04/05/2026: बंगाल में ‘पोरिबोर्तन’ | शाह का दांव |तमिलनाडु में विजय | ध्रुवीकरण की सियासत | सावरकर के प्रपौत्र ने कबूला | बिहार फिर गिरा पुल | गंगा में बीयर | नेपाल का दावा | एक कहानी पर 2 फैसले
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
बंगाल में भाजपा का ‘पोरिबोर्तन’, तमिलनाडु में विजय का धमाकेदार आगाज़, कांग्रेस की केरल में वापसी
तमिलनाडु चुनाव की गिनती के बीच मोदी और विजय की फोटो फिर आई सामने, सोशल मीडिया पर चर्चा
तमिलनाडु का ‘नया सूर्य’: जोसेफ विजय के ‘थलपति’ से ‘जननायक’ बनने की कहानी
वाराणसी इफ्तार विवाद: गंगा में बीयर पीने वाले जमानत पर बाहर, लेकिन 14 मुस्लिम युवक 45 दिनों से जेल में
एनआरआई ग्लोबल हेल्थ अलर्ट: क्या भारत में आपका परिवार “सफेद जहर” का सेवन कर रहा है?
मुंबई प्रेस क्लब से तीन सदस्यों का निलंबन; सोशल मीडिया पर आलोचना, “यह एक ‘पार्टी क्लब’ बनता जा रहा”
एससीएओआरए बनाम एसआईआर: कहानी एक ही, फैसले अलग-अलग; सुप्रीम कोर्ट से बंगाल को ऐसा विशेष उपचार नहीं मिला
लिपुलेख के जरिए मानसरोवर यात्रा पर नेपाल ने जताई आपत्ति; कहा- लिपुलेख हमारा क्षेत्र; भारत बोला- दावा अनुचित
बिहार में एक और पुल गिरा; भागलपुर में विक्रमशिला सेतु का हिस्सा गिरने से यातायात रुका, बड़ा हादसा टला
सावरकर ने 5 बार ब्रिटिश सरकार से मांगी माफ़ी, गाय को भगवान नहीं मानते थे: सावरकर के प्रपौत्र का कोर्ट में बयान
ग्रेट निकोबार परियोजना: विकास की दौड़ में पीछे छूटते जनजातीय अधिकार
बंगाल में भाजपा का ‘पोरिबोर्तन’, तमिलनाडु में विजय का धमाकेदार आगाज़, कांग्रेस की केरल में वापसी
पूरब में विपक्ष के आखिरी गढ़ को ढहाते हुए भाजपा ने सोमवार को पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी टीएमसी को करारी शिकस्त देकर ममता बनर्जी के 15 साल के शासन का अंत कर दिया. साथ ही, असम में भाजपा ने भारी बहुमत के साथ लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की है.
तमिलनाडु ने एक और चौंकाने वाला जनादेश दिया है, जहाँ अभिनेता से नेता बने जोसेफ विजय की पार्टी टीवीके (तमिलगा वेट्री कझगम), जो एक नई खिलाड़ी है, 234 सदस्यीय सदन में बहुमत के आंकड़े के करीब पहुँच गई है. इसने द्रविड़ दिग्गजों को हैरान करते हुए एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली द्रमुक (डीएमके) सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया है.
केरल ने बदलाव को चुना और पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली एलडीएफ (एलडीएफ) — जो देश की आखिरी वामपंथी सरकार थी — के शासन को समाप्त करने के लिए कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ के पक्ष में मतदान किया. केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी ने ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस और भाजपा वाले एनडीए गठबंधन में फिर से विश्वास जताया है.
मनोज सी. जी. और जतिन आनंद की रिपोर्ट के मुताबिक, इन विधानसभा चुनावों के परिणामों से एक स्पष्ट संदेश मिला है और वह है ‘परिवर्तन की चाह’. बंगाल में टीएमसी से लेकर द्रमुक और एलडीएफ तक, सत्ताधारी दलों को इस बदलाव की मार झेलनी पड़ी. केवल असम और पुडुचेरी ही इस लहर के विपरीत अपनी सत्ता बचाने में सफल रहे.
अपनी पार्टी के प्रदर्शन की सराहना करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में मिली जीत को “ऐतिहासिक” बताया और नई दिल्ली में भाजपा कार्यकर्ताओं से कहा कि “बंगाल के भविष्य में एक नया अध्याय शुरू हो गया है. अब यह ‘भय-मुक्त’ हो गया है.”
मोदी ने कहा, “पिछले साल 14 नवंबर को जब बिहार के परिणाम आए थे, तब भाजपा मुख्यालय के इसी मंच से मैंने आप सभी से कहा था कि गंगाजी बिहार से गंगा सागर की ओर बढ़ती हैं. आज गंगोत्री से लेकर गंगा सागर तक केवल कमल ही खिल रहा है.”
उन्होंने आगे कहा, “राज्य की राजनीतिक आदतों में बदलाव आना चाहिए. आज जब भाजपा जीत गई है, तो हमें ‘बदला’ नहीं बल्कि ‘बदलाव’ की बात करनी चाहिए. ‘भय’ की नहीं बल्कि ‘भविष्य’ की बात होनी चाहिए... आइए हिंसा के इस अंतहीन चक्र को समाप्त करें.”
रात 8.41 बजे चुनाव आयोग की वेबसाइट पर बंगाल की 293 सीटों में से 204 के नतीजे घोषित हो चुके थे. जिनमें से 146 सीटें भाजपा, 53 टीएमसी, 2-2 क्रमशः कांग्रेस और एजेयूपी और 1 सीट सीपीएम के खाते में गई हैं. बाकी 89 सीटों पर मतगणना जारी थी, जिनमें 62 सीटों पर भाजपा, 26 पर टीएमसी बढ़त बनाए हुए थी, जबकि एक सीट पर एआईएसएफ का उम्मीदवार आगे चल रहा था. ‘सूर्यास्त के बाद जीतेंगे टीएमसी उम्मीदवार’ - ममता बनर्जी
चूँकि तृणमूल कांग्रेस भाजपा से काफी पीछे चल रही है, ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर कई दौर की गिनती के बाद सही आंकड़े जारी करने में गड़बड़ी का आरोप लगाया. उन्होंने उम्मीदवारों से गिनती खत्म होने तक इंतजार करने का आग्रह किया. उन्होंने कहा, “परिणामों से निराश न हों. चुनाव आयोग उन जगहों (बूथों/निर्वाचन क्षेत्रों) के परिणाम रोक रहा है जहाँ तृणमूल कांग्रेस जीत रही है... आप (टीएमसी उम्मीदवार) सूर्यास्त के बाद जीतेंगे.” उन्होंने उम्मीदवारों और काउंटिंग एजेंटों से मतगणना केंद्र न छोड़ने का अनुरोध किया.
5 दशकों में पहली बार भारत में कोई वामपंथी सरकार नहीं
यह एक ऐसी राजनीतिक दुर्दशा है जिसे कामरेडों की पीढ़ियों ने न कभी देखा है और न अनुभव किया है. केरल में माकपा के नेतृत्व वाली वामपंथी सरकार की हार के साथ, पांच दशकों में पहली बार भारत में कोई कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री नहीं होगा.
वामपंथी ब्लॉक 1977 से 2011 तक पश्चिम बंगाल में सत्ता में था. इसने 1993 से 2018 तक त्रिपुरा पर शासन किया. और केरल में, यह हर पांच साल में सत्ता में लौटता रहा और 2021 में इस परंपरा को प्रभावी ढंग से तोड़ा था. जहाँ ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस ने 2011 में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा के 34 साल के ‘गिनीज रिकॉर्ड’ वाले शासन को समाप्त किया, वहीं त्रिपुरा में 25 साल पुराने वाम मोर्चा शासन का अंत 2018 में भाजपा द्वारा उसे चौंकाने वाली हार देकर किया गया. भाजपा ने 2023 में भी यही उपलब्धि दोहराई.
श्रवण गर्ग | बंगाल चुनाव: ‘अमित शाह का दांव’ और ममता की हार के संकेत
हरकारा डीप डाइव के इस लाइव इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों और उनके व्यापक राजनीतिक असर पर चर्चा हुई. शुरुआती विश्लेषण में यह स्पष्ट किया गया कि यह चुनाव सिर्फ भाजपा बनाम टीएमसी नहीं, बल्कि सीधे तौर पर ‘अमित शाह बनाम ममता बनर्जी’ का मुकाबला बन गया था, जिसमें बढ़त भाजपा के पक्ष में जाती दिख रही है.
चर्चा के दौरान बताया गया कि टीएमसी का कमजोर प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि राज्य में एंटी-इंकंबेंसी लहर मजबूत थी. तमिलनाडु, असम और केरल की तरह बंगाल में भी सत्ताविरोधी रुझान देखने को मिला. भाजपा ने पिछले कई वर्षों से इस चुनाव को रणनीतिक रूप से साधा था और अमित शाह ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया था.
बातचीत में ध्रुवीकरण को चुनाव का केंद्रीय तत्व बताया गया. भाजपा हिंदू वोटों के कंसोलिडेशन में सफल रही, जबकि मुस्लिम वोट पूरी तरह एकजुट नहीं हो पाए. मतदाता सूची से नाम कटने को हार का मुख्य कारण मानने की थ्योरी पर भी सवाल उठे और इसे निर्णायक फैक्टर नहीं माना गया. वहीं, मतगणना के दौरान टीएमसी द्वारा चुनाव आयोग पर परिणाम रोकने के आरोप और ममता बनर्जी का काउंटिंग सेंटर तक जाना, चुनावी तनाव को दर्शाता है.
श्रवण गर्ग ने यह भी रेखांकित किया कि बंगाल की यह जीत भाजपा के लिए जितनी बड़ी सफलता है, उतनी ही बड़ी चुनौती भी. 30% मुस्लिम आबादी वाले और लंबे समय तक लेफ्ट व टीएमसी के प्रभाव वाले राज्य में शासन करना आसान नहीं होगा. कानून-व्यवस्था, सामाजिक संतुलन और सीमावर्ती संवेदनशीलता जैसे मुद्दे अब केंद्र और भाजपा के सामने बड़ी परीक्षा बनकर खड़े होंगे.
राष्ट्रीय स्तर पर, इस परिणाम को विपक्ष के कमजोर होने के संकेत के रूप में देखा गया. ममता बनर्जी, केजरीवाल, नीतीश कुमार जैसे क्षेत्रीय नेताओं की पकड़ ढीली पड़ती दिख रही है, जिससे एकजुट विपक्ष की जरूरत और स्पष्ट हो जाती है.
इस बातचीत का निष्कर्ष यह है कि बंगाल चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है. जहां अमित शाह का प्रभाव और मजबूत होता दिख रहा है, वहीं विपक्ष के सामने अस्तित्व और पुनर्गठन की चुनौती खड़ी हो गई है. पूरी वीडियो यहाँ देखी जा सकती है.
जोसेफ विजय के ‘थलपति’ से ‘जननायक’ बनने की कहानी
दक्षिण भारतीय सिनेमा के सुपरस्टार थलपति विजय ने अब राजनीति के मंच पर भी जबरदस्त एंट्री दर्ज कराई है. उनकी पार्टी टीवीके ने 107 से ज्यादा सीटों पर जीत हासिल कर तमिलनाडु की सियासत में बड़ा उलटफेर कर दिया है, और अब विजय को राज्य के अगले मुख्यमंत्री के रूप में देखा जा रहा है. उनकी रैलियों में उमड़ती भारी भीड़ उनकी मजबूत जनस्वीकृति और जमीनी पकड़ का स्पष्ट संकेत देती है. लेकिन सवाल है कि पर्दे पर अपनी दमदार मौजूदगी से करोड़ों दिलों पर राज करने वाला ये सुपरस्टार आखिर है कौन?
बचपन और पारिवारिक पृष्ठभूमि
थलपति विजय का पूरा नाम जोसेफ़ विजय चंद्रशेखर है. उनका जन्म 22 जून 1974 को चेन्नई में एक फिल्मी परिवार में हुआ. उनके पिता एस. ए. चंद्रशेखर तमिल सिनेमा के प्रतिष्ठित निर्देशक रहे हैं, जबकि उनकी माँ शोभा एक जानी-मानी गायिका हैं. ऐसे माहौल में पले-बढ़े विजय का रुझान बचपन से ही अभिनय की ओर हो गया था.
बहुत कम उम्र में ही उन्होंने कैमरे के सामने कदम रख दिया था. उनके पिता ने उन्हें ‘वेट्री’ फिल्म में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट मौका दिया, जिसने उनके अभिनय सफर की शुरुआती नींव रखी. धीरे-धीरे विजय ने तय कर लिया कि उनका भविष्य सिनेमा में ही है.
उन्होंने कॉलेज में विज़ुअल मीडिया की पढ़ाई शुरू की, लेकिन एक्टिंग के जुनून के चलते बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी. इसके बाद उनकी माँ शोभा ने एक स्क्रिप्ट लिखी, जिस पर उनके पिता ने फिल्म बनाई. इसी फिल्म ‘नालैया थीरपू’ (1992) से विजय ने बतौर लीड एक्टर अपने करियर की शुरुआत की. भले ही यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक सफल नहीं रही, लेकिन इसने विजय के करियर की मजबूत नींव जरूर रख दी.
संघर्ष से ‘थलपति’ बनने की दास्तां
जब विजय ने नायक के रूप में कदम रखने का फैसला किया, तो उन्होंने विजुअल कम्युनिकेशन की अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी. साल 1992 में फिल्म ‘नालैया थीरपू’ आई. फिल्म की कहानी उनकी माँ शोभा ने लिखी थी और निर्देशन पिता ने किया था. फिल्म तो नहीं चली, लेकिन एक नया चेहरा चर्चा में आ गया.
शुरुआती दौर में आलोचकों ने उनके लुक और अभिनय पर सवाल उठाए, पर विजय ने हार नहीं मानी. 1996 में आई ‘पूवे उनक्कागा’ ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई. इसके बाद ‘गिल्ली’ ने उन्हें एक ‘मास हीरो’ बना दिया. बच्चे उनके डांस स्टेप्स की नकल करने लगे और युवा उनके स्टाइल के दीवाने हो गए. धीरे-धीरे उन्हें ‘थलपति’ (सेनापति) का खिताब मिला. ‘मर्सल’ और ‘सरकार’ जैसी फिल्मों ने न केवल बॉक्स ऑफिस पर करोड़ों की कमाई की, बल्कि उनमें विजय ने पहली बार राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर बेबाकी से बोलना शुरू किया.
निजी ज़िंदगी: एक प्रशंसक बनी हमसफर
विजय की प्रेम कहानी भी किसी फिल्म से कम नहीं है. लंदन में रहने वाली संगीता सोरलिंगम विजय की एक कट्टर प्रशंसक थीं. वह सिर्फ उनसे मिलने के लिए भारत आईं. मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ, दोस्ती हुई और 25 अगस्त 1999 को दोनों ने शादी कर ली. संगीता न केवल उनकी पत्नी बनीं, बल्कि उनकी सबसे बड़ी सलाहकार भी. दिलचस्प बात यह है कि विजय आज भी वही कपड़े पहनते हैं जिन्हें संगीता उनके लिए चुनती हैं.
जब पिता से भिड़ गए विजय
विजय का राजनीति में कदम रखना बिल्कुल आसान नहीं था. साल 2020-21 में उनके परिवार के भीतर ही एक बड़ा विवाद सामने आया, जिसने काफी सुर्खियां बटोरीं. उनके पिता एस. ए. चंद्रशेखर ने विजय के नाम पर ‘ऑल इंडिया थलपति विजय मक्कल इयक्कम’ नाम की एक राजनीतिक पार्टी रजिस्टर करा दी.
इस कदम से विजय बेहद नाराज़ हो गए. उन्होंने साफ तौर पर कहा कि उनकी अनुमति के बिना उनके नाम का राजनीतिक इस्तेमाल स्वीकार्य नहीं है. मामला इतना बढ़ गया कि विजय ने अपने ही माता-पिता सहित 11 लोगों के खिलाफ अदालत का रुख कर लिया.
उन्होंने एक सार्वजनिक बयान जारी करते हुए कहा, “मेरा और मेरे पिता की पार्टी का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई संबंध नहीं है. प्रशंसकों को इससे भ्रमित नहीं होना चाहिए.”
यह फैसला भले ही कड़ा था, लेकिन इसने साफ कर दिया कि विजय राजनीति में किसी विरासत या दबाव के तहत नहीं, बल्कि अपनी शर्तों और सोच के साथ उतरना चाहते हैं.
टीवीके का उदय और ‘सिनेमा’ को अलविदा
फरवरी 2024 में वह ऐतिहासिक पल आया जब विजय ने आधिकारिक रूप से ‘तमिलगा वेट्री कड़गम’ की स्थापना की. विजय का यह फैसला चौंकाने वाला था क्योंकि वह अपने करियर के चरम पर थे. उनकी एक फिल्म के लिए करोड़ों की भीड़ जुटती थी, लेकिन उन्होंने ऐलान किया: “मैं सिनेमा छोड़ रहा हूँ.”
अक्टूबर 2024 में विक्रवंडी की पहली रैली ने दिखा दिया कि विजय की ताकत क्या ह. उन्होंने वहां दहाड़ते हुए कहा कि वह ‘द्रविड़ मॉडल’ के नाम पर होने वाली धोखाधड़ी और परिवारवाद की राजनीति को खत्म करने आए हैं. उन्होंने घोषणा की कि ‘थलपति 69’ उनकी आखिरी फिल्म होगी, क्योंकि अब उनका पूरा जीवन जनता की सेवा के लिए समर्पित है.
विचारधारा: पेरियार का रास्ता और धर्मनिरपेक्षता
अपनी पहली ही रैली में विजय ने टीवीके की विचारधारा को साफ और विस्तार से रखा. उन्होंने कहा,
“हम द्रविड़ राष्ट्रवाद और तमिल राष्ट्रवाद को अलग नहीं करेंगे. ये दोनों इस मिट्टी की दो आँखें हैं. हमें खुद को किसी एक पहचान तक सीमित नहीं करना चाहिए.”
विजय ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के मूल सिद्धांतों पर चलेगी. उन्होंने पेरियार के विचारों का ज़िक्र करते हुए कहा था कि टीवीके महिला सशक्तीकरण और सामाजिक बराबरी के रास्ते पर आगे बढ़ेगी. हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि पेरियार की नास्तिकता वाली सोच से वे सहमत नहीं हैं.
भाषा के मुद्दे पर विजय ने दो-भाषा नीति का समर्थन जताया. उनका कहना था कि सरकारी कामकाज तमिल और अंग्रेज़ी दोनों में होना चाहिए, ताकि संतुलन बना रहे और लोगों को सुविधा मिले. इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी जातिगत जनगणना के पक्ष में है, ताकि सामाजिक न्याय की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें.
2026 का चुनाव: एक नए युग का उदय
2026 के विधानसभा चुनाव परिणामों ने तमिलनाडु की राजनीति के पुराने दिग्गजों को स्तब्ध कर दिया है. विजय की पार्टी टीवीके ने न केवल सीटें जीती हैं, बल्कि डीएमके और एआईडीएमके जैसे स्थापित दलों के वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाई है.
यह जीत विजय की लोकप्रियता, उनकी साफ-सुथरी छवि और लोगों के बदलाव की चाहत का नतीजा माना जा रहा. समर्थकों के लिए वह अब केवल एक अभिनेता नहीं, बल्कि उनके भविष्य के सारथी बन चुके हैं.
जोसेफ विजय से ‘थलपति’ विजय और अब एक जननायक बनने तक का यह सफर त्याग और संकल्प की कहानी है. एक ऐसा इंसान जिसने अपनी करोड़ों की कमाई और फिल्मी चकाचौंध को इसलिए ठोकर मार दी क्योंकि उसे अपने राज्य की गलियों में बदलाव लाना था. आज तमिलनाडु की राजनीति में एक नए सूर्य का उदय हुआ है, जिसका नाम है, विजय.
तमिलनाडु चुनाव की गिनती के बीच मोदी और विजय की फोटो फिर आई सामने, सोशल मीडिया पर चर्चा
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए वोटों की गिनती आगे बढ़ने के साथ ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अभिनेता से नेता बने विजय की एक पुरानी तस्वीर अचानक वायरल हो गई, जिसने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर व्यापक ध्यान आकर्षित किया.
यह तस्वीर, जो पहली बार 2014 के आम चुनाव अभियान के दौरान साझा की गई थी, मोदी और विजय की मुलाकात को दर्शाती है. ‘फ्री प्रेस जर्नल’ में अमीषा एस. की रिपोर्ट है कि उस समय मोदी ने विजय को दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग की एक प्रमुख हस्ती के रूप में संबोधित किया था. हालाँकि उस वक्त यह एक सामान्य मुलाकात थी, लेकिन तमिलनाडु के इस महत्वपूर्ण राजनीतिक मोड़ पर इसके अचानक दोबारा सामने आने से ऑनलाइन चर्चाएं तेज हो गई हैं.
एक दशक पुरानी इस तस्वीर के दोबारा प्रसारित होने से इंटरनेट पर तीखी बहस छिड़ गई है, जहाँ उपयोगकर्ता वर्तमान संदर्भ में इसकी राजनीतिक प्रासंगिकता निकालने की कोशिश करने लगे. सोशल मीडिया पर चल रही कुछ चर्चाओं में दोनों नेताओं के बीच संभावित राजनीतिक संबंधों या गठबंधन के संकेत भी दिए जा रहे हैं.
हालाँकि, इस पुरानी तस्वीर को वर्तमान के किसी भी राजनीतिक घटनाक्रम से जोड़ने वाला कोई पुख्ता प्रमाण या पुष्टि उपलब्ध नहीं है. यह तस्वीर किसी वर्तमान राजनीतिक सहयोग के संकेत के बजाय पिछले चुनावी चक्र की एक ऐतिहासिक झलक मात्र है.
आकार पटेल | ध्रुवीकरण की राजनीति
अगर आप एक सामान्य नागरिक हैं, तो आपके पास समर्थन करने और वोट देने के लिए अनेक पार्टियाँ हैं. डीएमके, एडीएमके, टीडीपी, एनसीपी, पीडीपी, टीएमसी, आईएनसी, जेडी(एस) और जेडी(यू) हैं, एनसीपी, टीआरएस, नई टीवीके, सीपीएम, सीपीआई और भी बहुत-सी पार्टियाँ हैं. अलग-अलग एजेंडे वाली पार्टियों की कोई कमी नहीं है. लेकिन अगर आपकी मुख्य रुचि भारतीय अल्पसंख्यकों — खासकर मुसलमानों — को धमकाने और परेशान करने में है, तो आपके लिए सिर्फ़ एक ही पार्टी है और वह है बीजेपी. सौभाग्य से, यह राष्ट्रीय स्तर पर और अधिकांश राज्यों में उपलब्ध है. यह पूर्वाग्रहग्रस्त भारतीयों को उसी तरह एकजुट करती है जैसे क्रिकेट और अंग्रेज़ी भाषा करती हैं — क्षेत्रीय सीमाओं को पार कर.
हाल ही में एक मीडिया इंटरैक्शन में एक विश्लेषक ने इसी बात को अलग तरीके से कहा. उन्होंने बीजेपी की अपील के बारे में कहा कि: “जिस किसी की भी दक्षिणपंथी विचारधारा है, उसके पास एक पार्टी है. दूसरी तरफ़ इतनी प्रतिस्पर्धा है कि वोट बँट जाता है.”
आइए समझने की कोशिश करें कि ऐसा क्यों है, क्योंकि यह सच है: जो बीजेपी करती है उसमें उसका कोई मुकाबला नहीं है. ‘दक्षिणपंथी’ शब्द नफ़रत-आधारित राजनीति का एक सौम्य शब्द है, और हम थोड़ी देर में देखेंगे क्यों. पहले, यह स्वीकार करने के बाद कि बीजेपी का कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है, हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि वह एक सरल और आसानी से समझ में आने वाला फॉर्मूला पेश करती है.
‘मैं मुसलमानों से नफ़रत करता हूँ’ — इसे किसी और स्पष्टीकरण की ज़रूरत नहीं है. यह साफ़, सीधा और असरदार है. मतदाता को यह समझने के लिए घोषणापत्र पढ़ने की ज़रूरत नहीं कि पार्टी किसका प्रतिनिधित्व करती है. बीजेपी की विचारधारा का सार अल्पसंख्यक-विरोध है.
अगर आप ऐसी पार्टी की तलाश में हैं, तो आपके पास राष्ट्रीय उपस्थिति वाली और इस मुद्दे पर दशकों की सिद्ध डिलीवरी वाली एक पार्टी मौजूद है. तो दूसरी क्यों देखें? कोई ज़रूरत नहीं.
एक सवाल उठता है: क्या बीजेपी को किसी ऐसी पार्टी से चुनौती नहीं मिल सकती जिसका स्टैंड हो — “लेकिन मैं मुसलमानों से ज़्यादा नफ़रत करता हूँ?”
हो सकता है और शायद होगा भी, लेकिन यह स्थिति बीजेपी के भीतर भी वैध रूप से ली जा सकती है, जैसा कि हम तब देखेंगे जब उत्तराधिकार का संघर्ष शुरू होगा. बीजेपी की विचारधारा का स्वीकार्य दायरा — जो भी हो — अल्पसंख्यकों को नापसंद करने से लेकर अल्पसंख्यकों से घृणा करने तक फैला है, और इस दायरे के भीतर सभी भावनाएँ स्वीकार्य हैं.
यही पहला और सबसे अहम कारण है कि बीजेपी का जो काम है उसमें उसका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं: वह सच्चे मायनों में अल्पसंख्यक-विरोधी है. दूसरा कारण यह है कि अन्य पार्टियाँ या तो बीजेपी जो करती है वह करना नहीं चाहतीं, या वे इसे छिटपुट तरीके से करती हैं और अप्रामाणिक लगती हैं. हम जानते हैं कि भारत की कई पार्टियाँ सांप्रदायिकता में उतरी हैं. लेकिन सांप्रदायिकता उनकी राजनीति या पहचान के केंद्र में नहीं है. बीजेपी एकमात्र ऐसी पार्टी नहीं है जिसने विभाजन और नफ़रत से फ़ायदा उठाया हो, लेकिन वह एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसने इसे अपना मंच बनाया है.
जिन मुद्दों ने बीजेपी को वह बनाया जो वह है — हमारी सबसे बड़ी पार्टी — वे मुद्दे वर्षों से अपरिवर्तित रहे. पहला, मुसलमानों को अयोध्या में अपनी मस्जिद छोड़नी होगी. दूसरा, मुसलमानों को कश्मीर में अपनी संवैधानिक स्वायत्तता छोड़नी होगी. तीसरा, मुसलमानों को अपना पर्सनल लॉ छोड़ना होगा. गौर करें कि इस विचारधारा में हिंदुओं के लिए कुछ नहीं है — उदाहरण के लिए, दलितों और आदिवासियों के लिए निजी क्षेत्र में आरक्षण. ध्यान अल्पसंख्यकों पर है, इसीलिए पार्टी और उसके लक्ष्य के बारे में जो निष्कर्ष निकाला जाता है वह निकाला जा सकता है.
अपने अधिकांश एजेंडे को हासिल करने के बाद, यह उसी राह पर चलती रही है जैसा हमने देखा है: मुसलमानों को अपना खान-पान छोड़ना होगा. किससे प्यार करें और शादी करें, इसकी आज़ादी छोड़नी होगी. यह आज़ादी कि कहाँ रहें, कहाँ नमाज़ पढ़ें — वह भी छोड़नी होगी. चाहे मुसलमान वोट दे सकते हैं या नहीं; चाहे वे शरण माँग सकते हैं या नहीं — और इसी तरह आगे और आगे. इसका कोई अंत नहीं है और कभी नहीं होगा, क्योंकि उद्देश्य ही उत्पीड़न है और धमकाना ही एकमात्र अंतिम लक्ष्य है.
इस कट्टरपन को ‘दक्षिणपंथी’ विचारधारा और राजनीति कहा जाता है, जो इस शब्द पर एक कलंक है. सामान्यतः राजनीति में जैसा समझा जाता है, परंपरावाद की एक लंबी और गौरवशाली परंपरा है. यह निरंतरता चाहता है. यह स्थिरता को महत्व देता है. उदाहरण के लिए, मुद्रा को समाप्त करना एक कट्टरपंथी विचार है, रूढ़िवादी नहीं. जो मनमाना छेड़छाड़, नाम बदलना, काट-छाँट और संस्थाओं का सिर कलम करना हम देख रहे हैं, वह कुछ भी रूढ़िवादी नहीं है. यहाँ जो दक्षिणपंथी बताया जाता है वह महज़ गहरा पूर्वाग्रह है जो किसी और चीज़ की आड़ में छुपा है.
इसीलिए दशकों में बीजेपी के घोषणापत्रों ने कई चीज़ें आज़माई हैं, अपनाई हैं और फिर छोड़ी हैं. 1960 और 1970 के दशक में वे समाजवादी थे. वाजपेयी के नेतृत्व में पार्टी ने घोषणा की थी कि वह सभी भारतीयों की आय और घरों के आकार पर सीमा लगाएगी. यह छोड़ दिया गया. इसने माँग की थी कि कारखानों में मशीनीकरण को श्रम की जगह लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी. यह भी छोड़ दिया गया. इसने चाहा था कि किसान ट्रैक्टर की जगह बैल का उपयोग करें. यह भी छोड़ दिया गया. इनमें से कोई भी चीज़ किसी स्पष्टीकरण के साथ न अपनाई गई और न छोड़ी गई, क्योंकि मतदाताओं को कोई स्पष्टीकरण देने की ज़रूरत ही नहीं थी. बीजेपी/जनसंघ जो मुख्य उत्पाद पेश कर रही थी वह हमेशा से नज़र के सामने था — और वह था अल्पसंख्यकों के प्रति उसकी सच्ची, प्रामाणिक और अपरिवर्तनीय नफ़रत. बाकी सब अप्रासंगिक था. जब तक वे सत्ता में आने पर इस पर डिलीवरी करते रहे (और उन्होंने की है, यह स्वीकार करना होगा), बाकी सब बेमानी था.
इसीलिए हमारे पास सिर्फ़ एक ही बीजेपी है और कोई चुनौती देने वाला नहीं होगा.
बिहार में एक और पुल गिरा; भागलपुर में विक्रमशिला सेतु का हिस्सा गिरने से यातायात रुका, बड़ा हादसा टला
बिहार के भागलपुर में गंगा नदी पर बने विक्रमशिला सेतु के पिलर नंबर 133 के पास सोमवार रात करीब 12:50 बजे पुल का एक हिस्सा ढह गया, जिसके बाद अधिकारियों ने पुल पर यातायात पूरी तरह से रोक दिया है.
अधिकारियों ने बताया कि वहां मौजूद पुलिसकर्मियों और प्रशासनिक टीम की मुस्तैदी के कारण एक बड़ा हादसा टल गया.घटना के समय पुल पर कई छोटे-बड़े वाहन मौजूद थे, लेकिन सुरक्षा बलों ने तुरंत सक्रियता दिखाते हुए उन्हें पीछे हटाया और सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया.
‘पीटीआई और टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के अनुसार, हादसे की सूचना मिलते ही जिलाधिकारी नवल किशोर चौधरी मौके पर पहुँचे और स्थिति का जायजा लिया. प्रशासन ने फिलहाल पुल पर वाहनों के आवागमन पर पूरी तरह से रोक लगा दी है.
विपक्ष का हमला
बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर सरकार को घेरते हुए लिखा कि उन्होंने एक महीने पहले ही चेतावनी दी थी कि ऐसी घटना हो सकती है. उन्होंने कहा कि आज की घटना यह दर्शाती है कि भ्रष्टाचार की सूची में बिहार शीर्ष पर क्यों है, जहाँ पिछले दो वर्षों में 100 से अधिक पुल और पुलिया ढह चुके हैं.
तेजस्वी यादव ने हिंदी में पोस्ट करते हुए लिखा: “और अब, भ्रष्ट एनडीए सरकार की कृपा से भागलपुर का विक्रमशिला सेतु गंगा मैया में समाधि ले चुका है. क्या भ्रष्टाचार के इससे और प्रत्यक्ष प्रमाण की आवश्यकता है? जिस वक्त पुल गिरा, उस समय उस पर कई गाड़ियाँ थीं, लेकिन ईश्वर की कृपा रही कि वे गिरते हुए स्लैब पर नहीं थे, जिससे जान-माल का नुकसान नहीं हुआ.”
पिछले कुछ सालों में बिहार में पुलों और सेतु गिरने की और भी घटनाएं हुई हैं. इसी साल मार्च में गोपालगंज में घोघारी नदी का निर्माणाधीन पुल ढह गया था. अधिकारियों ने खराब पर्यवेक्षण और गुणवत्ता प्रबंधन में कमी को इसका कारण बताया था. मार्च 2024 में कोसी नदी पर बन रहे भारत के सबसे लंबे निर्माणाधीन पुल का एक हिस्सा गिर गया था, जिसमें एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई थी और 10 अन्य घायल हो गए थे. जून-जुलाई 2024 में भारी बारिश और संरचनात्मक विफलताओं के कारण विभिन्न जिलों सीवान, सारण, मधुबनी, अररिया और किशनगंज में 17 दिनों के भीतर लगातार 12 पुल गिर गए थे और सरकार ने कुछ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी की थी. इसके पहले जून 2023 में अगुआनी-सुल्तानगंज में 1710 करोड़ रुपये की लागत से गंगा नदी पर बन रहा यह विशाल पुल निर्माण के दौरान 14 महीनों में दूसरी बार गिर गया था (पहली बार अप्रैल 2022 में गिरा था). जुलाई 2020 सत्तरघाट पुल, गोपालगंज मुख्यमंत्री द्वारा उद्घाटन किए जाने के मात्र 29 दिन बाद ही पुल और उसकी पहुँच सड़क का एक हिस्सा ढह गया.
सावरकर ने 5 बार ब्रिटिश सरकार से मांगी माफ़ी, गाय को भगवान नहीं मानते थे: सावरकर के प्रपौत्र का कोर्ट में बयान
‘लाइव लॉ’ की रिपोर्ट के अनुसार, पुणे की एक विशेष एमपी/एमएलए अदालत में विनायक दामोदर सावरकर के प्रपौत्र, सत्यकी सावरकर ने एक महत्वपूर्ण गवाही दी है. यह गवाही कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ दायर आपराधिक मानहानि के मामले के दौरान दी गई. सत्यकी ने राहुल गांधी पर लंदन में दिए गए एक भाषण के जरिए सावरकर को बदनाम करने का आरोप लगाया है.
दया याचिकाओं और ब्रिटिश सेना में भर्ती पर स्पष्टीकरण
जिरह के दौरान सत्यकी सावरकर ने स्वीकार किया कि जब सावरकर सेलुलर जेल (काला पानी) में बंद थे, तब उन्होंने पाँच बार दया याचिकाएं दायर की थीं. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केवल सावरकर ही नहीं, बल्कि उस समय के कई अन्य राजनीतिक कैदियों ने भी ब्रिटिश सरकार को इसी तरह की याचिकाएं भेजी थीं.
इसके अलावा, सत्यकी ने यह भी स्वीकार किया कि सावरकर ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीयों से ब्रिटिश सेना में भर्ती होने की अपील की थी. उन्होंने इसके पीछे सावरकर की दूरदर्शिता का तर्क देते हुए कहा कि “इसका उद्देश्य भारतीय युवाओं को सैन्य प्रशिक्षण, हथियारों का ज्ञान और अनुभव दिलाना था. सावरकर चाहते थे कि जब भारत स्वतंत्र हो, तो उसके पास अपनी एक प्रशिक्षित सशस्त्र सेना हो. इसी दूरदर्शिता का परिणाम था कि आजादी के ठीक बाद जब पाकिस्तान ने हमला किया, तो प्रशिक्षित भारतीय सैनिकों के कारण भारत जीतने में सफल रहा.”
आरएसएस और विचारधारा पर बयान
जिरह के दौरान जब सत्यकी सावरकर से यह सवाल पूछा गया कि क्या सावरकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इसी तरह की विचारधारा वाले राजनीतिक दलों के वैचारिक प्रेरणा स्रोत हैं, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि “मुझे इस बात की जानकारी नहीं है कि आरएसएस और उसके जैसी विचारधारा वाले अन्य राजनीतिक दल किसे अपना वैचारिक प्रेरणा स्रोत मानते हैं.”
गाय, ‘दो-राष्ट्र का सिद्धांत’ और भारत रत्न
सत्यकी ने अदालत को बताया कि सावरकर गाय को ‘भगवान’ नहीं मानते थे, बल्कि उसे एक ‘उपयोगी पशु’ के रूप में देखते थे. सत्यकी दो-राष्ट्र की अवधारणा वाले आरोप को खारिज कहा कि यह अवधारणा मूल रूप से सर सैयद अहमद खान द्वारा प्रस्तावित की गई थी, सावरकर ने केवल उस विवाद पर तथ्यात्मक टिप्पणी की थी.
जब सत्यकी से पूछा गया कि सावरकर को भगत सिंह या बटुकेश्वर दत्त जैसे अन्य क्रांतिकारियों की तुलना में अधिक महिमामंडित क्यों किया जाता है, तो उन्होंने कहा कि महान पुरुषों के विचारों में मतभेद होना स्वाभाविक है और राष्ट्रीय गौरव का निर्णय लेना भारत सरकार का काम है. साथ ही सावरकर को ‘भारत रत्न’ देने की मांग पर उन्होंने कहा कि इसका निर्णय भी सरकार को ही करना है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि नेहरू-गांधी परिवार के तीन सदस्यों (जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी) को भी यह सम्मान मिल चुका है.
वाराणसी इफ्तार विवाद: गंगा में बीयर पीने वाले जमानत पर बाहर, लेकिन 14 मुस्लिम युवक 45 दिनों से जेल में
वाराणसी में 17 मार्च को गंगा में कथित तौर पर चिकन बिरयानी के अवशेष फेंकने के आरोप में 14 युवकों को पकड़े जाने के लगभग दो महीने बाद, पुलिस का कहना है कि वह अभी भी “फॉरेंसिक रिपोर्ट” का इंतजार कर रही है, हालांकि उसने इसका विवरण साझा नहीं किया. सूत्रों ने बताया कि उस इंस्टाग्राम अकाउंट की रिपोर्ट का भी इंतजार है, जिससे कथित घटना का वीडियो अपलोड किया गया था.
लखनऊ से मनीष साहू की रिपोर्ट है कि पुलिस ने अभी तक चार्जशीट दाखिल नहीं की है. “धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने”, पूजा स्थल को “अपवित्र” करने, “जबरन वसूली” और प्रदूषण अधिनियम की धाराओं के तहत आरोपी इन 14 मुस्लिम युवकों की जमानत याचिका पर अब 5 मई को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सुनवाई होनी है. इससे पहले निचली अदालत और सत्र न्यायालय द्वारा उनकी जमानत अर्जी खारिज होने के बाद उच्च न्यायालय में तीन सुनवाई हो चुकी हैं.
इस बीच, वाराणसी के घाटों पर पुलिस की ऐसी ही एक और कार्रवाई हुई, जब दो युवकों को गंगा में कथित तौर पर बीयर पीते पकड़ा गया. अस्सी घाट चौकी प्रभारी उप-निरीक्षक रंजीत कुमार ने बताया कि अप्रैल के पहले सप्ताह में अर्जुन राजभर को पकड़ा गया था, जिसके बाद “वीडियो प्रमाण” के आधार पर लाल साहनी को गिरफ्तार किया गया. इस मामले में भी पुलिस ने अभी तक चार्जशीट दाखिल नहीं की है. शांति भंग और आपराधिक धमकी की धाराओं के तहत आरोपी राजभर और साहनी दोनों जमानत पर बाहर हैं.
राज्य सरकार, जिसने इफ्तार बिरयानी विवाद से पहले वाराणसी में गंगा में चलने वाली नावों के पंजीकरण का अधिकार नगर निगम से परिवहन विभाग को स्थानांतरित कर दिया था, ने अभी तक वह पोर्टल शुरू नहीं किया है जिसका उद्देश्य नियमन और प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना था.
नौका विहार के नए नियम
नाव मालिकों (नगर निगम के पास आधिकारिक तौर पर 1,217 नावें पंजीकृत हैं) को पोर्टल पर अपनी नावों का विवरण अपलोड करना होगा. लाइसेंस केवल सरकार द्वारा नियुक्त सर्वेक्षकों द्वारा सत्यापन और प्रमाणन के बाद ही जारी किए जाएंगे, जो निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करेंगे.
जब तक पोर्टल शुरू नहीं होता, नाव संचालक खुद ही अपनी निगरानी सख्त कर रहे हैं ताकि दोबारा किसी विवाद में न फंसें. वाराणसी में नाव संचालकों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन ‘माँ गंगा निषाद राज सेवा न्यास’ के अध्यक्ष प्रमोद मांझी कहते हैं: “पहले नावों पर होने वाली गतिविधियों के लिए कोई स्पष्ट आचार संहिता नहीं थी. इस विवाद ने हमें गंगा की पवित्रता बनाए रखने और उसे प्रदूषण से बचाने के लिए सुरक्षा उपाय लागू करने को मजबूर किया है.”
मांझी के अनुसार, नए दिशा-निर्देशों में नाव पर मांसाहार, शराब, नशीले पदार्थ और मादक द्रव्यों को ले जाने या सेवन करने पर सख्त प्रतिबंध शामिल है. नाव संचालकों को निर्देश दिया गया है कि वे सुनिश्चित करें कि यात्री नदी में प्लास्टिक की बोतलें, खाने के रैपर या कोई अन्य कचरा न फेंकें. उन्हें नावों पर कैमरे लगाने के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है. इसके अलावा, हथियारों का प्रदर्शन अब स्पष्ट रूप से वर्जित है, और संचालकों को नाव की स्वीकृत क्षमता के अनुसार ही यात्री बैठाने और किसी भी झगड़े पर नजर रखने को कहा गया है. मांझी कहते हैं, “उल्लंघन करने वालों के खिलाफ संगठन कार्रवाई करेगा और संबंधित अधिकारियों से शिकायत की जाएगी.”
भोजन के बारे में, न्यास के आयोजन सचिव शंभू निषाद कहते हैं कि शाकाहारी भोजन की “आमतौर पर अनुमति” है, लेकिन यात्री अपने साथ सामान ले जाते हैं और उनके बैग चेक करने का कोई प्रावधान नहीं है.
वाराणसी के सहायक पुलिस आयुक्त अतुल अंजान त्रिपाठी का कहना है कि चूंकि गंगा में चलने वाली सभी नावें निजी स्वामित्व वाली हैं, इसलिए सरकार की भूमिका मुख्य रूप से सुरक्षा और संरक्षा नियमों की देखरेख तक सीमित है. क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी राघवेंद्र सिंह ने वादा किया है कि नावों के पंजीकरण के लिए पोर्टल “जल्द ही शुरू” होगा.
जिस नाव पर 14 आरोपियों ने इफ्तार पार्टी की थी, उसके मालिक काशी साहनी की बेटी नैना साहनी का कहना है कि नाव वापस पानी में है. उन्होंने कहा, “लेकिन अब हम अतिरिक्त सावधानी बरत रहे हैं. हम युवकों के समूह को नाव किराए पर देने से बचते हैं और परिवारों को प्राथमिकता देते हैं.”
गिरफ्तार युवकों के परिवारों का कहना है कि उन्हें बिना उचित सबूत जुटाए झूठे आरोपों में फंसाया गया है और उन्होंने नदी में कोई अवशेष नहीं फेंके थे. वाराणसी जिला जेल में बंद मोहम्मद तहसीम और आजाद अली के पिता मोहम्मद शमीम कहते हैं: “सभी परिवार नियमित रूप से उनसे मिलने जाते हैं. जेल में समय बीतने के साथ हमारे बेटे हताश हो रहे हैं... हम प्रार्थना करते हैं कि ईश्वर हमारी मदद करे.”
‘एससीएओआरए’ बनाम ‘एसआईआर’: कहानी एक ही, फैसले अलग-अलग
वरिष्ठ पत्रकार मीतू जैन ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म “एक्स” पर पश्चिम बंगाल और बार एसोसिएशन के चुनाव के मामले में सुप्रीम कोर्ट के अलग-अलग रुख पर हैरानी व्यक्त की है. मीतू ने लिखा है: प्रथम दृष्टया, मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ द्वारा पश्चिम बंगाल के लाखों वंचित मतदाताओं की याचिकाओं के साथ किए गए व्यवहार और एक वकील संघ (बार एसोसिएशन) में मतदान के इच्छुक वकीलों के प्रति उसकी प्रतिक्रिया के बीच तुलना करना थोड़ा अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है, लेकिन दांव पर लगे कानूनी सिद्धांत और कानून की दो अलग-अलग व्याख्याओं को देखते हुए, यह समानता चौंकाने वाली है.
सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन (एससीएओआरए) के वकीलों के चुनाव बनाम पश्चिम बंगाल मतदाता सूची (एसआईआर) अभ्यास के मामले पर विचार करें. दोनों मामलों में पीठ वही थी—मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉय माल्या बागची, लेकिन जो मानदंड अपनाए गए वे एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत थे.
पश्चिम बंगाल के मामले में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए गए थे—लगभग 87 लाख—क्योंकि संबंधित अधिकारी समय रहते इन नामों का सत्यापन नहीं कर सके, भले ही यह ज्ञात था कि पश्चिम बंगाल चुनाव 23 और 29 अप्रैल को होने वाले थे. मतदाताओं की शिकायतों का निवारण नहीं किया जा सका, क्योंकि न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) व्यावहारिक रूप से अस्तित्वहीन थे या संसाधनों की कमी थी, और इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में ही मतदाताओं को उनके वैधानिक और मौलिक अधिकार से वंचित कर दिया गया.
अब एससीएओआरए का मामला लीजिए. एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड के इस निकाय का चुनाव 29 अप्रैल, 2026 को होना था और चुनाव प्रक्रिया पहले से ही चल रही थी, जब 27 अप्रैल को मुख्य न्यायाधीश कांत और न्यायमूर्ति बागची की पीठ ने हस्तक्षेप किया.
अदालत के सामने मामला यह था कि कुछ नए नियुक्त एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड अभी तक एससीएओआरए के सदस्य नहीं बने थे और चुनाव में मतदान नहीं कर सकते थे. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, भले ही यह उनके मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं था और इसके लिए सही मंच निचली न्यायपालिका होना चाहिए था. पश्चिम बंगाल में, पीड़ित मतदाताओं को एक न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) में भेजा गया था ताकि वे उस अधिकार के लिए लड़ सकें, जो अनिवार्य रूप से एक वैधानिक और मौलिक अधिकार है.
मुख्य न्यायाधीश के समक्ष याचिका यह थी कि इन एओआर (एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड्स) को एससीएओआरए का सदस्य बनाया जाना चाहिए और इस प्रकार मतदान की अनुमति दी जानी चाहिए. ये एओआर सदस्य इसलिए नहीं बन सके, क्योंकि एओआर की परीक्षा देने वाले वकीलों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा 16 अप्रैल को ही मंजूरी दी गई थी, जबकि मतदाता सूची में शामिल होने की अंतिम तिथि 14 अप्रैल, 2026 थी. दूसरे शब्दों में, यह एक ऐसी देरी थी जो उनकी गलती नहीं थी, जैसा कि पश्चिम बंगाल के मामले में भी हुआ था.
इसलिए, मतदान से दो दिन पहले, 27 अप्रैल को, मुख्य न्यायाधीश कांत और न्यायमूर्ति बागची ने इन एओआर के लिए नियम में अपवाद बनाने का फैसला किया. “परिस्थितियों को देखते हुए, चूंकि याचिकाकर्ता एओआर या उनके सहयोगी एओआर को प्रशासनिक प्रक्रियात्मक देरी के कारण 14 अप्रैल 2026 से पहले शामिल किया जा सकता था, उन्हें वर्तमान कार्यवाही के परिणाम के अधीन आगामी एससीएओआरए चुनावों में अपना वोट डालने की अनुमति दी जा सकती है.”
पदाधिकारी पद के लिए चुनाव लड़ रहे एक पीड़ित वकील का कहना है, “विधानसभा चुनाव में मतदान करना एक वैधानिक कानूनी अधिकार है और इस अधिकार से वंचित करना चुनावी प्रक्रिया को खतरे में डालता है. पश्चिम बंगाल में भी देरी प्रशासनिक थी, चुनाव आयोग की ओर से, लेकिन इसकी कीमत मतदाताओं को चुकानी पड़ी. लेकिन एससीएओआरए एक सोसायटी है, एक स्वायत्त निकाय है और यहाँ कोई मौलिक अधिकार प्रभावित नहीं हो रहे हैं, फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने उनकी मदद करने में असाधारण रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग किया, भले ही इसका मतलब चुनाव को नई तारीख तक स्थगित करना ही क्यों न हो.” उन्होंने आगे कहा कि इसके लिए सही मंच निचली अदालत होनी चाहिए थी.
27 अप्रैल के सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने यह सुनिश्चित किया कि 29 अप्रैल, 2026 को होने वाले चुनाव 21 मई तक के लिए टाल दिए गए. पश्चिम बंगाल को ऐसा विशेष उपचार नहीं मिला. मैंने एससीएओआरए की कार्यकारी समिति के कई सदस्यों से संपर्क किया, लेकिन उन्होंने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया क्योंकि वे “अदालत के साथ किसी परेशानी में नहीं पड़ना चाहते थे.”
लिपुलेख के जरिए मानसरोवर यात्रा पर नेपाल ने जताई आपत्ति; कहा- लिपुलेख हमारा क्षेत्र; भारत बोला- दावा अनुचित
काठमांडू में बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार, जिसे बने अभी एक महीने से थोड़ा ही अधिक समय हुआ है, ने भारत और चीन द्वारा लिपुलेख दर्रे के माध्यम से कैलाश मानसरोवर यात्रा आयोजित करने की योजना पर आपत्ति जताई है. नेपाल ने भारत और चीन, दोनों से साफ-साफ कहा है कि लिपुलेख क्षेत्र उसका है.
भारत ने कहा है कि इस तरह के दावे “न तो न्यायसंगत हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित हैं”, और वह नेपाल के साथ “रचनात्मक बातचीत” के लिए तैयार है.
शुभोजित रॉय और युबराज घिमिरे की रिपोर्ट के अनुसार, लिपुलेख दर्रा एक “विवादित” क्षेत्र रहा है और नेपाल अक्सर इस दर्रे के माध्यम से व्यापार और तीर्थयात्रा आयोजित करने के भारत और चीन के कदमों पर सवाल उठाता रहा है.
नेपाली विदेश मंत्रालय ने रविवार को कहा, “विदेश मंत्रालय ने विभिन्न मीडिया माध्यमों में कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर उठाए गए सवालों और चिंताओं पर ध्यान दिया है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि यह भारत और चीन के बीच नेपाली क्षेत्र लिपुलेख के माध्यम से आयोजित की जाएगी.”
मंत्रालय ने आगे कहा, “नेपाल सरकार इस तथ्य पर पूरी तरह स्पष्ट और अडिग है कि महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी 1816 की सुगौली संधि के बाद से नेपाल के अभिन्न अंग हैं.”
नेपाली मंत्रालय ने जोर देकर कहा कि उसने “कैलाश मानसरोवर यात्रा के संबंध में राजनयिक माध्यमों से भारत और चीन दोनों को अपने स्पष्ट रुख और चिंताओं से अवगत करा दिया है.”
उसने यह भी कहा, “इससे पहले भी नेपाल सरकार लगातार भारत सरकार से आग्रह करती रही है कि वह इस क्षेत्र में सड़क निर्माण या विस्तार, सीमा व्यापार और तीर्थयात्रा जैसी कोई भी गतिविधि न करे.” नेपाली विदेश मंत्रालय का यह संदर्भ अगस्त 2025 में भारत और चीन द्वारा लिपुलेख दर्रे के माध्यम से व्यापार फिर से शुरू करने की ओर था, जो कि सितंबर 2025 में ‘जेनज़ी’ विरोध प्रदर्शनों द्वारा सरकार गिरने से पहले हुआ था.
बयान में यह भी स्पष्ट किया गया कि “मित्र राष्ट्र चीन को भी आधिकारिक तौर पर इस तथ्य से अवगत करा दिया गया है कि लिपुलेख क्षेत्र नेपाली क्षेत्र है.”
नेपाल के इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने रविवार को कहा: “इस संबंध में भारत का रुख सुसंगत और स्पष्ट रहा है. लिपुलेख दर्रा 1954 से ही कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए एक पुराना मार्ग रहा है और दशकों से इस मार्ग से यात्रा होती आ रही है. यह कोई नया घटनाक्रम नहीं है.”
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, “क्षेत्रीय दावों के संबंध में भारत का हमेशा से यह मानना रहा है कि ऐसे दावे न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित हैं. क्षेत्रीय दावों का ऐसा एकपक्षीय और कृत्रिम विस्तार अस्वीकार्य है. भारत नेपाल के साथ द्विपक्षीय संबंधों के सभी मुद्दों पर रचनात्मक बातचीत के लिए तैयार है, जिसमें संवाद और कूटनीति के माध्यम से सीमा विवादों को सुलझाना भी शामिल है.” तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने सितंबर 2025 में अपनी चीन यात्रा के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ भी यह मुद्दा उठाया था.
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह “ऐतिहासिक संधियों, समझौतों, तथ्यों, मानचित्रों और साक्ष्यों के आधार पर भारत और नेपाल के बीच घनिष्ठ और मैत्रीपूर्ण संबंधों की भावना के अनुरूप, कूटनीतिक माध्यमों से सीमा मुद्दे को हल करने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध है.”
लिपुलेख दर्रा 2020 में भारत और नेपाल के बीच विवाद का विषय बना था, जब ओली सरकार ने वहां भारत द्वारा बुनियादी ढांचे और सड़क निर्माण पर आपत्ति जताई थी. इसके बाद नेपाल ने अपना नया मानचित्र प्रकाशित किया था, जिसमें लिपुलेख पर दावा किया गया था. भारत ने इन दावों को मई 2020 में और फिर अगस्त 2025 में खारिज कर दिया था.
निवर्तमान नेपाली राजदूत शंकर प्रसाद शर्मा ने पिछले शुक्रवार को ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के ‘आइडिया एक्सचेंज’ कार्यक्रम में कहा था : “सबसे पहले, एक बार जब सीमा जैसा मुद्दा संविधान में शामिल हो जाता है, तो सरकार चाहे कोई भी हो, उसे आसानी से बाहर नहीं निकाला जा सकता. 2022 में मेरे आने के बाद पहली बैठक के दौरान इस बारे में उच्च स्तरीय चर्चा हुई थी. यह सहमति बनी थी कि मौजूदा द्विपक्षीय तंत्र बातचीत शुरू करेगा. संवाद और कूटनीति ही सबसे अच्छा तरीका है. भारत और चीन के बीच व्यापार के संबंध में, नेपाल सरकार पहले ही विरोध जता चुकी है कि हमें इसमें शामिल किया जाना चाहिए. इस पर बातचीत होनी चाहिए क्योंकि वह हमारी भूमि है और इसे त्रिपक्षीय रूप से संबोधित किया जाना चाहिए.”
मुंबई प्रेस क्लब से तीन सदस्यों का निलंबन; सोशल मीडिया पर आलोचना, “यह एक ‘पार्टी क्लब’ बनता जा रहा”
मुंबई प्रेस क्लब को अपने तीन वरिष्ठ सदस्यों को छह साल के लिए निलंबित करने के कारण सोशल मीडिया पर तमाम आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है. दरअसल, प्रेस क्लब ने एलगार परिषद मामले से जुड़े मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों को आमंत्रित करने के लिए क्लब के तीनों सदस्यों को निलंबित किया है.
सुजाता मधोक नामक एक यूज़र ने लिखा कि मुंबई प्रेस क्लब में एक अनौपचारिक मिलन के लिए लोगों को आमंत्रित करने मात्र पर, एक पूर्व पदाधिकारी सहित सदस्यों को निलंबित कर देना कितना मनमाना फैसला है. जिन मेहमानों को आमंत्रित किया गया था, वे एक बेहद अजीब मामले में आरोपी हैं, अपराधी नहीं. यह असहिष्णुता की पराकाष्ठा है.
मीडियारामा नामक यूज़र ने कहा, “बेहद शर्मनाक! क्लब को अपने नाम से ‘प्रेस’ शब्द हटा देना चाहिए.” आविष्कार ने लिखा, @IndEditorsGuild @PCITweets देखिए कि सत्ता के सामने सच कैसे बोला जाता है. मुंबई प्रेस क्लब से सीखिए. महेंद्र सिंह ने कहा, “मुंबई प्रेस क्लब में यह क्या बकवास हो रही है? ऐसा लगता है कि पत्रकारों को एक स्वतंत्र स्थान प्रदान करने के बजाय वहाँ बहुत अधिक आंतरिक राजनीति हो रही है. एक समय का यह प्रतिष्ठित संस्थान अब गैर-कानूनी आदेश पारित कर अपने नाम को बदनाम कर रहा है.” फराज़ अहमद ने टिप्पणी की कि बॉम्बे प्रेस क्लब पर शर्म आती है, जबकि प्रीता सलिल ने लिखा, “यह एक ‘पार्टी क्लब’ बनता जा रहा है, राजनीति (धर्म नहीं) का प्रवेश हो रहा है.”
इस बीच “द इंडियन एक्सप्रेस” में वल्लभ ओज़ारकर की खबर है कि मुंबई प्रेस क्लब द्वारा तीन सदस्यों को निलंबित करने के दो दिन बाद, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के अधिकारियों ने क्लब का दौरा किया था. क्लब द्वारा जारी एक बयान के अनुसार, अधिकारियों ने इस बैठक से संबंधित दस्तावेज मांगे हैं.
यह मामला मुंबई प्रेस क्लब में 19 जनवरी को आयोजित एक कार्यक्रम से जुड़ा है, जिसमें 2018 के भीमा कोरेगांव मामले के कई आरोपी शामिल हुए थे. इनमें वरवरा राव, वर्नोन गोंसाल्वेस, अरुण फरेरा, गौतम नवलखा, आनंद तेलतुंबडे, हनी बाबू, रोना विल्सन और सुधीर धवले शामिल थे—ये सभी वर्तमान में जमानत पर बाहर हैं.
प्रेस क्लब ने कहा कि यह बैठक पूर्व अध्यक्ष गुरबीर सिंह सहित पूर्व पदाधिकारियों की उपस्थिति में हुई थी. क्लब ने स्पष्ट किया कि जमानत देते समय, सुप्रीम कोर्ट और विशेष एनआईए अदालत ने कुछ शर्तें लागू की थीं, जिनके तहत कुछ आरोपियों को जमानत पर रहते हुए एक-दूसरे से मिलने पर प्रतिबंध लगाया गया था. क्लब के अनुसार, 19 जनवरी की इस बैठक ने उन शर्तों के संभावित उल्लंघन पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
दो सदस्यों की शिकायतों के आधार पर एक आंतरिक जांच के बाद, क्लब की प्रबंध समिति ने तीन सदस्यों—पूर्व अध्यक्ष गुरबीर सिंह, वरिष्ठ पत्रकार बर्नार्ड डी’मेलो और श्रीकांत मोदक—को यह कहते हुए निलंबित कर दिया कि उन्होंने इस बैठक का आयोजन किया था या इसे सुगम बनाया था.
अपने बयान में, क्लब ने कहा कि उसकी जांच समिति ने दस्तावेजों, सीसीटीवी फुटेज और स्टाफ सदस्यों के बयानों की समीक्षा की और इस निष्कर्ष पर पहुँची कि इन तीनों ने “सामूहिक रूप से एक ऐसी बैठक को सुगम बनाया जिससे क्लब परिसर के भीतर जमानत की शर्तों का उल्लंघन हुआ होगा”, जिससे संस्थान “गंभीर कानूनी और प्रतिष्ठा संबंधी जोखिम” में पड़ गया.
निलंबित तीनों सदस्यों ने आरोपों को खारिज कर दिया और क्लब की कार्रवाई पर सवाल उठाए. गुरबीर सिंह ने कहा कि वह 19 जनवरी की चर्चा में “महज एक प्रतिभागी” थे और उन्होंने कार्यक्रम आयोजित करने से इनकार किया. मामले के गुणों पर उन्होंने कहा, “उपरोक्त के बावजूद, प्रेस क्लब में जेल सिंह, लालकृष्ण आडवाणी से लेकर कन्हैया कुमार और प्रशांत भूषण जैसे विभिन्न विचारों और विचारधाराओं के लोगों को आमंत्रित करने की एक समृद्ध संस्कृति रही है. उनमें से कई के खिलाफ मामले हैं, लेकिन जब तक वे दोषी नहीं ठहराए जाते, हम किसी को बाहर नहीं रखते. क्लब चर्चा और विवाद का एक मंच है, और एक प्रेस क्लब इसी के लिए होता है. भीमा कोरेगांव के किसी भी आरोपी को दोषी नहीं ठहराया गया था और वे कहीं भी जाने के लिए स्वतंत्र थे.” सिंह ने दावा किया कि निलंबन राजनीति से प्रेरित था और मुंबई प्रेस क्लब के आगामी चुनावों से जुड़ा था. उन्होंने कहा, “इस अचानक निष्कासन का तत्काल कारण यह डर है कि मैं आगामी चुनावों में एक एकजुट विपक्ष का नेतृत्व कर सकता हूँ. निष्कासन मुझे चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य बनाता है.”
बर्नार्ड डी’मेलो ने कहा कि उन्होंने भीमा कोरेगांव के आरोपियों को मामले से जुड़े व्यापक मुद्दों पर चर्चा करने के लिए आमंत्रित किया था, न कि अभियोजन पक्ष के गुणों पर. उन्होंने कहा, “अदालत में दोषी साबित होने तक आरोपी निर्दोष हैं,” उन्होंने आगे कहा कि गिरफ्तारी के लगभग आठ साल बाद भी सुनवाई शुरू नहीं हुई है. श्रीकांत मोदक ने भी किसी भी गलत काम से इनकार किया और कहा कि वह आरोपियों पर लगाई गई जमानत की शर्तों से अनजान थे.
ईरान का साथ छोड़ने के लिए भारत ने जो कीमत चुकाई
आनंद तेलतुंबडे ने भारत-ईरान संबंधों के पतन का एक विस्तृत और आलोचनात्मक विश्लेषण किया है. उनका मुख्य तर्क यह है कि मोदी सरकार ने अमेरिकी दबाव के आगे घुटने टेककर न केवल एक ऐतिहासिक मित्र खो दिया है, बल्कि भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक और आर्थिक हितों को भी गहरी क्षति पहुँचाई है.
लेख की शुरुआत भारत और ईरान के बीच हजारों साल पुराने संबंधों के उल्लेख से होती है. उनका कहना है कि यह रिश्ता केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं था, बल्कि सभ्यतागत था. सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर मुगल काल तक, फारसी भाषा और संस्कृति भारतीय शासन, साहित्य और संगीत (विशेषकर सूफी परंपरा) का अभिन्न हिस्सा रही. स्वतंत्रता के बाद भी, भारत ने 1950 में ईरान के साथ अपनी शुरुआती मित्रता संधियों में से एक पर हस्ताक्षर किए थे. उनका मानना है कि वर्तमान सरकार ने इन गहरे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक बंधनों की अनदेखी कर दी है.
ईरान भारत के लिए ऊर्जा का एक विश्वसनीय और सस्ता स्रोत था. 1990 से 2018 के बीच, वह भारत का दूसरा या तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता था. ईरान न केवल तेल देता था, बल्कि माल ढुलाई में छूट, लंबी उधारी और सबसे महत्वपूर्ण रूप से ‘रुपया भुगतान प्रणाली’ की सुविधा देता था, जिससे भारत का विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित रहता था.
तेलतुंबडे फरज़ाद-बी गैस क्षेत्र का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि कैसे भारतीय पूंजी और इंजीनियरों ने इसकी खोज की, लेकिन मोदी सरकार के “कॉम्प्राडोर पक्षाघात” (दबाव में निर्णय न ले पाना) के कारण भारत ने इस 6.2 बिलियन डॉलर के अवसर को खो दिया. 2021 में ईरान ने यह ठेका अपनी स्थानीय कंपनी को दे दिया, जिससे भारत के करोड़ों डॉलर का निवेश डूब गया.
भारत के लिए ईरान का सबसे बड़ा महत्व ‘भूगोल’ था. पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँचने के लिए ईरान एकमात्र जमीनी रास्ता प्रदान करता था. इसी रणनीतिक सोच के तहत चाबहार बंदरगाह का विकास किया गया था.
चाबहार बंदरगाह ‘अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा’ (आईएनएसटीसी) का दक्षिणी द्वार था, जो मुंबई को मास्को से जोड़ता. इससे परिवहन समय और लागत में 30-40% की कमी आती.
भारत ने चाबहार-जाहेदान रेलवे और अफगानिस्तान में जरंज-देलाराम राजमार्ग बनाकर एक ऐसा गलियारा तैयार किया था जो चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (बीआरआई) और ‘सीपीईसी’ (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) का एकमात्र प्रभावी मुकाबला था. लेकिन चाबहार को छोड़ना मध्य एशिया में चीनी प्रभुत्व के सामने आत्मसमर्पण करने जैसा है.
मनमोहन सिंह सरकार और मोदी सरकार के बीच एक तीखी तुलना करते हुए वह लिखते हैं कि 2011-12 में भी अमेरिका ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे. लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संप्रभु स्वायत्तता का परिचय देते हुए सार्वजनिक रूप से कहा कि भारत तेल आयात जारी रखेगा. उन्होंने अमेरिकी डॉलर के तंत्र से बचते हुए ‘यूको बैंक’ के माध्यम से रुपया भुगतान प्रणाली विकसित की. यह एक स्वतंत्र राष्ट्र का आचरण था. जबकि 2018 में जब ट्रम्प ने प्रतिबंध लगाए, तो मोदी सरकार ने बिना किसी प्रतिरोध के तेल आयात शून्य कर दिया. तेलतुंबडे इसे “व्यावहारिक” होने के नाम पर रणनीतिक आपदा बताते हैं.
लेख में हालिया घटनाओं (2025-26) को भारत की विदेश नीति का सबसे काला अध्याय बताया गया है. मसलन, चाबहार से विदाई. अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों की छूट रद्द किए जाने के बाद भारत ने विरोध करने के बजाय चाबहार परियोजना से किनारा करना शुरू कर दिया. 2026-27 के बजट में इस परियोजना के लिए ‘शून्य’ राशि आवंटित की गई. वह आशंका जताते हैं कि जिस बंदरगाह को भारत ने चीन को रोकने के लिए बनाया था, उसे अब चीन ही संचालित कर सकता है.
लेख के अनुसार, भारत-ईरान में एक तरह से यह द्विपक्षीय व्यापार का अंत है. जो व्यापार कभी 17 बिलियन डॉलर था, वह गिरकर 1.68 बिलियन डॉलर रह गया. ईरान के साथ व्यापार गिर रहा है, वहीं इजरायल की ओर झुकाव दिखाई पड़ रहा है. फरवरी 2026 में मोदी की इजरायल यात्रा और उसके तुरंत बाद ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई पर अमेरिकी-इजरायली हमले ने आग में घी का काम किया. भारत द्वारा हमले की निंदा न करना और खामेनेई की मृत्यु पर शोक व्यक्त न करना, ईरान के साथ संबंधों के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ.
निष्कर्ष यह है कि भारत ने अपनी ऊर्जा विविधता खो दी है और अब वह महंगे अमेरिकी और खाड़ी तेल पर निर्भर है. मध्य एशिया में भारत की विश्वसनीयता खत्म हो गई है और पाकिस्तान व चीन की स्थिति मजबूत हुई है.
आनंद तेलतुंबडे के अनुसार, भारत अब एक संप्रभु शक्ति के बजाय एक अधीनस्थ राज्य की तरह व्यवहार कर रहा है, जिसने अपनी दशकों की मेहनत और रणनीतिक बढ़त को केवल अमेरिका और इजरायल को खुश करने के लिए दांव पर लगा दिया है. यह नुकसान केवल आर्थिक नहीं, बल्कि अस्तित्वगत और कूटनीतिक है, जिसकी भरपाई निकट भविष्य में असंभव लगती है. अंग्रेजी में यह लंबा लेख यहां पढ़ा जा सकता है.
(आनंद तेलतुंबडे पीआईएल के पूर्व सीईओ, आईआईटी खड़गपुर और जीआईएम गोवा के प्रोफेसर हैं. वे एक लेखक और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता भी हैं.)
ग्रेट निकोबार परियोजना: विकास की दौड़ में पीछे छूटते जनजातीय अधिकार
‘आर्टिकल 14’ में ऋषिका पारदीकर की रिपोर्ट है कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का सुदूर दक्षिणी हिस्सा, ग्रेट निकोबार, इन दिनों एक विशालकाय विकास परियोजना और उससे उपजे विवादों के केंद्र में है. 92,000 करोड़ रुपये की इस महा-परियोजना का उद्देश्य आर्थिक और रणनीतिक लाभ प्राप्त करना है, लेकिन इसकी कीमत वहां की प्राचीन पारिस्थितिकी और सदियों से रह रही जनजातियों, विशेषकर ‘शोंपेन’ को चुकानी पड़ रही है.
अधिकारों का उल्लंघन और एएजेवीएस की भूमिका
हालिया विवादों का मुख्य कारण ‘अंडमान आदिम जनजाति विकास समिति’ (एएजेवीएस) द्वारा दी गई वह सहमति है, जिसके लिए वह कानूनी रूप से अधिकृत नहीं थी. एएजेवीएस का गठन जनजातियों के कल्याण के लिए किया गया था, लेकिन आरोप है कि इसने शोंपेन जनजाति की ओर से परियोजना के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी कर दिया. विशेषज्ञों और पूर्व सदस्यों, जैसे मानवविज्ञानी त्रिलोकनाथ पंडित का तर्क है कि इस संस्था के पास जनजातियों की पैतृक भूमि को सौंपने का कोई अधिकार नहीं है.
यह परियोजना केवल कंक्रीट का ढांचा नहीं है, बल्कि यह एक प्राचीन वर्षावन के विनाश की कहानी भी है. अनुमान है कि इस परियोजना के लिए लगभग 1 करोड़ (10 मिलियन) पेड़ काटे जाएंगे. यह क्षेत्र निकोबार मेगापॉड और जाइंट लेदरबैक कछुए जैसी दुर्लभ प्रजातियों का एकमात्र ठिकाना है. पर्यावरणविदों का मानना है कि ‘प्रतिपूरक वनीकरण’ के नाम पर हरियाणा जैसे राज्यों में पेड़ लगाना, निकोबार के सदियों पुराने वर्षावन की भरपाई कभी नहीं कर सकता.
शोंपेन और निकोबारी समुदायों का संघर्ष
शोंपेन एक अर्ध-खानाबदोश जनजाति है जो बाहरी दुनिया से लगभग कटी हुई है. उनकी अपनी भाषा और संस्कृति है जो पूरी तरह से जंगलों पर निर्भर है. परियोजना के कारण उनके आवास और आजीविका पर सीधा खतरा मंडरा रहा है. वहीं निकोबारी समुदाय, जिन्होंने शुरुआत में दबाव में आकर सहमति दी थी, अब उसे वापस ले लिया है. उनका कहना है कि उन्हें परामर्श के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया.
भारत सरकार का दावा है कि यह परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. सरकार के अनुसार, इससे किसी भी जनजाति का विस्थापन नहीं होगा. हालांकि, विपक्ष के नेता राहुल गांधी और अन्य विशेषज्ञों ने इसे ‘देश की प्राकृतिक विरासत के खिलाफ अपराध’ करार दिया है. हालिया रिपोर्टों में स्थानीय प्रशासन द्वारा एक ‘पुनर्वास योजना’ तैयार करने की बात भी सामने आई है, जो सरकार के ‘कोई विस्थापन नहीं’ वाले दावे पर सवाल खड़े करती है.
शिकार और शोषण के गंभीर आरोप
लेख में एएजेवीएस के अधिकारियों पर गंभीर आरोप भी लगाए गए हैं. पूर्व कर्मचारियों और स्थानीय लोगों का कहना है कि यह संस्था जनजातियों के कल्याण के बजाय शिकारियों की मदद करने और जंगलों में अवैध गतिविधियों को बढ़ावा देने का अड्डा बन गई है. जनजातियों को तंबाकू और शराब जैसे नशीले पदार्थों की आपूर्ति कर उनके संसाधनों तक पहुंच बनाने के आरोप भी चिंताजनक हैं.
विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाना हमेशा से एक चुनौती रहा है, लेकिन जब विकास की कीमत एक पूरी संस्कृति और प्रजाति का अस्तित्व हो, तो पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है. कलकत्ता उच्च न्यायालय में लंबित यह मामला केवल एक परियोजना का नहीं, बल्कि भारत के संवैधानिक वादों और जनजातीय अधिकारों की रक्षा की परीक्षा है. क्या हम एक ‘हांगकांग’ बनाने की चाह में अपनी सबसे प्राचीन और दुर्लभ विरासत को खोने के लिए तैयार हैं? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर आने वाली पीढ़ियां हमसे मांगेंगी.
ग्लोबल हेल्थ अलर्ट: क्या भारत में आपका परिवार “सफेद जहर” का सेवन कर रहा है?
डॉ. नेहल वैद्य, जो बाल रोग विशेषज्ञ हैं, लिखते हैं कि एक अनिवासी भारतीय (एनआरआई) के रूप में, हम अक्सर भारत में अपने माता-पिता और रिश्तेदारों के स्वास्थ्य पर ध्यान देते हैं. हालांकि, हाल ही में गुजरात के अहमदाबाद, राजकोट और हमारे अपने कच्छ क्षेत्र सहित पूरे राज्य में दूध और मावा में मिलावट के बड़े रैकेटों पर हुई कार्रवाई एक डरावनी सच्चाई बयां करती है. आपके परिवार द्वारा पिया जाने वाला दूध शायद “अमृत” नहीं, बल्कि एक धीमा रासायनिक जहर हो सकता है.
वे ये 12 अनिवार्य प्रश्न और उत्तर अपने भारत स्थित प्रियजनों के साथ साझा करने का आग्रह करती हैं. ये हैं:
1. क्या हम जो दूध पीते हैं वह शुद्ध है? यह असली है या नकली? गुजरात की हालिया घटनाओं के आंकड़े चौंकाने वाले हैं. अहमदाबाद (रामोल-वतवा) में एक फैक्ट्री ताड़ का तेल (पाम ऑयल) मिलाते हुए पकड़ी गई. राजकोट-गोंडल हाईवे पर फॉर्मेलिन और यूरिया मिला हुआ दूध जब्त किया गया. सूरत में ग्लूकोज पाउडर, व्हाइटनर और केमिकल एसेंस से “दूध” बनाया जा रहा था. बनासकांठा में माल्टोडेक्सट्रिन पाउडर घोटाला मिला, और मेहसाणा-विजापुर में सोख्ता कागज (ब्लॉटिंग पेपर) और जानवरों की चर्बी का उपयोग दूध को गाढ़ा करने के लिए किया जा रहा था.
2. क्या यह कच्छ में भी हुआ है? बिल्कुल. “सफेद जहर” के सौदागर यहाँ भी सक्रिय हैं. अंजार-गांधीधाम में केमिकल युक्त दूध जब्त किया गया, और भुज में नकली देसी घी और दूध का रैकेट पकड़ा गया. कच्छ के हाईवे पर कई होटलों में पाउडर और पानी से बना “दूध” पाया गया. रण उत्सव और त्योहारों के दौरान भुज और अंजार में स्टार्च और ब्लोटिंग पेपर से बना नकली मावा भारी मात्रा में पकड़ा गया.
3. यह तो चिंताजनक है! आखिर यह नकली दूध बनता कैसे है? इसके दो तरीके हैं: पहला, थोड़े से असली दूध में नकली चीजें मिला देना. दूसरा, बिना असली दूध की एक भी बूंद के, पूरी तरह रसायनों से दूध तैयार करना.
वसा (फैट) बढ़ाने के लिए जानवरों की चर्बी या पाम ऑयल का उपयोग किया जाता है. गाढ़ेपन के लिए सोख्ता कागज, स्टार्च या घटिया आटा मिलाया जाता है.
सिंथेटिक दूध बनाने के लिए यूरिया, कास्टिक सोडा, डिटर्जेंट और ग्लूकोज का उपयोग होता है. इसे इस तरह बनाया जाता है कि यह दिखने और महकने में बिल्कुल असली दूध जैसा लगे.
4. यदि कोई इसे डेयरी में जमा करे, तो क्या वह पकड़ा नहीं जाएगा? ज्यादातर छोटे विक्रेता और ग्राम समितियों के पास केवल फैट और एसएनएफ मापने वाली मशीनें होती हैं. जालसाज यूरिया और चीनी को इतने सटीक तरीके से मिलाते हैं कि दूध इन टेस्ट को पास कर लेता है. इसे पकड़ने के लिए विशेष ‘एडल्टरेशन टेस्टिंग किट’ की जरूरत होती है, जो छोटी सोसायटियों के पास नहीं होती.
5. क्या बड़ी डेयरियों में नकली दूध पकड़ा जाता है? हाँ, बड़ी डेयरियाँ दूध स्वीकार करने से पहले ‘डॉक टेस्ट’ करती हैं:
मिल्क एनालाइजर (FTIR): एक मिनट में यूरिया, सुक्रोज और माल्टोडेक्सट्रिन का पता लगाता है.
रैपिड टेस्ट स्ट्रिप्स: डिटर्जेंट, स्टार्च या हाइड्रोजन पेरोक्साइड होने पर रंग बदल देती हैं.
एंटीबायोटिक टेस्ट: यह देखने के लिए कि पशु को ज्यादा दवाएं तो नहीं दी गईं.
6. तो क्या हमें केवल बड़ी डेयरियों से दूध खरीदना चाहिए या खुद की गाय रखनी चाहिए? हाँ, ज्यादातर मामलों में यही सही है. यदि आपके पास कोई पुराना भरोसेमंद दूधवाला है तो ठीक है, अन्यथा बड़ी और प्रतिष्ठित डेयरियां सुरक्षित हैं.
7. हमारे शरीर पर नकली दूध का क्या प्रभाव पड़ता है? नकली दूध के रसायनों से तुरंत जी मिचलाना, उल्टी और पेट दर्द हो सकता है. लंबे समय में यह लिवर-किडनी फेलियर, हृदय रोग और कैंसर के खतरे को बढ़ाता है. यह बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए बेहद घातक है.
8. एक आम व्यक्ति घर पर नकली दूध की पहचान कैसे कर सकता है? कोई “जादुई” टेस्ट तो नहीं है, लेकिन ये तीन तरीके काम करते हैं:
शेक टेस्ट (हिलाकर देखें): एक शीशी में बराबर मात्रा में दूध और पानी मिलाएं और जोर से हिलाएं. यदि साबुन के झाग जैसा गाढ़ा झाग बने, तो इसमें डिटर्जेंट है.
आयोडीन टेस्ट: दूध में आयोडीन की 2-3 बूंदें डालें. यदि यह नीला हो जाए, तो इसमें स्टार्च या आटा है.
स्वाद और स्पर्श: असली दूध मीठा होता है; नकली कड़वा या साबुन जैसा लगता है. हथेली पर रगड़ने पर नकली दूध साबुन जैसा चिकना महसूस होता है. उबलने पर नकली दूध पीला पड़ जाता है.
9. क्या नकली दूध का उपयोग मावा और मिठाइयों में होता है? हाँ, यही इसका मुख्य उपयोग है. नकली मावा पहचानने के तरीके:
हथेली टेस्ट: मावे को हथेली पर रगड़ें. असली मावे से घी की महक आएगी और हाथ चिकना होगा. नकली मावे से केमिकल की गंध आएगी.
आयोडीन टेस्ट: पानी में मावा घोलकर आयोडीन डालें; नीला रंग मतलब स्टार्च की मिलावट.
10. नकली मावा कैसे बनता है? इसमें पाम ऑयल, कास्टिक सोडा और डिटर्जेंट के साथ गाढ़ेपन के लिए मैदा या आटा मिलाया जाता है. दानेदार बनावट के लिए भीगे हुए ब्लॉटिंग पेपर का इस्तेमाल होता है. इसे खराब होने से बचाने के लिए ‘फॉर्मेलिन’ मिलाया जाता है, जिसका उपयोग शवों को सड़ने से बचाने के लिए किया जाता है. यह कैंसर पैदा करने वाला तत्व है.
11. क्या पाम ऑयल की जगह ‘जानवरों की चर्बी’ का इस्तेमाल होता है? दुर्भाग्य से, हाँ. शाकाहारियों के लिए इन मिठाइयों का सेवन अनजाने में मांसाहार बन जाता है, जो उनकी धार्मिक मान्यताओं का उल्लंघन है.
12. इन जालसाजों के लिए कानूनी सजा क्या है? एफएसएसएआई एक्ट 2006 के तहत कड़ी कार्रवाई होती है: घटिया (पानी मिलाया हुआ) दूध: 5 लाख तक जुर्माना, गलत ब्रांडिंग: 3 लाख तक जुर्माना और नकली/जहरीला दूध: 1 लाख जुर्माने से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा.
कुलमिलाकर, अपने घर आने वाले दूध पर ये घरेलू टेस्ट जरूर करें. जैसा कि तारक मेहता के चंपकलाल कहते हैं, “सब सब की संभालो!” (हर कोई अपना ध्यान खुद रखे!)
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