिया गया है. ‘द हिंदू ब्यूरो’ के अनुसार, बयान में आगे कहा गया, “हमारा समर्थन इस शर्त पर होगा कि टीवीके इस गठबंधन से ऐसी किसी भी सांप्रदायिक शक्ति को दूर रखेगी जो भारत के संविधान में विश्वास नहीं रखती है.” उल्लेखनीय है कि राज्य की कुल 234 सीटों में से टीवीके को 108 सीटें हासिल हुई हैं. सरकार बनाने के लिए उसको 10 और विधायक चाहिए होंगे, जिनमें से पाँच उसे कांग्रेस के समर्थन से प्राप्त हो जाएंगे.
टीवीके को कांग्रेस के समर्थन से भाजपा असहज, एआईडीएमके पर विभाजन का खतरा
एआईडीएमके (अन्नाद्रमुक), जे. जयललिता के निधन के बाद से अपने सबसे गंभीर आंतरिक विखंडन की ओर बढ़ती दिख रही है. पार्टी के भीतर इस बात को लेकर गहरे मतभेद उभर आए हैं कि क्या विजय की ‘तमिलगा वेट्री कझगम’ (टीवीके) को गठबंधन सरकार बनाने में समर्थन दिया जाए या नहीं. सूत्रों का कहना है कि इस कदम को भाजपा के उस दृढ़ संकल्प से भी दिशा मिल रही है, जिसके तहत वह कांग्रेस को तमिलनाडु सरकार में प्रवेश करने से रोकना चाहती है. एआईडीएमके के वरिष्ठ सूत्रों ने पुष्टि की है कि नई दिल्ली में भाजपा आलाकमान चेन्नई में कांग्रेस समर्थित टीवीके सरकार बनने की संभावना से असहज है, खासकर पड़ोसी राज्य केरल में कांग्रेस के पुनरुत्थान के बाद.
इधर, टीवीके प्रमुख से मुलाकात के बाद कांग्रेस नेता प्रवीण चक्रवर्ती ने कहा, “विजय ने राहुल गांधी को शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है... जैसे ही राज्यपाल की अनुमति मिल जाएगी और शपथ ग्रहण का समय तय हो जाएगा, राहुल गांधी आएंगे.” विजय ने बुधवार को राजभवन में राज्यपाल से मुलाकात कर सरकार बनाने का दावा पेश किया.
लेकिन कांग्रेस के टीवीके को समर्थन के फैसले से एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली द्रमुक (डीएमके) नाराज़ हो गई है. उसने अपने ‘इंडिया’ गठबंधन के सहयोगी दल कांग्रेस पर तीखा हमला करते हुए उसे “पीठ में छुरा घोंपने वाला” कहा है. द्रमुक प्रवक्ता सरवनन अन्नादुरई ने कहा कि उनकी पार्टी तमिलनाडु में सरकार बनाने के लिए विजय की टीवीके को कांग्रेस द्वारा दिए गए समर्थन का अनुमोदन नहीं करती है.
आरजीवी ने खोजी करुणानिधि के पीछे खड़े युवा विजय की पुरानी फोटो: ‘कलैग्नार ने सपने में भी नहीं सोचा होगा’
मंगलवार की सुबह, तमिलनाडु चुनाव परिणामों द्वारा राज्य की राजनीतिक व्यवस्था को पूरी तरह से उलट देने (विजय की ‘तमिलगा वेट्री कझगम’ की जीत) के अगले दिन, फिल्म निर्माता राम गोपाल वर्मा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अभिनेता विजय की एक पुरानी और अनदेखी तस्वीर साझा की.
तस्वीर में एम. करुणानिधि किसी फिल्मी समारोह में नजर आ रहे हैं. वे फ्रेम के अगले हिस्से में हैं, जैसा कि वे आमतौर पर रहते थे. उनके ठीक पीछे, कहीं भीड़ में एक युवा विजय खड़े हैं जिन पर मुश्किल से नजर जाती है. राम गोपाल वर्मा (आरजीवी) ने कैप्शन में लिखा: “कलैग्नार ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनके पीछे खड़ा यह बच्चा एक दिन उनकी पार्टी को तबाह कर देगा.”
‘एक्सप्रेस मनोरंजन डेस्क’ के मुताबिक, यह ट्वीट तेजी से वायरल हो गया और इसकी वजह समझना मुश्किल नहीं था. विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेट्री कझगम’ ने सोमवार को अपने पहले ही चुनाव में 108 सीटें जीतकर तमिलनाडु में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी. करुणानिधि की पार्टी द्रमुक (डीएमके), जिसे उन्होंने लगभग पांच दशकों तक चलाया, 59 सीटों पर सिमट गई. उनके बेटे और निवर्तमान मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन अपनी खुद की सीट हार गए. 1980 के दशक के उत्तरार्ध से तमिलनाडु की राजनीति पर काबिज दो प्रमुख दलों का एकाधिकार खत्म हो गया था, और एक फिल्मी सितारे के नेतृत्व वाली पहली बार चुनाव लड़ रही पार्टी ने इसे खत्म कर दिया था.
द्रमुक (डीएमके) का महत्व
आरजीवी की तस्वीर इतनी प्रभावशाली क्यों थी, इसे समझने के लिए तमिलनाडु के सार्वजनिक जीवन में उस संगठन (द्रमुक) के महत्व को समझना जरूरी है. करुणानिधि ने 1969 में द्रमुक की कमान संभाली थी और अगस्त 2018 में अपने निधन तक इस पद पर रहे. राजनीति में आने से पहले, उन्होंने तमिल फिल्मों के लिए पटकथाएँ लिखी थीं, जिससे उन्हें फिल्म उद्योग और उससे मिलने वाले सांस्कृतिक प्रभाव की गहरी समझ थी. एक राजनेता के रूप में, उन्होंने अलग-अलग दशकों में पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया. उनके नेतृत्व में द्रमुक व्यापक ‘द्रविड़ राजनीतिक आंदोलन’ का अटूट हिस्सा बन गई थी, जिसने 1960 के दशक से ही तमिल पहचान और शासन व्यवस्था को आकार दिया है.
पंजाब को लेकर भी भाजपा के अरमान जागे
द हिंदू में विकास वासुदेव की रिपोर्ट है कि पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी जैसे राज्यों में मिली चुनावी सफलताओं ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के हौसलों को नई उड़ान दी है. भाजपा अब पंजाब को एक ऐसे अगले ‘डोमिनो’ (एक के बाद एक गिरने वाली कड़ी) के रूप में देख रही है, जिसे वह अपने पाले में कर सकती है. इसी रणनीति के तहत पार्टी ने एक बड़ा और साहसिक फैसला लिया है. साल 2027 में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनावों में भाजपा किसी बैसाखी के बिना, यानी अकेले चुनाव लड़ेगी.
पंजाब में भाजपा का अस्तित्व देश की आजादी के समय से ही रहा है. हालांकि, चुनावी आंकड़े बताते हैं कि पार्टी यहाँ लंबे समय तक एक सीमित दायरे में रही. 1992 से पहले, जब भाजपा (पूर्व में भारतीय जनसंघ) अकेले चुनाव लड़ती थी, तब उसका औसत वोट शेयर 6% से 7% के बीच रहता था. 1997 में जब पार्टी ने शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन किया, तो यह वोट शेयर मामूली बढ़त के साथ 8% तक पहुँचा.
दशकों तक भाजपा पंजाब में अकाली दल की ‘जूनियर पार्टनर’ बनकर रही. गठबंधन के तहत अकाली दल 94 सीटों पर चुनाव लड़ता था, जबकि भाजपा के हिस्से मात्र 23 सीटें आती थीं. पार्टी के राज्य संगठन का मानना था कि इस व्यवस्था ने भाजपा की वृद्धि को रोक रखा है. 2020 में कृषि कानूनों के विवाद के कारण जब अकाली दल ने एनडीए से नाता तोड़ा, तो भाजपा को अपनी जमीन तलाशने का मौका मिल गया. इसी साल मार्च में अमित शाह ने मोगा की ‘बदलाव रैली’ में अकेले चुनाव लड़ने का बिगुल फूंककर पार्टी के इरादे साफ कर दिए.
पंजाब का राजनीतिक गणित वर्तमान में काफी अस्थिर है. सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (आप), जो भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई थी, अब आंतरिक कलह से जूझ रही है. अप्रैल में सात राज्यसभा सांसदों के इस्तीफे ने पार्टी की छवि को नुकसान पहुँचाया है. साथ ही, मुख्यमंत्री भगवंत मान पर विधानसभा सत्र के दौरान लगे व्यक्तिगत आरोपों ने विपक्ष को हमला करने का मौका दे दिया है.
दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भी गुटबाजी का शिकार है. पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी द्वारा दलित प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाने और राहुल गांधी द्वारा राज्य इकाई को ‘टीम’ की तरह काम करने की नसीहत देने से यह साफ है कि कांग्रेस के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है. पुराने साथी शिरोमणि अकाली दल की स्थिति भी फिलहाल कमजोर नजर आ रही है.
भाजपा इस खाली होते राजनीतिक स्थान को भरने के लिए ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का सहारा ले रही है. पंजाब की लगभग 32% आबादी अनुसूचित जाति (एससी) है और 25-30% आबादी ओबीसी है. भाजपा अब इन वर्गों के साथ-साथ सिखों के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा सिखों के हित में किए गए कार्यों (जैसे करतारपुर कॉरिडोर और साहिबजादों की शहादत को सम्मान) का प्रचार कर रही है.
वर्तमान स्थितियों को देखते हुए पंजाब का चुनावी मुकाबला बहुकोणीय होने जा रहा है. जहाँ भाजपा नए जोश में है, वहीं आप और कांग्रेस अपनी आंतरिक समस्याओं से लड़ रही हैं. ऐसे में भाजपा का ‘मिशन पंजाब’ कितना सफल होता है, यह तो भविष्य ही बताएगा.
संसद द्वारा कानून बनाने तक ही सीईसी-ईसी नियुक्तियों में सीजेआई की भूमिका तय थी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (6 मई, 2026) को यह व्याख्या दी कि मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की भागीदारी केवल तब तक के लिए थी जब तक कि संसद इस पर कोई कानून नहीं बना लेती.
कृष्णदास राजगोपाल की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत की यह टिप्पणी ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023’ को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं के जवाब में आई. याचिकाकर्ताओं में एनजीओ ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) और कार्यकर्ता जया ठाकुर शामिल हैं. उन्होंने कहा कि 2023 का यह कानून मौजूदा राजनीतिक कार्यपालिका को सीईसी और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर प्रभावी, यदि “अनन्य” नहीं तो, नियंत्रण प्रदान करता है.
2023 का कानून उसी वर्ष मार्च में संविधान पीठ के एक फैसले को निष्प्रभावी करने के उद्देश्य से दिसंबर 2023 में पेश किया गया था. उस फैसले में कहा गया था कि सीईसी और ईसी की नियुक्तियां प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) और भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की समिति की सिफारिश पर की जानी चाहिए.
अदालत ने आदेश दिया था कि उसका निर्णय तब तक प्रभावी रहेगा जब तक कि “संसद संविधान के अनुच्छेद 324(2) के अनुरूप कानून नहीं बना लेती”.
इसके परिणामस्वरूप, सरकार 2023 का अधिनियम लेकर आई, जिसमें समिति में सीजेआई की जगह एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया गया. वर्तमान सीईसी ज्ञानेश कुमार नए कानून के तहत इस पद पर नियुक्त होने वाले पहले व्यक्ति थे. बुधवार को याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने कहा कि संविधान निर्माताओं और स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने कभी भी यह मंशा नहीं रखी थी कि सीईसी “प्रधानमंत्री का व्यक्ति” हो.
हंसारिया ने तर्क दिया कि संविधान निर्माताओं और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने ही चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को पूरी तरह से कार्यपालिका के हाथों में छोड़ने के खिलाफ चेतावनी दी थी.
उन्होंने मार्च 2023 के संविधान पीठ के फैसले (अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ) में सुप्रीम कोर्ट की अपनी टिप्पणियों का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि भारत के चुनाव आयोग जैसी संस्था के लिए परिकल्पित “प्रखर स्वतंत्रता, तटस्थता और ईमानदारी” के लिए शीर्ष चुनाव निकाय की नियुक्तियों पर सरकारी एकाधिकार और “अनन्य नियंत्रण” को समाप्त करना आवश्यक है.
फैसले से पहले, मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती थी. उस फैसले ने नियुक्ति प्रक्रिया को सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के समकक्ष ला दिया था.
हालाँकि, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने इस बात पर जोर दिया कि स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने भी उस फैसले को केवल तब तक के लिए प्रभावी रखने की मंशा जताई थी जब तक कि संसद कोई कानून पारित नहीं कर देती.
न्यायमूर्ति दत्ता ने पूछा, “क्या आप यह कह रहे हैं कि संसद के पास कानून बनाने की शक्ति नहीं थी? या क्या संसद को केवल एक निश्चित तरीके से ही कानून बनाने के लिए ‘मैंडमस’ (परमादेश) दिया जा सकता है?”
याचिकाकर्ताओं की ओर से ही पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि उनका मामला केवल समिति में सीजेआई की जगह कैबिनेट मंत्री को शामिल करने के बारे में नहीं है. यह चुनौती उस अधिनियम की संवैधानिकता पर भी सवाल उठाती है जिसने प्रभावी रूप से सीईसी और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर नियंत्रण वापस कार्यपालिका को सौंप दिया है.
उन्होंने तर्क दिया, “मुख्य बिंदु यह है कि चुनाव आयोग की नियुक्तियाँ कार्यपालिका के नियंत्रण में नहीं हो सकतीं.”
शंकरनारायणन ने कहा कि ‘अनूप बरनवाल’ फैसले ने “विधायी शून्यता” को संबोधित किया था. मार्च 2023 से पहले, सीईसी और ईसी की नियुक्तियाँ प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती थीं. फैसले में इसे एक “अस्थायी या कामचलाऊ व्यवस्था” कहा गया था जो सात दशकों तक चलती रही. इस “व्यवस्था” ने यह सुनिश्चित किया कि नियुक्ति की शक्ति राजनीतिक कार्यपालिका के पास ही रहे.
शंकरनारायणन ने कहा, “यह व्यवस्था 1950 के दशक में ही रुक जानी चाहिए थी, लेकिन जो भी पार्टियाँ सत्ता में आईं, उन्हें यह व्यवस्था सुविधाजनक लगी और यह जारी रही.” इस मामले में बहस गुरुवार (7 मई, 2026) को भी जारी रहेगी.
राज्यों में भाजपा के विस्तार के साथ, देशभर में मुस्लिम विधायकों की संख्या में भारी गिरावट
2014 से देश में भाजपा का बढ़ता वर्चस्व—जिसे पश्चिम बंगाल और असम में इसकी हालिया चुनावी सफलताओं ने और मजबूती दी है—ने भारत के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया है. इसका एक प्रत्यक्ष परिणाम राज्य विधानसभाओं में मुस्लिम प्रतिनिधित्व में आई भारी गिरावट है.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में ज़ीशान शेख की रिपोर्ट के मुताबिक, मुस्लिम विधायकों की संख्या 2013 में लगभग 339 थी, जो अब घटकर करीब 282 रह गई है.
सबसे अधिक गिरावट बड़े राज्यों में देखी गई है. उत्तर प्रदेश में, मुस्लिम विधायकों की संख्या 63 से घटकर लगभग आधी यानी 31 रह गई है. पश्चिम बंगाल में यह संख्या 59 से गिरकर 37 हो गई है, जबकि बिहार में यह 19 से घटकर 11 पर आ गई है. राजस्थान में भी 11 से घटकर यह संख्या 6 हो गई है.
ये गिरावट इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन राज्यों में देश की मुस्लिम आबादी का एक बड़ा हिस्सा रहता है. उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी लगभग 19% है, लेकिन अब उनके पास 8% से भी कम सीटें हैं. पश्चिम बंगाल में लगभग 27% आबादी के मुकाबले विधायकों में उनकी हिस्सेदारी करीब 12.6% है. बिहार में यह आबादी के लगभग 17% की तुलना में मात्र 4.5% है.
इसी तरह का अंतर अन्य राज्यों में भी दिखाई देता है. असम में मुस्लिम आबादी एक-तिहाई से अधिक है, लेकिन उनके पास लगभग 17% सीटें ही हैं. महाराष्ट्र और कर्नाटक में मुस्लिम विधायकों की हिस्सेदारी लगभग 3-4% है, जो उनकी 10% से अधिक की जनसंख्या हिस्सेदारी से काफी नीचे है.
अपेक्षाकृत उच्च प्रतिनिधित्व वाले राज्यों में भी गिरावट देखी गई है. केरल में मुस्लिम विधायकों की संख्या 36 से घटकर 34 और कर्नाटक में 11 से घटकर 9 हो गई है. गुजरात में यह संख्या दो से घटकर एक रह गई है, जबकि छत्तीसगढ़ में अब एक भी मुस्लिम विधायक नहीं है.
सात राज्य—अरुणाचल प्रदेश, गोवा, हिमाचल प्रदेश, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम और छत्तीसगढ़—ऐसे हैं जहाँ वर्तमान में कोई भी मुस्लिम विधायक नहीं है.
हालाँकि, कुछ अपवाद भी हैं. तमिलनाडु में मुस्लिम विधायकों की संख्या 8 से बढ़कर 9 हो गई है, जबकि मध्य प्रदेश और मेघालय में भी मामूली बढ़त दर्ज की गई है. यहाँ तक कि जम्मू और कश्मीर, जहाँ अभी भी मुस्लिम विधायकों की संख्या सबसे अधिक है, वहाँ भी यह संख्या 58 से घटकर 51 हो गई है.
जहाँ तक उन पार्टियों का सवाल है जिनका प्रतिनिधित्व ये मुस्लिम विधायक करते हैं, तो सबसे अधिक कांग्रेस से (61) हैं, उसके बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस (39), और तृणमूल कांग्रेस एवं समाजवादी पार्टी प्रत्येक से 34-34 विधायक हैं.
संयोगवश, भाजपा के पास भी दो मुस्लिम विधायक हैं—मणिपुर से अचब उद्दीन और त्रिपुरा से तफज्जल हुसैन.
दाराब फ़ारूक़ी : ओवैसी की एआईएमआईएम कोई सियासी पार्टी नहीं, ख़ानदानी जायदाद है
असदुद्दीन ओवैसी का दाँव सीधा-सादा है. मुझे वोट दो. मैं मुसलमान हूँ. बस यही पूरी दलील है. इसके पीछे कोई कार्यक्रम नहीं है. कोई संस्था नहीं. कोई योजना नहीं. बस एक पहचान, जो एक प्रमाण-पत्र की तरह पेश की जाती है.
वे मुसलमानों की स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व बनना चाहते हैं. एक पल के लिए इसे गंभीरता से लेते हैं और देखते हैं कि वे असल में पेश क्या कर रहे हैं.
1. एआईएमआईएम कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है. यह ख़ानदानी जायदाद है. दादा ने बनाई, बाप को मिली, बेटे को बाप से मिली. तीन पीढ़ियाँ. कोई चुनाव नहीं. कोई मुक़ाबला नहीं. कोई प्रक्रिया नहीं.
अध्यक्ष पद हर बार संपत्ति की तरह हस्तांतरित हुआ, और अगली बार भी संपत्ति की तरह ही होगा. यही वह शख़्स है जो मुसलमानों से स्वतंत्र लोकतांत्रिक नेतृत्व खड़ा करने की बात करता है. और यह काम वे एक विरासत में मिले तख़्त से कर रहे हैं.
2. एआईएमआईएम ने असल में बनाया क्या है? दंगा पीड़ितों के लिए कोई राष्ट्रीय क़ानूनी सहायता नेटवर्क नहीं है. संकट की माँग के अनुरूप कोई छात्रवृत्ति ढाँचा नहीं है. कोई आर्थिक सहकारिता नहीं. कोई भूमि अधिकार सेल नहीं.
जो है वह एक बेहद कुशल मीडिया ऑपरेशन है, जिसे गोदी मीडिया बड़े चाव से बढ़ाता है. हमदर्दी से नहीं. क्योंकि ओवैसी उनके काम का है. प्राइम टाइम पर एक ग़ुस्साया मुसलमान चेहरा ठीक वही है जो भाजपा की ध्रुवीकरण मशीनरी को चाहिए. ओवैसी कंटेंट देते हैं. गोदी मीडिया प्लेटफ़ॉर्म देता है. दोनों संतुष्ट होकर घर जाते हैं.
किसी मुसलमान के साथ नफ़रत का जुर्म होता है. बयान तैयार होते हैं. ट्वीट जाते हैं. आक्रोश हमेशा मुखर होता है. बेबसी हमेशा भावपूर्ण होती है. फिर अगला अत्याचार होता है और यही चक्र दोहराता है. इस बीच राज्य-दर-राज्य चुनाव लड़ने के लिए पैसा बिना किसी दिक़्क़त के आता रहता है. प्राथमिकताएँ साफ़ दिखती हैं. यह राजनीति नहीं है. यह प्रेस विज्ञप्ति के साथ परफ़ॉर्मेंस है.
3. ओवैसी के पास एक ट्रोल आर्मी है. और उनके पास उन मुसलमानों के लिए एक पसंदीदा गाली है जो धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को वोट देते हैं — दरी बिछाओ गैंग.
मतलब बिल्कुल साफ़ है. तुम बस उनकी रैली में दरी बिछाने के लायक़ हो. मंच पर कभी नहीं पहुँचोगे. यह गाली इस बात की सच्चाई को पकड़ती है कि धर्मनिरपेक्ष पार्टियों ने मुसलमानों की राजनीतिक भागीदारी को नेतृत्व नहीं, मज़दूरी समझा है.
लेकिन देखिए कि ओवैसी इसके बदले में क्या पेश कर रहे हैं. एक ऐसी पार्टी जिसके मंच पर सत्तर साल से एक ही ख़ानदान का क़ब्ज़ा है. जहाँ ख़ून के रिश्ते से बाहर का कोई मुसलमान कभी नेतृत्व तक नहीं पहुँचा. आप एक ऐसी जगह से निकले जहाँ मंच पर नहीं जा सकते थे. आप एक ऐसी जगह आ गए जहाँ मंच विरासती संपत्ति है.
दरी बस अंदर आ गई.
यह भाजपा की राजनीति का कोई विकल्प नहीं है. यह उसकी फ़ोटोकॉपी है. संघ भी उन हिंदुओं के साथ यही करता है जो भाजपा को वोट नहीं देते. भाषा एक जैसी है. इरादा एक जैसा है. फ़र्क़ बस यह है कि संघ के पीछे राज्य की ताक़त है. ओवैसी के पास ट्विटर है. लेकिन भूख एक जैसी है. तरीक़ा एक जैसा है. वे भाजपा की शक्ल हैं, उसी कमरे में खड़े हैं — बस थोड़े कम फ़र्नीचर के साथ.
4. देखिए उनकी पार्टी में कौन नहीं है. एक भी प्रगतिशील मुसलमान नहीं — न मर्द, न औरत — जिसने धर्मनिरपेक्ष जीवन में कुछ हासिल किया हो. कोई ऐसा जिसने करियर बनाया हो, नाम कमाया हो, पहचान की राजनीति से बाहर कुछ मूल्यवान रचा हो, और फिर वह प्रतिष्ठा अपने समुदाय की सेवा में सार्वजनिक जीवन में लाई हो. ऐसा कोई शख़्स एआईएमआईएम में नहीं है.
इसकी जगह जो हैं, वे वो लोग हैं जिनकी पूरी पहचान ही पार्टी है. जिनकी हैसियत ओवैसी से मिलती है, अपनी बनाई किसी चीज़ से नहीं.
प्रगतिशील लोग ओवैसी के लिए बोझ हैं. वे पूछते हैं कि योजना क्या है. वे जवाबदेही चाहते हैं. वे अंतर्विरोधों को भाँप लेते हैं. इसलिए उनकी पार्टी को सावधानी से इस तरह बनाया गया है कि वे उसमें शामिल न हो सकें. यह बहिष्करण इत्तिफ़ाक़ी नहीं है. यह उसकी बुनावट है.
एआईएमआईएम में मुस्लिम पहचान एक पोशाक है. कुर्ता या शेरवानी पहनो. टोपी पहनो. बाहरी दिखावा करो. यही दाख़िले का टिकट है. आपके विचार नहीं. आपका रिकॉर्ड नहीं. आपकी बनाई हुई चीज़ें नहीं.
प्रदर्शन लाइए. सवाल नहीं.
5. सच्चर कमेटी की रिपोर्ट 2006 में आई थी. उसमें सटीक और चौंकाने वाले विवरण के साथ दर्ज किया गया कि भारतीय मुसलमान अधिकांश विकास संकेतकों पर अनुसूचित जातियों से भी पीछे थे. साक्षरता. रोज़गार. संस्थागत प्रतिनिधित्व. स्वास्थ्य.
बीस साल बीत गए. ओवैसी उस रिपोर्ट का हवाला संसद में बड़े वाक्पटुता से देते हैं. आँकड़े धाराप्रवाह सुनाते हैं. डेटा सच्चा है. आक्रोश सच्चा है.
लेकिन उस डेटा से निकलती कोई योजना नहीं है. कोई बीस साला ढाँचा नहीं. कोई ठोस लक्ष्य नहीं. कोई नीति-दस्तावेज़ नहीं जो कहे: मुसलमान अभी यहाँ हैं, उन्हें यहाँ पहुँचना है, हम वहाँ ऐसे पहुँचेंगे. कुछ नहीं. निदान ऊँचे स्वर में है. नुस्ख़ा हमेशा के लिए ग़ायब है.
जो है वह एक दरबार है. मेरे पास आओ क्योंकि बाक़ियों ने तुम्हें धोखा दिया है. यही पूरा प्रस्ताव है. शिकायत बतौर राजनीति.
भावनाएँ ही हम देते हैं और भावनाओं पर ही जीते हैं. हम इमोशन वैम्पायर हैं. योजना? जब तख़्त पर बैठेंगे तब बताएँगे.
हालाँकि ओवैसी एक बात में सही हैं. धर्मनिरपेक्ष पार्टियाँ मुसलमानों को नाकाम कर चुकी हैं. वह नाकामी हक़ीक़ी है और दर्ज है.
लेकिन उस नाकामी से जो जवाब उभरा है वह एक ऐसी पार्टी है जो विरासती ताक़त पर टिकी है, परफ़ॉर्मेंस से चलती है, ट्रोल्स से बचाई जाती है, और किसी भी योजना से ख़ाली है. उस चीज़ की ज़ेरॉक्स जिसका वह विरोध करने का दावा करती है. वही तानाशाही प्रवृत्ति. वही पहचान-आधारित लामबंदी. जवाबदेही के लिए वही हिक़ारत. बस पीछे राज्य की ताक़त नहीं है.
अभी तक.
बंगाल में भाजपा की जीत के बाद बांग्लादेशी विदेश मंत्री ने बंगाली भाषी मुसलमानों के ‘पुश-इन’ के खिलाफ चेताया
‘मकतूब मीडिया’ के मुताबिक, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के ऐतिहासिक बहुमत हासिल करने के एक दिन बाद, बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने चेतावनी दी है कि यदि राज्य में नई सरकार के तहत “पुश-इन” (सीमा पार धकेलने) की घटनाएं बढ़ती हैं, तो ढाका इसका जवाब देगा.
अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक के बाद ढाका के राजकीय अतिथि गृह ‘पद्मा’ में पत्रकारों को जानकारी देते हुए खलीलुर रहमान ने कहा, “अगर पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद किसी भी तरह की ‘पुश-इन’ की घटना होती है, तो बांग्लादेश उचित कदम उठाएगा. “ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के आधिकारिक फेसबुक पेज ने भी मंगलवार को रहमान के इस बयान को साझा किया.
“पुश-इन” शब्द, जिसे भारत में “पुशबैक” कहा जाता है, उस प्रक्रिया को दर्शाता है, जिसमें भारतीय सीमा बल कथित तौर पर लोगों को भारत-बांग्लादेश सीमा पार कराकर जबरन बांग्लादेशी क्षेत्र में धकेल देते हैं. भारत सरकार बंगाली भाषी मुसलमानों के खिलाफ व्यवस्थित पूर्वाग्रह के आरोपों को लेकर सवालों के घेरे में रही है, जिन्हें अक्सर बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के “बांग्लादेशी घुसपैठिया” करार दिया जाता है.
वर्षों से, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उठाए गए मामलों सहित कई आरोपों में सुरक्षाकर्मियों पर दस्तावेजों के बावजूद बंगाली मुसलमानों को बांग्लादेशी नागरिक बताकर निशाना बनाने और उन्हें सीमा पार निष्कासित करने का आरोप लगाया गया है.
ढाका की ये चिंताएं पश्चिम बंगाल में भाजपा के आक्रामक चुनावी भाषणों के बीच आई हैं, जहां पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने बार-बार “बांग्लादेशी घुसपैठियों” का मुद्दा उठाया. पश्चिम बंगाल में भाजपा के नेता और जीत के बाद अगले मुख्यमंत्री बनने की प्रबल संभावना वाले सुवेन्दु अधिकारी ने अपने चुनावी भाषणों और सार्वजनिक बयानों का केंद्र कथित अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ को बनाया, जिसमें वे अक्सर “बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों” और रोहिंग्या प्रवासियों का जिक्र करते रहे.
जुलाई 2025 में सुवेन्दु अधिकारी ने घोषणा की थी, “सबसे पहले, इन रोहिंग्याओं और बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों को मतदाता सूची से हटाया जाना चाहिए. फिर उन्हें देश से बाहर निकाला जाना चाहिए... एक भी रोहिंग्या या बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिया यहां नहीं रहेगा. यह हमारी प्रतिबद्धता है.” उन्होंने दावा किया था कि पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में करीब 1 करोड़ “रोहिंग्या प्रवासी, बांग्लादेशी मुस्लिम मतदाता, मृत, डुप्लिकेट और फर्जी मतदाता” हैं और उन्होंने बिहार की तरह उन्हें हटाने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की मांग की थी. उनकी चेतावनी थी कि कार्रवाई के बिना, घुसपैठ के कारण होने वाले जनसांख्यिकीय परिवर्तनों से पश्चिम बंगाल “वृहद बांग्लादेश” या “पश्चिम बांग्लादेश” में बदल सकता है.
उल्लेखनीय है कि दिसंबर 2025 में अधिकारी ने कोलकाता में बांग्लादेश उप उच्चायोग तक एक विरोध मार्च का नेतृत्व किया था, जहां उन्होंने घोषणा की थी कि बांग्लादेश को “वैसा ही सबक सिखाया जाना चाहिए जैसा इजराइल ने गाजा को सिखाया” और भारत में राजनयिक मिशन के कामकाज में बाधा डालने की धमकी दी थी.
भाजपा का अभियान मतदाता सूची के विवादास्पद एसआईआर के साथ भी मेल खाता है, जिसके माध्यम से लगभग 90 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए. हटाए गए लोगों में से लगभग एक-तिहाई मुसलमान हैं. असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा, जिन्होंने सुवेन्दु के साथ प्रचार किया, ने भी कथित घुसपैठियों और मियां मुसलमानों को सीमा पार धकेलने के बारे में सार्वजनिक रूप से बयानबाजी की है.
अधिकारी और सरमा द्वारा की गई टिप्पणियों के संबंध में ढाका में पूछे गए सवालों के जवाब में रहमान ने कहा कि बांग्लादेश अतीत में भी ऐसे बयानों का विरोध कर चुका है और आवश्यक राजनयिक उपाय करना जारी रखेगा. बांग्लादेश ने सरमा की टिप्पणियों पर 30 अप्रैल को भारत के कार्यवाहक उच्चायुक्त पवन बढ़े को विदेश मंत्रालय में तलब किया था और ऐसे बयानों को “प्रतिकूल” बताते हुए भारतीय राजनीतिक नेताओं से संवेदनशील द्विपक्षीय मामलों पर संयम बरतने का आग्रह किया था. सत्ता संभालने के बाद से नई बीएनपी-नेतृत्व वाली सरकार द्वारा दर्ज किया गया यह पहला औपचारिक विरोध था.
रहमान ने दोनों देशों के बीच लंबे समय से लंबित तीस्ता जल बंटवारे के विवाद पर भी बात की. प्रस्तावित तीस्ता समझौता 2011 से रुका हुआ है, जब तत्कालीन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस समझौते का विरोध करते हुए तर्क दिया था कि इससे राज्य के किसानों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. यह पूछे जाने पर कि क्या पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत तीस्ता संधि पर बातचीत को पुनर्जीवित कर सकती है, रहमान ने कहा कि नई सरकार द्वारा अपनी स्थिति स्पष्ट करने से पहले अटकलें लगाना जल्दबाजी होगी. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि तीस्ता नदी के किनारे रहने वाले समुदाय गंभीर पारिस्थितिक और आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं और बांग्लादेश अपने लोगों के हित में सभी उपलब्ध विकल्पों पर विचार करेगा.
क्या खतरे में है भारत की चुनावी निष्पक्षता?
‘साउथ फर्स्ट’ की रिपोर्ट के अनुसार, हालिया विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद भारत की चुनावी प्रणाली पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है. हारने वाले दलों ने मतदान के आंकड़ों और ईवीएम की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं. पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के नतीजों ने न केवल सत्ता के समीकरण बदले हैं, बल्कि चुनावी शुचिता को लेकर नई चिंताएं भी पैदा कर दी हैं. मुख्य रूप से तीन बड़े मुद्दे मतदाता सूची का पुनरीक्षण, आगामी परिसीमन और ईवीएम संदेह लोकतंत्र की साख को प्रभावित कर रहे हैं.
मतदाता सूची और एसआईआर का विवाद
चुनावों से पहले ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ के नाम पर मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर बदलाव किए गए. चुनाव आयोग ने इसे फर्जी और मृत मतदाताओं को हटाने की एक आवश्यक सफाई प्रक्रिया बताया. अकेले पश्चिम बंगाल में लगभग 90 लाख नाम हटाए गए और पूरे देश में यह आंकड़ा करोड़ों में था.
विपक्ष और नागरिक समाज का आरोप है कि इस प्रक्रिया ने गरीब, प्रवासी और अल्पसंख्यक मतदाताओं को सबसे ज्यादा प्रभावित किया. पुरानी सूचियों और जटिल दस्तावेजों की मांग के कारण कई वास्तविक मतदाता मतदान के अधिकार से वंचित रह गए. आलोचकों का मानना है कि यह एक “छिपी हुई नागरिकता जांच” थी जिसने मतदान से पहले ही चुनावी आधार को प्रभावित कर दिया. इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी ने जनता के बीच संदेह को और गहरा किया है.
परिसीमन का क्षेत्रीय संकट
2026 के बाद होने वाला परिसीमन भारत के संघीय ढांचे के लिए एक बड़ी चुनौती है. जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण दक्षिण भारतीय राज्यों तमिलनाडु और केरल के लिए चिंता का विषय है. इन राज्यों ने सफलतापूर्वक जनसंख्या नियंत्रण किया और आर्थिक प्रगति की, लेकिन अब उन्हें डर है कि इस सफलता के बदले उन्हें संसद में सीटें खोनी पड़ेंगी. इसके विपरीत, अधिक जनसंख्या वाले उत्तर भारतीय राज्यों की ताकत बढ़ेगी. यह क्षेत्रीय असंतुलन देश की एकता और संघीय समानता के लिए खतरा बन सकता है.
ईवीएम और भरोसे का सवाल
ईवीएम पर संदेह का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा है. हालांकि चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार इन मशीनों को सुरक्षित बताया है, लेकिन विपक्षी दल अब भी पूर्ण वीवीपैट जांच की मांग कर रहे हैं. तकनीकी गड़बड़ियों की खबरें और मतदान के अंतिम आंकड़ों में विसंगतियां जनता के विश्वास को कमजोर करती हैं. भले ही धोखाधड़ी का कोई बड़ा सबूत न मिला हो, लेकिन ऑडिट प्रक्रिया का सीमित होना इस मुद्दे को जीवित रखता है.
पारदर्शिता ही एकमात्र मार्ग
लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का नाम है. चुनाव आयोग को चाहिए कि वह मतदाता सूची से नाम हटाने के कारणों को सार्वजनिक करे और अपील की प्रक्रिया को सरल बनाए. साथ ही, ईवीएम की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए स्वतंत्र तकनीकी जांच और व्यापक ऑडिट की अनुमति दी जानी चाहिए.
भारत का लोकतंत्र दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है, लेकिन इसकी मजबूती तभी बनी रहेगी जब चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष हो. हर नागरिक को यह विश्वास होना चाहिए कि उसका वोट सुरक्षित है और उसकी सही गिनती हुई है. बिना इन बुनियादी सुधारों के, चुनावी नतीजे अपनी नैतिक चमक खो सकते हैं. समय आ गया है कि सुधारों के जरिए संदेह के बादलों को हटाया जाए ताकि गणतंत्र का आधार मजबूत बना रहे.
कॉरपोरेट जिहाद” का नैरेटिव: नासिक टीसीएस मामले की सच्चाई और पुलिसिया कार्रवाई पर सवाल
‘आर्टिकल 14’ की रिपोर्ट के अनुसार, हाल के वर्षों में भारत में ‘जिहाद’ शब्द का प्रयोग किसी भी सामाजिक या व्यक्तिगत मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने के लिए एक हथियार की तरह किया जाने लगा है. महाराष्ट्र के नासिक में स्थित भारत की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) की एक शाखा में हुई घटना इसका सबसे ताज़ा और चिंताजनक उदाहरण है. यह मामला दिखाता है कि कैसे एक व्यक्तिगत विवाद और पुलिस की गुप्त कार्रवाई ने मिलकर ‘इस्लामोफोबिया’ का एक नया रूप गढ़ा, जिसे मुख्यमंत्री द्वारा “कॉरपोरेट जिहाद” का नाम दिया गया.
इस पूरे विवाद की जड़ें किसी कानूनी शिकायत में नहीं, बल्कि एक राजनैतिक कार्यकर्ता की ‘सूचना’ में छिपी थीं. फरवरी 2026 में, एक राजनैतिक दल के कार्यकर्ता ने नासिक पुलिस को बताया कि टीसीएस की एक हिंदू महिला कर्मचारी रमजान के रोजे रख रही है. एक नागरिक की निजी धार्मिक पसंद पर पुलिस की प्रतिक्रिया चौंकाने वाली थी. पुलिस ने बिना किसी प्रारंभिक जांच के कार्यालय के भीतर महिला अधिकारियों को भेष बदलकर तैनात कर दिया.
यह एक राज्य-प्रायोजित ‘स्टिंग ऑपरेशन’ था, जिसका उद्देश्य कर्मचारियों को मुस्लिम सहकर्मियों के खिलाफ बोलने के लिए उकसाना था. हालांकि बाद में आठ महिलाओं ने यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई, जो निश्चित रूप से गंभीर जांच का विषय है, लेकिन जिस तरह से इस मामले को धार्मिक धर्मांतरण की अंतरराष्ट्रीय साजिश के रूप में पेश किया गया, उसने न्याय की मूल भावना को ही पीछे छोड़ दिया.
जैसे ही पुलिस ने कार्रवाई शुरू की, मुख्यधारा के मीडिया ने इसे हाथों-हाथ लिया. बिना किसी ठोस सबूत के, “विदेशी फंडिंग”, “अंतरराष्ट्रीय तस्करी” और “जबरन बीफ खिलाने” जैसे सनसनीखेज दावे किए जाने लगे. इस पूरी कहानी का केंद्र एक मुस्लिम महिला कर्मचारी को बनाया गया, जिसके पास न तो कोई एचआर अधिकार थे और न ही कोई संस्थागत शक्ति. उसे एक “धर्मांतरण रैकेट” का मास्टरमाइंड घोषित कर दिया गया.
दिलचस्प बात यह है कि एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स की एक तथ्य-खोज रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि इतनी बड़ी ‘साजिश’ के बावजूद एक भी व्यक्ति का धर्मांतरण नहीं हुआ था. फिर भी, राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी और एटीएस जैसी संस्थाओं को एक कार्यस्थल विवाद में शामिल कर लिया गया.
17 अप्रैल 2026 को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने “कॉरपोरेट जिहाद” शब्द का प्रयोग किया. यह उस ‘टेम्पलेट’ का हिस्सा है जहाँ लव जिहाद, लैंड जिहाद और अब कॉरपोरेट जिहाद के जरिए सामान्य मानवीय व्यवहारों चाहे वह प्रेम हो, व्यापार हो या नौकरी को संगठित धार्मिक आक्रामकता के रूप में दिखाया जाता है.
नासिक मामले में प्राथमिकी के विश्लेषण से पता चलता है कि कई शिकायतों में भाषा बिल्कुल एक जैसी (शब्द-दर-शब्द) थी, जो उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाती है. साथ ही, जिस रिश्ते को ‘लव जिहाद’ बताया गया, वह कॉलेज के दिनों से था जहाँ दोनों एक-दूसरे की धार्मिक पहचान जानते थे. यहाँ पहचान छिपाने या धोखा देने जैसी कोई बात नहीं थी, जो इस नैरेटिव की बुनियाद को ही ढहा देती है.
इस तरह के मामलों का सबसे बुरा प्रभाव समाज के ताने-बाने पर पड़ता है. इस घटना के बाद नासिक, पुणे और मुंबई जैसे शहरों में मुस्लिम पेशेवरों ने कार्यस्थल पर बढ़ती शत्रुता और भेदभाव की शिकायत की है. विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में कंपनियां विवादों से बचने के लिए एक विशेष समुदाय के युवाओं को नौकरी देने से हिचकिचा सकती हैं, जो आर्थिक असमानता को और गहरा करेगा.
इसके अतिरिक्त, यह महिलाओं की अपनी पसंद और स्वायत्तता पर भी हमला है. किसी महिला का उपवास रखना या किसी के साथ मित्रता करना अब राज्य की निगरानी का हिस्सा बन गया है.
कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न या किसी भी प्रकार का अपमानजनक व्यवहार कानूनन अपराध है और दोषियों को सख्त सजा मिलनी चाहिए. लेकिन जब पुलिस और मीडिया किसी व्यक्तिगत अपराध को “सभ्यता के खतरे” के रूप में पेश करने लगते हैं, तो न्याय की प्रक्रिया राजनीति की दासी बन जाती है. नासिक का टीसीएस मामला हमें चेतावनी देता है कि अगर कानून प्रवर्तन एजेंसियां और मीडिया तथ्यों के बजाय राजनैतिक नैरेटिव से संचालित होंगे, तो इसका खामियाजा पूरे देश के सामाजिक सद्भाव को भुगतना पड़ेगा.
यूपी की ‘एक जिला, एक व्यंजन’ सूची में 208 व्यंजनों की पहचान, एक भी मांसाहार नहीं; ‘गलौटी कबाब’ और ‘मुरादाबादी बिरयानी’ नदारद
क्या अब भारतीय व्यंजनों को भी “तुष्टिकरण” का सामना करना पड़ रहा है? ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में मौलश्री सेठ की खबर है कि उत्तरप्रदेश की हाल ही में स्वीकृत ‘एक जिला, एक व्यंजन योजना’ के तहत राज्य भर में 208 विशिष्ट व्यंजनों की पहचान की गई है. हालाँकि, एक बड़ी चूक ने सबका ध्यान खींचा है — इस सूची में एक भी मांस आधारित व्यंजन शामिल नहीं है.
उदाहरण के लिए, लखनऊ के लिए रेवड़ी, चाट, मलाई मक्खन और “आम के उत्पाद” निर्धारित किए गए हैं. वहीं, मुरादाबाद मंडल में दाल के व्यंजन और हांडी हलवा शामिल हैं. इन दोनों क्षेत्रों की प्रसिद्ध विशेषताएं जैसे ‘गलौटी कबाब’ और ‘मुरादाबादी बिरयानी’ सूची से नदारद हैं.
इस योजना की शुरुआत सबसे पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 24 जनवरी को ‘यूपी दिवस’ और ‘प्रेरणा स्थल’ के उद्घाटन के दौरान लखनऊ में की थी, और 4 मई को राज्य कैबिनेट ने इसे औपचारिक मंजूरी दी. सूत्रों का कहना है कि कैबिनेट नोट में 18 मंडलों और 75 जिलों में फैले 208 व्यंजनों को शामिल किया गया है.
खाद्य समीक्षकों ने गलौटी कबाब जैसे प्रतिष्ठित व्यंजनों को बाहर रखे जाने पर सवाल उठाए हैं, जिसे व्यापक रूप से अवधी खान-पान का प्रतिनिधि व्यंजन माना जाता है. लखनऊ के लेखक हिमांशु बाजपेयी, जो दुनिया भर में ‘दास्तानगोई’ प्रस्तुत करते हैं, ने कहा कि यह चूक आश्चर्यजनक है. “मैं शाकाहारी हूँ, लेकिन जब लोकप्रिय व्यंजनों की सूची तैयार की जाती है, तो दुनिया भर में अपने ‘मुंह में घुल जाने वाले’ स्वाद के लिए मशहूर गलौटी कबाब का शामिल न होना हैरानी भरा है.”
उन्होंने चयन प्रक्रिया पर स्पष्टता की भी मांग की. उन्होंने कहा, “यदि उद्देश्य कम प्रसिद्ध व्यंजनों को बढ़ावा देना है, तो यह समझ में आता है. लेकिन यदि भोजन के चयन में कोई पूर्वाग्रह है, तो उसे स्पष्ट किया जाना चाहिए.”
चयन के मानदंडों के बारे में पूछे जाने पर कैबिनेट मंत्री राकेश सचान ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि “यह एक लचीली सूची है जिसे जनता की राय और सुझावों के आधार पर अपडेट (अपग्रेड) किया जा सकता है.”
उन्होंने आगे बताया कि सभी 75 जिलों में जिलाधिकारियों की अध्यक्षता में एक जिला स्तरीय समिति बनाई गई थी, जिसमें शिक्षक, प्रोफेसर और स्थानीय विशेषज्ञ शामिल थे, और उन्हीं ने ये सिफारिशें की थीं. सचान ने कहा, “सर्वेक्षण भी किए गए थे... इन्हीं सिफारिशों के आधार पर यह सूची तय की गई, यह कार्य आसान नहीं था.”
मांसाहारी व्यंजनों की अनुपस्थिति पर उन्होंने कहा, “यह जानबूझकर नहीं किया गया है. यदि भविष्य में सिफारिश की जाती है, तो उन्हें जोड़ा जा सकता है. विचार किसी व्यक्तिगत लोकप्रिय वस्तु को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि उन व्यंजनों को बढ़ावा देना है जिससे पैकेजिंग, बिक्री और प्रचार के माध्यम से बड़ी आबादी को लाभ हो.”
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.














