05/05/2026: ममता का इस्तीफा | दो तोपें | लोकतंत्र हारा | अमिट दाग | मगरमच्छ | 5 कारण | रुपया और गिरा | निदा खान | जंग, जहाज़, जिद
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
ममता का इस्तीफे से इनकार, संवैधानिक संकट की आहट
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया गिरकर सौ के और नजदीक, 95.25 के नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद
टीसीएस नासिक: 9 में से निदा खान का नाम सिर्फ एक एफआईआर में, लेकिन टीवी चैनलों ने ‘मास्टरमाइंड’ बताया
श्रीलंका के मीडिया में छा गई तमिलनाडु में सी. जोसेफ विजय की बड़ी जीत
‘मेरे इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता; हमें साजिश के तहत हराया गया’: ममता बनर्जी
ज्ञानेश कुमार: बंगाल चुनाव गाथा का ‘अमिट दाग’ वाला चेहरा
जिस मगरमच्छ के लिए ममता ने नहर खोदी थी, उसी ने अंततः उन्हें निगल लिया; बंगाल जनादेश के निहितार्थ
वामपंथ के गढ़ में फातिमा ताहिलिया की कहानी: मुस्लिम लीग की पहली महिला विधायक
राहुल गांधी ने टीएमसी की हार पर ‘खुशी मनाने’ वाले कांग्रेस नेताओं को फटकारा: ‘तुच्छ राजनीति को किनारे रखें’
पिनाराई के ‘किले’ का ढहना: केरल में वामपंथी शासन के अंत की कहानी
एसआइआर से सीआरपीएफ तक: वे पाँच कारक जिन्होंने बंगाल में भाजपा की जीत सुनिश्चित की
‘मेरे इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता; हमें साजिश के तहत हराया गया’: ममता बनर्जी
बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की हार पर चर्चा करते हुए पार्टी अध्यक्ष ममता बनर्जी ने मंगलवार (5 मई, 2026) को एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, “अगर वे सोचते हैं कि वे बल प्रयोग करके जीत जाएंगे और मैं जाकर अपना इस्तीफा दे दूंगी, तो ऐसा नहीं होगा. हम चुनाव नहीं हारे हैं. यह हमें हराने का उनका बलपूर्वक प्रयास है. आधिकारिक तौर पर वे चुनाव आयोग के माध्यम से हमें हरा सकते हैं, लेकिन नैतिक रूप से मैं आपसे कह रही हूं कि हम चुनाव जीत गए हैं.” बनर्जी ने आगे कहा, “हम हारे नहीं हैं, उन्होंने जबरन राज्य पर कब्जा कर लिया है. असली विलेन चुनाव आयोग है. चुनाव आयोग पक्षपाती है, न्यायपालिका है नहीं, वे (भाजपा) देश में एक पार्टी का शासन चाहते हैं.”
उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की हार को खारिज करते हुए बड़े पैमाने पर चुनावी धांधली, मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और चुनाव आयोग के पक्षपात का आरोप लगाया. इसे “लोकतंत्र की हत्या” करार देते हुए उन्होंने दावा किया कि 100 सीटें जबरन छीन ली गईं. बनर्जी ने कहा कि वह बिना किसी पद पर रहे एक “सामान्य नागरिक” के रूप में अपनी राजनीतिक लड़ाई जारी रखेंगी. “मेरा लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट है. अब मेरे पास कोई पद नहीं है, इसलिए मैं एक आम नागरिक हूँ. आप (भाजपा) यह नहीं कह सकते कि मैं किसी सरकारी पद का दुरुपयोग कर रही हूँ. अब मैं एक स्वतंत्र पक्षी की तरह हूँ और मेरा पूरा जीवन जनता की सेवा के लिए समर्पित है. इन 15 वर्षों के दौरान भी, मैंने पेंशन के रूप में एक पैसा भी नहीं निकाला है, और न ही कभी कोई वेतन लिया है.”
इसी बीच, भाजपा ने मंगलवार (5 मई, 2026) को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पश्चिम बंगाल में अपने विधायक दल के नेता के चुनाव के लिए पार्टी का केंद्रीय पर्यवेक्षक नियुक्त किया है. पार्टी ने केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा को भी असम में विधायक दल के नेता के चुनाव के लिए केंद्रीय पर्यवेक्षक नियुक्त किया है.
मुझे कुर्सी की परवाह नहीं
‘द हिंदू’ ब्यूरो के अनुसार, प्रेस कॉन्फ्रेंस में ममता बनर्जी ने कहा, “मैं एक कम महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में जीना चाहती हूँ. मुझे कुर्सी की परवाह नहीं है. मुझे केवल जनता की परवाह है. भले ही मैं चाहूँ, फिर भी मुझे विधानसभा नहीं जाना चाहिए. यह सही नहीं है.”
उन्होंने फिर दोहराया, “अगर वे सोचते हैं कि वे ताकत के दम पर जीत जाएंगे और मैं इस्तीफा दे दूंगी, तो यह नहीं होने वाला. हम चुनाव नहीं हारे हैं. आधिकारिक तौर पर वे चुनाव आयोग का इस्तेमाल कर हमें हरा सकते हैं, लेकिन नैतिक रूप से जीत हमारी हुई है. “
कल गणना केंद्र के भीतर मुझे लात मारी गई और धक्का दिया गया
ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि सोमवार (4 मई) को मतगणना केंद्रों के बाहर केंद्रीय बलों के जवानों ने गुंडों की तरह व्यवहार किया. उन्होंने कहा कि सोमवार को गणना केंद्र के भीतर उनके साथ बदसलूकी की गई, उन्हें लात मारी गई और धक्का दिया गया.
मैं ‘इंडिया’ गठबंधन को मजबूत करूंगी
ममता बनर्जी ने कहा, “हम भाजपा से नहीं लड़े, हम चुनाव आयोग से लड़े जिसने भगवा पार्टी के लिए काम किया.”
उन्होंने आगे कहा, “मैं इंडिया गठबंधन के सभी नेताओं की आभारी हूं. सोनिया गांधी, राहुल गांधी, अखिलेश, हेमंत सोरेन और तेजस्वी जैसे नेताओं ने मुझे फोन किया. अखिलेश यादव कल मुझसे मिलने आएंगे. अब मेरा लक्ष्य स्पष्ट है—मैं एक आजाद परिंदा हूं—मैंने स्पष्ट कर दिया था कि मैं इंडिया गठबंधन के अन्य नेताओं के साथ मिलकर क्या करूंगी. मैं इंडिया गठबंधन को और मजबूत करूंगी.”
वोट और सीटों का गणित: 5% का फर्क, 125 सीटों का झटका
न्यूज़18 की विस्तृत डेटा पड़ताल के अनुसार, भाजपा को करीब 46% और तृणमूल को लगभग 41% वोट मिले — केवल 5 प्रतिशत अंकों का अंतर. वास्तविक संख्या में यह फर्क करीब 32 लाख वोटों का रहा — भाजपा को 2.92 करोड़ और तृणमूल को 2.60 करोड़ मत मिले. लेकिन पहले पास करो प्रणाली में यह अंतर 125 सीटों की भारी बढ़त में बदल गया.
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर सयंतन घोष के अनुसार, इस परिणाम के पीछे कई कारण हैं — शासन संबंधी असंतोष, महिलाओं के खिलाफ अपराध, कानून-व्यवस्था की स्थिति और अल्पसंख्यक वोटों का विभाजन या बिखराव. न्यूज़18 ने यह भी नोट किया कि 2021 में भाजपा और तृणमूल के बीच वोट शेयर का अंतर करीब 10% था, लेकिन तब और अब दोनों चुनावों में सीटों का अंतर लगभग 125-145 के दायरे में रहा.
तृणमूल ने 2011, 2016 और 2021 — तीनों चुनावों में 124 सीटें लगातार जीती थीं. इस बार वह उनमें से 78 सीटें हार गई. भाजपा ने अपनी 54 पक्की सीटें बरकरार रखते हुए 65 नई सीटें भी जोड़ लीं.
एसआईआर विवाद: क्या चुनावी सूची संशोधन ने बदला खेल?
हिंदुस्तान टाइम्स की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट में यह प्रश्न उठाया गया कि क्या चुनाव आयोग के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) अभियान ने भाजपा को जिताया? रिपोर्ट का निष्कर्ष है — संभवतः नहीं. हालांकि एसआईआरके तहत लगभग 62 लाख नाम हटाए गए और 27 लाख लोगों ने पुनः आवेदन किया, लेकिन चुनावी डेटा यह नहीं दर्शाता कि इससे भाजपा को निर्णायक लाभ मिला.
डेटा दिखाता है कि 2024 लोकसभा चुनाव की तुलना में 2026 में भाजपा को 56 लाख अधिक वोट मिले, जबकि तृणमूल को 17 लाख कम. SIR के कारण शुद्ध मतदाता कटौती 89 लाख थी. तृणमूल के वोटों में गिरावट और एसआईआर अंतर्गत 27 लाख के अनुकूलन को जोड़ने पर यह संयोग आकर्षक लगता है, लेकिन सीट-दर-सीट विश्लेषण में एसआईआर-कटौती और वोट-शेयर परिवर्तन के बीच कोई स्पष्ट सहसंबंध नहीं मिला.
हालांकि, मुसलमान-बहुल जिलों में SIR की कटौती असंगत रूप से अधिक रही, जो राजनीतिक रूप से विवादास्पद है. फिर भी नई विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या 40 है — जो 2021 जैसी ही है. इसके बजाय, हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट की मूल थीसिस यह है कि भाजपा की जीत के पीछे “अत्यंत शक्तिशाली सत्ता-विरोधी लहर और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की अनुकूल हवा” जिम्मेदार है. तृणमूल 268 में से 293 सीटों पर वोट शेयर खो चुकी है और 69 सीटों पर 10 प्रतिशत अंक से अधिक की गिरावट आई.
हिंसा की रिपोर्टें, आरोप-प्रत्यारोप
नेशनल हेराल्ड की रिपोर्ट के अनुसार, नतीजों के बाद कई जिलों में तृणमूल के दफ्तरों में आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं. तृणमूल ने भाजपा पर अपने कार्यालयों पर हमले और कार्यकर्ताओं पर हमले का आरोप लगाया. हावड़ा के उदयनारायणपुर में एक प्रत्याशी पर हमले और मानिकतला में एक कार्यकर्ता की पिटाई की खबरें आईं, हालांकि इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी. उत्तर 24 परगना के पानीहाटी समेत कई स्थानों पर पार्टी कार्यालयों पर कब्जे की भी सूचनाएं मिलीं. अधिकारियों ने कहा कि स्थिति पर नजर रखी जा रही है और पुलिस व केंद्रीय बल तैनात हैं.
ममता के इस्तीफा नहीं देने पर राज्यपाल संवैधानिक विकल्पों का इस्तेमाल करेंगे
ममता बनर्जी के इस्तीफा नहीं देने की स्थिति में होगा क्या? इस बारे में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने ‘द टेलीग्राफ ऑनलाइन’ को बताया कि ऐसी दुर्लभ स्थिति में राज्यपाल मुख्यमंत्री से इस्तीफा मांग सकते हैं और यदि वे नहीं मानतीं, तो राज्यपाल अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगा सकते हैं. “एक दिन के लिए भी, इस स्थिति में राष्ट्रपति शासन सबसे संभावित विकल्प है. एक साथ दो मुख्यमंत्री नहीं हो सकते,” कुरैशी ने कहा. उन्होंने 2005 के बिहार का उदाहरण दिया, जब राबड़ी देवी के कार्यकाल के बाद स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने पर राष्ट्रपति शासन लगाया गया था.
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील फर्नांडीस ने कहा, “इस्तीफे का विरोध करके वे केवल संवैधानिक अराजकता को बढ़ावा देंगी.” कलकत्ता हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता जयंत नारायण चटर्जी ने कहा, “आजादी के बाद से ऐसा कभी नहीं हुआ. किसी मुख्यमंत्री ने पद छोड़ने से इनकार नहीं किया.” संविधान कहता है कि मुख्यमंत्री तभी तक पद पर रह सकते हैं जब तक विधानसभा का विश्वास प्राप्त हो. 207 सीटें जीतकर भाजपा ने यह साबित कर दिया कि तृणमूल को अब यह विश्वास हासिल नहीं है. ऐसे में राज्यपाल को बहुमत वाली पार्टी को सत्ता सौंपने की जिम्मेदारी है.
जवाहर सिरकार | ममता बनर्जी की सत्ता दो तोपों से उड़ी
अब जबकि ‘युद्ध का शोर थम गया है और जीत-हार का फैसला हो गया है’, आइए समझने की कोशिश करें कि किस तरह और क्यों बंगाल का किला भारतीय जनता पार्टी के सामने ढह गया. समाज के एक बड़े तबके में — अमीर व्यापारियों से लेकर पक्के बंगाली भद्रलोक तक, और हैरानी की बात यह है कि ममता बनर्जी की सरकारी सहायता से सबसे अधिक लाभान्वित होने वाले लोगों तक में भी — खुशी छुपाए नहीं छुप रही. ऐसा उत्साह, राजनीतिक कड़वाहट और बदलाव की बेचैन तड़प बंगाल में आखिरी बार 1977 में, आपातकाल के बाद के चुनाव में देखी गई थी. उस वक्त एक जूनियर सहायक रिटर्निंग ऑफिसर के रूप में मुझे शोरगुल के बीच मतगणना सुनिश्चित करने में खासी मशक्कत करनी पड़ी थी.
इस बार तृणमूल कांग्रेस के कुछ कट्टर समर्थकों को छोड़कर कोई भी सरकार के खिलाफ व्यापक गुस्से और बदलाव की अंतर्निहित चाहत को नकार नहीं सकता था. कई लोगों ने इसे भाजपा के ताकतवर और महंगे चुनाव प्रचार, एकतरफा मीडिया और अमीर व मध्यवर्ग की अचानक मुखरता से जोड़ा. सोशल मीडिया और चाय की दुकानों पर भी खूब बहसें हुईं. हाँ, बहुत से लोगों के मन में यह गहरी भावना भी थी कि बंगाली कभी भी उस पार्टी को वोट नहीं देंगे जिस पर हिंदी-हिंदू की मुहर लगी है. लेकिन सच यह है कि ऐसा हो गया.
ममता बनर्जी को गद्दी से हटाने वाली दो तोपें हैं — भ्रष्टाचार और बेरोजगारी. उनकी कल्पनाशील सब्सिडी और सरकारी मदद करोड़ों लोगों को एक दशक या उससे अधिक समय तक थामे रख सकती थी, लेकिन हमेशा के लिए नहीं. थका हुआ, बेरोजगार या कम तनख्वाह पाने वाला वह नौजवान जो स्विग्गी के लिए डिलीवरी करता है या ज़ोमैटो बाइक से मामूली पैसे कमाता है — वह उस तीन मंजिली इमारत को देखकर खुश नहीं हो सकता, जिसमें उसका स्थानीय तृणमूल नेता, जो कभी एक छोटी-सी टपकती झोपड़ी में रहता था, अब जा बसा है. स्थानीय पुलिस और नगर पालिका के अधिकारी इन नेताओं की चापलूसी करते रहे, भले ही उन्होंने सड़कों का हर इंच रेहड़ी-पटरी वालों से पाट दिया हो. गुंडे दरवाजा खटखटाते थे और मकान की मरम्मत या विस्तार करने पर ‘फीस’ वसूलते थे. एक चिकना ‘प्रति वर्ग फुट भुगतान’ तंत्र हर बिल्डर को राजनीतिक नेताओं को — और वह भी केवल एक स्तर पर नहीं, बल्कि कई स्तरों पर — पैसे देने के लिए मजबूर करता था.
राज्य में कोई बड़ा उद्योग नहीं आया, जिसने टाटा को भगाया और ‘बंगाल मीन्स बिजनेस’ हर साल फोटो-ऑप और बेशर्म भ्रामक प्रचार का नाटक बनकर रह गया. हकीकत से दूरी हर बीतते साल के साथ बढ़ती गई और एक सांसद के रूप में जब मैंने भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे उठाए तो मुझे फटकारा गया — तब तक, जब तक मैंने खुद इस्तीफा नहीं दे दिया.
लेकिन यह गुस्सा, अधिक से अधिक, हवा की तरह था जो पालों को धकेलती है. असली जंग जीतने वाला जहाज तो चुनावी सूचियों का वह अभूतपूर्व विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) था — एक ऐसी कार्यप्रणाली जो मौजूदा कानून और नियमों के अंतर्गत नहीं आती. ऐसा लगता है कि इसे बेरहम कॉर्पोरेट वकीलों और रणनीतिकारों ने तैयार किया, जिन्हें अधिग्रहण की गारंटी के लिए मोटी फीस दी गई. पहले दो संसदीय चुनाव और कई मतदाता सूची संशोधन कराने के अनुभव के आधार पर मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि एसआईआर न तो नौकरशाही की उपज है और न ही चुनावी. इसकी गलती ढूंढने वाली, दहशत फैलाने वाली पद्धति और मतदाताओं को सूची से हटाने की क्रूरता एक चालाकी से बनाई गई योजना लगती है जो कहीं और बनाई गई और जिसे एक ‘सुविधाजनक’ मुख्य चुनाव आयुक्त को लागू करने का काम सौंपा गया. इसने कुछ के पक्ष में और कुछ के खिलाफ मतदाता सूचियों को काट-छाँट कर तैयार किया. पश्चिम बंगाल में कुल मतदाता वंचना 90 लाख की रही, जिसमें से आधे से अधिक विवादास्पद हैं.
आश्चर्य की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्वीकार्य पाया और एक ऐसा अभूतपूर्व निर्णय लिया जिसे 70 वर्षों की सफलता का इतिहास रहा है. न्यायालय ने दावों और आपत्तियों के निपटारे से कार्यपालिका को हटाकर यह काम न्यायिक प्राधिकारियों को सौंप दिया. लेकिन चुनाव के दिन कम से कम 27 लाख मतदाता, एक विशाल संख्या, मताधिकार से वंचित रहे. चुनाव आयोग विपक्ष-शासित राज्यों में कुछ ‘पक्षपाती’ अधिकारियों का तबादला करता है. लेकिन इस बार मुख्य चुनाव आयुक्त ने पिछले सभी चुनावों की तुलना में अधिक अधिकारियों का तबादला किया. ढाई लाख से अधिक केंद्रीय सशस्त्र बल भी तैनात किए गए — जिन्होंने मतदान को स्वतंत्र और मृत्युमुक्त जरूर बनाया. केंद्रीय पर्यवेक्षक और माइक्रो पर्यवेक्षक सैकड़ों की संख्या में पहले कभी न देखे गए स्तर पर तैनात किए गए.
भाजपा की शानदार जीत का श्रेय केवल इन्हीं कारकों को देना अनुचित होगा, क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दशकों के समर्पित अभियान ने भी कमाल किया. हम उन पैसों के पहाड़ों की चर्चा नहीं करेंगे जो हर पहलू में दिखाई दे रहे थे. ममता बनर्जी ने व्यवस्थित ढंग से दूसरे धर्मनिरपेक्ष दलों को खत्म कर दिया था, इसलिए लोगों ने एकमात्र उपलब्ध विकल्प चुना. अब भाजपा की मुस्लिम-विरोधी छवि और पार्टी की सांस्कृतिक असंगति जैसे मुद्दे उठाना बेकार है, जब उनकी अपनी सरकार ही हालात को इस मुकाम तक ले आई. लोग उद्योग, रोजगार और केंद्र के साथ एक कामकाजी रिश्ता देखना चाहते हैं.
जवाहर सिरकार एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी और राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं.
अरुण श्रीवास्तव | बंगाल में लोकतंत्र की हार: ममता की पराजय से परे
तृणमूल की करारी हार को महज ममता बनर्जी की व्यक्तिगत पराजय कहना सरलीकरण होगा. इसके बजाय, 4 मई को भारत के चुनावी इतिहास के सबसे दुर्भाग्यपूर्ण दिनों में से एक के रूप में याद किया जाएगा, जब हिंदुत्व समूहों, गृह मंत्रालय, चुनाव आयोग और न्यायपालिका के एक वर्ग की मिलीभगत से बंगाल में लोकतंत्र का अपमान हुआ. बेशक, राहुल गांधी समेत उनके विरोधियों ने आरोप लगाया कि उनका भाजपा के प्रति नरम रुख था. लेकिन हकीकत यह है कि भगवा पारिस्थितिकी तंत्र उनके प्रति गहरी दुश्मनी रखता था, क्योंकि वे हिंदुत्व की राजनीति के विस्तार में एक बड़ी बाधा थीं.
इस घृणा की तीव्रता तब उजागर हुई जब मतगणना के अचानक स्थगन के खिलाफ उनके विरोध के दौरान एक स्वयंभू हिंदू सनातनी आस्था के अनुयायी ने उन्हें लात मारी. यह घटना हिंदुत्व खेमे के आचरण और रवैये की झलक देती है, जो अक्सर नरेंद्र मोदी से जोड़ा जाता है. बंगाल जैसी धरती पर, जो अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और नारी-सम्मान की परंपरा के लिए जानी जाती है, ऐसा कृत्य अत्यंत चिंताजनक है.
ममता ने आरोप लगाया कि मतगणना केंद्र पर उन्हें “लात मारी गई” और “पीटा गया”, फिर भी अमित शाह के अधीन केंद्रीय पुलिस ने हमलावर की पहचान करने की कोई खास कोशिश नहीं की. उनके मतगणना एजेंटों को भी बाहर निकाल दिया गया. उन्होंने मतदाता हेरफेर पर गंभीर चिंता जताई और भाजपा व चुनाव आयोग पर नतीजों से छेड़छाड़ की साजिश का आरोप लगाया. वे कोलकाता के सखावत मेमोरियल स्कूल भी गईं, जहाँ अधिकृत एजेंटों की गैरमौजूदगी में मतपेटियाँ खोले जाने के आरोप थे.
यह आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के लिए भी शर्म की बात है, जो भगवा कार्यकर्ताओं की हरकतों पर बेफिक्र नजर आए. जब कोलकाता और उसके आसपास हिंसा भड़की और भगवा समर्थकों — जिनमें कई प्रवासी हिंदी-भाषी समूह थे — ने तृणमूल कार्यकर्ताओं और नेताओं को निशाना बनाया, तो भागवत ने संयम बरतने का कोई आह्वान नहीं किया. भाजपा सरकार के औपचारिक शपथ ग्रहण से पहले ही सत्ता की खुशबू ने इन समूहों को बेलगाम कर दिया था. समर्थक ममता के कालीघाट स्थित आवास के बाहर इकट्ठा होकर नारे लगाते, गालियाँ देते और पार्टी के झंडे लहराते रहे, जबकि वे अभी भी कार्यवाहक मुख्यमंत्री थीं.
अपनी उत्साहित प्रतिक्रिया में कुछ टिप्पणीकारों और मीडिया के एक वर्ग ने दावा किया कि भाजपा ने एक सर्वभारतीय चरित्र हासिल कर लिया है और इंडिया गठबंधन का ‘वाटरलू’ हो गया है. दोनों दावे अतिरंजित हैं. दक्षिण भारत अभी भी भाजपा की पहुँच से काफी दूर है — केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना अभी भी संभावना की सीमा से बाहर हैं. यह दावा भी भ्रामक है कि इंडिया गठबंधन बिखर गया है, क्योंकि उसने कई राज्यों में संयुक्त रूप से चुनाव नहीं लड़ा था.
भाजपा की सफलता रातोरात नहीं मिली. लगभग एक दशक पहले आरएसएस और मोदी-शाह नेतृत्व ने इसकी नींव रखी थी. बिहार में एसआईआर का प्रयोग करने के बाद उन्होंने इसे बंगाल में एक निर्णायक रणनीति के रूप में अपनाया. शुरुआती विरोध के बावजूद, करोड़ों को प्रभावित करने वाले मतदाता-निष्कासन ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के रुख पर, खासकर प्रभावित मतदाताओं द्वारा उठाई गई चिंताओं को खारिज करने पर, मतदान के संवैधानिक महत्व को देखते हुए आलोचना हुई है.
2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को तृणमूल से करीब 5 फीसद अधिक वोट मिले, जबकि तृणमूल को कथित रूप से SIR के कारण 4.5 प्रतिशत का नुकसान हुआ. भाजपा को 2.88 करोड़ और तृणमूल को 2.56 करोड़ वोट मिले — यानी 32 लाख का फर्क. अगर वंचित मतदाता भाग लेते, तो नतीजे शायद अलग होते. इन चुनौतियों के बावजूद, तृणमूल ने 89 सीटें जीतीं — कठिन परिस्थितियों में एक उल्लेखनीय प्रदर्शन.
भाजपा के बंगाल पर ध्यान केंद्रित करने के पीछे कई कारण थे — राष्ट्रीय विस्तार की महत्वाकांक्षा, ममता बनर्जी को राजनीतिक रूप से कमजोर करने का इरादा, और बड़े कॉर्पोरेट निवेश से जुड़े रणनीतिक आर्थिक हित.
जमीनी स्तर पर, आरएसएस ने व्यापक संपर्क रणनीतियाँ अपनाईं — जिनमें मतदाताओं की भावनाओं को प्रभावित करने के लिए अनगिनत छोटी बैठकें शामिल थीं. अल्पसंख्यक समुदायों पर मनोवैज्ञानिक दबाव और लक्षित संदेश देने के साथ मिलकर इन प्रयासों ने कुछ क्षेत्रों में मतदान के तरीकों को प्रभावित किया. इस बीच, जिला स्तर पर तृणमूल नेतृत्व इन अभियानों की व्यापकता और सूक्ष्मता से अनजान दिखा.
राहुल गांधी के बयानों ने — जिसमें उन्होंने ममता बनर्जी पर परोक्ष रूप से भाजपा की मदद करने का आरोप लगाया — भी राजनीतिक असर डाला. हालाँकि इनका मकसद कांग्रेस की स्वतंत्र स्थिति जताना था, लेकिन इन बयानों ने विपक्षी एकता को कमजोर किया और एक बँटे हुए विपक्ष की भाजपा की कहानी को मजबूत किया.
चुनाव के बाद की कुछ घटनाओं — जैसे केंद्रीय बलों की तैनाती जारी रखना और उपचुनावों के समयनिर्धारण — ने भी राज्य में राजनीतिक स्थिरता और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर पड़ने वाले उनके असर को लेकर पर्यवेक्षकों में चिंता पैदा की है.
कुल मिलाकर, यह चुनावी नतीजा संस्थागत फैसलों, राजनीतिक रणनीतियों और मतदाता व्यवहार में बदलाव के जटिल परस्पर प्रभाव को दर्शाता है — जिसके असर बंगाल की तात्कालिक राजनीतिक सीमाओं से परे तक जाते हैं.
अरुण श्रीवास्तव एक वरिष्ठ पत्रकार हैं.
बँटा हुआ जनादेश, बदलती जमीन: अल्पसंख्यक वोटों के विभाजन ने कैसे बदला बंगाल का राजनीतिक नक्शा
— मोहम्मद ज़ियाउल्लाह खान
एक नाटकीय बदलाव में, जिसने पश्चिम बंगाल के लंबे समय से चले आ रहे चुनावी समीकरणों को हिलाकर रख दिया है, भारतीय जनता पार्टी ने न केवल अपने परंपरागत गढ़ों में बल्कि उन मुस्लिम-बहुल जिलों में भी उल्लेखनीय बढ़त हासिल की है जो कभी तृणमूल कांग्रेस के मजबूत किले माने जाते थे.
वर्षों से मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जिले अल्पसंख्यक वोटों के एकजुट होने की बदौलत तृणमूल के चुनावी वर्चस्व की रीढ़ बने रहे. लेकिन इस बार एक शांत लेकिन निर्णायक बदलाव आया — वह एकजुट वोट बिखर गया, जिसने दर्जनों सीटों पर नतीजे पलट दिए.
वे आँकड़े जो कहानी सुनाते हैं
चुनावी आँकड़े इस बदलाव की व्यापकता को रेखांकित करते हैं. इन तीन जिलों की 43 विधानसभा सीटों पर भाजपा 2021 में महज 8 सीटों से उछलकर 19 सीटों पर पहुँच गई. जबकि तृणमूल का तालमेल 35 से घटकर 22 रह गया. शेष सीटें कांग्रेस, सीपीआई(एम) और आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) जैसे छोटे क्षेत्रीय दलों में बँट गईं. यह पुनर्वितरण महज भाजपा की बढ़त नहीं, बल्कि वोटों का ऐसा फैलाव है जिसने तृणमूल के एक बार विश्वसनीय समर्थन आधार को कमजोर कर दिया.
मुर्शिदाबाद: किले से रणभूमि तक
मुर्शिदाबाद, जहाँ मुसलमानों की आबादी 66 फीसद से अधिक है, इस बदलाव का सबसे स्पष्ट उदाहरण है. 2021 में तृणमूल ने यहाँ 22 में से 20 सीटें जीती थीं. इस बार उसका तालमेल गिरकर महज 9 रह गया, और भाजपा ने भी 9 सीटें जीतीं — जो पहले की महज 2 सीटों से एक असाधारण उछाल है. कांग्रेस, सीपीआई(एम) और एजेयूपी जैसे क्षेत्रीय दलों के बीच वोटों का बिखराव निर्णायक साबित हुआ. रानीनगर, डोमकल, रेजिनगर और नवदा जैसी सीटों पर बहुकोणीय मुकाबलों में बँटे हुए अल्पसंख्यक वोटों ने तृणमूल की बढ़त को पतला कर दिया.
एसआईआर का कारक और चुनावी अंतर्धाराएँ
चुनावी सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण— जिसमें अकेले मुर्शिदाबाद में करीब 7.8 लाख नाम कथित रूप से हटाए गए — ने एक महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि तैयार की. हालाँकि तृणमूल ने तर्क दिया कि ये हटाव उसके मतदाता आधार पर असमान रूप से पड़े, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि वोटों के बिखराव का असर अधिक ठोस रहा. कथित मताधिकार-हनन की प्रतिक्रिया में एकजुट होने के बजाय, अल्पसंख्यक मतदाता कई दलों में बिखर गए और नजदीकी मुकाबलों वाली सीटों पर तृणमूल को कमजोर कर दिया.
समानांतर एकजुटता: भाजपा की रणनीतिक बढ़त
जहाँ अल्पसंख्यक वोट बँटे, वहीं कई सीटों पर हिंदू मतदाताओं में एक समानांतर एकजुटता आई. कांडी और नबग्राम जैसी सीटों पर भाजपा ने इस एकजुटता का फायदा उठाकर वे जीतें हासिल कीं जो द्विध्रुवीय मुकाबले में शायद मुश्किल होतीं. यह दोहरी गतिशीलता — एक तरफ बिखराव, दूसरी तरफ एकजुटता — संतुलन बिगाड़ने में निर्णायक साबित हुई.
मालदा और उत्तर दिनाजपुर: धीमा लेकिन निर्णायक बदलाव
मालदा में भाजपा की सीटें 4 से बढ़कर 6 हो गईं, जबकि एक विभाजित विपक्ष की स्थिति में तृणमूल की पकड़ कमजोर पड़ी. कांग्रेस ने सीमित जीत दर्ज करते हुए भी तृणमूल के अंतर को काटने में काफी प्रभाव बनाए रखा. उत्तर दिनाजपुर ने भी यही रुझान दोहराया. भाजपा की सीटें 2 से 4 हो गईं, जबकि तृणमूल 7 से 5 पर खिसक गई. कई सीटों पर कांग्रेस और वाम उम्मीदवारों का संयुक्त वोट शेयर उस अंतर से अधिक था जिससे तृणमूल हारी — जो विभाजन के निर्णायक असर को उजागर करता है.
मूल जिलों से परे: एक व्यापक पैटर्न
यह चुनावी पैटर्न तीन प्रमुख जिलों तक सीमित नहीं रहा. दक्षिण 24 परगना और बीरभूम के कुछ हिस्सों में भी ऐसे ही रुझान दिखे, जहाँ अल्पसंख्यक मतदाता भले ही प्रभावशाली न हों लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. यहाँ भी बिखरे हुए वोट और एकजुट विरोध ने भाजपा को उम्मीद से परे इलाकों में पाँव फैलाने का मौका दिया.
क्या यह रणनीतिक एकजुटता का अंत है?
ये नतीजे 2021 के चुनाव से एक विदाई हैं, जब तृणमूल ने खुद को भाजपा के खिलाफ प्राथमिक दीवार के रूप में पेश कर एनआरसी-सीएए बहस के बीच भारी अल्पसंख्यक एकजुटता हासिल की थी. इस बार वह रणनीतिक एकता कमजोर पड़ती दिखी. अल्पसंख्यक मतदाताओं के कुछ वर्ग कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर लौटे, जबकि अन्य ने उभरते क्षेत्रीय खिलाड़ियों का साथ दिया. नतीजा एक बँटा हुआ जनादेश रहा जिसने तृणमूल की चुनावी बढ़त को कमजोर कर दिया.
धीमा और संघर्षरत विपक्ष
भाजपा चुनावों को एक युद्ध मशीन की तरह लड़ती है — तेजी से सीखती है, पैनी तरह से अनुकूलन करती है और अनुशासन के साथ अमल करती है. 2024 के आम चुनावों के बाद उसने अपनी रणनीति को फिर से तराशा और बंगाल व असम समेत प्रमुख राज्यों में एक के बाद एक जीत हासिल की. इसके विपरीत, इंडिया गठबंधन 2024 में मिली गति को आगे बढ़ाने में नाकाम रहा. आंतरिक अहं-टकराव, समन्वय की कमी और स्पष्ट जमीनी रणनीति के अभाव ने उसकी स्थिति कमजोर की. एक ठोस और विश्वसनीय विकल्प पेश करने के बजाय विपक्ष बिखरा हुआ और प्रतिक्रियाशील नजर आया. जबकि भाजपा ने अपना संदेश परिष्कृत किया और खुद को एक स्थिर वैचारिक ताकत के रूप में प्रस्तुत किया.
बंगाल के लिए एक नई राजनीतिक हकीकत
यह नतीजा सिर्फ सीटों के आँकड़ों में बदलाव नहीं है — यह मतदाता व्यवहार में एक गहरे परिवर्तन को दर्शाता है. अनुमानित वोट ब्लॉकों का युग समाप्त होता नजर आ रहा है, जिसकी जगह एक अधिक तरल और विखंडित राजनीतिक परिदृश्य ले रहा है. तृणमूल के सामने चुनौती अपने पारंपरिक आधार में भरोसा और एकजुटता को फिर से बनाने की है. भाजपा के लिए ये उपलब्धियाँ एक अवसर हैं — लेकिन साथ ही यह याद दिलाती हैं कि स्थायी वर्चस्व के लिए क्षेत्रों में व्यापक और निरंतर समर्थन जरूरी है. पश्चिम बंगाल का राजनीतिक नक्शा अब तय निष्ठाओं से नहीं, बल्कि मतदाताओं की विकसित होती पसंद से परिभाषित हो रहा है — शांति से, लेकिन निर्णायक रूप से.
विभाजन से लिखा गया जनादेश
इस चुनाव से जो तस्वीर उभरती है वह महज भाजपा के उभार की नहीं, बल्कि एक ऐसे विपक्ष की है जिसने अपना सबसे भरोसेमंद लाभ — वोट एकजुटता — खो दिया. अल्पसंख्यक वोटों का बिखराव और दूसरी तरफ तीखी एकजुटता ने बंगाल का चुनावी गणित बदल दिया है. तृणमूल के लिए संदेश स्पष्ट है: पुरानी वफादारियों पर निर्भरता अब काफी नहीं. व्यापक विपक्ष के लिए सबक और भी कड़ा है — अनैक्य कोई कमजोरी भर नहीं, यह एक निर्णायक देनदारी है.
ज्ञानेश कुमार: बंगाल चुनाव गाथा का ‘अमिट दाग’ वाला चेहरा
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग ने 2026 के बंगाल चुनावों पर एक ऐसी अमिट छाप छोड़ी है, जैसी पहले शायद ही किसी चुनाव में देखी गई हो.
चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दूसरे दौर में महत्वपूर्ण बदलाव पेश किए, जिसमें बंगाल सहित 12 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश शामिल थे.
पहला: बूथ स्तर के अधिकारियों (बीएलओ) को उन मतदाताओं से निर्दिष्ट दस्तावेजों की प्रतियां एकत्र करने के लिए अधिकृत नहीं किया गया था, जिनके नाम दो दशक पहले हुए पिछले एसआईआर से “मैप” (मिलान) नहीं किए जा सके थे.
दूसरा: “तार्किक विसंगतियां” फिल्टर—एक ऐसा शब्द जो कानून में परिभाषित नहीं है—का विस्तार किया गया और इस श्रेणी में आने वाले मतदाताओं को अपनी पात्रता साबित करने के लिए तलब किया गया, भले ही उनका “मिलान” हो चुका था.
बिहार में, जहाँ एसआईआर का पहला दौर हुआ था, यह फ़िल्टर वास्तविक त्रुटियों पर लागू किया गया था, जैसे कि मतदाता सूची में दर्ज आयु या नाम का पहचान दस्तावेजों से मेल न खाना. इसे भी अधिकतर बिना सम्मन (बुलावा) जारी किए ही सुलझा लिया गया था.
‘द टेलीग्राफ’ में फ़िरोज़ एल. विंसेंट के अनुसार, दूसरे दौर वाले राज्यों में, “तार्किक विसंगतियों” की श्रेणी में उन लोगों को भी शामिल किया गया, जिनके पाँच से अधिक भाई-बहन थे, या जिनकी अपने माता-पिता और दादा-दादी के साथ आयु का अंतर एक निर्धारित सीमा से अधिक या कम था.
हालाँकि, बंगाल को छोड़कर अधिकांश राज्यों में, बीएलओ के पास वर्तनी की गलतियों के बावजूद मतदाताओं को “मैप” करने का विवेकपूर्ण अधिकार था, और कई निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) ने सभी मतदाताओं को शारीरिक रूप से बुलाए बिना केवल दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर नामों को मंजूरी दे दी थी.
बंगाल में, आयोग ने केंद्र सरकार के हजारों कर्मचारियों को “माइक्रो ऑब्जर्वर” के रूप में तैनात किया. तृणमूल सरकार ने इस बात पर जोर दिया कि इन अधिकारियों के पास मतदाताओं को पंजीकृत करने की कोई कानूनी शक्ति नहीं है. चुनाव आयोग ने पलटवार करते हुए कहा कि राज्य सरकार ने ईआरओ के रूप में कार्य करने के लिए आवश्यक रैंक के पर्याप्त अधिकारी उपलब्ध नहीं कराए थे.
यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा, जिसने आयोग को “अंतिम एसआईआर सूची” प्रकाशित करने और फिर पूरक सूचियां जोड़ने की अनुमति दी — जिसके लिए बंगाल और पड़ोसी राज्यों के न्यायिक अधिकारियों ने ईआरओ की भूमिका निभाई.
विभिन्न विश्लेषणों से पता चला है कि “तार्किक विसंगतियों” की इस कुल्हाड़ी ने मुसलमानों, विवाहित महिलाओं और मतुआ दलित समुदाय को असमान रूप से प्रभावित किया, जिनके बारे में तृणमूल का दावा था कि वे पार्टी को वोट देते हैं. हटाए गए नामों में जयनगर के पूर्व सांसद तरुण मंडल भी शामिल थे.
राज्य के 19 ट्रिब्यूनल के पास “तार्किक विसंगतियों” के कारण हटाए गए नामों के खिलाफ 27 लाख से अधिक अपीलें लंबित हैं, साथ ही नामों को शामिल किए जाने के खिलाफ भी 7 लाख अपीलें हैं.
फरवरी में, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी निर्वाचन सदन में मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) कुमार और अन्य चुनाव आयुक्तों के साथ बैठक के बीच से यह कहते हुए बाहर निकल गईं कि उन्हें “अपमानित” किया गया है.
पिछले महीने, आयोग मुख्यालय में तृणमूल प्रतिनिधिमंडल और कुमार के बीच इसी तरह का टकराव हुआ था. दोनों ही मामलों में, तृणमूल सदस्यों ने दावा किया कि केवल मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ही बोले और अन्य चुनाव आयुक्त मौन रहे.
इसके बाद, चुनाव आयोग ने एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए सोशल मीडिया (एक्स) पर सत्ताधारी दल का नाम लेकर एक पोस्ट किया, जिसका शीर्षक था “तृणमूल कांग्रेस को चुनाव आयोग की खरी-खरी”.
इसमें कहा गया, “इस बार, पश्चिम बंगाल में चुनाव निश्चित रूप से होंगे: भयमुक्त, हिंसा मुक्त, डराने-धमकाने से मुक्त, प्रलोभन मुक्त और बिना किसी छप्पा (फर्जी वोटिंग), बूथ जामिंग और सोर्स जामिंग के.”
इसके तुरंत बाद, बंगाल के जिला चुनाव अधिकारियों और जिला पुलिस प्रमुखों को ट्वीट के अंतिम हिस्से को दोहराते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के लिए कहा गया. मतदाता जागरूकता के नाम पर स्कूली बच्चों को रैलियों में वही संदेश लिखे हुए प्लेकार्ड (तख्तियां) लेकर चलने के लिए जुटाया गया.
चुनाव के अंत तक, बंगाल में अनुमानित 3 लाख केंद्रीय बल के जवान तैनात थे. यह 2021 के चुनावों में तैनात सैनिकों की संख्या से तीन गुना से भी अधिक था. सरकार बनने तक चुनाव के बाद की सुरक्षा प्रदान करने के लिए लगभग 700 कंपनियों को अभी भी रोका गया है.
मतदान से पहले, बख्तरबंद कर्मियों के वाहनों का उपयोग करके फ्लैग मार्च निकाला गया. केंद्रीय बलों ने कलकत्ता में सीआरपीएफ परिसर से अपना स्वयं का कंट्रोल रूम चलाया, और जिला प्रशासन पर निर्भर हुए बिना सीधे क्षेत्र की इकाइयों से संपर्क किया.
हालाँकि बंगाल ने अतीत के चुनावों में, विशेष रूप से 2006 और 1972 में भी भारी बल की तैनाती देखी थी, लेकिन यह अभूतपूर्व सुरक्षा घेरा तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन द्वारा 1995 के बिहार चुनावों के दौरान की गई व्यवस्था से प्रेरित प्रतीत होता है.
शेषन को एक ऐसे मसीहा मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने चुनाव आयोग का कद एक निष्पक्ष मध्यस्थ और सख्त लागूकर्ता के रूप में ऊँचा किया. बिहार में केंद्रीय बलों की 650 कंपनियों को भेजने के उनके कृत्य को तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के खिलाफ एक आभासी युद्ध की घोषणा के रूप में देखा गया था, क्योंकि आयोग का राज्य पुलिस की धांधली रोकने की क्षमता से भरोसा उठ गया था.
शेषन ने बिहार के वरिष्ठ अधिकारियों को भी बदल दिया था. 8 दिसंबर 1994 को अधिसूचित उन चुनावों को चार बार स्थगित किया गया और चार चरणों में कराया गया, जो अंततः 28 मार्च 1995 को समाप्त हुए. इस सबके अंत में, लालू प्रसाद के जनता दल की जीत हुई थी.उस समय सुरक्षा घेरे ने सभी पक्षों के अपराधियों को रोका और निम्न जातियों को बाहर आकर वोट देने में सक्षम बनाया, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से दबाया जाता था और अक्सर मतदान से रोका जाता था.
इस बार बंगाल में, कलकत्ता उच्च न्यायालय को उन कथित 800 “शरारती तत्वों” पर कार्रवाई करने के पुलिस के आदेश पर रोक लगानी पड़ी, जिन्हें चुनाव आयोग ने अधिसूचित किया था. इनमें तृणमूल के कई निर्वाचित प्रतिनिधि शामिल थे. जबकि “शरारती तत्वों” की सूची के बिना भी, रिटर्निंग अधिकारियों और जिला चुनाव अधिकारियों के पास चुनाव में बाधा डालने की कोशिश करने वाले किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को हिरासत में लेने की शक्ति होती है.
तृणमूल ने शिकायत की कि सुरक्षा बल चुनिंदा रूप से उसके सदस्यों को निशाना बना रहे हैं, और ऐसे वीडियो साझा किए जिनमें भाजपा समर्थक केंद्रीय बलों की उपस्थिति में अपने तृणमूल विरोधियों के साथ मारपीट कर रहे थे. फालटा में नए सिरे से चुनाव कराने का आदेश दिया गया है—जो 2004 में बिहार के छपरा संसदीय क्षेत्र में पुनर्मतदान के बाद अपनी तरह का पहला मामला है.
पुलिस पर्यवेक्षक अजय पाल शर्मा—जो उत्तर प्रदेश के एक आईपीएस अधिकारी हैं—को सार्वजनिक रूप से तृणमूल उम्मीदवार जहांगीर खान को मतदान के दौरान किसी भी शरारत के खिलाफ चेतावनी देते देखा गया. आमतौर पर पर्यवेक्षकों का काम कार्रवाई करना नहीं होता. इसके बजाय वे जो गलत देखते हैं, उसकी रिपोर्ट अपने ‘ऊपर’ करने की अपेक्षा उनसे की जाती है.
बंगाल और तमिलनाडु दोनों में, आयोग ने मुख्य सचिव, गृह सचिव और डीजीपी सहित अन्य अधिकारियों का स्थानांतरण किया. बंगाल में, आयोग ने एक कदम आगे बढ़ते हुए सैकड़ों पुलिस निरीक्षकों और ब्लॉक विकास अधिकारियों (बीडीओ) का तबादला कर दिया, जिससे “नौकरशाही के पंगु” होने के खिलाफ अदालत में मामला दर्ज हुआ. ममता ने चुनाव आयोग पर “राष्ट्रपति शासन” थोपने का आरोप लगाया.
चुनावी अधिकारियों ने ‘साइलेंस पीरियड’ (चुनाव प्रचार थमने के बाद) के दौरान दुपहिया वाहनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया, जिसे बाद में अदालत के हस्तक्षेप के बाद संशोधित किया गया.शराब पर लंबे समय तक लगाए गए प्रतिबंध में भी बदलाव करना पड़ा. अतीत में, आयोग ने बंगाल में मतदान के दौरान बाइक रैलियों और यहाँ तक कि सड़क किनारे कैरम क्लबों पर भी प्रतिबंध लगाया, लेकिन निजी परिवहन के सबसे लोकप्रिय साधन पर पूर्ण प्रतिबंध का प्रयास कभी नहीं किया गया था.
जिस मगरमच्छ के लिए ममता ने नहर खोदी थी, उसी ने अंततः उन्हें निगल लिया; बंगाल जनादेश के निहितार्थ
जैसा कि ममता बनर्जी निस्संदेह महसूस करेंगी जब हार का अहसास गहराने लगेगा—किस्मत एक चंचल प्रेमिका की तरह होती है.
वह हमेशा की तरह खुद को छोड़कर बाकी सभी को दोष देंगी, लेकिन बंगाल 2026 के फैसले का बड़ा निहितार्थ स्पष्ट है: उन्होंने उस उम्मीद और विश्वास को गंवा दिया है जो राज्य ने डेढ़ दशक तक चुनाव दर चुनाव उन पर जताया था.
‘द टेलीग्राफ’ में मेघदीप भट्टाचार्य के अनुसार, जैसे ही यह साफ हुआ कि 15 साल से सत्ता पर उनकी पकड़ अब छूट रही है, तृणमूल कांग्रेस की सर्वोच्च नेता शाम को अपने भवानीपुर गणना केंद्र पर “लूट! लूट! लूट!” चिल्लाईं. उन्होंने बड़े पैमाने पर मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और “गिनती में धोखाधड़ी” का आरोप लगाया.
निर्वाचन आयोग को “भाजपा आयोग” बताते हुए उन्होंने कहा, “क्या आपको लगता है कि यह जीत है? यह एक अनैतिक जीत है, नैतिक नहीं... राक्षसी पार्टी... उन्होंने 100 सीटें चुरा लीं, 100 से अधिक सीटों पर उन्होंने लूट और धोखाधड़ी की!” उन्होंने आगे कहा, “प्रधानमंत्री, (केंद्रीय) गृह मंत्री... यह पूरी तरह से अवैध है. हम चुनाव रद्द करने की मांग करेंगे. सर, ये अत्याचार, गिनती में धोखाधड़ी... लूट! लूट! लूट!”
2 मई 2021 को ममता नंदीग्राम में अपना व्यक्तिगत मुकाबला हार गई थीं, लेकिन उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में अपनी पार्टी का नेतृत्व करते हुए शानदार जीत दिलाई थी. सोमवार को, ठीक 1,828 दिन बाद, वह राज्य में भाजपा की लहर को रोकने में विफल रहीं और खुद अपने गढ़ भवानीपुर से 15,105 मतों के अंतर से हार गईं.
दोनों ही मौकों पर ममता के प्रतिद्वंद्वी उनके पूर्व शिष्य और अब धुर विरोधी सुवेन्दु अधिकारी थे, जो अब भगवा खेमे के इस ‘ट्रॉफी स्टेट’ की कमान संभालने की दौड़ में सबसे आगे हैं.
13 मई 2011 को ममता बनर्जी ने सिंगुर-नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के दम पर 34 साल पुराने वामपंथी शासन को उखाड़ फेंका था. उस ‘डेविड और गोलियथ’ की लड़ाई के बाद सोमवार को 5,470 दिन पूरे हुए.
पंद्रह साल बाद, सोमवार को उनका ‘गोलियथ’ क्षण था (जब एक विशाल सत्ता ढह गई), जहाँ लगभग 46 प्रतिशत मतदाताओं ने ‘पोरिवोर्तन’ (परिवर्तन) को चुना—वही बदलाव जिसका वादा उन्होंने कभी किया था, लेकिन जिसे देने में वह बड़े पैमाने पर विफल मानी गईं. इसके विपरीत केवल 41 प्रतिशत लोग उनके साथ खड़े रहे.
तृणमूल के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “वह झुकेंगी लेकिन टूटेंगी नहीं. वह विश्लेषण करेंगी और कई लोगों में दोष ढूंढेंगी. लेकिन जैसे-जैसे अंधेरा घिरेगा और उम्मीद की हर किरण बुझ जाएगी, वह बहुत थका हुआ महसूस करेंगी.”
नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने स्वीकार किया कि राजनीति के अपराधीकरण, भ्रष्टाचार, आर्थिक और औद्योगिक ठहराव और बेरोजगारी के खिलाफ बढ़ते सत्ता-विरोधी आक्रोश के सामने ममता की ‘खैरात और भत्ते’ अपर्याप्त साबित हुए.
उन्होंने कहा, “उन्होंने इसे ‘एसआईआर’ विरोधी जनमत संग्रह में बदलने की पूरी कोशिश की. लेकिन आर.जी. कर (बलात्कार-हत्या) और कई घोटालों जैसे मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सका. न ही हम बहुसंख्यक हिंदुओं के बीच अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की धारणा को खत्म कर पाए. कम से कम उनके तीसरे (और अब अंतिम) कार्यकाल को रोजगार सृजन, औद्योगीकरण, आर्थिक उत्थान और भ्रष्टाचार व अपराधीकरण पर लगाम लगाने पर केंद्रित होना चाहिए था.”
इस नेता जैसे कई लोग—भले ही 30बी हरीश चटर्जी स्ट्रीट की निवासी खुद ऐसा न सोचती हों—यह सोचने लगे हैं कि क्या यह 71 वर्षीय राजनीतिज्ञ के पांच दशकों के लंबे और उतार-चढ़ाव वाले सार्वजनिक जीवन का अंत है.
एक राजनीतिक विश्लेषक ने कहा, “उन्होंने अतीत में कई आश्चर्यजनक वापसी की हैं, और यदि वह एक दशक छोटी होतीं तो एक और वापसी संभव हो सकती थी. (भतीजे और उत्तराधिकारी) अभिषेक बनर्जी में शायद वह बात नहीं है. इस समय उन्हें यह भी नहीं पता कि अगली बड़ी चुनावी परीक्षा तक पार्टी एकजुट रहेगी या नहीं. उस पार्टी के लिए यह सोचना भी डरावना है जिसके पास अभी भी 42 सांसद (दोनों सदनों को मिलाकर) हैं.”
ममता मुख्यमंत्री के रूप में तीन कार्यकाल के बाद पद छोड़ेंगी. 2008 की गर्मियों से उन्होंने बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य पर अपना दबदबा बनाए रखा था.
तृणमूल के एक सांसद ने कविता का सहारा लेते हुए कहा, “तो इस तरह हमारी दुनिया का अंत होता है, किसी धमाके के साथ नहीं, बल्कि एक कराह के साथ.”
एक निवर्तमान मंत्री ने व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ टिप्पणी की कि जून 1977 (जब ज्योति बसु के नेतृत्व वाले वामपंथ ने कांग्रेस से बंगाल छीना था) के बाद पहली बार राज्य में ऐसी सरकार होगी जिसके पास केंद्र द्वारा “सौतेले व्यवहार” का बहाना नहीं होगा.
कुछ समय तक इस चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे, क्योंकि ज्ञानेश कुमार के चुनाव आयोग के संदिग्ध “तार्किक विसंगतियों” के पैरामीटर और सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में किए गए सामूहिक निष्कासन के कारण लाखों मतदाताओं को भागीदारी से वंचित कर दिया गया. लेकिन संभावना है कि ये शिकायतें जल्द ही दब जाएंगी. इतिहास हारने वालों पर कम ही दया दिखाता है.
ममता, जिन्होंने बार-बार शाम को प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का वादा किया था, दोपहर 12.44 बजे अपने सोशल मीडिया पर 91 सेकंड के वीडियो संदेश के रूप में पहली बार सामने आईं. इसमें उन्होंने अपने काउंटिंग एजेंटों को भाजपा-चुनाव आयोग-केंद्रीय बलों के “गेम प्लान” में न फंसने की चेतावनी दी.
उन्होंने हाथ जोड़कर अपने कार्यकर्ताओं से पोस्ट न छोड़ने का आग्रह करते हुए कहा, “वे बढ़त को रोक रहे हैं, गिनती रोक रहे हैं... अन्य 70-100 सीटों पर जहां हम जीत रहे हैं, वे उसे नहीं दिखा रहे हैं. एक बार सूरज डूबने दीजिए, हम जीतेंगे.”
जैसे ही सूरज पश्चिम की ओर झुका, ममता एक बार फिर सार्वजनिक रूप से दिखाई दीं. वह भवानीपुर के गणना केंद्र सखावत मेमोरियल गवर्नमेंट गर्ल्स हाई स्कूल पहुंचीं, जहाँ उनके एक काउंटिंग एजेंट को जबरन बाहर निकाले जाने के आरोप लगे थे. सुवेन्दु अधिकारी भी वहां मौजूद थे.
कुछ समय बाद वह अपने घर लौट आईं. उनके कालीघाट मोहल्ले में मीडियाकर्मियों और पुलिस की भीड़ धीरे-धीरे कम होने लगी थी—वर्षों में पहली बार राज्य की सत्ता का केंद्र बदल चुका था.
कांग्रेस के एक प्रतिद्वंद्वी ने कड़वाहट भरे स्वर में कहा, “मुझे विश्वास होने लगा था कि ममता ‘ससम्मान सेवानिवृत्त मुख्यमंत्री’ रहेंगी. यह थोड़ा दुखद है, क्योंकि उनकी विरासत कहीं अधिक सार्थक और स्थायी हो सकती थी.” उन्होंने आगे तंज कसते हुए कहा, “यह एक तरह का काव्यात्मक न्याय है. जिस मगरमच्छ के लिए उन्होंने खुद नहर खोदी थी और बंगाल में आमंत्रित किया था (अटल बिहारी वाजपेयी के युग में भाजपा सहयोगी के रूप में), उसी ने अंततः उन्हें निगल लिया.”
एसआईआर से सीआरपीएफ तक: वे पाँच कारण जिन्होंने बंगाल में भाजपा की जीत सुनिश्चित की
स्क्रोल के मुताबिक, पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 का जनादेश केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक और सामाजिक बदलाव का संकेत देता है. जिस राज्य में लंबे समय तक वामपंथ और फिर तृणमूल कांग्रेस का वर्चस्व रहा, वहां भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार दो-तिहाई बहुमत के साथ जीत दर्ज की. यह जीत अचानक नहीं आई, बल्कि कई रणनीतिक, सामाजिक और संस्थागत कारकों के संयोजन का परिणाम है. इन कारकों को समझे बिना इस जनादेश का सही विश्लेषण संभव नहीं है.
1. एसआईआर और मतदाता सूची का पुनर्गठन
इस चुनाव का सबसे विवादास्पद और निर्णायक कारक मतदाता सूची का ‘विशेष गहन संशोधन’ (एसआइआर) रहा. यह केवल एक प्रशासनिक कवायद नहीं, बल्कि चुनावी परिदृश्य को प्रभावित करने वाला बड़ा हस्तक्षेप साबित हुआ. इस प्रक्रिया के तहत लाखों नाम मतदाता सूची से हटाए गए, जिससे कुल सूची में लगभग 10-12% की कमी आई.
विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा हमला बताया और आरोप लगाया कि कई वैध मतदाताओं को भी सूची से बाहर कर दिया गया, खासकर सीमावर्ती और अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में. इसके उलट, भाजपा ने इसे “शुद्धिकरण” बताते हुए दावा किया कि इससे फर्जी और अवैध नाम हटे हैं, जिससे चुनाव अधिक पारदर्शी बने.
राजनीतिक असर स्पष्ट रहा. जिन सीटों पर बड़ी संख्या में नाम हटे, वहां जीत का अंतर कम जरूर था, लेकिन परिणाम निर्णायक रूप से भाजपा के पक्ष में गया. इससे चुनावी गणित बदल गया. कुल वोटर घटने से जीत के लिए आवश्यक वोटों की संख्या भी कम हो गई. कुल मिलाकर, एसआइआर ने न केवल मतदाता सूची बदली, बल्कि चुनाव के परिणाम को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख कारक बन गया.
2. सांप्रदायिक ध्रुवीकरण
एसआइआर ने केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं किया, बल्कि उसने सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण को भी तेज कर दिया. यह प्रक्रिया धीरे-धीरे चुनावी नैरेटिव का केंद्र बन गई, जहाँ आंकड़ों और सूची संशोधन से आगे बढ़कर पहचान की राजनीति हावी हो गई. भाजपा ने इसे जनसांख्यिकीय असंतुलन के मुद्दे से जोड़ा और यह संदेश देने की कोशिश की कि राज्य की सामाजिक संरचना बदल रही है, जिसे “सुधारने” की जरूरत है. इस नैरेटिव के जरिए हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने की रणनीति अपनाई गई.
दूसरी ओर, ममता बनर्जी पर “मुस्लिम तुष्टीकरण” के आरोपों को नए सिरे से उभारा गया. यह आरोप पहले भी लगते रहे थे, लेकिन एसआइआर के बाद यह ज्यादा प्रभावी राजनीतिक हथियार बन गया. इसके जवाब में तृणमूल कांग्रेस को मुस्लिम वोटों का बड़ा और अपेक्षाकृत एकजुट समर्थन मिला, खासकर उन इलाकों में जहाँ मतदाता सूची से नाम हटाने को लेकर असंतोष था.
हालाँकि, इस प्रतिक्रिया का दूसरा असर यह हुआ कि हिंदू मतदाताओं का ध्रुवीकरण और तेज हो गया. चुनावी मुकाबला धीरे-धीरे मुद्दों से हटकर पहचान आधारित समर्थन में बदल गया. परिणामस्वरूप, भाजपा को व्यापक हिंदू समर्थन मिला, जिसने कई सीटों पर उसे निर्णायक बढ़त दिलाई. यही संगठित समर्थन उसकी जीत की सबसे मजबूत नींव साबित हुआ.
3. ‘बाहरी’ छवि से छुटकारा
2021 के चुनावों में भाजपा को “बाहरी पार्टी” के रूप में पेश किया गया था, जिससे उसे स्पष्ट नुकसान हुआ था. इस बार पार्टी ने इस धारणा को तोड़ने के लिए अपनी रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव किए. सबसे बड़ा बदलाव यह रहा कि अभियान का चेहरा बाहरी नेताओं की बजाय राज्य के अपने नेताओं को बनाया गया.
सुवेंदु अधिकारी और सामिक भट्टाचार्य जैसे स्थानीय चेहरों को आगे कर भाजपा ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वह अब केवल “दिल्ली की पार्टी” नहीं, बल्कि बंगाल की जमीन से जुड़ी ताकत है. इससे कार्यकर्ताओं में भी आत्मविश्वास बढ़ा और स्थानीय स्तर पर पकड़ मजबूत हुई.
साथ ही, पार्टी ने सांस्कृतिक स्तर पर भी अपनी उपस्थिति को स्थानीय बनाने की कोशिश की. बंगाली भाषा, खानपान, त्योहारों और परंपराओं को अपनाकर यह दिखाया गया कि भाजपा राज्य की पहचान का सम्मान करती है. प्रधानमंत्री स्तर तक इस तरह के प्रतीकात्मक संकेतों का इस्तेमाल किया गया, जिससे संदेश और मजबूत हुआ.
इस रणनीति का असर यह हुआ कि तृणमूल कांग्रेस द्वारा लगाए जा रहे “बाहरी” के आरोपों की धार काफी हद तक कुंद हो गई. भाजपा खुद को एक “स्थानीय विकल्प” के रूप में स्थापित करने में सफल रही, जो इस चुनाव में उसकी बढ़त का एक अहम कारण बना.
4. सत्ता-विरोधी लहर (एंटी-इंकम्बेंसी)
लगातार 15 वर्षों की सत्ता के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ असंतोष स्वाभाविक था, लेकिन इस बार यह नाराज़गी अधिक व्यापक और गहरी दिखी. समय के साथ शासन से जुड़ी अपेक्षाएँ बढ़ीं, जबकि कई मोर्चों पर प्रदर्शन को लेकर सवाल भी तेज हुए.
भ्रष्टाचार के आरोप, बेरोजगारी, औद्योगिक ठहराव और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों ने जनता के बीच असंतोष को बढ़ाया. खासकर आर.जी. कर बलात्कार-हत्या मामले के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों ने सरकार की छवि को गंभीर नुकसान पहुँचाया और विपक्ष को एक मजबूत नैरेटिव दे दिया. यह मामला सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं रहा, बल्कि शासन की जवाबदेही और संवेदनशीलता पर बड़े सवाल खड़े करने लगा.
भाजपा ने इस असंतोष को संगठित तरीके से राजनीतिक दिशा दी. उसने “पोरिबोर्तन” (परिवर्तन) के उसी नारे को फिर से जीवित किया, जिसने कभी ममता बनर्जी को सत्ता तक पहुँचाया था. यह एक तरह से नैरेटिव की पुनरावृत्ति थी.जहाँ जनता से कहा गया कि जैसे उन्होंने वामपंथ को हटाया था, वैसे ही अब एक और बदलाव का समय है.
यह रणनीति इसलिए प्रभावी रही क्योंकि यह सिर्फ आलोचना तक सीमित नहीं थी, बल्कि मतदाताओं को एक स्पष्ट विकल्प और भावनात्मक अपील भी दे रही थी. नतीजतन, सत्ता-विरोधी लहर भाजपा के पक्ष में एक निर्णायक ताकत बन गई.
5. केंद्र की संस्थागत और मनोवैज्ञानिक बढ़त
भाजपा को केंद्र में सत्तारूढ़ होने का स्पष्ट लाभ मिला, जिसने इस चुनाव में उसकी स्थिति को और मजबूत किया. जांच एजेंसियों की बढ़ती सक्रियता, भारतीय निर्वाचन आयोग के फैसले और सुरक्षा बलों की व्यापक तैनाती ने एक ऐसा मनोवैज्ञानिक माहौल तैयार किया, जिसमें यह धारणा बनने लगी कि भाजपा की जीत लगभग तय है.
चुनाव से पहले बड़ी संख्या में अधिकारियों के तबादले और प्रशासनिक फेरबदल ने यह संकेत दिया कि राज्य की नौकरशाही पर तृणमूल कांग्रेस की पकड़ पहले जैसी मजबूत नहीं रही. इससे मतदाताओं के बीच यह संदेश गया कि सत्ता संतुलन बदल रहा है और केंद्र की भूमिका अधिक प्रभावी हो चुकी है.
साथ ही, केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल सहित केंद्रीय सुरक्षा बलों की भारी तैनाती ने चुनावी माहौल को भी प्रभावित किया. कई ऐसे मतदाता, जो पहले स्थानीय दबाव या डर के कारण मतदान केंद्र तक नहीं पहुंच पाते थे, इस बार अधिक आत्मविश्वास के साथ वोट डालने निकले.
उच्च मतदान प्रतिशत इस बात का संकेत देता है कि सुरक्षा और “फ्री एंड फेयर” चुनाव की भावना ने मतदाताओं को प्रेरित किया. इस तरह संस्थागत ताकत और मनोवैज्ञानिक बढ़त का यह संयोजन भाजपा के पक्ष में एक महत्वपूर्ण कारक साबित हुआ.
बंगाल में भाजपा की जीत केवल एक चुनावी सफलता नहीं, बल्कि बहुस्तरीय रणनीति का परिणाम है, जिसमें प्रशासनिक हस्तक्षेप, सामाजिक ध्रुवीकरण, स्थानीयकरण की राजनीति, सत्ता-विरोधी लहर और संस्थागत प्रभाव एक साथ शामिल रहे.
यह जनादेश बताता है कि भारतीय राजनीति में अब केवल करिश्माई नेतृत्व या कल्याणकारी योजनाएं ही पर्याप्त नहीं हैं; चुनाव जीतने के लिए व्यापक और बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता होती है. बंगाल 2026 इसी बदलती राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है.
राहुल गांधी ने टीएमसी की हार पर ‘खुशी मनाने’ वाले कांग्रेस नेताओं को फटकारा: ‘तुच्छ राजनीति को किनारे रखें’
बंगाल में भाजपा की भारी जीत के एक दिन बाद, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपनी ही पार्टी और अन्य दलों के उन नेताओं की कड़ी आलोचना की है, जो टीएमसी (तृणमूल कांग्रेस) का मजाक उड़ा रहे हैं और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की हार पर “खुशी” मना रहे हैं. उन्होंने कहा कि विपक्ष की यह हार भारत के लोकतंत्र को नष्ट करने के भाजपा के “मिशन” में केवल एक “बड़ा कदम” है. शिवसेना (यूबीटी) की पूर्व राज्यसभा सदस्य प्रियंका चतुर्वेदी ने भी इस तरह की खुशी को “शर्मनाक” बताया है.
‘एक्सप्रेस वेब डेस्क’ के अनुसार, राहुल गांधी ने कहा, “कांग्रेस के कुछ लोग और अन्य नेता टीएमसी की हार पर खुशी मना रहे हैं. उन्हें यह स्पष्ट रूप से समझने की जरूरत है—असम और बंगाल के जनादेश की चोरी भारतीय लोकतंत्र को नष्ट करने के भाजपा के मिशन में एक बड़ा कदम है. तुच्छ राजनीति को किनारे रखें. यह किसी एक पार्टी या दूसरी पार्टी के बारे में नहीं है. यह भारत के बारे में है.”
पिछले 24 घंटों में यह दूसरी बार है जब राहुल गांधी ने ममता बनर्जी का पक्ष लिया है. इससे पहले सोमवार को उन्होंने कहा था: “हम ममता जी से सहमत हैं। बंगाल में 100 से अधिक सीटें चुराई गई हैं.”
प्रियंका चतुर्वेदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट किया: “इंडिया गठबंधन के भीतर से ही टीएमसी और डीएमके की विफलता पर जिस तरह की खुशी जताई जा रही है, वह देखना शर्मनाक है. ऐसी ही शेखी बघारते हुए तब देखा गया था जब अरविंद केजरीवाल, तेजस्वी यादव (इंडिया गठबंधन का हिस्सा) हारे थे और हाल ही में ‘आप’ के विभाजन के समय भी. और अब आगामी यूपी चुनावों के लिए अखिलेश यादव पर निशाना साधा जा रहा है. ये विभाजन ही वे चीजें हैं जिन्हें मतदाता खारिज कर देते हैं और भाजपा इनका फायदा उठाती है.”
उन्होंने कहा कि 2024 के चुनावों में सभी दलों के सहयोगी प्रयास ने विपक्ष को काफी मजबूती दिलाने में मदद की थी. उन्होंने आगे कहा, “इसलिए कृपया पीछे हटें और उस भावना को याद करें जिसके लिए इंडिया गठबंधन का गठन हुआ था.”
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया गिरकर सौ के और नजदीक, 95.25 के नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद
खाड़ी देशों में नए सिरे से शुरू हुए संघर्ष और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बुनियादी ढांचे को निशाना बनाए जाने के कारण निवेशकों द्वारा जोखिम वाली संपत्तियों से दूरी बनाने के चलते मंगलवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 2 पैसे गिरकर 95.25 (अंतिम) के सर्वकालिक निचले स्तर पर बंद हुआ. इन घटनाओं ने आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) की चिंताओं को फिर से बढ़ा दिया है.
‘पीटीआई’ के अनुसार, विदेशी मुद्रा व्यापारियों ने कहा कि ब्रेंट ऑयल का भाव 110 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के करीब बने रहने से भारत जैसी तेल-आयातक अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बना हुआ है. इसके अलावा, बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच विदेशी पूंजी की निरंतर निकासी जैसे कारकों ने निवेशकों की धारणा को और कमजोर कर दिया.
अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.30 पर खुला, जिसके बाद इसमें गिरावट आई और इंट्रा-डे ट्रेड के दौरान यह 95.44 के सर्वकालिक निचले स्तर को छू गया. सोमवार को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 39 पैसे गिरकर 95.23 के सर्वकालिक निचले स्तर पर बंद हुआ था.
विनिर्माण गतिविधियाँ सुस्त बनी हुई हैं; इनपुट लागत 44 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुँची
इस बीच, सोमवार को एसएंडपी ग्लोबल द्वारा जारी एक उद्योग सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, कमजोर मांग और बढ़ती इनपुट लागत (लागत मूल्य) से प्रभावित होने के कारण अप्रैल में लगातार दूसरे महीने विनिर्माण गतिविधियाँ सुस्त रहीं, जैसा कि ‘डेक्कन हेराल्ड’ ने अपनी रिपोर्ट में बताया है. इनपुट लागत में यह उछाल एल्यूमीनियम, रसायनों, विद्युत घटकों, ईंधन, चमड़े, पेट्रोलियम उत्पादों और रबर की ऊँची कीमतों के कारण देखा गया. सर्वेक्षण में शामिल कंपनियों ने इन कीमतों में वृद्धि के लिए पश्चिम एशिया के संघर्ष को जिम्मेदार ठहराया. मुद्रास्फीति (महंगाई) की समग्र दर अगस्त 2022 के बाद से अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच गई है.
टीसीएस नासिक: 9 में से सिर्फ एक एफआईआर में निदा खान का नाम, लेकिन टीवी चैनलों ने ‘मास्टरमाइंड’ बताया
‘ऑल्ट न्यूज़’ में अंकिता महालनोबिश और शिंजिनी मजूमदार के अनुसार, नासिक के टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) बीपीओ मामले में दर्ज नौ एफआईआर (प्राथमिकी) में से केवल एक में निदा खान का नाम है, और वह भी कथित तौर पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के संबंध में. हालाँकि, इसके बाद मीडिया के कुछ वर्गों में जो कुछ भी दिखाया गया, उसका इस रिकॉर्ड से कोई मेल नहीं था. पिछले महीने आरोप सामने आने के बाद टीवी समाचार चैनलों पर जो कुछ प्रसारित किया गया और एफआईआर में जो दस्तावेज दर्ज हैं, उनके बीच जमीन-आसमान का अंतर है.
एफआईआर के परीक्षण से पता चलता है कि उनमें से कोई भी उन सनसनीखेज दावों का समर्थन नहीं करती है जो भारत के प्रमुख समाचार चैनलों पर प्राइम टाइम में प्रसारित किए गए थे. जहाँ केवल एक एफआईआर में निदा खान का नाम है और शिकायत हिंदू देवी-देवताओं के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी तक सीमित है, वहीं शिव अरूर, अर्णब गोस्वामी, अंजना ओम कश्यप और राहुल शिवशंकर सहित कई ‘स्टार’ एंकरों ने उन्हें तथाकथित “कॉर्पोरेट जिहाद” या “धर्मांतरण सिंडिकेट” की “मास्टरमाइंड” के रूप में चित्रित किया. उन पर आरोप लगाया गया कि वह हिंदू महिलाओं को निशाना बनाने और उनके धर्मांतरण की साजिश रच रही थीं. ये आरोप बिना किसी विश्वसनीय स्रोत के पेश किए गए और एफआईआर में इनका कोई उल्लेख नहीं है, जो कि इस मामले का आधार हैं.
विभिन्न चैनलों पर यह विमर्श (नरेटिव) अपुष्ट दावों की एक श्रृंखला पर बनाया गया था: जैसे भर्ती के दौरान महिलाओं को व्यवस्थित रूप से निशाना बनाया गया, उनका ब्रेनवॉश किया गया और शोषण किया गया, और धमकी या ब्लैकमेल के तहत धर्मांतरण के लिए मजबूर किया गया. यह भी दावा किया गया कि खान ने अपनी एचआर भूमिका का कथित तौर पर उपयोग करते हुए इन शिकायतों को दबा दिया. इसके अतिरिक्त यह भी दावे किए गए कि उन्होंने कर्मचारियों को हिजाब या बुर्का पहनने या इस्लामी प्रथाओं का पालन करने का निर्देश दिया—इन दावों का एफआईआर में कोई आधार नहीं होने के बावजूद इन्हें व्यापक रूप से प्रसारित किया गया.
एफआईआर में वास्तव में क्या लिखा है?
नौ एफआईआर की समीक्षा से पता चलता है कि उनमें कुल मिलाकर आठ व्यक्तियों के नाम हैं. ये हैं: रजा मेमन, तौसीफ अत्तार, शाहरुख कुरैशी, दानिश शेख, शफी शेख, आसिफ अंसारी, निदा खान और अश्विनी चैनानी.
आरोप दखलअंदाजी वाले व्यक्तिगत सवाल पूछने से लेकर छेड़छाड़, यौन उत्पीड़न और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने तक के हैं. रजा मेमन और तौसीफ का नाम नौ में से पाँच एफआईआर में है; उन पर विरोध के बावजूद महिला सहयोगियों के साथ बार-बार अवांछित व्यवहार करने का आरोप है. एक मामले में, मेमन ने कथित तौर पर एक महिला कर्मचारी से उसकी मासिक धर्म संबंधी समस्याओं के बारे में पूछा. कई शिकायतकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया है कि इन दोनों ने इस्लाम की श्रेष्ठता का सुझाव देने वाली टिप्पणियाँ कीं और हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाया.
एक शिकायतकर्ता का आरोप है कि रमजान के दौरान उसे तौसीफ के घर पर टोपी पहनने के लिए मजबूर किया गया, नमाज पढ़ने के लिए विवश किया गया और शाकाहारी होने के बावजूद मांसाहारी भोजन खिलाया गया.
ऑपरेशनल हेड अश्विनी चैनानी का नाम कई एफआईआर में है; एक मामले में उन पर आरोपियों का साथ देने और शिकायतों पर कार्रवाई न करने का आरोप है. इसी तरह के आरोप सीनियर मैनेजर नितिन कपूर के खिलाफ भी लगाए गए हैं. दो एफआईआर में नामित आसिफ अंसारी पर घूरने से लेकर छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोप हैं.
श्रीलंका के मीडिया में छा गई तमिलनाडु में सी. जोसेफ विजय की बड़ी जीत
श्रीलंकाई तमिल मीडिया ने मंगलवार (5 मई, 2026) को अपने मुख्य पृष्ठों पर अभिनेता सी. जोसेफ विजय को प्रमुखता दी और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में उनकी बड़ी जीत की खबरें और तस्वीरें प्रकाशित कीं. सोमवार (4 मई, 2026) को कई प्रकाशनों, विशेष रूप से न्यूज़ पोर्टल्स ने तमिलनाडु चुनाव परिणामों के रुझानों पर लगातार नज़र रखी और विजय के घोषणापत्र की मुख्य बातों व विभिन्न दलों द्वारा जीती गई सीटों के नियमित अपडेट दिए.
मीरा श्रीनिवासन की रिपोर्ट कहती है कि प्रमुख तमिल समाचार पत्रों—वीरकेसरी, तमिलन, थिनकरन और थिनकुरल—ने विजय की जीत को मुख्य खबर बनाया. उन्होंने अपनी सुर्खियों में इसे “विशाल जीत” और “सुनामी” करार दिया. वहीं, प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट अवंता आर्टिगाला ने डेली मिरर में एक कार्टून प्रकाशित किया, जिसमें अभिनेता-राजनेता को दक्षिण भारत से उभरते हुए दिखाया गया है. रिपोर्टों और सोशल मीडिया पोस्ट्स में विजय के समर्थकों और प्रशंसकों को उत्तरी प्रांत में जीत का जश्न मनाने के लिए पटाखे फोड़ते हुए भी दिखाया गया.
श्रीलंकाई नेताओं ने दी बधाई
श्रीलंका के राजनीतिक नेताओं ने भी तमिलनाडु के नए नेता को अपनी शुभकामनाएं भेजीं. ‘इलंकई तमिल अरासु कच्ची’ (आईटीएके) के महासचिव और जाफना के पूर्व विधायक एम.ए. सुमन्थिंरन ने ‘तमिलगा वेत्री कज़गम’ (टीवीके) और विजय को बधाई देते हुए सोशल मीडिया पर लिखा: “हम ईमानदारी से आशा करते हैं कि श्रीलंका के तमिल लोगों के लिए तमिलनाडु की जनता और सरकार का समर्थन निरंतर जारी रहेगा.” पूर्वी बट्टिकलोआ जिले के सांसद शाणक्यन राजमाणिक्यम ने मंगलवार को संसद में बोलते हुए विजय को उनकी “ऐतिहासिक जीत” पर बधाई दी. उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दों पर तमिलनाडु की सरकार और जनता के साथ मिलकर काम करने की इच्छुक है. राजपक्षे परिवार की पार्टी ‘श्रीलंका पोदुजाना पेरामुना’ के राष्ट्रीय आयोजक नामल राजपक्षे ने ‘एक्स’ पर विजय की “शानदार जीत” की सराहना की. उन्होंने कहा, “असली काम अब शुरू होता है. मैं आपको और आपकी टीम को चुनौतियों से उबरने और लोगों को सार्थक लाभ पहुंचाने की शक्ति की कामना करता हूं. मुझे उम्मीद है कि दोनों देशों के लोगों को प्रभावित करने वाले मामलों पर श्रीलंका के साथ संबंध अधिक मजबूत और सकारात्मक होंगे.”
श्रीलंका और तमिलनाडु का गहरा नाता
श्रीलंका, विशेष रूप से वहां की तमिल आबादी, हमेशा से तमिलनाडु के राजनीतिक घटनाक्रम पर करीब से नज़र रखती रही है. वे इसे श्रीलंका के ‘तमिल प्रश्न’, तमिलनाडु में रह रहे श्रीलंकाई शरणार्थियों की वापसी, युद्ध प्रभावित उत्तरी श्रीलंकाई मछुआरों को प्रभावित करने वाले मत्स्य विवाद और कच्चाथीवू को वापस लेने जैसे उकसावे वाले बयानों के संदर्भ में देखते हैं.
2009 में युद्ध की समाप्ति के बाद से, और श्रीलंका में नई दिल्ली की प्राथमिकताओं के रणनीतिक साझेदारी व विकास सहयोग की ओर झुकने के कारण, कई लोग मानते हैं कि “श्रीलंकाई तमिल मुद्दा” भारत के लिए अब कम प्राथमिकता वाला रह गया है. यहाँ तक कि तमिलनाडु के भीतर भी अब यह मतदाताओं के लिए कोई प्रमुख मुद्दा नहीं है, हालाँकि कुछ नेता समय-समय पर इसे उठाने की कोशिश करते हैं.
तमिलनाडु चुनावों के दौरान, श्रीलंका में कई सोशल मीडिया अकाउंट्स ने अलग-अलग उम्मीदवारों और तमिल राजनीति पर उनके प्रभाव को लेकर व्यंग्यात्मक वीडियो (रील्स) और टिप्पणियाँ साझा कीं. 23 अप्रैल, 2026 को मतदान से पहले, जाफना से ऐसी खबरें आईं जहाँ विभिन्न समूहों ने पाक जलडमरूमध्य के उस पार तमिलनाडु के उम्मीदवारों के समर्थन में कट-आउट और बैनर लगाए थे.
वामपंथ के गढ़ में फातिमा ताहिलिया की कहानी: मुस्लिम लीग की पहली महिला विधायक
इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) की पहली महिला विधायक फातिमा ताहिलिया ने वामपंथ के मजबूत गढ़ में एलडीएफ संयोजक को हराकर बड़ी जीत हासिल की है. कालीकट विश्वविद्यालय से कानून में स्नातकोत्तर और 34 वर्षीय अधिवक्ता फातिमा ताहिलिया ने हाई-प्रोफाइल पेराम्बरा विधानसभा क्षेत्र में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के वरिष्ठ नेता टी. पी. रामकृष्णन को शिकस्त दी.
इस कड़े मुकाबले में ताहिलिया को 81,429 वोट मिले और उन्होंने 5,087 मतों के अंतर से जीत दर्ज की.
‘मकतूब मीडिया’ के मुताबिक, कोझिकोड के पेरुवायल में जन्मी ताहिलिया ने चुनावी राजनीति में आने से पहले छात्र राजनीति के माध्यम से अपनी पहचान बनाई. उन्होंने ‘मुस्लिम स्टूडेंट्स फेडरेशन’ में एक नेता के रूप में कार्य किया और बाद में कोझिकोड निगम में पार्षद के रूप में सेवा दी. उन्होंने गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, कोझिकोड से बी.ए. एलएलबी और गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, त्रिशूर से एलएलएम की पढ़ाई पूरी की. वर्तमान में वह कालीकट जिला न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में प्रैक्टिस कर रही हैं. वह मुस्लिम यूथ लीग की राज्य सचिव के रूप में भी कार्यरत हैं, जो इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के भीतर उनके निरंतर बढ़ते कद को दर्शाता है.
इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का प्रतिनिधित्व करते हुए, ताहिलिया पार्टी द्वारा मैदान में उतारी गई दो महिला उम्मीदवारों में से एक थीं. लंबे समय से वामपंथियों का गढ़ माने जाने वाले निर्वाचन क्षेत्र में उनका चुनाव लड़ना विशेष रूप से महत्वपूर्ण था. उनकी उम्मीदवारी ने पूरे केरल का ध्यान आकर्षित किया, न केवल चुनावी मुकाबले के कारण, बल्कि अभियान के दौरान हुए विवादों की वजह से भी.
पेराम्बरा से उम्मीदवारी की घोषणा के तुरंत बाद फातिमा ताहिलिया को भारी साइबर हमलों और ऑनलाइन दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा. उनके सोशल मीडिया पेजों पर अपमानजनक, व्यक्तिगत और अश्लील टिप्पणियों की बाढ़ आ गई.
दुर्व्यवहार में हिजाब पहनने वाली एक युवा मुस्लिम महिला के रूप में उनकी पहचान को निशाना बनाया गया और चुनाव लड़ने की उनकी क्षमता पर सवाल उठाए गए. ताहिलिया ने कहा कि ऐसे हमले उनके लिए नए नहीं हैं और उन्होंने कोझिकोड के स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान भी इसी तरह के उत्पीड़न का सामना किया था.
एक और विवाद तब खड़ा हुआ जब आरोप लगे कि एलडीएफ से जुड़े प्रचार वाहनों ने फातिमा ताहिलिया को “कौम का उम्मीदवार” बताते हुए घोषणाएं कीं. यूडीएफ ने आरोप लगाया कि उनकी धार्मिक पहचान के माध्यम से चुनाव को सांप्रदायिक बनाने की कोशिश की गई, जिसके कारण राजनीतिक प्रतिक्रियाएं हुईं और चुनाव आयोग में शिकायतें दर्ज कराई गईं. इन तमाम चुनौतियों के बावजूद, फातिमा ताहिलिया एक मजबूत दावेदार के रूप में उभरीं और पेराम्बरा विधानसभा क्षेत्र में जीत हासिल की. उनकी यह जीत पारंपरिक रूप से एलडीएफ के दबदबे वाली सीट पर एक बड़े राजनीतिक बदलाव का प्रतीक है.
पिनाराई के ‘किले’ का ढहना: केरल में वामपंथी शासन के अंत की कहानी
‘द मूकनायक’ में गीता सुनील पिल्लई की रिपोर्ट है कि 4 मई 2026 का दिन भारतीय राजनीति के इतिहास में एक युग के अंत के रूप में दर्ज हो गया है. केरल, जिसे पिछले पांच दशकों से वामपंथी राजनीति का सबसे मजबूत और आखिरी गढ़ माना जाता था, वहां लाल झंडे की सत्ता का सूरज डूब गया है. यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ने करीब 100 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया, जबकि पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाला लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) अपनी ताकत का आधा हिस्सा भी नहीं बचा सका.
इस परिणाम के साथ ही भारत में ‘कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री’ का दौर समाप्त हो गया है. पश्चिम बंगाल (2011) और त्रिपुरा (2018) के बाद केरल ही एकमात्र राज्य था जहाँ वामपंथियों की सरकार थी. 1978 के बाद यह पहली बार है जब भारत के किसी भी राज्य में कोई कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री नहीं होगा.
आक्रोश की लहर: ‘भूल गए पीड़ितों’ का फैसला
विजयन सरकार की इस ऐतिहासिक हार के पीछे केवल विपक्षी रणनीति नहीं थी, बल्कि वे ‘आंसू’ थे जो पिछले दस वर्षों के शासन के दौरान जनता की आंखों से बहे थे.
एडीएम नवीन बाबू की मृत्यु: कन्नूर के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट नवीन बाबू की आत्महत्या ने पूरे राज्य को झकझोर दिया. माकपा नेता पीपी दिव्या द्वारा सार्वजनिक रूप से अपमानित किए जाने के बाद उनकी मृत्यु ने यह संदेश दिया कि सत्ता के नशे में चूर नेता स्वतंत्र नौकरशाहों को डरा-धमका रहे हैं. उनकी विधवा, मंजुषा की न्याय की पुकार चुनावी अभियान का एक भावनात्मक केंद्र बन गई.
सिद्धार्थ की त्रासदी: वायनाड के वेटरनरी कॉलेज के छात्र जेएस सिद्धार्थ की हॉस्टल में हुई बर्बर पिटाई और मौत ने कैंपस हिंसा के काले चेहरे को उजागर किया. आरोप लगा कि माकपा के छात्र संगठन ने कॉलेज को ‘टॉर्चर रूम’ में बदल दिया था. पिता टी. जयप्रकाश के संघर्ष ने युवा मतदाताओं के बीच सरकार के प्रति भारी रोष पैदा किया.
दमनकारी राजनीति: 2022 में मुख्यमंत्री के सामने काला झंडा दिखाने वाले युवाओं पर ‘हत्या के प्रयास’ (आईपीसी 307) का मामला दर्ज करना सरकार के अहंकार का प्रतीक बन गया. जब केंद्र सरकार ने इसे नागरिक उड्डयन अपराध मानने से आठ बार इनकार किया, तो राज्य सरकार की नीयत पर गंभीर सवाल उठे.
भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के आरोप
पिनाराई विजयन के दूसरे कार्यकाल में भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनकी ‘कैप्टन’ वाली छवि को बुरी तरह प्रभावित किया. मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव एम. शिवशंकर की स्वर्ण तस्करी मामले में गिरफ्तारी और उनकी बेटी वीणा विजयन की कंपनी ‘एक्सालॉजिक सॉल्यूशंस’ पर लगे वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों ने विपक्ष को “परिवारवाद और भ्रष्टाचार” का बड़ा हथियार दे दिया. हालाँकि ये आरोप कानूनी रूप से साबित नहीं हुए, लेकिन जनता की अदालत में इन्होंने गहरा प्रभाव डाला.
अपनों का ही विद्रोह: जब ‘कॉमरेड’ खिलाफ हो गए
इस चुनाव की सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि माकपा ने अपने उन क्षेत्रों में भी हार का स्वाद चखा जिन्हें ‘पार्टी विलेज’ कहा जाता था. पय्यानूर और थालीप्परम्बु जैसे निर्वाचन क्षेत्रों में पार्टी से निष्कासित नेताओं ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और भारी बहुमत से जीत हासिल की. यह इस बात का स्पष्ट संकेत था कि पार्टी का जमीनी कार्यकर्ता अब नेतृत्व की कार्यशैली और भ्रष्टाचार से ऊब चुका था. राजनीतिक विश्लेषक एमजी राधाकृष्णन ने सही कहा था कि “विजयन की ताकत ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई.” सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण ने पार्टी के भीतर लोकतंत्र को खत्म कर दिया था.
वायनाड: प्राकृतिक आपदा और प्रशासनिक विफलता
जुलाई 2024 में वायनाड के मुंडक्कई और चूरलमाला में आए भीषण भूस्खलन के बाद पुनर्वास कार्यों में हुई देरी ने आग में घी का काम किया. पीड़ितों को मिलने वाले फंड में देरी और चंदे के दुरुपयोग के आरोपों ने सरकार की संवेदनशीलता पर सवालिया निशान लगा दिया. आपदा से बचे लोग जब कर्ज के नोटिसों और अस्थाई घरों की बदहाली से जूझ रहे थे, तब उनकी नाराजगी मतपेटियों में तब्दील हो गई.
एक युग का अंत
80 वर्षीय पिनाराई विजयन, जिन्होंने लगभग 25 वर्षों तक पार्टी और सरकार पर अपनी पकड़ बनाए रखी, अब अपने ही निर्वाचन क्षेत्र धर्मदम में कड़े मुकाबले में पिछड़ते नजर आए. यह हार केवल एक पार्टी की हार नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति की हार है जिसने असहमति को दबाने और सत्ता को एक ही हाथ में केंद्रित करने की कोशिश की थी.
केरल का यह जनादेश लोकतंत्र की उस शक्ति का प्रमाण है जहां साक्षरता और राजनीतिक चेतना रखने वाली जनता ने स्पष्ट कर दिया कि सत्ता का अहंकार कभी भी जनभावनाओं से बड़ा नहीं हो सकता. 4 मई 2026 को केरल ने एक नई इबारत लिखी है, जो आने वाले समय में भारतीय वामपंथ के लिए आत्ममंथन का विषय रहेगी.
होर्मुज़ की आग: जंग, जहाज़ और जिद
होर्मुज़ जलडमरूमध्य — दुनिया की तेल की नस — इन दिनों एक ऐसे तनाव का केंद्र बन चुकी है जो किसी भी वक़्त पूरी तरह जंग में तब्दील हो सकती है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने रविवार को एलान किया कि अमेरिका होर्मुज़ से गुज़रने वाले व्यापारिक जहाज़ों को “गाइड” करने का अभियान शुरू करेगा, जिसे “प्रोजेक्ट फ़्रीडम” का नाम दिया गया है. लेकिन ईरान ने इसे सीधे चुनौती मान लिया और अमेरिकी नौसेना के जहाज़ों पर हमले शुरू कर दिए.
एक्सियोस के रिपोर्टर बराक़ रविद के मुताबिक़, ट्रम्प प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने रविवार को ही ईरान को इस ऑपरेशन की पूर्व सूचना दे दी थी और चेतावनी दी थी कि वह दख़लअंदाज़ी न करे. बावजूद इसके, ईरान ने अमेरिकी नौसैनिक जहाज़ों, व्यापारिक पोतों और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) पर हमले किए. जॉइंट चीफ़्स ऑफ़ स्टाफ़ के अध्यक्ष जनरल डैन कैन के मुताबिक़, 8 अप्रैल को युद्धविराम लागू होने के बाद से ईरान अब तक अमेरिकी बलों पर 10 से ज़्यादा बार हमला कर चुका है.
अल-जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, सोमवार को सबसे ज़्यादा तनाव देखा गया — ईरान ने अमेरिकी नौसैनिक जहाज़ों पर गोलीबारी की, अमेरिका ने ईरान की सात छोटी सैन्य नौकाओं को मार गिराया, यूएई के फुजैरा पेट्रोलियम इंडस्ट्रीज़ ज़ोन पर मिसाइल और ड्रोन हमले हुए जिसमें तीन लोग घायल हुए. एक दक्षिण कोरियाई जहाज़ पर भी संदिग्ध ईरानी हमला हुआ. ईरान का दावा है कि होर्मुज़ में एक यात्री नाव पर अमेरिकी हमले में पाँच आम नागरिक मारे गए. यूएई के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि मंगलवार को भी ईरान ने फिर मिसाइल और ड्रोन से हमला किया और उनके वायु रक्षा तंत्र ने जवाबी कार्रवाई की.
रक्षा मंत्री पीट हेग्सेथ ने मंगलवार को प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा कि युद्धविराम अभी भी बरक़रार है और “प्रोजेक्ट फ़्रीडम” अमेरिका-इज़राइल के संयुक्त ऑपरेशन “एपिक फ़्यूरी” से बिल्कुल अलग और स्वतंत्र अभियान है. उन्होंने कहा — “हमने जलडमरूमध्य पर एक शक्तिशाली लाल-सफ़ेद-नीला गुंबद बना दिया है. अमेरिकी विध्वंसक तैनात हैं, सैकड़ों लड़ाकू विमान, हेलिकॉप्टर, ड्रोन और निगरानी विमान 24 घंटे पहरा दे रहे हैं.” हेग्सेथ ने यह भी कहा कि ईरानी जहाज़ों को होर्मुज़ से गुज़रने नहीं दिया जाएगा, यानी ईरान के बंदरगाहों पर अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी जारी है. उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यह ऑपरेशन “अस्थायी” है और बाद में इसकी ज़िम्मेदारी अन्य देशों को सौंपी जाएगी — हालाँकि अभी तक किसी भी अमेरिकी सहयोगी ने इस सैन्य प्रयास में शामिल होने से इनकार किया है.
लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि अमेरिकी ऑपरेशन के पहले 24 घंटों में होर्मुज़ से जहाज़ों की आवाजाही लगभग ठप रही. एक्सियोस के मुताबिक़ सोमवार को महज़ दो अमेरिकी झंडे वाले व्यापारिक जहाज़ गुज़रे और मंगलवार को एक भी नहीं. हेग्सेथ का दावा था कि “सैकड़ों और जहाज़ लाइन में लगे हैं,” लेकिन शिपिंग कंपनियाँ अभी भी अमेरिकी भरोसे पर यक़ीन नहीं कर रहीं. अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार होर्मुज़ में 1,550 जहाज़ फँसे हुए हैं.
ईरान का रुख़ एकदम सख़्त है. ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाक़िर क़ालीबाफ़ ने ‘एक्स’ पर लिखा — “शिपिंग और ऊर्जा पारगमन की सुरक्षा को अमेरिका और उसके सहयोगियों ने ख़तरे में डाला है. हम पूरी तरह जानते हैं कि यथास्थिति अमेरिका के लिए असहनीय है, जबकि हमने अभी शुरुआत भी नहीं की.” ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने ‘एक्स’ पर लिखा — “प्रोजेक्ट फ़्रीडम दरअसल प्रोजेक्ट डेडलॉक है. होर्मुज़ की घटनाएँ साफ़ कर देती हैं कि राजनीतिक संकट का कोई सैन्य समाधान नहीं है. जब पाकिस्तान की मध्यस्थता में बातचीत आगे बढ़ रही है, तब अमेरिका को ‘बदख़्वाहों’ के बहकावे में आकर दलदल में नहीं खिंचना चाहिए.”
‘ड्रॉप साइट न्यूज़’ के जेरेमी स्काहिल और रायन ग्रिम ने तेहरान स्थित सेंटर फ़ॉर मिडिल ईस्ट स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ के वरिष्ठ शोधकर्ता अबास असलानी से बातचीत की. असलानी ने बताया कि ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी का मानना है कि जंग फिर से भड़कने की संभावना बहुत अधिक है — और इसमें ईरान के तटीय इलाक़ों पर हमले और ईरानी सैन्य व राजनीतिक नेतृत्व को निशाना बनाने वाले हमले शामिल हो सकते हैं. ईरानी सैन्य अधिकारी कहते हैं कि वे फ़ारस की खाड़ी में जवाबी हमले और इज़राइल पर हमलों के लिए तैयार हैं. असलानी ने ईरान की बातचीत की स्थिति, होर्मुज़ के भविष्य, तेहरान की आंतरिक निर्णय-प्रक्रिया और दोनों देशों की आर्थिक मजबूरियों पर विस्तार से रोशनी डाली.
‘सीएनएन’ के मुताबिक़ ट्रम्प ने स्पष्ट नहीं किया कि युद्धविराम का उल्लंघन किस हद तक माना जाएगा. जब पत्रकारों ने पूछा तो उन्होंने कहा — “पता चल जाएगा.” बातचीत का मोर्चा भी उलझा हुआ है. ट्रम्प ने ईरान के हालिया प्रस्तावों को यह कहकर ख़ारिज किया कि “उन्होंने अभी पर्याप्त क़ीमत नहीं चुकाई.” ईरान का आरोप है कि अमेरिका अधिकतम माँगें रख रहा है और तेहरान झुकने वाला नहीं. एक्सियोस और अल-जजीरा दोनों बताते हैं कि कुछ अमेरिकी और इज़राइली अधिकारियों को लगता है कि अगर कूटनीतिक गतिरोध बना रहा तो ट्रम्प इसी हफ़्ते जंग दोबारा शुरू करने का आदेश दे सकते हैं.
आर्थिक मोर्चे पर हालात गंभीर हैं. जंग से पहले अमेरिका में पेट्रोल की औसत क़ीमत 3 डॉलर प्रति गैलन से कम थी, जो अब एएए के मुताबिक़ 4.48 डॉलर प्रति गैलन हो गई है — यानी 50 फ़ीसदी की बढ़ोतरी. यह नवंबर के मध्यावधि चुनावों से पहले रिपब्लिकन पार्टी के लिए राजनीतिक सिरदर्द बनती जा रही है. ‘सीएनएन’ के अनुसार, कोविड महामारी के बाहर तेल की माँग में इतनी तेज़ गिरावट पहले कभी नहीं देखी गई. ट्रम्प ने कहा — “परमाणु हथियार रखने वाले मानसिक रूप से पागल लोगों से छुटकारा पाने के लिए यह बहुत छोटी क़ीमत है.” ईरान परमाणु हथियार बनाने से इनकार करता है. ट्रम्प ने यह भी माना कि युद्ध का आर्थिक असर उनकी उम्मीद से ज़्यादा बुरा हो सकता है. जंग से पहले होर्मुज़ से दुनिया का 20 फ़ीसदी तेल और प्राकृतिक गैस गुज़रती थी.
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