02/05/2026: मणिपुर हिंसा के तीन साल | मौलवी की लिंचिंग | कान्हा में बाघों पर वायरस | तरबूज़ से नहीं तो किससे | किताबों में ‘सैन्य राष्ट्रवाद’ | केंद्र बनाम टीएमसी | तेल पर भारत-चीन टक्कर
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
मणिपुर हिंसा: तीन साल बाद, न्याय और शांति सिर्फ ‘शब्द’
यूपी में मुस्लिम धर्मगुरु को मारपीट के बाद ट्रेन से बाहर फेंका गया; पोस्टमार्टम में सभी पसलियों में फ्रैक्चर की पुष्टि
मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में बाघिन और उसके चार शावकों की मौत, कुत्तों से फैलने वाले वायरस पर संदेह
बंगाल की 96 सीटों पर नज़र: इनमें से 48 में मतदान गिरा और एसआईआर के तहत 28% नाम हटाए गए
मुंबई में परिवार की मृत्यु का मामला: तरबूज में मिलावट नहीं मिली, लेकिन मौत का कारण अब भी स्पष्ट नहीं
अंग्रेजी की पाठ्यपुस्तकों में अंधराष्ट्रवाद का प्रवेश; विशेषज्ञों ने एनसीईआरटी की सैन्यवादी सामग्री पर उठाए सवाल
बंगाल: केंद्र के कर्मचारी ही कराएंगे वोटों की गिनती, सुप्रीम कोर्ट ने भी नहीं मानी टीएमसी की मांग
चौराहे पर इंडिया गठबंधन: क्या जनता पार्टी जैसा प्रयोग संभव है?
हॉर्मुज़ के ठप होने से वैश्विक आपूर्ति संकट के बीच भारत-चीन की तेल पर टक्कर, बढ़ सकती हैं कीमतें!
हरकारा डीप डाइव | बंगाल में सत्ता की जंग या सक्सेशन बैटल? अमित शाह क्यों केंद्र में
मणिपुर हिंसा: तीन साल बाद, न्याय और शांति सिर्फ ‘शब्द’
मणिपुर हिंसा को अब तीन साल होने को आए हैं, लेकिन इस सीमावर्ती राज्य में शांति और सामान्य स्थिति आज भी एक कोरी कल्पना बनी हुई है. ‘शिलॉन्ग टाइम्स’ की संपादक पेट्रीसिया मुखिम ‘द वायर’ में प्रकाशित अपने लेख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व, भाजपा की राजनीति और मणिपुर के जटिल जनजातीय संघर्षों पर तीखा प्रहार करती हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कभी भी ऐसे व्यक्ति के रूप में सामने नहीं आए हैं जो देश के हर हिस्से को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर चुपचाप चिंतन कर सकें. विभिन्न राज्यों के उनके दौरे सावधानीपूर्वक तैयार (कोरियोग्राफ) किए गए कार्यक्रम होते हैं और आमतौर पर परियोजनाओं का उद्घाटन करने या चुनाव अभियानों के लिए होते हैं. उन्होंने इस साल 9 अप्रैल को हुए राज्य विधानसभा चुनाव से पहले कई मौकों पर असम की यात्रा की. उन्होंने पश्चिम बंगाल की भी व्यापक यात्रा की है, जहाँ 23 अप्रैल को पहले चरण के चुनाव हुए और 29 अप्रैल को दूसरे और अंतिम चरण के.
मोदी की नेतृत्व शैली ‘प्रदर्शनकारी’ है. उनके भाषण बयानबाजी से भरे और विभाजनकारी होते हैं; वह राज्य को एकजुट करने के बजाय विभाजित करने के लिए राजनीतिक संदेशों का उपयोग करते हैं. इसलिए, कोई मोदी से यह उम्मीद नहीं कर सकता कि उनके पास युद्धरत पक्षों को आमंत्रित करने और संघर्ष समाधान की रणनीतियों पर शांति से काम करने के लिए उनके साथ बैठने का समय या झुकाव होगा. मोदी के लिए संघर्ष प्रबंधन से ज्यादा राजनीतिक संदेश देना महत्वपूर्ण है.
मणिपुर के लोग 3 मई, 2023 से इस तूफान के केंद्र में हैं. संघर्ष की तीसरी वर्षगांठ आ चुकी है, लेकिन इंफाल घाटी और कुकी-ज़ो बहुल पहाड़ी जिलों चूड़ाचाँदपुर और कांगपोकपी के राहत शिविरों में अभी भी रह रहे 65,000 से अधिक लोगों का मानसिक आघात समाप्त नहीं हुआ है. प्रधानमंत्री संघर्ष प्रबंधन की बारीकियों को अपने डिप्टी अमित शाह—केंद्रीय गृह मंत्री—पर छोड़ना पसंद करते हैं, जो एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनका ट्रैक रिकॉर्ड आम सहमति बनाने वाले रणनीतिकार का नहीं रहा है. क्या हमें 2002 के गुजरात दंगों और वहां उनकी भूमिका याद है?
भाजपा एक ऐसी पार्टी के रूप में नजर आती है जो धौंस जमाती है, और धौंस जमाने वालों से बातचीत की भाषा समझने की उम्मीद नहीं की जा सकती.
मणिपुर का त्रिकोणीय संघर्ष और ऐतिहासिक घाव
मणिपुर में संघर्ष मुख्य रूप से तीन समुदायों—मैतेई, नागा और कुकी-ज़ो—के बीच है. वर्तमान में नागा समुदाय कुकी-ज़ो पर जमीन अतिक्रमण का आरोप लगा रहा है. लेख याद दिलाता है कि 1992-97 के दौरान भी इन दोनों समुदायों के बीच भीषण रक्तपात हुआ था, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे. वह संघर्ष सुलझा नहीं था, बल्कि केवल ‘युद्ध की थकान’ के कारण थम गया था. मणिपुर में हिंसा की जड़ें हमेशा जमीन और सीमाओं के दावों में रही हैं. मुखिम पुरानी कांग्रेस सरकारों को भी दोषमुक्त नहीं करतीं, जिनकी नीति ‘रुको और देखो’ की रही है.
राष्ट्रपति शासन और प्रशासनिक विफलता
मई 2023 में हिंसा भड़कने के बाद केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति शासन लगाने में लगभग दो साल की देरी की (फरवरी 2025). लेख के अनुसार, यह देरी दर्शाती है कि भाजपा के लिए पूर्वोत्तर के इस दूरस्थ राज्य की कोई खास अहमियत नहीं है. एन. बीरेन सिंह की सरकार को लंबे समय तक काम करने दिया गया, जबकि उन पर आरोप थे कि वे पक्षपाती हैं और एक विशेष घाटी-आधारित उग्रवादी गुट का समर्थन कर रहे हैं.
हिंसा का तात्कालिक कारण मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने का उच्च न्यायालय का विवादास्पद आदेश था. हालांकि बाद में अदालत ने अपनी गलती मानी, लेकिन तब तक राज्य में जातीय विभाजन की ऐसी लकीर खिंच चुकी थी जिसे मिटाना असंभव हो गया.
राहत शिविरों की भयावह वास्तविकता
दिसंबर 2023 में राहत शिविरों में पैदा हुए बच्चे अब दो साल के हो चुके हैं, लेकिन उन्होंने अपने घर की दहलीज तक नहीं देखी है. युवाओं और बच्चों के जीवन के तीन कीमती साल बर्बाद हो चुके हैं. राज्य में ऐसी भौगोलिक सीमाएं खिंच गई हैं कि मैतेई केवल घाटी में और कुकी-ज़ो केवल पहाड़ियों में सिमट कर रह गए हैं. गांवों की रक्षा के लिए युवा वर्दी पहनकर चौबीसों घंटे बंकरों में पहरा दे रहे हैं.
भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताएं
केंद्र सरकार ने हाल ही में राहत के लिए 947 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं, लेकिन मुखिम इसे लेकर आशंकित हैं. वे कहती हैं कि पूर्वोत्तर विकास कोष का कोई पारदर्शी हिसाब नहीं रखा जाता और यह पैसा अक्सर मंत्रियों, नौकरशाहों और उग्रवादी गुटों की जेबों में चला जाता है. आरटीआई के आंकड़े बताते हैं कि लगभग 58,881 लोग विस्थापित हैं, जो सरकार की घोर अक्षमता का प्रमाण है.
निष्कर्ष यह है कि मणिपुर में मानवाधिकारों का उल्लंघन कल्पना से परे है. हजारों घर जला दिए गए हैं, महिलाओं के साथ वीभत्स अत्याचार हुए हैं और सामाजिक ताना-बाना पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो चुका है. मुखिम कहती हैं कि भले ही कल को स्थिति ‘सामान्य’ दिखने लगे, लेकिन जो घाव और अविश्वास पैदा हो गया है, उसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती. अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति सहानुभूति का अभाव और बहुसंख्यकवाद की राजनीति ने मणिपुर को एक ऐसी ‘कड़वी वास्तविकता’ में बदल दिया है, जहाँ न्याय और शांति केवल शब्दों तक सीमित रह गए हैं.
यूपी में मुस्लिम धर्मगुरु को मारपीट के बाद ट्रेन से बाहर फेंका; पोस्टमार्टम में सभी पसलियों में फ्रैक्चर की पुष्टि
उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में 27 अप्रैल 2026 को एक ऐसी घटना सामने आई जिसने कानून-व्यवस्था और रेल यात्रा की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. बिहार के किशनगंज के रहने वाले 29 वर्षीय इमाम मोहम्मद तौसीफ रजा का शव बरेली में रेलवे पटरियों के पास पाया गया. परिवार का आरोप है कि उनकी मौत कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि ट्रेन के भीतर भीड़ द्वारा की गई ‘लिंचिंग’ का परिणाम है.
मौत से पहले की आखिरी पुकार
‘द वायर’ में आकांक्षा कुमार की लंबी रिपोर्ट कहती है कि तौसीफ रजा बरेली में आयोजित वार्षिक उर्स में शामिल होकर ऋषिकेश-मुजफ्फरपुर स्पेशल ट्रेन से अपने घर लौट रहे थे. 26 अप्रैल की रात लगभग 9:45 बजे उन्होंने अपनी पत्नी तबस्सुम को तीन बार कॉल किया. यह कॉल सामान्य हाल-चाल जानने के लिए नहीं, बल्कि मदद की आखिरी गुहार थी. 29 सेकंड की एक ऑडियो रिकॉर्डिंग और एक वीडियो कॉल के जरिए तौसीफ ने बताया कि ट्रेन में कुछ लोग उनके साथ मारपीट कर रहे हैं.
पूर्व विधायक मुजाहिद आलम के अनुसार, तौसीफ ने अपनी पत्नी को स्थानीय सुरजापुरी बोली में बताया था कि ट्रेन में कुछ लोग नशे की हालत में हैं और उन्हें शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं. तौसीफ ने अपनी पत्नी से जल्द से जल्द शाहजहाँपुर पुलिस को फोन करने को कहा था. वीडियो कॉल के दौरान तबस्सुम ने देखा कि कुछ लोग तौसीफ का कॉलर पकड़कर उन्हें थप्पड़ मार रहे थे और उनकी टोपी गिर चुकी थी. इसके तुरंत बाद मोबाइल स्क्रीन काली हो गई और संपर्क टूट गया.
परिवार का संघर्ष और पुलिस की सूचना
अगली सुबह तक तौसीफ का कोई पता नहीं चला. 27 अप्रैल की सुबह जब परिवार ने उनके नंबर पर फिर से कॉल किया, तो पुलिस ने फोन उठाया और बताया कि तौसीफ की हालत गंभीर है. कुछ ही देर बाद पुलिस ने उनकी मृत्यु की पुष्टि कर दी. तौसीफ के पिता मोहम्मद अबुल हुसैन और भाई तौहीद रजा के लिए यह खबर वज्रपात जैसी थी. तौहीद जब बरेली पहुंचे, तो उन्होंने शव की हालत देखकर ही हत्या का संदेह जताया. शरीर पर जगह-जगह गहरे जख्म थे और हाथ-पैर टूटे हुए थे.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट के चौंकाने वाले खुलासे
‘द वायर’ द्वारा प्राप्त पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने परिवार के संदेह को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया. डॉ. आशुतोष पाराशरी द्वारा हस्ताक्षरित रिपोर्ट के अनुसार, शरीर की सभी पसलियां टूटी हुई पाई गईं, जो किसी भीषण प्रहार या कुचलने का संकेत देती हैं. दोनों फेफड़े फटे हुए थे और मौत का कारण “रक्तस्रावी शॉक और कोमा” बताया गया. सिर के पिछले हिस्से पर 12 सेमी लंबा गहरा घाव, कंधे पर चोट और हाथ की हड्डी टूटी हुई थी.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मेडिकल ऑफिसर ने इन चोटों को “एंटीमॉर्टम” (मृत्यु से पहले की) बताया है, जो पुलिस के “ट्रेन से गिरने” वाले तर्क को कमजोर करता है.
पुलिस का पक्ष और विरोधाभास
शुरुआत में बरेली पुलिस ने सोशल मीडिया पर चल रही मारपीट की खबरों को “भ्रामक” बताया था. पुलिस का आधिकारिक तर्क था कि अत्यधिक गर्मी के कारण तौसीफ गेट के पास बैठे थे और ऊंघने (झपकी आने) की वजह से संतुलन खोकर गिर गए. हालांकि, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ‘सभी पसलियों के टूटने’ और ‘सिर के पीछे गहरे घाव’ की मौजूदगी ने इस तर्क पर सवाल खड़े कर दिए. बाद में, बरेली के एसपी मानुष पारीक ने स्वीकार किया कि परिवार अब हत्या का संदेह जता रहा है और शिकायत मिलने पर उचित कानूनी कार्रवाई की जाएगी.
मृतक की पत्नी तबस्सुम ने स्थानीय मीडिया को बताया कि हमलावर उन पर चोरी का आरोप लगा रहे थे. तौसीफ ने अपना बैग खोलकर उन्हें दिखाया भी था कि वह एक मदरसा शिक्षक हैं और उनके पास केवल किताबें हैं. परिवार का तर्क है कि अगर यह महज एक दुर्घटना होती, तो तौसीफ का मोबाइल फोन बिल्कुल सुरक्षित और बिना किसी खरोंच के कैसे मिलता? मोबाइल का सही-सलामत मिलना इस बात की ओर इशारा करता है कि उनके साथ मारपीट ट्रेन के अंदर हुई और बाद में उन्हें नीचे फेंक दिया गया.
इस घटना ने राजनीतिक गलियारों में भी हलचल पैदा कर दी है. भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने रेल मंत्री से उच्च स्तरीय जांच की मांग की है. ‘ऑल इंडिया मुस्लिम जमात’ ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर सीबीआई जांच की मांग की है. मुस्लिम संगठनों का कहना है कि ट्रेनों में विशेष समुदाय के लोगों को निशाना बनाने वाली यह कोई पहली घटना नहीं है, और यदि इसे दुर्घटना बताकर रफा-दफा किया गया, तो यह न्याय के साथ अन्याय होगा.
कुलमिलाकर, तौसीफ रजा की मौत की गुत्थी अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट और ऑडियो रिकॉर्डिंग के इर्द-गिर्द सिमट गई है. एक तरफ पुलिस का ‘हादसा’ वाला दावा है, तो दूसरी तरफ ‘सभी पसलियों का टूटना’ और ‘मदद की आखिरी पुकार’ जैसे ठोस तथ्य हैं. दो साल पहले शादी के बंधन में बंधे तौसीफ की ‘शुभ यात्रा’ का अंत एक भयावह त्रासदी में हुआ, जो भारतीय रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द पर एक काला धब्बा है. अब गेंद पुलिस के पाले में है कि वह इसे निष्पक्ष जांच के जरिए सुलझाती है या इसे महज एक “इत्तफाकिया मौत” करार देती है.
मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में बाघिन और उसके चार शावकों की मौत, कुत्तों से फैलने वाले वायरस पर संदेह
मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व (केटीआर) में पिछले दो हफ्तों के भीतर एक बाघिन और उसके चार शावकों की मौत हो गई है. बाघिन और एक शावक ने बुधवार (29 अप्रैल, 2026) को दम तोड़ा. इस साल (2026) अब तक राज्य में कुल 27 बाघों की मृत्यु हो चुकी है.
इन पांचों जानवरों की मौत फेफड़ों के संक्रमण के कारण हुई है. वन्यजीव अधिकारियों ने इस मामले की जांच शुरू कर दी है क्योंकि उन्हें कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (सीडीवी) के फैलने का संदेह है, जो आमतौर पर कुत्तों के माध्यम से फैलता है. अधिकारियों के मुताबिक, 10 वर्षीय बाघिन और उसका 18 महीने का शावक 26 अप्रैल से क्वारंटीन में थे और इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. इससे पहले 17 से 25 अप्रैल के बीच कान्हा के सरही रेंज में तीन शावक मृत पाए गए थे, जिसके बाद बाघिन और इस अंतिम शावक को बेहोश करके इलाज के लिए लाया गया था.
मुख्य वन्यजीव वार्डन समिता राजोरा ने ‘द हिंदू’ को बताया कि तीसरे मृत शावक में सीडीवी की पुष्टि हो चुकी है, जबकि बाघिन और बुधवार को मरे शावक के नमूने जांच के लिए भेजे गए हैं.
“शुरुआत में दो शावकों के शव काफी सड़ी-गली अवस्था में मिले थे. स्थानीय अधिकारियों को लगा कि बाघिन बीमार होने के कारण शिकार नहीं कर पा रही थी, इसलिए शावकों की मौत भूख से हुई होगी. लेकिन जब तीसरा शावक मिला, तो मुझे लगा कि मामला गंभीर हो सकता है,” राजोरा ने कहा. उन्होंने बताया कि तीसरे शावक का शव जबलपुर स्थित स्कूल ऑफ वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक एंड हेल्थ (एसडब्ल्यूएफएच) भेजा गया था.
एसडब्ल्यूएफएच की जांच में पाया गया कि शावक गंभीर श्वसन समस्याओं, हीट स्ट्रोक और निमोनिया जैसी स्थितियों से जूझ रहा था और उसमें सीडीवी की मौजूदगी की पुष्टि हुई. राजोरा ने आगे बताया, “हमने हाथियों पर गश्ती दल भेजकर बाघिन और आखिरी शावक का पता लगाया. उनके लिए भोजन भी छोड़ा गया लेकिन उन्होंने ठीक से नहीं खाया, इसलिए हमने उन्हें इलाज के लिए पकड़ा. चार डॉक्टरों की टीम लगातार काम कर रही थी, लेकिन उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम हो चुकी थी, जिसके कारण उन्हें बचाया नहीं जा सका.”
राजोरा ने कहा कि वायरस को अन्य बाघों और जानवरों में फैलने से रोकने के लिए क्षेत्र में 40 कैमरे लगाए गए हैं, हालांकि अभी वहां कोई अन्य बाघ नहीं दिखा है. जानवरों की जांच के लिए पशु चिकित्सा कर्मियों को तैनात किया गया है. क्षेत्र से जानवरों का मल हटाया जा रहा है, ताकि संक्रमण न फैले. किसी अन्य संक्रमण की संभावना को खारिज करने के लिए जलाशयों के पानी के नमूने लिए गए हैं. इस घटना की रिपोर्ट केंद्रीय अधिकारियों और एनटीसीए को भेजी जा रही है. राजोरा ने यह भी स्पष्ट किया कि इस वर्ष मरे 27 बाघों में से 13 की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई, 1 की मौत डूबने से हुई, कुछ की मौत आपसी लड़ाई में हुई और 7 बाघों की मौत करंट लगने से हुई.
इस बीच वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने इन मौतों के लिए लापरवाही और गश्त की कमी को जिम्मेदार ठहराया है. उन्होंने दावा किया कि कान्हा और अन्य रिजर्व के कोर क्षेत्रों में आवारा कुत्ते घूम रहे हैं. वनों के भीतर भ्रष्टाचार बढ़ रहा है. टाइगर रिजर्व के अंदर तेंदू पत्ता जैसे वनोपज इकट्ठा करना प्रतिबंधित है, लेकिन कुछ अधिकारी ग्रामीणों को अंदर जाने देते हैं. ये लोग अपने साथ कुत्ते रखते हैं ताकि बाघ आने पर उन्हें सतर्क कर सकें.” उन्होंने संदेह जताया कि बाघिन ने किसी कुत्ते का शिकार किया होगा और उसे अपने शावकों को खिलाया होगा.
दुबे ने 2020 के एनटीसीए दिशा-निर्देशों का भी हवाला दिया, जिसमें रिजर्व के अंदर आवारा कुत्तों का टीकाकरण अनिवार्य है. उन्होंने सवाल उठाया, “यदि अंदर के कुत्तों का टीकाकरण हुआ था, तो यह वायरस कैसे आया? यह दर्शाता है कि संक्रमण बाहर से आया है.” हालांकि, राजोरा ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि एनटीसीए के दिशा-निर्देशों के अनुसार कोर, बफर और परिधीय क्षेत्रों में कुत्तों का नियमित टीकाकरण किया जा रहा है.
मुंबई में परिवार की मृत्यु का मामला: तरबूज में मिलावट नहीं मिली, लेकिन मौत का कारण अब भी स्पष्ट नहीं
मुंबई के एक परिवार के चार सदस्यों की कथित तौर पर तरबूज खाने के बाद हुई मौत के कुछ दिनों बाद, महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) द्वारा उनके घर से लिए गए नमूनों—तरबूज, बिरयानी, पानी और मसालों—की प्रारंभिक जांच में मिलावट के कोई संकेत नहीं मिले हैं.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में पूर्णिमा शाह की रिपोर्ट है कि पुलिस अब कलिना फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) की रिपोर्ट का इंतजार कर रही है. यह रिपोर्ट तय करेगी कि मौतें बैक्टीरिया के पनपने से होने वाली ‘फूड पॉइजनिंग’ (खाद्य विषाक्तता) के कारण हुई थीं या किसी जहरीले पदार्थ के सेवन की वजह से.
नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि जहाँ एफडीए खाद्य पदार्थों में मिलावट की जांच करता है, वहीं बैक्टीरिया के संक्रमण या जहर की उपस्थिति का निर्धारण करना फोरेंसिक विश्लेषण के दायरे में आता है. अधिकारी ने स्पष्ट किया, “केवल एफएसएल रिपोर्ट ही यह स्थापित करेगी कि मौतें बैक्टीरिया के बढ़ने से हुई फूड पॉइजनिंग के कारण हुईं या जहर के कारण.”
44 वर्षीय अब्दुल्ला डोकड़िया, उनकी पत्नी नसरीन (35), और उनकी बेटियों आयशा (16) एवं ज़ैनब (12) की मौत 26 अप्रैल को एक-दूसरे के कुछ ही घंटों के भीतर हो गई थी. पायधुनी के इस परिवार को कथित तौर पर उल्टियाँ हुईं और वे तेजी से बेहोश हो गए थे. सर जे.जे. अस्पताल के रिकॉर्ड और डॉक्टरों के अनुसार, परिवार ने 26 अप्रैल की रात करीब 1-1.30 बजे घर पर तरबूज खाया था.
एफडीए ने मृतक परिवार के घर से 11 नमूने एकत्र किए थे, जिनमें फ्रिज में रखा बचा हुआ तरबूज और बिरयानी, बर्तनों में रखा पुलाव, फ्रीजर से कच्चा चिकन, रसोई की सामग्री जैसे मसाले और चावल, आंशिक रूप से खाए गए खजूर, और गिलास व मिट्टी के बर्तन में रखा पानी शामिल था.
अंग्रेजी की पाठ्यपुस्तकों में अंधराष्ट्रवाद का प्रवेश; विशेषज्ञों ने एनसीईआरटी की सैन्यवादी सामग्री पर उठाए सवाल
“भारत की हृदयस्थली में, एक भव्य दृश्य है देखने योग्य, राष्ट्रीय समर स्मारक, सुनाता है वीरता की अनकही कहानियाँ...”
ये पंक्तियाँ एक अज्ञात लेखक द्वारा लिखी गई ‘नेशनल वॉर मेमोरियल’ (राष्ट्रीय समर स्मारक) नामक कविता की हैं, जिसे राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा कक्षा 6 के छात्रों के लिए प्रकाशित अंग्रेजी पाठ्यपुस्तक ‘पूर्वी’ में स्थान दिया गया है.
‘द टेलीग्राफ’ में बसंत कुमार मोहंती के अनुसार, पिछले दो वर्षों में एनसीईआरटी द्वारा जारी की गई अंग्रेजी की पाठ्यपुस्तकों में ऐसी कई कविताएँ, नाटक और कहानियाँ शामिल हैं, जो परिषद की पाठ्यपुस्तक टीम के सदस्यों द्वारा ही लिखी गई हैं. ये रचनाएँ ‘सैन्यवादी देशभक्ति’ का महिमामंडन करती हैं. इस रुझान ने विशेषज्ञों को यह सवाल उठाने पर मजबूर कर दिया है कि अंग्रेजी सिखाने के लिए प्रामाणिक साहित्य के बजाय इस तरह की बनावटी सामग्रियों का उपयोग क्यों किया जा रहा है?
कक्षा 6, 7 और 8 के लिए ‘पूर्वी’ और कक्षा 9 के लिए हाल ही में जारी ‘कावेरी’ में कई ऐसे अंश हैं जिनका श्रेय किसी लेखक को नहीं दिया गया है. कक्षा 6 की पाठ्यपुस्तक में योग और “एक भारत श्रेष्ठ भारत” के विषयों पर सामग्री है. इसी तरह, कक्षा 7 की पाठ्यपुस्तक में ऐसी सामग्री शामिल की गई है जो सैनिकों को श्रद्धांजलि जैसी प्रतीत होती है, जबकि कक्षा 8 की पुस्तक में सैन्यवादी राष्ट्रवाद पर आधारित एक कहानी शामिल है.
पिछले दो वर्षों में एनसीईआरटी द्वारा लाई गई अंग्रेजी की पाठ्यपुस्तकों में कई ऐसी कविताएँ, नाटक और कहानियाँ शामिल हैं, जो परिषद की पाठ्यपुस्तक टीम के सदस्यों द्वारा ही लिखी गई हैं और सैन्यवादी देशभक्ति का महिमामंडन करती हैं. इसने विशेषज्ञों को अंग्रेजी सिखाने के लिए प्रामाणिक सामग्री के बजाय बनावटी पाठ के उपयोग पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित किया है.
कक्षा 6, 7 और 8 के लिए ‘पूर्वी’ और कक्षा 9 के लिए हाल ही में जारी ‘कावेरी’ में कई ऐसी रचनाएँ हैं जिनका श्रेय किसी लेखक को नहीं दिया गया है. कक्षा 6 की पाठ्यपुस्तक में योग और “एक भारत श्रेष्ठ भारत” के विषय पर सामग्री है. इसी तरह, कक्षा 7 की पाठ्यपुस्तक में ऐसी सामग्री शामिल की गई है जो सैनिकों को श्रद्धांजलि जैसी लगती है, जबकि कक्षा 8 की किताब में सैन्यवादी राष्ट्रवाद पर एक कहानी है.
दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षा संकाय की पूर्व डीन और प्राथमिक कक्षाओं के लिए एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक विकास समितियों की पूर्व अध्यक्ष प्रो. अनीता रामपाल ने कहा कि परिषद ने 2005 में समिति के सदस्यों द्वारा कहानियाँ और कविताएँ लिखवाने की प्रथा को खत्म करने का निर्णय लिया था, क्योंकि वे बाल साहित्य के साहित्यिक विशेषज्ञ नहीं थे. इसके अलावा, यह नोट किया गया था कि ऐसी सामग्री छात्रों को विशिष्ट विषयों के बारे में समझने, विश्लेषण करने और ज्ञान प्राप्त करने में मदद करने में प्रभावी नहीं थी.
बच्चों को अच्छे साहित्य से परिचित कराने और उन्हें बेहतर सीखने व साहित्यिक विधाओं की समझ विकसित करने में मदद करने के लिए, प्रसिद्ध लेखकों द्वारा लिखे और प्रकाशित ‘प्रामाणिक पाठ’ को सचेत रूप से पहचाना और चुना जा रहा था.
रामपाल ने कहा कि 2005-06 से पाठ्यपुस्तक टीम ने प्रामाणिक पाठों के आधार पर पाठ या अध्याय तैयार करना शुरू किया था. उन्होंने कहा कि उन पाठों के इर्द-गिर्द उपयुक्त अभ्यास, कार्य और प्रश्न तैयार करके, उन्होंने शिक्षकों और छात्रों को कहानियों पर चर्चा और विश्लेषण करने के लिए प्रोत्साहित किया, साथ ही साहित्य के प्रति प्रशंसा भाव भी विकसित किया.
रामपाल ने कहा, “विज्ञान और सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में ज्यादातर पाठ्यपुस्तक समिति के सदस्य ही पाठ तैयार करते हैं. लेकिन भाषा में, टीम एक निश्चित आयु वर्ग के बच्चों के लिए उपयुक्त पाठ या अध्याय तैयार करने के लिए प्रामाणिक रचनाओं का उपयोग करती है. वर्तमान पुस्तकों में, पाठ्यपुस्तक टीमों द्वारा लिखी गई कहानियाँ या कविताएँ उपदेशात्मक और प्रवचन देने वाली प्रकृति की हैं. उनमें साहित्यिक मूल्य की कमी है, जबकि वे सैन्य वीरता, शहादत और सरकारी योजनाओं की प्रशंसा जैसे विषयों पर केंद्रित हैं.”
स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (एनसीएफएसई) 2023, जो नई पाठ्यपुस्तकों के लिए मार्गदर्शक दस्तावेज है, भाषा विषयों में पाठ्यपुस्तक टीम द्वारा तैयार किए गए पाठों से बचने के विषय पर मौन है. हालाँकि नई पाठ्यपुस्तकों में ब्रिटिश, अमेरिकी और भारतीय लेखकों की कुछ सामग्री का उपयोग किया गया है, लेकिन कुछ कहानियाँ और कविताएँ खुले तौर पर सरकारी योजनाओं या उसके एजेंडे को बढ़ावा देती हैं.
रामपाल ने कहा कि मेजर सोमनाथ शर्मा (कक्षा 8 की पुस्तक), सैनिकों को श्रद्धांजलि (कक्षा 7) और राष्ट्रीय समर स्मारक (कक्षा 6) पर कविता में ऐसी भाषा और जानकारी है जो बच्चों के लिए अनुपयुक्त है.
रामपाल ने कहा, “सरकारी कार्यक्रमों और परियोजनाओं पर आधारित सामग्री ऐसी भाषा का उपयोग करती है जिसे 10-14 वर्ष के बच्चे समझ नहीं पाएंगे या उससे जुड़ नहीं पाएंगे. पाठ में कुछ साहित्यिक मूल्य होना चाहिए जो आलोचनात्मक सोच को प्रोत्साहित कर सके. बनावटी वयस्क विषय और भाषा छात्रों को भाषा कौशल या आलोचनात्मक समझ विकसित करने में मदद नहीं करते हैं.” इस मामले में एनसीईआरटी के निदेशक प्रो. दिनेश प्रसाद सकलानी के जवाब की प्रतीक्षा की जा रही है.
हरकारा डीप डाइव |
श्रवण गर्ग: बंगाल में सत्ता की जंग या सक्सेशन बैटल? अमित शाह क्यों केंद्र में
बंगाल में चुनाव आयोग, ईडी, पैरामिलिट्री फोर्सेस और न्यायपालिका की भूमिका जिस तरह से दिखाई दे रही है, क्या वैसी ही सक्रियता अन्य राज्यों में भी देखी गई है? इस संदर्भ में चुनावी प्रक्रिया और संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर कई सवाल सामने आते हैं.
इसके साथ ही हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर एक अहम चर्चा हुई, जिसमें फोकस सीधे तौर पर अमित शाह की भूमिका और दांव पर रहा. बातचीत की शुरुआत इस से होती है कि जब देश के कई राज्यों में चुनाव हुए हैं, तो पूरा राष्ट्रीय ध्यान सिर्फ बंगाल पर ही क्यों केंद्रित है और केरल, तमिलनाडु या असम जैसे राज्यों को उसी तरह क्यों नहीं देखा जा रहा.
बंगाल में चुनाव आयोग, ईडी, पैरामिलिट्री फोर्सेस और न्यायपालिका की भूमिका जिस तरह से दिखाई दे रही है, क्या वैसी ही सक्रियता अन्य राज्यों में भी देखी गई है? इस संदर्भ में चुनावी प्रक्रिया और संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर कई सवाल सामने आते हैं.
एग्जिट पोल्स को लेकर भी बातचीत में संदेह जताया गया. खास तौर पर प्रदीप गुप्ता द्वारा एग्जिट पोल जारी न करने को लेकर यह चर्चा हुई कि क्या यह केवल तकनीकी कारण है या फिर चुनावी माहौल में किसी तरह के दबाव या असहजता का संकेत. वहीं अन्य एजेंसियों के एग्जिट पोल्स में बीजेपी और टीएमसी के बीच बेहद करीबी मुकाबला दिखाया जाना भी परसेप्शन और वास्तविकता के बीच के फर्क पर सवाल खड़े करता है.
बातचीत में यह भी सामने आया कि यह चुनाव केवल राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला नहीं, बल्कि व्यक्तिगत रूप से अमित शाह की राजनीतिक परीक्षा बन गया है. चर्चा में यह धारणा उभरती है कि इस बार नरेंद्र मोदी की भूमिका अपेक्षाकृत सीमित रही, जबकि अमित शाह ने स्वयं बंगाल में सक्रिय रहकर चुनाव की पूरी कमान संभाली. 2021 के चुनावी नतीजों के बाद इस बार उनकी आक्रामक रणनीति को एक बड़ी राजनीतिक वापसी के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है.
इसी के साथ बातचीत में बीजेपी के भीतर संभावित नेतृत्व परिवर्तन की बहस भी जुड़ती नजर आई. अगर भविष्य में नरेंद्र मोदी सक्रिय राजनीति से पीछे हटते हैं, तो अगला नेतृत्व किसके हाथ में होगा? इस सवाल में योगी आदित्यनाथ का नाम भी उभरकर सामने आता है. ऐसे में बंगाल चुनाव को एक बड़े “सक्सेशन टेस्ट” के रूप में देखा जा रहा है.
4 मई को अगर नतीजों में अंतर बेहद कम रहता है, तो क्या राज्य में राजनीतिक और सामाजिक स्थिरता बनी रह पाएगी? भारी संख्या में तैनात सुरक्षा बलों और चुनाव के बाद भी उनकी मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठाए गए.
इसके अलावा चुनाव में बढ़ते ध्रुवीकरण, ‘बाहरी बनाम स्थानीय’ की राजनीति और ममता बनर्जी की आक्रामक चुनावी शैली को भी महत्वपूर्ण फैक्टर बताया गया. ममता बनर्जी को इस चुनाव में एक ऐसे नेता के रूप में देखा जा रहा है जो सीधे सत्ता और तंत्र के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक बनकर उभरी हैं.
बंगाल की 96 सीटों पर नज़र: इनमें से 48 में मतदान गिरा और एसआईआर के तहत 28% नाम हटाए गए
पश्चिम बंगाल चुनाव दो प्रमुख कारणों से चर्चा में रहे: पहला, ‘तार्किक विसंगतियों’ का एक नया मानदंड जिसके तहत मतदाता सूची से 27.16 लाख नाम हटा दिए गए, और दूसरा, 92.95% का रिकॉर्ड मतदान, जिसमें 2021 की तुलना में 31 लाख अधिक वोट पड़े.
इन दोनों डेटा सेटों के विश्लेषण से 96 ऐसी सीटें सामने आई हैं, जो एक खास पैटर्न दिखाती हैं. इनमें से 48 सीटों पर इस बार मतदाताओं की संख्या 2021 की तुलना में कम रही. कुल हटाए गए 27.16 लाख नामों में से 28% अकेले इन्हीं 48 सीटों से थे. इससे संकेत मिलता है कि ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) का मतदान करने वाले मतदाताओं की संख्या पर प्रभाव पड़ा होगा.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में रिपोर्ट है कि बीजेपी ने 2021 में इन 48 सीटों में से 15 पर जीत दर्ज की थी. शेष 246 सीटें, जहाँ मतदाताओं की संख्या 2021 से अधिक है, उनमें से 48 सीटों पर कम से कम 20,000 अधिक वोट पड़े. ये 48 सीटें कुल अतिरिक्त पड़े वोटों का 42% हिस्सा थीं, लेकिन यहाँ मतदाता सूची से केवल 2.66 लाख नाम हटाए गए (औसत 5,548 प्रति सीट).
बीजेपी ने 2021 में इन 48 सीटों में से 14 जीती थीं. नामों को हटाए जाने के मोर्चे पर भी 27.16 लाख के आंकड़ों में भारी भिन्नता देखी गई है; यह शमशेरगंज में 74,775 नामों की कटौती से लेकर मानवजार में मात्र 71 नामों तक है. दोनों निर्वाचन क्षेत्रों में 90 प्रतिशत से अधिक मतदान के बावजूद, नामों को हटाने में इस अंतर का मतलब यह था कि जहाँ शमशेरगंज (96.04%) में मतदान में 33,536 वोटों की शुद्ध गिरावट (2021 की तुलना में 17.8% की कमी) देखी गई, वहीं मानवजार (91.73%) में मतदान में 20,605 वोटों की शुद्ध वृद्धि (9.6 प्रतिशत की बढ़त) देखी गई.
बंगाल: केंद्र के कर्मचारी ही कराएंगे वोटों की गिनती, सुप्रीम कोर्ट ने भी नहीं मानी टीएमसी की मांग
‘एसआईआर’ में लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाने, सैकड़ों अधिकारियों-कर्मचारियों के तबादले करने, लाखों की संख्या में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती और पश्चिम बंगाल में 4 मई को विधानसभा चुनाव की मतगणना के दौरान केंद्र सरकार के पर्यवेक्षक/कर्मचारी तो मतगणना मेज पर तैनात रहेंगे, लेकिन राज्य सरकार के नहीं. केंद्र सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों को मतगणना पर्यवेक्षकों और सहायकों के रूप में तैनात करने के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. शनिवार (2 मई 2026) को पार्टी की याचिका का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिका में अब किसी और आदेश की आवश्यकता नहीं है, सिवाय इसके कि 13 अप्रैल के चुनाव आयोग के सर्कुलर को पूरी तरह (अक्षरशः) लागू किया जाए.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में आशीष शाजी के अनुसार, यह फैसला तब आया जब टीएमसी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि उनकी सीमित शिकायत यह थी कि सर्कुलर के अनुसार, राज्य सरकार का भी एक प्रतिनिधि होना चाहिए.
इसके जवाब में, चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने कहा कि हमेशा से इसी नियम का पालन किया जाता रहा है.
दरअसल, 30 अप्रैल को, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने टीएमसी की उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें चुनाव आयोग के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके अनुसार प्रत्येक मतगणना मेज पर कम से कम एक मतगणना पर्यवेक्षक/सहायक केंद्र सरकार या केंद्रीय पीएसयू का कर्मचारी होना अनिवार्य है.
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था: “यह भारत निर्वाचन आयोग के कार्यालय का विशेषाधिकार है कि वह राज्य सरकार या केंद्र सरकार में से किसी से भी मतगणना पर्यवेक्षक और मतगणना सहायक नियुक्त करे. अदालत को राज्य सरकार के कर्मचारी के बजाय केंद्र सरकार/केंद्रीय पीएसयू कर्मचारी को नियुक्त करने में कोई अवैधता नहीं दिखती है.”
चौराहे पर इंडिया गठबंधन: क्या जनता पार्टी जैसा प्रयोग संभव है?
‘साउथ फर्स्ट’ केलिए पत्रकार पीवी कोंडल राव की रिपोर्ट.
भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में एक यक्ष प्रश्न लगातार गूँज रहा है: आखिर इंडिया गठबंधन, भाजपा और एनडीए के अभेद्य चुनावी रथ को रोकने के लिए 1977 की जनता पार्टी की तर्ज पर एक ठोस और एकीकृत इकाई क्यों नहीं बन पाया? हालांकि विपक्षी एकता की कोशिशें जारी हैं, लेकिन एक पूर्ण ‘विलय’ या जनता पार्टी जैसा ऐतिहासिक प्रयोग अब भी एक दूर का सपना नजर आता है. इसके पीछे वैचारिक मतभेद, नेतृत्व का संकट और क्षेत्रीय राजनीति की विवशताएं प्रमुख कारण हैं.
1977 का जनता पार्टी प्रयोग किसी सामान्य गठबंधन का परिणाम नहीं था. वह आपातकाल के विरुद्ध उपजा एक नैतिक और राजनीतिक विद्रोह था. इंदिरा गांधी द्वारा थोपे गए आपातकाल ने अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों को अपनी व्यक्तिगत पहचान मिटाकर एक होने पर मजबूर कर दिया था. उस समय जयप्रकाश नारायण जैसे कद के नेता थे, जिनका सम्मान सभी गुटों में था. लोकतांत्रिक मूल्यों की बहाली के लिए वैचारिक और व्यक्तिगत मतभेदों को हाशिए पर धकेल दिया गया था.
आज के इंडिया गठबंधन के सामने सबसे बड़ी बाधा एक सर्वमान्य नेतृत्व की कमी है. जनता पार्टी के पास ‘मोरारजी देसाई’ या ‘जगजीवन राम’ जैसे दिग्गज थे, लेकिन आज कांग्रेस का वह वर्चस्व नहीं रहा कि वह अकेले पूरे गठबंधन की धुरी बन सके. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन और दिल्ली-पंजाब में अरविंद केजरीवाल जैसे नेता अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन रखते हैं. इन नेताओं के लिए अपने क्षेत्रीय अस्तित्व को किसी केंद्रीय नेतृत्व के अधीन करना चुनावी रूप से घाटे का सौदा लगता है. यह गठबंधन एक एकीकृत शक्ति बनने के बजाय ‘महत्वाकांक्षाओं का समूह’ बनकर रह गया है.
जनता पार्टी का मूल आधार ‘कांग्रेस विरोध’ था, जिसने दक्षिणपंथ और वामपंथ को एक मंच पर ला दिया था. इसके विपरीत, इंडिया गठबंधन के भीतर वैचारिक विरोधाभास गहरे हैं. केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में गठबंधन के साथी ही एक-दूसरे के मुख्य चुनावी प्रतिद्वंद्वी हैं. भाजपा के ‘मजबूत राष्ट्रवाद’ और ‘विकास’ के नैरेटिव के सामने विपक्षी गठबंधन अब तक कोई ऐसा साझा एजेंडा पेश नहीं कर पाया है जो मतदाताओं को भावनात्मक रूप से जोड़ सके. केवल ‘भाजपा विरोध’ मतदाताओं को एकजुट करने के लिए पर्याप्त नहीं दिख रहा है.
भाजपा के पास आरएसएस जैसा एक अनुशासित कैडर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसा एक शक्तिशाली चेहरा है, जो चुनाव को ‘प्रेसिडेंशियल’ (राष्ट्रपति शैली) बना देता है. इसके मुकाबले, इंडिया गठबंधन का ढांचा बिखरा हुआ है. सीट-बंटवारे की जटिलताएं और संगठनात्मक तालमेल की कमी इसे एक ‘प्रतिक्रियावादी’ समूह तक सीमित कर देती है.
जनता पार्टी का प्रयोग अंततः अंतर्कलह के कारण विफल रहा था, लेकिन उसने यह सिद्ध किया था कि बड़े लक्ष्यों के लिए छोटे हितों का त्याग जरूरी है. इंडिया गठबंधन आज उसी चौराहे पर खड़ा है. यदि यह केवल एक ‘लेन-देन’ वाला गठबंधन बना रहता है, तो यह एनडीए के वर्चस्व को चुनौती देने में विफल हो सकता है.
राजनीति में अवसर बार-बार दस्तक नहीं देते. जनता पार्टी जैसा एकीकरण जोखिम भरा हो सकता है, लेकिन वर्तमान राजनीतिक माहौल में अनिर्णय उससे भी बड़ा जोखिम है.गठबंधन को सीटों के गणित से ऊपर उठकर एक साझा ‘राजनीतिक कल्पना’ और ‘साझा संगठन’ की दिशा में बढ़ने की सख्त जरूरत है.
हॉर्मुज़ के ठप होने से वैश्विक आपूर्ति संकट के बीच भारत-चीन की तेल पर टक्कर, बढ़ सकती हैं कीमतें!
‘द टेलीग्राफ ऑनलाइन’ की रिपोर्ट है कि मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के ठप पड़ने से वैश्विक तेल आपूर्ति पर गहरा असर पड़ा है. अमेरिका, ईरान और इज़राइल से जुड़े संघर्ष ने समुद्री रास्तों को बाधित कर दिया है, जिसके कारण लाखों बैरल कच्चा तेल फंस गया है. इस संकट ने दुनिया की दो सबसे बड़ी ऊर्जा खपत करने वाली अर्थव्यवस्थाओं भारत और चीन को सीधे टकराव की स्थिति में ला खड़ा किया है. यह टकराव सीमाओं पर नहीं, बल्कि रूसी कच्चे तेल के लिए बाजार में हो रही प्रतिस्पर्धा में दिख रहा है.
रूस, जो पहले कम किमतों पर तेल बेच रहा था, अब इस संकट के घड़ी में सबसे अहम आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है. भारत और चीन दोनों अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूसी तेल पर निर्भर होते जा रहे हैं. अप्रैल के आंकड़ों को देखें तो दोनों देशों ने लगभग 1.5 से 1.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन रूसी तेल आयात किया, हालांकि यह मार्च के मुकाबले कम है जब भारत ने करीब 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक आयात किया था.
आपूर्ति में यह गिरावट कई कारणों से हुई है, जिनमें लॉजिस्टिक बाधाएं, रूसी बंदरगाहों पर अवरोध और वैश्विक स्तर पर बढ़ती मांग शामिल हैं. हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल में भारी कमी आई है. चीन का आयात जहां पहले 4.45 मिलियन बैरल प्रतिदिन था, वह घटकर करीब 2.22 लाख बैरल रह गया है. भारत का आयात भी फरवरी के 2.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन से गिरकर लगभग 2.47 लाख बैरल पर आ गया है.भारत की कुल खरीद मार्च के उच्च स्तर से लगभग 21 प्रतिशत गिर गई है, जिससे रिफाइनरियों को अपने स्रोतों में बदलाव करना पड़ा है.
इस स्थिति ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर दबाव बढ़ा दिया है. भारत के पास महज 30 दिन का तेल भंडार है, और अगर कीमतें ऊंची रहीं तो इसका असर जल्द ही पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दिख सकता है. विश्लेषकों का मानना है कि कीमतें 25-28 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ सकती हैं. इससे आम उपभोक्ता और अर्थव्यवस्था दोनों प्रभावित हो सकते हैं. वहीँ चीन के पास फिलहाल कुछ राहत है क्योंकि उसने 3-4 महीने का भंडार जमा कर रखा है.
प्रतिस्पर्धा अब केवल भारत और चीन तक सीमित नहीं है. फिलीपींस, वियतनाम, इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देश भी रूसी तेल के लिए बाजार में उतर रहे हैं. इससे आपूर्ति और भी सीमित हो गई है और कीमतों पर दबाव बढ़ा है.
इस संकट के बीच भारत अपने स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है. वेनेजुएला, ब्राज़ील और अफ्रीकी देशों से तेल खरीदकर कमी को पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है. वहीं, सऊदी अरब और यूएई वैकल्पिक मार्गों के जरिए आपूर्ति बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं.
हॉर्मुज़ संकट ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की नाजुकता को उजागर कर दिया है. आने वाले समय में भारत और चीन के बीच यह तेल प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है, जिसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.
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