01/05/2026: सिलेंडर पर 1000 बढ़े | सस्ते तेल का लोगों को लाभ नहीं | अब पेट्रोल-डीज़ल का नंबर | ईवीएम पर ममता | मुसलमान टारगेट | हिमंता पर बांग्लादेश | छिपे शुक्राणु
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
हेट स्पीच: अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के खिलाफ कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता, सुप्रीम कोर्ट का फैसला
‘इंडियन स्टेट से लड़ने’ वाला बयान, राहुल गांधी पर एफआईआर की मांग खारिज
स्टारशिप में स्पेसएक्स का 15 अरब डॉलर से अधिक का निवेश; एयरलाइन जैसे रॉकेट बनाने की दिशा में कदम
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने हिमंता की टिप्पणियों पर भारत के दूत को किया तलब, नाराजगी जताई
तेल कंपनियों ने 9 माह में ₹1.37 लाख करोड़ का मुनाफा कमाया, लेकिन लोगों को धेला लाभ नहीं मिला
भोजन की थाली अब और महंगी, कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में करीब ₹1,000 की भारी बढ़ोतरी
नागरिकता की रेखाओं को फिर से खींच रहा है बंगाल का ‘एसआईआर’
ममता का छेड़छाड़ का आरोप: मतदान और गिनती के बीच, स्ट्रॉन्ग रूम में कैसे रखी जाती हैं ईवीएम
हरकारा डीप डाइव | प्रोफेसर अपूर्वानंद: बंगाल चुनाव में वोटर लिस्ट विवाद और मुसलमानों की भागीदारी पर उठते सवाल
जबलपुर बोट हादसा: आखिरी पल तक कलेजे से चिपका रहा मासूम, मां की बांहों में मिला शव; 9 की मौत
भोजन की थाली अब और महंगी, कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमत में करीब ₹1,000 की भारी बढ़ोतरी
भोजन की थाली अब और महंगी हो जाएगी. तेल कंपनियों ने शुक्रवार को कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर के दामों में करीब 1,000 रुपये की भारी वृद्धि की. यह लगातार तीसरा महीना है, जब कीमतों में बढ़ोतरी हुई है. होटलों और रेस्तरां में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाला 19 किलोग्राम का कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर ₹993 की रिकॉर्ड वृद्धि के साथ महंगा हो गया है. अलग-अलग शहरों में इसके दामों में हजार रुपये तक इजाफ़ा हुआ है. मसलन, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अब इसकी कीमत ₹3,071.50 हो गई है, जो पहले ₹2,078.50 थी.
‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में प्रियांशु प्रिया की रिपोर्ट के अनुसार, यह अब तक की सबसे बड़ी एकल वृद्धि है. इसके पहले 1 अप्रैल को प्रति सिलेंडर ₹195.50 और 1 मार्च को ₹114.50 की बढ़ोतरी की गई थी. इसके साथ ही, पिछले तीन महीनों में कुल कीमतों में ₹1,303 की वृद्धि हो चुकी है. हालांकि घरेलू एलपीजी सिलेंडर के दामों में 7 मार्च 2026 के बाद कोई कोई बदलाव नहीं किया गया है. घरेलू एलपीजी सिलेंडरों की कीमत आखिरी बार 7 मार्च को प्रति सिलेंडर 60 रुपये बढ़ाई गई थी.
तेल कंपनियों ने 9 माह में ₹1.37 लाख करोड़ का मुनाफा कमाया, लेकिन लोगों को धेला लाभ नहीं मिला
ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गुरुवार को ब्रेंट क्रूड $126 प्रति बैरल तक पहुंच गया, जो 4 साल का उच्चतम स्तर है. हालांकि, बाद में कीमतें गिरकर $116 पर आ गईं. लिहाजा एजेंसियों के हवाले से यह खबर दी जा रही है कि ईरान युद्ध के कारण महंगे कच्चे तेल से देश की तेल कंपनियों को रोजाना ₹2,400 करोड़ का नुकसान हो रहा है. पेट्रोल पर ₹14 प्रति लीटर और डीजल पर ₹18 प्रति लीटर का घाटा उठाना पड़ रहा है. जिससे तेल कंपनियां पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बढ़ाने का दबाव बना रही हैं. जबकि वास्तविकता यह है कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में कच्चे तेल की औसत कीमत महज $71 प्रति बैरल थी, जो कोविड वर्ष 2020-21 के बाद सबसे कम है.
‘भास्कर इंग्लिश’ की रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध 28 फरवरी, 2026 को शुरू हुआ और 27 फरवरी तक कीमत $76 प्रति बैरल थी. ऐसे में कच्चे तेल की कीमतें केवल पिछले 2 महीनों में बढ़ी हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 के पहले 9 महीनों में देश की चार प्रमुख तेल कंपनियों ने कुल ₹1.37 लाख करोड़ का मुनाफा कमाया, यानी हर दिन ₹116 करोड़. मगर, ताज्जुब है कि इसका लाभ आम उपभोक्ताओं को नहीं मिला. पेट्रोल, डीज़ल के दाम कम नहीं हुए. इसके पहले भी जब कच्चे तेल के दाम घटे, तो लोगों को बढ़ी हुई कीमतों पर ही ईंधन लेना पड़ा.
ईरान-अमेरिका युद्धविराम के बाद कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई है. भारतीय बास्केट में कच्चे तेल की कीमत, जो $150 तक पहुंच गई थी, अब गिरकर लगभग $100 प्रति बैरल पर आ गई है. सरकार ने 27 मार्च को पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में ₹10-₹10 की कटौती की थी. अनुमान है कि इससे हर महीने लगभग ₹12,000 करोड़ के राजस्व का नुकसान होगा.
सरकार ने डीजल निर्यात पर ‘विंडफॉल टैक्स’ (अतिरिक्त लाभ कर) लगाने का सहारा लिया है. 11 अप्रैल को सरकार ने डीजल निर्यात पर इस टैक्स को ₹21.50 प्रति लीटर से सीधे बढ़ाकर ₹55.5 प्रति लीटर कर दिया.
भारत से हर महीने औसतन 191 करोड़ लीटर डीजल निर्यात किया जाता है. विंडफॉल टैक्स बढ़ाने के बाद, सरकार केवल डीजल निर्यात से लगभग ₹10,500 करोड़ का मासिक राजस्व कमा रही है, जो काफी हद तक उत्पाद शुल्क से होने वाले नुकसान की भरपाई कर देता है.
कंपनियां घाटे को कम करने के लिए ‘राशनिंग’ (कोटा निर्धारण) का सहारा ले रही हैं. पंप ऑपरेटरों को निर्देश दिए गए हैं कि वे पिछले साल की बिक्री के बराबर ही स्टॉक बेचें. किसी भी ग्राहक को एक बार में 200 लीटर से ज्यादा डीजल न देने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि उद्योगों को होने वाली थोक आपूर्ति रोकी जा सके.
राहुल गांधी ने कहा, यह ‘चुनावी बिल’; अगली स्ट्राइक पेट्रोल-डीज़ल पर
कांग्रेस ने कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में हुई वृद्धि को लेकर मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है. राहुल गांधी ने इसे “चुनावी बिल” करार देते हुए कहा कि अगली “स्ट्राइक” पेट्रोल और डीजल पर होगी. लोकसभा में विपक्ष के नेता ने कहा कि उन्होंने पहले ही चेतावनी दी थी कि चुनाव के बाद महंगाई की मार पड़ेगी.
‘द हिंदू’ में ‘पीटीआई’ के मुताबिक राहुल गांधी ने ‘एक्स’ पर हिंदी में पोस्ट करते हुए कहा: “कह दिया था- चुनाव के बाद महंगाई की गर्मी आएगी. आज कमर्शियल गैस सिलेंडर ₹993 महंगा हो गया. यह एक दिन में अब तक की सबसे बड़ी बढ़ोतरी है. यह ‘चुनावी बिल’ है. फरवरी से अब तक: ₹1,380 की बढ़ोतरी, यानी महज तीन महीनों में 81% का उछाल. चाय की दुकानें, ढाबे, होटल, बेकरी, मिठाई की दुकानें - हर रसोई पर बोझ बढ़ गया है. इसका सीधा असर आपकी थाली पर भी पड़ेगा.”
कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने भी ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, “जैसे ही चुनावी चक्र समाप्त हुआ, मोदी सरकार ने एलपीजी सिलेंडरों की कीमतें बढ़ाने में ज़रा भी वक्त नहीं गंवाया.” उन्होंने कहा: कमर्शियल सिलेंडरों पर करीब ₹1,000 की भारी बढ़ोतरी उन करोड़ों भारतीयों को प्रभावित करेगी जो पेट भरने के लिए छोटे भोजनालयों पर निर्भर हैं. इसी तरह, करोड़ों छोटे खाद्य व्यवसायों को इस बढ़ोतरी का बोझ उठाना पड़ेगा. वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि भाजपा के लिए आम भारतीयों की पीड़ा का महत्व केवल चुनावी हथकंडों तक सीमित है, जिसके बाद उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है.
उन्होंने यह कहा कि ईरान युद्ध शुरू होने के बाद के तीन महीनों में सरकार को वित्तीय बोझ जनता पर डालने के बजाय, आम भारतीयों को कीमतों के झटके से बचाने के लिए एक ठोस योजना तैयार करनी चाहिए थी.
जब तेल सस्ता था, तब मुनाफा जेब में भरा
इससे पहले मंगलवार (28 अप्रैल, 2026) को राहुल गांधी ने आगाह किया था कि 29 अप्रैल को विधानसभा चुनाव खत्म होने के बाद पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए जाएंगे. उन्होंने सरकार पर वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कम कीमतों से मुनाफाखोरी करने का आरोप लगाया था और कहा था कि अब जब कीमतें बढ़ रही हैं, तो सरकार जनता पर बोझ डाल रही है.
उन्होंने कहा था: “चुनावी राहत खत्म, महंगाई की आँच आने वाली है! 29 अप्रैल के बाद सावधान रहें - पेट्रोल, डीजल, सब महंगा होगा. जब तेल सस्ता था, तब मोदी सरकार ने मुनाफा जेब में भरा. अब जब यह महंगा है, तो वह इसका बोझ आप पर डाल देगी. एक ऐसी सरकार जो सस्ता होने पर लूटती है - जनता को महंगाई की मार झेलने के लिए छोड़ देती है.”
ममता का छेड़छाड़ का आरोप: मतदान और गिनती के बीच, स्ट्रॉन्ग रूम में कैसे रखी जाती हैं ईवीएम
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मतदान खत्म होने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ईवीएम की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाए. उन्होंने दावा किया कि मतगणना से पहले स्ट्रॉन्ग रूम में रखी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के साथ छेड़छाड़ की कोशिश की जा रही है.
बुधवार को मतदान समाप्त होने के बाद गुरुवार रात ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग और भाजपा पर निशाना साधा. उन्होंने आरोप लगाया कि 4 मई को होने वाली मतगणना तक ईवीएम सुरक्षित नहीं हैं. इस आशंका के बीच वह कोलकाता के एक स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर देर रात तक मौजूद रहीं. साथ ही, उन्होंने अपनी पार्टी के सभी उम्मीदवारों को निर्देश दिया कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में स्ट्रॉन्ग रूम और मतगणना केंद्रों की निगरानी करें.
हालांकि, पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल ने इन आरोपों को खारिज किया. चुनाव आयोग के अनुसार, टीएमसी द्वारा साझा किया गया वीडियो गलत तरीके से पेश किया गया. आयोग ने स्पष्ट किया कि वह वीडियो पोस्टल बैलेट के पृथक्करण की नियमित प्रक्रिया का था, जिसे सभी उम्मीदवारों को सूचित करके किया गया था. टीएमसी ने आरोप लगाया था कि अधिकारियों और भाजपा प्रतिनिधियों द्वारा डाक मतपत्रों के साथ छेड़छाड़ की जा रही है, लेकिन आयोग ने इसे निराधार बताया.
प्रक्रिया क्या कहती है
चुनाव आयोग की ‘इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन मैनुअल, 2023’ के अनुसार, ईवीएम के रखरखाव और सुरक्षा के लिए सख्त नियम तय हैं. चुनाव से पहले ईवीएम जिला निर्वाचन अधिकारी (डीईओ) के नियंत्रण में सुरक्षित गोदामों में रखी जाती हैं. चुनाव प्रक्रिया शुरू होने पर राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में ईवीएम का रैंडमाइजेशन किया जाता है और उन्हें संबंधित विधानसभा क्षेत्रों के स्ट्रॉन्ग रूम में भेजा जाता है.
मतदान के दिन वोटिंग खत्म होने के बाद ईवीएम को सील किया जाता है और सुरक्षा के बीच स्ट्रॉन्ग रूम में वापस लाया जाता है. आमतौर पर उम्मीदवारों और उनके एजेंटों को इस प्रक्रिया में शामिल रहने की अनुमति होती है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे. सभी उपयोग की गई ईवीएम को एक अलग स्ट्रॉन्ग रूम में रखा जाता है, जबकि अप्रयुक्त मशीनों को ‘रिजर्व ईवीएम’ के रूप में दूसरे कमरे में रखा जाता है.
स्ट्रॉन्ग रूम के लिए भी सख्त सुरक्षा प्रावधान हैं. इसमें केवल एक प्रवेश द्वार होता है, जबकि अन्य सभी रास्तों को बंद कर दिया जाता है. दरवाजे पर डबल लॉक सिस्टम होता है, जिसकी चाबियां अलग-अलग अधिकारियों के पास रहती हैं. यहां 24 घंटे सशस्त्र सुरक्षा बल तैनात रहते हैं और पूरे परिसर की निगरानी सीसीटीवी कैमरों से की जाती है, जिनमें निर्बाध बिजली आपूर्ति की व्यवस्था होती है.
इसके अलावा, स्ट्रॉन्ग रूम खोलने और बंद करने की पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की जाती है और हर गतिविधि का रिकॉर्ड लॉग बुक में दर्ज होता है. उम्मीदवारों को पहले से सूचना देकर उन्हें अपने प्रतिनिधि तैनात करने का मौका दिया जाता है. रिटर्निंग ऑफिसर नियमित रूप से निरीक्षण कर रिपोर्ट जिला निर्वाचन अधिकारी को भेजते हैं.
मतगणना के दिन भी ईवीएम को स्ट्रॉन्ग रूम से काउंटिंग सेंटर तक कड़ी सुरक्षा और निगरानी में ले जाया जाता है. पूरी प्रक्रिया में उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाता है ताकि किसी भी तरह की शंका न रहे.
इसी तरह, पोस्टल बैलेट के लिए भी अलग प्रोटोकॉल तय हैं. इन्हें अलग लिफाफों में सुरक्षित रखकर विशेष स्ट्रॉन्ग रूम में संग्रहित किया जाता है और उनकी प्रक्रिया भी पारदर्शिता के साथ पूरी की जाती है.
कुल मिलाकर, चुनाव आयोग का कहना है कि ईवीएम और पोस्टल बैलेट की सुरक्षा के लिए बहुस्तरीय और पारदर्शी व्यवस्था लागू है. इसके बावजूद, चुनावी माहौल में आरोप-प्रत्यारोप जारी रहते हैं, जिससे राजनीतिक तनाव बढ़ता है.
हरकारा डीप डाइव | प्रोफेसर अपूर्वानंद
बंगाल चुनाव में वोटर लिस्ट विवाद और मुसलमानों की भागीदारी पर उठते सवाल
पश्चिम बंगाल चुनाव के माहौल और एग्जिट पोल बताते हैं कि ममता बनर्जी और टीएमसी के सामने इस बार कड़ी चुनौती है, जबकि भारतीय जनता पार्टी के लिए अवसर बन सकता है. हालांकि, बंगाल में एग्जिट पोल के बार-बार गलत साबित होने का इतिहास भी है. इसके साथ ही हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में प्रोफेसर अपूर्वानंद के साथ पश्चिम बंगाल चुनाव, मतदाता सूची, और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर गहन चर्चा हुई.
चर्चा का केंद्र चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर रहा. कहा गया कि इस बार चुनाव सिर्फ राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला नहीं था, बल्कि इसमें केंद्रीय सुरक्षा बलों, चुनाव आयोग और प्रशासनिक मशीनरी की भूमिका भी सवालों के घेरे में रही. खासतौर पर चुनाव के दौरान ध्रुवीकरण की राजनीति कई स्तरों पर दिखाई पड़ी.
चर्चा में सबसे गंभीर मुद्दा मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने का रहा. आंकड़ों के हवाले से कहा गया कि लाखों मतदाताओं के नाम हटाए गए, और इसमें अनुपातिक रूप से मुस्लिम समुदाय ज्यादा प्रभावित हुआ. जिन सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं, वहां बड़ी संख्या में नाम काटे जाने का दावा इस चुनाव के गणित को सीधे प्रभावित करता हुआ बताया गया.
प्रोफेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि यह कोई अलग-थलग घटना नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है. उनके अनुसार, भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में “मुस्लिम विरोध” एक केंद्रीय तत्व बन चुका है, और अलग-अलग राज्यों में चुनाव इसी आधार पर लड़े जा रहे हैं. बंगाल में यह और स्पष्ट रूप से सामने आया, जहां मतदाता सूची में बदलाव और ध्रुवीकरण साथ-साथ चलते दिखे.
चुनाव आयोग की प्रक्रिया, “लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी” जैसे आधारों पर नाम हटाना, और न्यायपालिका की प्रतिक्रिया इन सबको मिलाकर यह कहा गया कि चुनाव की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर गंभीर असर पड़ा है. योगेंद्र यादव की एक टिप्पणी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह “डिज़ाइन बाय बीजेपी, एक्जीक्यूटेड बाय ईसीआई और सर्टिफाइड बाय सुप्रीम कोर्ट” जैसा परिदृश्य बनता दिख रहा है.
इतिहास के संदर्भ में भी बंगाल की अहमियत पर अपनी बात रखते हुए उन्होने कहा कि विभाजन, सांप्रदायिक राजनीति और लंबे समय तक चली धर्मनिरपेक्ष राजनीति ने यहां एक अलग सामाजिक संतुलन बनाया था, जहां मुसलमान अपेक्षाकृत निश्चिंत होकर राजनीतिक जीवन में भागीदारी कर पाते थे. यही कारण है कि बंगाल का चुनाव राष्ट्रीय स्तर पर भी निर्णायक माना जा रहा है.
बातचीत का सबसे गंभीर पहलू यह है कि क्या एक समुदाय को धीरे-धीरे राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक बनाया जा रहा है. तर्क दिया गया कि अगर किसी समुदाय को वोट देने और प्रतिनिधित्व की प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाए, तो वह सिर्फ सामाजिक रूप से मौजूद रहेगा, लेकिन राजनीतिक रूप से प्रभावहीन हो जाएगा.
नागरिकता की रेखाओं को फिर से खींच रहा है बंगाल का ‘एसआईआर’
‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में नीलांजन सरकार और भानु जोशी की यह रिपोर्ट पश्चिम बंगाल में हुए विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के सामाजिक और राजनीतिक प्रभावों का विश्लेषण करती है. रिपोर्ट के अनुसार, मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया अब केवल एक प्रशासनिक अभ्यास नहीं रह गई है, बल्कि यह “कौन भारत का नागरिक होने के योग्य है” इसकी रेखाएं फिर से खींच रही है. मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया (जैसे ‘तार्किक विसंगति’) इतनी धुंधली है कि लोगों को समझ नहीं आ रहा कि उनके नाम क्यों कटे?
नीलांजन और भानु लिखते हैं कि टाकी निर्वाचन क्षेत्र में इछामती नदी के किनारे बसे एक गाँव में, एक बुजुर्ग मुस्लिम व्यक्ति हमें बताते हैं कि ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) के दौरान उनके परिवार से एक बेटे और एक बेटी (लेकिन अन्य बच्चों के नहीं) के नाम मतदाता सूची से काट दिए गए. बूथ स्तर के अधिकारी (बीएलओ) ने उन्हें बताया कि उनके जन्म प्रमाण पत्र खारिज कर दिए गए हैं और उन्हें ऑनलाइन पुन: आवेदन करने में मदद की. इस प्रक्रिया ने नौकरशाही पर उनके भरोसे को चकनाचूर कर दिया है. उनकी पत्नी इतनी डरी हुई हैं कि वह बाहर आकर हमसे मिलने को तैयार नहीं हैं, और अपने पति को चेतावनी देती हैं कि वह “शिक्षित” लोगों से बात करना बंद कर दें. हताश होकर वे हमसे कहते हैं, “इस मोड़ पर, हम बस यही उम्मीद कर सकते हैं कि वे मेरे बच्चों के नाम अंतिम सूची में डाल दें.”
वहाँ से महज कुछ किलोमीटर दूर, गुजरात के भरूच में काम करने वाला एक मध्यम आयु वर्ग का हिंदू व्यक्ति अपना वोट डालने के लिए वापस लौटा है. जब हम उनसे एसआईआर के बारे में पूछते हैं, तो वे अपनी आवाज़ ऊंची करते हुए घोषणा करते हैं, “एसआईआर किया जाना ज़रूरी था; हिंदू गाँवों में किसी का नाम नहीं कटा. मैंने सुना है कि एक मुस्लिम व्यक्ति के मतदाता सूची में 600 बच्चे थे!” एक अन्य व्यक्ति हंसते हुए बीच में टोकता है, “मैंने सौ सुना था, लेकिन यह तो उससे भी ज़्यादा है!”
मुख्यधारा के मीडिया में ध्यान एसआईआर के “आंकड़ों” के दस्तावेजीकरण पर रहा है. सूची से कितने नाम हटाए गए, और कहाँ से? क्या केवल मुसलमानों के नाम हटाए गए या हिंदुओं के भी? लेकिन ज़मीनी स्तर पर, एसआईआर केवल संख्याओं के बारे में नहीं है, बल्कि यह सत्ता के समीकरणों को फिर से व्यवस्थित करने और इस बारे में एक नैरेटिव (विमर्श) गढ़ने के बारे में भी है कि देश के मामलों में भाग लेने का अधिकार किसे है.
जैसे-जैसे लोग बेमेल दस्तावेज़ों के दलदल और भारत की कागज़ी नौकरशाही से जूझ रहे हैं, उनका सामना ‘समावेशन’ की तदर्थ प्रकृति और उन ‘विसंगतियों’ के धुंधलके से होता है जो इतनी गंभीर हैं कि नागरिकों को उनके वोट देने के अधिकार से वंचित कर सकती हैं. यदि एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) को स्पष्ट रूप से परिभाषित और सार्वजनिक रूप से जांची गई प्रक्रियाओं के माध्यम से किया गया होता, तो किसी भी निष्कासन को नियम-बद्ध तरीके से समझा और चुनौती दी जा सकती थी. लेकिन निष्कासन के इर्द-गिर्द की इस अस्पष्टता ने ध्रुवीकरण को जन्म दिया है और नागरिकता की धारणाओं को मौलिक रूप से बदल दिया है. वास्तव में कोई नहीं जानता कि उनके पड़ोसियों के नाम मतदाता सूची से क्यों काटे गए, वे केवल अटकलें लगा सकते हैं. क्या वे बांग्लादेश से हैं? क्या वे फर्जी मतदाताओं को पनाह दे रहे हैं? क्या उनके पास अवैध दस्तावेज़ हैं? या यह अनुचित रूप से निशाना बनाया जाना है?
टाकी से लगभग 30 मिनट की दूरी पर स्थित बादुरिया में एक दशक पहले एक भीषण हिंदू-मुस्लिम दंगा हुआ था — जिसमें एक फेसबुक पोस्ट और उसके बाद फैली अफवाहों ने सांप्रदायिक हिंसा की आग को भड़काया था. हालांकि तब से स्थितियां शांत हुई हैं, लेकिन दंगा हर किसी को याद है. एसआईआर की अस्पष्टता को आसपास के लोगों के लिए, इसे पहले से मौजूद हिंदू-मुस्लिम फाल्ट लाइन (वैमनस्य) पर आरोपित करके समझने योग्य बनाया जा रहा है. लेकिन इसे सिर्फ विमर्श गढ़ने (नैरेटिव बिल्डिंग) के रूप में देखना बहुत सरल होगा. एसआईआर मौलिक रूप से इस बात को बदल देता है कि नागरिक राज्य से कैसे जुड़े हैं. हालांकि भारतीय नागरिकता और मतदाता सूची में शामिल होने के बीच कोई तकनीकी संबंध नहीं है, लेकिन अधिकांश नागरिक अपने वोट को सबसे मौलिक अधिकारों में से एक के रूप में देखते हैं — जो प्रत्येक नागरिक के लिए समानता की गारंटी है. इसके अलावा, ‘विसंगतियों’ वाले मतदाताओं को हटाकर ‘न्यायाधिकरणों’ में न्यायनिर्णयन करने की इस प्रक्रिया और पड़ोसी राज्य असम में किए गए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) अभ्यास के बीच समानताएं देखना कठिन नहीं है.
नागरिकता और मतदान के बीच के इस जुड़ाव ने नागरिकों को बेमेल और विरोधाभासी दस्तावेजी प्रक्रियाओं की एक श्रृंखला से राहत पाने के लिए मजबूर कर दिया है. पिछली जनगणना के अनुसार, पश्चिम बंगाल में अनुसूचित जाति (एससी) की आबादी में नमोशूद्रों की हिस्सेदारी 16% से अधिक है; सीमावर्ती जिलों नादिया और उत्तर 24 परगना में उनकी संख्या विशेष रूप से अधिक है—क्योंकि इनमें से अधिकांश पारंपरिक रूप से सीमा पार से पैदल चलकर यहाँ आए हैं. नमोशूद्रों का एक बड़ा हिस्सा मतुआ महासंघ का अनुयायी है, जो एक जाति-विरोधी संप्रदाय है. कभी बीणापाणि देवी, जिन्हें ‘बोड़ो मां’ (बड़ी मां) कहा जाता था, इस संप्रदाय की प्रमुख थीं. लेकिन बंगाल की कई अन्य चीजों की तरह, राजनीति ने इस परिवार को भी बांट दिया है. बोड़ो मां की बहू, ममता बाला ठाकुर ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का साथ दिया, जबकि उनके पोते शांतनु ठाकुर (स्थानीय सांसद) और सुब्रत ठाकुर (मौजूदा विधायक और इस चुनाव में उम्मीदवार) ने भारतीय जनता पार्टी का पक्ष लिया.
मतुआ महासंघ के मुख्यालय, ठाकुरनगर में मंदिर के ठीक बगल में एक कार्यालय है जहाँ लोग “हिंदुत्व धार्मिक प्रमाणपत्र” के लिए आवेदन कर सकते हैं, और इसके साथ ही एक अन्य कार्यालय है जिस पर ‘सीएए सहायता केंद्र’ लिखा है. सीएए केंद्र के लोगों ने बताया कि सीएए के माध्यम से नागरिकता के लिए आवेदन करने हेतु हिंदुत्व धार्मिक प्रमाणपत्र और व्यक्तिगत दस्तावेजों की आवश्यकता होती है. वास्तव में, ऐसे किसी धार्मिक प्रमाणन का कोई कानूनी आधार नहीं है, और न ही सीएए के लिए यह कोई वास्तविक आवश्यकता है. (पूछताछ करने पर केंद्र के लोग अपनी बात से तुरंत मुकर भी गए.)
मतुआ समुदाय के लिए यह एक बड़ा झटका था जब उनमें से कई ने खुद को मतदाता सूची से बाहर पाया. फिर भी, सीएए इस समुदाय की एक प्रमुख राजनीतिक मांग थी, और यह वह आधार है जिसके जरिए वे मतदाता सूची में वैध प्रवेश का दावा कर सकते हैं. उपरोक्त प्रक्रियाएं दर्शाती हैं कि कैसे दस्तावेजी प्रक्रियाओं की अस्पष्टता का लाभ उठाकर राजनीतिक पहचान विकसित की जा सकती है. जहाँ टीएमसी ने 2021 के राज्य चुनावों में जीत हासिल की थी, वहीं भाजपा ने बनगाँव क्षेत्र की 7 में से 5 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी, जिसमें स्थानीय गायघाटा विधानसभा क्षेत्र भी शामिल है. 2026 के चुनावी अभियान के अंतिम दिनों में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समुदाय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराने के लिए ठाकुरनगर में एक रैली की.
मतदाता सूची और नागरिकता की इन जटिल दस्तावेजी प्रक्रियाओं का कुल परिणाम हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक विभेदित नागरिकता का मार्ग प्रशस्त करना रहा है. इस प्रक्रिया को पार करने के लिए मिलने वाले राजनीतिक संरक्षण के माध्यम से, हाल ही में भारत आए कुछ हिंदू राज्य की नज़र में वैधता प्राप्त कर लेते हैं, जबकि मुसलमान, भले ही वे यहाँ पीढ़ियों से रह रहे हों, अपनी “वैधता को प्रमाणित” करने के लिए मजबूर हैं.
उत्तर बंगाल के माल निर्वाचन क्षेत्र में तीस्ता नदी के पास स्थित चाय बागानों में एक बातचीत के दौरान, हमारी मुलाकात एक मुस्लिम दुकानदार से हुई जिसने इस मुद्दे को स्पष्ट रूप से समझाया, “अब राज्य हमसे लगातार दस्तावेज़ मांगता रह सकता है. आज, शायद मैं ठीक हूँ, लेकिन मेरे बच्चों को यहाँ रहने के लिए बार-बार अपनी पहचान साबित करनी होगी.”
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने हिमंता की टिप्पणियों पर भारत के दूत को किया तलब, नाराजगी जताई
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने भारत के कार्यवाहक उच्चायुक्त पवन बढ़े को तलब किया है और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा द्वारा की गई कुछ टिप्पणियों पर औपचारिक विरोध दर्ज कराया है.
यूएनबी समाचार सेवा ने एक अधिकारी के हवाले से बताया कि महानिदेशक (दक्षिण एशिया) इशरत जहां ने गुरुवार (30 अप्रैल, 2026) को भारतीय राजनयिक को बांग्लादेश के रुख से अवगत कराया.
‘द हिंदू’ में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले हफ्ते एक सोशल मीडिया पोस्ट में, सरमा ने कहा था कि असम में 20 विदेशी नागरिकों को पकड़ा गया और उन्हें वापस बांग्लादेश भेज दिया गया.
सरमा ने कहा था, “अशिष्ट लोग नरम भाषा नहीं समझते. जब हम असम से उन घुसपैठियों को निकालते हैं जो खुद नहीं जाते, तो हम खुद को इस भविष्यसूचक पंक्ति की याद दिलाते रहते हैं. उदाहरण के लिए, ये 20 अवैध बांग्लादेशी जिन्हें कल रात वापस धकेल दिया गया.”
इशरत ने भारतीय राजनयिक से कहा कि इस तरह की टिप्पणियाँ दोनों देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों की भावना को कमजोर करती हैं. अधिकारी ने इन टिप्पणियों को बांग्लादेश-भारत संबंधों के लिए “अपमानजनक” बताया और ढाका की नाराजगी व्यक्त की. इशरत ने संवेदनशील द्विपक्षीय मुद्दों पर बात करते समय संयम बरतने के महत्व पर जोर दिया.
2024 में शेख हसीना सरकार के गिरने के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के सत्ता में आने के बाद भारत और बांग्लादेश के संबंधों में बड़ी गिरावट देखी गई थी. फरवरी के संसदीय चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की जीत के बाद तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही भारत और बांग्लादेश अब द्विपक्षीय संबंधों को फिर से बनाने के प्रयास कर रहे हैं.
हेट स्पीच: अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के खिलाफ कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता, सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 2020 में दिल्ली के शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) विरोधी प्रदर्शनों के दौरान कथित नफरत भरे भाषणों (हेट स्पीच) के लिए भाजपा नेताओं अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के खिलाफ कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है.
जहाँ भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं, वहीं वर्मा दिल्ली सरकार में मंत्री हैं. नफरत भरे भाषणों से संबंधित याचिकाओं के एक समूह पर 29 अप्रैल को दिए गए अपने फैसले में, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने माकपा नेताओं बृंदा करात और के.एम. तिवारी द्वारा दायर उस याचिका पर भी सुनवाई की, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के जून 2022 के फैसले को चुनौती दी गई थी.
‘पीटीआई’ के अनुसार, अपने फैसले में, शीर्ष अदालत ने नोट किया कि हाईकोर्ट ने स्वतंत्र मूल्यांकन के आधार पर यह माना था कि इन भाषणों से किसी संज्ञेय अपराध के होने का पता नहीं चलता. अदालत ने यह भी कहा कि ये बयान किसी विशिष्ट समुदाय के खिलाफ निर्देशित नहीं थे और न ही इनसे हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था फैली.
ठाकुर ने “गद्दारों को गोली मारने” का नारा लगाया था
उल्लेखनीय है कि तत्कालीन वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर को चुनाव आयोग द्वारा तब फटकार लगाई गई थी, जब उन्होंने एक चुनावी रैली में भीड़ को “गद्दारों को गोली मारने” के नारे लगाने के लिए उकसाया था. वह शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बोल रहे थे.
प्रवेश वर्मा ने कसम खाई थी कि भाजपा की जीत के कुछ ही घंटों के भीतर प्रदर्शनकारियों को “वापस भेज दिया जाएगा.” उन्होंने आगे कहा था कि अगर इन्हें बेरोकटोक छोड़ दिया गया, तो वे “बलात्कार और हत्या” करेंगे.
‘इंडियन स्टेट से लड़ने’ वाला बयान, हाईकोर्ट ने राहुल गांधी पर एफआईआर की मांग खारिज की
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार (1 मई, 2026) को कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ 2025 में दिए गए एक कथित विवादास्पद बयान के लिए एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया.
न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान ने सिमरन गुप्ता द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद यह आदेश पारित किया. याचिकाकर्ता ने संभल की एक अदालत के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश देने की उनकी मांग को ठुकरा दिया गया था.
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि गांधी ने 2025 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के कार्यालय के उद्घाटन के दौरान कहा था कि “अब हम भाजपा, आरएसएस और स्वयं भारतीय राज्य (इंडियन स्टेट) से लड़ रहे हैं.”
स्टारशिप में स्पेसएक्स का 15 अरब डॉलर से अधिक का निवेश; एयरलाइन जैसे रॉकेट बनाने की दिशा में कदम
‘रॉयटर्स’ के अनुसार, स्पेसएक्स ने अपनी अगली पीढ़ी के स्टारशिप रॉकेट को विकसित करने में 15 अरब डॉलर से अधिक खर्च किए हैं. यह राशि उसके भरोसेमंद ‘फाल्कन’ रॉकेट की लागत को भी बौना बना देती है. एलोन मस्क की यह कंपनी पिछले लगभग एक दशक से पूरी तरह से ‘रीयूजेबल’ (पुन: इस्तेमाल योग्य) लॉन्च सिस्टम को सटीक बनाने की कोशिश कर रही है.
$1.75 ट्रिलियन (लाख करोड़) के मूल्यांकन के साथ सार्वजनिक बाजारों की ओर दौड़ रही स्पेसएक्स के सबसे आकर्षक व्यवसायों का भविष्य काफी हद तक स्टारशिप पर टिका है. यह विशाल दो-चरणीय रॉकेट प्रणाली मस्क की उन महत्वाकांक्षाओं का केंद्र है, जिसमें बड़ी संख्या में स्टारलिंक उपग्रहों को लॉन्च करना, मनुष्यों को चंद्रमा और मंगल पर ले जाना और अंततः पृथ्वी पर भारी बिजली खपत करने वाले डेटा केंद्रों के विकल्प के रूप में हजारों ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) कंप्यूटिंग उपग्रह’ तैनात करना शामिल है.
$15 बिलियन का यह आंकड़ा, जिसे पहले रिपोर्ट नहीं किया गया था, फाल्कन 9 के विकास पर खर्च किए गए लगभग $400 मिलियन से कहीं अधिक है. फाल्कन 9 ने स्पेसएक्स के वाणिज्यिक प्रभुत्व को आधार दिया है, जिससे तेजी से स्टारलिंक की तैनाती संभव हुई है.
स्पेसएक्स ने अपने गोपनीय आईपीओ पंजीकरण में कहा, “हमने बड़े पैमाने पर पूर्ण और तीव्र ‘रीयूजेबिलिटी’ पर ध्यान केंद्रित करके अपनी बढ़त को और बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण निवेश जारी रखा है, जिसमें हमारी अगली पीढ़ी के रॉकेट, स्टारशिप में $15 बिलियन से अधिक का निवेश शामिल है.” कंपनी का लक्ष्य 2026 की दूसरी छमाही में अपने नवीनतम स्टारलिंक उपग्रहों (V3) को लॉन्च करना है, जो संभवतः स्टारशिप के जरिए ही होगा.
2023 के बाद से, स्पेसएक्स ने 11 स्टारशिप परीक्षण उड़ानें संचालित की हैं, जिनमें शानदार विफलताएं और ध्यान खींचने वाली प्रगति दोनों देखी गईं. इनमें सबसे बड़ी उपलब्धि रॉकेट के विशाल ‘सुपर हेवी बूस्टर’ को विशाल यांत्रिक भुजाओं का उपयोग करके पृथ्वी पर वापस लौटते समय हवा में पकड़ना था.
इतनी प्रगति के बावजूद, स्पेसएक्स ने स्वीकार किया कि मस्क के “प्रति वर्ष हजारों लॉन्च” के लक्ष्य तक पहुँचने से पहले कई अभूतपूर्व बाधाएँ बाकी हैं. इतनी उच्च लॉन्च दर सालाना 100 गीगावाट सौर ऊर्जा संचालित एआई उपग्रहों को तैनात करने के लिए आवश्यक होगी.
जानकारों के अनुसार, इस काम में कई चुनौतियाँ भी हैं. मसलन, एक सिंगल स्टारशिप लॉन्च के लिए 244 टैंकर ट्रक प्राकृतिक गैस के बराबर ईंधन की आवश्यकता होती है. शोर और कंपन को कम करने के लिए लगभग 10 लाख गैलन पानी का उपयोग किया जाता है. यह एक जोखिम भरी और अप्रमाणित प्रक्रिया है जहाँ स्टारशिप को ईंधन ट्रांसफर करने के लिए अंतरिक्ष में ही टैंकर जहाजों से जुड़ना होगा. गहरे अंतरिक्ष मिशनों के लिए यह अनिवार्य है. तरल ऑक्सीजन को बेहद कम तापमान पर रखना और उसे अंतरिक्ष में लीक होने से बचाना भी एक बड़ी तकनीकी चुनौती है.
सितारों का शहर: स्टारबेस
पिछले एक दशक में, स्पेसएक्स ने दक्षिण टेक्सास में एक व्यापक विकास स्थल ‘स्टारबेस’ बनाया है. यह सुविधा पारंपरिक अंतरिक्ष वाहनों के बजाय वाणिज्यिक विमानों की तरह रॉकेट बनाने के लिए समर्पित है.
स्पेसएक्स अब अक्टूबर के बाद से अपने पहले स्टारशिप परीक्षण लॉन्च की तैयारी कर रहा है. यह मिशन स्टारशिप V3 प्रोटोटाइप की शुरुआत करेगा. स्टारशिप इंजीनियरिंग के निदेशक चार्ली कॉक्स ने कहा, “वर्जन 3 मूल रूप से जहाज का एक बिल्कुल नया (क्लीन-शीट) डिज़ाइन है.”
दर्जनों प्रमुख अपग्रेड के साथ V3 स्टारशिप को कक्षीय उड़ान, अंतरिक्ष में लंबी अवधि के परीक्षणों और चालक दल वाले चंद्र लैंडिंग के लिए तैयार किया गया है. नासा ने अपने ‘आर्टेमिस मून प्रोग्राम’ के तहत इस मिशन के लिए स्पेसएक्स को कम से कम $3 बिलियन का भुगतान किया है. नासा के ‘ह्यूमन लैंडिंग सिस्टम’ प्रोग्राम के उप प्रबंधक केंट चोजनाकी ने कहा, “बहुत कुछ इस पहली उड़ान पर निर्भर करेगा.”
जबलपुर क्रूज हादसा: आखिरी पल तक कलेजे से चिपका रहा मासूम, मां की बांहों में मिला शव; 9 की मौत
मध्य प्रदेश के जबलपुर में बरगी बांध पर हुए क्रूज हादसे में 9 लोगों की जान चली गई. कहा जा रहा है कि तेज आंधी और तूफान के कारण अनियंत्रित होकर क्रूज नर्मदा नदी में पलट गया. इस त्रासदी की सबसे मार्मिक तस्वीर तब सामने आई जब रेस्क्यू टीम को एक मां और उसके 3 साल के बेटे का शव मिला; मां ने अपनी लाइफ जैकेट में बच्चे को सीने से बांध रखा था.
‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित बरगी बांध में गुरुवार की शाम एक बड़ी त्रासदी में बदल गई. नर्मदा नदी में पर्यटन विभाग द्वारा संचालित एक क्रूज नौका पलटने से 9 लोगों की मौत हो गई है. यह हादसा न केवल मौसम की बेरुखी का परिणाम था, बल्कि यात्रियों ने प्रशासन और क्रूज ऑपरेटरों पर सुरक्षा मानकों की अनदेखी के गंभीर आरोप भी लगाए हैं. .
हादसे के समय क्रूज पर चालक दल सहित लगभग 43 यात्री सवार थे. प्रत्यक्षदर्शियों और अधिकारियों के अनुसार, शाम करीब 6 बजे मौसम ने अचानक करवट ली. देखते ही देखते हवा की गति 60 से 70 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच गई. तेज तूफानी हवाओं और लहरों के कारण नौका अपना संतुलन खो बैठी और बीच जलाशय में ही पलट गई. .
इस त्रासदी में सबसे चौंकाने वाली बात यात्रियों द्वारा लगाए गए सुरक्षा संबंधी आरोप हैं. जीवित बचे लोगों का दावा है कि ‘यात्रा शुरू होने के समय किसी को भी लाइफ जैकेट नहीं दी गई थी.’ एक पीड़ित, जूलियस, जिन्होंने इस हादसे में अपनी पत्नी को खो दिया. उन्होंने बताया कि जब नाव डूबने लगी और चीख-पुकार मची, तब कहीं जाकर कर्मचारियों ने लाइफ जैकेट बांटना शुरू किया. .
एक अन्य चश्मदीद सम्राट ने कहा कि मौसम खराब होते देख यात्रियों ने ऑपरेटर से नाव वापस किनारे पर ले जाने का अनुरोध किया था, लेकिन उनकी चेतावनी को अनसुना कर दिया गया. .
हादसे की सूचना मिलते ही एनडीआरएफ, राज्य आपदा प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन की टीमें मौके पर पहुंच गईं. गुरुवार रात से शुरू हुआ बचाव अभियान शुक्रवार तक जारी रहा, जिसमें अबतक 9 शव बरामद किए जा चुके हैं एवं करीब 15 से 16 लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया है, जबकि कुछ लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं.
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस घटना पर दुख व्यक्त किया है और प्रभावित परिवारों के प्रति संवेदना जताई है. राज्य सरकार ने प्रत्येक मृतक के परिजनों को 4 लाख रुपये के मुआवजे की घोषणा की है. साथ ही, पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए गए हैं. जांच में मुख्य रूप से दो बिंदुओं पर ध्यान देने की बात कही गई है. पहला, खराब मौसम की चेतावनी के बावजूद नाव का संचालन क्यों जारी रहा, और दूसरा, लाइफ जैकेट वितरण में देरी क्यों हुई.
‘छिपे हुए शुक्राणुओं’ की खोज: नई तकनीक ने उन पुरुषों को दी उम्मीद जिन्हें ‘बांझ’ घोषित कर दिया गया था
‘एआई’ संचालित एक नई तकनीक उन पुरुषों में शुक्राणु कोशिकाओं (स्पर्म सेल्स) का पता लगा रही है, जिन्हें बताया गया था कि उनके पास एक भी शुक्राणु नहीं है. यह तकनीक उन जोड़ों को माता-पिता बनने का एक और मौका दे रही है जो सालों से कोशिश कर रहे हैं.
नवंबर 2025 की शुरुआत में, अमेरिका के न्यू जर्सी में अपने घर की ओर गाड़ी चलाकर लौटते समय पेनेलोप को एक कॉल आया. यह उनके डॉक्टर का फोन था, जो वह खबर दे रहे थे- जिसका पेनेलोप को बेसब्री से इंतज़ार था. ढाई साल की पीड़ादायक कोशिशों के बाद, पेनेलोप आखिरकार गर्भवती थीं.
“बीबीसी” में कृपा पाधी की रिपोर्ट में कहा गया है कि आज के युग में जहाँ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है, चिकित्सा विज्ञान में इसका एक अत्यंत मानवीय और भावनात्मक अनुप्रयोग सामने आया है. कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा विकसित ‘स्टार’ सिस्टम उन पुरुषों के लिए वरदान साबित हो रहा है, जिन्हें चिकित्सा जगत ने ‘एज़ोस्पर्मिक’ घोषित कर दिया था, यानी वे पुरुष जिनके वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या शून्य मानी गई थी.
विश्व स्तर पर बांझपन एक गंभीर समस्या है, जो प्रजनन आयु के हर छह में से एक व्यक्ति को प्रभावित करती है. इसमें ‘पुरुष बांझपन’ का योगदान लगभग 50% मामलों में होता है. विशेष रूप से 1% पुरुष एज़ोस्पर्मिया से पीड़ित होते हैं. सैमुअल और पेनेलोप की कहानी इस संघर्ष का एक जीवंत उदाहरण है. सैमुअल क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम से ग्रस्त थे, जो एक आनुवंशिक स्थिति है जहाँ पुरुष एक अतिरिक्त ‘एक्स’ क्रोमोसोम के साथ पैदा होते हैं. इस स्थिति में शुक्राणुओं का उत्पादन न के बराबर होता है. सैमुअल को बताया गया था कि उनके जैविक पिता बनने की संभावना मात्र 20% है, जो किसी भी व्यक्ति के लिए एक गहरा मनोवैज्ञानिक झटका हो सकता है.
‘स्टार’ सिस्टम के विकास की कहानी अत्यंत रोचक है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी फर्टिलिटी सेंटर के निदेशक ज़ेव विलियम्स को इस तकनीक का विचार 2020 में खगोल विज्ञान के एक लेख से मिला. लेख में बताया गया था कि कैसे एआई का उपयोग ब्रह्मांड के विशाल डेटा में नए और धुंधले सितारों को खोजने के लिए किया जा रहा है. विलियम्स ने महसूस किया कि एक बांझ पुरुष के ऊतकों या वीर्य के नमूने में एक दुर्लभ शुक्राणु को खोजना भी एक विशाल आकाश में छोटे तारे को खोजने जैसा ही है.
मानवीय रूप से, एक तकनीशियन के लिए माइक्रोस्कोप के नीचे घंटों तक नमूने की एक-एक बूंद की जांच करना न केवल थकाऊ है, बल्कि इसमें त्रुटि की संभावना भी अधिक रहती है. ‘स्टार’ सिस्टम ने इसी समस्या का समाधान किया.
माइक्रोफ्लुइडिक्स और एआई का संगम
‘स्टार’ सिस्टम केवल एक सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग और एआई का एक जटिल मिश्रण है: माइक्रोफ्लुइडिक चिप्स: इसमें मानव बाल जितने पतले चैनल होते हैं, जिनसे होकर नमूना प्रवाहित होता है. हाई-स्पीड इमेजिंग: जैसे ही नमूना बहता है, सिस्टम प्रति सेकंड 300 छवियों की दर से तस्वीरें लेता है. एआई एल्गोरिदम: एआई इन छवियों का वास्तविक समय (रियल टाइम) में विश्लेषण करता है. यह कचरे, कोशिका के टुकड़ों और मलबे के ‘समुद्र’ में उस एक दुर्लभ, सक्रिय शुक्राणु को पहचान लेता है. जैसे ही एआई शुक्राणु की पहचान करता है, एक रोबोटिक प्रणाली मिलीसेकंड के भीतर उस विशिष्ट हिस्से को अलग कर लेती है, जिससे शुक्राणु को सुरक्षित रूप से निकाला जा सके.
परीक्षणों में पाया गया कि यह तकनीक मानवीय खोज की तुलना में 40 गुना अधिक प्रभावी है और इसकी संवेदनशीलता दर 100% है.
सफलता की पहली किरण
इस तकनीक की पहली बड़ी सफलता पिछले साल के अंत में मिली जब एक जोड़ा, जो 20 वर्षों से बांझपन से जूझ रहा था, ‘स्टार’ बेबी का माता-पिता बना. सैमुअल और पेनेलोप के मामले में भी यह तकनीक चमत्कारिक रही. सैमुअल के अंडकोष (टेस्टिकल्स) से प्राप्त ऊतकों में एआई ने 8 शुक्राणु खोज निकाले. इनमें से एक भ्रूण (ब्लास्टोसिस्ट) के रूप में विकसित हुआ और जुलाई 2026 में उनके घर पहले बेटे का आगमन संभावित है.
वर्तमान में, इस तकनीक का उपयोग करने वाले 175 रोगियों में से लगभग 30% मामलों में शुक्राणु खोजने में सफलता मिली है—ये वे लोग थे जिनके पास पहले कोई उम्मीद नहीं थी.
भविष्य की राह और सावधानियाँ
हालाँकि ‘स्टार’ सिस्टम ने चिकित्सा विज्ञान में नई ऊँचाइयों को छुआ है, लेकिन विशेषज्ञ सावधानी बरतने की सलाह भी देते हैं. वारविक यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सियोभान क्वेंबी के अनुसार, एआई के उत्साह में अक्सर ‘हैप्पी एंडिंग’ का अति-वादा कर दिया जाता है. बांझपन के उपचार महंगे होते हैं और जोड़े भावनात्मक रूप से असुरक्षित होते हैं. इसलिए, इस तकनीक के व्यापक उपयोग से पहले बड़े पैमाने पर नैदानिक परीक्षणों और नैतिक दिशा-निर्देशों की आवश्यकता है. चिकित्सा डेटा की गोपनीयता और जवाबदेही भी महत्वपूर्ण चुनौतियाँ हैं.
‘स्टार’ सिस्टम केवल एक तकनीकी आविष्कार नहीं है, बल्कि यह उस मानवीय इच्छाशक्ति का प्रतीक है जो विज्ञान के माध्यम से असंभव को संभव बनाने का प्रयास करती है. जहाँ पहले केवल ‘निराशा’ और ‘बांझपन’ जैसे शब्द थे, अब वहाँ ‘एआई’ और ‘उम्मीद’ ने अपनी जगह बना ली है. सैमुअल जैसे लाखों पुरुषों के लिए, यह तकनीक उनके अपने जैविक परिवार का सपना पूरा करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है. यह विज्ञान की उस शक्ति को दर्शाता है जो सुदूर अंतरिक्ष के सितारों को खोजने वाली तकनीक का उपयोग करके धरती पर नए जीवन की मुस्कान ला सकती है.
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.













